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लेखक: Soul_writer

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  • अधूरी इबादत भाग~24

    अधूरी इबादत भाग~24

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    भाग~24 सपनों का मलबा

     

    रूहानी की उंगलियाँ अभी भी कॉफी के गर्म मग के चारों ओर जकड़ी हुई थीं। उसके चेहरे पर एक पल को सिहरन दौड़ी, जैसे किसी ने उसका नाम नहीं, उसके भीतर का कोई राज़ पुकार लिया हो। मीना की सीधी, मासूम लेकिन भीतर तक घुसती हुई बात ने जैसे कमरे की हवा में एक अजीब सी बेचैनी घोल दी थी।

    एक हल्की साँस लेते हुए, खुद को संयत करते हुए रूहानी ने नज़रें मीना से हटाकर मेज़ की ओर फेर लीं, लेकिन शब्द उसके होंठों तक आ ही गए।

    “अद्वैत भी कल नीचे ही सोए थे… हम दोनों थक गए थे… ऊपर वाला कमरा बंद था, चाबी भी नहीं मिल रही थी। इसलिए सोचा नीचे आराम कर लें।”

    मीना ने कुछ पल तक उसे यूँ देखा, जैसे वह उसके शब्दों से कहीं ज़्यादा उसके चेहरे की रेखाएँ पढ़ने की कोशिश कर रही हो। 

    मीना हँसते हुए बोली, “अरे, मैं तो सोच रही थी अब ऊपर वाला कमरा खुल जाएगा… वैसे भी सर उसमें बस सोने ही तो जाते हैं। वैसे ठीक किया आपने नीचे सोकर, थक गए होंगे।” 

    रूहानी ने जवाब में सिर्फ सिर हिला दिया। मगर उसके भीतर अभी भी हलचल जारी थी। वो जानती थी, उसका जवाब सतही था। सच भी था, झूठ भी। जो कुछ बीत चुका था, वो बहुत कुछ कहता था….. मगर समझाने लायक नहीं।

    मीना अपना काम ख़त्म करके चली गई, मगर रूहानी की नज़र अब खिड़की के पार जा अटकी थी। बाहर हल्की धूप थी, वही पीली-सी जो सर्दियों में बिन बोले चुपचाप खिड़की पर बैठ जाती है। लेकिन रूहानी का मन कहीं और भटक रहा था।

    उसकी उंगलियाँ मग के गिर्द घूमती रहीं, मगर कॉफी अब ठंडी पड़ चुकी थी…… ठीक उसकी उम्मीदों की तरह, जो धीरे-धीरे ठंडी होती जा रही थीं… लेकिन बुझी नहीं थीं। एक बेचैनी सी उसके भीतर हिलोरें मार रही थी, जैसे कोई पुरानी चिंगारी फिर से जागने लगी हो। 

    उसने एक लंबी साँस ली और अपनी नज़रें खिड़की के पार से खींचते हुए खुद से बुदबुदाई, “बहुत दिन हो गए… अब और नहीं। आज मुझे स्टूडियो जाना ही होगा।”

    वो खुद को याद दिला रही थी…. स्टूडियो ही तो उसका असली ठिकाना था, उसका सपना, उसकी पहचान। वह जगह जिसने उसकी सोच को पंख दिए थे, जहां हर कोना उसकी मेहनत की खुशबू से महकता था। वहाँ लौटना, जैसे खुद के पास लौटना था। रूहानी ने धीरे से मग टेबल पर रखा, जैसे किसी पुराने वादे को फिर से थाम लिया हो।

    उसने खुद को आईने में देखा….. बाल बिखरे थे, चेहरा थका हुआ, पर आँखों में आज कुछ अलग था।

    एक ठहराव, एक संकल्प, एक जिद।

    “अब और देर नहीं,” उसने अपने आपसे कहा। अभी अद्वैत घर पर नहीं था, शायद किसी कवि सम्मलेन या लेखक मिलन समारोह में गया होगा। यही सही वक्त है। 

    वह अपने कमरे में गई। उसने वह बैग निकाला…. वही बैग जो यश ने उसे दिया था। वो धीरे से ज़िप खोली। अंदर पुराने स्केचबुक, कुछ फैब्रिक के टुकड़े, अधूरी डिज़ाइनिंग शीट्स… और फिर अचानक एक कोने में उसे कुछ चमकता हुआ दिखा…… एक छोटा सा मेटल का टुकड़ा।

    उसने उसे निकाला… उसकी आँखें भर आईं। उसमे स्टूडियो की चाबी थी। रूहानी के चेहरे पर एक धीमी-सी मुस्कान आई। एक उदास सी, लेकिन सच्ची।

    “तो तूने ये भी बचा लिया, यश…” उसके होंठों से निकला, जैसे कोई दबी हुई दुआ अनजाने में लौट आई हो।

    वो मुस्कुरा पड़ी। उसने चाबी को मुट्ठी में कस लिया। “वो सपना चुराया गया था, खत्म नहीं हुआ था।”

    फिर उसने बाहर का दरवाज़ा खोला….. बिलकुल वैसे ही जैसे किसी कमरे का नहीं, बल्कि अपने अंदर के डर का दरवाज़ा खोल रही हो। अब रूहानी फिर से अपने आप से मिलने जा रही थी….. उसी जगह जहाँ कभी उसकी आत्मा रंगों में घुलकर सांस लेती थी।

    ——————-

    रूहानी ने स्टूडियो के दरवाज़े पर खड़े होकर एक गहरी साँस ली। उसके भीतर एक तूफ़ान चल रहा था, लेकिन चेहरा शांत था….. जैसे कोई सैनिक जंग के मैदान में उतरने से पहले खुद को तैयार कर रहा हो। दरवाज़ा खोलते ही एक सड़ी-सी गंध ने उसका स्वागत किया, जैसे किसी ने जानबूझकर उसके सपनों को सड़ने के लिए छोड़ दिया हो।

    अंदर कदम रखते ही उसकी नज़र सबसे पहले उस मनीक्विन (Mannequin) एक प्रकार की मानव-आकार की मॉडल, पर पड़ी, जिस पर उसका पहला डिज़ाइन लटका था….. अब धूल और जाले से ढका हुआ। उसने धीरे से उस पर हाथ फेरा, जैसे किसी पुराने दोस्त को छू रही हो। पर कपड़ा अब भीगा हुआ था, शायद छत से पानी टपकता रहा होगा।

    रूहानी की उंगलियाँ उस जंग लगे सिलाई मशीन के हैंडल पर गई…… ठंडी, धूल सनी, और जैसे बरसों से किसी स्पर्श की प्रतीक्षा में जमी हुई। उस घिसी हुई सतह पर उसकी हथेलियों की नरमी धीरे-धीरे थरथराने लगी।

    वो वहीं ज़मीन पर बैठी, घुटनों को मोड़कर, कुहनी टिकाए, आँखें नीची किए। कभी इस स्टूडियो में उसकी हँसी गूंजती थी, मॉडल्स की चहक होती थी, और स्केचिंग के वक्त पेंसिल की खुरखुराहट किसी गीत जैसी लगती थी। लेकिन अब… अब बस टूटे शीशों की किरकिर और उस दीवार पर पड़ा कॉफी का दाग उसकी नाकामी का इश्तहार बना खड़ा था।

    “Copycat Studio — Talent Stolen Here!”

    उस एक वाक्य ने जैसे उसकी रगों में बर्फ घोल दी हो।

    “Steal?” वो बुदबुदाई।

    “किसी ने चुराया नहीं था… छीना था… जान-बूझकर। और मैंने… बस देखती रह गई।”

    उसने अपने घुटनों को सीने से लगाया और सिर टेक दिया। आँखों में आँसू तो अब भी नहीं थे। शायद इसलिए नहीं कि दुख कम हो गया था, बल्कि इसलिए कि दर्द अब खून की तरह बहना छोड़ चुका था। 

    टेबल से उड़कर ज़मीन पर बिखरे हुए बिजली और किराये के बिल उसके चारों ओर मौत के फरमान जैसे बिछे थे। हरेक कागज़ मानो चीख रहा था “तेरा सपना मर चुका है, अब बस उसकी लाश यहाँ सड़ रही है।”

    लेकिन रूहानी उस चीख को अनसुना कर चुकी थी। धीरे-धीरे वो उठी। उसकी चाल में थकावट थी, लेकिन वो थकावट शरीर की नहीं, आत्मा की थी। फिर भी उसने खुद को खींचा।

    दीवार की ओर बढ़ी, जहां अब भी कुछ फटे हुए स्केच टंगे थे। उसने एक को हाथ में लिया…. उसी डिज़ाइन का हिस्सा जो उसने अपनी पहली फैशन प्रतियोगिता के लिए बनाया था।

    फिर उसे याद आया… वो रात…. वो रात जब उसने घंटों बैठकर उस ड्रेस को रंगा था, हर सिलाई में अपने सपनों की महीन नब्ज़ सी टांकी थी। 

    पूरी रात उसने जागकर एक-एक टांका उस उम्मीद के साथ जोड़ा था, कि जब सुबह होगी तो उसका सपना रैंप पर चलेगा… उसके नाम के साथ, उसकी पहचान बनकर।

    और फिर… वो सुबह…… वो सुबह जब उस रैंप पर वही ड्रेस उतरी थी…. लेकिन किसी और के नाम से। किसी और के जिस्म पर। 

    जब उसने आँखों में आँसू और होंठों पर सन्नाटा लिए सवाल किया था, तो जवाब में बस एक बेमानी मुस्कान मिली थी।

    उसने अपने चारों ओर देखा… टूटा हुआ स्टूडियो था, पर नींव अभी थी। दीवारें भले ही धूल से सनी हों, लेकिन उन्होंने उसकी पसीने और जुनून से गढ़ी मेहनत को देखा था।

    तभी उसने एक स्टूल घसीटा, और उस पर बैठ गई। धीरे से अपने फोन का कैमरा ऑन किया और स्टूडियो की कुछ तस्वीरें लीं। हर टूटन, हर दरार, हर धब्बा।

    फिर इंस्टाग्राम पर पोस्ट किया –

    Chapter 1 – Rebuilding Ruins #RuhaniReturns

    वो जानती थी कि इसे देखकर कुछ लोग हँसेंगे, कुछ उंगली उठाएंगे। लेकिन इस बार वो डर नहीं रही थी क्योंकि सबसे बुरा गुजर चुका था।

    ————

    रात के तक़रीबन साढ़े ग्यारह बज चुके थे। अद्वैत थका-हारा लौटा, लेकिन जैसे ही घर में दाख़िल हुआ…. ड्रॉइंग रूम की हल्की-सी रौशनी और रूहानी की परछाईं उसकी नज़रों में आई। 

    वो अब भी जाग रही थी, सोफ़े पर बैठी, हाथों में एक पुराना स्केचबुक थामे… जैसे कोई खुद से बहस कर रहा हो।

    अद्वैत ने जूते उतारे, बैग रखा और धीरे से पूछा, “सोई नहीं अब तक?”

    रूहानी ने सिर उठाया। उसकी आंखों में नींद नहीं थी, बस एक दबी हुई उलझन थी। “नींद आ नहीं रही,” उसने हल्की सी मुस्कान के साथ कहा, “थोड़ा सोच रही थी।”

    अद्वैत ने पानी का गिलास लिया और वहीं पास बैठ गया। एक पल की चुप्पी रही।

    फिर रूहानी ने धीरे से कहा, “एक बात कहनी थी… मुझे तुमसे कुछ पैसे चाहिए।”

    अद्वैत ने चौंककर उसकी ओर देखा, “कितने?”

    रूहानी की आवाज़ थमी नहीं, “पच्चीस लाख रुपये… अभी।”

    कमरे में एक पल को ऐसा सन्नाटा छा गया जैसे दीवारें भी साँस रोककर वजह पूछना चाहती हो।

    ——- 

    क्या अद्वैत सच में मदद करेगा… या उसके सवालों में छिपा है कोई पुराना हिसाब?

    रूहानी ने जो माँगा… क्या वो सिर्फ पैसे थे? या कोई बीते रिश्ते की कीमत भी उसमें छुपी थी?

    और जब रूहानी ने कहा “अभी चाहिए”, तो क्या वो सिर्फ एक माँग थी… या किसी खतरे की आहट?

  • अधूरी इबादत भाग~23

    अधूरी इबादत भाग~23

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    भाग~23 अधूरे फासले 

     

    अद्वैत हर सुबह की तरह ठीक समय पर उठा। बाथरूम से बाहर निकलकर उसने घड़ी की ओर देखा… 6:45। रोज़ की तरह सिलसिलेवार ढंग से उसने अपनी शर्ट प्रेस की, बालों में हल्का सा जेल लगाया, फिर अपने स्टडी टेबल पर फाइल्स को अच्छे से समेटकर बैग में रख लिया। वो एक ऐसा आदमी था जिसे अपने जीवन में हर चीज़ को अनुशासन में रखना पसंद था….. हर भाव, हर फैसला, हर दिनचर्या।

    लेकिन आज उसकी सुबह में एक अजीब-सी बेचैनी थी, जिसे वह खुद भी ठीक से समझ नहीं पा रहा था। शायद इसलिए क्योंकि घर में अब वो अकेला नहीं था… फिर भी संवाद की कोई उम्मीद नहीं थी।

    बाहर निकलने से पहले स्टडी रूम के ताले की चाबी घुमाकर लॉक किया और फिर अपने कमरे का।

    वह सीढ़ियों से उतर कर मुख्य दरवाजे की तरफ जा ही रहा था तभी उसकी नज़र रूहानी के कमरे की ओर गई। दरवाज़ा हल्का सटा हुआ था। न कोई हलचल, न कोई आहट।

    कुछ पल के लिए वह वहीं ठिठक गया। उसका हाथ उठे लेकिन दरवाजे तक पहुंच नहीं पाए।

    वह चाहता था कि वो दरवाज़ा खटखटाए। 

    शायद पूछे, “ठीक हो?”

    शायद कहे, “मैं जा रहा हूँ, ज़रूरत हो तो कॉल कर लेना।”

    लेकिन फिर तो कुछ उसे रोक लेता है….. एक दीवार जो दोनों के बीच अब तक खड़ी है।

    ये रिश्ता, जो सिर्फ कागज़ी है, कहीं वो ये न समझ बैठे कि वह उसके जीवन में कुछ अधिक दखल देने लगा है।

    या फिर ये डर भी था कि अगर उसने दरवाज़ा खटखटाया, और जवाब में खामोशी मिली, तो दिनभर वो खामोशी उसकी सांसों से चिपकी रहेगी।

    उसने खुद को रोका, गहरी सांस ली और दरवाज़े की ओर से मुड़कर सीधे बाहर की ओर बढ़ गया। जूतों की धीमी आवाज़ फर्श पर गूंजती रही और जैसे ही दरवाज़ा बंद हुआ, घर फिर से उसी सन्नाटे में डूब गया…. जहाँ अब दो लोग थे, लेकिन दो अलग-अलग दुनिया में।

    अद्वैत के मन में एक हल्की-सी खटास रह गई…. शायद उस अनकहे संवाद की जो कभी हो नहीं पाया। पर उसने उसे भी अपनी दिनचर्या की तरह तह करके जेब में रख लिया, और चल पड़ा एक और व्यस्त दिन की ओर।

    अद्वैत के जाने के बाद मीना जब अपने नियत समय पर रोज़ की तरह घर का दरवाज़ा खोलकर अंदर दाख़िल हुई, तो उसे सब कुछ सामान्य लगा…. हॉल में वही हल्की सी धूल, किचन की खिड़की से आती धूप की पतली लकीर और अद्वैत सर की अनुपस्थिति का शांत एहसास। 

    वो धीरे-धीरे झाड़ू लगाते हुए कमरे दर कमरे बढ़ती चली गई, और आखिर में वह उस कमरे के दरवाज़े तक पहुँची, जो कल तक खाली रहा करता था…. अब जहाँ रूहानी थी।

    दरवाज़ा आंशिक रूप से खुला था और मीना जैसे ही अंदर गई, उसकी नज़र सीधे बिस्तर पर लेटी रूहानी पर पड़ी। पहले तो वो ठिठक गई।

    रूहानी गहरी नींद में थी, पर उसकी करवटें बेचैनी बयां कर रही थीं। उसके माथे पर हलकी लटें चिपकी थीं, जैसे कोई सपना उसे भीतर से उलझाए हुए हो। 

    मीना की नज़र उसके गले के चारों ओर घूमे मंगलसूत्र पर गई, और फिर मांग में भरे सिंदूर पर टिक गई। उसके चेहरे पर अचानक एक धीमा-सा विस्मय था, फिर उसने खुद को संयत किया और रूहानी के पास आकर धीरे से बोली,

    “मैडम… दिन चढ़ने वाला है… क्या अब उठेंगी आप?”

    रूहानी उस आवाज़ से चौंकी, जो नींद के घने कोहरे में किसी हल्की दस्तक जैसी थी। कुछ पल तो उसे समझ ही नहीं आया कि कौन बोल रहा है। 

    आंखें पूरी तरह खुलीं तो सामने मीना को खड़ा पाया, हल्की मुस्कराहट के साथ, जैसे उसने नींद से किसी सपने को जगा दिया हो।

    “मैडम, दिन चढ़ गया है… उठ जाइए?”

    रूहानी झेंप गई, हड़बड़ा कर उठकर बैठ गई, बाल बिखरे हुए थे, चेहरा अभी तक नींद और उलझन से भरा था। कुछ देर को वो बस देखती रही मीना की ओर, फिर खुद को संभालते हुए धीमे स्वर में बोली, “तुम साफ-सफाई कर लो… और मेरे लिए एक कॉफी बना देना। मैं अभी आती हूँ।”

    मीना ने सिर हिलाया, “जी मैडम” और काम में लग गई।

    रूहानी कमरे से बाहर आई तो अब वो पहले जैसी नहीं थी। कल जो तूफान आया था उसकी लहरें अब भी उसकी आंखों में थीं, पर उनमें अब एक संकल्प की परत भी थी। 

    उसने सफेद कुर्ता पहना था, सिंपल, लेकिन उसके चेहरे की गंभीरता और आंखों की थकान उसे और गहराई देती जा रही थी। जब वो किचन में पहुँची तो मीना वहां झाड़ू लगा रही थी।

    “तुम्हारी बेटी का बर्थडे कब है?” रूहानी ने अचानक पूछा, सोफे पर बैठते हुए।

    मीना ने चौंक कर उसकी ओर देखा, उसे याद आया कि उसने ही रूहानी को बोला था अपनी बेटी के लिए डिज़ाइनर कपड़े बनाने के लिए।

    इसके साथ ही मीना फिर से आंखों में चमक लिए मुस्कुराई, “बस एक हफ्ते में, मैडम।”

    “ठीक है, आज शाम को उसे लेते आना… उसका नाप लेना है।” रूहानी का लहजा स्थिर था, लेकिन उस स्थिरता में अपनापन था।

    मीना अब कॉफी बनाने लगी, लेकिन उसके चेहरे पर अब सवालों की परछाइयाँ उतर आई थीं। वो अब तक खुद को रोक रही थी, पर अब उससे रहा नहीं गया। 

    पहले उसने कॉफी का मग रूहानी को दिया, फिर अपने लिए भी एक पुराना मग निकाल कर उसमें कॉफी डाली और फर्श पर बैठ गई। 

    इस वक्त वो मेड नहीं, एक औरत थी… जो एक दूसरी औरत की उलझनों को समझना चाहती थी।

    “मैडम…” उसने धीरे से पूछा, “आपकी शादी कब हुई? और कहीं हमारे अद्वैत सर से तो नहीं हुई?”

    रूहानी के हाथ ठिठक गए। उसने नजर झुका लिया, जैसे इस सवाल का जवाब किसी भारी अलमारी के पीछे छिपा हो। उसके गले में लटकता मंगलसूत्र हल्की थरथराहट के साथ उसकी सांसों की लय में हिल रहा था।

    “बहुत जल्दी में हो गई… बताने का समय नहीं मिला,” रूहानी ने आखिरकार धीमे स्वर में कहा।

    मीना के चेहरे पर अब संदेह नहीं, पुष्टि थी। “आपके पति अद्वैत सर ही हैं न?”

    रूहानी ने कुछ नहीं कहा, बस धीमे से ‘हाँ’ में सिर हिला दिया। लेकिन उसने महसूस किया कि उसके भीतर जैसे कोई सिहरन दौड़ गई थी। 

    ‘पति’ शब्द उसके लिए अब भी अजनबी-सा था। वो अब भी इस रिश्ते को पूरी तरह महसूस नहीं कर पाई थी…. कागज़ पर नाम जुड़ने से आत्मा का बंधन नहीं बनता, ये बात उसके अंदर गूंज रही थी।

    मीना की आंखों में हल्की चमक उभरी, जैसे कोई पहेली सुलझ गई हो।

    वह एक हल्की मुस्कान के साथ बोली, “मैडम… माफ कीजिएगा, पर एक बात कहूँ?”

    रूहानी जो अब तक खिड़की की तरफ देखती हुई खोई हुई थी, चौंककर उसकी ओर मुड़ी, “हां, बोलो मीना।”

    मीना ने आंखें नीचे किए हुए धीरे से कहा, “अद्वैत सर को ज़रूर आपसे पहली नज़र में प्यार हो गया होगा… वरना वो तो आज तक किसी औरत को आंख उठाकर भी नहीं देखते थे। उनकी पहली पत्नी के जाने के बाद तो जैसे उनका दिल पत्थर हो गया था।”

    मीना की आवाज़ में एक भोली सच्चाई थी, जो सीधे रूहानी के भीतर कहीं गहराई तक उतर गई। उसकी आँखें पलभर को भी झपकी नहीं और न ही वह उसकी बातों पर मुस्कुरा नहीं सकी। 

    वो केवल कॉफी के कप में अपनी उंगलियों को लपेटे बैठी रही। उसकी आंखें थोड़ी दूर, किसी अदृश्य दीवार को घूर रही थीं।

    तभी मीना पूछ बैठी, “लेकिन आप नीचे के कमरे में क्यों सो रही थीं, सर का कमरा तो ऊपर है।”

    रूहानी की उंगलियाँ अचानक कॉफी के मग पर जकड़ गई और उसकी आंखें मीना की तरफ उठी…. चुप, लेकिन कुछ छिपाती हुईं।

    एक पल को कमरे की हवा जैसे ठहर सी गई……..

    ——-

    अब रूहानी मीना को क्या जवाब देगी?

    क्या अद्वैत के दिल में कोई अनकहा दर्द छुपा है, जो रूहानी को नहीं दिखता?

    उस दरवाज़े के पीछे छिपा क्या कोई राज़ है, जिसे खोलने की हिम्मत कोई नहीं कर पा रहा?

  • अधूरी इबादत भाग~23

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    भाग~23 अधूरे फासले 

     

    अद्वैत हर सुबह की तरह ठीक समय पर उठा। बाथरूम से बाहर निकलकर उसने घड़ी की ओर देखा… 6:45। रोज़ की तरह सिलसिलेवार ढंग से उसने अपनी शर्ट प्रेस की, बालों में हल्का सा जेल लगाया, फिर अपने स्टडी टेबल पर फाइल्स को अच्छे से समेटकर बैग में रख लिया। वो एक ऐसा आदमी था जिसे अपने जीवन में हर चीज़ को अनुशासन में रखना पसंद था….. हर भाव, हर फैसला, हर दिनचर्या।

    लेकिन आज उसकी सुबह में एक अजीब-सी बेचैनी थी, जिसे वह खुद भी ठीक से समझ नहीं पा रहा था। शायद इसलिए क्योंकि घर में अब वो अकेला नहीं था… फिर भी संवाद की कोई उम्मीद नहीं थी।

    बाहर निकलने से पहले स्टडी रूम के ताले की चाबी घुमाकर लॉक किया और फिर अपने कमरे का।

    वह सीढ़ियों से उतर कर मुख्य दरवाजे की तरफ जा ही रहा था तभी उसकी नज़र रूहानी के कमरे की ओर गई। दरवाज़ा हल्का सटा हुआ था। न कोई हलचल, न कोई आहट।

    कुछ पल के लिए वह वहीं ठिठक गया। उसका हाथ उठे लेकिन दरवाजे तक पहुंच नहीं पाए।

    वह चाहता था कि वो दरवाज़ा खटखटाए। 

    शायद पूछे, “ठीक हो?”

    शायद कहे, “मैं जा रहा हूँ, ज़रूरत हो तो कॉल कर लेना।”

    लेकिन फिर तो कुछ उसे रोक लेता है….. एक दीवार जो दोनों के बीच अब तक खड़ी है।

    ये रिश्ता, जो सिर्फ कागज़ी है, कहीं वो ये न समझ बैठे कि वह उसके जीवन में कुछ अधिक दखल देने लगा है।

    या फिर ये डर भी था कि अगर उसने दरवाज़ा खटखटाया, और जवाब में खामोशी मिली, तो दिनभर वो खामोशी उसकी सांसों से चिपकी रहेगी।

    उसने खुद को रोका, गहरी सांस ली और दरवाज़े की ओर से मुड़कर सीधे बाहर की ओर बढ़ गया। जूतों की धीमी आवाज़ फर्श पर गूंजती रही और जैसे ही दरवाज़ा बंद हुआ, घर फिर से उसी सन्नाटे में डूब गया…. जहाँ अब दो लोग थे, लेकिन दो अलग-अलग दुनिया में।

    अद्वैत के मन में एक हल्की-सी खटास रह गई…. शायद उस अनकहे संवाद की जो कभी हो नहीं पाया। पर उसने उसे भी अपनी दिनचर्या की तरह तह करके जेब में रख लिया, और चल पड़ा एक और व्यस्त दिन की ओर।

    अद्वैत के जाने के बाद मीना जब अपने नियत समय पर रोज़ की तरह घर का दरवाज़ा खोलकर अंदर दाख़िल हुई, तो उसे सब कुछ सामान्य लगा…. हॉल में वही हल्की सी धूल, किचन की खिड़की से आती धूप की पतली लकीर और अद्वैत सर की अनुपस्थिति का शांत एहसास। 

    वो धीरे-धीरे झाड़ू लगाते हुए कमरे दर कमरे बढ़ती चली गई, और आखिर में वह उस कमरे के दरवाज़े तक पहुँची, जो कल तक खाली रहा करता था…. अब जहाँ रूहानी थी।

    दरवाज़ा आंशिक रूप से खुला था और मीना जैसे ही अंदर गई, उसकी नज़र सीधे बिस्तर पर लेटी रूहानी पर पड़ी। पहले तो वो ठिठक गई।

    रूहानी गहरी नींद में थी, पर उसकी करवटें बेचैनी बयां कर रही थीं। उसके माथे पर हलकी लटें चिपकी थीं, जैसे कोई सपना उसे भीतर से उलझाए हुए हो। 

    मीना की नज़र उसके गले के चारों ओर घूमे मंगलसूत्र पर गई, और फिर मांग में भरे सिंदूर पर टिक गई। उसके चेहरे पर अचानक एक धीमा-सा विस्मय था, फिर उसने खुद को संयत किया और रूहानी के पास आकर धीरे से बोली,

    “मैडम… दिन चढ़ने वाला है… क्या अब उठेंगी आप?”

    रूहानी उस आवाज़ से चौंकी, जो नींद के घने कोहरे में किसी हल्की दस्तक जैसी थी। कुछ पल तो उसे समझ ही नहीं आया कि कौन बोल रहा है। 

    आंखें पूरी तरह खुलीं तो सामने मीना को खड़ा पाया, हल्की मुस्कराहट के साथ, जैसे उसने नींद से किसी सपने को जगा दिया हो।

    “मैडम, दिन चढ़ गया है… उठ जाइए?”

    रूहानी झेंप गई, हड़बड़ा कर उठकर बैठ गई, बाल बिखरे हुए थे, चेहरा अभी तक नींद और उलझन से भरा था। कुछ देर को वो बस देखती रही मीना की ओर, फिर खुद को संभालते हुए धीमे स्वर में बोली, “तुम साफ-सफाई कर लो… और मेरे लिए एक कॉफी बना देना। मैं अभी आती हूँ।”

    मीना ने सिर हिलाया, “जी मैडम” और काम में लग गई।

    रूहानी कमरे से बाहर आई तो अब वो पहले जैसी नहीं थी। कल जो तूफान आया था उसकी लहरें अब भी उसकी आंखों में थीं, पर उनमें अब एक संकल्प की परत भी थी। 

    उसने सफेद कुर्ता पहना था, सिंपल, लेकिन उसके चेहरे की गंभीरता और आंखों की थकान उसे और गहराई देती जा रही थी। जब वो किचन में पहुँची तो मीना वहां झाड़ू लगा रही थी।

    “तुम्हारी बेटी का बर्थडे कब है?” रूहानी ने अचानक पूछा, सोफे पर बैठते हुए।

    मीना ने चौंक कर उसकी ओर देखा, उसे याद आया कि उसने ही रूहानी को बोला था अपनी बेटी के लिए डिज़ाइनर कपड़े बनाने के लिए।

    इसके साथ ही मीना फिर से आंखों में चमक लिए मुस्कुराई, “बस एक हफ्ते में, मैडम।”

    “ठीक है, आज शाम को उसे लेते आना… उसका नाप लेना है।” रूहानी का लहजा स्थिर था, लेकिन उस स्थिरता में अपनापन था।

    मीना अब कॉफी बनाने लगी, लेकिन उसके चेहरे पर अब सवालों की परछाइयाँ उतर आई थीं। वो अब तक खुद को रोक रही थी, पर अब उससे रहा नहीं गया। 

    पहले उसने कॉफी का मग रूहानी को दिया, फिर अपने लिए भी एक पुराना मग निकाल कर उसमें कॉफी डाली और फर्श पर बैठ गई। 

    इस वक्त वो मेड नहीं, एक औरत थी… जो एक दूसरी औरत की उलझनों को समझना चाहती थी।

    “मैडम…” उसने धीरे से पूछा, “आपकी शादी कब हुई? और कहीं हमारे अद्वैत सर से तो नहीं हुई?”

    रूहानी के हाथ ठिठक गए। उसने नजर झुका लिया, जैसे इस सवाल का जवाब किसी भारी अलमारी के पीछे छिपा हो। उसके गले में लटकता मंगलसूत्र हल्की थरथराहट के साथ उसकी सांसों की लय में हिल रहा था।

    “बहुत जल्दी में हो गई… बताने का समय नहीं मिला,” रूहानी ने आखिरकार धीमे स्वर में कहा।

    मीना के चेहरे पर अब संदेह नहीं, पुष्टि थी। “आपके पति अद्वैत सर ही हैं न?”

    रूहानी ने कुछ नहीं कहा, बस धीमे से ‘हाँ’ में सिर हिला दिया। लेकिन उसने महसूस किया कि उसके भीतर जैसे कोई सिहरन दौड़ गई थी। 

    ‘पति’ शब्द उसके लिए अब भी अजनबी-सा था। वो अब भी इस रिश्ते को पूरी तरह महसूस नहीं कर पाई थी…. कागज़ पर नाम जुड़ने से आत्मा का बंधन नहीं बनता, ये बात उसके अंदर गूंज रही थी।

    मीना की आंखों में हल्की चमक उभरी, जैसे कोई पहेली सुलझ गई हो।

    वह एक हल्की मुस्कान के साथ बोली, “मैडम… माफ कीजिएगा, पर एक बात कहूँ?”

    रूहानी जो अब तक खिड़की की तरफ देखती हुई खोई हुई थी, चौंककर उसकी ओर मुड़ी, “हां, बोलो मीना।”

    मीना ने आंखें नीचे किए हुए धीरे से कहा, “अद्वैत सर को ज़रूर आपसे पहली नज़र में प्यार हो गया होगा… वरना वो तो आज तक किसी औरत को आंख उठाकर भी नहीं देखते थे। उनकी पहली पत्नी के जाने के बाद तो जैसे उनका दिल पत्थर हो गया था।”

    मीना की आवाज़ में एक भोली सच्चाई थी, जो सीधे रूहानी के भीतर कहीं गहराई तक उतर गई। उसकी आँखें पलभर को भी झपकी नहीं और न ही वह उसकी बातों पर मुस्कुरा नहीं सकी। 

    वो केवल कॉफी के कप में अपनी उंगलियों को लपेटे बैठी रही। उसकी आंखें थोड़ी दूर, किसी अदृश्य दीवार को घूर रही थीं।

    तभी मीना पूछ बैठी, “लेकिन आप नीचे के कमरे में क्यों सो रही थीं, सर का कमरा तो ऊपर है।”

    रूहानी की उंगलियाँ अचानक कॉफी के मग पर जकड़ गई और उसकी आंखें मीना की तरफ उठी…. चुप, लेकिन कुछ छिपाती हुईं।

    एक पल को कमरे की हवा जैसे ठहर सी गई……..

    ——-

    अब रूहानी मीना को क्या जवाब देगी?

    क्या अद्वैत के दिल में कोई अनकहा दर्द छुपा है, जो रूहानी को नहीं दिखता?

    उस दरवाज़े के पीछे छिपा क्या कोई राज़ है, जिसे खोलने की हिम्मत कोई नहीं कर पा रहा?

  • अधूरी इबादत भाग~22

    अधूरी इबादत भाग~22

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

    भाग~22 रिश्तों की खामोश लौ

     

    अद्वैत अब भी रूहानी का हाथ थामे हुए था, उसकी पकड़ में एक अजीब सी दृढ़ता थी… जैसे वो दुनिया से कह देना चाहता हो कि अब ये साथ अधूरा नहीं रहेगा, चाहे रिश्ता कागज़ों पर लिखा हो या बस हालातों से बंधा हो। वो दोनों जैसे ही कार के पास पहुँचे, पीछे से यश की आवाज़ आई—हांफती, लेकिन साफ़ और भावनाओं से भरी हुई।

    “दीदी!” यश ने पुकारा। उसके हाथ में एक बड़ा सा नीला बैग था।

    रूहानी और अद्वैत दोनों एक साथ मुड़े। रूहानी ने देखा…. यश धीरे-धीरे उनकी ओर आ रहा था, उसकी आंखों में चमक थी, लेकिन चेहरे पर अजीब-सी गंभीरता भी थी, जो उसके उम्र से बड़ी लग रही थी। 

    यश ने नीले बैग को रूहानी की ओर बढ़ाया। “ये लो दीदी,” उसने नरम आवाज़ में कहा, “आपके ड्रेस डिज़ाइनिंग का सारा सामान है इसमें।”

    रूहानी ने हैरानी से बैग को देखा। उसकी आंखें यश के चेहरे को पढ़ने लगीं, लेकिन कुछ कह नहीं पाईं। उसकी उंगलियाँ हौले से उस पुराने बैग के किनारे पर चली गईं, जैसे वो उसकी आत्मा की कोई भूली-बिसरी परत हो।

    यश ने रुककर साँस ली, फिर कहा, “जब पिछली बार आप घर से चली गई थीं, उस दिन… जब माँ-पापा आप पर गुस्सा हुए थे, तो आपके जाने के बाद उन्होंने आपके सारे कपड़े और आपसे जुड़े सारा सामान सबकुछ एक बैग में भरकर बाहर फेंक दिया था।”

    “मैं… आपके कपड़े और बाकी सामान तो नहीं बचा पाया,” यश की आवाज़ टूटने लगी, “लेकिन जब पापा आपकी चीजें फेंक रहे थे, तो मैंने आपकी स्केचबुक, कुछ फैब्रिक सैंपल्स, आपकी डिज़ाइन की हुई कुछ ड्रेसेस के नमूने… सब कुछ चुपचाप इस बैग में भर लिया था। तबसे ये मेरे पास ही था। आज लगा, आपको देना चाहिए। ये आपका सपना है ना दीदी, इससे जुड़ी हर चीज़…”

    वो चुप हो गया।

    रूहानी का कंठ भर आया। उसने हौले से बैग को अपने हाथों में लिया, जैसे कोई माँ अपनी खोई हुई संतान को गले लगाती है। उसकी उंगलियाँ बैग की ज़िप पर फिसलीं, जैसे उसे यकीन नहीं हो रहा हो कि जो वो पकड़े हुए है, वो उसका है… उसका सपना, उसका जुनून, उसका अस्तित्व।

    अद्वैत ने एक पल के लिए रूहानी की ओर देखा…. उसकी आंखें अब भीगी हुई थीं, लेकिन उनमें एक अजीब सी चमक थी। जैसे उस बैग ने उसे फिर से याद दिलाया हो कि वो सिर्फ एक “किसी की पत्नी” नहीं, बल्कि अपने आप में भी कुछ है। उसका एक नाम है, एक पहचान है, जो इस रिश्ते से पहले की भी थी।

    रूहानी ने वह बैग जमीन पर रख दिया और बिना कुछ कहे यश को गले लगा लिया। ये सिर्फ़ एक भाई-बहन का आलिंगन नहीं था, ये उन सपनों की रक्षा का शुक्रिया था, जिनकी कीमत किसी ने नहीं समझी… सिवाय यश के।

    अद्वैत एक कोने में खड़ा ये सब देख रहा था। उसके चेहरे पर कोई प्रतिक्रिया नहीं थी, लेकिन उसके सीने में कुछ दरक रहा था। वो जानता था, रूहानी की ये मुस्कान, उसका ये कांपता गला… ये सब यूँ ही नहीं था। किसी ने उसके सबसे गहरे हिस्से को छुआ था…. उस हिस्से को जिसे समाज ने कुचलने की कोशिश की थी।

    रूहानी ने एक लंबी, भारी साँस ली, जैसे उसकी आत्मा खुद को भीतर से संवार रही हो। फिर उसने यश के दोनों गालों को अपने हाथों में भर लिया। उसकी आँखें अब भी भीगी थीं, लेकिन उनमें एक स्पष्टता थी, एक दृढ़ता जिसे कोई माँ भी पहचान जाती।

    “यश,” उसकी आवाज़ धीरे लेकिन बेहद साफ़ थी, “अपनी दीदी की बात मानोगे न?”

    यश ने बिना झिझक के जवाब दिया, “हाँ… ज़रूर।”

    रूहानी मुस्कुराई नहीं, पर उसकी आँखों में एक संतोष झलक पड़ा। फिर वो झुक कर धीरे से बोली, “तुमसे माँ-पापा बहुत प्यार करते हैं। उन्होंने तुझे पाने के लिए कितनी मिन्नतें की थीं… तेरा जन्म उनके लिए किसी चमत्कार से कम नहीं था। तू उनके दुलारे बेटे है। इसलिए अब… मुझसे कोई संपर्क मत करना। नहीं तो… वो तेरा फ़ोन भी छीन लेंगे, और मैं नहीं चाहती कि मेरी वजह से तुझे डाँट पड़े।”

    यश की आँखों में आँसू और भी तेजी से उतर आए। उसकी ठुड्डी काँप रही थी। 

    रूहानी ने अपनी बात आगे बढ़ाई, “तुम्हें अभी बहुत कुछ करना है, बहुत आगे जाना है। अगले साल तुम्हारे दसवीं के एग्ज़ाम हैं न? अच्छे से पढ़ाई करना। जब तुम मेडल जीतोगे न, तो मैं खुद तुमसे मिलने आऊंगी। लेकिन अभी के लिए… किसी और चीज़ में ध्यान मत भटकाना और जो तुम्हारा शौक है, उसे जरूर आगे बढ़ाना।” 

    “द…दीदी…” यश के गालों पर आँसू ढुलक पड़े, उसने रूहानी की कलाई थाम ली, “ऐसा मत बोलो… मुझे अपने से दूर मत करो… मैं बहुत अकेला हो जाऊंगा…”

    रूहानी ने खुद को संयमित किया। उसके कंधे भारी हो चुके थे लेकिन आंखें अब भी बहने से इनकार कर रही थीं।

    रूहानी ने उसे धीरे से थपथपाया, “मैं भी तुम्हें बहुत प्यार करती हूँ, यश। इसलिए तुम्हें ये सब कहना पड़ रहा है।”

    उसी वक्त, अद्वैत ने कार का ड्राइविंग सीट वाला दरवाजा खोला और उसमें बैठ गया। उसकी मौजूदगी दोनों के लिए एक मजबूत सहारा बन गई थी। 

    रूहानी ने अद्वैत को बैठते हुए देखा, फिर यश की ओर देखते हुए बोली, “जा, भाई। माँ-पापा गुस्सा हो जाएंगे।”

    यश ने वो नीला बैग उठाया और कार के बैक सीट पर रख दिया। उसने एक बार फिर रूहानी को देखा, फिर बोला, “अलविदा, दीदी। जल्दी मिलेंगे।”

    रूहानी ने बस सिर हिलाकर जवाब दिया और उसने अपने छोटे भाई को एक बार फिर गले लगा लिया, अपने दिल में ये दुआ करते हुए कि ये अलविदा एक दिन फिर से मिलने का रास्ता बनाए।

    जब यश दूर जाने लगा, तो रूहानी और अद्वैत कार में बैठे। अद्वैत ने इंजन स्टार्ट किया और कार धीरे-धीरे गाड़ी को मोड़ती हुई निकल पड़ी उस सफर पर जहां कोई मंजिल नहीं थी…. या शायद मंज़िल अब उसी यात्रा में ही छुपी थी। 

    सफर के दौरान कार के भीतर एक बोझिल-सी खामोशी पसरी हुई थी। जैसे कोई पुराना गीत धीरे-धीरे बंद हो गया हो, लेकिन उसकी गूंज अभी भी दिल के किसी कोने में बाकी हो। दोनों की सांसें चल रही थीं, मगर जैसे शब्दों की कोई ज़रूरत नहीं बची थी।

    अद्वैत कार ड्राइव कर रहा था, उसकी निगाहें सड़क पर थीं, लेकिन उसका मन अंदर ही अंदर भटक रहा था….. उलझनों, सवालों और किसी अनकहे बोझ से भरा हुआ।

    रूहानी अपनी सीट पर खिड़की से सिर टिकाए बैठी थी, उसकी आंखें बंद थीं, लेकिन नींद उनसे कोसों दूर थी। वो कुछ देखना नहीं चाहती थी, शायद इस दुनिया से कुछ देर के लिए खुद को काट देना चाहती थी। हवा उसके चेहरे से टकरा रही थी, पर कोई ठंडक नहीं पहुंचा पा रही थी…. उसके भीतर की तपन अब और किसी छांव से बुझ नहीं सकती थी।

    अद्वैत ने एक बार नजरें उठाकर उसकी ओर देखा। वो कुछ कहना चाहता था शायद, कुछ ऐसा जो उसके मन में काफी देर से अटका था, पर फिर खुद को रोक लिया। इस वक़्त, कोई भी शब्द जैसे ज़ख्मों को कुरेदने जैसा होता। दोनों ही उस खामोशी को तोड़ना नहीं चाहते थे जो इस वक्त उनके बीच एक नाज़ुक पुल बन गई थी।

    जब कार अद्वैत के अपार्टमेंट के नीचे आकर रुकी, तब तक शाम ढल चुकी थी। सड़क किनारे पीली रोशनी में पत्तों की परछाइयाँ झूल रही थीं। शहर की भीड़-भाड़ से दूर, ये इलाका थोड़ा शांत था….. शायद उतना ही जितना इस वक़्त रूहानी के मन को चाहिए था।

    अद्वैत पहले बाहर निकला, फिर पीछे की सीट से चुपचाप रूहानी का बैग उठाया। वह कुछ नहीं बोला, सिर्फ उसके निकलने का इंतज़ार करता रहा। रूहानी धीरे-धीरे दरवाज़ा खोलकर उतरी, मानो किसी अनजाने देश की ज़मीन पर कदम रख रही हो….. एक नई शुरुआत, एक अनजाना ठिकाना, एक अनकहा रिश्ता।

    अद्वैत अपार्टमेंट की ओर बढ़ा, और बिना किसी औपचारिकता के दरवाज़ा खोलकर सीधा बैग किचन से सटे एक कमरे में रख दिया। सारा सामान रखने के बाद वह हाल में लौट आया, जहाँ रूहानी अब भी दरवाज़े के पास खड़ी थी, थोड़ी हिचकिचाहट, थोड़ी थकावट और थोड़ी सी उलझन के साथ।

    “फ्रेश हो जाओ,” अद्वैत ने कहा, उसकी आवाज़ में न कोई अधिकार था, न कोई औपचारिकता….. बस एक सादा-सा ख्याल, “और खाने के बाद ही सोना, ठीक है?”

    रूहानी थोड़ी चौंकी। उसने नजर उठाकर उसकी तरफ देखा।

    अब जबकि वो दोनों अकेले थे,जब कोई तमाशबीन नज़र नहीं थी, जब कोई समाज का डर भी सिर पर नहीं था, तब भी अद्वैत उसकी फिक्र क्यों कर रहा था?

    सिर्फ एक कानूनी करार का साथी होने के बावजूद, वह इतनी संजीदगी से पेश क्यों आ रहा था?

    उसके चेहरे की उलझन अद्वैत की नजर से छुप नहीं सकी। वह समझ गया कि रूहानी के मन में क्या चल रहा है। इसलिए बिना कोई सवाल उठने दिए, उसने खुद ही कहा, “मीना ने खाना बनाकर रख दिया था। और वैसे भी, दोपहर से अभी तक हमने कुछ खाया नहीं है। मैं भी फ्रेश होकर आता हूँ।”

    इतना कहकर वह सीढ़ियाँ चढ़कर अपने कमरे की ओर चला गया, जैसे उसे रूहानी को किसी उत्तर का बोझ नहीं देना था, बस उसकी थकान समझनी थी।

    रूहानी धीरे से कमरे की ओर बढ़ी, जो अद्वैत ने उसके लिए तय किया था। कमरे में रखी चीज़ें बिलकुल करीने से थीं, एक छोटी-सी अलमारी, एक साफ़-सुथरा बिस्तर, और एक कोने में रखा छोटा-सा नाइट लैम्प।

    उसने बैग की चेन खोली और हल्के हाथों से अपना सामान देखने लगी… वही कतरनें, वही डिजाइनिंग के स्केच, कुछ अधूरी नोटबुक्स और यादों से भरी हुई सिलवटें।

    कमरे की खिड़की से बाहर झांकते हुए वो बस बैठ गई—चुपचाप। उसकी पलकों पर आज कोई सपना नहीं था, बस एक एहसास था, कि शायद उसे पहली बार किसी ने बिना कुछ कहे, पूरी तरह समझ लिया था।

    उसका दिल तेज़ी से धड़क रहा था। न वो किसी प्रेम में थी, न कोई लगाव जागा था अभी तक। ये रिश्ता तो अब भी बस कागज़ पर दर्ज था, एक समझौता, एक अनुबंध। मगर इस समझौते में अद्वैत ने जो शालीनता, जो आदर और जो स्नेह बिना बोले दे दिया था, वह रूहानी के भीतर एक हल्की सी लौ जला गया था।

    एक ऐसी लौ, जो शायद आने वाले समय में उम्मीद बन सकती थी… या फिर सिर्फ एक याद। मगर इस वक़्त, वह लौ ही उसके लिए काफी थी।

    ——-

    क्या अद्वैत वाकई सिर्फ एक समझौते का हिस्सा है… या उसके खामोशी में कोई अनकहा इकरार छुपा है?

    क्या रूहानी उस लौ को पहचान पाएगी, जो उसके भीतर धीमे-धीमे जलने लगी है?

    और जब अतीत की परछाइयाँ फिर लौटेंगी, तब क्या ये नाज़ुक सा सुकून टिक पाएगा… या बिखर जाएगा एक और बार?

  • अधूरी इबादत भाग~21

    अधूरी इबादत भाग~21

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    भाग~21 आख़िर बोल पड़ी रूहानी 

     

    जानकी के थप्पड़ मारते ही रूहानी की देह जैसे संतुलन खो बैठी। गाल की जलन, कानों की गूंज और माँ के हाथों की बेरुखी….. उसे सब कुछ एक साथ महसूस हो रहा था। 

    रूहानी का चेहरा झटक कर एक तरफ मुड़ गया और उसकी आँखों में कुछ बुझ-सा गया। उसका शरीर जैसे लड़खड़ा गया, अंदर से जान निकलती महसूस हुई और वह बगल में खड़े अद्वैत की तरफ झुक गई, जैसे आत्मा ही खिंचकर उसके पास चली गई हो।

    वो उस पर केवल गिरी नहीं थी बल्कि वो उसमें समा गई। उसका माथा अद्वैत की कंधे से आकर लगा और हाथ खुद-ब-खुद उसकी बाहों को थामते चले गए, जैसे अगर अब उसने उसे नहीं थामा तो वह चूर-चूर होकर ज़मीन पर बिखर जाएगी।

    अद्वैत, जो अब तक भीड़ और तमाशे के बीच सबको समझने में लगा हुआ था, उस एक पल में बदल गया…. उसकी नज़रें जल उठीं, जबड़े भिंच गए, और सीना तन गया जैसे कोई आँधी थामे खड़ा हो। उसने रूहानी को एक झटके में अपने बाहों के घेरे में ले लिया… कस कर, हिफाज़त से, जैसे सारी दुनिया को रोक रहा हो उसके गिरने से।

    रूहानी का चेहरा अब भी जानकी की हथेली की गर्मी से जल रहा था। गाल पर उभरा लाल निशान साफ दिख रहा था, जो अंदर के आहत आत्मसम्मान और दिल के दर्द से मिलकर उसके चेहरे को और भी पीला और कमज़ोर बना रहा था। 

    उसकी आँखें डबडबाई हुई थीं, पर उसने रोना नहीं चुना। नहीं। वो जानती थी कि अगर आज वह टूटी, अगर आज आँसू बहाए, तो ये समाज और ये परिवार उसके आंसुओं की नमी से उसकी आत्मा को हमेशा के लिए गीला कर देंगे, उसे कमज़ोर और हारा हुआ मान लेंगे।

    अद्वैत की आंखें अब सीधी रूहानी की भीगी हुई लाल आखों से टकराईं। उन आँखों में गहरा आक्रोश था और अद्वैत की भी आँखों में एक स्त्री के अपमान को देखकर उपजा गुस्सा था, और एक दर्दनाक अविश्वास भी। 

    जैसे वो बिना कुछ कहे उससे पूछ रहा हो…. “क्या वाकई इस घर ने, इस परिवार ने तुम्हें कभी अपनाया था?” उसके चेहरे पर गुस्से और अविश्वास का ऐसा मिश्रण था जिसे शब्दों में बांध पाना मुश्किल था। रूहानी की आंखें अब भी भीगी थीं, पर उनमें भी एक अजीब सी स्पष्टता थी, एक छुपा हुआ दृढ़ संकल्प था…. वो टूट नहीं रही थी, वो बस सहारा ले रही थी।

    कुछ क्षण तक दोनों बस एक-दूसरे की आँखों में देखते रहे, जैसे तमाचा दोनों को पड़ा हो… एक को शरीर पर, गालों पर और दूसरे को आत्मा पर, दिल पर। उस एक पल के ठहराव में उन्होंने एक-दूसरे की पीड़ा को महसूस किया, एक-दूसरे की हिम्मत को परखा।

    रूहानी के अंदर बरसों का घुटा हुआ दर्द, समाज की बंदिशों से मिली घुटन, परिवार की उम्मीदों का बोझ…. सब कुछ अब शब्दों में फूटने को तैयार था। उसकी साँसे तेज़ हो चुकी थीं, और आवाज़ कांपते हुए भी एक सख्त लकीर लिए हुए आई…. जैसे बरसों का घुटा हुआ दर्द आखिर अब शब्दों में फूट पड़ा हो।

    पहले तो रूहानी थोड़ी देर चुप रही… फिर धीरे से बोली, “जिस अनजान ने मेरी जान बचाई… जब आप सब ने मुझे मरने के लिए छोड़ दिया था… उसी के घर में, बिना कुछ जाने, आपने मुझ पर इल्ज़ाम लगा दिए? मेरी बात सुने बिना ही मुझे गुनहगार बना दिया?’

    फिर वो अचानक वो अचानक अद्वैत के कंधे से थोड़ा अलग होकर पलटी और लगभग चीखते हुए, सीधे अपने माँ-बाप की तरफ देखकर बोली, “आप दोनों ने ही कहा था न… माँ, पापा, कि मैं इस अनजान आदमी के साथ, उसके घर… उसके कमरे, उसके बिस्तर पर… जाने कितनी रातें गुज़ार चुकी हूँ… समाज में बदनामी कर दी…?” 

    उसके शब्द आरोपों का जवाब नहीं, बल्कि उन्हीं आरोपों को पलटकर एक सवाल थे, जो सीधे उनके अंतरात्मा पर चोट कर रहे थे।

    “तो अब सुन लीजिए… हाँ! ये अनजान अब कोई और नहीं, मेरा पति है! हाँ, मैंने शादी कर ली है! क़ानूनी रूप से, सामाजिक रूप से और हाँ… मेरी मर्जी से! और आप फिर भी मुझे ही कसूरवार ठहरा रहे हैं? उस बदनामी के लिए जिसे आप पहले ही मेरे मत्थे मढ़ चुके थे?”

    उसके शब्द जैसे आंगन की हर ईंट पर हथौड़े की तरह गूंजे। सबकुछ थम गया। जानकी और भानु प्रताप की आँखें हैरत, शर्म और अपमान के मिलेजुले भावों से भर उठीं।

    उन्हें उम्मीद नहीं थी कि रूहानी इस तरह पलटकर जवाब देगी। मेहमानों के चेहरों पर एक नई सनसनी फैल गई थी, बातें बंद हो गईं थीं, केवल हवा में तैरती रूहानी की आवाज़ की गूंज बची थी।

    लेकिन भानु प्रताप का घमंड और क्रोध अब नियंत्रण से बाहर हो चुका था। उनकी बेटी ने, जिसे वो अपनी संपत्ति मानते थे, उनके ही सामने, भरी महफ़िल में उन्हें चुनौती दी थी। वो गुस्से में थरथराते हुए आगे बढ़े, उनके चेहरे पर खून उतर आया था।

    उनकी आँखों में अब बेटी के फैसले के लिए सिर्फ़ गुस्सा नहीं था, उसमें अपमान का, अस्वीकृति का और अपने अधिकार के छिन जाने का ज़हर भर गया था।

    “मैं अभी के अभी तेरी जान ले लूंगा!” वो गूंजती, कांपती हुई आवाज़ में चीखे और रूहानी की तरफ झपटे, उनका हाथ उठ चुका था।

    लेकिन इससे पहले कि उनका हाथ रूहानी तक पहुँचता, अद्वैत एक पल में बिजली की तेज़ी से उसके सामने आ गया। उसने रूहानी को अपने पीछे किया, उसे अपनी बाँहों के सुरक्षा घेरे में लिया। 

    वह गरजते हुए, भानु प्रताप की आँखों में आँखें डालकर बोला, “बहुत कर लिया आपने! बहुत सुन लिया आपकी बेटी ने! अब और नहीं। अगर रूहानी को एक खरोंच भी आई, तो मैं ये भूल जाऊँगा कि आप उसके पिता हैं। मैं सिर्फ़ ये याद रखूंगा कि आपने एक महिला का अपमान किया, उस पर हाथ उठाया और वो भी तब जब उसने सिर्फ़ अपने जीवन का फैसला खुद लिया।”

    रूहानी सन्न थी। उसका दिल धड़क नहीं रहा था, जैसे कुछ पल को सब थम गया हो। उसने अद्वैत की तरफ देखा…. वो शख्स जिसे उसने अब तक बस एक ‘समझौता’ माना था… अब सामने खड़ा था, जैसे दीवार बनकर। उसकी आंखों में ग़ुस्सा था, पर वो ग़ुस्सा रूहानी के लिए नहीं था…. रूहानी के लिए वो सिर्फ़ ढाल बन गया था।

    उसके भीतर कुछ टूटा भी, और कुछ जुड़ भी गया था।

    वो समझ नहीं पा रही थी कि ये वही अद्वैत है जो अब तक चुपचाप अपनी सीमाओं में रहता था? क्या ये वही रिश्ता है, जो बस कुछ कागज़ी शर्तों पर टिका था?

    रूहानी के मन में सवाल उठ रहे थे…. “क्या ये सब सच है? क्या कोई यूं भी मेरी तरफ खड़ा हो सकता है? बिना किसी मजबूरी के?”

    इन सब के बीच आँगन की हवा जैसे एकाएक भारी हो गई थी, इतनी भारी कि साँस लेना मुश्किल लग रहा था। सबकुछ ठहर गया था। भानु प्रताप का उठा हुआ हाथ हवा में जम गया।

    मेहमानों के चेहरे अब सहम और चुप्पी में ढल चुके थे। किसी में इतनी हिम्मत नहीं थी कि एक शब्द भी कह सके। अद्वैत की आवाज़ में, उसकी आँखों में जो दृढ़ता थी, वो किसी ने पहले नहीं देखी थी।

    भानु प्रताप कुछ पल तक जड़ हो गए। उनका गुस्सा, उनका अधिकार, अद्वैत की आँखों के सामने बौना लग रहा था। वह एक दामाद नहीं, आज एक रक्षक की तरह खड़ा था, जिसने न सिर्फ़ अपनी पत्नी की शारीरिक इज़्ज़त को बल्कि उसकी आत्मा को भी थाम लिया था, उसे टूटने से बचा लिया था।

    “आप हमें अपनाएँ या नहीं,” अद्वैत ने अब अपने स्वर को थोड़ा शांत किया, लेकिन उसी तेज़ और दृढ़ लहजे में कहा, “ये आपका फ़ैसला है। लेकिन किसी का आत्मसम्मान इस तरह रौंदा नहीं जा सकता। रूहानी आपकी बेटी है, हाँ। लेकिन अब वो मेरी पत्नी भी है और जब तक मैं ज़िंदा हूँ, कोई उसे दुख नहीं पहुँचा सकता…. चाहे वो इस दुनिया में कोई भी हो। उसका सम्मान मेरा सम्मान है और उसकी सुरक्षा मेरी ज़िम्मेदारी।”

    उसकी बातों में केवल शब्द नहीं थे, उनमें एक अटूट वादा था, एक ऐसी सच्चाई थी जो पूरे माहौल में घुलती चली गई, पुरानी रूढ़ियों और अपेक्षाओं की दीवारों से टकराती हुई।

    अद्वैत ने पहली बार रूहानी का हाथ थामा…. वो भी सबके सामने, बिना किसी हिचकिचाहट के, जैसे कोई फैसले की मुहर लगा रहा हो। उसकी हथेली में रूहानी की उंगलियाँ थरथरा रही थीं, पर इस बार डर नहीं था, बल्कि एक मौन स्वीकार था… और एक बिन बोले गुहार कि “अब मुझे और टूटा हुआ मत देखना।”

    अद्वैत का चेहरा शांत था, लेकिन उसकी आंखों में एक सुलगती हुई आग थी…. जैसे उसने तय कर लिया हो कि अब और नहीं, अब कोई और रूहानी को रुलाने का हक़ नहीं रखता। उसने सबके सामने, उसी आँगन में जहाँ अभी कुछ मिनट पहले रूहानी का आत्मसम्मान रौंदा गया था, उस सन्नाटे को चीरते हुए ठहरी हुई आवाज़ में कहा….

    “जब आप अपनी बेटी को सच में, पूरे दिल से अपना लेंगे… तब आइएगा उसे देखने के लिए,” अद्वैत ने कहा, जैसे किसी अदालत में अंतिम शब्द सुनाए जा रहे हों। “अब नहीं। आज से ये मेरी पत्नी है और जब तक आप इसे दोषी मानते रहेंगे, तब तक आप हम दोनों से दूर रहेंगे।”

    उसकी आवाज़ में कोई ऊँचा स्वर नहीं था, लेकिन हर लफ्ज़ जैसे पत्थर पर चोट करता जा रहा था। वो झुका नहीं, समझौता नहीं किया, सिर्फ़ एक शर्त रख दी…. सम्मान की।

    1. फिर बिना एक पल गँवाए, उसने रूहानी का हाथ और कस कर थामा और दोनों उस दहलीज़ की तरफ बढ़ चले जहाँ से कुछ देर पहले रूहानी को रोक दिया गया था। पर इस बार कोई रोकने वाला नहीं था, सिर्फ़ पीछे छूटा हुआ सन्नाटा और बहुत सारी निगाहें थीं…. जिनमें कुछ हैरानी थी, कुछ ग्लानि और कुछ वो चुप्पियाँ जो अपनी गलती पहचानने के बावजूद कुछ कह नहीं पातीं।

    रूहानी ने पीछे मुड़कर एक बार भी नहीं देखा। उसका चेहरा भावशून्य था, लेकिन उसकी चाल में वो वजन था जो केवल उन लड़कियों को आता है जो आत्मगौरव से जीना सीख चुकी हैं। 

    और ये जानते हुए भी कि उनका रिश्ता बस एक कागज़ी समझौता है….. एक ‘कॉन्ट्रैक्ट मैरिज’ जो समाज की आंखों में सिर्फ़ एक दिखावा है…. अद्वैत ने रूहानी का साथ वैसे दिया जैसे किसी सच्चे जीवनसाथी को देना चाहिए।

    ———–

    क्या रूहानी के माता-पिता इस संघर्ष को खत्म कर पाएंगे, या फिर उनका अहंकार और अस्वीकृति उनके रिश्ते की अंतिम परीक्षा साबित होगा? 

    क्या रूहानी का दर्द सच में खत्म होगा, या यह सिर्फ एक और शुरुआत है?

    अद्वैत और रूहानी के बीच खड़े इस तूफान में क्या कोई था जो उनका साथ देगा, या ये आंधी दोनों को एक दूसरे से और दूर कर देगी? 

  • अधूरी इबादत भाग~20

    अधूरी इबादत भाग~20

    पढ़ने का समय : 9 मिनट

     

    भाग~20 तोड़ डाली परंपराएं

     

    जानकी चौहान, भानु प्रताप और उनके साथ बैठे मेहमान…. सभी की नज़रें एक साथ मेन गेट पर टिक गईं। सबने एक ही पल में देखा…. रूहानी, एक अनजान आदमी के साथ, वरमाला पहने, सिंदूर लगाए, गले में मंगलसूत्र डाले।

    कुछ क्षणों तक बस एक सन्नाटा था। फिर वो सन्नाटा जैसे किसी ने चीख से तोड़ दिया हो। जानकी की आँखों में विश्वास टूटने की दहशत थी, भानु प्रताप की मुट्ठियाँ सख्त हो गई थीं, और मेहमानों की फुसफुसाहटें एक भरी सभा में ज्वालामुखी जैसी गूंज रही थीं।

    रूहानी और अद्वैत अब गेट के भीतर कदम रख चुके थे। दोनों का चेहरा बाहर से शांत और भावहीन दिख रहा था, लेकिन भीतर एक तूफान उमड़ रहा था। रूहानी की हथेलियाँ ठंडी थीं, उसकी साँसें तेज़ चल रही थीं, हर पल उसे लग रहा था जैसे उसका दिल सीने से बाहर आ जाएगा। 

    उसने हिम्मत करके अपने पापा की आँखों में देखना चाहा, पर उसका कलेजा कांप उठा। बस इसी क्षण से वो हमेशा से डरती आई थी और अभी यह पल किसी डरावने सपने की तरह उसके सामने था। उसने हमेशा से अपने पिता की स्वीकृति, उनका स्नेह और उनका गर्व चाहा था, लेकिन आज वो भीतर ही भीतर जानती थी कि शायद ये कभी नहीं मिलेगा, खासकर इस फैसले के बाद। 

    अद्वैत, रूहानी के ठीक बगल में खड़ा था, शांत, संयमित लेकिन बेहद सतर्क। उसकी आँखें चारों ओर के माहौल को स्कैन कर रही थीं, लोगों के चेहरों पर आते-जाते भावों को पढ़ रही थीं। वो जानता था कि ये उसके जीवन का सबसे महत्वपूर्ण क्षण है, शायद रूहानी के लिए उससे भी ज़्यादा।

    ये सिर्फ दो लोगों के स्वतंत्र विवाह की बात नहीं थी, ये दो अलग-अलग दुनियाओं, दो परिवारों के मूल्यों, परंपराओं, उम्मीदों और सपनों का एक ज़ोरदार टकराव था।

    उसने रूहानी की तरफ देखा, उसकी आँखों में डर और दर्द की एक झलक थी, लेकिन साथ ही होंठों के कसे होने और कंधों की दृढ़ता में एक अटूट संकल्प भी था।

    वो जानता था कि उसे इस समय उसके साथ खड़ा रहना है, न केवल शारीरिक रूप से, बल्कि उसकी हिम्मत बनकर, एक चट्टान की तरह।

    “ये क्या है?” भानु प्रताप की भारी और रौबदार आवाज़ ने सबकी बातचीत पर ब्रेक लगाया। उनकी आवाज़ में सिर्फ सवाल नहीं था, उसमें एक अधिकार था, एक चेतावनी थी। उनकी नज़रें सीधी अद्वैत पर टिकी थीं।

    “कौन है ये?” भानु प्रताप की ऊँगली अद्वैत की ओर उठी। उनकी आवाज़ में गुस्सा और अविश्वास साफ झलक रहा था। जैसे कोई अजनबी, कोई अनचाहा व्यक्ति उनकी दुनिया में घुस आया हो।

    यश, रूहानी का छोटा भाई, जो अब तक किनारे खड़ा इस अप्रत्याशित दृश्य को हतप्रभ देख रहा था, धीरे से आगे आया। उसकी आवाज़ में झिझक थी, लेकिन शब्दों में सच्चाई थी। बोला, “पापा, ये अद्वैत अवस्थी हैं… दीदी के पति।” 

    यश हमेशा से रूहानी का समर्थक रहा था, उसकी बातों को सुनता था, लेकिन आज वो भी अपने पिता के गुस्से से डरा हुआ था। वो जानता था कि उनके पिता का गुस्सा कितना भयानक और अनियंत्रित हो जाता है।

    “पति…?” जानकी की आवाज़ मानो थम गई थी, जैसे शब्दों ने गले में ही दम तोड़ दिया हो। उनकी आँखों में सिर्फ सवाल नहीं थे…. वहाँ एक टूटा हुआ भरोसा था, एक परंपरा की अनसुनी पुकार, और एक ऐसी टीस जो सदियों से हर माँ की आँखों में पलती रही है।

    उन्होंने रूहानी के लिए हमेशा वही देखा था जो हर रूढ़िवादी परिवार देखता है…. एक ऐसा जीवनसाथी जिसे उसके माँ – बाप चुनें, जो जात-पात, कुल-परंपरा, और खानदान की इज़्ज़त को सबसे ऊपर रखे। 

    रूहानी से कभी पूछा नहीं जाना था कि वो क्या चाहती है, क्योंकि उस घर में बेटियों से सवाल नहीं पूछे जाते….. उन्हें बस मौन स्वीकृति देना सिखाया जाता है।

    उनके लिए ‘शादी’ कोई प्रेम कथा नहीं, बल्कि एक सामाजिक अनुबंध थी…. जहाँ भावनाओं से ज़्यादा महत्व घर की मर्यादा का था। जानकी को यकीन था कि रूहानी भी वही करेगी जो उसकी माँ, उसकी नानी, और उन तमाम औरतों ने किया…. चुपचाप सर झुका कर उनकी पसंद को अपना भाग्य मान लेगी।

    और ये अद्वैत… कौन था ये? कहाँ से आया था? वो उनके बुने हुए सपनों से बिल्कुल अलग था, एक अनदेखी राह का पथिक था।

    कमल, वो लड़का जिसे रूहानी के पति के रूप में उसके माँ – बाप के द्वारा चुना गया था, पीछे खड़ा था। उसके चेहरे पर एक व्यंग्यात्मक और कुटिल मुस्कान थी। वो रूहानी को हमेशा से अपनी संपत्ति समझता था, एक ऐसी लड़की जो उसके रुतबे, उसकी सामाजिक स्थिति को और बढ़ाती। 

    आज, उसे लग रहा था जैसे वो संपत्ति, वो मान-सम्मान सब कुछ उससे छीन लिया गया हो, किसी ने उसे भरी महफ़िल में नीचा दिखा दिया हो। उसके अंदर अपमान और गुस्से का लावा उबल रहा था।

    “हमने शादी कर ली है,” रूहानी ने धीरे से कहा, उसकी आवाज़ में एक हल्की सी थरथराहट थी, “क़ानूनी तौर पर…” उसकी आवाज़ में थोड़ी सी हिम्मत थी, जो उसने अपने अंदर बची आखिरी ताक़त से बटोरी थी, लेकिन वो जानती थी कि ये काफ़ी नहीं है। उसके शब्द हवा में तैरते हुए से लगे और फिर सन्नाटे में खो गए।

    “क़ानूनी?” भानु प्रताप की हँसी बेहद कड़वी और तीखी थी, जैसे किसी घाव पर नमक छिड़क दिया गया हो। 

    “बिना बताये? बिना हमारी सहमति के? और आज अचानक तुम यहाँ ये तमाशा दिखाने आ गई?” उनकी आँखों से जैसे आग बरस रही थी, माथे पर नसें तन गई थीं। उन्हें लगा था जैसे उनकी बेटी ने उनके अधिकार को, उनके निर्णय को, उनके अस्तित्व को ही चुनौती दे दी हो।

    कमल ने इस मौके का फायदा उठाते हुए ताना मारा, “तमाशा नहीं तो और क्या है? सबके सामने नाक कटवा दी। अपने खानदान की इज़्ज़त मिट्टी में मिला दी।” उसकी आवाज़ में ज़हर घुला हुआ था, जैसे वो इस अपमान का बदला शब्दों से ले रहा हो।

    कमल के पिता ने भी अपनी आवाज़ मिलाई, उनके चेहरे पर भी घोर निराशा और गुस्सा था। “हमने तो समझा था, हमें एक संस्कारी बहू मिलेगी, जो घर की लक्ष्मण रेखा समझे। पर ये क्या निकला? अपने फ़ैसले खुद लेने वाली… हमारे घर की लड़कियों में ऐसा कभी नहीं हुआ।” उनके शब्द केवल रूहानी पर नहीं, बल्कि जानकी और भानु प्रताप पर भी एक कटाक्ष थे, जैसे उनकी परवरिश पर सवाल उठा रहे हों।

    रूहानी के कानों में ये बातें तीर की तरह चुभ रही थीं। उसे लग रहा था जैसे हर कोई उसे अपराधी ठहरा रहा हो। वो हमेशा से अपने परिवार का सम्मान करती थी, उनकी बातों को मानती थी, लेकिन आज उसे लग रहा था जैसे उसने सबसे बड़ा गुनाह कर दिया हो, ऐसा गुनाह जिसकी कोई माफ़ी नहीं थी। 

    उसकी आँखों में आँसुओं का सागर उमड़ रहा था, पर उसने उन्हें किसी तरह रोक रखा था। वो जानती थी, अगर आज रोई, अगर आज कमज़ोर पड़ी, तो ये लोग उसे हमेशा के लिए कमज़ोर मान लेंगे और उसे पूरी ज़िंदगी सिर्फ अपनी सफाई ही देनी पड़ेगी।

    अद्वैत ने जैसे ही कमल और उसके पिता की बातें सुनी तो उसका खून खौल उठा। वो अब और चुप नहीं रह सका। उसने उनलोगों की तरफ मुड़कर पहली बार कुछ कहा। उसकी आवाज़ में ठहराव था, शांति थी, लेकिन एक ऐसी दृढ़ता थी जिसने माहौल की सारी फुसफुसाहटों को दबा दिया। 

    “ये तमाशा नहीं है,” अद्वैत ने कहा, “ये ज़िम्मेदारी है। रूहानी ने कोई गुनाह नहीं किया है। उसने अपनी ज़िंदगी का सबसे बड़ा फ़ैसला लिया है, अपनी ख़ुशी का फ़ैसला और मैं उसके साथ हूँ। हम दोनों ने अपनी मर्ज़ी से, एक-दूसरे से शादी की है और हम अपने फ़ैसले के लिए किसी से माफ़ी नहीं मांगेंगे।”

    उसने फिर भानु प्रताप की तरफ देखा, उसकी आँखों में कोई डर नहीं था, सिर्फ़ एक सीधी, अडिग चुनौती थी। “और जहाँ तक बात इज़्ज़त की है, इज़्ज़त किसी इंसान के पहनावे से नहीं, किसी के गोत्र या खानदान से नहीं, इज़्ज़त किसी इंसान के फ़ैसले से नहीं घटती, उसकी इज़्ज़त उसके कर्मों से होती है। 

    रूहानी ने आज जो हिम्मत दिखाई है, जो साहस दिखाया है, वो काबिले-तारीफ़ है। आप लोगों को उस पर शर्मिंदा नहीं, उस पर गर्व होना चाहिए।” अद्वैत के शब्द तीखे और सच्चे थे, उन्होंने माहौल में एक नई लहर पैदा कर दी।

    रूहानी ने अद्वैत की तरफ देखा, उसकी आँखों में अविश्वास झलक रहा था। क्या उसने सच में ये कहा? वो, जो अब तक बस एक औपचारिक रिश्ते का हिस्सा था, आज कुछ ऐसा कह गया था जो रूहानी ने कभी उम्मीद नहीं की थी….. इस कॉन्ट्रैक्ट मर्रिज के भीतर भी कोई उसके दर्द को समझ सकता है। ये बात उसके लिए अजीब भी थी और अप्रत्याशित भी। उसे समझ नहीं आ रहा था कि अद्वैत सचमुच उसकी फिक्र करता है, या ये भी किसी शर्त का हिस्सा है।

    भानु प्रताप ने पलटकर अपने दोस्तों की तरफ देखा, जो अब भी फुसफुसा रहे थे, सर हिला रहे थे, जैसे कोई घटिया नाटक देख लिया हो। उनके चेहरे पर तिरस्कार, हैरानी और मज़ाक का मिश्रण था।

    “इतनी भी बेहयाई कोई कैसे कर सकता है, अब तो रीत-रिवाज़ भी इनसे डरने लगे होंगे,” कमल की माँ ने खून खौलाते लहजे में कहा, जैसे उसके संस्कारों पर किसी ने सीधा वार किया हो।

    रूहानी की माँ जानकी चौहान के लिए ये सब बर्दाश्त कर पाना, ये दृश्य देखना आसान नहीं था। सालों से जिस बेटी को अपनी आंखों के सामने पाला था, जिसे हर रिश्ते के लिए, हर मर्यादा के लिए तराशा था, जिसे कुल की प्रतिष्ठा का प्रतीक माना था, वो आज एक अजनबी के साथ वरमाला और सिंदूर में लिपटी खड़ी थी…. बिना बताये, बिना पूछे, बिना समझाए। 

    समाज की बातें, मेहमानों की फुसफुसाहटें जो अब ज़ोर पकड़ने लगी थीं, और पति भानु प्रताप की तनी हुई भौंहें और अपमानित चेहरा…. इन सबके बीच जानकी का दिल तड़प उठा। उसकी आँखों के सामने उसके सारे सपने बिखरते नज़र आ रहे थे।

    वो धीरे-धीरे रूहानी के पास आई, उसका चेहरा देखा… उस चेहरे पर न कोई ग्लानि थी, न कोई शर्म, बस एक गहरा सन्नाटा था, एक थका हुआ भाव था जैसे वो बहुत लंबी लड़ाई लड़कर आई हो और वही सन्नाटा उसकी माँ की सहनशक्ति तोड़ गया। जिस बेटी से उसे उम्मीद थी कि वो आँखों में आँसू लेकर माफ़ी मांगेगी, वो बेटी शांत खड़ी थी, जैसे उसने कोई गलती की ही न हो।

    “शर्म नहीं आई तुझे?” जानकी ने धीमे, पर कड़वे शब्दों में कहा। उसकी आवाज़ में माँ का प्यार नहीं, अपमानित स्त्री का गुस्सा था। “हमारे जीते जी तूने सब खत्म कर दिया। हमारी इज़्ज़त, हमारा नाम… सब मिट्टी में मिला दिया।”

    रूहानी एक पल को स्तब्ध खड़ी रही। उसकी आँखें भर आई थीं, लेकिन चेहरा कठोर था। वह कुछ कहना चाहती थी। होंठों तक आते हुए शब्द काँप रहे थे।

    “माँ… मैं बस—”

    जानकी ने बात पूरी होने से पहले ही रूहानी के गाल पर एक ज़ोरदार तमाचा जड़ दिया। उस एक थप्पड़ की गूंज पूरे आँगन में फैल गई, हवा में गूंजती रही, जैसे समय ठहर गया हो। हर कोई सन्न रह गया।

    —————

    क्या वाकई ये थप्पड़ सिर्फ एक गाल पर पड़ा था… या फिर एक पीढ़ी के सपनों, भरोसे और इज्ज़त पर भी?

    अब क्या रूहानी फिर खड़ी हो पाएगी… या ये थप्पड़ उसकी हिम्मत की आखिरी दरार बन जाएगा?

    अद्वैत… क्या वो अब भी उसका हाथ वैसे ही थामे रखेगा, या इस तमाचे की गूंज उसके वादों को भी डगमगा देगी?

     

  • अधूरी इबादत भाग~19

    अधूरी इबादत भाग~19

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    भाग ~19 दुल्हन… पर अधूरी

     

    अद्वैत की कार जैसे ही चौहान निवास के बाहर आकर रुकी, उस घर की पुरानी दीवारों पर एक नया तनाव उतर आया था। बाहर की धूप हल्की थी, लेकिन कार के भीतर एक अजीब

     सा बोझ था, जो किसी की आंखों से नहीं, लेकिन हर खामोशी से टपक रहा था।

    बैकसीट पर बैठा यश उतावलेपन से दरवाज़ा खोलते ही झट से बाहर निकला और दौड़ता हुआ फ्रंट सीट पर आ गया। रूहानी की खिड़की के पास आकर वह बच्चों जैसी उत्सुकता से बोला, “जल्दी से आओ न दीदी। मां-पापा तुम्हें शादीशुदा देखकर खुश हो जाएंगे।” उसके चेहरे पर उम्मीद थी, नादानी थी, और वो मासूम यक़ीन था जो हालात की गहराई नहीं समझता।

    रूहानी ने यश की ओर नहीं देखा। उसकी नजरें खुद में उलझी थीं। कार की खिड़की पर झुकी, शीशे में खुद को देखा तो बस एक वरमाला थी उसके गले में। ना मांग में सिंदूर, ना हाथों में चूड़ियाँ, ना कोई वो पहचान जो समाज ‘सहजीवन’ से जोड़ता है। और सच कहें तो चेहरा… चेहरा किसी दुल्हन का नहीं, किसी समझौते से झांकते हुए इंसान का था।

    उसने धीरे से अपना हाथ गले पर रखा, वहां, जहां आमतौर पर एक मंगलसूत्र होना चाहिए था… वो खालीपन उसे बाहर से ज़्यादा भीतर चुभ रहा था।

    अद्वैत, जो ड्राइवर सीट पर बैठा था, एकटक उसे देख रहा था। उसका हाथ रूहानी की हर हरकत को पढ़ रहा था जैसे वो कोई किताब हो जिसे वो कई बार दोहरा चुका हो। उसने समझ लिया था…. रूहानी किस दुविधा में है। वह यह जानता था कि ये सिर्फ एक दिखावटी शादी है, लेकिन दिखावे का यह क्षण अब वास्तविक दुनिया में प्रवेश कर चुका था, जहाँ भावनाएं नकाब नहीं पहनतीं।

    इसलिए अद्वैत ने यश की ओर मुड़कर नरम लेकिन तय स्वर में कहा, “तुम्हारी दीदी तुम्हारे जीजाजी के साथ पहली बार घर आ रही है तो क्या स्वागत नहीं करोगे?”

    यश ने जैसे किसी भूली हुई रस्म को याद करते हुए अपनी दोनों हथेलियों से सिर पीटा, “अरे, जीजाजी, मैं तो भूल ही गया था। जरूर स्वागत होगा। मैं करूंगा ना। आपने बिल्कुल सही कहा। मैं अभी जाता हूं, आप भी दीदी को लेकर जल्दी से आना।” और वो फुर्ती से घर की ओर भाग गया।

    अद्वैत ने उसकी मासूम ऊर्जा पर मुस्कराते हुए कहा, “हां, तुम जाओ, हम दोनों अभी आते हैं।”

    अब कार के भीतर फिर वही सन्नाटा था, पर अब उसमें सवाल थे।

    ——–

    यश के अकेले घर में प्रवेश करते ही उसकी मां जानकी चौहान के चेहरे पर चिंता, शर्म और ग़ुस्से की मिली-जुली रेखाएँ खिंच गई थीं। उसकी आँखों में हज़ार सवाल तैर रहे थे और लहजा ऐसा जैसे किसी ज्वालामुखी ने फूटने की पूरी तैयारी कर ली हो।

    उसने यश की कलाई कसकर पकड़ी और लगभग घसीटते हुए उसे हॉल से दूर कोने की ओर ले गई, जहाँ से भानु प्रताप की नज़रें उन पर न पड़ें।

    उसका स्वर धीमा नहीं था, पर डर और बेचैनी से भरा हुआ था, “सुबह-सुबह ही निकल गया था न तू उस बेशर्म के साथ, तो आने में दोपहर कैसे हो गई? और शॉपिंग का सामान कहां है? खाली हाथ क्यों आया है तू, और वो बेशर्म कहां रह गई?”

    वो जैसे रुकी ही नहीं। उसकी सांसें तेज़ चल रही थीं, होंठ कांप रहे थे और माथे पर पसीने की एक महीन परत थी। “कहीं भाग तो नहीं गई? हाय राम! अब तो हम कहीं मुँह दिखाने लायक नहीं रहे। हॉल में तेरे पापा के दोस्त और उनका पूरा परिवार आया हुआ है। कब से रूहानी से मिलने के लिए बोल रहे हैं, और मैं आधे घंटे से कहे जा रही हूं कि वो अपने भाई के साथ खरीदारी करने गई है। बोल मेरे बेटे, कहां छोड़ आया है उसे?”

    यश ने मां के कंधों को पकड़ कर हल्के से दबाया, जैसे उसकी थरथराहट को थाम लेना चाहता हो। उसकी आवाज़ में वो संयम था जो अक्सर बच्चों में नहीं होता, लेकिन इस वक़्त उसके चेहरे पर एक अलग किस्म की समझदारी झलक रही थी।

    “मुझे बोलने दोगी, तब न मैं कुछ बता पाऊंगा,” उसने माँ की आँखों में देखकर कहा, “तब से तो एक ही सांस में बोले जा रही हो। दीदी मेरे ही साथ थी, बस पीछे से आ रही हैं…”

    ——– 

    इधर, अद्वैत ने जैसे ही कार के ग्लव बॉक्स से वो छोटी सी डिब्बी निकाली और रूहानी की ओर बढ़ाई, उसकी आँखों में एक अजीब सी गहराई थी—जैसे वो जानता हो कि ये क्षण नाटकीय नहीं, पर जरूरी है। “ये लो,” उसने धीमे से कहा, “इसे पहन लो, वरना तुम्हारे मां-पापा को शक हो जाएगा।”

    रूहानी ने कुछ नहीं कहा। बस उसके हाथ से वो डिब्बी ली और धीरे से खोली। उसमें एक छोटा सा फैंसी मंगलसूत्र था—सस्ता, लेकिन अपनी भूमिका में सटीक। उसका दिल थोड़ी देर को जैसे ठहर गया। उसने उस मंगलसूत्र को हथेलियों में रखा और उंगलियों से हल्के हल्के मसलने लगी, जैसे वो धातु नहीं कोई विचार हो—कभी अपना, कभी पराया।

    अद्वैत उसकी उंगलियों के कम्पन और उसके माथे की संकोचभरी सिलवटों को पढ़ रहा था। उसकी नजरें कहीं ठहरी नहीं थीं, पर सब देख रही थीं। वो समझ गया कि ये नाटक उनके लिए बाहरी दुनिया को दिखाने के लिए है, लेकिन रूहानी के भीतर कुछ बहुत गहरा टूटा और जुड़ता जा रहा है।

    “और हां,” उसने एक और डिब्बी बढ़ाते हुए कहा, “इसे मत भूल जाना… मैं यहीं बाहर हूं।”

    इतना कहकर अद्वैत कार से बाहर निकल गया और उसकी तरफ पीठ कर के खड़ा हो गया, जैसे उसे खुद को भी इस दृश्य से अलग रखना हो।

    कार के अंदर अब सिर्फ रूहानी थी और एक अजीब सी चुप्पी। उसने मंगलसूत्र को बिना ज़्यादा सोचे, एक ही झटके में पहन लिया। उसके बाद जब उसने दूसरी डिब्बी खोली, तो उसमें लाल रंग का सिंदूर देखकर उसका दिल एक बार फिर कांप गया। उंगलियां ठिठकीं, आँखें नम हुईं। वो आईने में खुद को देख रही थी….. एक ऐसी स्त्री, जो शादीशुदा दिखने जा रही थी, लेकिन मन के किसी कोने में अभी भी कुछ अधूरा, कुछ अनकहा ज़िंदा था।

    आईने में उसका अक्स बदलता गया। उसे अपना पुराना चेहरा याद आया—वो लड़की जो कुछ साल पहले अपने करियर, अपनी पहचान और एक सच्चे प्रेम के ख्वाब के साथ ज़िंदगी को देखने निकली थी। मगर उस प्रेम ने धोखा दिया था, और करियर अब उस मोड़ पर आ खड़ा हुआ था जहाँ झूठ की परत चढ़ानी पड़ रही थी।

    पर अब वक्त उन बातों का नहीं था। वो जानती थी कि एक परछाईं की तरह अतीत उसके साथ चल सकती है, लेकिन आज जो सामने खड़ा है, उससे नज़रें नहीं चुराई जा सकतीं। उसने एक चुटकी सिंदूर उठाया और अपनी मांग में भर लिया—सिर्फ इसलिए नहीं कि दुनिया देखे, बल्कि इसलिए कि वो खुद उस भूमिका को निभा सके जो उससे उम्मीद की जा रही थी।

    बाहर खड़े अद्वैत की पीठ की तरफ देखते हुए उसने गहरी साँस ली और दरवाज़ा खोल कर कहा, “चलो, मैं तैयार हूं।”

    अद्वैत ने जब उसकी आवाज़ सुनी, तो मुड़कर देखा। उसके हाथ अपने वरमाला को ठीक कर रहे थे, पर निगाहें रूहानी के चेहरे पर जम गईं। एक पल को वो ठिठक गया। सामने खड़ी औरत वही थी जिससे उसने एक समझौता किया था, लेकिन अब उसमें कुछ बदल गया था…. वो सिर्फ रूहानी नहीं रही, उसमें कहीं छुपकर उसकी ‘पत्नी’ भी झलकने लगी थी।

    “तुम…” बस इतना ही कहा अद्वैत ने, उसकी आंखों में एक अबोझ सी चमक थी।_

    रूहानी ने घबरा कर कहा, “क्या हुआ? कुछ ठीक से नहीं है क्या?” वो अपनी वरमाला, मंगलसूत्र और सिंदूर को टटोलने लगी, जैसे कोई बच्चा हो जिसने पहली बार कुछ पहन कर आईने में खुद को देखा हो।

    “नहीं… सब ठीक है…” अद्वैत ने अपनी कल्पना से बाहर आते हुए कहा, “चलो चलते हैं।”

    दोनों घर के मेन गेट के पास पहुँचे। हवा थोड़ी गर्म थी, लेकिन उनके बीच एक अजीब सी ठंडक पसरी हुई थी…. शब्दों की, भावनाओं की, और उन अहसासों की जो ज़ोर से कहे नहीं जा सकते।

    उधर थोड़ी दूरी पर एक नौजवान लड़का…. तनाव और झुंझलाहट से टहलता हुआ…. बेसब्री से बोला, “यश, कहां रह गई रूहानी? मुझसे अब बर्दाश्त नहीं हो रहा।”

    यश ने तुरंत गेट की ओर इशारा किया, “वो रही दीदी…”

    और फिर सब जैसे रुक गया।

    जानकी चौहान, भानु प्रताप और उनके साथ बैठे मेहमान…. सभी की नज़रें एक साथ मेन गेट पर टिक गईं। सबने एक ही पल में देखा…. रूहानी, एक अनजान आदमी के साथ, वरमाला पहने, सिंदूर लगाए, गले में मंगलसूत्र डाले।

    कुछ क्षणों तक बस एक सन्नाटा था। फिर वो सन्नाटा जैसे किसी ने चीख से तोड़ दिया हो। जानकी की आँखों में विश्वास टूटने की दहशत थी, भानु प्रताप की मुट्ठियाँ सख्त हो गई थीं, और मेहमानों की फुसफुसाहटें एक भरी सभा में ज्वालामुखी जैसी गूंज रही थीं।

    ————-

    क्या ये सिर्फ एक दिखावा था, या इस नाटक ने वाकई कुछ बदल दिया था?

    क्या जानकी की आँखों में जो दहशत थी, वो एक माँ का डर था या एक औरत का टूटा हुआ घमंड?

    भानु प्रताप की सख्त मुट्ठियाँ… क्या वो सिर्फ गुस्से की थीं, या किसी पुराने राज़ की दस्तक थी?

    रूहानी के क़दमों ने चौहान निवास में जो तूफ़ान लाया था… क्या अब उससे कोई बच पाएगा?

  • अधूरी इबादत भाग~18

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    भाग~18 इमोशन्स का बीमा

    पंजीकरण कार्यालय की उस सफ़ेद, ठंडी दीवारों वाली बिल्डिंग में ~भी उस वक़्त एक अजीब सी गर्माहट फैल गई थी, जब रुहानी के हाथों में काग़ज़ का वो पुलिंदा रखा गया – अद्वैत द्वारा तैयार किया गया विवाह अनुबंध। 

    बाहर हल्की धूप थी, अंदर ट्यूब लाइट की सफेद रौशनी और दोनों के बीच कुछ ऐसा था जो रौशनी से ज़्यादा कुछ कहता था…. एक मौन संवाद। 

    रुहानी के हाथ काँपते नहीं रहे थे, पर उसकी आँखें एक-एक शब्द पर रुकती चली जा रही थीं, जैसे कोई मन के अंदर झाँकने का हक़ मांग रहा हो।

    उसके सामने अद्वैत खड़ा था, एकदम शांत, जैसे उसने अपने भीतर की हर हलचल को ताले में बंद कर रखा हो। वो कुछ नहीं बोल रहा था, बस रुहानी के चेहरे को पढ़ रहा था…. उसकी हर मरोड़, हर रुकावट, हर सांस की गहराई को। 

    उधर रुहानी, एक-एक शब्द पढ़ती जा रही थी…..

    विवाह अनुबंध-पत्र (Contract Marriage Agreement)

    (स्वतंत्रता, सीमाओं और गोपनीयता के स्पष्ट निर्देशों सहित)

    पक्ष 1:

    नाम: अद्वैत अवस्थी

    उम्र: 28 वर्ष

    पेशा: लेखक एवं सामाजिक वक्ता

    निवास: विमान नगर, पुणे

     

    पक्ष 2:

    नाम: रुहानी चौहान

    उम्र: 24 वर्ष

    पेशा: स्वतंत्र वस्त्र डिज़ाइनर

    निवास: हडपसर, पुणे८

    स्पष्ट और पारदर्शी शर्तें: (Clear and Transparent Terms)

    1. यह विवाह केवल एक सामाजिक औपचारिकता है, जो एक वर्ष तक सीमित रहेगा।

    2. यह विवाह दिखावे का है, लेकिन इ⁹सके बावजूद किसी भी प्रकार के अतिरिक्त विवाहिक संबंध (extra-marital affair) की अनुमति नहीं होगी।

    3. दोनों के कमरे अलग-अलग होंगे। कोई भी पक्ष बिना पूर्व अनुमति के दूसरे के निजी स्थान में प्रवेश नहीं करेगा।

    4. शारीरिक संपर्क केवल सार्वजनिक मौकों पर “विवाहित जोड़े” की छवि बनाए रखने के लिए सीमित होगा, और वह भी केवल सामाजिक मर्यादाओं के भीतर।

    5. अनुबंध की अवधि में किसी भी प्रकार की शारीरिक निकटता की कोई अनिवार्यता नहीं होगी। न कोई अपेक्षा, न कोई ज़ोर।

    6. यह स्पष्ट रूप से समझा जाता है कि “दिल लगाना मना है” (falling in love is not allowed)…… किसी भी भावनात्मक जुड़ाव की कोई ज़रूरत या बाध्यता नहीं है।

    7. कोई भी inappropriate या असहज करने वाला स्पर्श, शब्द या व्यवहार इस अनुबंध का उल्लंघन माना जाएगा।

    8. दोनों अपने-अपने पेशेवर जीवन में पूर्ण स्वतंत्र रहेंगे। कोई भी एक-दूसरे के काम में हस्तक्षेप नहीं करेगा, न आलोचना, न सलाह बिना माँगे।

    9. दोनों को अपने सामाजिक, व्यक्तिगत और मानसिक क्षेत्र में स्वतंत्रता का पूरा अधिकार है।

    10. इस अनुबंध की जानकारी एक सीमित दायरे तक ही रखी जाएगी: सिर्फ अद्वैत, रुहानी, उनके वकील और मैनेजर तक।

    11. यदि इस अनुबंध की कोई भी शर्त का उल्लंघन होता है, तो यह समझा जाएगा कि अनुबंध समाप्त हो चुका है। फिर दोनों पक्ष एक-दूसरे से पूर्णतः अजनबी हो जाएंगे, और इस शर्त के उल्लंघन करने वाले को किसी भी तरह की कोई बात करने का अधिकार नहीं होगा।

     

    हस्ताक्षर:

    पक्ष 1 (अद्वैत अवस्थी): _______________

    पक्ष 2 (रुहानी चौहान): _______________

    विधिक सलाहकार: _______________

    तिथि: _______________

     

    रुहानी ने अनुबंध के पहले कुछ खंडों को पढ़ते हुए महसूस किया कि यह किसी और दुनिया का समझौता था। यह अनुबंध उससे दूर था, फिर भी जैसे वह खुद को इसमें बांधने जा रही हो।

    “दोनों के कमरे अलग-अलग होंगे… दिल लगाना मना है… कोई भी शारीरिक निकटता अनुबंध का हिस्सा नहीं होगी…” जैसे हर शब्द उसकी सोच में एक छोटी सी सुई चुभो रहा हो, मगर दर्द की जगह एक अजीब किस्म की ठंडक भर रही थी।

    “कमाल है…” उसने हल्की सी हँसी में फुसफुसाया, बिना अद्वैत की तरफ़ देखे, “तुमने तो हर इमोशन का बीमा करवा लिया है इस कॉन्ट्रैक्ट में।”

    अद्वैत ने पहली बार पलकें झपकाईं, फिर बहुत धीरे से कहा, “इमोशन्स ही तो सबसे ज़्यादा नुकसान करते हैं और मुझे अब कोई भी नुकसान नहीं चाहिए।”

    रुहानी आगे पढ़ी। अगली शर्त थी….‘पब्लिक प्लेस में साथ दिखना होगा, पर कोई भी स्पर्श मर्यादित रहेगा। सिर्फ़ दिखावे के लिए।’

    “मतलब… हमें भीड़ में हाथ पकड़ना होगा, पर एक छत के ही नीचे होने पर कोई स्पर्श नहीं होगा?” उसकी आवाज़ में एक टुकड़ा था…न गुस्से का, न दुःख का… बस एक उलझा हुआ विस्मय।

    अद्वैत ने सिर झुकाया, जैसे मान लेना चाहता हो कि हाँ, ये सब शायद असहज है, पर है ज़रूरी।

    “ये सब ज़रूरी है, रुहानी,” उसने नज़रों को दूर खिड़की की दिशा में टिकाते हुए कहा, “मेरे करियर की एक धारणा है, जो टूटी तो सब बिखर जाएगा। मुझे अपने शब्दों को बचाना है… और अब… अपना चेहरा भी।”

    रुहानी की आँखें कुछ पल के लिए अद्वैत की आंखों पर टिक गईं, जैसे उसकी पुतली में कोई अनकहा डर देख रही हों। फिर वो बोली, धीरे, लेकिन बिलकुल साफ़…. “मेरे लिए भी तो ज़रूरी है अब ये सब। पापा के मेरी मर्ज़ी के खिलाफ, जबरदस्ती उनकी पसंद के दकियानूसी सोच वाले इंसान से शादी करने से तो ये झूठी शादी ही सही… कम से कम यहाँ मेरी रज़ामंदी तो है और वैसे भी मुझे भी तो अपने प्रोफेशन में सेटल होने के लिए वक्त चाहिए।”

    उसके शब्दों में आंसू नहीं थे, लेकिन आवाज़ जैसे किसी जले हुए पत्ते पर चल रही थी… खुरदरी, सूखी, फिर भी सच्ची। अद्वैत ने उसे गौर से देखा, पहली बार जैसे उसकी मजबूरी की असल शक्ल को पहचाना हो। कमरा कुछ देर के लिए सांस लेना भूल गया था।

    रुहानी ने आख़िरी पन्ने पर दस्तख़त करने से पहले काग़ज़ को हल्के से मोड़ा, जैसे कोई किताब के किसी अधूरे अध्याय को दबा कर रख देता है… ताकि कोई और उस अधूरेपन को महसूस न कर पाए।

    रजिस्टार ने दोनों से कहा, “अब आप दोनों एक दूसरे को वरमाला पहनाएं ताकि यह पूरी प्रक्रिया असली शादी जैसा लगे।” कमरे में खामोशी छा गई। अद्वैत और रुहानी एक दूसरे को देखते रहे, जैसे दोनों एक अजीब सी स्थिति में फंसे हों। उनकी आँखों में सवाल था, न जाने कितना कुछ कहना चाहते थे, पर शब्द नहीं मिल रहे थे।

    अद्वैत की आँखों में कुछ छिपा हुआ था, जैसे वह खुद को इस पल से बाहर निकालने का रास्ता ढूँढ़ रहा हो। रुहानी ने धीमे से कहा, “हम दोनों खुद ही माला पहन लेते हैं,” और अद्वैत ने भी हामी भरी, मानो वह इस छोटी सी समझौते में अपने कर्तव्यों से बाहर आना चाहता हो।८

    वकील ने कहा, “जैसा आप दोनों चाहें, वैसा ही सही,”

    फिर दोनों ने बिना किसी और शब्दों के खुद के गले में माला डाल दी. वकील की मंजूरी के बाद, जब वे कमरे से बाहर निकले, तो रुहानी का छोटा भाई यश वहाँ खड़ा था। 

    जैसे ही उसने रुहानी को देखा, खुशी से दौड़ते हुए उसके गले लग गया और बोला, “अब पापा की जबरदस्ती किसी और जगह शादी नहीं कर पाएंगे, मैं बहुत खुश हूं आपके लिए।” उसका चेहरा जैसे किसी छोटे बच्चे की खुशी से भर गया हो, और रुहानी के मन में एक हल्की सी राहत महसूस हुई। 

    अद्वैत ने चुपचाप देखा, मानो वह इस नये रिश्ते में खुद को थोड़ा और खोता जा रहा हो, पर उसकी आँखों में कोई अजीब सी गहराई थी, जैसे वह इस रिश्ते के बारे में बहुत कुछ सोच रहा हो।

    यश खुशी से अद्वैत के पास आकर बोला, “जीजाजी तो बोल सकता हूं न अब आपको, चलिए मेरे साथ मेरे पापा के घर, अब पापा भी जान जाएंगे कि रूहानी दीदी की शादी हो गई है तो अब सब ठीक हो जाएगा।” यश की आवाज में उम्मीद और राहत थी, जैसे उसने किसी बड़े संकट से निकलने का रास्ता पा लिया हो।

    लेकिन अद्वैत और रूहानी एक दूसरे को प्रश्नवाचक नजरों से देखकर उस बात पर चुप रहे। उनके दिलों में अनकहे सवाल थे…..क्या सच में सब ठीक हो जाएगा? 

    ————–

    क्या ये अनुबंध दोनों के लिए यह एक ऐसा चक्रव्यूह बन जाएगा, जिसमें वे खुद ही फंसते चले जाएंगे? 

    अद्वैत और रुहानी के बीच एक अदृश्य दीवार खड़ी थी, जो टूटेगी या फिर और मजबूत होगी?

    क्या वे सच में अपनी इच्छाओं और डर से बच पाएंगे, या यह शादी उन्हें उन भावनाओं के सबसे करीब ले आएगी, जिनसे बचने के लिए उन्होंने ये अनुबंध किया था?

     

  • अधूरी इबादत भाग~17

    अधूरी इबादत भाग~17

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    भाग~17 शादी… मगर नकली

     

    रात के खाने के बाद जब सब अपने-अपने कमरों में चले गए थे, तब रुहानी चुपचाप छत पर आकर बैठ गई थी। ऊपर आसमान बिलकुल शांत था, लेकिन उसके भीतर हलचल थी… ऐसी जैसे ठहरे पानी में अचानक कोई कंकर गिरा हो। 

    हवा में हल्की ठंडक थी, और चाँद की रोशनी उसकी पलकों पर पड़ी तो उसकी सोच और भी गहराने लगी। वो अपने पैरों को सिकोड़े, घुटनों को बाँहों में भरे, बस छत के कोने में बैठी थी, जैसे किसी सवाल की तलाश में हो, जो खुद उसी के भीतर छुपा हो। 

    रात की नमी, नीले आसमान का सूनापन, और शहर की दूर होती हलचलें…. सब जैसे मिलकर कोई अनकहा गीत गा रही थीं, जिसमें हर सुर रुहानी की बेचैनी को छू रहा था।

    यश की कही सारी बातें अब भी उसके कानों में गूंज रही थीं… एक-एक लफ़्ज़ जैसे मन के अंदर गहराई तक उतर गया था। अद्वैत ने जो कहा था, यश ने सब कुछ ज्यों का त्यों सुना दिया था, लेकिन उस सच्चाई में भी कहीं न कहीं कोई परतें छुपी थीं, जो रुहानी को भीतर से बेचैन कर रही थीं।l

    “आख़िर वो मुझसे शादी क्यूँ करना चाहता है?” – ये सवाल उसकी सोच में बार-बार एक टकराते हुए समुंदर की तरह उठ रहा था, जिसका कोई किनारा नजर नहीं आ रहा था। उसकी ज़िंदगी के सबसे कठिन लम्हे में उसने उसे बचाया था, ये बात सच थी…. लेकिन क्या किसी की जान बचाने भर से कोई रिश्ता इतना गहरा हो सकता है कि वो शादी तक पहुंच जाए? नहीं… रुहानी का दिल मानने को तैयार नहीं था।

    उसने जितना अद्वैत को जाना था… उसके घर में रहते हुए, उसकी मेड से बात करके…. वो इंसान तो बेहद आत्मनिर्भर था, एकदम अपने ही खोल में बंद, जैसे दुनिया से कोई सरोकार ही न हो। उसके चेहरे पर हमेशा एक उदास ठहराव रहता था, जैसे हर मुस्कान पर एक साया हो। वो न तो फालतू बातचीत करता, न ही किसी से खास घुलता-मिलता। 

    और फिर, सबसे बड़ी बात जो रुहानी को भीतर तक कचोट रही थी…. वो ये कि अद्वैत अपनी मरी हुई पत्नी से बेहद मोहब्बत करता था। इतना कि उसके गुजर जाने के बाद किसी और औरत को उसने अपने घर में आने तक नहीं दिया। ना कोई दोस्त, ना कोई हमराज़, ना कोई छांव।)

    तो फिर… ऐसी कौन सी बात है जो उसे, एक अजनबी लड़की को, अपनी पत्नी बनाने के लिए मजबूर कर रही है? रुहानी की उंगलियाँ धीरे-धीरे उसकी मोबाइल की किनारी से खेल रही थीं, और मन सवालों के भंवर में डूबा जा रहा था। 

    तभी उसके हाथ में रखा मोबाइल एकाएक बज उठा।  पर बस एक नाम चमक रहा था — Adwait. जैसे किसी खामोश तलाब में पत्थर गिरा हो, वैसे ही उसकी तंद्रा टूटी। उस एक नाम से उसके भीतर की सारी उलझनें जाग उठीं। हाथ थोड़े काँपे, पर उसने कॉल उठा लिया।

    फोन उठते ही दोनों तरफ कुछ क्षण की चुप्पी रही। जैसे दोनों अपनी साँसें थामे हुए हों, जैसे शब्दों से ज़्यादा भारी हो गई हों खामोशियाँ। और फिर जैसे कोई धागा एक साथ खिंच जाए….. दोनों एक साथ बोल पड़े:

    “मुझे तुम्हें कुछ बताना है,” अद्वैत की आवाज़ थी, भारी और धीमी।

    “मुझे तुमसे कुछ पूछना है,” रुहानी की आवाज़ में भी हल्की थरथराहट थी।

    फिर दोनों एक साथ रुक गए। एक और खामोशी, लेकिन इस बार वह बोझिल नहीं थी…. यह एक इंतज़ार की खामोशी थी।

    रुहानी ने आखिरकार धीमे स्वर में कहा, “यश ने बताया तुम्हारे प्रपोज़ल के बारे में… उसी सिलसिले में कुछ पूछना था मुझे।”

    फोन के दूसरी तरफ अद्वैत ने एक लंबी, गहरी साँस ली, जैसे शब्दों को आकार देने के लिए भीतर से कुछ खींच रहा हो, और फिर बोला, “इससे पहले कि तुम कुछ पूछो, मैं तुम्हें कुछ बताना चाहता हूँ… जिससे शायद तुम्हारे सारे सवालों के जवाब खुद-ब-खुद मिल जाएँ।”

    रुहानी थोड़ी चौंकी। यह शायद पहली बार था जब अद्वैत ने उससे इतने लंबे वाक्य में कुछ कहा था। कुछ तो था उस आवाज़ में…. कोई थकान, कोई सच्चाई, कोई बोझ। 

    वह बस “हम्म… ठीक है, कहो जो कहना है,” कहकर सुनने लगी।

    अद्वैत की आवाज़ फिर आई, बहुत साफ और सीधे लहजे में, “ये शादी असली शादी नहीं होगी।”

    रुहानी के माथे पर लकीरें उभर आईं, और उसकी भौहें एक-दूसरे के पास सिमट गईं। “क्या मतलब?” उसने पूछा, जैसे किसी पहेली को हल करने की कोशिश कर रही हो।

    “तुम्हें थोड़ा अजीब लग रहा होगा,” अद्वैत ने कहा, “लेकिन हमारी शादी एक शो होगी दुनिया के लिए… मतलब, ‘contract marriage’। मुझे इसी सिलसिले में तुमसे बात करनी थी।”

    अब उसकी आवाज़ में कोई झिझक नहीं थी….. जैसे जो बोझ वो दिल में लिए फिर रहा था, अब वो उतरने वाला हो। और उधर रुहानी की आँखें आसमान को नहीं, अब अपने भीतर के किसी सच को देख रही थीं….. वो सच, जिसे वो अब तक अनदेखा कर रही थी।

    रुहानी के कानों में जब ये सब बातें पड़ीं, तो पहले-पहल उसे विश्वास नहीं हुआ। शब्द तो मानो हवा में तैरते हुए आए थे, मगर जब उन्होंने उसके दिल की सतह को छुआ, तो वहां से भी कुछ वैसी ही सच्चाई फूट पड़ी। 

    भीतर से एक आवाज आई….. थकी हुई, टूटी हुई, मगर बेहद सच्ची…..”मैं भी तो किसी से रियल में शादी नहीं करना चाहती, ये भी ठीक ही है।” उसकी आंखों में थोड़ी नमी थी, लेकिन होंठों पर एक हल्की सी राहत की परछाईं भी। जैसे किसी भारी बोझ को अस्थायी ही सही, मगर कुछ देर के लिए नीचे रख दिया गया हो।

    अद्वैत की आवाज फिर कानों में पड़ी, गहरी और संयमित, “ऐसे तो मुझे एक साल का कॉन्ट्रैक्ट चाहिए तुमसे, लेकिन अगर तुम्हें कम या ज़्यादा करवाना हो तो तुम बता देना।”

    उसकी आवाज़ में एक पेशेवर ठंडक थी, पर उसके शब्दों की परतों में कहीं एक आत्म-रक्षा की दीवार भी थी… जैसे वो कुछ छुपा रहा हो, खुद से भी।

    रुहानी हल्की मुस्कराहट के साथ, पर दिल में उठते सवालों को थामे, धीरे से पूछ बैठी, “और क्या-क्या टर्म्स एंड कंडीशन्स रहेंगी इस कॉन्ट्रैक्ट में?”

    अद्वैत ने तुरंत कहा, “उतना सारा अभी कॉल पर बताना तो इम्पॉसिबल है। मैं तुम्हें सब मैसेज कर दूँगा। तुम्हें जो भी मॉडिफिकेशन करवाना हो, तो जल्द से जल्द मुझे रिप्लाई कर देना। मैं कल अपने मैनेजर से कहकर सारे डॉक्युमेंट्स बनवा लूंगा।”

    फोन की स्क्रीन से चिपकी रुहानी की उंगलियाँ कांप गईं। कोई रिश्ता यूँ कागज़ों में बंध जाए, ये सोचना भी भारी लग रहा था। लेकिन अब कुछ पूछे बिना रहा न गया। उसकी आवाज़ में एक थरथराहट थी, जैसे भीतर की सच्चाई बाहर आने को तैयार हो—“अचानक से तुम्हें कॉन्ट्रैक्ट मैरिज करने की क्या ज़रूरत आन पड़ी?”

    अद्वैत ने अपनी आंखें कुछ पल के लिए बंद कीं, जैसे हर जवाब को भीतर से टटोल रहा हो। फिर धीरे-धीरे कहने लगा, “ये सब मेरी राइटिंग करियर के लिए है। नाम है मेरा, एक इमेज है… उस पर दाग नहीं लगने दे सकता। कुछ चीजें दुनिया के लिए परफेक्ट दिखानी पड़ती हैं।”

    उसकी आवाज में कोई घमंड नहीं था, बस एक थकी हुई सच्चाई थी….जैसे कोई लेखक अपने किरदार को नहीं, खुद को पर्दे के पीछे छिपा रहा हो। कुछ कहने से पहले ही अद्वैत फिर बोल पड़ा, मानो उसे डर था कि कहीं रुहानी कोई वाजिब सवाल ना पूछ ले जिससे उसका यह ताश का महल हिल जाए, “याद रहे, contract marriage की बात केवल मैं, तुम, मेरे मैनेजर और वकील को ही पता रहेगी। इसके अलावा और कोई नहीं जान पाए।”

    रुहानी के होंठों पर एक उदासी भरी हँसी खिली, जो मुस्कान से ज़्यादा एक खामोश स्वीकार था। “तुम बेफिकर रहो,” उसने कहा, और वो शब्द किसी वादे की तरह गूंजे, जैसे उसने ना सिर्फ अद्वैत की बात मानी, बल्कि खुद को भी एक दायरे में कैद कर दिया हो। 

    उस हँसी में कोई नयापन नहीं था, बस एक पुरानी थकान थी…. एक लड़की की जो रिश्तों से ज़्यादा उम्मीदें करना भूल चुकी थी, और अब हर सौदे में बस थोड़ी सी इज़्ज़त ढूंढ रही थी।

    ——–

    रुहानी ने जो ‘हाँ’ कहा, क्या वो किसी मजबूरी का फैसला था… या दिल के किसी छुपे कोने से आई सहमति?

    जब इस कॉन्ट्रैक्ट की शर्तें कागज़ पर उतरेंगी… तो क्या कोई एक लाइन उनकी किस्मत की लकीर बदल देगी?

    क्या एक समझौते के तहत बंधे इस रिश्ते में सचमुच कोई प्यार, कोई इमोशन हो सकता था?

  • अधूरी इबादत भाग~16

    अधूरी इबादत भाग~16

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    भाग~16 खुद से बड़ा सवाल

     

    अद्वैत उस पुराने, हल्की रोशनी वाले कैफ़े के एक कोने की टेबल पर बैठा था, जहाँ लकड़ी की मेज़ें और दीवारों पर लगे पुराने पोस्टर अब भी बीते ज़माने की खुशबू सँजोए हुए थे।

    वो बच्चा, जो पहली बार उससे मिला था, अब उसकी ज़िंदगी की सबसे गंभीर बात कह चुका था…. शादी की, रिश्तों की, भरोसे की। यश के शब्द अब भी उसके ज़ेहन में गूंज रहे थे, और उसकी आँखें उस बालक की मासूम गंभीरता में उलझी हुई थीं, जैसे वो किसी गहरे सवाल के जवाब ढूँढ रही हों।

    “तुम तो आज पहली बार मुझसे मिल रहे हो, यश,” अद्वैत की आवाज़ में एक अजीब सी नरमी थी, मानो वह किसी नाजुक काँच को थाम रहा हो, “तो तुम मुझे अपनी दीदी से शादी करने के लिए कैसे कह सकते हो?”

    यश ने चौंकने की बजाय बहुत सधे हुए स्वर में जवाब दिया, उसकी आँखों में कोई हिचक नहीं थी, “दीदी ने आपके बारे में जितना बताया है, उससे मुझे तो आप बहुत भले इंसान लगते हो।”

    अद्वैत ने एक पल को उसकी ओर देखा, उसकी आँखों में सच में कोई छल नहीं था। मगर वो यह सुनकर और जानना चाहता था। उसकी आवाज़ में थोड़ी जिज्ञासा उभरी, “भला इंसान कैसे?”

    यश का चेहरा खिल उठा। “सबसे पहली बात,” उसने कहा, “आपने मेरी दीदी की जान बचाई है। और दूसरी, सबसे बड़ी बात – आपने कभी भी उनका फायदा नहीं उठाया, न उनके साथ कुछ ग़लत किया। आजकल तो लोग बस मौके ढूंढते हैं, लेकिन आपने… आपने उन्हें स्पेस दिया, इज़्ज़त दी… वो चीज़ जो शायद उन्हें सबसे ज़्यादा चाहिए थी।”

    अद्वैत के भीतर कुछ खामोशी से हिलने लगा। यश के मासूम शब्दों ने उसे अंदर तक छू लिया था। उसे लगा जैसे कोई उसके अंधेरे कमरे में एक छोटा सा दीया जला गया हो, बिना कोई शोर किए। उस पल में अद्वैत को एहसास हुआ कि भले ही उसने कुछ बड़ा नहीं किया हो, पर शायद… शायद उसका होना ही किसी के लिए काफी हो गया था।

    अद्वैत को अपने बारे में यश के मुँह से ये बातें सुनना कुछ अजीब सा लग रहा था। भीतर कहीं कुछ काँप गया था। जैसे कोई पुरानी धूल में ढकी हुई तस्वीर अचानक आँखों के सामने आ गई हो—अपनी माँ की वो आँखें, जिनमें उसने आखिरी बार देखा था खुद पर भरोसा। वो आँखें जो कहती थीं, “दूसरे जैसे मत बनना, अद्वैत… अपनी अच्छाई को मत छोड़ना।” आज यश के मासूम शब्दों ने उस अधूरी बात को पूरा कर दिया था।

    जिस अद्वैत अवस्थी को दुनिया अक्सर “नजायज़” कहकर किनारे कर देती थी, जिसके नाम के आगे कभी पिता का नाम नहीं जुड़ा, जिसकी परवरिश सवालों की छांव में हुई—क्या वही अद्वैत आज किसी के लिए “भला इंसान” कहलाने लायक बन गया है? क्या उसने सचमुच अपनी माँ के आदर्शों को जी लिया है, जो एक किशोर लड़के की आँखों में इतनी साफ इज्ज़त उतर आई?

    लेकिन जैसे ही उसका मन उन ख्यालों में बहने लगा, उसने खुद को एक झटका दिया। नहीं, अभी भावनाओं में बहने का समय नहीं है। उसने गहराई से यश की आँखों में देखा, फिर धीमी, मगर साफ आवाज़ में बोला, “यश, तुम्हें किसी भी तरह अपनी दीदी को कल कोर्ट लेकर आना होगा। तभी हम दोनों की शादी हो पाएगी।”

    यश कुछ कहने ही वाला था कि अद्वैत ने जल्दी से जोड़ा, “लेकिन इस बारे में सिर्फ़ तुम्हें और रूहानी को ही पता होना चाहिए। कोई तीसरा नहीं। कोई भी नहीं।”

    उसके शब्दों में कोई डर नहीं था, मगर एक जिम्मेदारी की थकान ज़रूर थी। मानो वो उस अकेले पुल पर खड़ा हो जहाँ से नीचे छलांग लगाना भी जरूरी था और टिके रहना भी। उसकी आवाज़ में स्थिरता थी, लेकिन भीतर कहीं बहुत गहराई में एक बवंडर चल रहा था…. डर, उम्मीद और एक अजीब-सी राहत का। जैसे वो किसी ऐसी डोर को थामे खड़ा था जो अगर टूटी, तो सब कुछ बिखर जाएगा, लेकिन अगर बची रही… तो शायद एक नई ज़िंदगी शुरू हो सकती थी।

    यश की बातों को सुनते हुए अद्वैत का मन कुछ झिझकता है, लेकिन उसने अपने भीतर के असमंजस को दबा दिया। “आप फिक्र मत कीजिए सर, कल मैं उन्हें शादी की शॉपिंग के नाम से ले आऊँगा,” यश का विश्वासपूर्ण स्वर सुनकर अद्वैत ने एक गहरी सांस ली। 

    फिर, जैसे किसी कांटे को उखाड़ने की कोशिश करते हुए उसने अपनी चिंता को एक बार फिर से व्यक्त किया, “लेकिन साथ में कोई और नहीं होना चाहिए, ना ही तुम्हारी माँ या तुम्हारे पापा।” अद्वैत के शब्दों में गहरी चिंता थी, जैसे उसके मन में एक अंधी सी गलती का डर पल रहा हो, जो इस फैसले को और भी कठिन बना रहा था।

    यश ने एक हल्की मुस्कान के साथ कहा, “आप निश्चिंत रहिए, दीदी को लेकर मैं अकेले ही आऊँगा, माँ-पापा मुझे कुछ नहीं बोलेंगे।” यश के शब्दों में एक तरह का आत्मविश्वास था, लेकिन अद्वैत के भीतर एक हल्की सी खटक महसूस हुई। यह विश्वास था या फिर एक और भ्रम, वह नहीं जानता था।

    उसके मन में एक असमंजस था, जैसे एक तट पर खड़ा कोई इंसान जो जानता है कि समुद्र की लहरें कभी भी उसे अपनी चपेट में ले सकती हैं, फिर भी वह कदम बढ़ाने के लिए तैयार नहीं है। उसने अपने भीतर की घबराहट को शांत किया, और फिर से अपने ध्यान को एक ही बिंदु पर केंद्रित किया। “बस, अब यहीं तक,” उसने खुद से कहा, और फिर वहां से जाने का निर्णय लिया।

    अद्वैत जैसे ही उठने वाला था, तभी उसकी नजरें रुहानी के फोन पर पड़ीं, जो अभी भी उसके हाथों में था। कुछ पल के लिए वह जैसे ठहर गया। उसकी उंगलियाँ फोन के आसपास हल्की सी घूमने लगीं, जैसे उसे इसे वापस करना न हो, बल्कि उसमें छुपे हुए किसी गहरे रिश्ते को थामे रखने की इच्छा हो।

    दिल में उथल-पुथल सी महसूस हो रही थी। वह रुहानी से जुड़ी हर बात, हर याद, उसकी आँखों के सामने जैसे सजीव हो उठी। पर फिर उसने खुद को सँभाला और यथार्थ में लौटते हुए यश को फोन वापस करते हुए कहा, “अपनी दीदी को उसका फोन दे देना।”

    यश ने उस फोन को सावधानी से अद्वैत से लिया और उसे अपने हाथों में थाम लिया, जैसे कोई बहुमूल्य चीज हो। वह खड़ा होने लगा, जाने के लिए तैयार था, तभी अद्वैत ने उसे रोकते हुए कहा, “और हाँ, रुहानी को बोल देना कि मैंने अपना नंबर इस में सेव कर लिया है और मैं उससे बात कर लूंगा।”

    यश ने सिर झुकाकर कहा, “जी जरूर, धन्यवाद,” और धीरे-धीरे कदम बढ़ाए। अद्वैत ने उसे जाते हुए देखा, लेकिन उसका मन अभी भी कहीं और था। उसके भीतर जैसे एक अजीब सी लहर दौड़ रही थी। उसका ध्यान अब भी उसी फोन पर था, जिसमें रुहानी की यादें और उसकी खुशबू बसी हुई थी। यश के जाते ही अद्वैत वहीं बैठा रहा, जैसे किसी उलझी हुई सोच में खो गया हो। उसके दिल में एक अजीब सी गहरी खामोशी थी, जिसे वह खुद भी समझ नहीं पा रहा था।

    ———–

    क्या अद्वैत की ज़िंदगी में अब भी कोई और आ सकता था, या फिर वह खुद ही किसी अजनबी भविष्य की ओर बढ़ रहा था?

    क्या रुहानी इस समझौते को स्वीकार करेगी, जो अद्वैत ने बिना उससे पूछे तय कर दिया है? 

    अद्वैत की उम्मीदों और रुहानी के दिल के बीच जो अनकही बातें हैं, क्या वे दोनों के सामने आने वाली राह को बदल देंगी?