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लेखक: Auther preeti Sharma

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Auther preeti Sharma

मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

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  • नसीब

    नसीब

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    नसीब न जाने क्या होता है,

    कभी हँसाता, कभी रुलाता है।

    जिसे चाहो वो दूर हो जाता,

    जिसे न चाहो वो पास आता है।

    कभी मेहनत भी हार जाती है,

    कभी किस्मत राह बना जाती है।

    इंसान बस कोशिश करता रह जाता है,

    नसीब जाने कब क्या दिखाता है।

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    Auther preeti Sharma

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  • वक्त का फ़ैसला

    वक्त का फ़ैसला

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

     

    सेआस

    वक्त जब कोई फैसला सुनाता है,

    शुरुआत में वो समझ कहाँ आता है।

    जिसे हम अपनी हार मान बैठते हैं,

    वो अक्सर किसी बड़े दर्द से बचाता है।

    ​टूटे हुए सपनों पर जब आँखें रोती हैं,

    तब किस्मत नई राहों के बीज बोती है।

    हर बंद रास्ते के पीछे एक नई सहर होती है,

    वक्त की चाल थोड़ी धीमी पर बेअसर नहीं होती है।

    ​आज जो फैसला एक बोझ लगता है,

    कल वही हमारी सबसे बड़ी ताकत बनता है।

    इंतज़ार करो, थोड़ा भरोसा रखो उस पर,

    वक्त हर सवाल का सही जवाब गढ़ता है।

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  • मैं क्यू भला इस दर्द में

    मैं क्यू भला इस दर्द में

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

     

    मैं क्यों भला इस व्यर्थ के दर्द में तड़पती रहूं,

    दूसरों की ख़ातिर खुद ही से लड़ती रहूं।

    जब आसमां ने दिए हैं पंख मुझे उड़ने को,

    तो फिर ज़मीन की बंदिशों से क्यों डरती रहूं।

    ग़म के साए में रहकर अपनी चमक खोना नहीं,

    अब किसी की बेरुखी पर बैठकर रोना नहीं।

    तोड़ फेंकी हैं मैंने खामोशी की ज़ंजीरें,

    अपनी क़िस्मत की रेखाएं अब खुद लिखूंगी।

    रौशनी मेरी अपनी है, मैं यूं ही चमकती रहूं।

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  • अंतिम भाग

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

    श्री कृष्ण और सुदामा — अटूट मित्रता की कहानी

    अध्याय 15

    सुदामा कृष्ण के सामने खड़े थे।

     

    उनकी आँखों में आँसू थे और चेहरे पर वर्षों पुरानी यादों की चमक।

     

    कृष्ण ने धीरे से पूछा,

     

    “अब याद आया, सुदामा?”

     

    सुदामा ने सिर झुका लिया।

     

    “हाँ कृष्ण… सब याद आ गया।”

     

    उन्होंने अपनी पोटली खोली और उसमें से वह पुरानी लकड़ी की माला निकाल ली।

     

    “ये भी तुमने ही मुझे दी थी।”

     

    कृष्ण मुस्कुराए।

     

    “तुमने इसे इतने साल संभालकर रखा।”

     

    सुदामा ने कहा,

     

    “मैंने संभालकर नहीं रखा था कृष्ण… शायद तुम्हारी याद ने इसे मेरे पास संभालकर रखा था।”

     

    दोनों कुछ पल चुप रहे।

     

    पास खड़ा बच्चा उनकी बातें सुन रहा था।

     

    सुदामा ने उसकी तरफ देखा।

     

    “कृष्ण, अब मुझे समझ आ गया कि तुमने मुझे यहाँ क्यों बुलाया।”

     

    कृष्ण ने कुछ नहीं कहा।

     

    सुदामा बच्चे के पास जाकर बैठ गए।

     

    “तुम्हें पढ़ना अच्छा लगता है?”

     

    बच्चे ने धीरे से सिर हिलाया।

     

    “हाँ।”

     

    “बड़े होकर क्या बनना चाहते हो?”

     

    बच्चे ने थोड़ी देर सोचा।

     

    “मैं… ऐसा इंसान बनना चाहता हूँ जिससे किसी को मदद मिले।”

     

    सुदामा की आँखें भर आईं।

     

    उन्होंने कृष्ण की तरफ देखा।

     

    “तुमने इसे भी वही बात सिखाई है।”

     

    कृष्ण हँसे।

     

    “मैंने नहीं, समय ने सिखाई है।”

     

    सुदामा ने बच्चे का हाथ पकड़ लिया।

     

    “तो फिर आज से तुम्हारी जिम्मेदारी मेरी।”

     

    बच्चे ने पूछा,

     

    “क्या मैं आपके साथ रह सकता हूँ?”

     

    सुदामा ने उसके सिर पर हाथ रखा।

     

    “जहाँ अपना मन मिले, वही घर होता है।”

     

    कृष्ण चुपचाप दोनों को देखते रहे।

     

    कुछ देर बाद सुदामा उनके पास आए।

     

    “कृष्ण, एक बात पूछूँ?”

     

    “पूछो।”

     

    “तुमने मुझे कभी बताया क्यों नहीं कि तुमने मेरा इंतजार इतने साल किया?”

     

    कृष्ण ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “क्योंकि सच्ची दोस्ती में इंतजार का हिसाब नहीं रखा जाता।”

     

    सुदामा की आँखें नम हो गईं।

     

    “और अगर मैं कभी वापस नहीं आता?”

     

    कृष्ण ने बिना देर किए कहा,

     

    “तो भी मैं तुम्हें अपना दोस्त ही मानता।”

     

    सुदामा ने कृष्ण को गले लगा लिया।

     

    कई वर्षों की दूरी उस एक पल में जैसे मिट गई।

     

    उन्हें फिर वही गुरुकुल याद आया।

     

    दो छोटे बच्चे।

     

    एक साथ बैठकर खाना खाते हुए।

     

    एक-दूसरे की शरारतों पर हँसते हुए।

     

    मुश्किल समय में एक-दूसरे का हाथ पकड़ते हुए।

     

    तब उन्हें लगा था कि समय के साथ सब बदल जाएगा।

     

    लेकिन आज समझ आया—

     

    सच्ची दोस्ती समय से नहीं बदलती।

     

    सुदामा ने धीरे से कहा,

     

    “कृष्ण, उस दिन मैंने तुमसे पूछा था कि हमारी जिंदगी बदल जाएगी तो क्या हमारी दोस्ती भी बदल जाएगी।”

     

    कृष्ण मुस्कुराए।

     

    “और मैंने कहा था—कभी नहीं।”

     

    “आज मुझे उस जवाब का मतलब समझ आया।”

     

    कृष्ण ने पूछा,

     

    “क्या?”

     

    सुदामा बोले,

     

    “दोस्ती साथ रहने का नाम नहीं है। दोस्ती उस भरोसे का नाम है, जो दूरी के बाद भी दिल में बना रहता है।”

     

    कृष्ण की आँखों में भी नमी आ गई।

     

    सुदामा ने अपनी पुरानी पोटली कृष्ण को वापस देने की कोशिश की।

     

    “इसे रख लो।”

     

    कृष्ण ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं।”

     

    “क्यों?”

     

    “अब ये तुम्हारे पास ही रहेगी।”

     

    “लेकिन क्यों?”

     

    कृष्ण ने कहा,

     

    “क्योंकि अब तुम्हें इसकी जरूरत पहले से ज्यादा है।”

     

    सुदामा समझ गए।

     

    उन्होंने पोटली को फिर अपने सीने से लगा लिया।

     

    उन्हें अब पता था कि उसमें सिर्फ एक पुरानी निशानी नहीं थी।

     

    उसमें उनकी दोस्ती की याद थी।

     

    एक वादा था।

     

    एक विश्वास था।

     

    और एक ऐसा रिश्ता था जिसे समय भी कमजोर नहीं कर पाया।

     

    शाम होने लगी।

     

    सुदामा वापस जाने के लिए तैयार हुए।

     

    बच्चा भी उनके साथ चलने लगा।

     

    कृष्ण ने उन्हें जाते हुए देखा।

     

    सुदामा कुछ कदम चले, फिर पलटकर बोले,

     

    “कृष्ण!”

     

    “हाँ?”

     

    “इस बार मैं वादा नहीं भूलूँगा।”

     

    कृष्ण मुस्कुराए।

     

    “मुझे पता है।”

     

    सुदामा ने हाथ जोड़ दिए।

     

    “तुम मेरे दोस्त हो… ये बात अब कभी नहीं भूलूँगा।”

     

    कृष्ण ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “और तुम मेरे दोस्त हो… ये बात मुझे कभी याद दिलाने की जरूरत नहीं पड़ेगी।”

     

    सुदामा आगे बढ़ गए।

     

    उनके कदम पहले से ज्यादा मजबूत थे।

     

    अब उनके पास धन नहीं था।

     

    महल नहीं था।

     

    लेकिन उनके दिल में एक ऐसी दौलत थी, जो किसी राजा के पास भी नहीं होती—

     

    सच्चे दोस्त का विश्वास।

     

    रास्ते में बच्चा उनके साथ चल रहा था।

     

    सुदामा ने उसकी तरफ देखा।

     

    “चलो, अब तुम्हें पढ़ाई करनी है।”

     

    बच्चा मुस्कुराया।

     

    “और अगर मैं गलती करूँ तो?”

     

    सुदामा हँस पड़े।

     

    “तो मैं तुम्हें समझाऊँगा।”

     

    “और अगर फिर भी गलती करूँ?”

     

    “तो फिर…”

     

    सुदामा कुछ पल रुके।

     

    “फिर तुम्हें कृष्ण की एक बात याद दिलाऊँगा।”

     

    बच्चे ने पूछा,

     

    “क्या?”

     

    सुदामा मुस्कुराए।

     

    “किसी का हाथ पकड़ो तो उसे बीच रास्ते में छोड़ना मत।”

     

    दोनों आगे बढ़ गए।

     

    दूर महल की ओर देखते हुए सुदामा के मन में कृष्ण का चेहरा था।

     

    उन्होंने मन ही मन कहा—

     

    “कृष्ण, हमारा वो वादा कभी टूटा ही नहीं था… बस मैं उसे कुछ समय के लिए भूल गया था।”

     

    हवा धीरे-धीरे चल रही थी।

     

    सुदामा की पोटली उनके कंधे पर थी।

     

    और उसमें रखी पुरानी निशानी जैसे उन्हें बार-बार यही बता रही थी—

     

    सच्ची दोस्ती में दूरी हो सकती है, समय बदल सकता है, जिंदगी बदल सकती है… लेकिन सच्चे दोस्त के लिए दिल में जगह कभी नहीं बदलती।

     

    और इसी के साथ कृष्ण और सुदामा की वह कहानी पूरी हुई—

     

    एक ऐसी दोस्ती की कहानी, जिसमें न कोई स्वार्थ था, न कोई हिसाब… सिर्फ विश्वास था, अपनापन था और एक ऐसा वादा था, जो वर्षों बाद भी अपनी जगह कायम रहा।

     

    समाप्त 

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    Auther preeti Sharma

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  • आखिरी निशानी

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     

    अध्याय 14 — पेटी में बंद आखिरी निशानी

     

    “कृष्ण?”

     

    सुदामा ने घबराकर बाहर देखा।

     

    आँगन बिल्कुल शांत था।

     

    हवा तक जैसे थम गई थी।

     

    उन्होंने कुछ कदम बाहर बढ़ाए।

     

    “कृष्ण… अगर तुम सच में हो, तो सामने आओ।”

     

    कोई उत्तर नहीं मिला।

     

    पीछे खड़ा वृद्ध धीरे से बोला,

     

    “सुदामा जी, शायद आपको भ्रम हुआ है।”

     

    सुदामा ने उसकी ओर देखा।

     

    “नहीं… वह आवाज मैंने पहचानी थी।”

     

    वृद्ध कुछ नहीं बोला।

     

    सुदामा वापस कमरे में आए और लकड़ी की पेटी के सामने बैठ गए।

     

    उन्होंने अपनी हथेली पेटी पर रखी।

     

    “कृष्ण, अगर तुमने इसे मेरे लिए छोड़ा है… तो अब मुझे सच जानना है।”

     

    उन्होंने पेटी खोल दी।

     

    अंदर कपड़े में लिपटी एक छोटी-सी वस्तु रखी थी।

     

    सुदामा ने उसे धीरे से उठाया।

     

    कपड़ा हटाते ही उनकी आँखें भर आईं।

     

    वह एक पुरानी लकड़ी की बांसुरी थी।

     

    सुदामा उसे देखते ही पहचान गए।

     

    “ये तो…”

     

    वृद्ध ने पूछा,

     

    “पहचान गए?”

     

    सुदामा ने सिर हिलाया।

     

    “हाँ। ये कृष्ण की बांसुरी है।”

     

    वह बांसुरी उनके हाथों में काँप रही थी।

     

    “लेकिन ये यहाँ कैसे?”

     

    वृद्ध ने धीरे से कहा,

     

    “कृष्ण इसे यहीं छोड़ गए थे।”

     

    “कब?”

     

    “बहुत साल पहले।”

     

    सुदामा ने बांसुरी को ध्यान से देखा।

     

    उस पर एक छोटा-सा निशान बना था।

     

    उन्होंने उँगली से उस निशान को छुआ।

     

    और अचानक उन्हें सब कुछ थोड़ा-थोड़ा याद आने लगा।

     

    गुरुकुल की वही आखिरी शाम।

     

    सूरज ढल रहा था।

     

    कृष्ण और सुदामा आश्रम के पीछे बैठे थे।

     

    कृष्ण के हाथ में यही बांसुरी थी।

     

    सुदामा ने उस समय पूछा था,

     

    “कृष्ण, तुम द्वारका जाओगे तो मुझे भूल तो नहीं जाओगे?”

     

    कृष्ण हँसे थे।

     

    “तुम्हें भूलना इतना आसान है क्या?”

     

    सुदामा भी हँसे थे।

     

    फिर कृष्ण कुछ देर चुप हो गए।

     

    उन्होंने बांसुरी सुदामा के हाथ में रख दी।

     

    “इसे रख लो।”

     

    सुदामा ने कहा,

     

    “मैं इसे क्या करूँगा?”

     

    कृष्ण बोले,

     

    “जब भी तुम्हें लगे कि मैं तुमसे दूर हूँ, इसे देख लेना।”

     

    सुदामा की आँखों से आँसू बहने लगे।

     

    “लेकिन मैंने तो इसे कभी लिया ही नहीं…”

     

    वह अचानक रुक गए।

     

    याद पूरी नहीं थी।

     

    कृष्ण ने शायद उसके बाद कुछ कहा था।

     

    सुदामा ने आँखें बंद कर लीं।

     

    “कृष्ण… मुझे याद करने दो।”

     

    काफी देर तक वह शांत बैठे रहे।

     

    फिर अचानक उनके चेहरे पर हैरानी आ गई।

     

    “हाँ!”

     

    वृद्ध ने पूछा,

     

    “क्या याद आया?”

     

    सुदामा ने धीरे से कहा,

     

    “उस दिन कृष्ण ने मुझसे कहा था…”

     

    वह कुछ पल रुके।

     

    “अगर कभी ऐसा समय आए जब तुम्हें लगे कि तुम्हारे पास देने के लिए कुछ नहीं बचा… तब भी किसी जरूरतमंद को खाली हाथ मत लौटाना।”

     

    वृद्ध ध्यान से सुन रहा था।

     

    सुदामा की आवाज भर्रा गई।

     

    “मैंने उससे पूछा था—मैं खुद गरीब हुआ तो दूसरों की मदद कैसे करूँगा?”

     

    फिर सुदामा मुस्कुराए।

     

    “कृष्ण ने कहा था—धन से नहीं, मन से मदद करना।”

     

    कमरे में कुछ पल सन्नाटा रहा।

     

    वृद्ध की आँखें भी नम हो गईं।

     

    सुदामा ने बांसुरी को सीने से लगा लिया।

     

    “तो यही था वो वादा…”

     

    लेकिन तभी उन्हें कुछ और याद आया।

     

    उनका चेहरा अचानक गंभीर हो गया।

     

    “नहीं…”

     

    वृद्ध ने पूछा,

     

    “क्या हुआ?”

     

    सुदामा ने कहा,

     

    “कृष्ण ने उस दिन मुझसे एक और बात कही थी।”

     

    “क्या?”

     

    “उसने कहा था कि एक दिन मैं इस गुरुकुल में वापस आऊँगा।”

     

    वृद्ध ने धीरे से सिर हिलाया।

     

    “हाँ।”

     

    सुदामा ने चौंककर उसकी तरफ देखा।

     

    “तुम्हें कैसे पता?”

     

    वृद्ध ने पेटी के नीचे हाथ डाला और एक पुराना कागज निकाला।

     

    “क्योंकि कृष्ण ने ये भी छोड़ा था।”

     

    सुदामा ने कागज लिया।

     

    उस पर सिर्फ एक वाक्य लिखा था—

     

    “जब सुदामा लौटे, तो उसे वह जगह दिखाना जहाँ हमने पहली बार अपना वादा किया था।”

     

    सुदामा ने चारों ओर देखा।

     

    “कौन-सी जगह?”

     

    वृद्ध ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    वह कमरे से बाहर निकल गया।

     

    “मेरे पीछे आइए।”

     

    सुदामा बांसुरी और कागज लेकर उसके पीछे चल पड़े।

     

    वृद्ध उन्हें गुरुकुल के पीछे एक पुराने पेड़ के पास ले गया।

     

    पेड़ अब बहुत बड़ा हो चुका था।

     

    उसकी जड़ों के पास जमीन पर पत्थरों से बना एक छोटा-सा निशान था।

     

    वृद्ध ने कहा,

     

    “यहीं बैठते थे तुम दोनों।”

     

    सुदामा नीचे बैठ गए।

     

    उन्होंने पेड़ के तने को छुआ।

     

    और उनकी याद फिर लौट आई।

     

    कृष्ण और सुदामा वहाँ बैठे थे।

     

    कृष्ण ने मिट्टी पर अपनी उँगली से कुछ लिखा था।

     

    सुदामा ने पूछा था,

     

    “ये क्या है?”

     

    कृष्ण ने कहा था,

     

    “वादा।”

     

    “कैसा वादा?”

     

    कृष्ण मुस्कुराए थे।

     

    “जब हम बड़े हो जाएंगे, तब चाहे हमारी जिंदगी कितनी भी बदल जाए… हम किसी ऐसे इंसान को अकेला नहीं छोड़ेंगे जिसे हमारी जरूरत हो।”

     

    सुदामा की साँस जैसे रुक गई।

     

    “मैंने… ये वादा किया था।”

     

    वृद्ध ने कहा,

     

    “और कृष्ण ने इसे कभी नहीं भुलाया।”

     

    सुदामा ने पूछा,

     

    “तो फिर उसने मुझे इतने सालों तक क्यों नहीं बताया?”

     

    वृद्ध मुस्कुराया।

     

    “शायद क्योंकि उसे भरोसा था कि आपको खुद याद आएगा।”

     

    सुदामा की आँखों से आँसू गिर पड़े।

     

    उन्होंने बांसुरी को देखा।

     

    “कृष्ण… तुमने मेरी गरीबी नहीं देखी।”

     

    वह मुस्कुराए।

     

    “तुमने मेरा दिल देखा।”

     

    उसी समय पीछे से घोड़े के आने की आवाज सुनाई दी।

     

    वृद्ध ने पलटकर देखा।

     

    एक व्यक्ति घोड़े से उतर रहा था।

     

    उसके हाथ में द्वारका की मुहर लगी हुई थी।

     

    वह सीधे सुदामा के पास आया।

     

    “क्या आप सुदामा हैं?”

     

    “हाँ।”

     

    उसने एक पत्र आगे बढ़ाया।

     

    “ये आपके लिए है।”

     

    सुदामा ने पत्र लिया।

     

    मुहर देखकर उनका दिल तेज धड़कने लगा।

     

    वह कृष्ण का पत्र था।

     

    सुदामा ने काँपते हाथों से पत्र खोलना शुरू किया।

     

    लेकिन पत्र पढ़ने से पहले ही उनकी नजर आखिरी पंक्ति पर पड़ गई।

     

    वहाँ लिखा था—

     

    “सुदामा, अब तुम्हें वह करना है जिसका वादा हमने उस दिन किया था।”

     

    सुदामा की आँखें फैल गईं।

     

    “लेकिन करना क्या है?”

     

    दूत ने उनकी तरफ देखा।

     

    “यही बताने के लिए मुझे भेजा गया है।”

     

    सुदामा ने पत्र कसकर पकड़ लिया।

     

    दूत ने कहा—

     

    “द्वारका में एक व्यक्ति तुम्हारा इंतजार कर रहा है।”

     

    सुदामा चौंक गए।

     

    “कौन?”

     

    दूत ने जवाब दिया,

     

    “जिसे देखकर आपको अपने पुराने वादे का आखिरी हिस्सा याद आ जाएगा।”

     

    सुदामा कुछ समझ नहीं पाए।

     

    लेकिन उनके मन में एक बात साफ हो चुकी थी।

     

    कृष्ण ने सिर्फ अतीत याद कराने के लिए उन्हें गुरुकुल नहीं बुलाया था।

     

    वह चाहते थे कि सुदामा अब अपने उस पुराने वादे को पूरा करें।

     

    लेकिन वह वादा किसके लिए था?

     

    और द्वारका में उनका इंतजार कौन कर रहा था?

     

    क्रमशः…

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    Auther preeti Sharma

    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

  • गुरुकुल की ओर लौटते

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

    अध्याय 13 — गुरुकुल की ओर लौटते कदम

    सुबह होते ही सुदामा ने गुरुकुल जाने की तैयारी शुरू कर दी।

     

    कई साल बीत चुके थे।

     

    जिस रास्ते पर कभी दो बच्चे नंगे पैर दौड़ा करते थे, उसी रास्ते पर अब सुदामा एक बूढ़े यात्री की तरह धीरे-धीरे आगे बढ़ रहे थे।

     

    उनके हाथ में वही छोटी-सी पोटली थी।

     

    वह बार-बार उसे देखते।

     

    उन्हें अब भी समझ नहीं आ रहा था कि कृष्ण ने आखिर इसमें ऐसा क्या रखा है, जो उन्हें उनके अतीत तक ले जा रहा है।

     

    उनकी पत्नी ने रास्ते के लिए थोड़ा भोजन बाँधा।

     

    “इसे रख लीजिए।”

     

    सुदामा ने पोटली के पास वह भोजन रखा।

     

    फिर पत्नी की तरफ देखकर बोले,

     

    “पता नहीं कितने दिन बाद वापस आऊँगा।”

     

    पत्नी मुस्कुराईं।

     

    “आप कृष्ण के दोस्त हैं। जहाँ कृष्ण की याद बुला रही है, वहाँ जाने में देर कैसी?”

     

    सुदामा भी मुस्कुरा दिए।

     

    “तुम्हें लगता है कृष्ण ने सच में कुछ सोचकर ये सब किया है?”

     

    “मुझे तो हमेशा से लगता है कि कृष्ण जो करते हैं, उसके पीछे कोई न कोई वजह जरूर होती है।”

     

    सुदामा ने धीरे से सिर हिलाया।

     

    “हाँ… यही तो बात है।”

     

    कुछ देर बाद वह चल पड़े।

     

    रास्ता लंबा था।

     

    चलते-चलते उन्हें गुरुकुल के दिन याद आने लगे।

     

    कृष्ण और वह साथ बैठकर पढ़ते थे।

     

    कभी गुरुजी की डाँट खाते।

     

    कभी जंगल से लकड़ियाँ लेने जाते।

     

    कभी भूख लगने पर एक-दूसरे से अपना थोड़ा-सा भोजन बाँट लेते।

     

    एक याद आते ही सुदामा हँस पड़े।

     

    “कृष्ण कितना शरारती था…”

     

    फिर अचानक उनकी हँसी रुक गई।

     

    उन्हें वही आखिरी शाम याद आई।

     

    कृष्ण का चेहरा।

     

    उसकी आँखों की उदासी।

     

    और वह अधूरा वादा।

     

    सुदामा ने खुद से कहा,

     

    “आज मुझे सब याद करना ही होगा।”

     

    शाम होते-होते वह उस जंगल के पास पहुँच गए जहाँ कभी गुरुकुल हुआ करता था।

     

    लेकिन वहाँ पहुँचते ही उनके कदम रुक गए।

     

    सामने वही पुराना रास्ता था।

     

    पेड़ अब बहुत बड़े हो चुके थे।

     

    आश्रम की दीवारें कुछ टूट गई थीं।

     

    लेकिन जगह वही थी।

     

    सुदामा धीरे-धीरे अंदर गए।

     

    आँगन में कदम रखते ही उनके शरीर में जैसे एक सिहरन दौड़ गई।

     

    उन्होंने आँखें बंद कर लीं।

     

    अचानक उन्हें कृष्ण की आवाज सुनाई दी।

     

    “सुदामा, जल्दी करो!”

     

    वह मुस्कुरा दिए।

     

    “तुम हमेशा मुझे ही जल्दी करने को कहते थे।”

     

    फिर उनकी आँखें नम हो गईं।

     

    उन्होंने चारों ओर देखा।

     

    “कृष्ण…”

     

    कोई जवाब नहीं आया।

     

    सुदामा ने पोटली निकाली।

     

    “अब बताओ दोस्त… मुझे यहाँ क्यों बुलाया?”

     

    उसी समय पीछे से किसी की आवाज आई,

     

    “क्योंकि कुछ बातें जगह बदलने से नहीं बदलतीं।”

     

    सुदामा तुरंत पलटे।

     

    सामने एक वृद्ध व्यक्ति खड़ा था।

     

    सुदामा ने उसे ध्यान से देखा।

     

    पहचानने की कोशिश की।

     

    वृद्ध मुस्कुराया।

     

    “पहचाना नहीं?”

     

    सुदामा ने सिर हिलाया।

     

    वह व्यक्ति आगे आया।

     

    “मैं उसी गुरुकुल का एक पुराना सेवक हूँ।”

     

    सुदामा की आँखें फैल गईं।

     

    “तुम…?”

     

    “हाँ।”

     

    वृद्ध ने कहा,

     

    “मैंने तुम्हें और कृष्ण को बचपन से देखा है।”

     

    सुदामा कुछ बोल नहीं पाए।

     

    फिर उन्होंने पूछा,

     

    “क्या कृष्ण ने तुम्हें मेरे बारे में बताया था?”

     

    वृद्ध मुस्कुराया।

     

    “बहुत पहले।”

     

    “क्या?”

     

    “उन्होंने कहा था कि एक दिन सुदामा यहाँ जरूर लौटेगा।”

     

    सुदामा का दिल तेज धड़कने लगा।

     

    “और उन्होंने ये भी कहा था कि उसे क्या बताना है?”

     

    वृद्ध ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं।”

     

    सुदामा परेशान हो गए।

     

    “तो फिर?”

     

    वृद्ध ने आश्रम के पुराने कमरे की तरफ इशारा किया।

     

    “उन्होंने तुम्हारे लिए वहाँ कुछ छोड़ा था।”

     

    सुदामा कुछ पल वहीं खड़े रहे।

     

    “क्या?”

     

    वृद्ध ने कहा,

     

    “यह तुम्हें खुद देखना होगा।”

     

    सुदामा धीरे-धीरे उस कमरे की तरफ बढ़े।

     

    दरवाजे पर हाथ रखते ही उन्हें कृष्ण की वही पुरानी मुस्कान याद आ गई।

     

    उन्होंने दरवाजा खोला।

     

    कमरे में धूल जमी थी।

     

    एक तरफ पुरानी लकड़ियाँ थीं।

     

    दूसरी तरफ कुछ टूटे हुए सामान।

     

    लेकिन कमरे के बीचोंबीच एक छोटी-सी लकड़ी की पेटी रखी थी।

     

    सुदामा उसे देखते ही रुक गए।

     

    पेटी पर एक छोटा-सा चिन्ह बना था।

     

    वही चिन्ह…

     

    जो कृष्ण अपनी किताबों पर बनाया करते थे।

     

    सुदामा ने काँपते हाथों से पेटी उठाई।

     

    वृद्ध ने कहा,

     

    “इसे खोलने से पहले अपनी पोटली देखना।”

     

    सुदामा चौंक गए।

     

    उन्होंने पोटली खोली।

     

    अंदर रखी पुरानी चीज को बाहर निकाला।

     

    वह एक छोटी-सी लकड़ी की माला थी।

     

    सुदामा उसे देखते ही स्तब्ध रह गए।

     

    “ये…”

     

    उनकी आँखों के सामने एक पुरानी तस्वीर जैसी याद उभरी।

     

    कृष्ण वही माला उनके हाथ में दे रहे थे।

     

    और कह रहे थे—

     

    “इसे संभालकर रखना।”

     

    सुदामा की आँखों से आँसू निकल पड़े।

     

    “मैं इसे भूल गया था…”

     

    वृद्ध चुपचाप खड़ा रहा।

     

    सुदामा ने पेटी की ओर देखा।

     

    “क्या इसमें वही बात है?”

     

    वृद्ध ने कहा,

     

    “शायद।”

     

    सुदामा ने पेटी खोलने के लिए हाथ बढ़ाया।

     

    लेकिन तभी…

     

    बाहर मंदिर की घंटी जैसी आवाज सुनाई दी।

     

    सुदामा ठिठक गए।

     

    वृद्ध भी अचानक गंभीर हो गया।

     

    “ये आवाज…”

     

    सुदामा ने पूछा,

     

    “क्या हुआ?”

     

    वृद्ध ने धीमे स्वर में कहा,

     

    “ये घंटी कई सालों से नहीं बजी।”

     

    दोनों बाहर की तरफ देखने लगे।

     

    और तभी सुदामा को लगा…

     

    जैसे किसी ने बहुत दूर से उनका नाम पुकारा हो।

     

    “सुदामा…”

     

    वह आवाज बिल्कुल कृष्ण जैसी थी।

     

    सुदामा की आँखें फैल गईं।

     

    “कृष्ण?”

     

    कमरे में सन्नाटा छा गया।

     

    लेकिन अब सुदामा के सामने सिर्फ एक सवाल था—

     

    अगर कृष्ण यहाँ नहीं थे, तो फिर उनकी आवाज किसने पुकारी थी?

     

    क्रमशः…

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    Auther preeti Sharma

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  • वो वादा जो सुदामा भूल गया

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    श्री कृष्ण और सुदामा — अटूट मित्रता की कहानी

     

    अध्याय 12 — वो वादा जो सुदामा भूल गए थे

     

    “अब समय आ गया है, सुदामा।”

     

    द्वारका में कृष्ण खिड़की के पास खड़े थे।

     

    उधर सुदामा अपने घर में उसी छोटी-सी पोटली को सीने से लगाए बैठे थे।

     

    रात काफी हो चुकी थी, लेकिन उनकी आँखों में नींद नहीं थी।

     

    बार-बार उनके मन में कृष्ण की बातें घूम रही थीं।

     

    “एक दिन ऐसा आएगा जब हमारी जिंदगी बहुत बदल जाएगी…”

     

    सुदामा ने आँखें बंद कर लीं।

     

    “लेकिन उसके बाद कृष्ण ने क्या कहा था?”

     

    वह जितना याद करने की कोशिश करते, उतना ही सब धुंधला होता जाता।

     

    उन्होंने करवट बदली।

     

    फिर उठकर बैठ गए।

     

    सामने वही पुरानी चीज रखी थी, जो कृष्ण ने भेजी थी।

     

    सुदामा ने उसे हाथ में लिया।

     

    “तुम्हारे अंदर ऐसा क्या छिपा है, जो मुझे इतने सालों बाद भी परेशान कर रहा है?”

     

    उन्हें खुद पर थोड़ी हँसी भी आई।

     

    “मैं भी ना… कृष्ण से मिलकर आया और अब उसके भेजे हुए सामान का रहस्य सुलझाने बैठ गया।”

     

    लेकिन अगले ही पल उनकी आँखें नम हो गईं।

     

    “कृष्ण ने इसे इतने साल संभालकर रखा…”

     

    उन्होंने उस चीज को हथेली में बंद कर लिया।

     

    “क्या उसे सच में मेरी इतनी याद आती रही होगी?”

     

    तभी पीछे से उनकी पत्नी की आवाज आई,

     

    “आप अभी तक सोए नहीं?”

     

    सुदामा ने पलटकर देखा।

     

    “नींद नहीं आ रही।”

     

    “क्यों?”

     

    “कृष्ण की वजह से।”

     

    पत्नी उनके पास आकर बैठ गईं।

     

    “क्या हुआ?”

     

    सुदामा ने पोटली उनकी तरफ बढ़ा दी।

     

    “ये देखो।”

     

    पत्नी ने उसे ध्यान से देखा।

     

    “इसमें ऐसा क्या है?”

     

    “यही तो समझ नहीं आ रहा।”

     

    सुदामा कुछ देर चुप रहे।

     

    फिर बोले,

     

    “मुझे लगता है कृष्ण मुझे किसी पुरानी बात की याद दिलाना चाहता है।”

     

    “कौन-सी बात?”

     

    “एक वादा।”

     

    पत्नी ने पूछा,

     

    “आपने कृष्ण से कोई वादा किया था?”

     

    सुदामा ने धीरे से सिर हिलाया।

     

    “शायद।”

     

    “शायद?”

     

    “मुझे याद नहीं।”

     

    उनकी आवाज में परेशानी साफ थी।

     

    “यही बात मुझे अंदर से परेशान कर रही है। मैं कृष्ण के साथ बिताया एक-एक दिन याद कर सकता हूँ। हमें कब डाँट पड़ी, कब हम साथ हँसे, कब हमने चोरी से खाना खाया… सब याद है।”

     

    वह रुके।

     

    “लेकिन उस दिन की आखिरी बात याद नहीं।”

     

    पत्नी ने धीरे से कहा,

     

    “शायद सुबह तक याद आ जाए।”

     

    सुदामा मुस्कुराए।

     

    “काश।”

     

    अगली सुबह सूरज निकलते ही सुदामा उठ गए।

     

    उन्होंने सबसे पहले वह पोटली उठाई।

     

    वह उसे लेकर घर के बाहर उसी पुराने पेड़ के नीचे जाकर बैठ गए, जो उनके पुराने घर के आँगन में भी था।

     

    उन्होंने आँखें बंद कीं।

     

    “चलो सुदामा… याद करो।”

     

    उन्होंने खुद से कहा।

     

    “गुरुकुल का आखिरी दिन।”

     

    धीरे-धीरे उन्हें सब दिखाई देने लगा।

     

    कृष्ण सामने खड़े थे।

     

    उनके चेहरे पर मुस्कान थी, लेकिन आँखों में उदासी।

     

    सुदामा ने उस याद को पकड़ने की कोशिश की।

     

    कृष्ण कुछ कह रहे थे।

     

    “सुदामा…”

     

    सुदामा ने मन ही मन जवाब दिया,

     

    “हाँ कृष्ण?”

     

    फिर आवाज धुंधली हो गई।

     

    सुदामा ने माथे पर हाथ रख लिया।

     

    “नहीं… आगे क्या कहा था?”

     

    उन्होंने फिर कोशिश की।

     

    इस बार उन्हें कृष्ण की आवाज थोड़ी साफ सुनाई दी।

     

    “अगर कभी तुम्हें लगे कि तुम बिल्कुल अकेले हो…”

     

    सुदामा की आँखें खुल गईं।

     

    “हाँ!”

     

    उन्हें कुछ याद आया था।

     

    वह उत्साह में खड़े हो गए।

     

    “कृष्ण ने यही कहा था!”

     

    लेकिन आगे?

     

    वह फिर बैठ गए।

     

    “उसके बाद क्या कहा था?”

     

    उन्होंने आँखें बंद कीं।

     

    अचानक एक और याद सामने आई।

     

    कृष्ण उनका हाथ पकड़े हुए थे।

     

    “तुम चाहे जहाँ चले जाना…”

     

    सुदामा की आँखों में आँसू आ गए।

     

    “मैं तुम्हें…”

     

    आवाज फिर गायब हो गई।

     

    “क्या?”

     

    सुदामा बेचैन हो गए।

     

    “कृष्ण ने क्या कहा था?”

     

    उसी समय उनकी पत्नी बाहर आईं।

     

    “क्या हुआ?”

     

    सुदामा ने उनकी तरफ देखा।

     

    “मुझे थोड़ा याद आया है।”

     

    “क्या?”

     

    “कृष्ण ने कहा था कि अगर मुझे कभी लगे कि मैं अकेला हूँ, तो…”

     

    वह रुक गए।

     

    पत्नी ने पूछा,

     

    “तो?”

     

    सुदामा ने सिर हिलाया।

     

    “याद नहीं आ रहा।”

     

    उनकी आवाज टूट गई।

     

    “इतने सालों से मेरे मन में ये बात थी और मुझे पता ही नहीं था।”

     

    पत्नी ने कहा,

     

    “आपने उस दिन कृष्ण से क्या कहा था, वो याद है?”

     

    सुदामा ने सोचते हुए कहा,

     

    “मैंने उससे पूछा था… अगर हमारी जिंदगी बदल गई तो क्या हमारी दोस्ती भी बदल जाएगी?”

     

    “और कृष्ण ने?”

     

    सुदामा की आँखों में मुस्कान आ गई।

     

    “उसने कहा था—नहीं।”

     

    कुछ पल दोनों चुप रहे।

     

    फिर सुदामा ने कहा,

     

    “लेकिन शायद उसके बाद मैंने उससे कुछ और कहा था।”

     

    “क्या?”

     

    “शायद…”

     

    सुदामा की आँखें अचानक भर आईं।

     

    “मैंने कहा था कि अगर कभी मेरे बच्चे भूखे हों और मेरे पास उन्हें देने के लिए कुछ न हो…”

     

    उनकी आवाज काँपने लगी।

     

    “तो मैं कृष्ण को याद करूँगा।”

     

    पत्नी ने उनकी तरफ देखा।

     

    सुदामा ने सिर झुका लिया।

     

    “लेकिन मैंने कभी कृष्ण से मदद माँगने का सोचा ही नहीं था।”

     

    उन्होंने लंबी साँस ली।

     

    “मुझे लगता था कि दोस्ती में हिसाब नहीं होना चाहिए।”

     

    पत्नी ने कहा,

     

    “और कृष्ण ने भी तो कोई हिसाब नहीं रखा।”

     

    सुदामा की आँखों से आँसू निकल आए।

     

    “हाँ…”

     

    उसी समय दूर से किसी के कदमों की आवाज सुनाई दी।

     

    सुदामा ने पलटकर देखा।

     

    वही व्यक्ति था जो द्वारका से संदेश लेकर आया था।

     

    सुदामा खड़े हो गए।

     

    “तुम?”

     

    वह व्यक्ति उनके सामने आकर रुका।

     

    “मुझे आपसे एक बात कहनी है।”

     

    सुदामा ने पूछा,

     

    “कृष्ण का कोई और संदेश है?”

     

    उसने सिर हिलाया।

     

    “हाँ।”

     

    सुदामा का दिल तेज धड़कने लगा।

     

    “क्या कहा है उसने?”

     

    उस व्यक्ति ने कहा,

     

    “कृष्ण ने कहा है कि आपको उस पुराने वादे को याद करने के लिए अपने मन पर जोर डालने की जरूरत नहीं है।”

     

    सुदामा हैरान रह गए।

     

    “फिर?”

     

    “उन्होंने कहा है कि आपको बस गुरुकुल की उस आखिरी शाम को याद करना है।”

     

    सुदामा की आँखें फैल गईं।

     

    “आखिरी शाम?”

     

    “हाँ।”

     

    “उस शाम ऐसा क्या हुआ था?”

     

    दूत ने कहा,

     

    “ये मुझे नहीं बताया गया।”

     

    सुदामा ने बेचैनी से पूछा,

     

    “तुम्हें कुछ और पता है?”

     

    दूत ने थोड़ी देर चुप रहकर कहा,

     

    “बस इतना कहा गया है कि जो बात आपको याद करनी है, वह उसी जगह से जुड़ी है।”

     

    सुदामा ने तुरंत कहा,

     

    “कौन-सी जगह?”

     

    दूत ने जवाब दिया,

     

    “गुरुकुल।”

     

    सुदामा चुप हो गए।

     

    उनकी आँखों के सामने गुरुजी का आश्रम आ गया।

     

    वही पेड़।

     

    वही आँगन।

     

    वही रास्ता।

     

    और वही आखिरी शाम…

     

    सुदामा ने धीरे से कहा,

     

    “मुझे वहाँ जाना होगा।”

     

    पत्नी ने हैरानी से पूछा,

     

    “अभी?”

     

    सुदामा ने सिर हिलाया।

     

    “हाँ।”

     

    “लेकिन क्यों?”

     

    सुदामा ने पोटली को हाथ में कसकर पकड़ लिया।

     

    “क्योंकि मेरा दोस्त मुझे कोई चीज वापस देकर नहीं गया है।”

     

    “तो?”

     

    सुदामा की आँखों में एक अजीब-सा भरोसा था।

     

    “वह मुझे मेरी ही भूली हुई याद वापस दिलाना चाहता है।”

     

    दूत मुस्कुराया।

     

    “शायद यही कृष्ण चाहते थे।”

     

    सुदामा ने पूछा,

     

    “क्या कृष्ण ने कहा है कि मैं अकेला जाऊँ?”

     

    दूत कुछ पल चुप रहा।

     

    फिर बोला,

     

    “नहीं।”

     

    “तो?”

     

    “उन्होंने कहा है कि इस बार सुदामा अकेला नहीं जाएगा।”

     

    सुदामा ने हैरानी से उसकी तरफ देखा।

     

    “मतलब?”

     

    दूत ने कुछ नहीं कहा।

     

    बस इतना बोला,

     

    “आप गुरुकुल पहुँचेंगे तो समझ जाएँगे।”

     

    यह कहकर वह वहाँ से चला गया।

     

    सुदामा काफी देर तक उसे जाते हुए देखते रहे।

     

    फिर उन्होंने अपनी पत्नी की तरफ देखा।

     

    “लगता है कृष्ण ने इस बार भी कुछ छिपाकर रखा है।”

     

    पत्नी मुस्कुराईं।

     

    “तो पता कर आइए।”

     

    सुदामा ने पोटली संभालकर रखी।

     

    उनके चेहरे पर पहली बार डर नहीं था।

     

    बल्कि एक अजीब-सी खुशी थी।

     

    वह उस जगह वापस जाने वाले थे जहाँ से उनकी और कृष्ण की दोस्ती शुरू हुई थी।

     

    शायद वहीं उन्हें उस पुराने वादे का जवाब मिलने वाला था।

     

    लेकिन सुदामा नहीं जानते थे कि गुरुकुल में उनका इंतजार सिर्फ एक पुरानी याद नहीं कर रही थी।

     

    वहाँ…

     

    कृष्ण ने उनके लिए कुछ ऐसा छोड़ रखा था, जिसे देखकर सुदामा को अपनी आँखों पर विश्वास नहीं होने वाला था।

     

    क्रमशः…

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  • पोटली में छिपा था राज

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    अध्याय 11 — पोटली में छिपा था पुराना राज

    सुदामा के हाथ में वह छोटी-सी पोटली थी।

     

    उन्होंने उसे धीरे से खोला था।

     

    अंदर एक पुरानी-सी चीज रखी थी।

     

    उसे देखते ही सुदामा कुछ पल के लिए बिल्कुल शांत हो गए।

     

    उनकी आँखों के सामने गुरुकुल के दिन घूमने लगे।

     

    वही मिट्टी का आँगन।

     

    वही पेड़।

     

    वही गुरुजी की आवाज।

     

    और उनके साथ बैठा कृष्ण।

     

    सुदामा ने उस चीज को हाथ में लेकर ध्यान से देखा।

     

    “ये तो…”

     

    उनकी आवाज वहीं रुक गई।

     

    उनकी पत्नी पास आकर बैठ गईं।

     

    “क्या है इसमें?”

     

    सुदामा ने जवाब नहीं दिया।

     

    वह बस उस चीज को देखते रहे।

     

    कुछ देर बाद उन्होंने कहा,

     

    “ये कृष्ण के पास थी।”

     

    पत्नी ने हैरानी से पूछा,

     

    “आपको पूरा यकीन है?”

     

    “हाँ।”

     

    सुदामा ने धीरे से कहा,

     

    “गुरुकुल में हम दोनों के पास ऐसी ही चीज थी।”

     

    “फिर ये कृष्ण ने आपको क्यों भेजी?”

     

    सुदामा के पास इसका जवाब नहीं था।

     

    उन्होंने पोटली में रखा छोटा-सा कागज उठाया।

     

    कागज बहुत साधारण था।

     

    उस पर बस कुछ पंक्तियाँ लिखी थीं।

     

    सुदामा ने पढ़ना शुरू किया।

     

    “मित्र, जो चीज तुम्हारे पास कभी थी, उसे मैंने इतने वर्षों से संभालकर रखा था। अब समय आ गया है कि वह तुम्हारे पास वापस आ जाए। लेकिन इसके साथ जुड़ी एक बात ऐसी है, जो मैंने आज तक किसी को नहीं बताई।”

     

    सुदामा आगे पढ़ ही नहीं पाए।

     

    उनके हाथ काँपने लगे।

     

    पत्नी ने पूछा,

     

    “क्या हुआ?”

     

    सुदामा ने कागज उन्हें दे दिया।

     

    उन्होंने भी पढ़ा।

     

    दोनों एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे।

     

    पत्नी ने पूछा,

     

    “आखिर ऐसी कौन-सी बात है जो कृष्ण ने इतने साल छिपाकर रखी?”

     

    सुदामा ने धीरे से कहा,

     

    “मुझे नहीं पता।”

     

    फिर उन्होंने कागज पलटा।

     

    पीछे कुछ और लिखा था।

     

    “जब तुम गुरुकुल से गए थे, उस दिन तुमने मुझसे एक बात कही थी। शायद तुम्हें वह याद भी न हो। लेकिन मैंने उसे कभी नहीं भुलाया।”

     

    सुदामा अचानक उठकर खड़े हो गए।

     

    “मैंने क्या कहा था?”

     

    उन्होंने आँखें बंद कर लीं।

     

    वह पुराने दिनों को याद करने लगे।

     

    गुरुकुल से विदाई का दिन…

     

    कृष्ण और सुदामा रास्ते के उस मोड़ पर खड़े थे जहाँ से दोनों के रास्ते अलग होने वाले थे।

     

    सुदामा ने तब कृष्ण से क्या कहा था?

     

    बहुत सोचने के बाद उन्हें कुछ याद आया।

     

    उन्होंने धीरे से कहा,

     

    “मैंने कहा था…”

     

    वह रुक गए।

     

    पत्नी ने पूछा,

     

    “क्या?”

     

    सुदामा की आँखों में आँसू आ गए।

     

    “मैंने कृष्ण से कहा था कि अगर कभी मेरी जिंदगी में ऐसा समय आए जब मैं अपने परिवार के लिए कुछ न कर पाऊँ… तो मैं चाहता हूँ कि मेरे बच्चे कम से कम इतना जरूर जानें कि उनके पिता ने कभी हार नहीं मानी।”

     

    पत्नी चुप रह गईं।

     

    सुदामा ने सिर झुका लिया।

     

    “लेकिन मुझे नहीं लगता कि कृष्ण को वह बात याद होगी।”

     

    तभी पीछे से उनके बेटे की आवाज आई,

     

    “पिताजी, कृष्ण कौन हैं?”

     

    सुदामा ने पलटकर बेटे को देखा।

     

    उन्होंने उसे अपने पास बुलाया।

     

    “कृष्ण मेरे बहुत पुराने दोस्त हैं।”

     

    बेटे ने पूछा,

     

    “क्या वो वही हैं जिन्होंने हमारा घर दिया?”

     

    सुदामा मुस्कुराए।

     

    “हाँ।”

     

    “तो क्या वो बहुत अच्छे हैं?”

     

    सुदामा ने बिना सोचे कहा,

     

    “बहुत अच्छे।”

     

    बेटे ने फिर पूछा,

     

    “क्या मैं उनसे मिल सकता हूँ?”

     

    सुदामा कुछ पल चुप रहे।

     

    फिर बोले,

     

    “जरूर। कभी मौका मिला तो तुम्हें उनसे जरूर मिलवाऊँगा।”

     

    उसी समय बाहर से आवाज आई।

     

    “सुदामा जी!”

     

    सुदामा बाहर आए।

     

    वही आदमी खड़ा था जो पोटली लेकर आया था।

     

    सुदामा ने पूछा,

     

    “तुम कौन हो?”

     

    उसने कहा,

     

    “मैं द्वारका से आया हूँ।”

     

    “लेकिन कृष्ण ने तुम्हें यहाँ क्यों भेजा?”

     

    आदमी ने कहा,

     

    “मुझे सिर्फ संदेश देने के लिए भेजा गया है।”

     

    “कौन-सा संदेश?”

     

    उसने कहा,

     

    “कृष्ण ने कहा है कि अगर सुदामा पोटली खोल लें, तो उन्हें कहना कि वह उसमें रखी चीज को ध्यान से देखें।”

     

    सुदामा ने वह चीज फिर हाथ में ली।

     

    “इसमें ऐसा क्या है?”

     

    आदमी ने कहा,

     

    “मुझे नहीं पता।”

     

    “तुम्हें कुछ भी नहीं बताया गया?”

     

    “नहीं।”

     

    सुदामा ने ध्यान से उस वस्तु को देखा।

     

    वह बहुत पुरानी थी।

     

    किनारे थोड़े घिस चुके थे।

     

    लेकिन उस पर एक निशान बना हुआ था।

     

    सुदामा ने निशान देखते ही उसे पहचान लिया।

     

    “ये निशान…”

     

    उनके चेहरे का रंग बदल गया।

     

    आदमी ने पूछा,

     

    “क्या हुआ?”

     

    सुदामा ने तुरंत अंदर जाकर अपनी पुरानी संदूकची खोली।

     

    उसमें उनके पास कुछ पुराने कपड़े और गुरुकुल की याद से जुड़ी छोटी-मोटी चीजें थीं।

     

    उन्होंने उसमें से एक कपड़े में लिपटी चीज निकाली।

     

    दोनों चीजों को पास रखकर देखा।

     

    निशान बिल्कुल एक जैसा था।

     

    सुदामा की साँस जैसे रुक गई।

     

    “ये दोनों एक ही चीज का हिस्सा हैं।”

     

    पत्नी ने पूछा,

     

    “तो कृष्ण ने आपको इसका दूसरा हिस्सा भेजा है?”

     

    सुदामा ने सिर हिलाया।

     

    “हाँ।”

     

    अब रहस्य और गहरा हो चुका था।

     

    कृष्ण ने वह चीज इतने साल संभालकर क्यों रखी?

     

    और उसके दूसरे हिस्से को सुदामा के पास क्यों भेजा?

     

    सुदामा ने तुरंत कागज उठाया और दोबारा पढ़ा।

     

    इस बार नीचे एक और छोटी पंक्ति दिखाई दी, जो पहले उनकी नजर से छूट गई थी।

     

    उन्होंने पढ़ा—

     

    “जब समय सही होगा, तुम्हें समझ आएगा कि हमारी दोस्ती सिर्फ गुरुकुल की याद नहीं थी। उस दिन हमने एक वादा किया था… और वह वादा अभी पूरा होना बाकी है।”

     

    सुदामा कुछ देर तक उस कागज को देखते रहे।

     

    फिर उन्होंने धीरे से कहा,

     

    “कृष्ण ने इतने साल बाद ये बात क्यों याद दिलाई?”

     

    पत्नी ने पूछा,

     

    “क्या आपको वह वादा याद है?”

     

    सुदामा ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं।”

     

    “तो फिर?”

     

    सुदामा ने खिड़की से बाहर देखा।

     

    “शायद कृष्ण चाहता है कि मैं खुद याद करूँ।”

     

    उसी रात सुदामा सो नहीं पाए।

     

    वह बार-बार उस पुरानी चीज को देखते रहे।

     

    उन्हें गुरुकुल का हर छोटा-बड़ा पल याद आने लगा।

     

    लेकिन वह वादा…

     

    उन्हें कुछ भी याद नहीं आ रहा था।

     

    आखिर आधी रात को उन्हें एक धुंधली-सी बात याद आई।

     

    गुरुकुल के आखिरी दिन कृष्ण ने उनसे कहा था—

     

    “सुदामा, एक दिन ऐसा आएगा जब हमारी जिंदगी बहुत बदल जाएगी।”

     

    सुदामा ने तब हँसकर कहा था,

     

    “तो क्या तुम मुझे भूल जाओगे?”

     

    कृष्ण ने जवाब दिया था,

     

    “अगर मैं तुम्हें भूल गया, तो मैं कृष्ण कैसे रहूँगा?”

     

    सुदामा की आँखें भर आईं।

     

    लेकिन उसके बाद क्या हुआ था?

     

    उन्हें याद नहीं था।

     

    अचानक उन्हें लगा कि शायद उस दिन की कोई बात उनके मन से जानबूझकर छूट गई है।

     

    और अब कृष्ण ने वही पुराना राज फिर से उनके सामने रख दिया था।

     

    सुदामा ने पोटली को अपने सीने से लगा लिया।

     

    “कृष्ण… आखिर तुमने उस दिन मुझसे ऐसा क्या वादा किया था?”

     

    दूर द्वारका में कृष्ण खिड़की के पास खड़े थे।

     

    उनके चेहरे पर हल्की मुस्कान थी।

     

    उन्होंने धीरे से कहा,

     

    “अब समय आ गया है, सुदामा।”

     

    “अब तुम्हें खुद याद करना होगा…”

     

    क्रमशः…

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    Auther preeti Sharma

    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

  • सुदामा ने जो देखा यकीन नहीं हुआ

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     

    अध्याय 10 — सुदामा ने जो देखा, उसे यकीन नहीं हुआ

     

    सुदामा धीरे-धीरे अपने गाँव की तरफ बढ़ रहे थे।

     

    उनके मन में कृष्ण की बातें घूम रही थीं।

     

    बार-बार उन्हें वही पल याद आ रहा था जब कृष्ण ने उन्हें गले लगाया था।

     

    सुदामा के मन में एक अजीब-सी शांति थी।

     

    उन्होंने कृष्ण से कुछ नहीं माँगा था।

     

    न पैसे की बात की थी, न घर की परेशानी बताई थी।

     

    फिर भी कृष्ण ने उन्हें ऐसे अपनाया था जैसे इतने साल कभी बीते ही न हों।

     

    सुदामा रास्ते में मुस्कुराते हुए सोच रहे थे,

     

    “सच में… मेरा कृष्ण बिल्कुल नहीं बदला।”

     

    लेकिन जैसे-जैसे वह अपने गाँव के करीब पहुँचे, उन्हें कुछ अजीब-सा दिखाई देने लगा।

     

    दूर से उन्हें एक बड़ा-सा घर दिखाई दे रहा था।

     

    सुदामा रुक गए।

     

    उन्होंने आँखें छोटी करके उस घर को देखा।

     

    “ये यहाँ कब बन गया?”

     

    उन्हें समझ नहीं आया।

     

    जहाँ उनका छोटा-सा टूटा घर हुआ करता था, वहाँ अब एक सुंदर और बड़ा भवन खड़ा था।

     

    आस-पास के रास्ते भी साफ थे।

     

    कुछ लोग उस घर के बाहर खड़े थे।

     

    सुदामा ने सोचा,

     

    “शायद मैं गलत रास्ते पर आ गया हूँ।”

     

    वह कुछ कदम पीछे हटे और फिर गाँव की तरफ देखा।

     

    पेड़ वही थे।

     

    कुएँ की जगह वही थी।

     

    वही पुराना रास्ता भी था।

     

    सुदामा का दिल तेजी से धड़कने लगा।

     

    “नहीं… मैं सही जगह आया हूँ।”

     

    वह धीरे-धीरे उस भवन की तरफ बढ़े।

     

    जितना पास जाते, उतना ही उनका हैरान होना बढ़ता जाता।

     

    मुख्य दरवाजे पर सुंदर नक्काशी थी।

     

    आँगन बड़ा था।

     

    लेकिन सुदामा की नजर उस जगह पर अटक गई जहाँ कभी उनका छोटा-सा घर हुआ करता था।

     

    वही जगह।

     

    वही मिट्टी का आँगन।

     

    वही पुराना पेड़।

     

    लेकिन घर…

     

    घर बिल्कुल बदल चुका था।

     

    सुदामा के मुँह से बस इतना निकला,

     

    “ये कैसे हो सकता है?”

     

    तभी अंदर से किसी की आवाज आई।

     

    “आप कौन हैं?”

     

    सुदामा ने पलटकर देखा।

     

    एक आदमी दरवाजे के पास खड़ा था।

     

    सुदामा ने पूछा,

     

    “भाई, यहाँ पहले एक छोटा-सा घर था। बहुत गरीब परिवार रहता था। उसकी पत्नी और बच्चे…”

     

    वह आदमी मुस्कुराया।

     

    “आप किसे ढूँढ रहे हैं?”

     

    सुदामा ने अपना नाम बताने में भी संकोच किया।

     

    “मैं… सुदामा को ढूँढ रहा हूँ।”

     

    आदमी ने कुछ पल उन्हें देखा।

     

    फिर मुस्कुराकर बोला,

     

    “तो फिर आपको कहीं जाने की जरूरत नहीं है।”

     

    सुदामा चौंक गए।

     

    “क्यों?”

     

    उस आदमी ने हाथ जोड़कर कहा,

     

    “क्योंकि आप ही सुदामा हैं।”

     

    सुदामा की आँखें फैल गईं।

     

    “तुम्हें मेरा नाम कैसे पता?”

     

    उस आदमी ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    बस दरवाजे की तरफ इशारा कर दिया।

     

    “अंदर जाइए।”

     

    सुदामा का दिल अब और तेज धड़क रहा था।

     

    वह धीरे-धीरे अंदर गए।

     

    आँगन में कदम रखते ही उन्हें सामने एक स्त्री दिखाई दी।

     

    वह उनकी पत्नी थीं।

     

    लेकिन सुदामा उन्हें देखकर कुछ पल के लिए पहचान ही नहीं पाए।

     

    उनकी पत्नी ने उन्हें देखते ही दौड़कर उनके पास आकर कहा,

     

    “आप आ गए!”

     

    सुदामा बस उन्हें देखते रह गए।

     

    “ये… ये सब क्या है?”

     

    उनकी पत्नी की आँखों में आँसू आ गए।

     

    “मुझे भी नहीं पता।”

     

    “लेकिन हमारा घर…”

     

    “घर तो सुबह तक वही था।”

     

    सुदामा ने हैरानी से पूछा,

     

    “फिर ये सब कैसे हुआ?”

     

    उनकी पत्नी ने सिर हिलाया।

     

    “मुझे नहीं पता।”

     

    वह कुछ देर चुप रहीं।

     

    फिर बोलीं,

     

    “आज सुबह जब मैं बच्चों के साथ बाहर आई तो हमारा पुराना घर वहाँ था ही नहीं।”

     

    “फिर?”

     

    “फिर अचानक लोगों ने आकर कहा कि यह घर अब हमारा है।”

     

    सुदामा की समझ में कुछ नहीं आ रहा था।

     

    उन्होंने पूछा,

     

    “किसने दिया?”

     

    उनकी पत्नी ने धीरे से कहा,

     

    “किसी ने अपना नाम नहीं बताया।”

     

    सुदामा की नजरें नीचे हो गईं।

     

    उन्हें कृष्ण याद आ गए।

     

    वही मुस्कान।

     

    वही बातें।

     

    वही सवाल—

     

    “तुम मेरे पास सिर्फ मिलने आए हो या दिल में कुछ और भी है?”

     

    सुदामा की आँखें भर आईं।

     

    उन्होंने धीरे से कहा,

     

    “कृष्ण…”

     

    पत्नी ने पूछा,

     

    “क्या कहा आपने?”

     

    सुदामा ने उनकी तरफ देखा।

     

    “कुछ नहीं।”

     

    लेकिन उनके मन में सब साफ हो चुका था।

     

    कृष्ण ने बिना उनसे कुछ पूछे सब समझ लिया था।

     

    सुदामा अंदर गए।

     

    जहाँ पहले मिट्टी का फर्श था, वहाँ अब साफ-सुथरा आँगन था।

     

    जहाँ बारिश में पानी टपकता था, वहाँ अब मजबूत छत थी।

     

    बच्चों के लिए नए कपड़े रखे थे।

     

    घर में अनाज भरा था।

     

    लेकिन सुदामा की नजर इन चीजों पर नहीं थी।

     

    वह एक कोने में जाकर चुपचाप बैठ गए।

     

    उनकी पत्नी उनके पास आईं।

     

    “आप खुश नहीं हैं?”

     

    सुदामा ने उनकी तरफ देखा।

     

    “बहुत खुश हूँ।”

     

    “फिर रो क्यों रहे हैं?”

     

    सुदामा ने आँसू पोंछते हुए कहा,

     

    “क्योंकि मैंने आज समझा कि सच्चा दोस्त वही होता है जो तुम्हारे मुँह से बात निकलने का इंतजार नहीं करता।”

     

    पत्नी कुछ समझ नहीं पाईं।

     

    सुदामा मुस्कुराए।

     

    “कृष्ण ने सब कर दिया।”

     

    उनकी पत्नी की आँखें भी नम हो गईं।

     

    “आपने उनसे कुछ माँगा था?”

     

    सुदामा ने तुरंत सिर हिला दिया।

     

    “नहीं।”

     

    “फिर?”

     

    “बस… चिवड़ा दिया था।”

     

    पत्नी हँसते-हँसते रोने लगीं।

     

    “इतना-सा चिवड़ा?”

     

    सुदामा ने कहा,

     

    “हाँ।”

     

    फिर कुछ देर दोनों चुप रहे।

     

    सुदामा ने अपनी पत्नी से कहा,

     

    “तुमने मुझे कृष्ण के पास भेजा था।”

     

    “हाँ।”

     

    “अगर तुम मुझे नहीं भेजतीं तो?”

     

    पत्नी ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “तो शायद आज भी हम उसी पुराने घर में बैठे होते।”

     

    सुदामा ने आसमान की तरफ देखा।

     

    उनके चेहरे पर संतोष था।

     

    लेकिन तभी उनके छोटे बेटे ने दौड़कर आकर कहा,

     

    “पिताजी!”

     

    सुदामा ने उसे अपनी गोद में उठा लिया।

     

    “क्या हुआ?”

     

    बेटे ने उत्साह से कहा,

     

    “पिताजी, आज घर में बहुत सारे लोग आए थे।”

     

    सुदामा ने पूछा,

     

    “कौन लोग?”

     

    बेटे ने सिर हिलाया।

     

    “पता नहीं। लेकिन जाते समय एक आदमी मुझे एक बात कहकर गया।”

     

    सुदामा अचानक गंभीर हो गए।

     

    “क्या बात?”

     

    बेटे ने कहा,

     

    “उसने कहा था कि पिताजी जब वापस आएँ तो उनसे कहना…”

     

    वह रुक गया।

     

    सुदामा ने पूछा,

     

    “क्या कहना?”

     

    बेटे ने मासूमियत से कहा,

     

    “कृष्ण अपने दोस्त को कभी अकेला नहीं छोड़ते।”

     

    सुदामा की आँखों से आँसू निकल पड़े।

     

    उन्होंने बेटे को सीने से लगा लिया।

     

    अब उन्हें किसी सबूत की जरूरत नहीं थी।

     

    वह समझ चुके थे कि यह सब कृष्ण का ही किया हुआ था।

     

    लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई थी।

     

    उसी शाम जब सुदामा अपने नए घर के बाहर बैठे थे, एक अनजान व्यक्ति वहाँ आया।

     

    उसने सुदामा के सामने एक छोटी-सी पोटली रखी।

     

    सुदामा ने पूछा,

     

    “ये क्या है?”

     

    उस व्यक्ति ने कहा,

     

    “द्वारका से आपके लिए संदेश आया है।”

     

    सुदामा का दिल धक से रह गया।

     

    “द्वारका से?”

     

    उस व्यक्ति ने सिर हिलाया।

     

    “हाँ।”

     

    सुदामा ने पोटली खोली।

     

    उसमें एक छोटी-सी चीज थी।

     

    उसे देखते ही सुदामा की आँखें भर आईं।

     

    वह वही चीज थी…

     

    जो गुरुकुल के दिनों में कृष्ण और सुदामा दोनों के पास हुआ करती थी।

     

    सुदामा उसे हाथ में लेकर बस एक ही बात कह पाए—

     

    “कृष्ण… तुमने मुझे याद भी रखा।”

     

    लेकिन उस छोटी-सी चीज के साथ एक संदेश भी था।

     

    और उस संदेश में जो लिखा था…

     

    उसे पढ़कर सुदामा के चेहरे की मुस्कान अचानक गायब हो गई।

     

    क्रमशः…

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    Auther preeti Sharma

    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

  • कृष्ण ने बिना कहे समझ लिया

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    अध्याय 9 — कृष्ण ने बिना कहे समझ लिया

     

    सुदामा कृष्ण के सामने चुपचाप खड़े थे।

     

    कृष्ण उनकी तरफ देख रहे थे। उनके चेहरे पर वही पुरानी मुस्कान थी, जो सुदामा ने गुरुकुल के दिनों में न जाने कितनी बार देखी थी।

     

    लेकिन आज सुदामा के चेहरे पर खुशी के साथ झिझक भी थी।

     

    कृष्ण ने धीरे से कहा,

     

    “सुदामा… इतने साल बाद मेरे पास आए हो और फिर भी मुझसे कुछ छिपा रहे हो?”

     

    सुदामा ने नजरें नीचे कर लीं।

     

    “नहीं कृष्ण, ऐसी कोई बात नहीं है।”

     

    कृष्ण हल्के से मुस्कुराए।

     

    “तुम्हें मैं आज का कृष्ण लग रहा हूँ क्या?”

     

    सुदामा ने उनकी तरफ देखा।

     

    कृष्ण ने कहा,

     

    “मैं वही हूँ जो गुरुकुल में तुम्हारे साथ बैठकर खाना खाता था। वही जो तुम्हारे हिस्से की रोटी भी चुपके से खा जाता था।”

     

    सुदामा हँस पड़े।

     

    “और फिर जब गुरुजी पूछते थे कि खाना किसने खाया, तो तुम बड़ी मासूम शक्ल बना लेते थे।”

     

    कृष्ण भी हँस पड़े।

     

    “अरे, तुम भी तो मेरा नाम नहीं लेते थे।”

     

    कुछ पल के लिए दोनों पुराने दिनों में खो गए।

     

    लेकिन फिर सुदामा की मुस्कान गायब हो गई।

     

    कृष्ण ने यह देख लिया।

     

    उन्होंने पास जाकर सुदामा का हाथ पकड़ लिया।

     

    “सुदामा, मुझे सच बताओ। घर पर सब ठीक है?”

     

    सुदामा कुछ नहीं बोले।

     

    कृष्ण ने फिर पूछा,

     

    “भाभी कैसी हैं?”

     

    सुदामा ने धीरे से कहा,

     

    “ठीक हैं।”

     

    “बच्चे?”

     

    “ठीक हैं।”

     

    कृष्ण ने उनकी आँखों में देखा।

     

    “और तुम?”

     

    यह सवाल सुनते ही सुदामा चुप हो गए।

     

    काफी देर तक उनके मुँह से एक शब्द भी नहीं निकला।

     

    कृष्ण ने कुछ नहीं कहा।

     

    उन्होंने बस सुदामा के कंधे पर हाथ रख दिया।

     

    सुदामा की आँखें भर आईं।

     

    “कृष्ण…”

     

    “हाँ, बोलो।”

     

    “मैं तुमसे कुछ माँगने नहीं आया था।”

     

    कृष्ण मुस्कुराए।

     

    “मुझे पता है।”

     

    “मैं बस तुमसे मिलने आया था।”

     

    “ये भी मुझे पता है।”

     

    सुदामा ने हैरानी से पूछा,

     

    “फिर तुम बार-बार पूछ क्यों रहे हो?”

     

    कृष्ण ने हँसते हुए कहा,

     

    “क्योंकि दोस्ती में कुछ बातें पूछनी नहीं पड़तीं, बस महसूस करनी पड़ती हैं।”

     

    सुदामा ने सिर झुका लिया।

     

    कृष्ण ने धीरे से कहा,

     

    “तुम्हारे कपड़े बहुत कुछ बता रहे हैं सुदामा। तुम्हारा चेहरा भी। तुम्हारी आवाज भी।”

     

    सुदामा की आँखों से आँसू निकल पड़े।

     

    “मैंने बहुत कोशिश की कृष्ण।”

     

    “किस बात की?”

     

    “अपने परिवार को खुश रखने की।”

     

    सुदामा कुछ देर रुके।

     

    “मैंने बच्चों को पढ़ाया। जो मिला, उसमें घर चलाया। कभी किसी से शिकायत नहीं की। लेकिन कई बार ऐसा हुआ कि घर में खाने तक की परेशानी हो गई।”

     

    कृष्ण चुपचाप सुनते रहे।

     

    सुदामा बोले,

     

    “मेरी पत्नी ने कभी मुझसे कुछ नहीं माँगा। बच्चों ने भी कभी जिद नहीं की। लेकिन उनकी आँखों में सब दिखता था।”

     

    कृष्ण की आँखें भी नम हो गईं।

     

    “तो तुम इतने सालों तक अकेले यह सब सहते रहे?”

     

    सुदामा ने हल्की मुस्कान के साथ कहा,

     

    “तुम्हारी दोस्ती की याद थी ना।”

     

    कृष्ण ने उनका हाथ कसकर पकड़ लिया।

     

    “और तुमने सोचा कि मुझे कुछ नहीं बताओगे?”

     

    सुदामा ने कहा,

     

    “तुम द्वारका के राजा हो कृष्ण। तुम्हारे पास कितने काम होंगे। मैं अपनी परेशानी लेकर तुम्हारे पास कैसे आता?”

     

    कृष्ण ने तुरंत कहा,

     

    “राजा?”

     

    वह थोड़ा मुस्कुराए।

     

    “मेरे लिए तुम अभी भी वही सुदामा हो जो मेरे साथ गुरुकुल में पेड़ के नीचे बैठता था।”

     

    सुदामा की आँखों में आँसू थे।

     

    कृष्ण ने कहा,

     

    “तुमने मुझे अपना दोस्त समझकर आने में भी इतना समय लगा दिया।”

     

    सुदामा कुछ नहीं बोल पाए।

     

    तभी कृष्ण ने देखा कि सुदामा के पैर यात्रा की वजह से थके हुए थे।

     

    कृष्ण ने कहा,

     

    “पहले बैठो।”

     

    “नहीं कृष्ण, मैं ठीक हूँ।”

     

    “तुम्हारी ये ‘मैं ठीक हूँ’ वाली आदत अभी तक नहीं गई?”

     

    सुदामा मुस्कुरा दिए।

     

    कृष्ण ने अपने सेवकों से पानी मंगवाया और खुद सुदामा के पास बैठ गए।

     

    सुदामा घबरा गए।

     

    “कृष्ण, तुम ये क्या कर रहे हो?”

     

    कृष्ण ने कहा,

     

    “आज मुझे अपने दोस्त की सेवा करने दो।”

     

    “लेकिन तुम राजा हो।”

     

    कृष्ण ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “और तुम मेरे दोस्त हो। आज मेरे लिए यही सबसे बड़ी बात है।”

     

    सुदामा की आँखें फिर भर आईं।

     

    कृष्ण ने उनके थके हुए पैरों को पानी से धोया।

     

    सुदामा बार-बार उन्हें रोकने की कोशिश करते रहे।

     

    “कृष्ण, ऐसा मत करो।”

     

    कृष्ण ने हँसते हुए कहा,

     

    “जब मैं गुरुकुल में गलती करता था और तुम मेरा काम अपने ऊपर ले लेते थे, तब तो तुमने मुझे कभी रोका नहीं।”

     

    सुदामा कुछ बोल नहीं पाए।

     

    कृष्ण ने कहा,

     

    “आज मेरी बारी है।”

     

    कुछ देर बाद दोनों साथ बैठ गए।

     

    कृष्ण ने फिर वही छोटा-सा पोटली उठाई जो सुदामा अपने साथ लाए थे।

     

    “वैसे एक बात बताओ।”

     

    “क्या?”

     

    “तुम मेरे लिए क्या लाए हो?”

     

    सुदामा झेंप गए।

     

    “कुछ खास नहीं।”

     

    कृष्ण ने पोटली खोल ली।

     

    उसमें थोड़ा-सा चिवड़ा था।

     

    कृष्ण के चेहरे पर ऐसी खुशी आई जैसे उन्हें कोई बहुत बड़ा खजाना मिल गया हो।

     

    उन्होंने थोड़ा चिवड़ा उठाया और खाने लगे।

     

    “अरे वाह! यही तो चाहिए था।”

     

    सुदामा ने कहा,

     

    “कृष्ण, ये बहुत साधारण है।”

     

    कृष्ण ने कहा,

     

    “साधारण?”

     

    उन्होंने मुस्कुराकर सुदामा की तरफ देखा।

     

    “जिसमें दोस्त का प्यार हो, वह साधारण कैसे हो सकता है?”

     

    सुदामा की आँखों से आँसू बहने लगे।

     

    कृष्ण ने उन्हें देखकर कहा,

     

    “आज तुम मेरे पास खाली हाथ नहीं आए सुदामा। तुम अपने साथ हमारी दोस्ती की वही खुशबू लेकर आए हो, जो गुरुकुल में थी।”

     

    सुदामा ने सिर उठाकर कृष्ण को देखा।

     

    उन्हें लगा जैसे इतने सालों का सारा दुख धीरे-धीरे हल्का हो रहा हो।

     

    लेकिन कृष्ण के मन में कुछ और था।

     

    वह अपने दोस्त को बिना माँगे ही सब कुछ देना चाहते थे।

     

    सुदामा ने कुछ नहीं माँगा।

     

    उन्होंने अपने दुख की पूरी बात भी नहीं कही।

     

    लेकिन कृष्ण सब समझ चुके थे।

     

    रात काफी हो चुकी थी।

     

    कृष्ण ने कहा,

     

    “सुदामा, आज तुम यहीं आराम करो।”

     

    सुदामा ने कहा,

     

    “नहीं कृष्ण, सुबह मुझे वापस जाना है।”

     

    कृष्ण कुछ पल उन्हें देखते रहे।

     

    फिर बोले,

     

    “ठीक है। लेकिन जाने से पहले मुझे एक वादा करना होगा।”

     

    “कैसा वादा?”

     

    “अब कभी अपने दोस्त से मिलने में इतनी देर मत करना।”

     

    सुदामा मुस्कुरा दिए।

     

    “वादा।”

     

    दोनों ने एक-दूसरे को देखा।

     

    कभी गुरुकुल में साथ रहने वाले दो दोस्त आज अलग-अलग दुनिया में खड़े थे।

     

    लेकिन उनके बीच की दोस्ती वैसी ही थी।

     

    अगली सुबह सुदामा जब द्वारका से अपने घर लौटने के लिए निकले, तो उनके मन में एक ही सवाल था—

     

    कृष्ण ने मुझे इतना प्यार तो दिया… लेकिन क्या मेरे घर की हालत भी बदलेगी?

     

    उन्हें अभी नहीं पता था कि कृष्ण ने उनके लिए क्या सोच रखा था।

     

    और जब सुदामा अपने गाँव के पास पहुँचे…

     

    तो उन्हें दूर से कुछ ऐसा दिखाई दिया, जिसे देखकर वह अपनी आँखों पर विश्वास ही नहीं कर पाए।

     

    क्रमशः…

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    Auther preeti Sharma

    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं