क्यों दिल दुखाते हैं इस नाचीज़ का, क्या कसूर है मेरी खामोशियों का,
हमने तो हर दर्द छुपाकर रखा, फिर क्यों हिसाब माँगते हो मेरी वफ़ाओं का।
तुम्हारी खुशी के लिए खुद को भुलाया, हर आँसू को पलकों में छुपाया,
फिर भी तुमने दर्द ही दर्द दिया, क्या यही सिला है सच्चे जज़्बातों का?
हम नाचीज़ सही, पर दिल तो रखते हैं, टूटकर भी तुम्हें अपना कहते हैं,
कभी बैठकर पूछना हाल हमारा, क्यों दिल दुखाते हो इस नाचीज़ का? 💔


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