फिर चल दिए, तुम कहां हम कहां,
राहें अलग, मंज़िलें जुदा।
सपनों की डोर थी एक पल साथ,
अब हवा में बिखर गई वो दुआ।
तुम्हारी हँसी गूँजती है अब भी,
मेरे सन्नाटों में कहीं छुपी।
मैं ढूँढता हूँ वो परछाईं,
जो कभी मेरे दिल में थी बसी।
फिर चल दिए, तुम कहां हम कहां,
कहानी अधूरी, यादें गवाह।
मिलन की आस अब भी बाकी,
जुदाई का दर्द बना है पनाह।
फिर चल दिए, तुम कहां हम कहां,
राहों के मोड़ पर खामोशियाँ बसीं।
कदमों की आहट दूर जाती रही,
दिल की धड़कनें वहीं ठहर सी गईं।
सपनों की डोर कभी एक थी,
अब टूटकर हवाओं में बिखर गई।
तुम्हारी परछाईं अब भी साथ है,
पर हकीकत की ज़मीन जुदा हो गई।
फिर चल दिए, तुम कहां हम कहां,
जुदाई का मौसम, तन्हाई की सदा।
यादों के दीपक जलते हैं हर रात,
पर उजाला भी अब अधूरा सा लगा।
तुम्हारी हँसी की गूँज अब भी आती है,
मेरे सन्नाटों को चुपके से जगाती है।
मैं ढूँढता हूँ वो पल, वो नज़रें,
जहाँ मोहब्बत की खुशबू बस जाती है।
फिर चल दिए, तुम कहां हम कहां,
कहानी अधूरी, दर्द गवाह।
मिलन की आस अब भी बाकी है,
जुदाई का सफ़र बना है पनाह।
कभी सोचता हूँ, राहें फिर मिलेंगी,
कभी ख्वाबों में तुम्हारी झलक दिखेगी।
पर वक्त की धारा बहती है आगे,
हमारे बीच अब सिर्फ़ यादें रहेंगी।

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