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  • जिसे मैने पहली बार राखी बांधी

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    जिसे मैंने पहली बार राखी बांधी

    अनुष्का को बचपन से रक्षाबंधन का त्योहार बहुत पसंद था।

     

    रक्षाबंधन आने से कई दिन पहले ही वह बाजार जाने की जिद करने लगती थी।

     

    “माँ, इस बार सबसे सुंदर राखी लूंगी।”

     

    माँ मुस्कुराकर कहतीं,

     

    “इतनी तैयारी किसके लिए?”

     

    अनुष्का तुरंत जवाब देती,

     

    “मेरे भाई के लिए।”

     

    उसका बड़ा भाई रवि उससे चार साल बड़ा था।

     

    दोनों बचपन से बहुत करीब थे।

     

    रवि उसे चिढ़ाता था।

     

    उसकी चीजें छिपा देता था।

     

    कभी उसके बाल खींच देता था।

     

    और फिर जब अनुष्का रोती, तो सबसे पहले वही उसे चुप कराता।

     

    रक्षाबंधन के दिन अनुष्का हमेशा कहती,

     

    “भैया, हाथ आगे करो।”

     

    रवि मजाक करता,

     

    “पहले गिफ्ट बताओ।”

     

    अनुष्का गुस्सा होकर कहती,

     

    “पहले राखी।”

     

    रवि हंसकर हाथ आगे कर देता।

     

    सालों तक यही चलता रहा।

     

    लेकिन समय के साथ दोनों बड़े हो गए।

     

    रवि काम के सिलसिले में दूसरे शहर चला गया।

     

    अनुष्का पढ़ाई करने लगी।

     

    फिर भी हर रक्षाबंधन पर दोनों मिलते जरूर थे।

     

    अगर मिलना संभव न होता तो वीडियो कॉल पर बात करते।

     

    रवि हमेशा कहता,

     

    “राखी बांधना जरूरी है, चाहे सामने हो या दूर।”

     

    अनुष्का कहती,

     

    “आपके बिना त्योहार अधूरा लगता है।”

     

    एक साल रक्षाबंधन से कुछ महीने पहले रवि को दूसरे देश में एक बड़ा काम मिल गया।

     

    वह बहुत दूर चला गया।

     

    जाने से पहले उसने अनुष्का से कहा,

     

    “इस बार शायद राखी पर नहीं आ पाऊंगा।”

     

    अनुष्का ने नाराज होकर कहा,

     

    “तो मैं भेज दूंगी।”

     

    रवि हंस पड़ा।

     

    “जरूर भेजना।”

     

    लेकिन उस साल परिस्थितियां ऐसी बनीं कि रवि समय पर बात भी नहीं कर पाया।

     

    उसका काम बहुत व्यस्त था और संपर्क करना मुश्किल हो रहा था।

     

    अनुष्का हर दिन इंतजार करती।

     

    रक्षाबंधन से एक दिन पहले उसने फोन किया।

     

    कॉल नहीं लगी।

     

    उसने संदेश भेजा।

     

    जवाब नहीं आया।

     

    अगले दिन सुबह वह जल्दी उठ गई।

     

    उसने राखी की थाली सजाई।

     

    लेकिन सामने भाई नहीं था।

     

    उसने वीडियो कॉल की कोशिश की।

     

    फिर भी बात नहीं हुई।

     

    अनुष्का की आंखें भर आईं।

     

    माँ ने उसके पास आकर कहा,

     

    “उदास मत हो बेटा, बात हो जाएगी।”

     

    अनुष्का ने कहा,

     

    “माँ, पहली बार ऐसा लग रहा है जैसे रक्षाबंधन है ही नहीं।”

     

    माँ ने प्यार से उसके सिर पर हाथ रखा।

     

    “त्योहार सिर्फ साथ बैठने से नहीं, दिल से भी मनाए जाते हैं।”

     

    अनुष्का ने राखी वापस डिब्बे में रखने के लिए हाथ बढ़ाया।

     

    तभी दरवाजे पर किसी ने आवाज दी।

     

    “मैडम… माफ कीजिए।”

     

    अनुष्का बाहर आई।

     

    सामने एक युवक खड़ा था।

     

    उसके हाथ में एक पर्स था।

     

    “ये शायद आपका है।”

     

    अनुष्का ने देखा।

     

    वह माँ का पर्स था।

     

    “अरे! ये आपको कहां मिला?”

     

    युवक ने बताया कि पर्स रास्ते में गिर गया था और अंदर मिले एक पते के आधार पर वह लौटाने आया था।

     

    माँ ने उसे धन्यवाद दिया।

     

    “अंदर आओ बेटा, कम से कम चाय पीकर जाना।”

     

    युवक ने पहले मना किया।

     

    लेकिन माँ के बार-बार कहने पर वह अंदर आ गया।

     

    उसका नाम आर्यन था।

     

    बातों-बातों में माँ ने कहा,

     

    “आज रक्षाबंधन है, इसलिए बेटी थोड़ी उदास है।”

     

    आर्यन ने अनुष्का की तरफ देखा।

     

    “क्यों?”

     

    अनुष्का ने हल्की मुस्कान के साथ कहा,

     

    “भाई बहुत दूर है।”

     

    आर्यन चुप हो गया।

     

    कुछ देर बाद उसने धीरे से कहा,

     

    “मैं समझ सकता हूं।”

     

    अनुष्का ने पूछा,

     

    “क्यों?”

     

    आर्यन ने कहा,

     

    “मेरी कोई बहन नहीं है।”

     

    यह सुनकर अनुष्का कुछ पल चुप रही।

     

    माँ ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “तो आज से अनुष्का तुम्हारी बहन।”

     

    आर्यन थोड़ा असहज होकर हंस पड़ा।

     

    “ऐसे रिश्ते बन जाते हैं क्या?”

     

    माँ ने कहा,

     

    “कुछ रिश्ते बनने के लिए सालों की जरूरत नहीं होती।”

     

    अनुष्का चुपचाप राखी की थाली की तरफ देखने लगी।

     

    फिर उसने पूछा,

     

    “आपको राखी बंधवाने में कोई परेशानी तो नहीं?”

     

    आर्यन ने उसकी तरफ देखा।

     

    शायद वह भी पहली बार ऐसा अनुभव कर रहा था।

     

    उसने धीरे से अपना हाथ आगे कर दिया।

     

    “नहीं।”

     

    अनुष्का ने राखी उठाई।

     

    लेकिन राखी बांधने से पहले रुक गई।

     

    उसके मन में आया—

     

    क्या किसी अनजान इंसान को भाई कहना इतना आसान है?

     

    फिर उसने आर्यन की आंखों में देखा।

     

    वह बिल्कुल चुप था।

     

    जैसे उसके मन में भी कोई पुरानी कमी हो।

     

    अनुष्का ने धीरे से राखी बांध दी।

     

    “अब आप मेरे भाई हो।”

     

    आर्यन मुस्कुराया।

     

    “इतनी जल्दी फैसला?”

     

    “हां।”

     

    “और अगर मैं अच्छा भाई नहीं निकला?”

     

    अनुष्का ने कहा,

     

    “तो डांट दूंगी।”

     

    सब हंस पड़े।

     

    आर्यन ने पूछा,

     

    “गिफ्ट क्या चाहिए?”

     

    अनुष्का ने कहा,

     

    “कुछ नहीं।”

     

    “हर बहन यही बोलती है?”

     

    “नहीं, मुझे सच में कुछ नहीं चाहिए।”

     

    आर्यन ने कहा,

     

    “तो एक वादा।”

     

    “कैसा?”

     

    “जब भी कभी जरूरत हो, मुझे फोन करना।”

     

    अनुष्का ने मजाक में कहा,

     

    “और आप उठाओगे?”

     

    आर्यन हंस पड़ा।

     

    “कोशिश करूंगा।”

     

    उस दिन के बाद दोनों अपने-अपने काम में व्यस्त हो गए।

     

    अनुष्का को लगा शायद यह रिश्ता सिर्फ उसी दिन तक था।

     

    लेकिन शाम को उसके फोन पर एक संदेश आया।

     

    “घर पहुंच गया, बहन।”

     

    अनुष्का मुस्कुराई।

     

    कुछ दिनों बाद—

     

    “पढ़ाई कैसी चल रही है?”

     

    फिर—

     

    “माँ की तबीयत ठीक है?”

     

    फिर—

     

    “कोई परेशानी हो तो बताना।”

     

    धीरे-धीरे दोनों की बातें बढ़ने लगीं।

     

    रवि जब विदेश से वापस आया, तो अनुष्का ने उत्साह से कहा,

     

    “भैया, आपको किसी से मिलवाना है।”

     

    रवि ने पूछा,

     

    “कौन?”

     

    “मेरे दूसरे भाई से।”

     

    रवि हंस पड़ा।

     

    “वाह! मैं कुछ महीने बाहर क्या गया, मेरी जगह भर दी?”

     

    अनुष्का ने कहा,

     

    “जगह कोई नहीं भर सकता।”

     

    फिर वह मुस्कुराई।

     

    “बस दिल बड़ा हो गया।”

     

    जब रवि की मुलाकात आर्यन से हुई तो वह पहले थोड़ा हैरान हुआ।

     

    लेकिन फिर उसने कहा,

     

    “मेरी बहन को परेशान मत करना।”

     

    आर्यन ने हंसते हुए जवाब दिया,

     

    “आपकी बहन पहले से ही मुझे परेशान कर रही है।”

     

    अनुष्का ने दोनों को गुस्से से देखा।

     

    “आप दोनों दोस्त मत बन जाना।”

     

    दोनों भाई हंस पड़े।

     

    अगले साल रक्षाबंधन आया।

     

    इस बार अनुष्का के सामने दो हाथ थे।

     

    एक उसके बचपन के भाई रवि का।

     

    दूसरा उस भाई का, जिसे उसने एक साल पहले पहली बार राखी बांधी थी।

     

    अनुष्का ने पहले रवि को राखी बांधी।

     

    फिर आर्यन की तरफ देखा।

     

    आर्यन ने हाथ आगे करते हुए कहा,

     

    “इस बार भी राखी बांधोगी या रिश्ता खत्म?”

     

    अनुष्का ने तुरंत कहा,

     

    “भाई से रिश्ता खत्म नहीं होता।”

     

    आर्यन मुस्कुराया।

     

    “अच्छा।”

     

    अनुष्का ने उसे राखी बांधी।

     

    माँ दूर खड़ी दोनों को देख रही थीं।

     

    उनकी आंखें नम थीं।

     

    अनुष्का ने कहा,

     

    “माँ, उस दिन अगर पर्स नहीं गिरता तो?”

     

    माँ ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “तो शायद एक रिश्ता नहीं मिलता।”

     

    अनुष्का ने दोनों भाइयों को देखा।

     

    उस दिन उसे समझ आया—

     

    रिश्ते सिर्फ खून से नहीं बनते।

     

    कुछ रिश्ते भरोसे से बनते हैं।

     

    कुछ अपनापन देखकर।

     

    और कुछ रिश्ते…

     

    बस एक राखी के धागे से दिल में जगह बना लेते हैं।

     

    उस साल अनुष्का ने महसूस किया कि उसका रक्षाबंधन पहले से कहीं ज्यादा खास था।

     

    क्योंकि उसके पास सिर्फ एक भाई नहीं था।

     

    उसके पास दो ऐसे लोग थे, जिन्हें वह दिल से अपना कह सकती थी।

     

    रवि ने हंसते हुए कहा,

     

    “अब गिफ्ट किससे पहले लेगी?”

     

    अनुष्का ने कहा,

     

    “दोनों से।”

     

    आर्यन बोला,

     

    “लो, असली बहन अब सामने आई।”

     

    अनुष्का हंस पड़ी।

     

    घर फिर से हंसी से भर गया।

     

    उसने अपनी दोनों भाइयों की कलाई पर बंधी राखियों को देखा।

     

    एक रिश्ता उसे जन्म से मिला था।

     

    दूसरा उसे रक्षाबंधन के दिन मिला था।

     

    लेकिन दोनों में एक बात समान थी—

     

    अपनापन।

     

    और अनुष्का ने उसी दिन मन ही मन सोचा—

     

    कभी-कभी भगवान हमें रिश्ते चुनने का मौका भी देता है।

     

    बस उन्हें पहचानने के लिए…

     

    दिल का दरवाजा खुला होना चाहिए।

     

    उसकी पहली राखी, जो उस साल अधूरी लग रही थी…

     

    आखिर में उसकी जिंदगी की सबसे यादगार राखी बन गई।

  • हर साल राखी भेजती रही

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

    हर साल राखी भेजती रही, पर भाई ने कभी जवाब नहीं दिया

     

    रक्षाबंधन आने में अभी पांच दिन बाकी थे।

     

    मीरा बाजार में राखियां देख रही थी।

     

    उसकी नजर एक साधारण-सी लाल और सुनहरे धागे वाली राखी पर जाकर रुक गई।

     

    उसने दुकानदार से कहा,

     

    “भैया, ये वाली दे दीजिए।”

     

    दुकानदार ने पूछा,

     

    “बस एक?”

     

    मीरा ने हल्की मुस्कान के साथ कहा,

     

    “हां, बस एक ही भाई है।”

     

    राखी हाथ में लेते ही उसकी आंखें नम हो गईं।

     

    पिछले आठ सालों से वह हर रक्षाबंधन पर अपने भाई अभिषेक को राखी भेजती थी।

     

    लेकिन पिछले आठ सालों में अभिषेक ने उसे कभी फोन करके यह नहीं कहा था—

     

    “राखी मिल गई।”

     

    न कोई गिफ्ट।

     

    न कोई वीडियो कॉल।

     

    न कोई लंबी बात।

     

    बस कभी-कभी दो शब्दों का एक संदेश आता था—

     

    “Thanks.”

     

    और कई बार वह भी नहीं।

     

    मीरा के दोस्तों को यह बात समझ नहीं आती थी।

     

    एक दिन उसकी सहेली ने पूछा था,

     

    “जब तुम्हारा भाई इतना दूर-दूर रहता है तो तुम हर साल राखी क्यों भेजती हो?”

     

    मीरा ने कहा था,

     

    “क्योंकि वो मेरा भाई है।”

     

    “लेकिन उसे तो फर्क ही नहीं पड़ता।”

     

    मीरा कुछ सेकंड चुप रही।

     

    फिर बोली,

     

    “शायद पड़ता हो।”

     

    उसकी सहेली हंस पड़ी।

     

    “तुझे खुद नहीं पता।”

     

    मीरा ने जवाब नहीं दिया।

     

    सच तो यह था कि कभी-कभी उसे भी बुरा लगता था।

     

    बहुत बुरा।

     

    बचपन में अभिषेक और मीरा बहुत करीब थे।

     

    अभिषेक उससे छह साल बड़ा था।

     

    जब मीरा छोटी थी, वह उसके पीछे-पीछे घूमती रहती।

     

    “भैया, मुझे भी साइकिल चलानी है।”

     

    “गिर जाएगी।”

     

    “तो आप पकड़ लेना।”

     

    “तू बहुत परेशान करती है।”

     

    फिर भी अभिषेक घंटों उसके पीछे साइकिल पकड़कर दौड़ता रहता।

     

    मीरा को स्कूल में कोई डांट देता तो वह घर आकर सबसे पहले भाई को बताती।

     

    अभिषेक हमेशा कहता,

     

    “रो मत, मैं हूं ना।”

     

    लेकिन समय के साथ सब बदल गया।

     

    अभिषेक पढ़ाई और काम के लिए दूसरे शहर चला गया।

     

    धीरे-धीरे फोन कम हो गए।

     

    फिर बातें कम हो गईं।

     

    और फिर जैसे दोनों की जिंदगी अपनी-अपनी दिशा में चल पड़ी।

     

    फिर भी हर साल मीरा राखी भेजती रही।

     

    इस बार उसने राखी के साथ एक छोटा-सा पत्र भी लिखा।

     

    उसने लिखा—

     

    “भैया, इस बार भी राखी भेज रही हूं। पता नहीं आपको पसंद आएगी या नहीं। हर साल सोचती हूं कि शायद इस बार आप फोन करेंगे। लेकिन अगर नहीं भी किया तो कोई बात नहीं। बस राखी संभालकर रख लेना।”

     

    पत्र लिखते-लिखते उसकी आंखें भर आईं।

     

    फिर उसने आखिरी लाइन लिखी—

     

    “आप चाहे जितने दूर हो जाओ, मेरे लिए हमेशा वही रहोगे जो बचपन में कहते थे—मैं हूं ना।”

     

    उसने लिफाफा बंद कर दिया।

     

    रक्षाबंधन आ गया।

     

    सुबह से ही मीरा का मन बेचैन था।

     

    वह बार-बार मोबाइल देखती।

     

    कोई कॉल नहीं।

     

    दोपहर हुई।

     

    कोई संदेश नहीं।

     

    शाम हो गई।

     

    अब भी कुछ नहीं।

     

    माँ ने पूछा,

     

    “क्या हुआ?”

     

    मीरा ने कहा,

     

    “कुछ नहीं।”

     

    माँ ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “अभिषेक का इंतजार कर रही है?”

     

    मीरा ने तुरंत कहा,

     

    “नहीं।”

     

    लेकिन उसकी आंखें सच बता रही थीं।

     

    रात को उसने खुद को समझाया।

     

    “हर साल ऐसा ही होता है। इस बार इतना सोचने की क्या जरूरत है?”

     

    उसने मोबाइल एक तरफ रख दिया।

     

    तभी दरवाजे की घंटी बजी।

     

    मीरा ने सोचा शायद कोई पड़ोसी होगा।

     

    उसने दरवाजा खोला।

     

    और सामने…

     

    अभिषेक खड़ा था।

     

    कुछ सेकंड तक मीरा को विश्वास ही नहीं हुआ।

     

    “भैया?”

     

    अभिषेक हल्का-सा मुस्कुराया।

     

    “अंदर नहीं बुलाएगी?”

     

    मीरा की आंखों से आंसू निकल आए।

     

    “आप… यहां?”

     

    वह कुछ कहे बिना भाई के गले लग गई।

     

    कई सालों की शिकायतें उस एक पल में जैसे बाहर आ गईं।

     

    अभिषेक ने उसके सिर पर हाथ रखा।

     

    “इतना रोएगी तो पड़ोसी सोचेंगे मैंने कुछ किया है।”

     

    मीरा रोते-रोते हंस पड़ी।

     

    माँ भी बाहर आ गईं।

     

    “अभिषेक!”

     

    वह माँ के पैर छूने लगा।

     

    घर में अचानक खुशी लौट आई।

     

    कुछ देर बाद मीरा ने पूछा,

     

    “लेकिन आप आए कैसे? आपने बताया भी नहीं।”

     

    अभिषेक ने अपना बैग खोला।

     

    उसने अंदर से एक डिब्बा निकाला।

     

    मीरा ने खोला।

     

    और वह हैरान रह गई।

     

    अंदर…

     

    राखियां थीं।

     

    बहुत सारी राखियां।

     

    लाल।

     

    पीली।

     

    हरी।

     

    साधारण।

     

    रंगीन।

     

    पुरानी।

     

    नई।

     

    मीरा ने एक-एक करके उन्हें देखा।

     

    उसकी आंखें भर आईं।

     

    “ये सब…?”

     

    अभिषेक ने कहा,

     

    “तेरी भेजी हुई हैं।”

     

    मीरा ने धीरे से पूछा,

     

    “सभी?”

     

    “एक भी नहीं फेंकी।”

     

    मीरा कुछ बोल नहीं पाई।

     

    अभिषेक ने कहा,

     

    “तू सोचती थी मुझे फर्क नहीं पड़ता?”

     

    मीरा की आंखों से आंसू बहने लगे।

     

    “आपने कभी बताया नहीं।”

     

    अभिषेक चुप रहा।

     

    फिर बोला,

     

    “मुझसे गलतियां हुई हैं।”

     

    मीरा उसकी तरफ देखने लगी।

     

    “जब मैं घर से दूर गया, मुझे लगा काम खत्म करके आराम से बात करूंगा।”

     

    वह हल्का-सा हंसा।

     

    “लेकिन काम कभी खत्म ही नहीं हुआ।”

     

    मीरा चुप रही।

     

    अभिषेक ने कहा,

     

    “हर साल राखी आती थी। मैं उसे खोलता था। बांधता था।”

     

    “फिर फोन क्यों नहीं किया?”

     

    इस सवाल पर अभिषेक की आंखें झुक गईं।

     

    “शायद आदत खराब हो गई।”

     

    मीरा ने कहा,

     

    “एक फोन करने की?”

     

    “हां।”

     

    फिर वह गंभीर होकर बोला,

     

    “हम अक्सर सोचते रहते हैं कि अपनों से बात बाद में कर लेंगे।”

     

    मीरा ध्यान से सुन रही थी।

     

    “लेकिन बाद में करते-करते कई साल निकल जाते हैं।”

     

    उसकी आवाज धीमी हो गई।

     

    “और फिर एक दिन पता चलता है कि अपने हमसे दूर नहीं गए थे… हम खुद उनसे दूर होते गए।”

     

    मीरा की आंखें भर आईं।

     

    अभिषेक ने बैग से एक और चीज निकाली।

     

    वह वही पत्र था जो मीरा ने राखी के साथ भेजा था।

     

    “ये भी मिला।”

     

    मीरा ने शर्म से कहा,

     

    “पढ़ लिया?”

     

    अभिषेक ने कहा,

     

    “कई बार।”

     

    मीरा ने उसकी तरफ देखा।

     

    अभिषेक बोला,

     

    “उस आखिरी लाइन ने मुझे बहुत देर तक सोचने पर मजबूर किया।”

     

    “कौन-सी?”

     

    “मैं हूं ना।”

     

    मीरा चुप हो गई।

     

    अभिषेक ने कहा,

     

    “बचपन में मैं तुझे ये बात कहता था।”

     

    फिर उसने मुस्कुराकर कहा,

     

    “लेकिन बड़ा होकर खुद ही गायब हो गया।”

     

    मीरा की आंखों से फिर आंसू निकल आए।

     

    अभिषेक ने कहा,

     

    “इस बार सोचा कि सिर्फ ‘Thanks’ लिखकर बात खत्म नहीं करूंगा।”

     

    मीरा ने हल्के से कहा,

     

    “तो?”

     

    “इस बार राखी खुद बंधवाने आऊंगा।”

     

    मीरा मुस्कुरा दी।

     

    वह तुरंत अंदर गई और पूजा की थाली लेकर आई।

     

    अभिषेक उसके सामने बैठ गया।

     

    मीरा ने तिलक लगाया।

     

    राखी उठाई।

     

    लेकिन इस बार उसका हाथ कांप नहीं रहा था।

     

    उसने धीरे से भाई की कलाई पर राखी बांध दी।

     

    अभिषेक ने पूछा,

     

    “अब क्या मांगोगी?”

     

    मीरा ने कहा,

     

    “कुछ नहीं।”

     

    “पक्का?”

     

    “हां।”

     

    “गिफ्ट नहीं चाहिए?”

     

    मीरा ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं।”

     

    अभिषेक ने कहा,

     

    “लेकिन इस बार मैं गिफ्ट देने के लिए तैयार होकर आया हूं।”

     

    मीरा ने पूछा,

     

    “क्या?”

     

    अभिषेक ने कहा,

     

    “एक वादा।”

     

    मीरा की आंखें उसकी तरफ उठ गईं।

     

    “कैसा वादा?”

     

    अभिषेक ने अपना मोबाइल निकाला।

     

    उसमें एक नया अलार्म लगा था।

     

    हर रविवार शाम सात बजे।

     

    नाम लिखा था—

     

    “मीरा को फोन करना।”

     

    मीरा हंस पड़ी।

     

    “इसके लिए अलार्म लगाना पड़ेगा?”

     

    अभिषेक ने कहा,

     

    “हां।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि कुछ रिश्ते इतने जरूरी होते हैं कि उन्हें किस्मत और व्यस्तता के भरोसे नहीं छोड़ना चाहिए।”

     

    मीरा की आंखें नम हो गईं।

     

    “तो हर रविवार फोन करोगे?”

     

    “हां।”

     

    “और अगर भूल गए?”

     

    अभिषेक मुस्कुराया।

     

    “तो अलार्म याद दिला देगा।”

     

    मीरा ने कहा,

     

    “नहीं।”

     

    अभिषेक ने पूछा,

     

    “फिर?”

     

    मीरा ने उसकी राखी की तरफ देखते हुए कहा,

     

    “ये याद दिलाएगी।”

     

    अभिषेक कुछ सेकंड तक अपनी कलाई को देखता रहा।

     

    फिर उसने कहा,

     

    “पक्का।”

     

    उस रात दोनों बहुत देर तक बातें करते रहे।

     

    बचपन की।

     

    स्कूल की।

     

    पुरानी शरारतों की।

     

    उन दिनों की, जिन्हें दोनों ने अपनी जिंदगी की जल्दी में कहीं पीछे छोड़ दिया था।

     

    सुबह जब अभिषेक वापस जाने लगा, मीरा ने पूछा,

     

    “भैया?”

     

    “हां?”

     

    “अगली राखी पर फिर आओगे?”

     

    अभिषेक मुस्कुराया।

     

    “अगर तू भेजेगी तो।”

     

    मीरा ने कहा,

     

    “नहीं भेजूंगी।”

     

    अभिषेक हैरान हुआ।

     

    “क्यों?”

     

    मीरा मुस्कुराई।

     

    “क्योंकि इस बार मैं खुद आकर बांधूंगी।”

     

    अभिषेक हंस पड़ा।

     

    “फिर ठीक है।”

     

    दोनों कुछ सेकंड तक एक-दूसरे को देखते रहे।

     

    अभिषेक ने कहा,

     

    “मीरा।”

     

    “हां?”

     

    “अब भी वही कह सकता हूं।”

     

    मीरा की आंखें नम हो गईं।

     

    “क्या?”

     

    अभिषेक ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “मैं हूं ना।”

     

    मीरा मुस्कुरा दी।

     

    और इस बार उसे उन शब्दों पर कोई शक नहीं था।

     

    क्योंकि कभी-कभी प्यार खत्म नहीं होता।

     

    बस लोग उसे जताना भूल जाते हैं।

     

    और कभी-कभी एक छोटी-सी राखी…

     

    सालों की दूरी को याद दिला देती है कि रिश्ता अभी भी वहीं है।

     

    बस किसी एक को…

     

    दरवाजा खोलकर कहना होता है—

     

    “मैं आ गया।”

  • राखी के साथ मिला अधूरा पत्र

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

     

    राखी के साथ मिला भाई का अधूरा पत्र

    रक्षाबंधन से एक दिन पहले काव्या अपने पुराने घर लौटी थी।

     

    लगभग तीन साल बाद।

     

    घर का दरवाजा खोलते ही उसे वही पुरानी खुशबू महसूस हुई। दीवारों पर लगी तस्वीरें, आंगन में रखा पुराना झूला और कोने में रखा लकड़ी का संदूक—सब कुछ वैसा ही था।

     

    बस एक चीज बदल गई थी।

     

    घर पहले जितना शोर वाला नहीं रहा था।

     

    क्योंकि काव्या और उसके बड़े भाई रोहन के बीच पिछले तीन साल से ठीक से बात नहीं हुई थी।

     

    एक ही शहर में रहने के बावजूद दोनों जैसे एक-दूसरे के लिए अजनबी बन गए थे।

     

    माँ ने उसे देखकर कहा,

     

    “आ गई बेटा?”

     

    काव्या ने धीरे से माँ को गले लगाया।

     

    “हां माँ।”

     

    माँ की आंखों में खुशी थी।

     

    “तूने कहा था इस बार नहीं आएगी।”

     

    काव्या ने नजरें झुका लीं।

     

    “सोचा… राखी है।”

     

    माँ समझ गईं कि वह किसके लिए आई है।

     

    उन्होंने धीरे से पूछा,

     

    “रोहन से बात करेगी?”

     

    काव्या ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    रोहन अपने कमरे में था।

     

    काव्या चाहती थी कि वह बाहर आए।

     

    उससे कुछ कहे।

     

    कम से कम इतना ही बोले—

     

    “आ गई?”

     

    लेकिन कई घंटे बीत गए।

     

    रोहन बाहर नहीं आया।

     

    काव्या को गुस्सा आने लगा।

     

    “हमेशा की तरह।”

     

    माँ ने पूछा,

     

    “क्या?”

     

    “कुछ नहीं।”

     

    शाम को काव्या अपने पुराने कमरे में गई।

     

    वहां सब कुछ लगभग वैसा ही था।

     

    पुरानी किताबें।

     

    कॉलेज की कुछ तस्वीरें।

     

    एक कोने में रखा लकड़ी का डिब्बा।

     

    काव्या ने उसे खोला।

     

    अंदर उसकी बचपन की चीजें थीं।

     

    पुराने कार्ड।

     

    कुछ तस्वीरें।

     

    और एक सफेद लिफाफा।

     

    लिफाफे पर उसका नाम लिखा था—

     

    “काव्या के लिए।”

     

    उसने तुरंत पहचान लिया।

     

    वह रोहन की लिखावट थी।

     

    काव्या के हाथ कांपने लगे।

     

    लिफाफा पुराना था।

     

    उस पर धूल की हल्की परत थी।

     

    उसने धीरे से खोलना शुरू किया।

     

    अंदर एक पत्र था।

     

    लेकिन पत्र अधूरा था।

     

    उसमें लिखा था—

     

    “काव्या, मुझे नहीं पता कि तू मुझसे कब तक नाराज रहेगी। लेकिन अगर कभी ये पत्र पढ़े तो बस इतना समझ लेना कि…”

     

    उसके बाद कागज खाली था।

     

    काव्या की आंखें भर आईं।

     

    उसे तीन साल पुराना वह दिन याद आ गया।

     

    उस दिन घर में बहुत बड़ा झगड़ा हुआ था।

     

    काव्या को दूसरे शहर में नौकरी मिली थी।

     

    वह बहुत खुश थी।

     

    लेकिन रोहन ने कहा था,

     

    “तू इतनी दूर अकेली नहीं जाएगी।”

     

    काव्या को लगा कि भाई उस पर भरोसा नहीं करता।

     

    उसने गुस्से में कहा,

     

    “आपको हमेशा मेरी जिंदगी कंट्रोल करनी होती है।”

     

    रोहन ने कहा,

     

    “मैं सिर्फ चिंता कर रहा हूं।”

     

    “मुझे आपकी चिंता नहीं चाहिए।”

     

    ये शब्द रोहन को बहुत बुरे लगे थे।

     

    उसने गुस्से में कहा,

     

    “ठीक है, जो करना है कर।”

     

    काव्या चली गई।

     

    और उसके बाद दोनों के बीच दूरी बढ़ती चली गई।

     

    फोन कम हुए।

     

    बातें बंद हुईं।

     

    फिर सिर्फ त्योहारों पर औपचारिक संदेश आने लगे।

     

    “हैप्पी रक्षाबंधन।”

     

    बस इतना।

     

    काव्या पत्र को हाथ में लिए माँ के पास गई।

     

    “माँ, ये पत्र?”

     

    माँ का चेहरा बदल गया।

     

    “तुझे कहां मिला?”

     

    “मेरे कमरे में।”

     

    माँ ने धीरे से कहा,

     

    “रोहन ने लिखा था।”

     

    “लेकिन पूरा क्यों नहीं किया?”

     

    माँ की आंखें नम हो गईं।

     

    “उस दिन तुम दोनों का झगड़ा हुआ था।”

     

    काव्या चुप हो गई।

     

    माँ बोलीं,

     

    “उसके बाद वह कई बार तुझे फोन करना चाहता था।”

     

    “तो किया क्यों नहीं?”

     

    “शायद उसे लगा कि तू बात नहीं करना चाहती।”

     

    काव्या ने पत्र को देखा।

     

    “माँ, उसने ये अधूरा क्यों छोड़ दिया?”

     

    माँ ने कहा,

     

    “क्योंकि कभी-कभी इंसान को शब्द नहीं मिलते।”

     

    काव्या की आंखों से आंसू निकल आए।

     

    उस रात वह देर तक सो नहीं सकी।

     

    उसे याद आने लगा कि बचपन में रोहन कैसा था।

     

    जब वह स्कूल जाने से डरती थी तो रोहन उसका बैग उठाता था।

     

    जब उसे गणित नहीं आती थी तो घंटों बैठकर पढ़ाता था।

     

    जब कोई उसे परेशान करता तो सबसे पहले रोहन खड़ा होता।

     

    और फिर वह एक दिन…

     

    एक ही झगड़े में उसे अपना दुश्मन समझ बैठी थी।

     

    अगली सुबह रक्षाबंधन था।

     

    काव्या ने पूजा की थाली तैयार की।

     

    उसने माँ से पूछा,

     

    “रोहन उठ गया?”

     

    माँ ने कहा,

     

    “हां, बाहर बैठा है।”

     

    काव्या के कदम रुक गए।

     

    दिल तेजी से धड़कने लगा।

     

    वह थाली लेकर बाहर गई।

     

    रोहन सोफे पर बैठा था।

     

    उसकी नजर काव्या पर पड़ी।

     

    दोनों कुछ सेकंड तक चुप रहे।

     

    रोहन ने धीरे से कहा,

     

    “राखी बांधेगी?”

     

    काव्या की आंखें भर आईं।

     

    वह उसके सामने बैठ गई।

     

    तिलक लगाया।

     

    राखी उठाई।

     

    लेकिन उसका हाथ कांप रहा था।

     

    रोहन ने पूछा,

     

    “क्या हुआ?”

     

    काव्या ने धीरे से कहा,

     

    “मुझे एक पत्र मिला।”

     

    रोहन का चेहरा बदल गया।

     

    “कौन-सा पत्र?”

     

    काव्या ने अपने बैग से वह पत्र निकाला।

     

    रोहन उसे देखते ही चुप हो गया।

     

    काव्या ने पूछा,

     

    “आपने इसे पूरा क्यों नहीं लिखा?”

     

    रोहन ने नजरें झुका लीं।

     

    “अब उस बात को छोड़ दे।”

     

    “नहीं।”

     

    काव्या की आंखों से आंसू निकल आए।

     

    “आज जवाब चाहिए।”

     

    रोहन कुछ देर चुप रहा।

     

    फिर बोला,

     

    “उस दिन मुझे बहुत गुस्सा आया था।”

     

    “मुझे भी।”

     

    “लेकिन उसके बाद…”

     

    वह रुक गया।

     

    “क्या?”

     

    रोहन ने कहा,

     

    “मुझे डर लगने लगा था।”

     

    काव्या हैरान हुई।

     

    “मुझसे?”

     

    “नहीं।”

     

    उसने धीरे से कहा,

     

    “तुझे खोने से।”

     

    काव्या की आंखें भर आईं।

     

    रोहन ने कहा,

     

    “तू दूर जा रही थी। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि कैसे कहूं कि मुझे तेरी चिंता है।”

     

    “तो आपने गुस्सा क्यों किया?”

     

    रोहन हल्का-सा हंस पड़ा।

     

    “क्योंकि मैं समझदार भाई नहीं हूं।”

     

    काव्या की आंखों से आंसू निकल आए।

     

    “और मैं भी समझदार बहन नहीं थी।”

     

    दोनों कुछ पल चुप रहे।

     

    फिर काव्या ने पूछा,

     

    “पत्र पूरा करोगे?”

     

    रोहन ने उसे देखा।

     

    “अभी?”

     

    काव्या ने सिर हिलाया।

     

    रोहन ने पत्र हाथ में लिया।

     

    उसके आखिरी शब्द पढ़े—

     

    “अगर कभी ये पत्र पढ़े तो बस इतना समझ लेना कि…”

     

    वह रुक गया।

     

    फिर काव्या की आंखों में देखकर बोला,

     

    “…मैं तुझसे कभी नाराज नहीं था। मैं बस ये नहीं जानता था कि तुझे अपनी जिंदगी में कैसे रोकूं, बिना तेरी उड़ान रोके।”

     

    काव्या रो पड़ी।

     

    उसने राखी नीचे रख दी और भाई के गले लग गई।

     

    रोहन ने कहा,

     

    “अरे, राखी तो बांध।”

     

    काव्या रोते हुए हंस पड़ी।

     

    “पहले पांच मिनट ऐसे ही रहने दो।”

     

    माँ दूर खड़ी रो रही थीं।

     

    कुछ देर बाद काव्या फिर भाई के सामने बैठी।

     

    उसने उसकी कलाई पर राखी बांधी।

     

    फिर कहा,

     

    “इस बार मुझे गिफ्ट नहीं चाहिए।”

     

    रोहन ने पूछा,

     

    “तो?”

     

    काव्या ने अधूरा पत्र उसकी तरफ बढ़ाया।

     

    “इसे संभालकर रखिए।”

     

    “क्यों?”

     

    “ताकि जब भी हम फिर से बेवकूफी में नाराज हों…”

     

    रोहन हंस पड़ा।

     

    “तो?”

     

    “तो इसे पढ़ लें।”

     

    रोहन ने कहा,

     

    “ठीक है।”

     

    काव्या ने पूछा,

     

    “और अगर फिर भी गुस्सा रहा?”

     

    रोहन ने कहा,

     

    “तो तू राखी लेकर आ जाना।”

     

    काव्या हंस पड़ी।

     

    “हर समस्या का इलाज राखी?”

     

    रोहन ने कहा,

     

    “हमारे लिए तो हां।”

     

    उस दिन दोनों ने साथ बैठकर खाना खाया।

     

    तीन साल बाद घर में फिर से वही शोर था।

     

    माँ बार-बार दोनों को देख रही थीं।

     

    उन्हें विश्वास नहीं हो रहा था कि तीन साल की चुप्पी एक राखी के दिन खत्म हो सकती है।

     

    शाम को काव्या वापस जाने लगी।

     

    रोहन ने पूछा,

     

    “कब आएगी?”

     

    काव्या मुस्कुराई।

     

    “फोन करूंगी।”

     

    रोहन ने तुरंत कहा,

     

    “फोन मत करना।”

     

    काव्या हैरान हुई।

     

    “क्यों?”

     

    रोहन मुस्कुराया।

     

    “सीधे आ जाना।”

     

    काव्या हंस पड़ी।

     

    “ठीक है।”

     

    फिर उसने भाई की कलाई पर बंधी राखी को देखा।

     

    वह साधारण-सी थी।

     

    लेकिन इस बार उस राखी ने सिर्फ एक वादा नहीं बांधा था।

     

    उसने तीन साल की नाराजगी खोल दी थी।

     

    घर से बाहर निकलते समय काव्या ने पीछे मुड़कर देखा।

     

    रोहन दरवाजे पर खड़ा था।

     

    काव्या ने हाथ हिलाया।

     

    रोहन ने कहा,

     

    “काव्या!”

     

    “क्या?”

     

    रोहन ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “पत्र पूरा हो गया।”

     

    काव्या की आंखें नम हो गईं।

     

    वह मुस्कुराई और बोली,

     

    “हां भैया।”

     

    उस दिन काव्या को समझ आया कि—

     

    कुछ रिश्ते टूटते नहीं हैं, बस बातों के बीच चुप्पी जमा हो जाती है।

     

    और कभी-कभी…

     

    उसे हटाने के लिए बस एक राखी, एक गले लगना और कुछ सच्चे शब्द काफी होते हैं।

     

    क्योंकि रक्षाबंधन सिर्फ कलाई पर धागा बांधने का दिन नहीं है।

     

    यह उन रिश्तों को फिर से जोड़ने का दिन भी है, जिनमें प्यार तो होता है… लेकिन बातें अधूरी रह जाती हैं।

  • रक्षाबंधन

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

    रक्षाबंधन की सुबह कबीर अपने कमरे में बैठा पुरानी फाइलों को देख रहा था।

     

    बाहर से उसकी छोटी बहन सिया की आवाज आई—

     

    “भैया! जल्दी बाहर आओ, राखी बांधनी है।”

     

    कबीर ने जल्दी से फाइल बंद कर दी।

     

    “आ रहा हूं।”

     

    सिया पूजा की थाली लेकर बैठी थी। उसके चेहरे पर हमेशा की तरह शरारती मुस्कान थी।

     

    “आज भी देर से आए।”

     

    कबीर ने हंसते हुए कहा,

     

    “अरे मैडम, भाई हूं आपका, कोई स्कूल का बच्चा नहीं।”

     

    सिया ने कहा,

     

    “मेरे लिए तो आप हमेशा बच्चे ही रहोगे।”

     

    कबीर बैठ गया।

     

    सिया ने तिलक लगाया, मिठाई खिलाई और उसकी कलाई पर सुंदर-सी राखी बांध दी।

     

    फिर वह तुरंत बोली,

     

    “अब गिफ्ट दो।”

     

    कबीर ने जेब से एक छोटा-सा लिफाफा निकाला।

     

    “लो।”

     

    सिया ने खोला।

     

    उसमें पैसे थे।

     

    सिया ने लिफाफा वापस कर दिया।

     

    “नहीं चाहिए।”

     

    कबीर हैरान हुआ।

     

    “हर साल तो गिफ्ट के पीछे पड़ जाती है।”

     

    सिया ने कहा,

     

    “इस बार मुझे कुछ नहीं चाहिए।”

     

    “तबियत तो ठीक है?”

     

    सिया हंस पड़ी।

     

    “बिल्कुल।”

     

    कबीर ने कहा,

     

    “फिर क्या बात है?”

     

    सिया ने उसकी आंखों में देखते हुए कहा,

     

    “इस बार गिफ्ट मैं दूंगी।”

     

    कबीर हंस पड़ा।

     

    “मुझे?”

     

    “हां।”

     

    “और क्या देगी?”

     

    सिया उठकर अपने कमरे में गई।

     

    कुछ देर बाद वह एक बड़ा-सा लिफाफा लेकर आई।

     

    उसने कबीर के हाथ में रखा।

     

    “खोलो।”

     

    कबीर ने लिफाफा खोला।

     

    अंदर कुछ कागज थे।

     

    उन्हें पढ़ते ही उसका चेहरा बदल गया।

     

    वह कुछ देर तक चुप रहा।

     

    फिर उसने सिया की तरफ देखा।

     

    “ये कहां से मिले?”

     

    सिया मुस्कुराई।

     

    “घर में।”

     

    कबीर के हाथ कांपने लगे।

     

    वे कागज उसके पुराने कॉलेज एडमिशन के थे।

     

    कई साल पहले कबीर को संगीत की पढ़ाई के लिए एक बड़े संस्थान में दाखिला मिला था।

     

    वह बचपन से गायक बनना चाहता था।

     

    उसे गाना बहुत पसंद था।

     

    स्कूल के हर कार्यक्रम में वह हिस्सा लेता।

     

    जब भी घर में कोई मेहमान आता, सिया तुरंत कहती—

     

    “भैया, गाना सुनाओ ना।”

     

    कबीर हंसकर कहता,

     

    “तू मेरी मैनेजर है क्या?”

     

    सिया गर्व से कहती,

     

    “हां।”

     

    लेकिन वह सपना कभी पूरा नहीं हुआ।

     

    उसी समय पिता का काम बंद हो गया था।

     

    घर की आर्थिक स्थिति खराब हो गई।

     

    सिया की पढ़ाई भी चल रही थी।

     

    कबीर ने बिना किसी से ज्यादा बात किए अपना दाखिला छोड़ दिया।

     

    वह नौकरी करने लगा।

     

    कुछ सालों में पिता की हालत सुधरी, सिया ने पढ़ाई पूरी की और नौकरी करने लगी।

     

    लेकिन कबीर ने फिर कभी अपने सपने की बात नहीं की।

     

    वह कहता,

     

    “अब ये सब बचपन की बातें हैं।”

     

    सिया को हमेशा लगता था कि भाई ने सच में अपने सपने भुला दिए हैं।

     

    लेकिन एक दिन उसने कबीर को कमरे में अकेले पुराने गाने सुनते देखा।

     

    उसकी आंखें बंद थीं।

     

    और वह धीरे-धीरे गुनगुना रहा था।

     

    सिया वहीं रुक गई।

     

    उसे समझ आ गया—

     

    सपना खत्म नहीं हुआ था। बस भाई ने उसे छिपा दिया था।

     

    उसने चुपचाप कबीर के पुराने कागज ढूंढे।

     

    और महीनों तक जानकारी जुटाती रही।

     

    उसने एक स्थानीय संगीत प्रशिक्षण कार्यक्रम के बारे में पता किया।

     

    आवेदन किया।

     

    कबीर की पुरानी रिकॉर्डिंग ढूंढी।

     

    उसकी अनुमति के बिना कुछ भी अंतिम नहीं किया, लेकिन जरूरी जानकारी के लिए पिता से मदद ली।

     

    और आखिरकार…

     

    कबीर का चयन एक विशेष संगीत प्रशिक्षण कार्यक्रम के लिए हो गया।

     

    सिया ने उसकी आंखों में देखते हुए कहा,

     

    “भैया, लिफाफे में आगे का कागज भी देखो।”

     

    कबीर ने दूसरा पत्र निकाला।

     

    उसमें चयन की जानकारी थी।

     

    उसने धीरे से पढ़ा।

     

    फिर दोबारा पढ़ा।

     

    “सिया…”

     

    उसकी आवाज रुक गई।

     

    “ये क्या है?”

     

    सिया ने कहा,

     

    “आपका राखी का गिफ्ट।”

     

    कबीर ने तुरंत कागज वापस कर दिए।

     

    “नहीं।”

     

    सिया ने पूछा,

     

    “क्यों?”

     

    “मैं अब ये नहीं कर सकता।”

     

    “क्यों नहीं?”

     

    “बहुत देर हो गई।”

     

    सिया ने कहा,

     

    “किसके लिए?”

     

    “सपनों के लिए।”

     

    सिया का चेहरा गंभीर हो गया।

     

    “भैया, सपनों की कोई एक्सपायरी डेट नहीं होती।”

     

    कबीर हल्का-सा हंस पड़ा।

     

    “तू बहुत बड़ी बातें करने लगी है।”

     

    सिया ने कहा,

     

    “क्योंकि आपने छोटी बहन को बड़ा होने दिया।”

     

    कबीर चुप हो गया।

     

    सिया की आंखें भर आईं।

     

    “आपको याद है, जब मैं स्कूल में रो रही थी कि मुझे आगे पढ़ने नहीं जाना?”

     

    कबीर ने सिर हिलाया।

     

    “आपने कहा था—डर के कारण अपने सपने मत छोड़ना।”

     

    कबीर चुप रहा।

     

    “आज वही बात आपको वापस कर रही हूं।”

     

    कबीर ने नजरें झुका लीं।

     

    “लेकिन घर?”

     

    सिया ने तुरंत कहा,

     

    “घर संभाल लेंगे।”

     

    “पैसे?”

     

    “मैं हूं।”

     

    कबीर ने उसकी तरफ देखा।

     

    सिया मुस्कुराई।

     

    “हर बार सिर्फ भाई ही क्यों कहे—मैं हूं ना?”

     

    उसकी आंखों से आंसू निकल आए।

     

    “आज मुझे कहने दो।”

     

    कबीर कुछ नहीं बोल पाया।

     

    सिया ने उसके हाथ पकड़ लिए।

     

    “भैया, आपने मेरी पढ़ाई के लिए अपना सपना छोड़ा था।”

     

    कबीर ने कहा,

     

    “मैंने अपनी मर्जी से किया था।”

     

    “हां।”

     

    “तू बोझ नहीं थी।”

     

    “मुझे पता है।”

     

    सिया की आवाज कांपने लगी।

     

    “लेकिन अब मुझे अपने भाई को देखकर ये नहीं सोचना कि उसने मेरे लिए कुछ अधूरा छोड़ दिया।”

     

    कबीर की आंखें भर आईं।

     

    वह बोला,

     

    “मैंने कभी तुझसे ये उम्मीद नहीं रखी।”

     

    सिया ने कहा,

     

    “ये आपकी उम्मीद नहीं है।”

     

    उसने उसकी राखी वाली कलाई को देखा।

     

    “ये मेरी राखी का वादा है।”

     

    कुछ देर तक कमरे में बिल्कुल शांति थी।

     

    फिर कबीर ने धीरे से पूछा,

     

    “अगर मैं असफल हो गया तो?”

     

    सिया ने कहा,

     

    “तो फिर कोशिश करोगे।”

     

    “और अगर लोग हंसेंगे?”

     

    “तो मैं भी हंस दूंगी।”

     

    कबीर हंस पड़ा।

     

    “बहुत अच्छी बहन है तू।”

     

    सिया ने तुरंत कहा,

     

    “अब पता चला?”

     

    दोनों हंस पड़े।

     

    लेकिन कबीर की आंखों में अब भी आंसू थे।

     

    वह उठकर अपने कमरे में गया।

     

    कुछ देर बाद वह हाथ में एक पुराना माइक लेकर आया।

     

    वह खिलौने जैसा छोटा माइक था।

     

    सिया ने उसे देखते ही पहचान लिया।

     

    “ये अभी तक रखा है?”

     

    कबीर ने कहा,

     

    “तूने दिया था।”

     

    सिया को याद आया।

     

    बचपन में उसने अपनी गुल्लक तोड़कर कबीर के लिए वह माइक खरीदा था।

     

    तब कबीर ने कहा था—

     

    “जब मैं बड़ा गायक बनूंगा, तो पहला गाना तुझे सुनाऊंगा।”

     

    सिया की आंखें भर आईं।

     

    “आपने अपना वादा भूल गए थे।”

     

    कबीर ने माइक की तरफ देखते हुए कहा,

     

    “शायद नहीं।”

     

    सिया ने पूछा,

     

    “फिर?”

     

    कबीर ने उसकी तरफ देखा।

     

    “शायद मुझे याद दिलाने के लिए आज की राखी का इंतजार था।”

     

    कुछ महीनों बाद कबीर ने संगीत की ट्रेनिंग शुरू कर दी।

     

    शुरुआत आसान नहीं थी।

     

    काम और ट्रेनिंग साथ संभालनी पड़ती थी।

     

    कभी वह थक जाता।

     

    कभी कहता,

     

    “छोड़ देता हूं।”

     

    तब सिया कहती,

     

    “राखी देखो।”

     

    कबीर अपनी कलाई की तरफ देखता।

     

    “हर बार यही कहेगी?”

     

    “हां।”

     

    “कब तक?”

     

    “जब तक आप खुद अपने सपने से भागना बंद नहीं कर देते।”

     

    धीरे-धीरे कबीर फिर से बदलने लगा।

     

    उसकी आवाज में पहले जैसा आत्मविश्वास लौट आया।

     

    वह छोटे कार्यक्रमों में गाने लगा।

     

    एक दिन उसने घर आकर कहा,

     

    “सिया!”

     

    “क्या हुआ?”

     

    “आज मुझे पहला भुगतान मिला।”

     

    सिया दौड़कर उसके पास आई।

     

    “सच?”

     

    कबीर ने पैसे उसकी तरफ बढ़ाए।

     

    “तेरा गिफ्ट।”

     

    सिया ने तुरंत मना कर दिया।

     

    “नहीं।”

     

    कबीर ने पूछा,

     

    “क्यों?”

     

    सिया ने कहा,

     

    “मुझे पैसे नहीं चाहिए।”

     

    “तो?”

     

    सिया मुस्कुराई।

     

    “वही सुनना है जो आपने बचपन में कहा था।”

     

    कबीर समझ गया।

     

    उसने कहा,

     

    “पहला गाना?”

     

    सिया ने सिर हिलाया।

     

    कबीर ने मुस्कुराते हुए कहा,

     

    “तैयार हो मैनेजर?”

     

    सिया हंस पड़ी।

     

    “हमेशा।”

     

    कुछ दिनों बाद घर की छत पर दोनों बैठे थे।

     

    सिया ने वही पुराना खिलौना माइक उसके हाथ में दिया।

     

    “लो।”

     

    कबीर ने कहा,

     

    “ये अब भी संभालकर रखा है?”

     

    “क्योंकि मुझे पता था, एक दिन इसकी जरूरत पड़ेगी।”

     

    कबीर ने गाना शुरू किया।

     

    वह कोई बड़ा मंच नहीं था।

     

    न सामने हजारों लोग थे।

     

    बस एक बहन थी।

     

    और उसका भाई था।

     

    गाना खत्म हुआ तो सिया की आंखें नम थीं।

     

    उसने कहा,

     

    “भैया, आज मेरा राखी का गिफ्ट पूरा हुआ।”

     

    कबीर ने पूछा,

     

    “कैसे?”

     

    सिया ने कहा,

     

    “क्योंकि इस बार आपने मुझे कुछ खरीदा हुआ नहीं दिया।”

     

    कबीर मुस्कुराया।

     

    “तो क्या दिया?”

     

    सिया ने उसकी कलाई पर बंधी राखी को छूते हुए कहा,

     

    “आपने मुझे मेरा वही पुराना भाई वापस दे दिया, जिसके पास सपने थे।”

     

    कबीर की आंखें नम हो गईं।

     

    उसने बहन के सिर पर हाथ रखा।

     

    उस दिन दोनों को समझ आया कि रक्षाबंधन सिर्फ रक्षा का त्योहार नहीं है।

     

    कभी-कभी एक बहन भी अपने भाई के सपनों की रक्षा करती है।

     

    और कभी…

     

    राखी का सबसे बड़ा गिफ्ट कोई चीज नहीं होती।

     

    वह किसी अपने को फिर से खुद पर विश्वास करना सिखाना होता है।

  • रक्षाबंधन का दिन

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

    रक्षाबंधन का दिन था।

     

    घर में सुबह से ही हलचल थी। माँ रसोई में मिठाई तैयार कर रही थीं और रिया अपने कमरे में बैठी राखी की थाली सजा रही थी।

     

    लेकिन उसके चेहरे पर खुशी नहीं थी।

     

    उसकी सहेली ने सुबह ही उसे अपनी राखी का गिफ्ट दिखाया था।

     

    महंगा फोन।

     

    नई घड़ी।

     

    कपड़े।

     

    और भी बहुत कुछ।

     

    रिया ने बस मुस्कुराकर कहा था,

     

    “बहुत अच्छा है।”

     

    लेकिन उसके मन में एक पुरानी बात फिर से आ गई।

     

    उसके भाई आरव ने उसे कभी राखी पर कोई गिफ्ट नहीं दिया था।

     

    कभी चॉकलेट नहीं।

     

    कभी कोई कपड़ा नहीं।

     

    कभी कोई खास चीज नहीं।

     

    रिया बचपन से हर साल उसे राखी बांधती थी और आरव बस इतना कहता था,

     

    “धन्यवाद, छोटी।”

     

    फिर चला जाता।

     

    रिया को यह बात हमेशा चुभती थी।

     

    वह सोचती थी,

     

    “शायद भैया को मेरी उतनी परवाह नहीं है।”

     

    उस दिन भी आरव सुबह से घर पर नहीं था।

     

    रिया ने माँ से पूछा,

     

    “भैया कहां गए हैं?”

     

    माँ ने कहा,

     

    “काम से बाहर गए हैं।”

     

    रिया ने नाराज़ होकर कहा,

     

    “आज के दिन भी?”

     

    माँ ने कुछ जवाब नहीं दिया।

     

    दोपहर हो गई।

     

    रिया की सहेलियों ने अपनी तस्वीरें भेजनी शुरू कर दीं।

     

    किसी ने लिखा—

     

    “मेरे भाई ने मुझे सरप्राइज दिया!”

     

    किसी ने लिखा—

     

    “बेस्ट भाई!”

     

    रिया ने मोबाइल बंद कर दिया।

     

    उसकी आंखें नम हो गईं।

     

    वह धीरे से बोली,

     

    “सबके भाई ऐसे होते हैं… बस मेरे नहीं।”

     

    माँ दरवाजे पर खड़ी थीं।

     

    उन्होंने सुन लिया।

     

    “ऐसा क्यों कह रही है?”

     

    रिया ने कहा,

     

    “क्योंकि सच है।”

     

    माँ उसके पास बैठ गईं।

     

    “तेरे भैया तुझसे बहुत प्यार करते हैं।”

     

    रिया हंस पड़ी।

     

    “कैसा प्यार, माँ?”

     

    माँ चुप रहीं।

     

    रिया ने कहा,

     

    “उन्होंने कभी मुझे महसूस ही नहीं होने दिया।”

     

    “हर कोई प्यार एक जैसा नहीं दिखाता बेटा।”

     

    रिया ने नाराज़ होकर कहा,

     

    “लेकिन कभी तो दिखाना चाहिए।”

     

    शाम होने लगी।

     

    आरव अभी तक घर नहीं आया था।

     

    रिया ने राखी की थाली एक तरफ रख दी।

     

    “अब नहीं बांधूंगी।”

     

    माँ ने पूछा,

     

    “क्यों?”

     

    “जब उन्हें फर्क ही नहीं पड़ता तो मुझे क्यों पड़े?”

     

    तभी दरवाजे की घंटी बजी।

     

    रिया तेजी से बाहर आई।

     

    सामने आरव खड़ा था।

     

    उसके कपड़े धूल से भरे थे।

     

    चेहरे पर थकान थी।

     

    हाथ में कोई गिफ्ट नहीं था।

     

    रिया ने उसे देखकर मुंह फेर लिया।

     

    आरव ने पूछा,

     

    “राखी नहीं बांधेगी?”

     

    रिया ने कहा,

     

    “आपको क्या फर्क पड़ता है?”

     

    आरव कुछ सेकंड चुप रहा।

     

    “फर्क पड़ता है।”

     

    रिया ने तुरंत उसकी तरफ देखा।

     

    “कब?”

     

    आरव ने जवाब नहीं दिया।

     

    रिया ने गुस्से में कहा,

     

    “आपको कभी कुछ देना नहीं होता। कभी कोई गिफ्ट नहीं। कभी कोई सरप्राइज नहीं।”

     

    आरव शांत खड़ा रहा।

     

    रिया की आवाज भर आई।

     

    “मैं आपकी बहन हूं या बस राखी बांधने वाली कोई लड़की?”

     

    यह सुनकर माँ की आंखें भर आईं।

     

    आरव ने धीरे से कहा,

     

    “रिया, पहले राखी बांध दे।”

     

    रिया ने कहा,

     

    “नहीं।”

     

    आरव पहली बार थोड़ा गंभीर हुआ।

     

    “प्लीज।”

     

    रिया चुप हो गई।

     

    माँ ने थाली उसकी तरफ बढ़ाई।

     

    रिया ने बिना कुछ बोले तिलक लगाया और राखी बांध दी।

     

    आरव ने अपनी कलाई को कुछ देर देखा।

     

    फिर अपनी जेब से एक पुराना-सा कागज निकाला।

     

    रिया ने पूछा,

     

    “ये क्या है?”

     

    आरव ने वह कागज उसके हाथ में रख दिया।

     

    रिया ने पढ़ा।

     

    वह एक कोचिंग संस्थान की फीस की रसीद थी।

     

    रिया हैरान हुई।

     

    “ये मेरी कोचिंग की फीस है।”

     

    आरव ने सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

    “लेकिन ये तो पापा ने दी थी।”

     

    माँ ने धीरे से कहा,

     

    “नहीं बेटा।”

     

    रिया ने माँ की तरफ देखा।

     

    आरव बोला,

     

    “पापा की दुकान में उस समय बहुत परेशानी थी।”

     

    रिया का चेहरा बदल गया।

     

    “तो फीस किसने दी?”

     

    आरव चुप रहा।

     

    रिया ने रसीद पर नाम देखा।

     

    आरव शर्मा।

     

    रिया के हाथ कांपने लगे।

     

    “आपने?”

     

    आरव ने हल्की आवाज में कहा,

     

    “हां।”

     

    रिया को याद आया कि उस साल आरव ने नया फोन खरीदने की बहुत इच्छा जताई थी।

     

    लेकिन उसने कभी नहीं खरीदा।

     

    रिया ने पूछा,

     

    “लेकिन आपने कहा था कि आपको फोन पसंद नहीं आया।”

     

    आरव मुस्कुराया।

     

    “झूठ बोला था।”

     

    रिया की आंखों में आंसू आ गए।

     

    आरव ने जेब से एक और कागज निकाला।

     

    यह उसकी कॉलेज की फीस की रसीद थी।

     

    फिर एक और।

     

    उसकी किताबों की।

     

    उसके प्रतियोगी फॉर्म की।

     

    रिया अब कुछ बोल नहीं पा रही थी।

     

    “ये सब… आपने किया?”

     

    आरव ने कहा,

     

    “तू पढ़ना चाहती थी।”

     

    “लेकिन आप?”

     

    “मैं काम कर रहा था।”

     

    रिया की आंखों से आंसू निकल आए।

     

    “आपने मुझे कभी बताया क्यों नहीं?”

     

    आरव ने उसकी कलाई की तरफ देखा।

     

    “क्योंकि मैं चाहता था कि तू ये कभी महसूस न करे कि तेरी पढ़ाई किसी पर बोझ है।”

     

    रिया रो पड़ी।

     

    उसे अचानक पिछले कई साल याद आने लगे।

     

    हर बार जब उसे किसी चीज की जरूरत होती, माँ कहतीं—

     

    “देखते हैं।”

     

    और कुछ दिनों बाद वह चीज उसके पास होती।

     

    रिया सोचती थी घर में सब सामान्य है।

     

    उसे नहीं पता था कि उसका भाई उसके लिए अपनी जरूरतें पीछे करता रहा।

     

    रिया ने रोते हुए कहा,

     

    “लेकिन राखी पर आपने मुझे कभी गिफ्ट नहीं दिया।”

     

    आरव ने पहली बार हल्के से हंसकर कहा,

     

    “इसका जवाब मेरे पास है।”

     

    वह अंदर गया।

     

    कुछ देर बाद एक छोटा-सा डिब्बा लेकर आया।

     

    रिया ने पूछा,

     

    “ये क्या है?”

     

    “खोल।”

     

    रिया ने डिब्बा खोला।

     

    अंदर बहुत सारी छोटी-छोटी चीजें थीं।

     

    एक बचपन की तस्वीर।

     

    उसकी टूटी हुई पेंसिल का छोटा हिस्सा।

     

    एक पुराना हेयर क्लिप।

     

    स्कूल की एक छोटी फोटो।

     

    रिया की बनाई हुई राखियां।

     

    हर साल की।

     

    रिया हैरान होकर बैठ गई।

     

    “आपने ये सब संभालकर रखा?”

     

    आरव ने कहा,

     

    “हां।”

     

    “क्यों?”

     

    “पता नहीं।”

     

    रिया की आंखों से आंसू बहने लगे।

     

    आरव ने धीरे से कहा,

     

    “मैं गिफ्ट खरीदने में अच्छा नहीं हूं।”

     

    रिया हल्का-सा हंस पड़ी।

     

    “तो?”

     

    “लेकिन चीजें संभालकर रखने में अच्छा हूं।”

     

    रिया ने डिब्बे में रखी राखियों को छुआ।

     

    हर साल की राखी।

     

    किसी का धागा टूट चुका था।

     

    किसी का रंग फीका पड़ गया था।

     

    लेकिन आरव ने एक भी नहीं फेंकी थी।

     

    रिया ने पूछा,

     

    “भैया, आपने मुझे कभी बताया क्यों नहीं कि आप ये सब रखते हो?”

     

    आरव ने कहा,

     

    “तूने कभी पूछा नहीं।”

     

    रिया ने उसकी तरफ देखा।

     

    “मैंने पूछा था… कि आप मुझसे प्यार करते हो या नहीं।”

     

    आरव कुछ पल चुप रहा।

     

    फिर बोला,

     

    “तब मैं क्या बोला था?”

     

    रिया को याद आया।

     

    वह शायद दस साल की थी।

     

    उसने गुस्से में पूछा था,

     

    “भैया, आप मुझे प्यार करते हो?”

     

    आरव ने जवाब दिया था—

     

    “बहुत सवाल करती है।”

     

    उस समय रिया रो पड़ी थी।

     

    आज आरव ने कहा,

     

    “मुझे उस समय कहना चाहिए था।”

     

    रिया की आंखें भर आईं।

     

    “तो आज कहो।”

     

    आरव उसकी तरफ देखने लगा।

     

    रिया ने फिर कहा,

     

    “आज साफ-साफ कहो।”

     

    आरव ने हल्की मुस्कान के साथ कहा,

     

    “हां रिया।”

     

    उसकी आवाज धीमी थी।

     

    “मैं तुझसे बहुत प्यार करता हूं।”

     

    रिया फूटकर रो पड़ी।

     

    वह अपने भाई के गले लग गई।

     

    आरव ने उसके सिर पर हाथ रखा।

     

    रिया रोते हुए बोली,

     

    “आप बहुत बुरे हो।”

     

    आरव हंस पड़ा।

     

    “अब क्या कर दिया?”

     

    “पहले क्यों नहीं बताया?”

     

    “तूने फिर पूछा नहीं।”

     

    रिया ने पीछे हटकर कहा,

     

    “अब पूछूंगी भी नहीं।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि अब पता है।”

     

    आरव मुस्कुराया।

     

    रिया ने उसके हाथ में एक छोटा-सा डिब्बा रखा।

     

    “ये आपके लिए।”

     

    आरव ने खोला।

     

    अंदर एक सुंदर-सी घड़ी थी।

     

    आरव ने पूछा,

     

    “क्यों?”

     

    रिया ने कहा,

     

    “क्योंकि हर रक्षाबंधन पर सिर्फ भाई ही नहीं देता।”

     

    आरव चुप हो गया।

     

    रिया ने कहा,

     

    “इस बार मेरी बारी है।”

     

    आरव की आंखें नम हो गईं।

     

    रिया ने उसकी पुरानी राखियों वाले डिब्बे को देखते हुए कहा,

     

    “भैया, आप गिफ्ट देना नहीं जानते थे…”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “तो?”

     

    रिया मुस्कुराई।

     

    “आपने मुझे सबसे बड़ा गिफ्ट दिया है—बिना बताए हमेशा मेरे साथ रहना।”

     

    उस दिन रिया को कोई महंगा फोन नहीं मिला।

     

    न कोई चमकदार गिफ्ट।

     

    लेकिन उसे एक ऐसा सच मिल गया, जो किसी भी तोहफे से ज्यादा कीमती था।

     

    उसे समझ आ गया कि—

     

    हर प्यार बोलकर नहीं दिखाया जाता।

     

    कुछ लोग हमें “आई लव यू” नहीं कहते।

     

    वे हमारी फीस भरते हैं।

     

    हमारी जरूरतें पूरी करते हैं।

     

    हमारी छोटी-छोटी बातें याद रखते हैं।

     

    और हमारी बांधी हुई राखियां सालों तक संभालकर रखते हैं।

     

    उस शाम रिया ने भाई की कलाई पर बंधी राखी को देखा और मुस्कुराई।

     

    उसे आखिरकार अपना रक्षाबंधन का गिफ्ट मिल गया था।

     

    एक ऐसा भाई, जिसने शायद कभी प्यार के बड़े-बड़े शब्द नहीं बोले… लेकिन अपनी हर छोटी-बड़ी चीज में बहन के लिए प्यार छिपाकर रखा।

  • इस बार राखी मत बांधना

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

     

    इस बार राखी मत बांधना

    रक्षाबंधन से दो दिन पहले तन्वी के मोबाइल पर उसके भाई विक्रम का फोन आया।

     

    “तन्वी, इस बार घर मत आना।”

     

    तन्वी ने सोचा शायद उसने गलत सुना है।

     

    “क्या कहा आपने?”

     

    विक्रम की आवाज दूसरी तरफ से बिल्कुल शांत थी।

     

    “इस बार राखी मत बांधना।”

     

    तन्वी कुछ सेकंड तक चुप रही।

     

    फिर उसने धीरे से पूछा,

     

    “भैया… सब ठीक है?”

     

    “हां।”

     

    “तो फिर ऐसी बात क्यों कर रहे हो?”

     

    विक्रम ने कहा,

     

    “बस, इस बार नहीं।”

     

    और उसने फोन काट दिया।

     

    तन्वी देर तक मोबाइल को देखती रही।

     

    उसके लिए यह बात समझना मुश्किल था।

     

    विक्रम कभी ऐसा नहीं था।

     

    वह हर साल रक्षाबंधन से कई दिन पहले ही पूछना शुरू कर देता था—

     

    “इस बार कितनी राखियां खरीद रही है?”

     

    तन्वी कहती,

     

    “एक ही भाई है मेरा।”

     

    विक्रम जवाब देता,

     

    “तो एक राखी से क्या होगा? मुझे तो कम से कम पांच चाहिए।”

     

    “पांच क्यों?”

     

    “एक हाथ के लिए, एक दूसरे हाथ के लिए और बाकी संभालकर रखूंगा।”

     

    तन्वी हंस पड़ती।

     

    लेकिन इस बार…

     

    वही भाई कह रहा था—

     

    “राखी मत बांधना।”

     

    तन्वी ने कई बार फोन किया।

     

    विक्रम ने नहीं उठाया।

     

    उसने भाभी को फोन किया।

     

    भाभी ने भी बस इतना कहा,

     

    “तन्वी, भैया की बात मान लेना।”

     

    अब तन्वी और परेशान हो गई।

     

    उसने माँ से पूछा।

     

    माँ कुछ पल चुप रहीं।

     

    “शायद उसे थोड़ा समय चाहिए।”

     

    “लेकिन क्यों?”

     

    माँ ने जवाब नहीं दिया।

     

    तन्वी के मन में कई सवाल थे।

     

    क्या उसने कुछ गलत कहा था?

     

    क्या भैया उससे नाराज थे?

     

    क्या घर में कोई परेशानी थी?

     

    लेकिन किसी ने उसे कुछ नहीं बताया।

     

    रक्षाबंधन की सुबह तन्वी ने वही किया जो वह हर साल करती थी।

     

    सुबह जल्दी उठी।

     

    नहाई।

     

    नई ड्रेस पहनी।

     

    पूजा की थाली सजाई।

     

    और अपने भाई के लिए राखी निकाली।

     

    माँ ने उसे देखकर पूछा,

     

    “तू जा रही है?”

     

    तन्वी ने कहा,

     

    “हां।”

     

    “लेकिन विक्रम ने मना किया है।”

     

    तन्वी की आंखें भर आईं।

     

    “माँ, अगर मैं आज नहीं गई तो शायद जिंदगी भर पछताऊंगी कि मैंने कोशिश क्यों नहीं की।”

     

    माँ उसे रोक नहीं सकीं।

     

    तन्वी भाई के घर पहुंची।

     

    दरवाजे पर भाभी खड़ी थीं।

     

    उन्हें देखकर तन्वी ने पूछा,

     

    “भैया कहां हैं?”

     

    भाभी ने नजरें झुका लीं।

     

    “अंदर।”

     

    तन्वी तेजी से कमरे की तरफ गई।

     

    दरवाजा आधा खुला था।

     

    अंदर विक्रम खिड़की के पास बैठा था।

     

    तन्वी ने कहा,

     

    “भैया।”

     

    विक्रम ने पलटकर देखा।

     

    उसकी आंखें लाल थीं।

     

    जैसे वह काफी देर से रोया हो।

     

    तन्वी का गुस्सा तुरंत खत्म हो गया।

     

    “क्या हुआ?”

     

    विक्रम ने कहा,

     

    “तुझे आने को मना किया था।”

     

    तन्वी उसके पास बैठ गई।

     

    “पहले बताओ क्या हुआ है।”

     

    विक्रम चुप रहा।

     

    तन्वी ने उसकी कलाई की तरफ देखा।

     

    “आप मुझसे राखी क्यों नहीं बंधवाना चाहते?”

     

    विक्रम ने धीरे से कहा,

     

    “क्योंकि मुझे डर लग रहा है।”

     

    तन्वी चौंक गई।

     

    उसने अपने भाई को कभी डरते हुए नहीं देखा था।

     

    बचपन में जब वह डरती थी तो विक्रम हमेशा कहता था—

     

    “मैं हूं ना।”

     

    आज वही भाई कह रहा था—

     

    “मुझे डर लग रहा है।”

     

    तन्वी ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “किस बात का?”

     

    विक्रम ने बहुत धीमी आवाज में कहा,

     

    “इस बात का कि शायद मैं अब पहले जैसा भाई नहीं रह पाऊंगा।”

     

    तन्वी समझ नहीं पाई।

     

    “मतलब?”

     

    विक्रम ने कमरे के कोने में रखी फाइल की तरफ देखा।

     

    तन्वी ने फाइल उठाई।

     

    उसमें कुछ अस्पताल के कागज थे।

     

    तन्वी ने उन्हें पढ़ने की कोशिश की।

     

    विक्रम ने उसका हाथ रोक लिया।

     

    “नहीं।”

     

    तन्वी ने उसकी आंखों में देखा।

     

    “मुझसे क्या छिपा रहे हो?”

     

    विक्रम ने सिर झुका लिया।

     

    “कुछ समय से मैं ठीक महसूस नहीं कर रहा था। जांच करवाई है।”

     

    तन्वी की आंखें भर आईं।

     

    “तो?”

     

    विक्रम ने कहा,

     

    “डॉक्टर ने इलाज और आराम की बात कही है। अभी बहुत कुछ साफ नहीं है।”

     

    तन्वी की सांस तेज हो गई।

     

    विक्रम ने जल्दी से कहा,

     

    “घबराने की जरूरत नहीं है। इलाज चल रहा है।”

     

    तन्वी की आंखों से आंसू निकल आए।

     

    “तो मुझे बताया क्यों नहीं?”

     

    विक्रम ने कहा,

     

    “क्योंकि मैं नहीं चाहता था कि तू मुझे देखकर डर जाए।”

     

    तन्वी ने कहा,

     

    “और आप अकेले डरते रहेंगे?”

     

    विक्रम चुप रहा।

     

    तन्वी ने उसकी कलाई पकड़ ली।

     

    “भैया, राखी का मतलब जानते हो?”

     

    विक्रम ने हल्की मुस्कान से कहा,

     

    “तू बताएगी?”

     

    “हां।”

     

    तन्वी ने कहा,

     

    “राखी का मतलब सिर्फ ये नहीं कि भाई बहन की रक्षा करेगा।”

     

    विक्रम उसे सुनता रहा।

     

    “रिश्ता एक तरफ से नहीं चलता। अगर आज आपको मेरी जरूरत है तो मैं आपके साथ खड़ी रहूंगी।”

     

    विक्रम की आंखों से आंसू निकल आए।

     

    “लेकिन मैं चाहता था कि तू मुझे कमजोर न देखे।”

     

    तन्वी ने कहा,

     

    “आप मेरे भाई हो, कोई कहानी के हीरो नहीं, जिसे कभी कमजोरी नहीं होती।”

     

    विक्रम की आंखों में पहली बार हल्की मुस्कान आई।

     

    तन्वी ने आगे कहा,

     

    “मुझे मजबूत भाई नहीं चाहिए।”

     

    “तो?”

     

    “मुझे मेरा भाई चाहिए। जैसा भी है, जिस हालत में है, मेरे सामने है।”

     

    विक्रम ने सिर झुका लिया।

     

    तन्वी ने राखी उठाई।

     

    “अब हाथ आगे करो।”

     

    विक्रम ने कहा,

     

    “मैंने मना किया था।”

     

    तन्वी ने उसकी तरफ देखते हुए कहा,

     

    “आज पहली बार आपकी बात नहीं मानूंगी।”

     

    विक्रम ने धीरे से अपनी कलाई आगे कर दी।

     

    तन्वी ने तिलक लगाया।

     

    राखी बांधी।

     

    फिर उसका हाथ दोनों हाथों में लेकर कहा,

     

    “आज इस राखी पर वादा मैं लूंगी।”

     

    विक्रम ने पूछा,

     

    “क्या?”

     

    “अब से कोई परेशानी अकेले नहीं झेलोगे।”

     

    विक्रम चुप रहा।

     

    “वादा करो।”

     

    उसने धीरे से कहा,

     

    “वादा।”

     

    “और एक बात।”

     

    “अब क्या?”

     

    तन्वी ने कहा,

     

    “अगली बार मुझे ये मत कहना कि राखी मत बांधना।”

     

    विक्रम मुस्कुराया।

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि राखी बांधने के लिए भाई का मजबूत होना जरूरी नहीं है।”

     

    उसकी आवाज भर आई।

     

    “बस मेरा भाई होना जरूरी है।”

     

    विक्रम की आंखों से आंसू निकल आए।

     

    उसने बहन को गले लगा लिया।

     

    दोनों देर तक कुछ नहीं बोले।

     

    उस पल किसी को गिफ्ट की जरूरत नहीं थी।

     

    न महंगे कपड़ों की।

     

    न मिठाई की।

     

    बस एक-दूसरे के साथ की जरूरत थी।

     

    कुछ देर बाद भाभी कमरे में आईं।

     

    उनके हाथ में चाय थी।

     

    तन्वी ने कहा,

     

    “भाभी, अब से इनकी सारी बातें मुझे बतानी होंगी।”

     

    भाभी मुस्कुरा दीं।

     

    “ये तो अब तुम्हारे भरोसे हैं।”

     

    विक्रम ने कहा,

     

    “मेरी शिकायत करने के लिए पूरी टीम बन गई।”

     

    तन्वी ने तुरंत कहा,

     

    “और ये टीम बहुत सख्त है।”

     

    तीनों हल्का-सा हंस पड़े।

     

    उस दिन के बाद तन्वी अक्सर भाई के पास जाती।

     

    कभी दोनों पुरानी बातें करते।

     

    कभी बिना किसी बात के चाय पीते।

     

    कभी तन्वी उसे डांटती—

     

    “आराम किया करो।”

     

    विक्रम कहता,

     

    “तू पहले भी इतना आदेश देती थी?”

     

    तन्वी जवाब देती,

     

    “पहले छोटी थी, अब बहन हूं।”

     

    समय के साथ इलाज चलता रहा और परिवार साथ बना रहा।

     

    कुछ महीनों बाद एक दिन विक्रम ने तन्वी को फोन किया।

     

    “छोटी।”

     

    “हां भैया?”

     

    “अगली राखी की तैयारी कर लेना।”

     

    तन्वी मुस्कुराई।

     

    “कितनी चाहिए?”

     

    विक्रम हंस पड़ा।

     

    “पांच।”

     

    “फिर वही?”

     

    “हां।”

     

    “लेकिन क्यों?”

     

    विक्रम ने कहा,

     

    “क्योंकि इस बार समझ गया हूं कि राखी सिर्फ मेरी जिम्मेदारी नहीं है।”

     

    तन्वी चुप हो गई।

     

    विक्रम ने आगे कहा,

     

    “जब मैं कहता था ‘मैं हूं ना’, तब शायद मुझे लगता था कि मुझे हमेशा सबके लिए मजबूत रहना पड़ेगा।”

     

    “और अब?”

     

    “अब पता चला… कभी-कभी किसी अपने को भी कहने देना चाहिए—मैं हूं ना।”

     

    तन्वी की आंखें नम हो गईं।

     

    उसने कहा,

     

    “तो सुनो भैया।”

     

    “हां?”

     

    “मैं हूं ना।”

     

    विक्रम मुस्कुराया।

     

    उसकी कलाई पर बंधी राखी हल्की हवा में हिल रही थी।

     

    और तन्वी को लगा कि इस साल उसने भाई की कलाई पर सिर्फ एक धागा नहीं बांधा।

     

    उसने उसे यह भरोसा बांधा था कि—

     

    मुश्किल समय में मजबूत होने का मतलब अकेले खड़े रहना नहीं होता।

     

    कभी-कभी किसी अपने का हाथ पकड़ लेना भी ताकत होता है।

     

    और शायद इसीलिए…

     

    जिस भाई ने कहा था—

     

    “इस बार राखी मत बांधना…”

     

    उसी ने बाद में सबसे ज्यादा मजबूती से कहा—

     

    “अगली राखी पर जरूर आना।”

  • भईया ने मेरी राखी कभी नहीं उतारी

    पढ़ने का समय : 9 मिनट

     

    भैया ने मेरी राखी कभी नहीं उतारी

     

    रक्षाबंधन की सुबह अंशिका अपने भाई समीर की कलाई को देखकर अचानक चुप हो गई।

     

    समीर की कलाई पर एक पुराना, फीका पड़ा हुआ धागा अब भी बंधा था।

     

    उसके ऊपर हर साल नई राखी बंधती रही थी, लेकिन वह पुराना धागा कभी नहीं हटाया गया।

     

    अंशिका ने धीरे से पूछा,

     

    “भैया, ये पुराना धागा अब तक क्यों बांध रखा है?”

     

    समीर मुस्कुराया।

     

    “तुझे याद नहीं?”

     

    अंशिका ने ध्यान से देखा।

     

    “नहीं।”

     

    समीर ने कहा,

     

    “ये तूने पहली बार मुझे राखी बांधी थी।”

     

    अंशिका हंस पड़ी।

     

    “तब मैं कितनी छोटी थी!”

     

    “पांच साल की।”

     

    “और आप?”

     

    “दस साल का।”

     

    अंशिका ने मजाक में कहा,

     

    “तो अब तक क्यों संभाल रखा है? ये तो कभी भी टूट सकता है।”

     

    समीर ने अपनी कलाई को देखते हुए कहा,

     

    “कुछ धागे टूटने के बाद भी नहीं टूटते।”

     

    अंशिका ने उसकी बात पर ध्यान नहीं दिया।

     

    “आप भी ना, बहुत इमोशनल बातें करने लगे हो।”

     

    समीर बस मुस्कुरा दिया।

     

    लेकिन उस दिन अंशिका को नहीं पता था कि उस पुराने धागे के पीछे एक ऐसा सच था, जिसके बारे में उसने कभी सोचा भी नहीं था।

     

    समीर और अंशिका एक छोटे से शहर में रहते थे।

     

    पिता की एक छोटी-सी सिलाई की दुकान थी।

     

    माँ घर संभालती थीं।

     

    घर बहुत बड़ा नहीं था, लेकिन खुशियां बहुत थीं।

     

    समीर पढ़ाई में बहुत अच्छा था।

     

    उसका सपना था कि वह बड़ा होकर शहर जाकर पढ़े और अपने पसंद का काम करे।

     

    जब भी स्कूल में कोई पूछता,

     

    “बड़े होकर क्या बनोगे?”

     

    समीर बिना सोचे जवाब देता,

     

    “कुछ बड़ा।”

     

    अंशिका तुरंत कहती,

     

    “और मुझे क्या बनाओगे?”

     

    समीर हंसता।

     

    “तुझे?”

     

    “हां।”

     

    “तुझे दुनिया की सबसे परेशान करने वाली बहन।”

     

    अंशिका गुस्सा होने का नाटक करती।

     

    लेकिन दोनों बहुत करीब थे।

     

    फिर एक साल पिता की तबीयत खराब रहने लगी।

     

    दुकान बंद होने लगी।

     

    घर की आमदनी कम हो गई।

     

    समीर उस समय बारहवीं में था।

     

    उसे शहर के एक अच्छे कॉलेज में दाखिला मिल गया।

     

    उसका सपना पूरा होने वाला था।

     

    घर में सभी खुश थे।

     

    लेकिन फीस बहुत ज्यादा थी।

     

    पिता ने कहा,

     

    “मैं दुकान गिरवी रख दूंगा।”

     

    समीर ने तुरंत मना कर दिया।

     

    “नहीं पापा।”

     

    “लेकिन बेटा, ये तुम्हारा सपना है।”

     

    समीर ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “सपने कहीं नहीं जाते।”

     

    कुछ दिनों बाद अंशिका ने देखा कि समीर अब अक्सर दुकान पर बैठने लगा है।

     

    वह सोचती,

     

    “भैया शायद पापा की मदद कर रहे हैं।”

     

    फिर कॉलेज खुलने का दिन आ गया।

     

    अंशिका ने उत्साह से पूछा,

     

    “भैया, कब जा रहे हो?”

     

    समीर ने कहा,

     

    “अभी नहीं।”

     

    “क्यों?”

     

    “कुछ काम है।”

     

    दिन बीतते गए।

     

    फिर महीने।

     

    फिर साल।

     

    समीर शहर नहीं गया।

     

    अंशिका बड़ी होती रही।

     

    उसने पढ़ाई की।

     

    कॉलेज में दाखिला लिया।

     

    लेकिन उसे कभी नहीं पता चला कि उसके भाई ने अपना सपना क्यों छोड़ दिया।

     

    समीर हमेशा कहता,

     

    “मुझे यहीं अच्छा लगता है।”

     

    समय के साथ पिता की तबीयत और कमजोर हो गई।

     

    समीर ने दुकान पूरी तरह संभाल ली।

     

    अंशिका की पढ़ाई चलती रही।

     

    जब उसे बड़े शहर के कॉलेज में पढ़ने का मौका मिला, तो वह बहुत खुश हुई।

     

    लेकिन फीस देखकर उसने कहा,

     

    “माँ, शायद मैं यहीं पढ़ लूं।”

     

    समीर ने तुरंत कहा,

     

    “तू जाएगी।”

     

    “लेकिन भैया, खर्चा?”

     

    “मैं हूं ना।”

     

    “आपके पास इतने पैसे कहां हैं?”

     

    समीर ने हंसकर कहा,

     

    “तेरा भाई दुकान चलाता है।”

     

    अंशिका चली गई।

     

    चार साल तक समीर ने हर महीने उसकी फीस भेजी।

     

    उसने कभी उसे महसूस नहीं होने दिया कि पैसे की कोई परेशानी है।

     

    अंशिका ने पढ़ाई पूरी की और नौकरी लग गई।

     

    घर लौटते समय उसने सोचा—

     

    अब भैया को आराम दूंगी।

     

    पहली तनख्वाह मिलने के बाद वह बाजार गई।

     

    उसने समीर के लिए एक सुंदर घड़ी खरीदी।

     

    और रक्षाबंधन के दिन घर पहुंच गई।

     

    राखी बांधने से पहले उसने कहा,

     

    “भैया, आज आपको एक गिफ्ट देना है।”

     

    समीर ने हंसकर कहा,

     

    “मुझे पता है, बहुत महंगा होगा।”

     

    अंशिका ने घड़ी उसके सामने रखी।

     

    समीर कुछ पल चुप रहा।

     

    “बहुत सुंदर है।”

     

    “अब आपकी बारी।”

     

    “मेरी?”

     

    “हां। अब आप बताओ, आपको क्या चाहिए?”

     

    समीर ने मजाक में कहा,

     

    “आराम।”

     

    अंशिका ने गंभीर होकर कहा,

     

    “सच में।”

     

    समीर ने उसकी तरफ देखा।

     

    “कुछ नहीं चाहिए।”

     

    “आपने पूरी जिंदगी मेरे लिए काम किया है। अब मेरी बारी है।”

     

    समीर मुस्कुरा दिया।

     

    “पगली, भाई-बहन हिसाब नहीं रखते।”

     

    उस रात अंशिका अपने पुराने कमरे में सामान देख रही थी।

     

    उसे एक पुरानी फाइल मिली।

     

    वह फाइल शायद पिता की थी।

     

    उसने खोलकर देखा।

     

    अंदर कुछ कागज थे।

     

    और एक पुराना पत्र।

     

    ऊपर लिखा था—

     

    “समीर के नाम—कॉलेज प्रवेश पत्र।”

     

    अंशिका की सांस रुक गई।

     

    उसने तारीख देखी।

     

    वही साल, जब समीर ने शहर जाने का सपना छोड़ दिया था।

     

    फाइल में कुछ बैंक की रसीदें भी थीं।

     

    अंशिका ने ध्यान से देखा।

     

    उसके भाई के नाम की एक छात्रवृत्ति थी।

     

    फिर भी वह कॉलेज नहीं गया था।

     

    तभी पीछे से माँ की आवाज आई।

     

    “तुझे ये फाइल कहां मिली?”

     

    अंशिका ने पलटकर पूछा,

     

    “माँ… भैया कॉलेज क्यों नहीं गए थे?”

     

    माँ चुप हो गईं।

     

    “मुझे सच बताइए।”

     

    माँ की आंखें भर आईं।

     

    उन्होंने धीरे से कहा,

     

    “उस साल तेरा स्कूल बदलना था।”

     

    “तो?”

     

    “तेरी फीस और घर के खर्च में बहुत परेशानी थी।”

     

    अंशिका ने कहा,

     

    “लेकिन भैया की छात्रवृत्ति थी।”

     

    माँ ने सिर झुका लिया।

     

    “छात्रवृत्ति पूरी फीस के लिए नहीं थी।”

     

    “तो भैया ने क्या किया?”

     

    माँ रो पड़ीं।

     

    “उन्होंने अपनी पढ़ाई छोड़ दी।”

     

    अंशिका की आंखें भर आईं।

     

    “मेरे लिए?”

     

    माँ ने कहा,

     

    “तेरे लिए नहीं… परिवार के लिए।”

     

    “उन्होंने कभी बताया क्यों नहीं?”

     

    “क्योंकि वह नहीं चाहता था कि तू अपने सपनों को बोझ समझे।”

     

    अंशिका वहीं बैठ गई।

     

    उसके सामने भाई की पूरी जिंदगी जैसे एक-एक करके खुल रही थी।

     

    वह कॉलेज नहीं गया।

     

    दुकान संभाली।

     

    पिता का इलाज कराया।

     

    बहन की पढ़ाई कराई।

     

    और हर बार मुस्कुराकर कहा—

     

    “मैं हूं ना।”

     

    अंशिका के हाथ में वह पुराना प्रवेश पत्र कांप रहा था।

     

    वह तुरंत समीर के कमरे में गई।

     

    समीर सोने की तैयारी कर रहा था।

     

    अंशिका को देखकर बोला,

     

    “क्या हुआ?”

     

    अंशिका के हाथ में कागज देखकर उसका चेहरा बदल गया।

     

    “तुझे ये कहां मिला?”

     

    अंशिका की आंखों से आंसू बहने लगे।

     

    “आपने मुझे कभी बताया क्यों नहीं?”

     

    समीर ने धीरे से कहा,

     

    “कौन-सी बात?”

     

    “आपका कॉलेज!”

     

    समीर कुछ पल चुप रहा।

     

    फिर मुस्कुराया।

     

    “बहुत पुरानी बात है।”

     

    “मेरे लिए पुरानी नहीं है।”

     

    “अंशिका…”

     

    “आपने अपना सपना छोड़ दिया।”

     

    समीर ने कहा,

     

    “हर सपना पूरा करना जरूरी नहीं होता।”

     

    अंशिका रोते हुए बोली,

     

    “लेकिन आपको मौका मिला था।”

     

    समीर ने उसकी आंखों में देखकर कहा,

     

    “और तुझे भी तो मिला।”

     

    “मेरे सपने के लिए आपका सपना क्यों रुका?”

     

    समीर ने हल्के से कहा,

     

    “क्योंकि उस समय मुझे लगा कि तेरे आगे बढ़ने में मेरा आगे बढ़ना भी शामिल है।”

     

    अंशिका के पास कोई जवाब नहीं था।

     

    समीर ने अपनी कलाई दिखाई।

     

    वह पुराना धागा अब भी वहां था।

     

    “याद है तूने पहली बार राखी बांधी थी?”

     

    अंशिका ने आंसू पोंछते हुए सिर हिलाया।

     

    “तब तूने क्या कहा था, पता है?”

     

    “नहीं।”

     

    “तूने कहा था—भैया, बड़े होकर मुझे कभी अकेला मत छोड़ना।”

     

    अंशिका फूटकर रो पड़ी।

     

    समीर ने कहा,

     

    “बस वही बात मेरे दिमाग में रह गई।”

     

    अंशिका ने उसकी कलाई पकड़ ली।

     

    “लेकिन भैया, राखी का मतलब ये नहीं कि आप अपनी पूरी जिंदगी मेरे लिए छोड़ दें।”

     

    समीर ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “मैंने जिंदगी नहीं छोड़ी।”

     

    “तो क्या?”

     

    “मैंने अपनी जिंदगी में एक नया कारण जोड़ लिया।”

     

    अंशिका ने सिर हिलाया।

     

    “अब मेरी बात सुनिए।”

     

    “क्या?”

     

    “इस बार राखी पर मुझे आपसे कुछ चाहिए।”

     

    “क्या?”

     

    “अब आप अपना एक सपना बताइए।”

     

    समीर हंस पड़ा।

     

    “अब मेरी उम्र सपने देखने की नहीं रही।”

     

    अंशिका ने कहा,

     

    “तो फिर मेरी उम्र भी कम नहीं थी जब आपने मेरे लिए सपने देखे।”

     

    समीर चुप हो गया।

     

    अंशिका ने कहा,

     

    “इस बार मेरी राखी का वादा है—अब आप अपने लिए भी जिएंगे।”

     

    समीर की आंखें भर आईं।

     

    “बहुत मुश्किल काम दे रही है।”

     

    “भाई हूं… या बहन?”

     

    “बहन।”

     

    “तो सुनना पड़ेगा।”

     

    दोनों हंस पड़े।

     

    कुछ महीनों बाद अंशिका ने समीर को एक लिफाफा दिया।

     

    उसके अंदर एक प्रशिक्षण कार्यक्रम का प्रवेश पत्र था।

     

    वह वही काम था, जिसे समीर बचपन से सीखना चाहता था।

     

    समीर ने पूछा,

     

    “ये क्या है?”

     

    अंशिका मुस्कुराई।

     

    “आपका रुका हुआ सपना।”

     

    समीर की आंखें भर आईं।

     

    “मैं अब शुरू कर सकता हूं?”

     

    अंशिका ने उसकी कलाई पर राखी बांधते हुए कहा,

     

    “सपनों की कोई उम्र नहीं होती भैया।”

     

    समीर ने पुरानी राखी के धागे को छुआ।

     

    “और ये?”

     

    अंशिका मुस्कुराई।

     

    “इसे मत उतारना।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि अब ये सिर्फ आपके पुराने वादे की याद नहीं है।”

     

    “तो?”

     

    अंशिका ने कहा,

     

    “अब ये याद दिलाएगी कि जिस भाई ने मेरी जिंदगी बनाने में अपना सपना रोक दिया था… उसकी बहन अब उसके सपनों को फिर से उड़ान देगी।”

     

    समीर ने पहली बार उस पुरानी राखी को देखकर अलग तरह से मुस्कुराया।

     

    और अंशिका ने समझ लिया—

     

    राखी सिर्फ भाई के बहन की रक्षा करने का त्योहार नहीं है।

     

    कभी-कभी बहन भी भाई की उस उम्मीद की रक्षा करती है…

     

    जिसे उसने सबके लिए जीते-जीते कहीं पीछे छोड़ दिया हो।

     

    और उस साल…

     

    अंशिका की राखी ने समीर की कलाई पर सिर्फ एक धागा नहीं बांधा था।

     

    उसने उसके अधूरे सपने को फिर से जीने की हिम्मत बांध दी थी।

  • तोहफा वापस चाहिए

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    इस राखी पर मुझे तुमसे कुछ वापस चाहिए

    रक्षाबंधन से एक दिन पहले आदित्य के मोबाइल पर अपनी बहन पूजा का फोन आया।

     

    “भैया, कल समय पर घर आ जाना।”

     

    आदित्य मुस्कुराया।

     

    “हर साल आता हूं।”

     

    “इस बार देर मत करना।”

     

    “अच्छा बाबा, नहीं करूंगा।”

     

    पूजा कुछ पल चुप रही, फिर बोली,

     

    “और हां, इस बार मेरे लिए कोई गिफ्ट मत लाना।”

     

    आदित्य हैरान हो गया।

     

    “क्या?”

     

    “सुना नहीं? कोई गिफ्ट नहीं चाहिए।”

     

    “ये कैसे हो सकता है? मेरी बहन और गिफ्ट न मांगे?”

     

    पूजा हंसने की कोशिश करने लगी।

     

    “इस बार मुझे कुछ और चाहिए।”

     

    “क्या?”

     

    “कल बताऊंगी।”

     

    फोन कट गया।

     

    आदित्य कुछ देर तक मोबाइल को देखता रहा।

     

    उसे पूजा की आवाज अजीब लगी थी।

     

    वह हंस तो रही थी, लेकिन जैसे उसकी हंसी के पीछे कोई चिंता छिपी हुई थी।

     

    अगली सुबह आदित्य जल्दी घर पहुंच गया।

     

    दरवाजा पूजा ने खोला।

     

    वह हल्के पीले रंग का सूट पहने हुए थी। हाथ में पूजा की थाली थी।

     

    आदित्य ने उसे देखते ही कहा,

     

    “वाह! आज तो मेरी बहन बहुत खुश लग रही है।”

     

    पूजा ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “अंदर आओ भैया।”

     

    घर में माँ भी बैठी थीं।

     

    लेकिन आदित्य ने तुरंत महसूस किया कि माहौल सामान्य नहीं था।

     

    माँ की आंखें बार-बार पूजा की तरफ जा रही थीं।

     

    पूजा जरूरत से ज्यादा चुप थी।

     

    आदित्य ने पूछा,

     

    “सब ठीक है?”

     

    माँ ने जल्दी से कहा,

     

    “हां बेटा, सब ठीक है।”

     

    पूजा ने बात बदल दी।

     

    “पहले राखी बांध लूं।”

     

    आदित्य उसके सामने बैठ गया।

     

    पूजा ने तिलक लगाया।

     

    मिठाई खिलाई।

     

    फिर राखी उठाई।

     

    लेकिन राखी बांधते समय उसके हाथ कांप रहे थे।

     

    आदित्य ने धीरे से पूछा,

     

    “क्या हुआ?”

     

    “कुछ नहीं।”

     

    “तू मुझसे झूठ बोल रही है।”

     

    पूजा की आंखें भर आईं।

     

    “पहले राखी बांध लेने दो।”

     

    उसने राखी बांध दी।

     

    कुछ सेकंड तक दोनों चुप रहे।

     

    फिर आदित्य ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “अब बता, इस बार क्या चाहिए?”

     

    पूजा ने उसकी तरफ देखा।

     

    “आप वादा करोगे?”

     

    “पहले मांग तो सही।”

     

    “नहीं, पहले वादा।”

     

    आदित्य ने कहा,

     

    “ठीक है, वादा।”

     

    पूजा ने गहरी सांस ली।

     

    “मुझे मेरा भाई वापस चाहिए।”

     

    आदित्य की मुस्कान गायब हो गई।

     

    “क्या मतलब?”

     

    पूजा की आंखों से आंसू निकल आए।

     

    “मुझे वही भाई वापस चाहिए जो पहले था।”

     

    आदित्य चुप रह गया।

     

    पूजा ने पहली बार उसके सामने अपने मन की सारी बातें रख दीं।

     

    “पहले आप मुझे रोज फोन करते थे।”

     

    आदित्य नजरें झुकाकर सुनता रहा।

     

    “मैं बीमार होती थी तो आप सबसे पहले आते थे।”

     

    उसकी आवाज कांपने लगी।

     

    “मैं किसी बात से परेशान होती थी तो आप कहते थे—पूजा, बता क्या हुआ?”

     

    आदित्य के चेहरे पर पछतावा दिखाई देने लगा।

     

    पूजा ने कहा,

     

    “लेकिन पिछले एक साल से आप बदल गए हो।”

     

    “पूजा…”

     

    “नहीं भैया, आज मुझे बोलने दो।”

     

    आदित्य चुप हो गया।

     

    “आप घर आते हो तो फोन में लगे रहते हो। मैं कुछ बताती हूं तो कहते हो बाद में। मेरे मैसेज कई-कई घंटे बाद देखते हो।”

     

    पूजा की आंखों से आंसू लगातार बह रहे थे।

     

    “आपने कभी सोचा कि मैं क्यों नाराज होती हूं?”

     

    आदित्य के पास कोई जवाब नहीं था।

     

    “मुझे आपके पैसे नहीं चाहिए थे। न महंगे गिफ्ट चाहिए थे। मुझे सिर्फ पहले वाले आप चाहिए थे।”

     

    कमरे में सन्नाटा छा गया।

     

    माँ की आंखें भी नम थीं।

     

    आदित्य ने धीरे से कहा,

     

    “मैंने सोचा था कि मैं तुम्हारे लिए काम कर रहा हूं।”

     

    पूजा ने पूछा,

     

    “किसने कहा कि मुझे इतना चाहिए?”

     

    आदित्य ने उसकी तरफ देखा।

     

    पूजा बोली,

     

    “भैया, मुझे बड़ा घर नहीं चाहिए। महंगी चीजें नहीं चाहिए। मुझे बस कभी-कभी आपके साथ बैठकर चाय पीनी है।”

     

    आदित्य की आंखें भर आईं।

     

    वह पिछले एक साल से लगातार काम कर रहा था।

     

    उसकी एक ही सोच थी—

     

    “माँ और पूजा को किसी चीज की कमी नहीं होने दूंगा।”

     

    वह ज्यादा पैसे कमाना चाहता था।

     

    पूजा के लिए बेहतर भविष्य बनाना चाहता था।

     

    लेकिन इसी कोशिश में वह भूल गया था कि उसके परिवार को सिर्फ उसके पैसों की नहीं…

     

    उसकी मौजूदगी की भी जरूरत थी।

     

    आदित्य ने धीरे से कहा,

     

    “मुझे लगा मैं जिम्मेदारी निभा रहा हूं।”

     

    पूजा ने उसके हाथ पर हाथ रखा।

     

    “जिम्मेदारी सिर्फ खर्च चलाना नहीं होती भैया।”

     

    यह बात सीधे आदित्य के दिल में उतर गई।

     

    कुछ देर बाद उसने पूछा,

     

    “अगर मैं बदलना चाहूं तो?”

     

    पूजा ने आंसू पोंछे।

     

    “तो?”

     

    “तो क्या मेरी बहन मुझे वापस मौका देगी?”

     

    पूजा मुस्कुराई।

     

    “इसलिए तो राखी बांधी है।”

     

    आदित्य ने उसकी राखी वाली कलाई को देखा।

     

    “तो बता, सबसे पहले क्या करना होगा?”

     

    पूजा ने कहा,

     

    “आज अपना फोन बंद करो।”

     

    “क्या?”

     

    “हां।”

     

    “पूरा दिन?”

     

    “पूरा दिन।”

     

    माँ हंस पड़ीं।

     

    “सजा ठीक है।”

     

    आदित्य ने फोन उठाया।

     

    स्क्रीन देखी।

     

    फिर उसे बंद कर दिया।

     

    “अब?”

     

    पूजा ने कहा,

     

    “अब नाश्ता बनाओ।”

     

    आदित्य ने आंखें बड़ी कीं।

     

    “मैं?”

     

    “हां, मेरे पुराने वाले भैया को रसोई में जाकर मेरी पसंद का नाश्ता बनाना आता था।”

     

    आदित्य मुस्कुराया।

     

    “आज तो मेरी परीक्षा हो रही है।”

     

    पूजा ने कहा,

     

    “अभी तो शुरुआत है।”

     

    उस दिन वर्षों बाद तीनों ने साथ बैठकर नाश्ता किया।

     

    फिर पुरानी तस्वीरें देखीं।

     

    माँ ने बचपन के किस्से सुनाए।

     

    पूजा और आदित्य पुरानी बातों पर हंसते रहे।

     

    शाम को पूजा ने कहा,

     

    “भैया, चलो बाहर।”

     

    दोनों उसी पार्क में गए जहां बचपन में खेला करते थे।

     

    एक बेंच पर बैठकर पूजा ने पूछा,

     

    “याद है, आप मुझे साइकिल चलाना सिखाते थे?”

     

    आदित्य हंस पड़ा।

     

    “और तू हर बार गिरने के बाद मुझे ही दोष देती थी।”

     

    “क्योंकि गलती आपकी होती थी।”

     

    “बिल्कुल नहीं।”

     

    दोनों हंस पड़े।

     

    कुछ देर बाद पूजा गंभीर हो गई।

     

    “भैया?”

     

    “हां?”

     

    “आज मैं बहुत खुश हूं।”

     

    आदित्य ने पूछा,

     

    “क्यों?”

     

    पूजा ने उसकी कलाई पर बंधी राखी की तरफ देखा।

     

    “क्योंकि आज मेरा गिफ्ट मिल गया।”

     

    आदित्य ने कहा,

     

    “लेकिन मैंने तो कुछ दिया ही नहीं।”

     

    पूजा मुस्कुराई।

     

    “दिया है।”

     

    “क्या?”

     

    “अपना समय।”

     

    आदित्य चुप हो गया।

     

    पूजा ने कहा,

     

    “कभी-कभी इंसान को दुनिया की सबसे महंगी चीज नहीं चाहिए होती।”

     

    “फिर क्या चाहिए होता है?”

     

    “अपनों के साथ कुछ सच्चे पल।”

     

    आदित्य की आंखें नम हो गईं।

     

    उसने बहन के सिर पर हाथ रखा।

     

    “मुझे माफ कर दे।”

     

    पूजा ने कहा,

     

    “एक शर्त पर।”

     

    “अब क्या?”

     

    “अगले हफ्ते रविवार को घर आना।”

     

    “आऊंगा।”

     

    “फोन बंद करके।”

     

    आदित्य हंस पड़ा।

     

    “ठीक है।”

     

    “हर महीने कम से कम एक दिन।”

     

    “पक्का।”

     

    पूजा ने हाथ आगे किया।

     

    “वादा?”

     

    आदित्य ने अपनी राखी वाली कलाई उसके सामने कर दी।

     

    “इस राखी की कसम।”

     

    उस रात आदित्य घर से वापस जाने लगा।

     

    माँ ने पूछा,

     

    “आज तो गिफ्ट लेकर आया था?”

     

    आदित्य ने कहा,

     

    “इस बार गिफ्ट मैं नहीं लाया।”

     

    पूजा ने मुस्कुराकर पूछा,

     

    “तो कौन लाया?”

     

    आदित्य ने बहन की तरफ देखकर कहा,

     

    “मेरी बहन।”

     

    पूजा हैरान हुई।

     

    “मैंने?”

     

    “हां।”

     

    “क्या दिया?”

     

    आदित्य ने कहा,

     

    “याद दिलाया कि जिंदगी में सबसे बड़ी कमाई क्या होती है।”

     

    पूजा चुप रही।

     

    आदित्य ने उसकी तरफ देखकर कहा,

     

    “अपने लोगों के पास होने का समय।”

     

    पूजा की आंखें भर आईं।

     

    उसने कहा,

     

    “तो फिर इस बार मेरी राखी का वादा?”

     

    आदित्य ने जवाब दिया,

     

    “मैं सिर्फ तुम्हारी जरूरतों का नहीं, तुम्हारे समय का भी भाई रहूंगा।”

     

    पूजा मुस्कुराई।

     

    उस दिन एक बहन ने अपने भाई से कोई महंगा गिफ्ट नहीं मांगा था।

     

    उसने बस कहा था—

     

    “मुझे मेरा भाई वापस चाहिए।”

     

    और शायद रक्षाबंधन का सबसे खूबसूरत मतलब भी यही है।

     

    राखी सिर्फ भाई से बहन की रक्षा का वादा नहीं लेती…

     

    कभी-कभी वह रिश्तों को फिर से समय देने का वादा भी लेती है।

     

    क्योंकि कुछ रिश्ते पैसे से नहीं टूटते,

     

    दूरी से भी नहीं टूटते…

     

    वे बस तब कमजोर पड़ने लगते हैं, जब हम अपनों के लिए समय निकालना भूल जाते हैं।

     

    और उस दिन पूजा को उसका सबसे बड़ा रक्षाबंधन का तोहफा मिल गया था—

     

    उसका वही पुराना भाई… जो उसके पास बैठकर बिना किसी जल्दी के मुस्कुरा रहा था।

  • आखिरी राखी जो बंधी नहीं

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

    वो आखिरी राखी जो कभी बांधी नहीं गई

     

    रक्षाबंधन की सुबह पूरे घर में खुशी थी, लेकिन मीरा अपने कमरे में बैठी एक पुरानी लकड़ी की पेटी को बार-बार खोल और बंद कर रही थी।

     

    पेटी के अंदर एक राखी रखी थी।

     

    लाल और पीले धागे वाली।

     

    राखी नई नहीं थी।

     

    उसे खरीदे हुए पूरे बारह साल हो चुके थे।

     

    लेकिन आज तक वह किसी की कलाई पर नहीं बंधी थी।

     

    मीरा हर साल उसे निकालती।

     

    कुछ देर देखती।

     

    फिर वापस उसी पेटी में रख देती।

     

    उसकी माँ कई साल पहले कहती थीं,

     

    “बेटा, अब इस राखी को संभालकर रखने से क्या होगा?”

     

    मीरा धीरे से जवाब देती,

     

    “माँ, कुछ चीजें बांधने के लिए नहीं होतीं… बस याद रखने के लिए होती हैं।”

     

    लेकिन इस बार माँ नहीं थीं।

     

    मीरा घर में अकेली बैठी थी।

     

    उसकी उम्र अब तीस साल हो चुकी थी।

     

    आज भी रक्षाबंधन था।

     

    बाहर मोहल्ले की लड़कियां अपने भाइयों को राखी बांध रही थीं।

     

    कहीं हंसी थी।

     

    कहीं मिठाई बांटी जा रही थी।

     

    लेकिन मीरा की नजर सिर्फ उस पुरानी राखी पर थी।

     

    तभी दरवाजे पर दस्तक हुई।

     

    “मीरा!”

     

    बाहर से पड़ोस की बूढ़ी शारदा दादी की आवाज आई।

     

    मीरा ने जल्दी से पेटी बंद की।

     

    “आ रही हूं दादी।”

     

    दरवाजा खोलते ही दादी ने कहा,

     

    “आज भी नहीं गई?”

     

    मीरा समझ गई कि दादी क्या पूछ रही हैं।

     

    उसने धीरे से कहा,

     

    “नहीं।”

     

    दादी कुछ पल चुप रहीं।

     

    “कब तक खुद को सजा देती रहेगी?”

     

    मीरा की आंखें भर आईं।

     

    “मैं खुद को सजा नहीं दे रही।”

     

    “फिर?”

     

    “बस… भूल नहीं पा रही।”

     

    दादी अंदर आ गईं।

     

    उन्होंने लकड़ी की पेटी को देखा।

     

    “फिर वही राखी?”

     

    मीरा ने सिर हिला दिया।

     

    दादी ने पूछा,

     

    “क्या आज भी तू सोचती है कि अगर उस दिन तू उसे राखी बांध देती, तो सब बदल जाता?”

     

    मीरा ने जवाब नहीं दिया।

     

    उसकी आंखों के सामने बारह साल पुराना दृश्य घूमने लगा।

     

    तब वह अठारह साल की थी।

     

    उसका भाई विवान उससे तीन साल बड़ा था।

     

    दोनों बचपन से एक-दूसरे के सबसे अच्छे दोस्त थे।

     

    विवान बहुत शरारती था।

     

    और मीरा बहुत जल्दी नाराज हो जाती थी।

     

    विवान उसे छेड़ता,

     

    “तुझे गुस्सा करते हुए देखकर मजा आता है।”

     

    मीरा जवाब देती,

     

    “एक दिन सच में बात करना बंद कर दूंगी।”

     

    विवान हंस देता।

     

    “तू मेरे बिना रह नहीं सकती।”

     

    मीरा गुस्से में कहती,

     

    “बहुत गलतफहमी है आपको।”

     

    लेकिन सच यह था कि दोनों एक-दूसरे के बिना रह भी नहीं सकते थे।

     

    हर रक्षाबंधन पर मीरा सबसे पहले विवान की कलाई पर राखी बांधती।

     

    और विवान हर साल उसे चिढ़ाता,

     

    “इस बार क्या चाहिए? पहले ही बता दे, मेरे पास ज्यादा पैसे नहीं हैं।”

     

    मीरा हमेशा कहती,

     

    “मुझे गिफ्ट नहीं चाहिए।”

     

    विवान पूछता,

     

    “तो?”

     

    “बस कभी मुझे छोड़कर मत जाना।”

     

    विवान हंसते हुए कहता,

     

    “पगली, मैं कहीं नहीं जाऊंगा।”

     

    लेकिन एक साल रक्षाबंधन से ठीक एक दिन पहले दोनों के बीच बहुत बड़ा झगड़ा हो गया।

     

    विवान को एक दूसरे शहर में पढ़ाई के लिए जाना था।

     

    वह बहुत खुश था।

     

    लेकिन मीरा नाराज थी।

     

    “तुम हमेशा के लिए चले जाओगे।”

     

    विवान ने कहा,

     

    “पढ़ने जा रहा हूं, भाग नहीं रहा।”

     

    “लेकिन यहां से दूर।”

     

    “मीरा, जिंदगी में आगे बढ़ना पड़ता है।”

     

    मीरा ने गुस्से में कहा,

     

    “तो चले जाओ। मुझे क्या फर्क पड़ता है?”

     

    विवान चुप हो गया।

     

    “सच?”

     

    मीरा ने चेहरा दूसरी तरफ कर लिया।

     

    “हां।”

     

    विवान ने कहा,

     

    “ठीक है।”

     

    अगले दिन रक्षाबंधन था।

     

    मीरा ने सुबह राखी खरीदी।

     

    लेकिन उसका गुस्सा अभी तक कम नहीं हुआ था।

     

    विवान उसके कमरे के बाहर आया।

     

    “राखी नहीं बांधेगी?”

     

    मीरा ने कहा,

     

    “नहीं।”

     

    “पक्का?”

     

    “हां।”

     

    विवान कुछ पल दरवाजे पर खड़ा रहा।

     

    फिर बोला,

     

    “ठीक है।”

     

    मीरा ने सोचा था कि वह वापस आएगा।

     

    मनाएगा।

     

    मजाक करेगा।

     

    कहेगा कि वह गुस्सा छोड़ दे।

     

    लेकिन विवान चला गया।

     

    उस शाम उसे शहर के लिए निकलना था।

     

    मीरा ने खुद को रोक लिया।

     

    उसने सोचा,

     

    “जब जाना ही है तो मैं क्यों रोकूं?”

     

    विवान जाने से पहले माँ से मिला।

     

    पिता से मिला।

     

    फिर मीरा के कमरे के बाहर आकर रुका।

     

    “मीरा?”

     

    मीरा ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    “मैं जा रहा हूं।”

     

    कमरे के अंदर बैठी मीरा की आंखें भर आईं।

     

    लेकिन उसने कहा,

     

    “जाओ।”

     

    कुछ सेकंड तक बाहर कोई आवाज नहीं आई।

     

    फिर उसके कदमों की आवाज दूर होती चली गई।

     

    मीरा ने दौड़कर दरवाजा खोला।

     

    लेकिन विवान जा चुका था।

     

    वह भागकर बाहर आई।

     

    गाड़ी सड़क के मोड़ से निकल रही थी।

     

    मीरा ने हाथ में राखी पकड़ रखी थी।

     

    लेकिन वह आवाज नहीं दे पाई।

     

    बस वहीं खड़ी रह गई।

     

    उसके बाद विवान कभी वापस नहीं आया।

     

    कुछ समय बाद परिवार को खबर मिली कि शहर में एक गंभीर घटना के बाद उससे संपर्क टूट गया था और वह लापता हो गया।

     

    कई साल तक तलाश चली।

     

    लेकिन कोई पता नहीं मिला।

     

    मीरा की जिंदगी वहीं रुक गई।

     

    उसे हमेशा लगता रहा—

     

    “अगर उस दिन मैंने उसे राखी बांध दी होती…”

     

    शारदा दादी ने उसकी आंखों के सामने हाथ हिलाया।

     

    “कहां खो गई?”

     

    मीरा वर्तमान में लौट आई।

     

    उसने राखी को हाथ में लिया।

     

    “दादी, मैंने आखिरी बार उसे बिना राखी के जाने दिया।”

     

    दादी ने धीरे से कहा,

     

    “लेकिन क्या तुझे लगता है कि उसने तुझे माफ नहीं किया होगा?”

     

    मीरा ने दुखी होकर कहा,

     

    “मैंने उसे बहुत बुरा कहा था।”

     

    दादी मुस्कुराईं।

     

    “भाई-बहन के रिश्ते में गुस्सा आखिरी बात नहीं होता।”

     

    मीरा ने कुछ नहीं कहा।

     

    तभी बाहर से किसी ने आवाज दी।

     

    “मीरा जी?”

     

    दरवाजे पर एक अधेड़ आदमी खड़ा था।

     

    उसके हाथ में एक छोटा बैग था।

     

    “आप मुझे नहीं जानतीं। मैं विवान का दोस्त था।”

     

    मीरा का दिल तेजी से धड़कने लगा।

     

    “विवान?”

     

    उस आदमी ने सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

    “आपको मेरे भाई के बारे में कुछ पता है?”

     

    आदमी ने बैग आगे कर दिया।

     

    “उसके पास कुछ चीजें थीं। बहुत सालों बाद ये सामान मेरे पास पहुंचा। मुझे आपका पता ढूंढने में समय लगा।”

     

    मीरा के हाथ कांपने लगे।

     

    उसने बैग खोला।

     

    अंदर कुछ पुरानी किताबें थीं।

     

    एक पुरानी घड़ी।

     

    और एक छोटा डिब्बा।

     

    मीरा ने डिब्बा खोला।

     

    उसके अंदर…

     

    एक राखी थी।

     

    बहुत पुरानी।

     

    साथ में एक कागज रखा था।

     

    मीरा ने पढ़ा—

     

    “अगर मीरा कभी ये पढ़े तो उसे कहना कि मैं उससे नाराज नहीं था।

     

    उसने उस दिन राखी नहीं बांधी, लेकिन मैं जानता था कि वह मुझसे प्यार करती है।

     

    वह गुस्से में है, बस।

     

    अगर कभी वापस आया तो उससे जरूर राखी बंधवाऊंगा।

     

    और अगर नहीं आ पाया…

     

    तो उसे कहना कि मेरी कलाई पर राखी न सही, लेकिन मेरे दिल में हमेशा मेरी बहन का प्यार बंधा रहा।”

     

    मीरा के हाथ से कागज गिर गया।

     

    वह फूट-फूटकर रोने लगी।

     

    दादी ने उसे संभाला।

     

    “देखा? उसने तुझे कभी छोड़ा ही नहीं था।”

     

    मीरा ने उस राखी को अपने हाथों में लिया।

     

    फिर अपनी पुरानी पेटी खोली।

     

    उसमें रखी राखी निकाली।

     

    दोनों राखियों को साथ रख दिया।

     

    एक राखी मीरा ने विवान के लिए खरीदी थी।

     

    एक विवान ने शायद उसके लिए संभालकर रखी थी।

     

    बारह साल बाद…

     

    दोनों राखियां एक साथ थीं।

     

    लेकिन कलाई अभी भी खाली थी।

     

    मीरा धीरे से बोली,

     

    “दादी, अब क्या करूं?”

     

    दादी ने कहा,

     

    “जिस प्यार को तूने सालों से अधूरा समझा, उसे पूरा कर।”

     

    मीरा ने दोनों राखियां उठाईं।

     

    वह घर के उस कमरे में गई, जहां बचपन में विवान और वह खेलते थे।

     

    दीवार पर उसकी एक पुरानी तस्वीर लगी थी।

     

    मीरा ने तस्वीर के सामने बैठकर कहा,

     

    “भैया, उस दिन मैं बहुत गुस्से में थी।”

     

    उसकी आवाज कांप रही थी।

     

    “मैंने सोचा था आप मुझे मनाओगे।”

     

    उसने राखी तस्वीर के फ्रेम पर रख दी।

     

    “लेकिन मैं भूल गई कि हर बार किसी रिश्ते को दूसरा इंसान ही नहीं मनाता।”

     

    उसने आंखें बंद कर लीं।

     

    “मुझे भी आपको रोकना चाहिए था।”

     

    कुछ देर तक वह चुप रही।

     

    फिर धीरे से मुस्कुराई।

     

    “लेकिन आज मैं आपको एक बात बताना चाहती हूं।”

     

    उसने दोनों राखियों को तस्वीर के सामने रखा।

     

    “आज मैं आपको राखी नहीं बांध सकती… लेकिन आज से खुद को दोष देना छोड़ रही हूं।”

     

    उसकी आंखों से आंसू बह रहे थे।

     

    “क्योंकि मुझे पता है… आप मुझसे नाराज नहीं थे।”

     

    मीरा ने तस्वीर को देखा।

     

    “और शायद… यही मेरी सबसे जरूरी राखी थी।”

     

    उस दिन शाम को शारदा दादी ने देखा कि मीरा घर के बाहर बैठी है।

     

    लेकिन इस बार उसकी गोद में लकड़ी की पेटी नहीं थी।

     

    मीरा ने दादी से कहा,

     

    “दादी, आज मैंने राखी बांधी।”

     

    दादी ने हैरानी से पूछा,

     

    “किसे?”

     

    मीरा ने आसमान की तरफ देखा।

     

    “उसे… जिससे मैंने कभी प्यार करना बंद ही नहीं किया।”

     

    उसकी आंखों में आंसू थे।

     

    लेकिन इस बार उन आंसुओं में सिर्फ दुख नहीं था।

     

    एक अजीब-सी शांति भी थी।

     

    क्योंकि उसे आखिरकार समझ आ गया था—

     

    कुछ राखियां कलाई पर नहीं बंधतीं।

     

    वे यादों में बंधती हैं।

     

    माफी में बंधती हैं।

     

    और उन रिश्तों में बंधती हैं…

     

    जिन्हें समय, दूरी और नाराज़गी भी खत्म नहीं कर पाती।

     

    उसकी राखी कभी विवान की कलाई तक नहीं पहुंची थी…

     

    लेकिन उसका प्यार हमेशा उसके भाई तक पहुंचता रहा।

  • मेरी बहन ने राखी नहीं खरीदी

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

     

    मेरी बहन ने राखी क्यों नहीं खरीदी?

    “माँ, इस साल दीदी ने मेरे लिए राखी खरीदी ही नहीं।”

     

    रोहन ने यह बात थोड़ी नाराज़गी और थोड़े दुख के साथ कही।

     

    माँ रसोई में खड़ी थीं। उन्होंने पलटकर अपने बेटे को देखा।

     

    “तुझे कैसे पता?”

     

    रोहन ने मोबाइल एक तरफ रखते हुए कहा,

     

    “हर साल रक्षाबंधन से पहले वो मुझे फोन करके पूछती थी कि इस बार कौन-सी राखी पसंद है। इस बार उसने एक बार भी नहीं पूछा।”

     

    माँ कुछ पल चुप रहीं।

     

    “शायद व्यस्त होगी।”

     

    रोहन ने तुरंत कहा,

     

    “दीदी कभी इतनी व्यस्त नहीं होती कि राखी भूल जाए।”

     

    उसकी आवाज में शिकायत थी।

     

    दरअसल, रोहन और उसकी बड़ी बहन काव्या का रिश्ता बहुत खास था।

     

    काव्या रोहन से सात साल बड़ी थी। बचपन से ही वह उसकी दूसरी माँ जैसी थी।

     

    जब रोहन छोटा था, काव्या ही उसे स्कूल के लिए तैयार करती।

     

    उसके जूते ढूंढती।

     

    होमवर्क करवाती।

     

    और जब वह रोता, तो माँ से पहले काव्या उसके पास पहुंचती।

     

    लेकिन पिछले दो सालों में काव्या की शादी हो गई थी।

     

    अब वह दूसरे शहर में रहती थी।

     

    फिर भी हर रक्षाबंधन पर वह सबसे पहले घर आती थी।

     

    रोहन हमेशा उसका इंतजार करता।

     

    लेकिन इस बार…

     

    रक्षाबंधन से तीन दिन पहले तक भी काव्या का कोई फोन नहीं आया था।

     

    रोहन ने खुद भी उसे फोन नहीं किया।

     

    उसने सोचा,

     

    “अगर दीदी को याद होगा, तो खुद फोन करेंगी।”

     

    लेकिन फोन नहीं आया।

     

    अगले दिन भी नहीं।

     

    रक्षाबंधन की सुबह रोहन देर तक सोता रहा।

     

    माँ ने कई बार आवाज लगाई।

     

    “रोहन, उठ जा बेटा।”

     

    “नहीं उठना।”

     

    “आज रक्षाबंधन है।”

     

    “तो?”

     

    माँ उसके पास बैठ गईं।

     

    “तू नाराज़ है?”

     

    रोहन ने करवट बदल ली।

     

    “नहीं।”

     

    माँ हल्का सा मुस्कुराईं।

     

    “मुझे तो लग रहा है बहुत नाराज़ है।”

     

    रोहन ने धीरे से कहा,

     

    “दीदी भूल गईं।”

     

    माँ ने उसकी पीठ पर हाथ रखा।

     

    “हर बात के पीछे कोई वजह होती है।”

     

    रोहन ने कहा,

     

    “इस बार उनकी कोई वजह नहीं सुननी।”

     

    माँ चुप हो गईं।

     

    दोपहर हो गई।

     

    रोहन बार-बार फोन देखने लगा।

     

    लेकिन कोई कॉल नहीं।

     

    शाम होने लगी।

     

    तभी दरवाजे की घंटी बजी।

     

    रोहन तेजी से उठा।

     

    उसे लगा काव्या होगी।

     

    लेकिन बाहर पड़ोस का एक बच्चा खड़ा था।

     

    उसने रोहन को एक छोटा-सा लिफाफा दिया।

     

    “ये आपके लिए है।”

     

    रोहन ने पूछा,

     

    “किसने दिया?”

     

    बच्चा बोला,

     

    “एक दीदी ने।”

     

    रोहन ने तुरंत लिफाफा खोला।

     

    अंदर एक छोटा-सा कागज था।

     

    उस पर लिखा था—

     

    “भैया, आज शाम 7 बजे पुराने पार्क में आ जाना। अकेले।”

     

    नीचे लिखा था—

     

    “तुम्हारी बहन।”

     

    रोहन का गुस्सा अचानक कम होने लगा।

     

    लेकिन उसने सोचा,

     

    “अब याद आई राखी?”

     

    माँ ने पूछा,

     

    “कहां जा रहा है?”

     

    रोहन ने कहा,

     

    “थोड़ी देर में आता हूं।”

     

    ठीक सात बजे वह पुराने पार्क पहुंच गया।

     

    पार्क में हल्का अंधेरा था।

     

    एक कोने में पीली रोशनी जल रही थी।

     

    वहां एक बेंच पर काव्या बैठी थी।

     

    रोहन को देखते ही वह खड़ी हो गई।

     

    उसके चेहरे पर थकान थी।

     

    रोहन उसके सामने जाकर रुक गया।

     

    “अब याद आई मैं?”

     

    काव्या मुस्कुराने की कोशिश करने लगी।

     

    “तुझे कभी भूली थी क्या?”

     

    “तो फोन क्यों नहीं किया?”

     

    “काम था।”

     

    रोहन नाराज़ हो गया।

     

    “बस? इतनी बड़ी वजह?”

     

    काव्या चुप रही।

     

    “और राखी?”

     

    रोहन ने पूछा।

     

    काव्या ने अपने बैग की तरफ देखा।

     

    “नहीं खरीदी।”

     

    रोहन का दिल टूट गया।

     

    “मतलब सच में भूल गईं?”

     

    काव्या ने धीरे से कहा,

     

    “नहीं।”

     

    “तो?”

     

    उसने बैग से एक छोटा-सा कपड़े का टुकड़ा निकाला।

     

    उस पर लाल धागे से कुछ बनाया गया था।

     

    रोहन ने ध्यान से देखा।

     

    वह राखी थी।

     

    बहुत साधारण।

     

    धागे से बनी हुई।

     

    बीच में छोटे-छोटे मोती लगे थे।

     

    रोहन ने पूछा,

     

    “ये आपने बनाई है?”

     

    काव्या ने सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

    “लेकिन आप तो हमेशा बाजार से सबसे सुंदर राखी लाती थीं।”

     

    काव्या की आंखें नम हो गईं।

     

    “इस बार बाजार जाने का समय नहीं मिला।”

     

    रोहन चुप हो गया।

     

    फिर उसने पूछा,

     

    “क्यों?”

     

    काव्या ने बैग से एक और चीज निकाली।

     

    एक छोटा-सा अस्पताल का बिल।

     

    रोहन ने उसे देखा।

     

    “ये किसका है?”

     

    काव्या ने कहा,

     

    “मेरा नहीं।”

     

    “फिर किसका?”

     

    “माँ का।”

     

    रोहन का चेहरा बदल गया।

     

    “माँ?”

     

    “कुछ दिनों पहले उनकी तबीयत खराब हुई थी। उन्होंने तुझसे छिपाया क्योंकि तेरी परीक्षाएं थीं।”

     

    रोहन स्तब्ध रह गया।

     

    “लेकिन आपने मुझे क्यों नहीं बताया?”

     

    काव्या ने कहा,

     

    “क्योंकि तू परेशान हो जाता।”

     

    रोहन को अचानक याद आया।

     

    पिछले कई दिनों से माँ उससे कह रही थीं—

     

    “तू अपनी पढ़ाई पर ध्यान दे।”

     

    अब उसे सब समझ आने लगा।

     

    काव्या ने कहा,

     

    “मैं पिछले तीन दिनों से शहर में थी। माँ के इलाज और बाकी काम में लगी थी।”

     

    रोहन की आंखें भर आईं।

     

    “और आपने मुझे बताया भी नहीं।”

     

    काव्या मुस्कुराई।

     

    “बड़ी बहन होने की एक बीमारी होती है।”

     

    “क्या?”

     

    “छोटे भाई को परेशान नहीं होने देती।”

     

    रोहन ने धीरे से कहा,

     

    “लेकिन मैं अब छोटा नहीं हूं, दीदी।”

     

    काव्या की आंखों से आंसू निकल आए।

     

    “मेरे लिए हमेशा रहेगा।”

     

    रोहन चुप हो गया।

     

    काव्या ने राखी उठाई।

     

    “बांध दूं?”

     

    रोहन ने तुरंत अपनी कलाई आगे कर दी।

     

    काव्या के हाथ कांप रहे थे।

     

    राखी बांधते हुए उसने कहा,

     

    “मुझे लगा था इस बार शायद तू मुझसे नाराज़ रहेगा।”

     

    रोहन ने धीरे से कहा,

     

    “था।”

     

    “अब?”

     

    “अब भी हूं।”

     

    काव्या उसे देखने लगी।

     

    रोहन ने पहली बार मुस्कुराते हुए कहा,

     

    “क्योंकि आपने मुझे इतना बड़ा समझा ही नहीं कि सच बता सकें।”

     

    काव्या की आंखों में आंसू के साथ मुस्कान आ गई।

     

    “तो माफ कर दे।”

     

    रोहन ने कहा,

     

    “एक शर्त पर।”

     

    “क्या?”

     

    “अगली बार कुछ भी हो, मुझसे छिपाना नहीं।”

     

    काव्या ने उसकी तरफ देखा।

     

    “ठीक है।”

     

    रोहन ने कहा,

     

    “वादा?”

     

    काव्या ने अपनी उंगली आगे की।

     

    “वादा।”

     

    रोहन ने अचानक पूछा,

     

    “दीदी, आपने मेरे लिए कोई गिफ्ट नहीं खरीदा?”

     

    काव्या ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “इस बार नहीं।”

     

    रोहन ने बनावटी दुख दिखाया।

     

    “वाह! राखी भी हाथ से बनी और गिफ्ट भी नहीं।”

     

    काव्या हंस पड़ी।

     

    “बहुत बुरे भाई हो तुम।”

     

    “और आप बहुत बुरी बहन हैं।”

     

    दोनों कुछ सेकंड चुप रहे।

     

    फिर अचानक रोहन ने अपनी बहन को गले लगा लिया।

     

    “मुझे कुछ नहीं चाहिए दीदी।”

     

    काव्या ने उसके सिर पर हाथ रखा।

     

    “सच?”

     

    “हां।”

     

    रोहन ने उसकी कलाई पर बंधी राखी को छुआ।

     

    “बस अगली बार मुझे भूलना मत।”

     

    काव्या ने धीरे से कहा,

     

    “तू मेरे लिए सांस लेने जैसा है। कोई अपनी सांस भूल सकता है क्या?”

     

    रोहन की आंखें फिर भर आईं।

     

    कुछ देर बाद दोनों घर लौट आए।

     

    माँ दरवाजे पर खड़ी थीं।

     

    रोहन ने उन्हें देखते ही कहा,

     

    “माँ, आप दोनों ने मुझे बच्चा समझ रखा है क्या?”

     

    माँ और काव्या एक-दूसरे को देखने लगीं।

     

    माँ ने पूछा,

     

    “तुझे पता चल गया?”

     

    रोहन ने कहा,

     

    “हां।”

     

    फिर वह माँ के पास गया।

     

    “अगली बार मुझसे कुछ छिपाया तो मैं सच में नाराज़ हो जाऊंगा।”

     

    माँ ने उसके सिर पर हाथ रखा।

     

    “अब नहीं छिपाएंगे।”

     

    रोहन ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “पक्का?”

     

    माँ ने कहा,

     

    “पक्का।”

     

    उस रात रोहन अपने कमरे में बैठा अपनी कलाई की तरफ देख रहा था।

     

    वह राखी बहुत साधारण थी।

     

    न उसमें सोने की चमक थी।

     

    न महंगे पत्थर।

     

    न बाजार जैसी सजावट।

     

    लेकिन रोहन को लगा कि उसने जिंदगी की सबसे कीमती राखी पहनी है।

     

    क्योंकि उस राखी को खरीदने के लिए बहन के पास समय नहीं था…

     

    लेकिन भाई के लिए अपने हाथों से बनाने का प्यार जरूर था।

     

    अगले दिन काव्या वापस अपने घर जाने लगी।

     

    रोहन ने दरवाजे पर उसे रोक लिया।

     

    “दीदी!”

     

    “हां?”

     

    उसने कहा,

     

    “अगले साल मुझे कौन-सी राखी बांधोगी?”

     

    काव्या मुस्कुराई।

     

    “तुझे कौन-सी चाहिए?”

     

    रोहन ने अपनी कलाई पर बंधी राखी को देखते हुए कहा,

     

    “ऐसी ही।”

     

    “इतनी साधारण?”

     

    रोहन ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं।”

     

    काव्या ने पूछा,

     

    “फिर कैसी?”

     

    रोहन ने कहा,

     

    “जिसे बनाने में बाजार के पैसे नहीं, मेरी बहन का दिल लगा हो।”

     

    काव्या कुछ नहीं बोली।

     

    बस मुस्कुराई और अपने भाई के सिर पर हाथ रख दिया।

     

    और उस दिन रोहन को समझ आया—

     

    हर राखी की कीमत उसके धागे से नहीं होती।

     

    कुछ राखियां इसलिए सबसे कीमती होती हैं…

     

    क्योंकि उन्हें बांधने वाला इंसान हमें बिना बताए भी हमारी फिक्र करता रहता है।