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  • मेरी पहली कविता

    मेरी पहली कविता

    पढ़ने का समय : 2 मिनट

    याद है मुझे आज भी…

    याद है मुझे आज भी,
    मेरी वो पहली कविता।

    जब उसे लिखा था,
    तो कभी सोचा भी नहीं था
    कि मैं भी कुछ लिख सकती हूँ,
    अपने एहसासों को शब्दों में पिरो सकती हूँ।

    जब पहली बार उसे पढ़ा,
    तो दिल खुशी से भर गया था।
    ऐसा लगा जैसे मेरे मन की बातों को
    एक नई पहचान मिल गई हो।

    बड़ी उम्मीदों के साथ
    मैंने अपनी पहली कविता सबको दिखाई।

    सोचा था लोग उसके जज़्बात समझेंगे,
    उसमें छिपी भावनाओं को महसूस करेंगे।

    लेकिन तारीफ़ से ज़्यादा
    लोगों ने मेरी गलतियाँ गिनवा दीं।

    किसी ने शब्दों की कमी बताई,
    किसी ने लिखने का तरीका गलत कहा,
    और किसी ने ये तक कह दिया कि
    “तुमसे कविता नहीं लिखी जाएगी।”

    उन बातों ने दिल दुखाया,
    कुछ पल के लिए ऐसा लगा
    शायद सच में मैं लिख नहीं सकती।

    लेकिन फिर अगले ही दिन
    मैंने खुद से एक वादा किया।

    मैंने आईने में देखकर कहा—

    “नहीं… मैं हार नहीं मानूँगी।”

    जिसने मेरी गलतियाँ देखीं,
    मेरी भावनाएँ नहीं देखीं,
    एक दिन मैं उसे अपनी कलम की ताकत दिखाऊँगी।

    एक दिन ऐसा आएगा
    जब मेरी गलतियों की नहीं,
    मेरी कविताओं की बात होगी।

    लोग शब्दों की कमी नहीं,
    उनमें छिपे एहसासों को पढ़ेंगे।

    और जिस दिन ऐसा होगा,
    उन्हें मेरी पहली कविता भी याद आएगी।

    तब वे उसकी गलतियाँ नहीं,
    उसमें छिपे सपनों को याद करेंगे।

    उस मासूम कोशिश को याद करेंगे,
    जिसने एक लेखक को जन्म दिया था।

    क्योंकि हर बड़ी कहानी,
    हर बेहतरीन कविता,
    एक छोटी सी शुरुआत से ही जन्म लेती है।

     

    और मेरी शुरुआत…
    मेरी वही पहली कविता थी। ✍️❤️🌸

     

  • सपने जो

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    कुछ सपने टूट गए,

    कुछ अपने छूट गए,

    बाकी जो बची थी ज़िंदगी,

    उसे भी दर्द के हवाले कर गए। 💔

  • दर्द छुपाना सीख लिया 💔

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    अब किसी से शिकायत नहीं करते,

    अपने दर्द की नुमाइश नहीं करते,

    जो समझ सके वो अपना है,

    बाकी किसी को हम आज़माइश नहीं करते। 🖤🥀

  • बिन मौसम बरसात जैसे हो तुम

    बिन मौसम बरसात जैसे हो तुम

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    बिन मौसम बरसात जैसे हो तुम,
    मेरी यादों का पूरा आसमान हो तुम।

    कभी बूंदों बनकर चुपके से बरस जाते हो,
    तो कभी यादों का सैलाब बन दिल में उतर आते हो।

    जब भी तुम्हारी याद आती है,
    चेहरे पर एक मीठी सी मुस्कान छा जाती है।

    बीते हुए लम्हे फिर से जी उठते हैं,
    और अधूरी ख्वाहिशें भी हौले से गुनगुनाने लगती हैं।

    लेकिन जब भी तुम्हें देखने का दिल करता है,
    आँखों में अनजाने ही आँसू भर आते हैं।

    तुम्हारी कमी का एहसास
    दिल को फिर से तन्हा कर जाता है।

    बिन मौसम बरसात जैसे हो तुम,
    कभी सुकून तो कभी दर्द की बात जैसे हो तुम।

    मेरी हर दुआ, हर ख्वाब, हर एहसास में बसे हो,
    मेरी यादों के पूरे संसार जैसे हो तुम। ❤️🌹

  • आपका होना एक तरफ…

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    दुनिया की हर ख़ुशी एक तरफ़, और तेरा साथ एक तरफ़,

     

    *आने वाले कल को जीत लेंगे, बस थामे रखना मेरा हाथ एक तरफ़।*💝💝

  • निशब्द : अनकहे अल्फ़ाज़

    पढ़ने का समय : 2 मिनट

    कोई पूछे कि कौन हूँ मैं, कह देना कोई खास नहीं,

    भीड़ बहुत है इस दुनिया में, पर मेरे कोई पास नहीं।

    पढ़ सकते हैं लफ्ज़ मेरे, पर समझें वो एहसास नहीं,

    लिखे कितने दर्द यहाँ, पर मिलते सही अल्फ़ाज़ नहीं।

     

    कोई पूछे कि कौन हूँ मैं, कह देना कोई खास नहीं,

    दिल में उठते जज़्बात कई, पर मन में कोई साज़ नहीं,

    हर चेहरा मुझको जानता है, पर मेरा कोई नाम नहीं।

    मैं टूटा हुआ वो आईना हूँ, जिसमें झूठा अंदाज़ नहीं।

     

    कोई पूछे कि कौन हूँ मैं, कह देना कोई खास नहीं,

    चलता हूँ राहों पर तनहा, साथ में कोई आस नहीं।

    धड़कन चलती रहती है बस, उसमें कोई आवाज़ नहीं।

    हँसता हूँ मैं महफ़िलों में, पर दिल में कोई राग नहीं।

     

    कोई पूछे कि कौन हूँ मैं, कह देना कोई खास नहीं,

    मंज़िल खुद पूछे मुझसे, तेरा खुद पर विश्वास नहीं?

    आईना रोज़ टटोलता है, पर देता कोई जवाब नहीं,

    चेहरे सब पहचानते हैं, पर मेरी कोई पहचान नहीं।

     

    कोई पूछे कि कौन हूँ मैं, कह देना कोई खास नहीं,

    नींदों में भी सुकून मिल सके, ऐसी कोई रात नहीं।

    मैं वो लफ़्ज़ हूँ टूटा सा, जिसकी कोई किताब नहीं,

    मैं वो दरिया हूँ सूखा सा, जिसकी कोई प्यास नहीं।

     

    कोई पूछे कि कौन हूँ मैं, कह देना कोई खास नहीं,

    भीतर जितनी रोशनी है, उतनी बाहर बात नहीं।

    कोई पूछे फिर भी मुझसे, दुनिया में कुछ खास नहीं?

    मुस्काकर बस इतना कहता हूँ, शायद मैं ही खास नहीं।

     

    ~ देव श्रीवास्तव ” दिव्यम ” ✍️

  • खुद को पाना आसान नहीं….

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    खुद को पाना आसान नहीं था जनाब,

    मैंने अपना सर्वस्व गँवाकर खुद को पाया है।

     

    आसान नहीं था इच्छाओं, आशाओं और उम्मीदों का त्याग,

    मैंने हर चाहत को दिल में दफ़नाया है।

     

    खुद को पाने की राह में बड़ी यातनाएँ सही हैं मैंने,

    हर आँसू को मुस्कान के पीछे छुपाया है।

     

    टूटकर, बिखरकर, फिर से खुद को गढ़ा है मैंने,

    तब कहीं जाकर अपने अस्तित्व को अपनाया है।

     

    खुद को पाना आसान नहीं था जनाब,

    मैंने बहुत कुछ खोकर ये मुकाम पाया

  • तीसरी चाय

    तीसरी चाय

    पढ़ने का समय : 4 मिनट

    एक बेटी की शादी के बाद, विदाई के वक्त आंसू तो सब देखते हैं, लेकिन उस खालीपन को कोई नहीं देख पाता जो वह अपने पीछे छोड़ जाती है। यह कहानी उसी खालीपन और एक पिता-बेटी के रिश्ते की है, जहाँ “तीसरी चाय” उनकी आखरी चाय बन गई।

    तीसरी चाय

    अविनाश जी के दिन की शुरुआत हमेशा तीन कप चाय से होती थी। पहली सुबह की धूप के साथ, दूसरी दोपहर के आलस को भगाने के लिए, और तीसरी… तीसरी चाय उनके लिए सिर्फ एक पेय नहीं, बल्कि पूरे दिन का सबसे खूबसूरत हिस्सा थी।

    यह तीसरी चाय शाम को ठीक ६ बजे बनती थी। इस चाय का एक नियम था इसे सिर्फ अविनाश जी और उनकी बेटी, पीहू, साथ पीते थे। पीहू जब से कॉलेज से, और बाद में ऑफिस से लौटती, वह सीधे रसोई में जाती थी। दो कप चाय छनती, और दोनों बालकनी में बैठ जाते। वहाँ न कोई फोन होता, न कोई अखबार। सिर्फ पिता-बेटी, दफ्तर की बातें, राजनीति, पुरानी यादें और ढेर सारे ठहाके।

    “पापा, आपके हाथ की अदरक वाली तीसरी चाय न मिले, तो मेरा दिन पूरा नहीं होता है। ” पीहू अक्सर कहती थी।

    अविनाश जी मुस्कुरा कर कहते थे। “और यह चाय न पिलाऊँ, तो मेरा दिन खत्म नहीं होता, बेटा।

    वक्त पंख लगाकर उड़ गया। पीहू की शादी तय हो गई। घर में शहनाइयाँ गूँज उठीं, मेहमानों का ताँता लग गया। अविनाश जी शादी की तैयारियों में इतने मसरूफ रहे कि उन्हें सोचने का मौका ही नहीं मिला।

    देखते ही देखते विदाई का दिन भी आ गया।

    शादी के ठीक अगले दिन, शाम के ५:३० बज रहे थे। विदाई हो चुकी थी। सारे मेहमान अपने-अपने कमरों में थककर सो रहे थे। पूरा घर, जो कल तक हँसी-मजाक से गूँज रहा था, अचानक एक अजीब सी खामोशी में डूब गया था। चारों तरफ बिखरी हुई गेंदे के फूलों की पंखुड़ियाँ और खाली कुर्सियाँ उस अकेलेपन को और बढ़ा रही थीं।

    अविनाश जी अकेले अपने सोफे पर बैठे थे। उनकी नजर घड़ी पर गई शाम के ठीक ५:५५ हो रहे थे।

    आदत से मजबूर, वे भारी कदमों से रसोई की तरफ बढ़े। उन्होंने गैस जलाई, सस्पेन में पानी रखा। अदरक कूटी, पत्ती डाली, दूध मिलाया। चाय उबल रही थी और उसकी खुशबू पूरे घर में फैल गई।

    अविनाश जी ने दो कप निकाले। हमेशा की तरह।

    उन्होंने दोनों कपों में चाय छानी। ट्रे उठाई और बालकनी की तरफ चल दिए। बालकनी में दो कुर्सियाँ हमेशा की तरह आमने-सामने रखी थीं।

    अविनाश जी अपनी कुर्सी पर बैठ गए। उन्होंने पीहू की कुर्सी के सामने दूसरा कप रख दिया। चाय से भाप उठ रही थी। उन्होंने आदत के मुताबिक आवाज देने के लिए मुँह खोला “पीहू, चाय तैयार” पर शब्द उनके हलक में ही फंस गए।

    सामने की कुर्सी खाली थी। वहाँ कोई नहीं था। पीहू अब अपने नए घर, अपनी नई जिंदगी में कदम रख चुकी थी। वह अब इस घर की मेहमान थी, बाशिंदा नहीं।

    अविनाश जी ने उस दूसरे कप को देखा। गर्म चाय की वह भाप धीरे-धीरे ठंडी हो रही थी, ठीक वैसे ही जैसे उनके दिल की धड़कनें उस सूनेपन में जम रही थीं। उन्हें अहसास हुआ कि अब से हर शाम ६ बजे चाय तो बनेगी, पर वह तीसरी चाय साझा करने वाली पीहू वहाँ नहीं होगी।

    उन्होंने पीहू के हिस्से की उस चाय के कप को धीरे से छुआ। वह कप अभी भी गुनगुना था, मानो पीहू की आखिरी छुअन उसमें बाकी हो। अविनाश जी की आँखों से एक आंसू टपका और सीधे उनकी चाय में जा गिरा।

    वह तीसरी चाय, एक पिता के साथ उसकी बेटी की आखरी चाय बन चुकी थी सच्ची नहीं, तो यादों के साए में ही सही है।

    “दुकानें चाय की अब भी सजी हैं शहर में,

    मगर वो तीसरी चाय का स्वाद बेटी के साथ ही चला गया।”

    Lakshmi Kumari …..

    साप्ताहिक प्रतियोगिता……

  • कागज पर थकान लिखूँगी.. ✍️✍️

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    ✍️✍️

    अगर मौका मिला कभी , तो कागज पर अपनी थकान लिखूंगी ✍️✍️

    मजबूत कंधों के पीछे छुपी,, वो छोटी सी इन्सान लिखूंगी ✍️✍️

    जो हर मुश्किल में मुस्कुरा कर कहती है सब ठीक है🥲🥲

    उस एक झूठ के पीछे छुपे , हजारों बेबस तूफान लिखूंगी ✍️✍️

    नहीं लिखूंगी मैं सिर्फ अपनी जीत के चर्चे दुनिया में ✍️

    मैं तो हार कर भी मुस्कराई,, वो लहुलुहान स्वाभिमान लिखूंगी ✍️✍️

    लिखूंगी वो रातें जब तकिया गवाह था,,मेरी सिसकियों का🥹🥹

    पर सुबह उठकर फिर से बनी,, चट्टान जैसी इन्सान लिखूंगी ✍️✍️

     

    मैं लिख पाऊं कुछ तो 

    मैं खुद को लिखूंगी ✍️✍️

    अपनी रुह के हर ज़ख्म को 

    अपना ही सम्मान लिखूंगी ✍️✍️✍️

  • जहर हो रहे है…

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    गांव बदल कर शहर हो रहे है…

     

    इंसान दिन ब दिन जहर हो रहे है… ✍️✍️