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  • भाग 2: हवेली में पाँचवाँ कौन था?

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

     

     

    आरव दीवार के सामने खड़ा रह गया।

     

    उसके हाथ में टॉर्च काँप रही थी।

     

    दीवार पर लिखा था—

     

    “अब तुम पाँच हो।”

     

    निखिल, करण और मोहित उसके पीछे खड़े थे।

     

    चारों ने एक-दूसरे को देखा।

     

    मोहित की आवाज काँप रही थी।

     

    “हम तो चार हैं…”

     

    करण ने तुरंत गिनती की।

     

    “आरव… निखिल… मोहित… मैं।”

     

    चार।

     

    फिर उसने पीछे देखा।

     

    गलियारा खाली था।

     

    लेकिन उसी समय तीसरे कमरे के अंदर से एक बच्ची के रोने की आवाज आई।

     

    “भैया…”

     

    आरव ने आँखें बंद कर लीं।

     

    “ये हमें डराने की कोशिश कर रही है।”

     

    निखिल ने कहा—

     

    “लेकिन सीढ़ियाँ कहाँ गईं?”

     

    किसी के पास जवाब नहीं था।

     

    वे जिस रास्ते से ऊपर आए थे, वहाँ अब एक काली दीवार खड़ी थी।

     

    आरव ने दीवार को हाथ लगाया।

     

    वह पत्थर की तरह ठंडी थी।

     

    “पीछे हटो।”

     

    उसने लोहे की टॉर्च से दीवार पर वार किया।

     

    ठक!

     

    दीवार पर कोई निशान नहीं पड़ा।

     

    तभी पीछे से किसी ने धीरे से कहा—

     

    “सीढ़ियाँ तुम्हें जाने नहीं देंगी।”

     

    चारों एक साथ पलटे।

     

    गलियारे के आखिर में वही छोटी लड़की खड़ी थी, जिसे उन्होंने आईने में देखा था।

     

    इस बार वह सच में वहाँ थी।

     

    उसने सफेद रंग की पुरानी फ्रॉक पहन रखी थी।

     

    उसके लंबे बाल चेहरे पर बिखरे हुए थे।

     

    आरव ने धीरे से पूछा—

     

    “तुम कौन हो?”

     

    लड़की ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    वह तीसरे कमरे की तरफ देखने लगी।

     

    फिर उसने अपना हाथ उठाकर इशारा किया।

     

    “उसके अंदर मत जाना।”

     

    मोहित ने पूछा—

     

    “कौन है अंदर?”

     

    लड़की ने उसकी तरफ देखा।

     

    “वो…”

     

    कुछ पल चुप रहने के बाद उसने कहा—

     

    “जो मेरा पिता बनकर घूमता है।”

     

    चारों के चेहरे पर डर उतर आया।

     

    आरव ने पूछा—

     

    “तुम्हारे पिता कौन थे?”

     

    लड़की ने धीरे से कहा—

     

    “इस हवेली के मालिक।”

     

    “और उन्होंने तुम्हें कमरे में बंद किया था?”

     

    लड़की ने सिर हिलाया।

     

    “उन्होंने मुझे नहीं बंद किया।”

     

    “फिर?”

     

    लड़की ने तीसरे कमरे की तरफ देखा।

     

    “उसने किया था।”

     

    अचानक कमरे के अंदर से किसी आदमी की आवाज आई—

     

    “झूठ बोल रही है।”

     

    लड़की डरकर पीछे हट गई।

     

    दरवाजे की जंजीर अपने आप हिलने लगी।

     

    छन्न… छन्न…

     

    आरव ने देखा कि जंजीर धीरे-धीरे खुल रही थी।

     

    निखिल ने कहा—

     

    “भागो!”

     

    लेकिन लड़की ने जोर से चिल्लाया—

     

    “रुको!”

     

    जंजीर अचानक जमीन पर गिर गई।

     

    तीसरे कमरे का दरवाजा थोड़ा-सा खुल गया।

     

    अंदर से घना अंधेरा दिखाई दे रहा था।

     

    और उस अंधेरे के बीच…

     

    एक पुरानी लकड़ी की कुर्सी रखी थी।

     

    कुर्सी पर एक आदमी बैठा था।

     

    उसका चेहरा दिखाई नहीं दे रहा था।

     

    आरव ने टॉर्च उसकी तरफ की।

     

    आदमी ने धीरे-धीरे अपना सिर उठाया।

     

    उसका चेहरा देखकर चारों के मुँह से चीख निकल गई।

     

    चेहरा इंसान जैसा था…

     

    लेकिन आँखें नहीं थीं।

     

    जहाँ आँखें होनी चाहिए थीं, वहाँ सिर्फ काली त्वचा थी।

     

    उसने मुस्कुराकर कहा—

     

    “अंदर आओ।”

     

    आरव पीछे हट गया।

     

    आदमी ने फिर कहा—

     

    “तुम चार नहीं हो।”

     

    उसकी आवाज पूरे गलियारे में गूँजने लगी।

     

    “तुम पाँच हो।”

     

    मोहित ने डरते हुए पूछा—

     

    “पाँचवाँ कौन है?”

     

    वह आदमी हँसने लगा।

     

    फिर उसने उंगली आरव की तरफ कर दी।

     

    “वही।”

     

    आरव ने पीछे देखा।

     

    उसके पीछे कोई नहीं था।

     

    “मैं?”

     

    आदमी ने सिर हिलाया।

     

    “तुम्हारे अंदर पाँचवाँ पहले से है।”

     

    अचानक आरव को सिर में तेज दर्द हुआ।

     

    उसे चक्कर आने लगे।

     

    उसके कानों में फुसफुसाहट सुनाई दी—

     

    “मुझे याद करो…”

     

    आरव ने अपना सिर पकड़ लिया।

     

    और तभी उसे एक दृश्य दिखाई दिया।

     

    एक छोटी बच्ची हवेली के आँगन में खेल रही थी।

     

    उसके साथ एक लड़का भी था।

     

    लड़के का चेहरा आरव जैसा था।

     

    आरव डरकर जमीन पर बैठ गया।

     

    “ये क्या है?”

     

    लड़की उसके पास आई।

     

    उसने पहली बार अपना नाम बताया।

     

    “मेरा नाम मीरा है।”

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

     

    “और वो लड़का?”

     

    मीरा ने कहा—

     

    “वो मेरा भाई था।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “कहाँ है वो?”

     

    मीरा ने उसकी आँखों में देखा।

     

    “तुम्हारे अंदर।”

     

    अचानक हवेली में जोर की घंटी बजने लगी।

     

    टन… टन… टन…

     

    कमरे के अंदर बैठा वह बिना आँखों वाला आदमी खड़ा हो गया।

     

    “अब समय आ गया है।”

     

    मीरा चिल्लाई—

     

    “आरव! दरवाजा बंद करो!”

     

    आरव ने पूरी ताकत से तीसरे कमरे का दरवाजा बंद करने की कोशिश की।

     

    लेकिन उस आदमी ने अंदर से दरवाजा पकड़ लिया।

     

    उसकी ताकत बहुत ज्यादा थी।

     

    करण और निखिल भी आरव की मदद करने लगे।

     

    मोहित पीछे खड़ा काँप रहा था।

     

    तभी उसके कंधे पर किसी ने हाथ रखा।

     

    मोहित ने सोचा कि शायद करण है।

     

    उसने पीछे मुड़कर देखा।

     

    वहाँ कोई नहीं था।

     

    फिर उसके कान के पास फुसफुसाहट हुई—

     

    “पाँचवाँ मिल गया…”

     

    मोहित की आँखें फैल गईं।

     

    उधर आरव ने दरवाजा पूरी ताकत से बंद कर दिया।

     

    तीसरा कमरा बंद हो गया।

     

    कुछ सेकंड तक सब शांत रहा।

     

    फिर मोहित की चीख सुनाई दी।

     

    तीनों ने पलटकर देखा।

     

    मोहित गलियारे के आखिरी कोने में खड़ा था।

     

    उसकी आँखें बंद थीं।

     

    और वह मुस्कुरा रहा था।

     

    आरव ने पूछा—

     

    “मोहित?”

     

    मोहित ने धीरे-धीरे आँखें खोलीं।

     

    लेकिन उसकी आँखों का रंग बदल चुका था।

     

    वे पूरी तरह काली थीं।

     

    उसने मुस्कुराकर कहा—

     

    “तुम लोगों ने गलत दरवाजा बंद किया है।”

     

    फिर पीछे की दीवार से आवाज आई—

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    और इस बार आवाज तीसरे कमरे से नहीं…

     

    उनके पीछे से आ रही थी।

  • भाग 1: आधी रात की दस्तक

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

     

     

    शहर से करीब पंद्रह किलोमीटर दूर एक छोटा-सा गाँव था—रामपुरा।

     

    गाँव के आखिरी छोर पर एक बहुत पुरानी हवेली थी।

     

    लोग उसे काली हवेली कहते थे।

     

    हवेली इतनी पुरानी थी कि उसकी दीवारों पर उगी काई ने पूरी इमारत को हरे और काले रंग में ढक दिया था। खिड़कियों के शीशे टूटे हुए थे और मुख्य दरवाजे पर लोहे की बड़ी-बड़ी कीलें लगी थीं।

     

    लेकिन उस हवेली की सबसे डरावनी बात उसका बंद पड़ा तीसरा कमरा था।

     

    गाँव के बुजुर्ग कहते थे कि उस कमरे का दरवाजा पिछले पैंतीस साल से नहीं खुला था।

     

    और जो भी उसे खोलने की कोशिश करता…

     

    वह रात में गायब हो जाता।

     

    इसी गाँव में आरव नाम का एक लड़का रहता था।

     

    आरव को पुरानी जगहों और रहस्यमयी कहानियों में बहुत दिलचस्पी थी। वह हमेशा अपने दोस्तों से कहता था—

     

    “भूत होते तो आज तक किसी ने वीडियो बना लिया होता।”

     

    उसके तीन दोस्त थे—निखिल, करण और मोहित।

     

    एक दिन चारों स्कूल से लौट रहे थे।

     

    रास्ते में निखिल ने काली हवेली की तरफ देखते हुए कहा—

     

    “तुझे पता है, कल रात वहाँ से किसी लड़की के रोने की आवाज आई थी।”

     

    आरव हँस पड़ा।

     

    “तू भी दादी-नानी वाली कहानियों पर विश्वास करता है?”

     

    करण ने कहा—

     

    “मजाक मत कर। मेरे चाचा ने भी सुना है।”

     

    आरव ने हवेली की तरफ देखा।

     

    उसकी तीसरी मंजिल की एक खिड़की खुली थी।

     

    “अगर वहाँ कोई है, तो आज रात पता कर लेते हैं।”

     

    मोहित तुरंत बोला—

     

    “तू पागल है क्या?”

     

    आरव मुस्कुराया।

     

    “डर गया?”

     

    “डर नहीं लगा…”

     

    मोहित ने धीमे से कहा।

     

    “लेकिन उस हवेली के बारे में एक बात सच है।”

     

    “क्या?”

     

    “उसमें रात के बारह बजे कोई दरवाजा खटखटाता है।”

     

    चारों कुछ पल चुप रहे।

     

    आरव ने पूछा—

     

    “कौन?”

     

    मोहित ने सिर हिलाया।

     

    “किसी को नहीं पता।”

     

    उस रात करीब साढ़े ग्यारह बजे चारों दोस्त हवेली के बाहर पहुँच गए।

     

    आसमान में बादल थे।

     

    चाँद कभी बादलों के पीछे छिप जाता, कभी दिखाई देता।

     

    हवेली का मुख्य दरवाजा आधा खुला था।

     

    आरव ने टॉर्च जलाई।

     

    “चलो।”

     

    अंदर कदम रखते ही ठंडी हवा का झोंका आया।

     

    हवेली के अंदर धूल की मोटी परत थी।

     

    दीवारों पर पुराने चित्र लगे थे।

     

    एक चित्र में हवेली के मालिक का परिवार दिखाई दे रहा था।

     

    एक आदमी…

     

    एक औरत…

     

    और उनके बीच करीब दस साल की एक लड़की।

     

    मोहित ने तस्वीर पर टॉर्च डाली।

     

    “इस लड़की के चेहरे पर खरोंच क्यों है?”

     

    आरव ने पास जाकर देखा।

     

    लड़की के चेहरे को किसी नुकीली चीज से इतनी बार खरोंचा गया था कि चेहरा पहचान में नहीं आ रहा था।

     

    तभी ऊपर से आवाज आई।

     

    ठक…

     

    चारों ने सिर उठाया।

     

    फिर—

     

    ठक… ठक…

     

    जैसे कोई ऊपर की मंजिल पर चल रहा हो।

     

    करण ने फुसफुसाकर कहा—

     

    “कोई है।”

     

    आरव ने कहा—

     

    “चलकर देखते हैं।”

     

    वे सीढ़ियों की तरफ बढ़े।

     

    हर कदम के साथ लकड़ी की सीढ़ियाँ चरमरातीं।

     

    ऊपर पहुँचकर उन्हें एक लंबा गलियारा दिखाई दिया।

     

    गलियारे के आखिर में तीन दरवाजे थे।

     

    पहला कमरा खुला था।

     

    दूसरा बंद था।

     

    और तीसरे कमरे पर मोटी लोहे की जंजीर बंधी थी।

     

    जंजीर पर लाल रंग से कुछ लिखा था—

     

    “इसे मत खोलना।”

     

    आरव ने टॉर्च उस लिखावट पर डाली।

     

    मोहित पीछे हट गया।

     

    “हमें वापस जाना चाहिए।”

     

    तभी तीसरे कमरे के अंदर से आवाज आई।

     

    बहुत धीमी।

     

    एक लड़की की आवाज।

     

    “भैया…”

     

    चारों जम गए।

     

    फिर आवाज आई—

     

    “मुझे बाहर निकालो…”

     

    मोहित की साँसें तेज हो गईं।

     

    “यहाँ कोई बच्ची बंद है!”

     

    आरव ने जंजीर को देखा।

     

    “अगर सच में कोई अंदर है तो हमें मदद करनी चाहिए।”

     

    करण ने कहा—

     

    “लेकिन यह जंजीर…”

     

    आरव ने उसे पकड़ लिया।

     

    जंजीर बर्फ जैसी ठंडी थी।

     

    अचानक अंदर से जोर की आवाज आई।

     

    धड़ाम!

     

    चारों पीछे हट गए।

     

    फिर दरवाजे के नीचे से किसी की उंगलियाँ दिखाई दीं।

     

    पतली…

     

    सफेद…

     

    और असामान्य रूप से लंबी।

     

    वे उंगलियाँ धीरे-धीरे दरवाजे के नीचे से बाहर आईं।

     

    मोहित चीखने ही वाला था कि आरव ने उसका मुँह दबा दिया।

     

    अंदर से लड़की की आवाज आई—

     

    “भैया… तुम आ गए।”

     

    आरव का दिल तेजी से धड़कने लगा।

     

    “तुम कौन हो?”

     

    कुछ सेकंड कोई जवाब नहीं आया।

     

    फिर अंदर से आवाज आई—

     

    “मैं वही हूँ… जिसे इस हवेली ने पैंतीस साल पहले बंद कर दिया था।”

     

    आरव ने करण की तरफ देखा।

     

    “पैंतीस साल?”

     

    तभी उसके पीछे लगे पुराने आईने में कुछ दिखाई दिया।

     

    चारों लड़के वहाँ खड़े थे।

     

    लेकिन आईने में…

     

    पाँच लोग दिखाई दे रहे थे।

     

    उनके पीछे एक छोटी लड़की खड़ी थी।

     

    उसका चेहरा बिल्कुल काला था।

     

    और वह धीरे-धीरे अपना हाथ उठाकर तीसरे कमरे की तरफ इशारा कर रही थी।

     

    आरव ने पलटकर पीछे देखा।

     

    वहाँ कोई नहीं था।

     

    फिर आईने की तरफ देखा।

     

    लड़की अब भी वहाँ थी।

     

    उसने अपने होंठ खोले।

     

    और बिना आवाज के सिर्फ इतना कहा—

     

    “दरवाजा मत खोलना।”

     

    अचानक तीसरे कमरे के अंदर से जोर-जोर से दरवाजा पीटने की आवाज आने लगी।

     

    धड़ाम!

     

    धड़ाम!

     

    धड़ाम!

     

    और फिर एक आदमी की भारी आवाज गूँजी—

     

    “उसे बाहर मत निकालना!”

     

    चारों लड़के डरकर सीढ़ियों की तरफ भागे।

     

    लेकिन सीढ़ियों के पास पहुँचते ही आरव रुक गया।

     

    नीचे जाने वाली सीढ़ियाँ गायब थीं।

     

    उनकी जगह…

     

    एक लंबी, काली दीवार थी।

     

    और दीवार पर ताजा खून से लिखा था—

     

    “अब तुम पाँच हो।”

  • भाग 6 — सच और सीख

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

     

    कई साल बीत गए।

    आरव अब बड़ा हो चुका था।

    उसने उस पुराने घर के बारे में कभी किसी से बात नहीं की।

    उसके पिता ने वह मकान बेच दिया था और शहर में नया घर बना लिया था।

    आरव की जिंदगी धीरे-धीरे सामान्य हो गई।

    लेकिन अपनी माँ की एक बात वह कभी नहीं भूला—

    “सच से कभी मत भागना।”

    एक दिन आरव अपने पिता के पुराने सामान को व्यवस्थित कर रहा था।

    उसे एक लकड़ी का डिब्बा मिला।

    डिब्बे में उसकी माँ की तस्वीर थी।

    और उसके नीचे एक छोटी डायरी।

    आरव ने डायरी खोली।

    पहले पन्ने पर लिखा था—

    “अगर कभी आरव बड़ा होकर यह डायरी पढ़े, तो उसे सच्चाई जरूर बताना।”

    आरव की आंखों में आंसू आ गए।

    उसने पढ़ना शुरू किया।

    मीरा ने लिखा था कि उसे अपनी मृत्यु का अंदाजा हो गया था।

    उसे पता था कि सावित्री की आत्मा खतरनाक है।

    लेकिन उसे यह भी पता था कि असली समस्या सिर्फ सावित्री नहीं थी।

    कालिका उस घर में बहुत पहले से मौजूद थी।

    मीरा ने अपने बेटे को बचाने के लिए अपनी आत्मा का एक हिस्सा उस घर में छोड़ दिया था।

    इसलिए वह कई बार आरव को दिखाई देती थी।

    आरव यह पढ़कर चौंक गया।

    उसने आगे पढ़ा—

    “मैं नहीं चाहती कि मेरा बेटा भूतों से डरकर जिंदगी जिए। मैं चाहती हूं कि वह समझे कि डर हमेशा बाहर से नहीं आता। कई बार डर हमारे अपने मन में होता है।”

    आरव ने डायरी बंद कर दी।

    उसी रात उसने सपना देखा।

    वह उसी पुराने घर में खड़ा था।

    ऊपर वाला कमरा खुला था।

    अंदर उसकी माँ बैठी थीं।

    उन्होंने मुस्कुराकर कहा—

    “तुमने डायरी पढ़ ली?”

    आरव ने कहा—

    “हाँ।”

    “अब तुम्हें सब समझ आ गया?”

    “हाँ, माँ।”

    “तो अब तुम मुझसे एक वादा करो।”

    “क्या?”

    “किसी बच्चे को कभी डर के साथ अकेला मत छोड़ना।”

    आरव ने सिर हिलाया।

    “मैं वादा करता हूँ।”

    मीरा ने कहा—

    “और एक बात।”

    “क्या?”

    “लोगों को डराने के लिए भूत की कहानी मत सुनाना। अगर सुनाओ, तो उसमें छिपी सीख भी बताना।”

    आरव मुस्कुराया।

    तभी सपना टूट गया।

    सुबह वह उठकर खिड़की के पास गया।

    सूरज निकल चुका था।

    आसमान साफ था।

    उसने पहली बार महसूस किया कि उसकी माँ सच में उससे दूर नहीं गई थीं।

    वह उसकी यादों में थीं।

    उसकी आदतों में थीं।

    उसके संस्कारों में थीं।

    उसके दिल में थीं।

    कुछ दिनों बाद आरव ने उस पुराने घर को देखने का फैसला किया।

    वह वहां पहुंचा तो घर लगभग खंडहर बन चुका था।

    मुख्य दरवाजा टूटा हुआ था।

    ऊपर की खिड़की पर धूल जमी थी।

    आरव धीरे-धीरे अंदर गया।

    उसे डर नहीं लग रहा था।

    वह ऊपर गया।

    जिस कमरे में कभी भयानक घटनाएं हुई थीं, वहां अब खाली दीवारें थीं।

    उसने फर्श को देखा।

    जहां कभी काला निशान बना था, वहां अब एक छोटा-सा पौधा उग आया था।

    आरव कुछ देर उसे देखता रहा।

    फिर उसके पीछे किसी ने कहा—

    “बेटा…”

    आरव ने तुरंत पीछे देखा।

    कोई नहीं था।

    उसके चेहरे पर मुस्कान आ गई।

    “माँ?”

    हवा का हल्का झोंका आया।

    खिड़की का पर्दा हिला।

    और जमीन पर एक सूखा पत्ता गिरा।

    आरव ने पत्ता उठाया।

    उस पर लाल रंग की हल्की रेखा थी।

    उसे अचानक लाल गेंद याद आई।

    रवि।

    सावित्री।

    कालिका।

    और वह पूरा डरावना अतीत।

    आरव ने पत्ते को वहीं रख दिया।

    “सबको शांति मिले।”

    वह नीचे आ गया।

    घर से बाहर निकलते समय उसने आखिरी बार पीछे देखा।

    इस बार ऊपर की खिड़की में कोई चेहरा नहीं था।

    सिर्फ सुबह की धूप थी।

    आरव ने समझ लिया कि कहानी खत्म हो चुकी है।

    लेकिन जाते-जाते उसे एक बात महसूस हुई—

    किसी भी घर को भूतिया बनाने वाली चीज सिर्फ दीवारें नहीं होतीं।

    कभी-कभी इंसानों का लालच, गुस्सा, बदला और अधूरा दुःख भी किसी जगह को डरावना बना देता है।

    सावित्री बुरी बनकर पैदा नहीं हुई थी।

    वह अपने बेटे के प्यार में टूट गई थी।

    देवदत्त अपने बेटे को वापस लाने की लालसा में गलत रास्ते पर चला गया।

    कालिका ने लोगों के दुःख का फायदा उठाया।

    और मीरा ने अपने बेटे को बचाने के लिए अपनी आखिरी सांस तक हिम्मत नहीं छोड़ी।

    यही इस कहानी का सबसे बड़ा सच था।

    डर से भागने पर डर बड़ा होता है।

    सच का सामना करने पर डर छोटा हो जाता है।

    और सबसे बड़ी बात—

    जिस इंसान के दिल में सच्चा प्यार और अच्छे संस्कार होते हैं, उसे अंधेरे से लड़ने के लिए किसी जादू की जरूरत नहीं होती।

    कहानी की सीख

    इस कहानी से हमें कई महत्वपूर्ण बातें सीखने को मिलती हैं—

    डर के कारण किसी गलत फैसले पर भरोसा नहीं करना चाहिए।

    दुःख को दिल में दबाकर रखने के बजाय उसे स्वीकार करना जरूरी है।

    लालच और बदले की भावना इंसान को गलत रास्ते पर ले जा सकती है।

    मुश्किल समय में परिवार का साथ सबसे बड़ी ताकत बनता है।

    सच्चाई चाहे कितनी भी डरावनी हो, उससे भागने के बजाय उसका सामना करना चाहिए।

    किसी की गलती के पीछे छिपे दुःख को समझना जरूरी है, लेकिन गलत काम को सही नहीं मानना चाहिए।

    माफी कमजोरी नहीं, बल्कि अपने मन को आजाद करने की ताकत है।

    माँ-बाप का प्यार शरीर के खत्म होने के बाद भी उनकी यादों और संस्कारों के रूप में हमारे साथ रहता है।

    और शायद इसी वजह से आरव की माँ की आखिरी बात सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण थी—

    “डर को अपनी जिंदगी मत बनने देना। अंधेरा कितना भी गहरा हो, एक छोटी-सी रोशनी उसे खत्म करने के लिए काफी होती है।”

    समाप्त।

  • भाग 5 — आखिरी रात

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

     

    आईना टूट चुका था।

    सावित्री की आत्मा मुक्त हो चुकी थी।

    रवि भी चला गया था।

    और आरव को लगा कि अब सब खत्म हो गया है।

    लेकिन उसके पिता को यकीन नहीं था।

    उन्होंने कहा—

    “जब तक कालिका का नाम इस घर से पूरी तरह मिट नहीं जाता, खतरा खत्म नहीं हुआ है।”

    आरव ने पूछा—

    “हम उसे कैसे खत्म करेंगे?”

    पापा ने कहा—

    “मुझे नहीं पता।”

    दोनों ने साधु को फोन किया।

    साधु ने कहा—

    “आज रात घर में मत रहना।”

    पापा ने पूछा—

    “क्यों?”

    “क्योंकि आज अमावस्या है।”

    आरव ने खिड़की से बाहर देखा।

    आसमान पर बादल छाए थे।

    रात करीब दस बजे अचानक बिजली चली गई।

    पापा ने कहा—

    “हम अभी निकलते हैं।”

    लेकिन जैसे ही उन्होंने मुख्य दरवाजा खोला, बाहर घना कोहरा था।

    सड़क दिखाई नहीं दे रही थी।

    फिर दरवाजा अपने आप बंद हो गया।

    ठक!

    आरव ने कहा—

    “पापा…”

    पापा ने उसका हाथ पकड़ लिया।

    “डरो मत।”

    तभी घर में किसी बच्चे के रोने की आवाज आई।

    “माँ…”

    आरव चौंका।

    यह रवि की आवाज थी।

    “लेकिन रवि तो मुक्त हो गया था।”

    पापा ने कहा—

    “यह रवि नहीं है।”

    आवाज फिर आई—

    “माँ…”

    फिर उसी आवाज ने कहा—

    “आरव…”

    आरव पीछे हट गया।

    आवाज बदलने लगी।

    पहले रवि।

    फिर उसकी माँ।

    फिर सावित्री।

    फिर कई लोगों की आवाजें एक साथ।

    “आरव…”

    दीवारों पर काले हाथों के निशान दिखाई देने लगे।

    पापा ने मंदिर से मिला पवित्र धागा आरव की कलाई पर बांध दिया।

    “जब तक यह तुम्हारे हाथ में है, वह तुम्हें छू नहीं पाएगी।”

    तभी ऊपर से किसी के दौड़ने की आवाज आई।

    धड़धड़धड़…

    पापा ने कहा—

    “हमें ऊपर जाना होगा।”

    आरव डर गया।

    “फिर से?”

    “हाँ। इस बार हमें इसे हमेशा के लिए खत्म करना होगा।”

    दोनों सीढ़ियां चढ़ने लगे।

    ऊपर पहुंचकर उन्होंने देखा कि टूटा हुआ आईना पूरी तरह गायब था।

    उसकी जगह फर्श पर एक गोल काला निशान बना हुआ था।

    निशान के बीच एक पुराना दीपक रखा था।

    दीपक अपने आप जल उठा।

    और उसके पीछे एक आवाज आई—

    “आखिर तुम आ ही गए।”

    कालिका सामने खड़ी थी।

    अब उसका चेहरा साफ दिखाई दे रहा था।

    वह किसी बूढ़ी औरत जैसी दिखती थी।

    उसकी आंखें पूरी तरह काली थीं।

    पापा ने पूछा—

    “तुम्हें क्या चाहिए?”

    “वही जो मुझे कभी नहीं मिला।”

    “क्या?”

    “एक शरीर।”

    आरव ने डरते हुए पूछा—

    “किसका?”

    कालिका मुस्कुराई।

    “तुम्हारा।”

    आरव पीछे हट गया।

    “मैं तुम्हें अपना शरीर नहीं दूंगा।”

    “तुम्हें देना नहीं पड़ेगा।”

    उसने हाथ उठाया।

    आरव की आंखों के सामने अंधेरा छाने लगा।

    उसे लगा जैसे वह किसी दूसरी जगह पहुंच गया है।

    उसने खुद को एक पुराने घर में देखा।

    वहां एक छोटा बच्चा खेल रहा था।

    एक महिला उसे खाना खिला रही थी।

    वह सावित्री थी।

    बच्चा रवि था।

    दृश्य बदल गया।

    रवि सड़क पर खेल रहा था।

    एक तेज आवाज हुई।

    फिर सब अंधेरा।

    सावित्री अपने बेटे को ढूंढते हुए रो रही थी।

    फिर देवदत्त आया।

    उसने कहा—

    “मैं उसे वापस लाऊंगा।”

    फिर उसने कालिका को बुलाया।

    लेकिन कालिका कोई साधारण आत्मा नहीं थी।

    वह उस घर में पहले से मौजूद एक भटकती शक्ति थी।

    उसने देवदत्त से कहा—

    “मैं तुम्हारे बेटे की याद दे सकती हूँ, जीवन नहीं।”

    देवदत्त ने फिर भी अनुष्ठान किया।

    और उस दिन से घर अभिशप्त हो गया।

    आरव ने सब कुछ देखा।

    फिर उसने कालिका से कहा—

    “तुम्हें रवि नहीं चाहिए था। तुम्हें लोगों का दुःख चाहिए था।”

    कालिका कुछ क्षण शांत रही।

    फिर बोली—

    “दुःख सबसे शक्तिशाली भावना है।”

    आरव ने कहा—

    “लेकिन प्यार उससे ज्यादा शक्तिशाली है।”

    उसी समय उसकी कलाई पर बंधा धागा चमकने लगा।

    आरव को अपनी माँ की आवाज सुनाई दी—

    “बेटा, डर को जितना ताकत दोगे, वह उतना बड़ा होगा।”

    आरव ने आंखें बंद कीं।

    उसे माँ की सारी बातें याद आने लगीं।

    वह रातें जब माँ उसे कहानी सुनाती थीं।

    उसकी पहली स्कूल ड्रेस।

    उसका जन्मदिन।

    माँ का माथे पर हाथ रखना।

    धीरे-धीरे उसके अंदर का डर कम होने लगा।

    कालिका पीछे हटने लगी।

    “नहीं…”

    आरव ने कहा—

    “तुम मेरे डर से ताकत लेती हो। लेकिन मैं अब तुमसे नहीं डरता।”

    कालिका चीखी।

    कमरे की दीवारें कांपने लगीं।

    पापा ने किताब में लिखा मंत्र पढ़ना शुरू किया।

    आरव ने लकड़ी का वह खिलौना जमीन पर रखा जो उसकी माँ ने बनाया था।

    उसने कहा—

    “यह मेरी माँ की याद है। इसे कोई नहीं छीन सकता।”

    अचानक कमरे में तेज रोशनी फैल गई।

    मीरा की आत्मा दिखाई दी।

    उसके पीछे सावित्री और रवि भी थे।

    सावित्री ने कालिका से कहा—

    “तुमने मेरे दुःख का इस्तेमाल किया। अब मेरा दुःख तुम्हारी ताकत नहीं है।”

    रवि ने अपनी माँ का हाथ पकड़ लिया।

    कालिका कमजोर पड़ने लगी।

    मीरा ने आरव की ओर देखा।

    “अब आखिरी काम तुम्हें करना होगा।”

    “क्या?”

    “उसे माफ कर दो।”

    आरव चौंक गया।

    “जिसने आपको और इतने लोगों को परेशान किया, उसे?”

    मीरा ने कहा—

    “माफी उसके लिए नहीं होती। कभी-कभी माफी अपने दिल को आजाद करने के लिए होती है।”

    आरव ने कालिका की ओर देखा।

    “मैं तुम्हें माफ करता हूँ।”

    कालिका चीखने लगी।

    उसका शरीर धुएं में बदलने लगा।

    फिर वह पूरी तरह गायब हो गई।

    घर में पहली बार शांति छा गई।

    सुबह सूरज की रोशनी खिड़की से अंदर आई।

    पापा ने आरव को गले लगा लिया।

    दोनों रो रहे थे।

    उस दिन उन्होंने वह घर छोड़ने का फैसला किया।

    लेकिन जाने से पहले आरव आखिरी बार ऊपर वाले कमरे में गया।

    कमरा अब बिल्कुल सामान्य था।

    दीवार पर उसकी माँ की एक तस्वीर लगी थी।

    आरव ने तस्वीर के सामने हाथ जोड़कर कहा—

    “माँ, अब मैं डरूंगा नहीं।”

    तस्वीर के होंठों पर हल्की मुस्कान दिखाई दी।

    आरव नीचे लौट आया।

    जब वह घर से बाहर निकला, उसने पीछे मुड़कर देखा।

    खिड़की में उसकी माँ खड़ी थी।

    वह हाथ हिला रही थी।

    आरव ने भी हाथ हिलाया।

    फिर उसने पलक झपकाई।

    खिड़की खाली थी।

    उस दिन के बाद उस घर में कभी किसी ने भूत नहीं देखा।

    लेकिन मोहल्ले के बुजुर्ग आज भी कहते हैं कि अमावस्या की रात उस घर की ऊपरी खिड़की में कभी-कभी हल्की रोशनी दिखाई देती है।

    लोग कहते हैं, वह किसी भूत की रोशनी नहीं है।

    वह एक माँ का प्यार 

  • भाग 4 — घर का असली रहस्य

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     

    आरव और उसके पापा ने पूरी रात घर से बाहर रहने का फैसला किया।

    सुबह होते ही वे पुराने मंदिर गए, जहां पापा ने एक बुजुर्ग साधु से पूरी घटना बताई।

    साधु ने बहुत देर तक कुछ नहीं कहा।

    फिर उन्होंने पूछा—

    “यह घर तुम्हारे परिवार ने खरीदा था?”

    पापा ने सिर हिलाया।

    “हाँ।”

    “किससे?”

    पापा ने कहा, “एक बूढ़े आदमी से। उसने बताया था कि घर कई साल से खाली पड़ा था।”

    साधु ने गंभीर होकर कहा—

    “उसने झूठ बोला।”

    पापा चौंक गए।

    “आप उसे जानते हैं?”

    साधु ने कहा—

    “मैंने उस घर का इतिहास सुना है। सावित्री अकेली नहीं थी।”

    आरव ने पूछा—

    “कौन था उसके साथ?”

    साधु ने कहा—

    “उसका पति।”

    पापा चुप हो गए।

    “सावित्री के पति का नाम देवदत्त था। वह तांत्रिक विद्या में विश्वास करता था। अपने बेटे की मौत के बाद उसने सावित्री को समझाया कि वह आत्माओं की मदद से रवि को वापस ला सकता है।”

    आरव ने डरते हुए पूछा—

    “क्या उसने सच में ऐसा किया?”

    “उसने कोशिश की।”

    साधु ने आगे कहा—

    “लेकिन आत्मा को वापस लाने के बजाय उसने कई आत्माओं को उस घर में बांध दिया।”

    पापा ने पूछा—

    “तो सावित्री?”

    “वह अपने बेटे के दुःख में धीरे-धीरे उस शक्ति का हिस्सा बन गई।”

    आरव को पिछली रात का कागज याद आया।

    “सावित्री अकेली नहीं थी…”

    साधु ने कहा—

    “उस घर में कई आत्माएं कैद थीं।”

    यह सुनकर आरव के रोंगटे खड़े हो गए।

    साधु ने उन्हें एक पुरानी किताब दी।

    “इसे अपने साथ ले जाओ। लेकिन ध्यान रखना—घर के अंदर इसे आधी रात के बाद मत पढ़ना।”

    पापा ने किताब ले ली।

    घर लौटने के बाद उन्होंने दिन के उजाले में किताब पढ़नी शुरू की।

    उसमें लिखा था कि देवदत्त ने एक कमरे में एक विशेष अनुष्ठान किया था। उसका उद्देश्य मृत आत्मा को वापस बुलाना था।

    लेकिन अनुष्ठान अधूरा रह गया।

    रवि की आत्मा तो वापस नहीं आई, लेकिन घर में कई भटकी आत्माएं फंस गईं।

    सावित्री उनमें से एक बन गई।

    आरव ने पूछा—

    “अगर वह आत्मा मुक्त हो गई, तो बाकी आत्माओं का क्या होगा?”

    पापा ने किताब पलटी।

    एक पन्ने पर लिखा था—

    “जब तक घर की अंतिम स्मृति नष्ट नहीं होती, आत्माएं मुक्त नहीं होंगी।”

    “अंतिम स्मृति क्या है?”

    पापा ने जवाब पढ़ा।

    “वह वस्तु जिसमें सबसे ज्यादा दुःख और मृत्यु की ऊर्जा बंधी हो।”

    आरव को समझ आ गया।

    “वह संदूक?”

    पापा ने कहा—

    “शायद।”

    दोनों ऊपर गए।

    कमरा पहले जैसा नहीं था।

    दीवारों पर बने पुराने चित्र गायब हो चुके थे।

    लेकिन कमरे के बीच में एक चीज रखी थी—

    एक बड़ा आईना।

    आरव ने आईने में देखा।

    उसे अपना चेहरा नहीं दिखाई दिया।

    उसमें उसकी माँ खड़ी थी।

    “आरव…”

    वह पीछे हट गया।

    “माँ?”

    आईने में मीरा ने सिर हिलाया।

    “बेटा, आईने को मत तोड़ना।”

    पापा ने पूछा—

    “मीरा, क्या इसमें आत्माएं कैद हैं?”

    मीरा ने कहा—

    “यह आईना सिर्फ प्रतिबिंब नहीं दिखाता। यह उन लोगों की यादें दिखाता है जिन्हें इस घर ने खोया है।”

    अचानक आईने में दृश्य बदल गया।

    एक छोटा बच्चा दिखाई दिया।

    वह रवि था।

    फिर एक आदमी आया।

    देवदत्त।

    उसने कुछ मंत्र पढ़े और आईने के सामने एक काला दीपक जलाया।

    फिर दृश्य बदल गया।

    सावित्री रो रही थी।

    उसकी गोद में रवि की तस्वीर थी।

    देवदत्त ने कहा—

    “मैं रवि को वापस लाऊंगा।”

    लेकिन उसी समय कमरे में तेज हवा चली।

    दीपक बुझ गया।

    आईने में कई काली परछाइयां दिखाई दीं।

    देवदत्त डरकर भाग गया।

    सावित्री अकेली रह गई।

    तभी एक परछाईं उसके पीछे आकर खड़ी हो गई।

    उसने सावित्री के कान में कुछ कहा।

    सावित्री ने अपना चेहरा ऊपर उठाया।

    उसकी आंखें बदल गईं।

    दृश्य समाप्त हो गया।

    आरव कांपने लगा।

    “माँ, वह परछाईं कौन थी?”

    मीरा ने कहा—

    “वही असली आत्मा है जिसने सबको बांध रखा है।”

    “उसका नाम?”

    मीरा ने कहा—

    “कालिका।”

    कमरे में अचानक तापमान गिर गया।

    आईना काला पड़ गया।

    और एक आवाज गूंजी—

    “मीरा…”

    मीरा की आत्मा घबरा गई।

    “आरव, भागो!”

    लेकिन देर हो चुकी थी।

    आईने से एक काली आकृति बाहर निकल आई।

    उसका चेहरा दिखाई नहीं दे रहा था।

    उसने हाथ बढ़ाया।

    पापा पीछे गिर गए।

    आरव भागने लगा, लेकिन उसके पैर जैसे जमीन से चिपक गए।

    काली आकृति ने कहा—

    “तुम्हारी माँ ने मुझे बहुत सालों तक रोका है।”

    मीरा ने कहा—

    “मैंने तुम्हें नहीं रोका। मैंने आरव को बचाया है।”

    कालिका हंसी।

    “अब तुम्हारा बेटा मेरे पास आएगा।”

    आरव ने आंखें बंद कर लीं।

    उसे माँ की बात याद आई—

    “सच से कभी मत भागना।”

    उसने आंखें खोलीं।

    “तुम चाहती क्या हो?”

    कालिका शांत हो गई।

    “मुझे वह चाहिए जो तुम्हारी माँ ने छिपाया।”

    “क्या?”

    “तुम्हारी माँ की आखिरी याद।”

    पापा ने कहा—

    “मीरा की आखिरी याद तो…”

    अचानक उन्हें कुछ याद आया।

    माँ की मृत्यु से पहले उसने आरव के लिए एक छोटा-सा लकड़ी का खिलौना बनाया था।

    वह खिलौना हमेशा आरव के पास रहता था।

    आरव ने जेब से उसे निकाला।

    कालिका की आंखें चमक उठीं।

    “यही है।”

    मीरा चीखी—

    “आरव, इसे मत देना!”

    कालिका आगे बढ़ी।

    आरव ने खिलौना पीछे कर लिया।

    “यह मेरी माँ की आखिरी निशानी है। मैं इसे तुम्हें नहीं दूंगा।”

    कालिका का चेहरा विकृत हो गया।

    “फिर तुम्हें भी यहीं रहना होगा!”

    अचानक आईना टूटने लगा।

    कांच की दरारों से सैकड़ों आवाजें आने लगीं।

    “बचाओ…”

    “हमें मुक्त करो…”

    “हमें बाहर जाने दो…”

    आरव ने समझ लिया कि कालिका उन सभी आत्माओं को कैद करके रखे हुए थी।

    उसने पापा से कहा—

    “हमें इस आईने को नष्ट करना होगा।”

    पापा ने मंदिर से मिली किताब खोली।

    उसमें लिखा था कि आईने को तोड़ना पर्याप्त नहीं होगा।

    उसे उस जगह ले जाकर तोड़ना होगा जहां पहला अनुष्ठान हुआ था।

    यानी—

    ऊपर वाले कमरे के बीचोंबीच।

    पापा ने आईना उठाया।

    लेकिन कालिका ने रास्ता रोक लिया।

    मीरा ने अपनी पूरी शक्ति से उसे रोकने की कोशिश की।

    “आरव, अभी!”

    आरव ने लकड़ी का खिलौना जमीन पर रखा।

    फिर उसने आईने को दोनों हाथों से उठाया।

    और पूरी ताकत से उसे फर्श पर पटक दिया।

    छन्न्न्न!

    आईना हजारों टुकड़ों में टूट गया।

    एक भयानक चीख पूरे घर में गूंज उठी।

    खिड़कियां टूट गईं।

    दीवारों में दरारें पड़ गईं।

    काली आकृति हवा में तड़पने लगी।

    फिर एक-एक करके सारी आत्माएं रोशनी में बदलने लगीं।

    रवि भी उनमें था।

    उसने अपनी माँ की तरफ देखा।

    “माँ…”

    सावित्री की आत्मा भी दिखाई दी।

    वह मुस्कुराई।

    और फिर दोनों रोशनी में बदल गए।

    लेकिन कालिका अभी भी खत्म नहीं हुई थी।

    उसने आखिरी बार आरव की तरफ देखा।

    “तुमने मुझे रोका है… खत्म नहीं किया।”

    और वह अंधेरे में गायब हो गई।

    घर फिर शांत हो गया।

    मीरा की आत्मा ने आरव को देखा।

    “अब मुझे जाना होगा।”

    आरव ने पूछा—

    “क्या आप फिर कभी आएंगी?”

    मीरा ने कहा—

    “जब तुम्हें मेरी सबसे ज्यादा जरूरत होगी, तब तुम्हें मेरी आवाज अपने दिल में सुनाई देगी।”

    और वह भी रोशनी बनकर गायब हो गई।

    आरव ने अपनी आंखें बंद कर लीं।

    उस रात पहली बार घर में कोई आवाज नहीं आई।

    लेकिन अगले दिन जब पापा ने टूटा हुआ आईना देखा, तो उसके एक छोटे से टुकड़े में अभी भी कुछ दिखाई दे रहा था।

    एक काला चेहरा।

    और उसके नीचे लिखा था—

    “मैं अभी यहीं हूँ।”

     

  • भाग 3 — माँ की आत्मा

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

     

    घर का मुख्य दरवाजा बंद था।

    पापा ने पूरी ताकत से उसे खोलने की कोशिश की, लेकिन दरवाजा जैसे पत्थर का बन गया था।

    आरव रोते हुए बोला, “पापा, अब क्या होगा?”

    पापा ने कहा, “डरो मत। मैं तुम्हें कुछ नहीं होने दूंगा।”

    तभी घर की सारी घड़ियां एक साथ बंद हो गईं।

    बारह बज रहे थे।

    फिर अचानक एक-एक करके सभी घड़ियां उल्टी दिशा में चलने लगीं।

    आरव ने अपनी आंखें बंद कर लीं।

    ऊपर से किसी के गाने की आवाज आ रही थी।

    बहुत धीमी।

    बहुत उदास।

    पापा ने आरव को पीछे रहने को कहा और खुद सीढ़ियों की तरफ बढ़े।

    “कौन है?”

    कोई जवाब नहीं आया।

    फिर ऊपर से आवाज आई—

    “अरुण…”

    पापा रुक गए।

    यह उनकी पत्नी मीरा की आवाज थी।

    “अरुण, मुझे बचा लो…”

    पापा की आंखों में आंसू आ गए।

    उन्होंने धीरे से कहा, “मीरा?”

    आरव ने उनका हाथ पकड़ लिया।

    “पापा, मत जाइए।”

    लेकिन पापा जैसे उस आवाज के जादू में आ चुके थे।

    वह सीढ़ियां चढ़ने लगे।

    आरव भी उनके पीछे चला।

    ऊपर पहुंचकर उन्होंने देखा कि कमरे का दरवाजा खुला हुआ था।

    अंदर अंधेरा था।

    फिर अचानक कमरे के बीच एक हल्की रोशनी दिखाई दी।

    उस रोशनी में एक औरत खड़ी थी।

    सफेद साड़ी।

    चेहरा शांत।

    आंखों में आंसू।

    वह मीरा थी।

    आरव दौड़कर उसकी ओर जाना चाहता था, लेकिन पापा ने उसे रोक लिया।

    “रुको।”

    औरत ने कहा—

    “आरव… मैं सच में तुम्हारी माँ हूँ।”

    आरव ने उसे ध्यान से देखा।

    इस बार उसके पैर सीधे थे।

    चेहरा भी डरावना नहीं था।

    उसने कहा, “अगर आप मेरी माँ हैं तो मुझे वह बात बताइए जो सिर्फ माँ जानती थी।”

    औरत मुस्कुराई।

    “तुम्हें बचपन में नींद नहीं आती थी। मैं तुम्हें नीले रंग की छोटी कार देती थी। तुम उसे तकिए के नीचे रखकर सोते थे।”

    आरव की आंखों से आंसू निकल आए।

    यह बात किसी और को नहीं पता थी।

    वह आगे बढ़ा।

    “माँ…”

    औरत ने हाथ फैलाए।

    लेकिन पापा ने फिर उसे रोक दिया।

    “मीरा, अगर तुम सच में हो तो बताओ, सावित्री को कैसे रोका जा सकता है?”

    औरत का चेहरा अचानक गंभीर हो गया।

    “उसकी आत्मा को खत्म नहीं किया जा सकता।”

    “फिर?”

    “उसे मुक्त करना होगा।”

    पापा ने पूछा, “कैसे?”

    मीरा ने कमरे के एक कोने की तरफ इशारा किया।

    वहाँ वही पुराना लोहे का संदूक रखा था।

    “उसमें रवि की आखिरी चीज है।”

    पापा ने संदूक खोला।

    अंदर एक छोटी लाल गेंद, एक पुरानी तस्वीर और चांदी का लॉकेट था।

    मीरा ने कहा—

    “सावित्री अपने बेटे की मौत को स्वीकार नहीं कर पाई। उसका दुःख ही उसकी शक्ति बन गया। उसे लगता है कि हर बच्चा उसका रवि है। अगर रवि की आखिरी याद उसे वापस दे दी जाए, तो शायद वह मुक्त हो सके।”

    आरव ने पूछा—

    “लेकिन वह मेरी माँ जैसी क्यों दिखती है?”

    मीरा ने कहा—

    “क्योंकि वह जानती है कि बच्चे अपनी माँ की आवाज पर भरोसा करते हैं। उसने तुम्हें अपने बेटे की जगह पाने के लिए मेरी शक्ल अपनाई।”

    अचानक कमरे में तेज हवा चलने लगी।

    मीरा का चेहरा धुंधला पड़ने लगा।

    “माँ!”

    आरव उसकी तरफ दौड़ा।

    मीरा ने कहा—

    “मुझे अभी जाना होगा। सावित्री आ रही है।”

    तभी कमरे की दीवार पर एक काली परछाईं दिखाई दी।

    सावित्री।

    उसकी आवाज गूंज उठी—

    “तुमने मेरा बेटा मुझसे छीन लिया!”

    मीरा ने कहा—

    “तुम्हारा बेटा मर चुका है, सावित्री। आरव तुम्हारा बेटा नहीं है।”

    सावित्री चीखी।

    कमरे की खिड़कियां टूटने लगीं।

    कांच के टुकड़े हवा में उड़ने लगे।

    पापा ने आरव को अपने पीछे कर लिया।

    सावित्री धीरे-धीरे कमरे में उतर आई।

    उसके बाल हवा में उड़ रहे थे।

    उसकी आंखें लाल थीं।

    “मेरा रवि…”

    उसने आरव की तरफ हाथ बढ़ाया।

    आरव पीछे हट गया।

    “मैं रवि नहीं हूँ!”

    सावित्री की आवाज बदल गई।

    “तुम्हें बनना पड़ेगा।”

    उसने हाथ घुमाया और आरव अचानक जमीन से ऊपर उठ गया।

    “पापा!”

    पापा ने उसका हाथ पकड़ लिया।

    लेकिन वह भी धीरे-धीरे हवा में उठने लगे।

    तभी मीरा की आत्मा ने सावित्री के सामने आकर कहा—

    “उसे छोड़ दो!”

    सावित्री चीखी—

    “तुमने मेरे बेटे को मुझसे छीन लिया!”

    मीरा ने कहा—

    “तुम्हारा बेटा तुम्हें किसी ने नहीं छीना था। वह हादसे में मरा था। लेकिन तुमने उसकी मौत को स्वीकार नहीं किया। तुमने अपने दुःख में निर्दोष बच्चों को कैद करना शुरू कर दिया।”

    सावित्री कुछ क्षण के लिए शांत हो गई।

    उसकी आंखों में पहली बार गुस्से की जगह दर्द दिखाई दिया।

    मीरा ने लाल गेंद उसकी तरफ बढ़ाई।

    “यह रवि की है।”

    सावित्री ने गेंद को देखा।

    उसका चेहरा बदलने लगा।

    उसे जैसे कुछ याद आ गया।

    “रवि…”

    उसकी आवाज अब डरावनी नहीं थी।

    बल्कि एक माँ की तरह थी।

    “माँ, मैं गिर गया…”

    सावित्री के चेहरे पर आंसू आ गए।

    वह जमीन पर बैठ गई।

    “रवि…”

    कमरे में अचानक बच्चे की हंसी गूंजने लगी।

    सावित्री ने ऊपर देखा।

    उसे सामने एक छोटा बच्चा दिखाई दिया।

    वह लाल गेंद लेकर खड़ा था।

    “माँ, मैं घर जाना चाहता हूँ।”

    सावित्री उसके पीछे चल पड़ी।

    लेकिन जाते-जाते उसने आरव की ओर देखा।

    “मुझे माफ करना…”

    और फिर वह गायब हो गई।

    कमरे में शांति छा गई।

    मीरा भी धीरे-धीरे गायब होने लगी।

    आरव दौड़कर उसके पास गया।

    “माँ, आप जा रही हो?”

    मीरा ने उसके सिर पर हाथ रखा।

    “बेटा, माँ कभी पूरी तरह नहीं जाती।”

    “फिर आप वापस क्यों नहीं आ सकतीं?”

    मीरा मुस्कुराई।

    “क्योंकि कुछ रिश्ते शरीर से नहीं, प्यार से जुड़े होते हैं।”

    आरव रोने लगा।

    “मैं आपको भूलना नहीं चाहता।”

    “मुझे भूलना मत। लेकिन मेरे लिए अपना जीवन मत रोकना।”

    मीरा की छवि धीरे-धीरे रोशनी में बदल गई।

    आखिरी बार उसकी आवाज आई—

    “सच से कभी मत भागना, आरव।”

    और वह गायब हो गई।

    घर की सारी खिड़कियां खुल गईं।

    मुख्य दरवाजा भी खुल गया।

    सुबह की हल्की रोशनी घर में आने लगी।

    आरव और उसके पिता नीचे आ गए।

    लेकिन कहानी अभी खत्म नहीं हुई थी।

    क्योंकि जब पापा ने पुराने संदूक को दोबारा देखा, तो उसमें एक और कागज मिला।

    उस पर लिखा था—

    “सावित्री अकेली नहीं थी।”

    पापा का चेहरा फिर सफेद पड़ गया।

    आरव ने पूछा—

    “पापा… इसका मतलब क्या है?”

    पापा ने कोई जवाब नहीं दिया।

    और तभी ऊपर वाले कमरे से किसी बच्चे की हंसी सुनाई दी।

     

  • भाग 2 — पुरानी डायरी का राज

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     

    सुबह हो चुकी थी, लेकिन आरव के मन में रात का डर अभी भी जिंदा था।

    पापा ने नाश्ता तक नहीं किया। वह लगातार घर के अंदर इधर-उधर घूम रहे थे। बार-बार ऊपर वाली मंजिल की तरफ देखते और फिर नजरें झुका लेते।

    आरव ने पहली बार अपने पिता के चेहरे पर इतना डर देखा था।

    उसने फिर पूछा, “पापा, मेरी माँ की मौत उस औरत की वजह से हुई थी?”

    पापा कुछ देर चुप रहे।

    फिर उन्होंने कहा, “आरव, कुछ बातें ऐसी होती हैं जिन्हें जितना छिपाओ, उतना ही अच्छा लगता है।”

    “लेकिन मुझे सच जानना है।”

    पापा ने उसकी तरफ देखा।

    “तुम अभी बच्चे हो।”

    “मैं बच्चा नहीं हूँ। मैंने कल रात उसे देखा है।”

    यह सुनते ही पापा के हाथ से गिलास गिर गया।

    गिलास फर्श पर टूट गया।

    पापा ने कांपती आवाज में पूछा, “तुमने उसे देखा?”

    आरव ने सिर हिला दिया।

    “उसका चेहरा कैसा था?”

    “माँ जैसा।”

    पापा ने आँखें बंद कर लीं।

    कुछ देर बाद उन्होंने कहा, “आज शाम मैं तुम्हें सब बताऊंगा।”

    लेकिन शाम तक इंतजार करना आरव के लिए मुश्किल था।

    दोपहर में पापा किसी काम से बाहर गए।

    आरव अकेला था।

    तभी उसकी नजर पापा की अलमारी पर पड़ी।

    उसे याद आया कि पापा ने पिछली रात एक पुरानी तस्वीर दिखाई थी।

    उसने अलमारी खोली।

    कपड़ों के पीछे एक पुराना लकड़ी का डिब्बा रखा था।

    डिब्बे पर धूल जमी थी।

    आरव ने उसे बाहर निकाला।

    अंदर कुछ तस्वीरें, पुराने कागज और एक डायरी थी।

    डायरी के पहले पन्ने पर लिखा था—

    “मीरा की डायरी।”

    मीरा आरव की माँ का नाम था।

    आरव ने कांपते हाथों से डायरी खोली।

    पहले कुछ पन्नों में सामान्य बातें थीं।

    फिर एक जगह लिखा था—

    “आज घर में फिर किसी के चलने की आवाज आई। मैंने अरुण से कहा कि घर में कोई है, लेकिन उसने मेरी बात नहीं मानी।”

    आरव आगे पढ़ता गया।

    एक और पन्ने पर लिखा था—

    “मुझे लगता है कि यह घर खाली नहीं है। रात को कोई मेरे कमरे के बाहर खड़ा रहता है। जब मैं दरवाजा खोलती हूँ तो कोई नहीं होता।”

    अगले पन्ने पर शब्दों के बीच कई जगह स्याही फैली हुई थी।

    “कल रात उसने पहली बार मेरा नाम लिया। उसने कहा—‘मीरा, तुम मेरे बेटे को मुझसे नहीं छीन सकती।’”

    आरव का दिल जोर से धड़कने लगा।

    उसने अगला पन्ना पलटा।

    “आज मैंने अरुण से सच पूछा। उसने बताया कि इस घर में रहने वाली पिछली महिला का नाम सावित्री था। उसका एक बेटा था, जो बहुत कम उम्र में मर गया था। उसके बाद सावित्री पागल हो गई। वह हर बच्चे को अपना बेटा समझने लगी।”

    आरव ने पढ़ना जारी रखा।

    “लोग कहते हैं कि सावित्री ने इसी घर के ऊपर वाले कमरे में आत्महत्या की थी।”

    आरव की उंगलियां ठंडी हो गईं।

    अब उसे समझ आ रहा था कि ऊपर वाला कमरा क्यों बंद रहता था।

    लेकिन डायरी में आगे जो लिखा था, उसने उसे और डरा दिया।

    “सावित्री की मृत्यु के बाद भी उसकी आत्मा घर में दिखाई देती रही। कई लोगों ने कहा कि वह बच्चों को बुलाती है। लेकिन सबसे डरावनी बात यह है कि वह अपना चेहरा उस व्यक्ति की माँ जैसा बना सकती है, जिसे वह अपने साथ ले जाना चाहती है।”

    आरव ने डायरी बंद कर दी।

    उसकी सांस तेज हो गई।

    उसी समय घर के बाहर किसी ने दरवाजा खटखटाया।

    ठक… ठक…

    आरव चौंक गया।

    उसने खिड़की से बाहर देखा।

    कोई नहीं था।

    फिर दरवाजे पर दस्तक हुई।

    ठक… ठक… ठक…

    आरव पीछे हट गया।

    तभी दरवाजे के दूसरी तरफ से आवाज आई—

    “बेटा…”

    आरव की आँखें फैल गईं।

    यह उसकी माँ की आवाज थी।

    “दरवाजा खोलो…”

    आरव ने दरवाजा नहीं खोला।

    आवाज फिर आई—

    “आरव, मैं हूँ… तुम्हारी माँ।”

    उसकी आँखों में आंसू आ गए।

    वह अपनी माँ की आवाज पहचानता था।

    लेकिन डायरी की बात उसे याद थी।

    वह धीरे से पीछे हट गया।

    “तुम मेरी माँ नहीं हो।”

    कुछ सेकंड तक बिल्कुल शांति रही।

    फिर बाहर से धीमी हंसी सुनाई दी।

    “तुम्हें सच पता चल गया है…”

    आरव के शरीर में सिहरन दौड़ गई।

    “लेकिन तुम्हारे पापा ने अभी पूरा सच नहीं बताया।”

    दरवाजे के नीचे से एक काला साया दिखाई दिया।

    वह साया इंसान के पैरों जैसा नहीं था।

    वह धीरे-धीरे दरवाजे के नीचे से लंबा होता गया।

    आरव दौड़कर दूसरे कमरे में छिप गया।

    कुछ मिनट बाद पापा घर लौटे।

    उन्होंने आरव को डर के मारे कोने में बैठा देखा।

    आरव ने सारी बात बताई।

    पापा ने डायरी अपने हाथ में ली।

    “तुमने इसे पढ़ लिया?”

    “हाँ।”

    पापा ने गहरी सांस ली।

    “अब तुम्हें सब बताना ही पड़ेगा।”

    उन्होंने कहा—

    “सावित्री सच में इस घर में रहती थी। लेकिन वह सिर्फ पागल नहीं थी। उसका बेटा रवि एक हादसे में मरा था। सावित्री को लगता था कि उसकी मौत के लिए घर के मालिक जिम्मेदार हैं। वह बदला लेना चाहती थी।”

    “लेकिन माँ की मौत?”

    “तुम्हारी माँ ने इस घर का सच जान लिया था।”

    पापा की आवाज कांपने लगी।

    “तुम्हारी माँ को पता चला था कि सावित्री की आत्मा किसी बच्चे के शरीर पर कब्जा करने की कोशिश करती है। तुम्हारे जन्म के बाद वह तुम्हें अपना रवि समझने लगी।”

    आरव चुप रहा।

    पापा ने आगे कहा—

    “तुम्हारी माँ ने तुम्हें बचाने के लिए उससे मुकाबला किया।”

    “फिर?”

    “एक रात तुम्हारी माँ ऊपर वाले कमरे में गई। सुबह वह बेहोश मिली। अस्पताल में उसकी मौत हो गई।”

    आरव की आँखों से आंसू निकलने लगे।

    “तो आपने उस कमरे को बंद क्यों कर दिया?”

    पापा ने कहा—

    “क्योंकि मुझे लगा था कि ताला लगाने से सब खत्म हो जाएगा।”

    तभी ऊपर से तेज आवाज आई।

    धड़ाम!

    दोनों ने ऊपर देखा।

    ऊपर वाला दरवाजा अपने आप खुल चुका था।

    फिर किसी बच्चे के रोने की आवाज आई।

    “माँ…”

    आरव के पापा का चेहरा बदल गया।

    “यह आवाज…”

    उन्होंने कांपते हुए कहा—

    “यह सावित्री के बेटे रवि की आवाज है।”

    आरव ने पूछा, “लेकिन वह तो मर चुका था।”

    पापा ने धीरे से कहा—

    “हाँ। और यही सबसे बड़ा डर है।”

    तभी सीढ़ियों पर किसी के कदमों की आवाज आने लगी।

    ठक…

    ठक…

    ठक…

    एक औरत धीरे-धीरे नीचे उतर रही थी।

    सफेद साड़ी।

    लंबे बाल।

    और हाथ में एक पुरानी लाल गुड़िया।

    वह आरव को देखकर मुस्कुराई।

    “रवि…”

    आरव पीछे हट गया।

    “मेरा नाम आरव है!”

    औरत ने गर्दन टेढ़ी की।

    “तुम्हारी माँ ने भी यही कहा था…”

    उसने लाल गुड़िया फर्श पर फेंकी।

    गुड़िया का सिर अपने आप घूम गया।

    और उसके मुंह से आवाज निकली—

    “आरव… ऊपर आओ।”

    पापा ने आरव का हाथ पकड़ा और उसे बाहर की ओर खींचा।

    लेकिन जैसे ही दोनों दरवाजे तक पहुंचे, मुख्य दरवाजा अपने आप बंद हो गया।

    घर के अंदर अंधेरा छा गया।

    और पीछे से सावित्री की आवाज आई—

    “आज कोई इस घर से बाहर नहीं जाएगा।”

     

  • भूतिया मम्मी का सच (भाग 1)

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

     

    रात के करीब साढ़े ग्यारह बज रहे थे। बाहर तेज बारिश हो रही थी। आसमान में बार-बार बिजली चमकती और कुछ सेकंड के लिए पूरा घर सफेद रोशनी से भर जाता। उसके बाद फिर वही घना अंधेरा और बारिश की आवाज।

    बारह साल का आरव अपनी किताब लेकर बिस्तर पर बैठा था। अगले दिन उसका स्कूल में टेस्ट था, लेकिन उसका मन पढ़ाई में बिल्कुल नहीं लग रहा था।

    उसका नया घर बहुत बड़ा था। शहर से दूर एक पुराने मोहल्ले में बना यह मकान उसके पिता ने कुछ ही महीने पहले खरीदा था। घर की सबसे अजीब बात थी—ऊपरी मंजिल का एक कमरा।

    उस कमरे पर हमेशा ताला लगा रहता था।

    आरव ने कई बार पापा से पूछा था, “पापा, ऊपर वाला कमरा बंद क्यों रहता है?”

    पापा हर बार एक ही जवाब देते, “वह पुराना स्टोर रूम है। उसमें बहुत बेकार सामान पड़ा है। तुम वहाँ मत जाना।”

    लेकिन आरव को लगता था कि पापा उससे कुछ छिपा रहे हैं।

    उसकी माँ की मृत्यु तीन साल पहले हो चुकी थी। आरव को अपनी माँ की बहुत कम यादें थीं। उसे बस इतना याद था कि माँ उसे रात में कहानी सुनाकर सुलाती थीं और उसके माथे पर हाथ फेरते हुए कहती थीं—

    “आरव, चाहे दुनिया में कुछ भी हो जाए, मैं हमेशा तुम्हारे पास रहूँगी।”

    माँ की मृत्यु के बाद पापा ने दूसरी शादी नहीं की थी। आरव अक्सर सोचता था कि शायद पापा भी माँ को बहुत याद करते हैं।

    उस रात अचानक ऊपर से किसी के चलने की आवाज आई।

    ठक… ठक… ठक…

    आरव ने किताब बंद कर दी।

    आवाज फिर आई।

    ठक… ठक… ठक…

    ऐसा लग रहा था जैसे कोई धीरे-धीरे ऊपर वाले बंद कमरे के बाहर चल रहा हो।

    आरव का दिल तेज धड़कने लगा।

    उसने सोचा, शायद बिल्ली होगी।

    तभी ऊपर से एक और आवाज आई।

    “आरव…”

    वह जम गया।

    आवाज बहुत धीमी थी, लेकिन वह पहचान गया था।

    वह उसकी माँ की आवाज थी।

    “आरव…”

    उसके हाथ से किताब नीचे गिर गई।

    कुछ देर तक वह हिल भी नहीं पाया।

    फिर उसने खुद को समझाया, “नहीं… यह मेरा भ्रम है। माँ तो…”

    उसने वाक्य पूरा नहीं किया।

    फिर आवाज आई—

    “आरव… दरवाजा खोल दो…”

    अब आरव बिस्तर से उतर चुका था।

    वह धीरे-धीरे कमरे से बाहर निकला। गलियारे में अंधेरा था। बिजली कुछ देर पहले ही चली गई थी। उसने मोबाइल की टॉर्च जलाई और सीढ़ियों की तरफ बढ़ा।

    हर सीढ़ी पर उसके पैर कांप रहे थे।

    ऊपर पहुंचकर उसने देखा कि बंद कमरे का दरवाजा आधा खुला हुआ था।

    आरव की सांस रुक गई।

    जिस कमरे पर हमेशा भारी ताला लगा रहता था, वह आज खुला था।

    दरवाजे के अंदर से ठंडी हवा आ रही थी।

    “आरव…”

    इस बार आवाज बिल्कुल उसके कान के पास सुनाई दी।

    वह डरकर पीछे मुड़ा।

    वहाँ कोई नहीं था।

    तभी कमरे के अंदर एक पुरानी लकड़ी की कुर्सी अपने आप हिलने लगी।

    चर्र… चर्र…

    आरव ने मोबाइल की रोशनी कमरे में डाली।

    दीवारों पर पुराने चित्र लगे थे। एक कोने में लोहे का संदूक रखा था। सामने एक बड़ी अलमारी थी।

    और दीवार पर एक तस्वीर लगी थी।

    आरव की आँखें फैल गईं।

    वह उसकी माँ की तस्वीर थी।

    लेकिन तस्वीर में माँ मुस्कुरा नहीं रही थीं।

    उनका चेहरा उदास था और उनकी आँखें सीधी आरव को देख रही थीं।

    आरव तस्वीर के पास गया।

    तस्वीर के नीचे धूल से ढका एक छोटा-सा कागज रखा था।

    उसने उसे उठाया।

    उस पर सिर्फ एक लाइन लिखी थी—

    “जिसे तुम अपनी माँ समझ रहे हो, उससे दूर रहना।”

    आरव के हाथ कांपने लगे।

    तभी पीछे से दरवाजा जोर से बंद हो गया।

    धड़ाम!

    आरव चीख पड़ा।

    उसने दरवाजा खोलने की कोशिश की, लेकिन कुंडी बाहर से बंद थी।

    अचानक कमरे में किसी के रोने की आवाज आने लगी।

    “आरव… मुझे यहाँ से निकालो…”

    आरव ने पीछे देखा।

    कमरे के अंधेरे कोने में एक औरत खड़ी थी।

    उसके लंबे काले बाल चेहरे पर फैले हुए थे। सफेद साड़ी जमीन को छू रही थी। उसके पैर दिखाई नहीं दे रहे थे।

    आरव का शरीर सुन्न पड़ गया।

    औरत ने धीरे-धीरे अपना चेहरा उठाया।

    वह चेहरा उसकी माँ का था।

    “माँ…”

    आरव के मुंह से अनायास निकला।

    औरत मुस्कुराई।

    लेकिन वह मुस्कान इंसानी नहीं थी।

    उसने अपना हाथ आरव की ओर बढ़ाया।

    “बेटा… इतने साल बाद आए हो…”

    आरव पीछे हटने लगा।

    तभी उसकी नजर औरत के पैरों पर पड़ी।

    उसके पैर उल्टे थे।

    आरव जोर से चीखा।

    और उसी क्षण कमरे की खिड़की अपने आप खुल गई।

    तेज हवा अंदर आई और मेज पर रखे कागज हवा में उड़ने लगे।

    उनमें से एक कागज आरव के पैरों के पास गिरा।

    उस पर लिखा था—

    “अगर वह तुम्हारी माँ जैसी दिखती है, तो इसका मतलब यह नहीं कि वह तुम्हारी माँ है।”

    अचानक कमरे की सारी लाइटें जल उठीं।

    औरत गायब थी।

    दरवाजा खुला हुआ था।

    आरव दौड़ता हुआ नीचे आया।

    पापा अभी घर नहीं लौटे थे।

    वह पूरी रात अपने कमरे में दुबका रहा।

    सुबह पापा आए तो आरव ने पूरी घटना उन्हें बताई।

    पापा का चेहरा सुनते ही सफेद पड़ गया।

    उन्होंने तुरंत ऊपर जाकर कमरे का दरवाजा देखा।

    लेकिन अब वहाँ फिर से ताला लगा हुआ था।

    पापा कुछ देर तक चुप रहे।

    फिर उन्होंने आरव से कहा—

    “आज से तुम कभी ऊपर नहीं जाओगे।”

    आरव ने पूछा, “पापा, वह कौन थी?”

    पापा ने उसकी तरफ देखा।

    उनकी आँखों में डर था।

    “मैं नहीं चाहता था कि तुम्हें यह सच कभी पता चले।”

    आरव ने पूछा, “कौन-सा सच?”

    पापा ने कोई जवाब नहीं दिया।

    उन्होंने बस जेब से एक पुरानी तस्वीर निकाली।

    तस्वीर में आरव की माँ थी।

    और उसके पीछे एक दूसरी औरत खड़ी थी।

    वह बिल्कुल उसी भूत जैसी दिख रही थी।

    तस्वीर के पीछे तारीख लिखी थी—

    15 अगस्त 1998।

    आरव ने तारीख देखते ही पूछा—

    “पापा… यह औरत कौन है?”

    पापा ने धीमी आवाज में कहा—

    “यही वह राज है जिसकी वजह से तुम्हारी माँ मरी थी।”

    और तभी ऊपर से फिर वही आवाज आई—

    “आरव…”

    दोनों ने एक साथ ऊपर देखा।

    घर की छत से किसी के धीरे-धीरे चलने की आवाज आ रही थी।

    ठक… ठक… ठक…

     

  • अधूरी इबादत भाग~53

    अधूरी इबादत भाग~53

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    भाग~53 क्या अब सब ठीक होगा? 

     

    रूहानी के हाथ में थमा चम्मच अब भी उस प्लेट में अटका हुआ था, लेकिन उसका ध्यान बिल्कुल भी वहां नहीं था। अद्वैत के पूछे सवाल और उसके जवाब ने जैसे दिल के भीतर किसी पुराने दरवाज़े की चिटकनी फिर से खोल दी हो।

    “हाँ… नहीं… मेरा मतलब… अपने छोटे भाई से मिलने का तो मन बहुत है,” उसने नज़रें बचाकर कहा, “लेकिन मेरी वजह से अगर वहाँ कोई सीन create हो गया तो यश का birthday spoil हो जाएगा।”

    उसकी आवाज़ धीमी थी, पर साफ़। उसमें डर नहीं था, बस एक गहरी जिम्मेदारी थी….. जैसे वो अब सिर्फ अपनी नहीं, अपने अतीत की भी रखवाली कर रही हो।

    अद्वैत ने उसकी आँखों में देख कर सिर्फ ‘ठीक है’ कहा, फिर थोड़ा मुस्कुराते हुए बोला, “तुम ब्रेकफास्ट कर लो, मैं तुम्हें स्टूडियो छोड़ देता हूँ।”

    रूहानी ने तुरंत मना किया, “नहीं अद्वैत, मैं cab…..”

    लेकिन अद्वैत ने बीच में ही टोकते हुए कहा, “तुम जब तक car चलाना सीख नहीं लेती, तब तक अगर मैं घर पर रहूँ, तो तुम्हें studio पहुँचाता रहूँगा। और तुम अपनी schedule देख लेना… ताकि मैं तुम्हें जल्दी से car drive करना सिखा दूँ।”

    इतना कहकर वो पलटा और सीढ़ियाँ चढ़ते हुए ऊपर अपने कमरे की ओर चला गया।

    रूहानी कुछ पल तक वहीं बैठी रह गई। इस सोच में की अभी तक किसी ने उसकी इस ज़िन्दगी में self-independent होने के लिए नहीं कहा, जो किया उसने अपनी ज़िद पर। 

    “कितनी अजीब बात है…” उसने बुदबुदाते हुए खुद से कहा, “…जो इंसान कभी मेरे लिए एक राह जैसा लगा करता था, आज वही एक अस्थायी पड़ाव बन गया है। एक साल बाद… हम फिर से अजनबी हो जाएंगे और मैं नहीं चाहती कि इस एक साल की मुलाक़ात में कोई ऐसा एहसास बन जाए जो फिर से मुझे खुद को खो देना पड़े।”

    °°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°

    शाम होते ही रूहानी ने जैसे ही स्टूडियो का दरवाज़ा बंद किया, बाहर खड़ी गाड़ी की तरफ़ नज़र गई और उसके क़दम ठिठक गए। 

    अद्वैत ड्राइवर सीट के बजाय कार के दरवाज़े से टिक कर खड़ा था, गहरे नीले कोट और हल्की चमकती शर्ट में, बाल थोड़े बिखरे हुए लेकिन चेहरे पर वही पुराना सधा हुआ सुकून। 

    कार की पिछली सीट पर खूबसूरत बुके और कई रंग-बिरंगे गिफ्ट्स रखे थे, जैसे किसी फिल्म का सेट रियलिटी में उतर आया हो।

    रूहानी के माथे पर हल्की सी सलवट पड़ी और उसने पूछा, “ये सब क्या है अद्वैत?”

    अद्वैत ने अपने दोनों हाथों को साइन के पास बांधते हुए गाड़ी के दरवाज़े पर पीठ टिकाई और नाटकीय अंदाज़ में बोला, “मुझे मेरी प्यारी बीवी के और भी प्यारे भाई ने स्पेशली अपने बर्थडे पार्टी में invite किया है, तो मैंने सोचा क्यों न आपसे भी पूछ लूं… क्या आप मेरे साथ चलेंगी, मैडम?”

    रूहानी की आँखें बड़ी हो गईं, फिर आँखों में हल्की मुस्कान थी, लेकिन भीतर कहीं कुछ काँप रहा था। अद्वैत के शब्दों ने उसे कुछ ऐसा महसूस कराया जो उसने बहुत वक़्त से नहीं किया था, जैसे कोई सच में उसकी परवाह करता है, बिना किसी शर्त के, बिना किसी स्वार्थ के।

    वो बोली, “अगर मैं न आना चाहूं तो…?”

    अद्वैत ने पहले एक पल रुककर उसकी आँखों में झाँका, फिर बिना जल्दबाज़ी के कुछ कदम उसकी ओर बढ़ाया अपने दोनों हाथों को पीछे की तरफ बांधे हुए। 

    “आपकी इच्छा मेरे लिए हुक्म के बराबर है, मिसेज रूहानी चौहान,” अद्वैत ने मुस्कुराते हुए कहा, “ये बंदा आपको अभी घर छोड़ सकता है… लेकिन वो क्या है ना, वहाँ कोई आपकी राह तक रहा होगा….. दस साल छोटा, प्यारा, इकलौता भाई। जिसने आज पहली बार अपनी दीदी को invite किया है, और वो भी इस अद्वैत के ज़रिए…”

    रूहानी की आँखों में कुछ चमकने लगा था। अद्वैत का ये अंदाज़…. थोड़ा चुलबुला, थोड़ा नरम, और पूरी तरह दिल से….. उसके लिए एकदम नया था। 

    वो हल्के से मुस्कुरा कर बोली, “ठीक है, ठीक है… इतनी ड्रामा की ज़रूरत नहीं है, मैं भी चल रही हूँ।”

    लेकिन जैसे ही उसने अपने पहनावे पर नज़र डाली…. टी-शर्ट और जींस….. उसकी मुस्कान हल्की सी सिकुड़ गई। “माँ-पापा अगर मुझे इन कपड़ों में देखेंगे तो मार ही डालेंगे।”

    अद्वैत ने फौरन जवाब दिया, “क्यों घबरा रही हो, रूहानी? वहाँ तुम मिसेज रूहानी चौहान बनकर जा रही हो और मिस्टर अद्वैत अवस्थी की पत्नी को जो अच्छा लगे वो पहने, उसे किसी के भी छोटी सोच के बारे में नहीं सोचना चाहिए।”

    रूहानी की साँस जैसे थोड़ी रुक गई। उसकी नज़र अद्वैत के चेहरे पर टिक गई…. उस आवाज़ पर जिसमें न कोई बनावट थी, न कोई झूठ। “लेकिन…” उसने धीमे से कहा, “मेरे कपड़े पार्टी लुक के नहीं हैं।”

    अद्वैत ने उसकी बात बीच में काटते हुए कार का दरवाज़ा खोला, “तो चलो, अभी भी देर नहीं हुई है, खरीद लेते हैं।”

    रूहानी ने हल्का सा विरोध किया, “फिजूलखर्ची क्यों करनी? घर चलो, मैं अपने कपड़ों में से कुछ पहन लूंगी।”

    लेकिन अद्वैत ने उसकी बात सुनकर सिर हल्के से हिलाया और एक सादगी भरी गंभीरता से बोला, “तुम्हारे भाई का बर्थडे है, रूहानी… प्लीज़, चलो शॉप पर। सिर्फ तुम्हारे लिए नहीं, उसके लिए भी जो शायद आज तुम्हें देखकर बेइंतहा ख़ुशी महसूस करेगा।”

    वो एक पल के लिए चुप रही, फिर कुछ सोचते हुए धीरे से कार में बैठ गई। उसकी आँखों में पहली बार कोई बहस नहीं थी…. सिर्फ एक गहरा सन्नाटा और उस सन्नाटे में अद्वैत की बातों की गूंज।

    कभी-कभी कोई अजनबी एक दिन में वो भरोसा दे जाता है, जो अपनों ने सालों में नहीं दिया होता…..

    °°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°

    शाम की परछाइयाँ धीरे-धीरे ज़मीन पर उतर रही थीं। आसमान पर फीकी नारंगी रेखाएँ नीले रंग में घुलने लगी थीं और बाज़ार की दुकानों में बत्तियाँ एक-एक कर जल उठी थीं। हल्की हवा में गुलमोहर के पत्ते सरसराते हुए जैसे किसी भूले-बिसरे गीत की धुन छेड़ रहे थे।

    रेडीमेड शॉप के बाहर खड़ी अद्वैत की गाड़ी में ड्राइविंग सीट पर बैठे अद्वैत के बगल वाली सीट पर रूहानी बैठी थी, जिसने एक नरम lavender shade का अनारकली सूट खरीद कर पहना था, जिसके look में उसे कोई पुराना अहसास मिल गया था।

    “तुम्हें यही पसंद आया?” अद्वैत ने पूछा, तो रूहानी ने ड्रेस पर नज़र गड़ाते हुए सिर हिलाया। 

    “हाँ… यही ठीक लगेगा आज के लिए,” उसकी आवाज़ में भावनाओं की तहें थीं…. कुछ गहरी, कुछ छुपी हुई। 

    अद्वैत ने बिना कुछ कहे गाड़ी स्टार्ट की। एक पल को दोनों खामोश रहे, जैसे किसी और की याद के लिए एक छोटा-सा मौन रख रहे हों।

    जैसे ही गाड़ी ने बाज़ार की रौशनी को पीछे छोड़ा और सड़क अब रूहानी के पापा के घर की ओर मुड़ चुकी थी, हवा थोड़ी ठंडी और एहसास थोड़ा भारी हो गया।

    रूहानी के मम्मी-पापा के घर की चौखट पर जब गाड़ी का इंजन बंद हुआ। सन्नाटा उतर आया, पर दिल की धड़कनें तेज़ थीं।

    अद्वैत ने धीरे से कहा, “चलो…?”

    रूहानी ने सिर झुकाकर कपड़े की तहें ठीक कीं, दुपट्टे पर उँगलियाँ फिराईं। 

    यश की कही बात उसका मन दोहराया जा रहा था,“तुम ethnic पहनती हो तो लगती नहीं जैसे इस दौर की हो…”

    उन्होंने दरवाज़ा खोला। बाहर की हवा में रात की सीलन और किसी भूले अल्फाज़ की गंध थी।

    दरवाज़े तक पहुँचते हुए रूहानी का हाथ काँपा, उसके wristwatch की सूई अब भी 6:57 पर रुकी थी…. वही वक़्त जब सब थम गया था।

    अद्वैत ने दरवाज़े की घंटी की तरफ हाथ बढ़ाया।

    उसने रूहानी की तरफ देखा, उसकी आँखों में एक सवाल था… “क्या तुम तैयार हो?”

    रूहानी की धड़कनों की गति बढ़ चुकी थीं। उसने बिना कुछ कहे सिर हिला दिया।

    और फिर… अद्वैत ने घंटी दबाई।

    —————————

    “क्या वक़्त सच में थम गया है… या आज की रात वो सूई फिर से चलने वाली है?”

    “रूहानी तैयार तो है… लेकिन किसके लिए? अपने भाई से मिलने के लिए, या उन सवालों का सामना करने के लिए जो अब तक अनकहे थे?”

  • भाग 5: आखिरी धरोहर

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     

     

    सुबह हो चुकी थी।

     

    रुद्रगढ़ हवेली का अधिकांश हिस्सा मलबे में बदल गया था। गाँव के लोग दूर खड़े होकर टूटे हुए महल को देख रहे थे।

     

    आरव और कबीर आँगन में खड़े थे।

     

    हरिदास कहीं दिखाई नहीं दे रहा था।

     

    आरव ने पूरी रात की रिकॉर्डिंग देखी।

     

    वीडियो में सब कुछ साफ दिखाई दे रहा था—पश्चिमी कमरा, तहखाना, मृणालिनी की डायरी और वह अजीब काली परछाईं।

     

    लेकिन एक चीज़ देखकर उसके हाथ काँपने लगे।

     

    जहाँ उसे याद था कि मृणालिनी उसके सामने खड़ी थी, वीडियो में वहाँ कोई नहीं था।

     

    सिर्फ आरव और कबीर थे।

     

    और कैमरे के पीछे से एक बच्ची की आवाज़ आ रही थी—

     

    “सच को बाहर ले जाओ।”

     

    आरव ने वीडियो बंद कर दिया।

     

    कबीर चुपचाप खड़ा था।

     

    “तू ठीक है?” आरव ने पूछा।

     

    कबीर ने उसकी तरफ देखा।

     

    “हाँ।”

     

    लेकिन उसकी आँखों के नीचे काले घेरे थे।

     

    “मुझे रात से एक ही सपना आ रहा है।”

     

    “क्या सपना?”

     

    कबीर ने जवाब नहीं दिया।

     

    उसने जेब से कुछ निकाला।

     

    वही चाँदी की पायल।

     

    आरव का चेहरा बदल गया।

     

    “ये तेरे पास कैसे आई?”

     

    कबीर ने कहा—

     

    “जब हम तहखाने में थे, तभी मैंने इसे उठा लिया था।”

     

    आरव ने तुरंत पायल उसके हाथ से लेने की कोशिश की।

     

    लेकिन कबीर ने हाथ पीछे कर लिया।

     

    “नहीं।”

     

    उसकी आवाज़ बदल गई थी।

     

    “ये मेरी है।”

     

    आरव कुछ क्षण उसे देखता रहा।

     

    “कबीर, ये मृणालिनी की थी।”

     

    कबीर मुस्कुराया।

     

    “मुझे पता है।”

     

    आरव के शरीर में सिहरन दौड़ गई।

     

    “तुझे कैसे पता?”

     

    कबीर ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    उस रात आरव गाँव के एक छोटे होटल में रुका। उसने तय किया कि सुबह शहर लौट जाएगा।

     

    रात करीब दो बजे उसकी नींद खुली।

     

    कमरे में कोई खड़ा था।

     

    आरव ने मोबाइल की रोशनी जलाई।

     

    कोई नहीं था।

     

    फिर खिड़की पर दस्तक हुई।

     

    टक… टक… टक…

     

    आरव ने पर्दा हटाया।

     

    बाहर कबीर खड़ा था।

     

    लेकिन होटल की चौथी मंज़िल की खिड़की के बाहर कोई इंसान कैसे खड़ा हो सकता था?

     

    आरव पीछे हट गया।

     

    कबीर ने शीशे के दूसरी तरफ से मुस्कुराते हुए कहा—

     

    “दरवाज़ा खोल।”

     

    आरव ने सिर हिलाया।

     

    “तू वहाँ कैसे है?”

     

    कबीर की मुस्कान गायब हो गई।

     

    उसका चेहरा धीरे-धीरे मृणालिनी जैसा बनने लगा।

     

    फिर आवाज़ आई—

     

    “धरोहर कभी खत्म नहीं होती। सिर्फ अपना रक्षक बदलती है।”

     

    आरव ने आँखें बंद कर लीं।

     

    कुछ सेकंड बाद जब उसने दोबारा देखा, खिड़की के बाहर कोई नहीं था।

     

    सुबह होते ही वह कबीर को ढूँढने गया।

     

    कबीर होटल में नहीं था।

     

    उसका फोन कमरे में पड़ा था।

     

    और बिस्तर पर वही चाँदी की पायल रखी थी।

     

    आरव ने पुलिस को सूचना दी।

     

    कई घंटे तक खोजबीन हुई।

     

    लेकिन कबीर का कोई पता नहीं चला।

     

    तीन दिन बाद आरव शहर लौट आया।

     

    उसने रुद्रगढ़ हवेली पर बनाई पूरी डॉक्यूमेंट्री इंटरनेट पर डाल दी।

     

    वीडियो बहुत तेजी से वायरल हो गया।

     

    लोगों ने हवेली की कहानी पर विश्वास किया।

     

    पुराने दस्तावेज़ों की जाँच हुई।

     

    राजेंद्र सिंह और मृणालिनी के बारे में रिकॉर्ड सच निकले।

     

    गाँव में मृणालिनी के नाम पर एक स्मारक बनाया गया।

     

    आरव को लगा कि अब सब खत्म हो गया।

     

    लेकिन ठीक एक महीने बाद उसे डाक से एक पैकेट मिला।

     

    भेजने वाले का नाम नहीं था।

     

    अंदर एक पुरानी तस्वीर थी।

     

    तस्वीर में रुद्रगढ़ हवेली दिखाई दे रही थी।

     

    आरव ने ध्यान से देखा।

     

    हवेली के सामने चार लोग खड़े थे।

     

    मृणालिनी।

     

    हरिदास।

     

    कबीर।

     

    और…

     

    आरव खुद।

     

    लेकिन तस्वीर के पीछे तारीख लिखी थी—

     

    1936।

     

    आरव की साँस रुक गई।

     

    तस्वीर के पीछे एक और वाक्य लिखा था—

     

    “तुम दोनों कभी यहाँ पहली बार नहीं आए थे।”

     

    आरव के हाथ से तस्वीर गिर गई।

     

    उसी रात उसने अपने परिवार के पुराने दस्तावेज़ खोजने शुरू किए।

     

    उसे अपने दादा की एक डायरी मिली।

     

    उसमें सिर्फ एक लाइन लिखी थी—

     

    “हर पीढ़ी में रुद्रगढ़ का एक वारिस लौटता है। उसे लगता है कि वह धरोहर देखने आया है। असल में धरोहर उसे देखने बुलाती है।”

     

    आरव ने डायरी बंद कर दी।

     

    तभी उसके कमरे की लाइट बंद हो गई।

     

    अँधेरे में किसी बच्ची की हँसी सुनाई दी।

     

    ही… ही… ही…

     

    फिर वही आवाज़—

     

    “आरव…”

     

    उसने मोबाइल की फ्लैशलाइट जलाई।

     

    दीवार पर एक परछाईं थी।

     

    छोटी बच्ची की।

     

    लेकिन वह परछाईं अकेली नहीं थी।

     

    उसके पीछे एक आदमी की परछाईं भी थी।

     

    फिर तीसरी।

     

    चौथी।

     

    दर्जनों परछाइयाँ।

     

    आरव पीछे हटता गया।

     

    दीवार पर धीरे-धीरे शब्द उभरने लगे—

     

    “कहानी खत्म नहीं हुई।”

     

    अचानक उसका फोन बजा।

     

    स्क्रीन पर नाम देखकर उसके हाथ काँप गए।

     

    कबीर कॉलिंग।

     

    आरव ने फोन उठाया।

     

    कुछ सेकंड तक कोई आवाज़ नहीं आई।

     

    फिर कबीर की बहुत धीमी आवाज़ सुनाई दी—

     

    “आरव… मुझे ढूँढना मत।”

     

    “तू कहाँ है?”

     

    दूसरी तरफ कुछ फुसफुसाहट सुनाई दी।

     

    कबीर बोला—

     

    “मैं वहीं हूँ जहाँ से सब शुरू हुआ था।”

     

    “हवेली में?”

     

    कुछ क्षण खामोशी रही।

     

    फिर कबीर ने कहा—

     

    “नहीं।”

     

    उसकी आवाज़ काँपने लगी।

     

    “तुम्हारे घर के नीचे।”

     

    आरव के चेहरे का रंग उड़ गया।

     

    उसी क्षण उसके पैरों के नीचे फर्श से आवाज़ आई।

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    वही तीन दस्तक।

     

    जैसी रुद्रगढ़ हवेली के पश्चिमी कमरे में सुनाई दी थी।

     

    फर्श पर एक दरार बनने लगी।

     

    आरव पीछे हट गया।

     

    दरार के अंदर से ठंडी हवा आने लगी।

     

    और फिर एक पुरानी लकड़ी की पट्टी अपने आप हट गई।

     

    नीचे अँधेरी सीढ़ियाँ थीं।

     

    सीढ़ियों के पास एक पुरानी चाँदी की पायल पड़ी थी।

     

    आरव ने ऊपर देखा।

     

    दीवार पर मृणालिनी की तस्वीर लगी थी।

     

    इस बार तस्वीर में वह अकेली नहीं थी।

     

    उसके बगल में कबीर खड़ा था।

     

    और दूसरी तरफ…

     

    आरव।

     

    मृणालिनी की आँखें तस्वीर के अंदर से सीधे आरव को देख रही थीं।

     

    उसके होंठ धीरे-धीरे हिले।

     

    आवाज़ कमरे में नहीं आई।

     

    लेकिन आरव ने उसके शब्द साफ समझ लिए—

     

    “पुरानी धरोहर को कोई नष्ट नहीं कर सकता।”

     

    नीचे से कबीर की आवाज़ आई—

     

    “वह सिर्फ एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक जाती है।”

     

    आरव ने टॉर्च उठाई।

     

    और उन अँधेरी सीढ़ियों पर पहला कदम रख दिया।

     

    उसके पीछे दरवाज़ा अपने आप बंद हो गया।

     

    धड़ाम!

     

    अँधेरे में एक बच्ची की हँसी गूँजी।

     

    और उसी के साथ…

     

    रुद्रगढ़ की धरोहर ने अपना नया रक्षक चुन लिया।