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भाग 3 — माँ की आत्मा

पढ़ने का समय : 5 मिनट

 

घर का मुख्य दरवाजा बंद था।

पापा ने पूरी ताकत से उसे खोलने की कोशिश की, लेकिन दरवाजा जैसे पत्थर का बन गया था।

आरव रोते हुए बोला, “पापा, अब क्या होगा?”

पापा ने कहा, “डरो मत। मैं तुम्हें कुछ नहीं होने दूंगा।”

तभी घर की सारी घड़ियां एक साथ बंद हो गईं।

बारह बज रहे थे।

फिर अचानक एक-एक करके सभी घड़ियां उल्टी दिशा में चलने लगीं।

आरव ने अपनी आंखें बंद कर लीं।

ऊपर से किसी के गाने की आवाज आ रही थी।

बहुत धीमी।

बहुत उदास।

पापा ने आरव को पीछे रहने को कहा और खुद सीढ़ियों की तरफ बढ़े।

“कौन है?”

कोई जवाब नहीं आया।

फिर ऊपर से आवाज आई—

“अरुण…”

पापा रुक गए।

यह उनकी पत्नी मीरा की आवाज थी।

“अरुण, मुझे बचा लो…”

पापा की आंखों में आंसू आ गए।

उन्होंने धीरे से कहा, “मीरा?”

आरव ने उनका हाथ पकड़ लिया।

“पापा, मत जाइए।”

लेकिन पापा जैसे उस आवाज के जादू में आ चुके थे।

वह सीढ़ियां चढ़ने लगे।

आरव भी उनके पीछे चला।

ऊपर पहुंचकर उन्होंने देखा कि कमरे का दरवाजा खुला हुआ था।

अंदर अंधेरा था।

फिर अचानक कमरे के बीच एक हल्की रोशनी दिखाई दी।

उस रोशनी में एक औरत खड़ी थी।

सफेद साड़ी।

चेहरा शांत।

आंखों में आंसू।

वह मीरा थी।

आरव दौड़कर उसकी ओर जाना चाहता था, लेकिन पापा ने उसे रोक लिया।

“रुको।”

औरत ने कहा—

“आरव… मैं सच में तुम्हारी माँ हूँ।”

आरव ने उसे ध्यान से देखा।

इस बार उसके पैर सीधे थे।

चेहरा भी डरावना नहीं था।

उसने कहा, “अगर आप मेरी माँ हैं तो मुझे वह बात बताइए जो सिर्फ माँ जानती थी।”

औरत मुस्कुराई।

“तुम्हें बचपन में नींद नहीं आती थी। मैं तुम्हें नीले रंग की छोटी कार देती थी। तुम उसे तकिए के नीचे रखकर सोते थे।”

आरव की आंखों से आंसू निकल आए।

यह बात किसी और को नहीं पता थी।

वह आगे बढ़ा।

“माँ…”

औरत ने हाथ फैलाए।

लेकिन पापा ने फिर उसे रोक दिया।

“मीरा, अगर तुम सच में हो तो बताओ, सावित्री को कैसे रोका जा सकता है?”

औरत का चेहरा अचानक गंभीर हो गया।

“उसकी आत्मा को खत्म नहीं किया जा सकता।”

“फिर?”

“उसे मुक्त करना होगा।”

पापा ने पूछा, “कैसे?”

मीरा ने कमरे के एक कोने की तरफ इशारा किया।

वहाँ वही पुराना लोहे का संदूक रखा था।

“उसमें रवि की आखिरी चीज है।”

पापा ने संदूक खोला।

अंदर एक छोटी लाल गेंद, एक पुरानी तस्वीर और चांदी का लॉकेट था।

मीरा ने कहा—

“सावित्री अपने बेटे की मौत को स्वीकार नहीं कर पाई। उसका दुःख ही उसकी शक्ति बन गया। उसे लगता है कि हर बच्चा उसका रवि है। अगर रवि की आखिरी याद उसे वापस दे दी जाए, तो शायद वह मुक्त हो सके।”

आरव ने पूछा—

“लेकिन वह मेरी माँ जैसी क्यों दिखती है?”

मीरा ने कहा—

“क्योंकि वह जानती है कि बच्चे अपनी माँ की आवाज पर भरोसा करते हैं। उसने तुम्हें अपने बेटे की जगह पाने के लिए मेरी शक्ल अपनाई।”

अचानक कमरे में तेज हवा चलने लगी।

मीरा का चेहरा धुंधला पड़ने लगा।

“माँ!”

आरव उसकी तरफ दौड़ा।

मीरा ने कहा—

“मुझे अभी जाना होगा। सावित्री आ रही है।”

तभी कमरे की दीवार पर एक काली परछाईं दिखाई दी।

सावित्री।

उसकी आवाज गूंज उठी—

“तुमने मेरा बेटा मुझसे छीन लिया!”

मीरा ने कहा—

“तुम्हारा बेटा मर चुका है, सावित्री। आरव तुम्हारा बेटा नहीं है।”

सावित्री चीखी।

कमरे की खिड़कियां टूटने लगीं।

कांच के टुकड़े हवा में उड़ने लगे।

पापा ने आरव को अपने पीछे कर लिया।

सावित्री धीरे-धीरे कमरे में उतर आई।

उसके बाल हवा में उड़ रहे थे।

उसकी आंखें लाल थीं।

“मेरा रवि…”

उसने आरव की तरफ हाथ बढ़ाया।

आरव पीछे हट गया।

“मैं रवि नहीं हूँ!”

सावित्री की आवाज बदल गई।

“तुम्हें बनना पड़ेगा।”

उसने हाथ घुमाया और आरव अचानक जमीन से ऊपर उठ गया।

“पापा!”

पापा ने उसका हाथ पकड़ लिया।

लेकिन वह भी धीरे-धीरे हवा में उठने लगे।

तभी मीरा की आत्मा ने सावित्री के सामने आकर कहा—

“उसे छोड़ दो!”

सावित्री चीखी—

“तुमने मेरे बेटे को मुझसे छीन लिया!”

मीरा ने कहा—

“तुम्हारा बेटा तुम्हें किसी ने नहीं छीना था। वह हादसे में मरा था। लेकिन तुमने उसकी मौत को स्वीकार नहीं किया। तुमने अपने दुःख में निर्दोष बच्चों को कैद करना शुरू कर दिया।”

सावित्री कुछ क्षण के लिए शांत हो गई।

उसकी आंखों में पहली बार गुस्से की जगह दर्द दिखाई दिया।

मीरा ने लाल गेंद उसकी तरफ बढ़ाई।

“यह रवि की है।”

सावित्री ने गेंद को देखा।

उसका चेहरा बदलने लगा।

उसे जैसे कुछ याद आ गया।

“रवि…”

उसकी आवाज अब डरावनी नहीं थी।

बल्कि एक माँ की तरह थी।

“माँ, मैं गिर गया…”

सावित्री के चेहरे पर आंसू आ गए।

वह जमीन पर बैठ गई।

“रवि…”

कमरे में अचानक बच्चे की हंसी गूंजने लगी।

सावित्री ने ऊपर देखा।

उसे सामने एक छोटा बच्चा दिखाई दिया।

वह लाल गेंद लेकर खड़ा था।

“माँ, मैं घर जाना चाहता हूँ।”

सावित्री उसके पीछे चल पड़ी।

लेकिन जाते-जाते उसने आरव की ओर देखा।

“मुझे माफ करना…”

और फिर वह गायब हो गई।

कमरे में शांति छा गई।

मीरा भी धीरे-धीरे गायब होने लगी।

आरव दौड़कर उसके पास गया।

“माँ, आप जा रही हो?”

मीरा ने उसके सिर पर हाथ रखा।

“बेटा, माँ कभी पूरी तरह नहीं जाती।”

“फिर आप वापस क्यों नहीं आ सकतीं?”

मीरा मुस्कुराई।

“क्योंकि कुछ रिश्ते शरीर से नहीं, प्यार से जुड़े होते हैं।”

आरव रोने लगा।

“मैं आपको भूलना नहीं चाहता।”

“मुझे भूलना मत। लेकिन मेरे लिए अपना जीवन मत रोकना।”

मीरा की छवि धीरे-धीरे रोशनी में बदल गई।

आखिरी बार उसकी आवाज आई—

“सच से कभी मत भागना, आरव।”

और वह गायब हो गई।

घर की सारी खिड़कियां खुल गईं।

मुख्य दरवाजा भी खुल गया।

सुबह की हल्की रोशनी घर में आने लगी।

आरव और उसके पिता नीचे आ गए।

लेकिन कहानी अभी खत्म नहीं हुई थी।

क्योंकि जब पापा ने पुराने संदूक को दोबारा देखा, तो उसमें एक और कागज मिला।

उस पर लिखा था—

“सावित्री अकेली नहीं थी।”

पापा का चेहरा फिर सफेद पड़ गया।

आरव ने पूछा—

“पापा… इसका मतलब क्या है?”

पापा ने कोई जवाब नहीं दिया।

और तभी ऊपर वाले कमरे से किसी बच्चे की हंसी सुनाई दी।

 

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