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आखिरी राखी जो बंधी नहीं

पढ़ने का समय : 8 मिनट

वो आखिरी राखी जो कभी बांधी नहीं गई

 

रक्षाबंधन की सुबह पूरे घर में खुशी थी, लेकिन मीरा अपने कमरे में बैठी एक पुरानी लकड़ी की पेटी को बार-बार खोल और बंद कर रही थी।

 

पेटी के अंदर एक राखी रखी थी।

 

लाल और पीले धागे वाली।

 

राखी नई नहीं थी।

 

उसे खरीदे हुए पूरे बारह साल हो चुके थे।

 

लेकिन आज तक वह किसी की कलाई पर नहीं बंधी थी।

 

मीरा हर साल उसे निकालती।

 

कुछ देर देखती।

 

फिर वापस उसी पेटी में रख देती।

 

उसकी माँ कई साल पहले कहती थीं,

 

“बेटा, अब इस राखी को संभालकर रखने से क्या होगा?”

 

मीरा धीरे से जवाब देती,

 

“माँ, कुछ चीजें बांधने के लिए नहीं होतीं… बस याद रखने के लिए होती हैं।”

 

लेकिन इस बार माँ नहीं थीं।

 

मीरा घर में अकेली बैठी थी।

 

उसकी उम्र अब तीस साल हो चुकी थी।

 

आज भी रक्षाबंधन था।

 

बाहर मोहल्ले की लड़कियां अपने भाइयों को राखी बांध रही थीं।

 

कहीं हंसी थी।

 

कहीं मिठाई बांटी जा रही थी।

 

लेकिन मीरा की नजर सिर्फ उस पुरानी राखी पर थी।

 

तभी दरवाजे पर दस्तक हुई।

 

“मीरा!”

 

बाहर से पड़ोस की बूढ़ी शारदा दादी की आवाज आई।

 

मीरा ने जल्दी से पेटी बंद की।

 

“आ रही हूं दादी।”

 

दरवाजा खोलते ही दादी ने कहा,

 

“आज भी नहीं गई?”

 

मीरा समझ गई कि दादी क्या पूछ रही हैं।

 

उसने धीरे से कहा,

 

“नहीं।”

 

दादी कुछ पल चुप रहीं।

 

“कब तक खुद को सजा देती रहेगी?”

 

मीरा की आंखें भर आईं।

 

“मैं खुद को सजा नहीं दे रही।”

 

“फिर?”

 

“बस… भूल नहीं पा रही।”

 

दादी अंदर आ गईं।

 

उन्होंने लकड़ी की पेटी को देखा।

 

“फिर वही राखी?”

 

मीरा ने सिर हिला दिया।

 

दादी ने पूछा,

 

“क्या आज भी तू सोचती है कि अगर उस दिन तू उसे राखी बांध देती, तो सब बदल जाता?”

 

मीरा ने जवाब नहीं दिया।

 

उसकी आंखों के सामने बारह साल पुराना दृश्य घूमने लगा।

 

तब वह अठारह साल की थी।

 

उसका भाई विवान उससे तीन साल बड़ा था।

 

दोनों बचपन से एक-दूसरे के सबसे अच्छे दोस्त थे।

 

विवान बहुत शरारती था।

 

और मीरा बहुत जल्दी नाराज हो जाती थी।

 

विवान उसे छेड़ता,

 

“तुझे गुस्सा करते हुए देखकर मजा आता है।”

 

मीरा जवाब देती,

 

“एक दिन सच में बात करना बंद कर दूंगी।”

 

विवान हंस देता।

 

“तू मेरे बिना रह नहीं सकती।”

 

मीरा गुस्से में कहती,

 

“बहुत गलतफहमी है आपको।”

 

लेकिन सच यह था कि दोनों एक-दूसरे के बिना रह भी नहीं सकते थे।

 

हर रक्षाबंधन पर मीरा सबसे पहले विवान की कलाई पर राखी बांधती।

 

और विवान हर साल उसे चिढ़ाता,

 

“इस बार क्या चाहिए? पहले ही बता दे, मेरे पास ज्यादा पैसे नहीं हैं।”

 

मीरा हमेशा कहती,

 

“मुझे गिफ्ट नहीं चाहिए।”

 

विवान पूछता,

 

“तो?”

 

“बस कभी मुझे छोड़कर मत जाना।”

 

विवान हंसते हुए कहता,

 

“पगली, मैं कहीं नहीं जाऊंगा।”

 

लेकिन एक साल रक्षाबंधन से ठीक एक दिन पहले दोनों के बीच बहुत बड़ा झगड़ा हो गया।

 

विवान को एक दूसरे शहर में पढ़ाई के लिए जाना था।

 

वह बहुत खुश था।

 

लेकिन मीरा नाराज थी।

 

“तुम हमेशा के लिए चले जाओगे।”

 

विवान ने कहा,

 

“पढ़ने जा रहा हूं, भाग नहीं रहा।”

 

“लेकिन यहां से दूर।”

 

“मीरा, जिंदगी में आगे बढ़ना पड़ता है।”

 

मीरा ने गुस्से में कहा,

 

“तो चले जाओ। मुझे क्या फर्क पड़ता है?”

 

विवान चुप हो गया।

 

“सच?”

 

मीरा ने चेहरा दूसरी तरफ कर लिया।

 

“हां।”

 

विवान ने कहा,

 

“ठीक है।”

 

अगले दिन रक्षाबंधन था।

 

मीरा ने सुबह राखी खरीदी।

 

लेकिन उसका गुस्सा अभी तक कम नहीं हुआ था।

 

विवान उसके कमरे के बाहर आया।

 

“राखी नहीं बांधेगी?”

 

मीरा ने कहा,

 

“नहीं।”

 

“पक्का?”

 

“हां।”

 

विवान कुछ पल दरवाजे पर खड़ा रहा।

 

फिर बोला,

 

“ठीक है।”

 

मीरा ने सोचा था कि वह वापस आएगा।

 

मनाएगा।

 

मजाक करेगा।

 

कहेगा कि वह गुस्सा छोड़ दे।

 

लेकिन विवान चला गया।

 

उस शाम उसे शहर के लिए निकलना था।

 

मीरा ने खुद को रोक लिया।

 

उसने सोचा,

 

“जब जाना ही है तो मैं क्यों रोकूं?”

 

विवान जाने से पहले माँ से मिला।

 

पिता से मिला।

 

फिर मीरा के कमरे के बाहर आकर रुका।

 

“मीरा?”

 

मीरा ने कोई जवाब नहीं दिया।

 

“मैं जा रहा हूं।”

 

कमरे के अंदर बैठी मीरा की आंखें भर आईं।

 

लेकिन उसने कहा,

 

“जाओ।”

 

कुछ सेकंड तक बाहर कोई आवाज नहीं आई।

 

फिर उसके कदमों की आवाज दूर होती चली गई।

 

मीरा ने दौड़कर दरवाजा खोला।

 

लेकिन विवान जा चुका था।

 

वह भागकर बाहर आई।

 

गाड़ी सड़क के मोड़ से निकल रही थी।

 

मीरा ने हाथ में राखी पकड़ रखी थी।

 

लेकिन वह आवाज नहीं दे पाई।

 

बस वहीं खड़ी रह गई।

 

उसके बाद विवान कभी वापस नहीं आया।

 

कुछ समय बाद परिवार को खबर मिली कि शहर में एक गंभीर घटना के बाद उससे संपर्क टूट गया था और वह लापता हो गया।

 

कई साल तक तलाश चली।

 

लेकिन कोई पता नहीं मिला।

 

मीरा की जिंदगी वहीं रुक गई।

 

उसे हमेशा लगता रहा—

 

“अगर उस दिन मैंने उसे राखी बांध दी होती…”

 

शारदा दादी ने उसकी आंखों के सामने हाथ हिलाया।

 

“कहां खो गई?”

 

मीरा वर्तमान में लौट आई।

 

उसने राखी को हाथ में लिया।

 

“दादी, मैंने आखिरी बार उसे बिना राखी के जाने दिया।”

 

दादी ने धीरे से कहा,

 

“लेकिन क्या तुझे लगता है कि उसने तुझे माफ नहीं किया होगा?”

 

मीरा ने दुखी होकर कहा,

 

“मैंने उसे बहुत बुरा कहा था।”

 

दादी मुस्कुराईं।

 

“भाई-बहन के रिश्ते में गुस्सा आखिरी बात नहीं होता।”

 

मीरा ने कुछ नहीं कहा।

 

तभी बाहर से किसी ने आवाज दी।

 

“मीरा जी?”

 

दरवाजे पर एक अधेड़ आदमी खड़ा था।

 

उसके हाथ में एक छोटा बैग था।

 

“आप मुझे नहीं जानतीं। मैं विवान का दोस्त था।”

 

मीरा का दिल तेजी से धड़कने लगा।

 

“विवान?”

 

उस आदमी ने सिर हिलाया।

 

“हां।”

 

“आपको मेरे भाई के बारे में कुछ पता है?”

 

आदमी ने बैग आगे कर दिया।

 

“उसके पास कुछ चीजें थीं। बहुत सालों बाद ये सामान मेरे पास पहुंचा। मुझे आपका पता ढूंढने में समय लगा।”

 

मीरा के हाथ कांपने लगे।

 

उसने बैग खोला।

 

अंदर कुछ पुरानी किताबें थीं।

 

एक पुरानी घड़ी।

 

और एक छोटा डिब्बा।

 

मीरा ने डिब्बा खोला।

 

उसके अंदर…

 

एक राखी थी।

 

बहुत पुरानी।

 

साथ में एक कागज रखा था।

 

मीरा ने पढ़ा—

 

“अगर मीरा कभी ये पढ़े तो उसे कहना कि मैं उससे नाराज नहीं था।

 

उसने उस दिन राखी नहीं बांधी, लेकिन मैं जानता था कि वह मुझसे प्यार करती है।

 

वह गुस्से में है, बस।

 

अगर कभी वापस आया तो उससे जरूर राखी बंधवाऊंगा।

 

और अगर नहीं आ पाया…

 

तो उसे कहना कि मेरी कलाई पर राखी न सही, लेकिन मेरे दिल में हमेशा मेरी बहन का प्यार बंधा रहा।”

 

मीरा के हाथ से कागज गिर गया।

 

वह फूट-फूटकर रोने लगी।

 

दादी ने उसे संभाला।

 

“देखा? उसने तुझे कभी छोड़ा ही नहीं था।”

 

मीरा ने उस राखी को अपने हाथों में लिया।

 

फिर अपनी पुरानी पेटी खोली।

 

उसमें रखी राखी निकाली।

 

दोनों राखियों को साथ रख दिया।

 

एक राखी मीरा ने विवान के लिए खरीदी थी।

 

एक विवान ने शायद उसके लिए संभालकर रखी थी।

 

बारह साल बाद…

 

दोनों राखियां एक साथ थीं।

 

लेकिन कलाई अभी भी खाली थी।

 

मीरा धीरे से बोली,

 

“दादी, अब क्या करूं?”

 

दादी ने कहा,

 

“जिस प्यार को तूने सालों से अधूरा समझा, उसे पूरा कर।”

 

मीरा ने दोनों राखियां उठाईं।

 

वह घर के उस कमरे में गई, जहां बचपन में विवान और वह खेलते थे।

 

दीवार पर उसकी एक पुरानी तस्वीर लगी थी।

 

मीरा ने तस्वीर के सामने बैठकर कहा,

 

“भैया, उस दिन मैं बहुत गुस्से में थी।”

 

उसकी आवाज कांप रही थी।

 

“मैंने सोचा था आप मुझे मनाओगे।”

 

उसने राखी तस्वीर के फ्रेम पर रख दी।

 

“लेकिन मैं भूल गई कि हर बार किसी रिश्ते को दूसरा इंसान ही नहीं मनाता।”

 

उसने आंखें बंद कर लीं।

 

“मुझे भी आपको रोकना चाहिए था।”

 

कुछ देर तक वह चुप रही।

 

फिर धीरे से मुस्कुराई।

 

“लेकिन आज मैं आपको एक बात बताना चाहती हूं।”

 

उसने दोनों राखियों को तस्वीर के सामने रखा।

 

“आज मैं आपको राखी नहीं बांध सकती… लेकिन आज से खुद को दोष देना छोड़ रही हूं।”

 

उसकी आंखों से आंसू बह रहे थे।

 

“क्योंकि मुझे पता है… आप मुझसे नाराज नहीं थे।”

 

मीरा ने तस्वीर को देखा।

 

“और शायद… यही मेरी सबसे जरूरी राखी थी।”

 

उस दिन शाम को शारदा दादी ने देखा कि मीरा घर के बाहर बैठी है।

 

लेकिन इस बार उसकी गोद में लकड़ी की पेटी नहीं थी।

 

मीरा ने दादी से कहा,

 

“दादी, आज मैंने राखी बांधी।”

 

दादी ने हैरानी से पूछा,

 

“किसे?”

 

मीरा ने आसमान की तरफ देखा।

 

“उसे… जिससे मैंने कभी प्यार करना बंद ही नहीं किया।”

 

उसकी आंखों में आंसू थे।

 

लेकिन इस बार उन आंसुओं में सिर्फ दुख नहीं था।

 

एक अजीब-सी शांति भी थी।

 

क्योंकि उसे आखिरकार समझ आ गया था—

 

कुछ राखियां कलाई पर नहीं बंधतीं।

 

वे यादों में बंधती हैं।

 

माफी में बंधती हैं।

 

और उन रिश्तों में बंधती हैं…

 

जिन्हें समय, दूरी और नाराज़गी भी खत्म नहीं कर पाती।

 

उसकी राखी कभी विवान की कलाई तक नहीं पहुंची थी…

 

लेकिन उसका प्यार हमेशा उसके भाई तक पहुंचता रहा।

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