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एक भाई जिसे अपनी बहन याद नहीं थी

पढ़ने का समय : 6 मिनट

जिस भाई को अपनी बहन याद नहीं थी

 

“माफ कीजिए… क्या आप मुझे जानती हैं?”

 

ये सवाल सुनते ही अनामिका के हाथ से राखी का डिब्बा नीचे गिर गया।

 

सामने खड़ा आदमी उसका अपना भाई विवान था।

 

वही भाई, जिसके साथ उसने बचपन की हर छोटी-बड़ी याद बांटी थी।

 

लेकिन आज उसकी आंखों में अनजानापन था।

 

अनामिका ने कांपती आवाज में पूछा,

 

“भैया… मुझे पहचान नहीं रहे?”

 

विवान ने कुछ पल उसे देखा।

 

फिर सिर हिलाते हुए कहा,

 

“नहीं।”

 

अनामिका को लगा जैसे उसके पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई हो।

 

विवान की मां यानी उनकी माँ पीछे खड़ी थीं। उनकी आंखों से आंसू बह रहे थे।

 

कुछ महीने पहले एक दुर्घटना के बाद विवान की याददाश्त चली गई थी। डॉक्टरों ने कहा था कि उसे पुरानी बातें याद आने में समय लग सकता है।

 

लेकिन अनामिका को उम्मीद थी कि शायद उसे देखकर उसका भाई उसे पहचान लेगा।

 

आखिर वह उसकी छोटी बहन थी।

 

जिसे वह बचपन में प्यार से “नन्ही” कहता था।

 

जिसके बिना खाना नहीं खाता था।

 

जिसे स्कूल छोड़ने रोज जाता था।

 

लेकिन आज…

 

उसे कुछ याद नहीं था।

 

अनामिका ने मुस्कुराने की कोशिश की।

 

“कोई बात नहीं भैया। मैं… आपकी बहन हूं।”

 

विवान ने उसकी तरफ देखा।

 

“मुझे सच में कुछ याद नहीं।”

 

अनामिका ने सिर हिला दिया।

 

“कोई बात नहीं।”

 

वह अपने आंसू छिपाकर बाहर चली गई।

 

उस दिन के बाद अनामिका रोज भाई से मिलने आती।

 

कभी उसके लिए पसंद की मिठाई लाती।

 

कभी बचपन की तस्वीरें दिखाती।

 

कभी पुरानी बातें सुनाती।

 

“भैया, आपको याद है? आपने एक बार मेरी गुल्लक तोड़ दी थी।”

 

विवान हंसता।

 

“मैंने?”

 

“हां।”

 

“क्यों?”

 

“क्योंकि आपको क्रिकेट खेलने के लिए पैसे चाहिए थे।”

 

विवान मुस्कुराता।

 

“फिर?”

 

“फिर आपने अपनी सारी बचत मुझे दे दी थी और कहा था कि गुल्लक वापस खरीद लेंगे।”

 

विवान ध्यान से सुनता, लेकिन उसके चेहरे पर कोई पहचान नहीं आती।

 

अनामिका को दुख होता।

 

लेकिन उसने हार नहीं मानी।

 

रक्षाबंधन आने वाला था।

 

माँ ने कहा,

 

“बेटा, इस बार राखी मत बांधना। अगर उसे कुछ याद नहीं है तो उसे अजीब लगेगा।”

 

अनामिका ने सिर हिलाया।

 

“नहीं माँ। मैं राखी जरूर बांधूंगी।”

 

“लेकिन वह तुझे पहचानता भी नहीं।”

 

अनामिका ने धीरे से कहा,

 

“राखी पहचान के लिए नहीं बांधी जाती माँ… रिश्ते के लिए बांधी जाती है।”

 

रक्षाबंधन के दिन अनामिका एक छोटी-सी थाली लेकर भाई के कमरे में गई।

 

विवान खिड़की के पास बैठा था।

 

अनामिका ने पूछा,

 

“भैया, आज आपको पता है कौन-सा दिन है?”

 

विवान ने सिर हिलाया।

 

“नहीं।”

 

“आज रक्षाबंधन है।”

 

“अच्छा।”

 

“आज बहन अपने भाई की कलाई पर राखी बांधती है।”

 

विवान ने अपनी कलाई आगे कर दी।

 

“तो बांध दो।”

 

अनामिका कुछ पल उसे देखती रही।

 

उसकी आंखों में आंसू आ गए।

 

उसने धीरे-धीरे राखी उसकी कलाई पर बांध दी।

 

राखी बांधते समय उसके हाथ कांप रहे थे।

 

विवान ने पूछा,

 

“तुम रो क्यों रही हो?”

 

अनामिका ने मुस्कुराकर कहा,

 

“खुशी के आंसू हैं।”

 

राखी बांधने के बाद उसने उसके सामने मिठाई रखी।

 

विवान ने मिठाई उठाई।

 

फिर अचानक रुक गया।

 

उसने राखी को गौर से देखा।

 

“ये राखी…”

 

अनामिका का दिल जोर से धड़कने लगा।

 

“क्या हुआ?”

 

“कुछ याद आ रहा है।”

 

अनामिका तुरंत उसके पास बैठ गई।

 

“क्या?”

 

विवान ने आंखें बंद कर लीं।

 

“एक छोटी लड़की…”

 

अनामिका की सांस रुक गई।

 

“वो बहुत रो रही है।”

 

“क्यों?”

 

“क्योंकि उसकी राखी टूट गई है।”

 

अनामिका की आंखों से आंसू बह निकले।

 

विवान माथे पर हाथ रखकर बोला,

 

“मैं उसे नई राखी देने के लिए बाजार जा रहा हूं।”

 

अनामिका ने कांपते हुए पूछा,

 

“फिर?”

 

विवान ने आंखें खोलीं।

 

“वो लड़की मुझे भैया कहती है।”

 

अनामिका रोते हुए हंस पड़ी।

 

“हां भैया… वही लड़की मैं हूं।”

 

विवान उसे देखने लगा।

 

कुछ पल बाद उसकी आंखों में पहचान की हल्की चमक आई।

 

“नन्ही?”

 

अनामिका जैसे जम गई।

 

उसके मुंह से आवाज नहीं निकली।

 

फिर वह भाई के गले लगकर रो पड़ी।

 

“भैया!”

 

विवान भी भावुक हो गया।

 

“नन्ही…”

 

दोनों काफी देर तक एक-दूसरे को पकड़े रहे।

 

माँ दरवाजे पर खड़ी रो रही थीं।

 

लेकिन तभी विवान अचानक पीछे हट गया।

 

उसने सिर पकड़ लिया।

 

“मुझे सब याद नहीं आ रहा।”

 

अनामिका ने उसका हाथ पकड़ा।

 

“कोई बात नहीं।”

 

“लेकिन मुझे इतना याद है कि तू मेरी बहन है।”

 

अनामिका मुस्कुराई।

 

“मेरे लिए इतना ही काफी है।”

 

उस दिन के बाद विवान की याददाश्त धीरे-धीरे वापस आने लगी।

 

कुछ बातें पहले याद आईं।

 

फिर कुछ चेहरे।

 

फिर घर की यादें।

 

लेकिन सबसे ज्यादा उसे अपनी बहन की बातें याद आने लगीं।

 

एक दिन उसने अनामिका से कहा,

 

“तू रोज मेरे पास क्यों आती थी?”

 

अनामिका ने मुस्कुराकर कहा,

 

“क्योंकि मुझे डर था कि अगर मैं आना बंद कर दूंगी तो शायद आपको लगेगा कि मैं सच में आपकी बहन नहीं हूं।”

 

विवान की आंखें नम हो गईं।

 

“तूने मुझे याद दिलाने की कोशिश क्यों नहीं छोड़ी?”

 

“क्योंकि आप भूल सकते थे कि मैं कौन हूं… लेकिन मैं कैसे भूल जाती कि आप कौन हैं?”

 

विवान ने बहन के सिर पर हाथ रखा।

 

“मुझे माफ कर दे।”

 

“किस बात के लिए?”

 

“तुझे पहचान नहीं पाया।”

 

अनामिका ने सिर हिलाया।

 

“इसमें आपकी गलती नहीं थी।”

 

“लेकिन तूने मेरा साथ नहीं छोड़ा।”

 

“भाई को याददाश्त खोने पर बहन थोड़ी छोड़ देती है।”

 

कुछ महीनों बाद विवान पूरी तरह ठीक होने लगा।

 

एक दिन उसने अपनी पुरानी अलमारी खोली।

 

अंदर एक छोटा-सा डिब्बा रखा था।

 

उसने डिब्बा निकाला।

 

अंदर कई पुरानी राखियां थीं।

 

विवान ने एक राखी उठाई।

 

“ये किसकी है?”

 

अनामिका ने देखकर कहा,

 

“मेरी।”

 

“इतनी सारी?”

 

“हर साल की।”

 

विवान मुस्कुराया।

 

फिर उसने अपनी कलाई आगे कर दी।

 

“अगली राखी के लिए नई राखी मत बनाना।”

 

अनामिका ने पूछा,

 

“क्यों?”

 

“क्योंकि इस बार मैं खुद चुनूंगा।”

 

“क्या?”

 

“एक ऐसी राखी जिसमें सबसे मजबूत धागा हो।”

 

अनामिका हंस पड़ी।

 

“इतनी मजबूत क्यों?”

 

विवान ने उसकी तरफ देखकर कहा,

 

“ताकि अगर मेरी याददाश्त फिर कभी मेरा साथ छोड़ दे… तो भी वो धागा मुझे तेरे रिश्ते की याद दिलाता रहे।”

 

अनामिका की आंखें भर आईं।

 

उसने भाई की कलाई पकड़कर कहा,

 

“अब आपको कभी भूलने नहीं दूंगी।”

 

विवान मुस्कुराया।

 

“और मैं तुझे कभी अकेला नहीं छोड़ूंगा।”

 

उस रक्षाबंधन ने दोनों को एक बात सिखा दी थी—

 

रिश्ते सिर्फ यादों से नहीं चलते।

 

कभी-कभी यादें चली जाती हैं, चेहरे भूल जाते हैं, नाम मिट जाते हैं…

 

लेकिन सच्चा प्यार अपना रास्ता खुद ढूंढ लेता है।

 

और एक छोटी-सी राखी…

 

कभी-कभी उस रास्ते की पहली निशानी बन जाती है।

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