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टैग: #प्यार #दर्द #इंतज़ार

  • तोहफा वापस चाहिए

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    इस राखी पर मुझे तुमसे कुछ वापस चाहिए

    रक्षाबंधन से एक दिन पहले आदित्य के मोबाइल पर अपनी बहन पूजा का फोन आया।

     

    “भैया, कल समय पर घर आ जाना।”

     

    आदित्य मुस्कुराया।

     

    “हर साल आता हूं।”

     

    “इस बार देर मत करना।”

     

    “अच्छा बाबा, नहीं करूंगा।”

     

    पूजा कुछ पल चुप रही, फिर बोली,

     

    “और हां, इस बार मेरे लिए कोई गिफ्ट मत लाना।”

     

    आदित्य हैरान हो गया।

     

    “क्या?”

     

    “सुना नहीं? कोई गिफ्ट नहीं चाहिए।”

     

    “ये कैसे हो सकता है? मेरी बहन और गिफ्ट न मांगे?”

     

    पूजा हंसने की कोशिश करने लगी।

     

    “इस बार मुझे कुछ और चाहिए।”

     

    “क्या?”

     

    “कल बताऊंगी।”

     

    फोन कट गया।

     

    आदित्य कुछ देर तक मोबाइल को देखता रहा।

     

    उसे पूजा की आवाज अजीब लगी थी।

     

    वह हंस तो रही थी, लेकिन जैसे उसकी हंसी के पीछे कोई चिंता छिपी हुई थी।

     

    अगली सुबह आदित्य जल्दी घर पहुंच गया।

     

    दरवाजा पूजा ने खोला।

     

    वह हल्के पीले रंग का सूट पहने हुए थी। हाथ में पूजा की थाली थी।

     

    आदित्य ने उसे देखते ही कहा,

     

    “वाह! आज तो मेरी बहन बहुत खुश लग रही है।”

     

    पूजा ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “अंदर आओ भैया।”

     

    घर में माँ भी बैठी थीं।

     

    लेकिन आदित्य ने तुरंत महसूस किया कि माहौल सामान्य नहीं था।

     

    माँ की आंखें बार-बार पूजा की तरफ जा रही थीं।

     

    पूजा जरूरत से ज्यादा चुप थी।

     

    आदित्य ने पूछा,

     

    “सब ठीक है?”

     

    माँ ने जल्दी से कहा,

     

    “हां बेटा, सब ठीक है।”

     

    पूजा ने बात बदल दी।

     

    “पहले राखी बांध लूं।”

     

    आदित्य उसके सामने बैठ गया।

     

    पूजा ने तिलक लगाया।

     

    मिठाई खिलाई।

     

    फिर राखी उठाई।

     

    लेकिन राखी बांधते समय उसके हाथ कांप रहे थे।

     

    आदित्य ने धीरे से पूछा,

     

    “क्या हुआ?”

     

    “कुछ नहीं।”

     

    “तू मुझसे झूठ बोल रही है।”

     

    पूजा की आंखें भर आईं।

     

    “पहले राखी बांध लेने दो।”

     

    उसने राखी बांध दी।

     

    कुछ सेकंड तक दोनों चुप रहे।

     

    फिर आदित्य ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “अब बता, इस बार क्या चाहिए?”

     

    पूजा ने उसकी तरफ देखा।

     

    “आप वादा करोगे?”

     

    “पहले मांग तो सही।”

     

    “नहीं, पहले वादा।”

     

    आदित्य ने कहा,

     

    “ठीक है, वादा।”

     

    पूजा ने गहरी सांस ली।

     

    “मुझे मेरा भाई वापस चाहिए।”

     

    आदित्य की मुस्कान गायब हो गई।

     

    “क्या मतलब?”

     

    पूजा की आंखों से आंसू निकल आए।

     

    “मुझे वही भाई वापस चाहिए जो पहले था।”

     

    आदित्य चुप रह गया।

     

    पूजा ने पहली बार उसके सामने अपने मन की सारी बातें रख दीं।

     

    “पहले आप मुझे रोज फोन करते थे।”

     

    आदित्य नजरें झुकाकर सुनता रहा।

     

    “मैं बीमार होती थी तो आप सबसे पहले आते थे।”

     

    उसकी आवाज कांपने लगी।

     

    “मैं किसी बात से परेशान होती थी तो आप कहते थे—पूजा, बता क्या हुआ?”

     

    आदित्य के चेहरे पर पछतावा दिखाई देने लगा।

     

    पूजा ने कहा,

     

    “लेकिन पिछले एक साल से आप बदल गए हो।”

     

    “पूजा…”

     

    “नहीं भैया, आज मुझे बोलने दो।”

     

    आदित्य चुप हो गया।

     

    “आप घर आते हो तो फोन में लगे रहते हो। मैं कुछ बताती हूं तो कहते हो बाद में। मेरे मैसेज कई-कई घंटे बाद देखते हो।”

     

    पूजा की आंखों से आंसू लगातार बह रहे थे।

     

    “आपने कभी सोचा कि मैं क्यों नाराज होती हूं?”

     

    आदित्य के पास कोई जवाब नहीं था।

     

    “मुझे आपके पैसे नहीं चाहिए थे। न महंगे गिफ्ट चाहिए थे। मुझे सिर्फ पहले वाले आप चाहिए थे।”

     

    कमरे में सन्नाटा छा गया।

     

    माँ की आंखें भी नम थीं।

     

    आदित्य ने धीरे से कहा,

     

    “मैंने सोचा था कि मैं तुम्हारे लिए काम कर रहा हूं।”

     

    पूजा ने पूछा,

     

    “किसने कहा कि मुझे इतना चाहिए?”

     

    आदित्य ने उसकी तरफ देखा।

     

    पूजा बोली,

     

    “भैया, मुझे बड़ा घर नहीं चाहिए। महंगी चीजें नहीं चाहिए। मुझे बस कभी-कभी आपके साथ बैठकर चाय पीनी है।”

     

    आदित्य की आंखें भर आईं।

     

    वह पिछले एक साल से लगातार काम कर रहा था।

     

    उसकी एक ही सोच थी—

     

    “माँ और पूजा को किसी चीज की कमी नहीं होने दूंगा।”

     

    वह ज्यादा पैसे कमाना चाहता था।

     

    पूजा के लिए बेहतर भविष्य बनाना चाहता था।

     

    लेकिन इसी कोशिश में वह भूल गया था कि उसके परिवार को सिर्फ उसके पैसों की नहीं…

     

    उसकी मौजूदगी की भी जरूरत थी।

     

    आदित्य ने धीरे से कहा,

     

    “मुझे लगा मैं जिम्मेदारी निभा रहा हूं।”

     

    पूजा ने उसके हाथ पर हाथ रखा।

     

    “जिम्मेदारी सिर्फ खर्च चलाना नहीं होती भैया।”

     

    यह बात सीधे आदित्य के दिल में उतर गई।

     

    कुछ देर बाद उसने पूछा,

     

    “अगर मैं बदलना चाहूं तो?”

     

    पूजा ने आंसू पोंछे।

     

    “तो?”

     

    “तो क्या मेरी बहन मुझे वापस मौका देगी?”

     

    पूजा मुस्कुराई।

     

    “इसलिए तो राखी बांधी है।”

     

    आदित्य ने उसकी राखी वाली कलाई को देखा।

     

    “तो बता, सबसे पहले क्या करना होगा?”

     

    पूजा ने कहा,

     

    “आज अपना फोन बंद करो।”

     

    “क्या?”

     

    “हां।”

     

    “पूरा दिन?”

     

    “पूरा दिन।”

     

    माँ हंस पड़ीं।

     

    “सजा ठीक है।”

     

    आदित्य ने फोन उठाया।

     

    स्क्रीन देखी।

     

    फिर उसे बंद कर दिया।

     

    “अब?”

     

    पूजा ने कहा,

     

    “अब नाश्ता बनाओ।”

     

    आदित्य ने आंखें बड़ी कीं।

     

    “मैं?”

     

    “हां, मेरे पुराने वाले भैया को रसोई में जाकर मेरी पसंद का नाश्ता बनाना आता था।”

     

    आदित्य मुस्कुराया।

     

    “आज तो मेरी परीक्षा हो रही है।”

     

    पूजा ने कहा,

     

    “अभी तो शुरुआत है।”

     

    उस दिन वर्षों बाद तीनों ने साथ बैठकर नाश्ता किया।

     

    फिर पुरानी तस्वीरें देखीं।

     

    माँ ने बचपन के किस्से सुनाए।

     

    पूजा और आदित्य पुरानी बातों पर हंसते रहे।

     

    शाम को पूजा ने कहा,

     

    “भैया, चलो बाहर।”

     

    दोनों उसी पार्क में गए जहां बचपन में खेला करते थे।

     

    एक बेंच पर बैठकर पूजा ने पूछा,

     

    “याद है, आप मुझे साइकिल चलाना सिखाते थे?”

     

    आदित्य हंस पड़ा।

     

    “और तू हर बार गिरने के बाद मुझे ही दोष देती थी।”

     

    “क्योंकि गलती आपकी होती थी।”

     

    “बिल्कुल नहीं।”

     

    दोनों हंस पड़े।

     

    कुछ देर बाद पूजा गंभीर हो गई।

     

    “भैया?”

     

    “हां?”

     

    “आज मैं बहुत खुश हूं।”

     

    आदित्य ने पूछा,

     

    “क्यों?”

     

    पूजा ने उसकी कलाई पर बंधी राखी की तरफ देखा।

     

    “क्योंकि आज मेरा गिफ्ट मिल गया।”

     

    आदित्य ने कहा,

     

    “लेकिन मैंने तो कुछ दिया ही नहीं।”

     

    पूजा मुस्कुराई।

     

    “दिया है।”

     

    “क्या?”

     

    “अपना समय।”

     

    आदित्य चुप हो गया।

     

    पूजा ने कहा,

     

    “कभी-कभी इंसान को दुनिया की सबसे महंगी चीज नहीं चाहिए होती।”

     

    “फिर क्या चाहिए होता है?”

     

    “अपनों के साथ कुछ सच्चे पल।”

     

    आदित्य की आंखें नम हो गईं।

     

    उसने बहन के सिर पर हाथ रखा।

     

    “मुझे माफ कर दे।”

     

    पूजा ने कहा,

     

    “एक शर्त पर।”

     

    “अब क्या?”

     

    “अगले हफ्ते रविवार को घर आना।”

     

    “आऊंगा।”

     

    “फोन बंद करके।”

     

    आदित्य हंस पड़ा।

     

    “ठीक है।”

     

    “हर महीने कम से कम एक दिन।”

     

    “पक्का।”

     

    पूजा ने हाथ आगे किया।

     

    “वादा?”

     

    आदित्य ने अपनी राखी वाली कलाई उसके सामने कर दी।

     

    “इस राखी की कसम।”

     

    उस रात आदित्य घर से वापस जाने लगा।

     

    माँ ने पूछा,

     

    “आज तो गिफ्ट लेकर आया था?”

     

    आदित्य ने कहा,

     

    “इस बार गिफ्ट मैं नहीं लाया।”

     

    पूजा ने मुस्कुराकर पूछा,

     

    “तो कौन लाया?”

     

    आदित्य ने बहन की तरफ देखकर कहा,

     

    “मेरी बहन।”

     

    पूजा हैरान हुई।

     

    “मैंने?”

     

    “हां।”

     

    “क्या दिया?”

     

    आदित्य ने कहा,

     

    “याद दिलाया कि जिंदगी में सबसे बड़ी कमाई क्या होती है।”

     

    पूजा चुप रही।

     

    आदित्य ने उसकी तरफ देखकर कहा,

     

    “अपने लोगों के पास होने का समय।”

     

    पूजा की आंखें भर आईं।

     

    उसने कहा,

     

    “तो फिर इस बार मेरी राखी का वादा?”

     

    आदित्य ने जवाब दिया,

     

    “मैं सिर्फ तुम्हारी जरूरतों का नहीं, तुम्हारे समय का भी भाई रहूंगा।”

     

    पूजा मुस्कुराई।

     

    उस दिन एक बहन ने अपने भाई से कोई महंगा गिफ्ट नहीं मांगा था।

     

    उसने बस कहा था—

     

    “मुझे मेरा भाई वापस चाहिए।”

     

    और शायद रक्षाबंधन का सबसे खूबसूरत मतलब भी यही है।

     

    राखी सिर्फ भाई से बहन की रक्षा का वादा नहीं लेती…

     

    कभी-कभी वह रिश्तों को फिर से समय देने का वादा भी लेती है।

     

    क्योंकि कुछ रिश्ते पैसे से नहीं टूटते,

     

    दूरी से भी नहीं टूटते…

     

    वे बस तब कमजोर पड़ने लगते हैं, जब हम अपनों के लिए समय निकालना भूल जाते हैं।

     

    और उस दिन पूजा को उसका सबसे बड़ा रक्षाबंधन का तोहफा मिल गया था—

     

    उसका वही पुराना भाई… जो उसके पास बैठकर बिना किसी जल्दी के मुस्कुरा रहा था।

  • आखिरी राखी जो बंधी नहीं

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

    वो आखिरी राखी जो कभी बांधी नहीं गई

     

    रक्षाबंधन की सुबह पूरे घर में खुशी थी, लेकिन मीरा अपने कमरे में बैठी एक पुरानी लकड़ी की पेटी को बार-बार खोल और बंद कर रही थी।

     

    पेटी के अंदर एक राखी रखी थी।

     

    लाल और पीले धागे वाली।

     

    राखी नई नहीं थी।

     

    उसे खरीदे हुए पूरे बारह साल हो चुके थे।

     

    लेकिन आज तक वह किसी की कलाई पर नहीं बंधी थी।

     

    मीरा हर साल उसे निकालती।

     

    कुछ देर देखती।

     

    फिर वापस उसी पेटी में रख देती।

     

    उसकी माँ कई साल पहले कहती थीं,

     

    “बेटा, अब इस राखी को संभालकर रखने से क्या होगा?”

     

    मीरा धीरे से जवाब देती,

     

    “माँ, कुछ चीजें बांधने के लिए नहीं होतीं… बस याद रखने के लिए होती हैं।”

     

    लेकिन इस बार माँ नहीं थीं।

     

    मीरा घर में अकेली बैठी थी।

     

    उसकी उम्र अब तीस साल हो चुकी थी।

     

    आज भी रक्षाबंधन था।

     

    बाहर मोहल्ले की लड़कियां अपने भाइयों को राखी बांध रही थीं।

     

    कहीं हंसी थी।

     

    कहीं मिठाई बांटी जा रही थी।

     

    लेकिन मीरा की नजर सिर्फ उस पुरानी राखी पर थी।

     

    तभी दरवाजे पर दस्तक हुई।

     

    “मीरा!”

     

    बाहर से पड़ोस की बूढ़ी शारदा दादी की आवाज आई।

     

    मीरा ने जल्दी से पेटी बंद की।

     

    “आ रही हूं दादी।”

     

    दरवाजा खोलते ही दादी ने कहा,

     

    “आज भी नहीं गई?”

     

    मीरा समझ गई कि दादी क्या पूछ रही हैं।

     

    उसने धीरे से कहा,

     

    “नहीं।”

     

    दादी कुछ पल चुप रहीं।

     

    “कब तक खुद को सजा देती रहेगी?”

     

    मीरा की आंखें भर आईं।

     

    “मैं खुद को सजा नहीं दे रही।”

     

    “फिर?”

     

    “बस… भूल नहीं पा रही।”

     

    दादी अंदर आ गईं।

     

    उन्होंने लकड़ी की पेटी को देखा।

     

    “फिर वही राखी?”

     

    मीरा ने सिर हिला दिया।

     

    दादी ने पूछा,

     

    “क्या आज भी तू सोचती है कि अगर उस दिन तू उसे राखी बांध देती, तो सब बदल जाता?”

     

    मीरा ने जवाब नहीं दिया।

     

    उसकी आंखों के सामने बारह साल पुराना दृश्य घूमने लगा।

     

    तब वह अठारह साल की थी।

     

    उसका भाई विवान उससे तीन साल बड़ा था।

     

    दोनों बचपन से एक-दूसरे के सबसे अच्छे दोस्त थे।

     

    विवान बहुत शरारती था।

     

    और मीरा बहुत जल्दी नाराज हो जाती थी।

     

    विवान उसे छेड़ता,

     

    “तुझे गुस्सा करते हुए देखकर मजा आता है।”

     

    मीरा जवाब देती,

     

    “एक दिन सच में बात करना बंद कर दूंगी।”

     

    विवान हंस देता।

     

    “तू मेरे बिना रह नहीं सकती।”

     

    मीरा गुस्से में कहती,

     

    “बहुत गलतफहमी है आपको।”

     

    लेकिन सच यह था कि दोनों एक-दूसरे के बिना रह भी नहीं सकते थे।

     

    हर रक्षाबंधन पर मीरा सबसे पहले विवान की कलाई पर राखी बांधती।

     

    और विवान हर साल उसे चिढ़ाता,

     

    “इस बार क्या चाहिए? पहले ही बता दे, मेरे पास ज्यादा पैसे नहीं हैं।”

     

    मीरा हमेशा कहती,

     

    “मुझे गिफ्ट नहीं चाहिए।”

     

    विवान पूछता,

     

    “तो?”

     

    “बस कभी मुझे छोड़कर मत जाना।”

     

    विवान हंसते हुए कहता,

     

    “पगली, मैं कहीं नहीं जाऊंगा।”

     

    लेकिन एक साल रक्षाबंधन से ठीक एक दिन पहले दोनों के बीच बहुत बड़ा झगड़ा हो गया।

     

    विवान को एक दूसरे शहर में पढ़ाई के लिए जाना था।

     

    वह बहुत खुश था।

     

    लेकिन मीरा नाराज थी।

     

    “तुम हमेशा के लिए चले जाओगे।”

     

    विवान ने कहा,

     

    “पढ़ने जा रहा हूं, भाग नहीं रहा।”

     

    “लेकिन यहां से दूर।”

     

    “मीरा, जिंदगी में आगे बढ़ना पड़ता है।”

     

    मीरा ने गुस्से में कहा,

     

    “तो चले जाओ। मुझे क्या फर्क पड़ता है?”

     

    विवान चुप हो गया।

     

    “सच?”

     

    मीरा ने चेहरा दूसरी तरफ कर लिया।

     

    “हां।”

     

    विवान ने कहा,

     

    “ठीक है।”

     

    अगले दिन रक्षाबंधन था।

     

    मीरा ने सुबह राखी खरीदी।

     

    लेकिन उसका गुस्सा अभी तक कम नहीं हुआ था।

     

    विवान उसके कमरे के बाहर आया।

     

    “राखी नहीं बांधेगी?”

     

    मीरा ने कहा,

     

    “नहीं।”

     

    “पक्का?”

     

    “हां।”

     

    विवान कुछ पल दरवाजे पर खड़ा रहा।

     

    फिर बोला,

     

    “ठीक है।”

     

    मीरा ने सोचा था कि वह वापस आएगा।

     

    मनाएगा।

     

    मजाक करेगा।

     

    कहेगा कि वह गुस्सा छोड़ दे।

     

    लेकिन विवान चला गया।

     

    उस शाम उसे शहर के लिए निकलना था।

     

    मीरा ने खुद को रोक लिया।

     

    उसने सोचा,

     

    “जब जाना ही है तो मैं क्यों रोकूं?”

     

    विवान जाने से पहले माँ से मिला।

     

    पिता से मिला।

     

    फिर मीरा के कमरे के बाहर आकर रुका।

     

    “मीरा?”

     

    मीरा ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    “मैं जा रहा हूं।”

     

    कमरे के अंदर बैठी मीरा की आंखें भर आईं।

     

    लेकिन उसने कहा,

     

    “जाओ।”

     

    कुछ सेकंड तक बाहर कोई आवाज नहीं आई।

     

    फिर उसके कदमों की आवाज दूर होती चली गई।

     

    मीरा ने दौड़कर दरवाजा खोला।

     

    लेकिन विवान जा चुका था।

     

    वह भागकर बाहर आई।

     

    गाड़ी सड़क के मोड़ से निकल रही थी।

     

    मीरा ने हाथ में राखी पकड़ रखी थी।

     

    लेकिन वह आवाज नहीं दे पाई।

     

    बस वहीं खड़ी रह गई।

     

    उसके बाद विवान कभी वापस नहीं आया।

     

    कुछ समय बाद परिवार को खबर मिली कि शहर में एक गंभीर घटना के बाद उससे संपर्क टूट गया था और वह लापता हो गया।

     

    कई साल तक तलाश चली।

     

    लेकिन कोई पता नहीं मिला।

     

    मीरा की जिंदगी वहीं रुक गई।

     

    उसे हमेशा लगता रहा—

     

    “अगर उस दिन मैंने उसे राखी बांध दी होती…”

     

    शारदा दादी ने उसकी आंखों के सामने हाथ हिलाया।

     

    “कहां खो गई?”

     

    मीरा वर्तमान में लौट आई।

     

    उसने राखी को हाथ में लिया।

     

    “दादी, मैंने आखिरी बार उसे बिना राखी के जाने दिया।”

     

    दादी ने धीरे से कहा,

     

    “लेकिन क्या तुझे लगता है कि उसने तुझे माफ नहीं किया होगा?”

     

    मीरा ने दुखी होकर कहा,

     

    “मैंने उसे बहुत बुरा कहा था।”

     

    दादी मुस्कुराईं।

     

    “भाई-बहन के रिश्ते में गुस्सा आखिरी बात नहीं होता।”

     

    मीरा ने कुछ नहीं कहा।

     

    तभी बाहर से किसी ने आवाज दी।

     

    “मीरा जी?”

     

    दरवाजे पर एक अधेड़ आदमी खड़ा था।

     

    उसके हाथ में एक छोटा बैग था।

     

    “आप मुझे नहीं जानतीं। मैं विवान का दोस्त था।”

     

    मीरा का दिल तेजी से धड़कने लगा।

     

    “विवान?”

     

    उस आदमी ने सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

    “आपको मेरे भाई के बारे में कुछ पता है?”

     

    आदमी ने बैग आगे कर दिया।

     

    “उसके पास कुछ चीजें थीं। बहुत सालों बाद ये सामान मेरे पास पहुंचा। मुझे आपका पता ढूंढने में समय लगा।”

     

    मीरा के हाथ कांपने लगे।

     

    उसने बैग खोला।

     

    अंदर कुछ पुरानी किताबें थीं।

     

    एक पुरानी घड़ी।

     

    और एक छोटा डिब्बा।

     

    मीरा ने डिब्बा खोला।

     

    उसके अंदर…

     

    एक राखी थी।

     

    बहुत पुरानी।

     

    साथ में एक कागज रखा था।

     

    मीरा ने पढ़ा—

     

    “अगर मीरा कभी ये पढ़े तो उसे कहना कि मैं उससे नाराज नहीं था।

     

    उसने उस दिन राखी नहीं बांधी, लेकिन मैं जानता था कि वह मुझसे प्यार करती है।

     

    वह गुस्से में है, बस।

     

    अगर कभी वापस आया तो उससे जरूर राखी बंधवाऊंगा।

     

    और अगर नहीं आ पाया…

     

    तो उसे कहना कि मेरी कलाई पर राखी न सही, लेकिन मेरे दिल में हमेशा मेरी बहन का प्यार बंधा रहा।”

     

    मीरा के हाथ से कागज गिर गया।

     

    वह फूट-फूटकर रोने लगी।

     

    दादी ने उसे संभाला।

     

    “देखा? उसने तुझे कभी छोड़ा ही नहीं था।”

     

    मीरा ने उस राखी को अपने हाथों में लिया।

     

    फिर अपनी पुरानी पेटी खोली।

     

    उसमें रखी राखी निकाली।

     

    दोनों राखियों को साथ रख दिया।

     

    एक राखी मीरा ने विवान के लिए खरीदी थी।

     

    एक विवान ने शायद उसके लिए संभालकर रखी थी।

     

    बारह साल बाद…

     

    दोनों राखियां एक साथ थीं।

     

    लेकिन कलाई अभी भी खाली थी।

     

    मीरा धीरे से बोली,

     

    “दादी, अब क्या करूं?”

     

    दादी ने कहा,

     

    “जिस प्यार को तूने सालों से अधूरा समझा, उसे पूरा कर।”

     

    मीरा ने दोनों राखियां उठाईं।

     

    वह घर के उस कमरे में गई, जहां बचपन में विवान और वह खेलते थे।

     

    दीवार पर उसकी एक पुरानी तस्वीर लगी थी।

     

    मीरा ने तस्वीर के सामने बैठकर कहा,

     

    “भैया, उस दिन मैं बहुत गुस्से में थी।”

     

    उसकी आवाज कांप रही थी।

     

    “मैंने सोचा था आप मुझे मनाओगे।”

     

    उसने राखी तस्वीर के फ्रेम पर रख दी।

     

    “लेकिन मैं भूल गई कि हर बार किसी रिश्ते को दूसरा इंसान ही नहीं मनाता।”

     

    उसने आंखें बंद कर लीं।

     

    “मुझे भी आपको रोकना चाहिए था।”

     

    कुछ देर तक वह चुप रही।

     

    फिर धीरे से मुस्कुराई।

     

    “लेकिन आज मैं आपको एक बात बताना चाहती हूं।”

     

    उसने दोनों राखियों को तस्वीर के सामने रखा।

     

    “आज मैं आपको राखी नहीं बांध सकती… लेकिन आज से खुद को दोष देना छोड़ रही हूं।”

     

    उसकी आंखों से आंसू बह रहे थे।

     

    “क्योंकि मुझे पता है… आप मुझसे नाराज नहीं थे।”

     

    मीरा ने तस्वीर को देखा।

     

    “और शायद… यही मेरी सबसे जरूरी राखी थी।”

     

    उस दिन शाम को शारदा दादी ने देखा कि मीरा घर के बाहर बैठी है।

     

    लेकिन इस बार उसकी गोद में लकड़ी की पेटी नहीं थी।

     

    मीरा ने दादी से कहा,

     

    “दादी, आज मैंने राखी बांधी।”

     

    दादी ने हैरानी से पूछा,

     

    “किसे?”

     

    मीरा ने आसमान की तरफ देखा।

     

    “उसे… जिससे मैंने कभी प्यार करना बंद ही नहीं किया।”

     

    उसकी आंखों में आंसू थे।

     

    लेकिन इस बार उन आंसुओं में सिर्फ दुख नहीं था।

     

    एक अजीब-सी शांति भी थी।

     

    क्योंकि उसे आखिरकार समझ आ गया था—

     

    कुछ राखियां कलाई पर नहीं बंधतीं।

     

    वे यादों में बंधती हैं।

     

    माफी में बंधती हैं।

     

    और उन रिश्तों में बंधती हैं…

     

    जिन्हें समय, दूरी और नाराज़गी भी खत्म नहीं कर पाती।

     

    उसकी राखी कभी विवान की कलाई तक नहीं पहुंची थी…

     

    लेकिन उसका प्यार हमेशा उसके भाई तक पहुंचता रहा।

  • भाई ने बहन से किया वो वादा

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    भाई ने बहन से किया वो वादा

     

    “अगर मैं कभी बहुत दूर चला गया ना, तो क्या तू मुझे भूल जाएगी?”

     

    रिया ने अपने भाई कबीर की तरफ हैरानी से देखा।

     

    “आप ऐसी बातें क्यों कर रहे हो?”

     

    कबीर ने मुस्कुराते हुए बात बदल दी।

     

    “बस ऐसे ही पूछ लिया।”

     

    रिया ने उसकी बांह पर हल्का-सा हाथ मारा।

     

    “आप कहीं नहीं जाने वाले। और अगर गए भी ना, तो मैं आपको ढूंढकर वापस ले आऊंगी।”

     

    कबीर हंस पड़ा।

     

    “बहुत बहादुर हो गई है मेरी छोटी बहन।”

     

    रिया ने गर्व से कहा,

     

    “आपकी बहन हूं।”

     

    दोनों हंस रहे थे, लेकिन रिया नहीं जानती थी कि उसके भाई के मन में पिछले कई दिनों से एक बात चल रही थी।

     

    एक ऐसी बात…

     

    जिसके बारे में वह उसे बताना चाहता भी था और नहीं भी।

     

    कबीर और रिया के पिता की कई साल पहले मौत हो गई थी। माँ ने दोनों बच्चों को अकेले पाला।

     

    कबीर उम्र में रिया से आठ साल बड़ा था।

     

    इसलिए वह हमेशा भाई से ज्यादा पिता जैसा रहा।

     

    रिया को स्कूल छोड़ना, उसकी फीस भरना, उसके जन्मदिन पर केक लाना—कबीर हर जिम्मेदारी अपनी समझता था।

     

    लेकिन पिछले कुछ महीनों से घर की आर्थिक हालत खराब हो गई थी।

     

    माँ की नौकरी छूट गई थी।

     

    रिया कॉलेज में पढ़ रही थी।

     

    कबीर की छोटी नौकरी से घर का खर्च मुश्किल से चलता था।

     

    एक शाम रिया ने देखा कि कबीर देर रात तक किसी से फोन पर बात कर रहा था।

     

    “हां, मैं तैयार हूं।”

     

    रिया ने पूछा,

     

    “किस बात के लिए?”

     

    कबीर ने जल्दी से फोन रखा।

     

    “कुछ नहीं।”

     

    “भैया, आप मुझसे कुछ छिपा रहे हो।”

     

    “तू हर बात जानना जरूरी समझती है क्या?”

     

    रिया नाराज हो गई।

     

    “पहले तो आप मुझे सब बताते थे।”

     

    कबीर कुछ पल चुप रहा।

     

    फिर उसके सिर पर हाथ रखकर बोला,

     

    “कभी-कभी कुछ बातें समय आने पर बतानी पड़ती हैं।”

     

    “कौन-सी बात?”

     

    कबीर ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “जब बताऊंगा तो नाराज मत होना।”

     

    रिया ने कहा,

     

    “पहले बताओ तो सही।”

     

    लेकिन कबीर ने बात बदल दी।

     

    अगले दिन रक्षाबंधन था।

     

    रिया सुबह जल्दी उठी।

     

    उसने इस बार अपने भाई के लिए खुद एक राखी बनाई थी।

     

    सफेद और नीले धागे की राखी।

     

    कबीर को नीला रंग बहुत पसंद था।

     

    राखी के बीच में उसने एक छोटा-सा शब्द लिखा था—

     

    “वादा”

     

    कबीर ने राखी देखकर पूछा,

     

    “इस पर वादा क्यों लिखा है?”

     

    रिया ने कहा,

     

    “क्योंकि इस बार मुझे आपसे एक वादा लेना है।”

     

    “क्या?”

     

    “आप पहले राखी बंधवाओ।”

     

    कबीर हंस पड़ा।

     

    “ठीक है।”

     

    रिया ने पूजा की थाली सजाई।

     

    माँ पास बैठी थीं।

     

    उसने कबीर के माथे पर तिलक लगाया।

     

    मिठाई खिलाई।

     

    फिर राखी उसकी कलाई पर बांधते हुए बोली,

     

    “अब मेरा वादा।”

     

    कबीर ने पूछा,

     

    “क्या मांगोगी?”

     

    रिया ने उसकी आंखों में देखकर कहा,

     

    “मुझसे कभी कुछ मत छिपाना।”

     

    कबीर का चेहरा गंभीर हो गया।

     

    कुछ पल तक वह चुप रहा।

     

    फिर उसने धीरे से कहा,

     

    “ये वादा शायद मैं नहीं कर सकता।”

     

    रिया के हाथ रुक गए।

     

    “क्यों?”

     

    माँ ने चिंतित होकर कबीर की तरफ देखा।

     

    कबीर ने गहरी सांस ली।

     

    “क्योंकि एक बात है, जो मैं कई दिनों से तुम दोनों से छिपा रहा हूं।”

     

    रिया की धड़कन तेज हो गई।

     

    “क्या बात?”

     

    कबीर ने जेब से एक कागज निकाला।

     

    “मुझे दूसरे शहर में नौकरी मिली है।”

     

    रिया ने राहत की सांस ली।

     

    “बस इतनी-सी बात?”

     

    कबीर ने कहा,

     

    “लेकिन ये नौकरी बहुत दूर है।”

     

    “तो?”

     

    “मुझे कम से कम तीन साल वहीं रहना होगा।”

     

    रिया का चेहरा बदल गया।

     

    “तीन साल?”

     

    “हां।”

     

    “और आप मुझे छोड़कर चले जाएंगे?”

     

    कबीर ने कहा,

     

    “छोड़कर नहीं जा रहा, रिया। हमारे लिए जा रहा हूं।”

     

    “मुझे नहीं चाहिए ऐसी नौकरी!”

     

    “रिया…”

     

    “नहीं चाहिए पैसे, अगर उसके बदले आप नहीं होंगे।”

     

    कबीर चुप रहा।

     

    रिया की आंखों से आंसू निकल आए।

     

    “आपने पहले क्यों नहीं बताया?”

     

    “क्योंकि मुझे पता था तू रोएगी।”

     

    “तो क्या हुआ? आपको लगता है मुझे रोने का भी हक नहीं?”

     

    कबीर के चेहरे पर दर्द साफ दिखाई दिया।

     

    “ऐसी बात नहीं है।”

     

    रिया ने राखी की तरफ देखा।

     

    उसने धीरे से कहा,

     

    “मैंने सोचा था इस राखी पर आपसे वादा लूंगी कि हम हमेशा साथ रहेंगे।”

     

    कबीर ने उसकी बात काटी।

     

    “हम साथ रहेंगे।”

     

    “कैसे? आप दूसरे शहर में होंगे।”

     

    कबीर ने अपनी कलाई पर बंधी राखी को देखा।

     

    “दूरी से रिश्ते खत्म नहीं होते।”

     

    रिया चुप रही।

     

    कबीर ने उसके सामने बैठते हुए कहा,

     

    “याद है बचपन में तू डरती थी तो मैं क्या कहता था?”

     

    रिया ने धीरे से कहा,

     

    “आप कहते थे, मैं हूं ना।”

     

    “तो आज भी वही कह रहा हूं।”

     

    “लेकिन आप यहां नहीं होंगे।”

     

    कबीर ने उसके हाथ अपने हाथों में लिए।

     

    “रिया, मैं जहां भी रहूंगा, तेरे लिए हमेशा यहीं रहूंगा।”

     

    रिया रो पड़ी।

     

    कबीर ने कहा,

     

    “अब मेरी बात सुन। मैं तुझसे एक वादा करना चाहता हूं।”

     

    रिया ने उसकी तरफ देखा।

     

    “क्या?”

     

    “मैं कितनी भी दूर चला जाऊं, तेरे किसी भी मुश्किल समय में तुझे अकेला नहीं छोड़ूंगा।”

     

    रिया चुप रही।

     

    कबीर ने आगे कहा,

     

    “रात हो या दिन, तू एक फोन करेगी और मैं तेरे साथ खड़ा मिलूंगा।”

     

    “फोन पर?”

     

    कबीर मुस्कुराया।

     

    “अगर जरूरत पड़ी तो सामने।”

     

    रिया की आंखें फिर भर आईं।

     

    “पक्का?”

     

    कबीर ने अपनी राखी वाली कलाई आगे की।

     

    “इस राखी की कसम।”

     

    कुछ दिनों बाद कबीर दूसरे शहर चला गया।

     

    शुरुआत में रिया को बहुत खालीपन महसूस हुआ।

     

    घर में हर चीज उसे भाई की याद दिलाती।

     

    उसकी पुरानी किताबें।

     

    उसका मग।

     

    उसकी कुर्सी।

     

    कभी-कभी वह भाई से नाराज होकर फोन नहीं उठाती।

     

    फिर कबीर मैसेज करता—

     

    “तू नाराज हो सकती है, लेकिन अकेली नहीं।”

     

    रिया मैसेज पढ़कर मुस्कुरा देती।

     

    समय बीतने लगा।

     

    रिया अपनी पढ़ाई में व्यस्त हो गई।

     

    एक दिन कॉलेज में उसे एक जरूरी इंटरव्यू के लिए जाना था।

     

    वह बहुत घबराई हुई थी।

     

    उसने कबीर को फोन किया।

     

    “भैया, मुझे डर लग रहा है।”

     

    दूसरी तरफ से वही पुरानी आवाज आई,

     

    “मैं हूं ना।”

     

    रिया मुस्कुराई।

     

    “आप तो बहुत दूर हो।”

     

    “वीडियो कॉल कर।”

     

    पूरे रास्ते कबीर वीडियो कॉल पर उसके साथ रहा।

     

    इंटरव्यू से पहले उसने कहा,

     

    “अब जा। और याद रख, तू किसी से कम नहीं।”

     

    रिया ने इंटरव्यू दिया।

     

    कुछ दिनों बाद उसका चयन हो गया।

     

    रिया की सबसे पहली कॉल कबीर को थी।

     

    “भैया! मेरा चयन हो गया!”

     

    कबीर खुशी से चिल्लाया,

     

    “मुझे पता था।”

     

    “आपको कैसे पता?”

     

    “क्योंकि तू मेरी बहन है।”

     

    कुछ महीनों बाद कबीर रक्षाबंधन पर घर लौटा।

     

    रिया ने दरवाजा खोला।

     

    दोनों कुछ सेकंड तक बस एक-दूसरे को देखते रहे।

     

    फिर रिया दौड़कर उसके गले लग गई।

     

    “आप सच में आ गए।”

     

    कबीर ने कहा,

     

    “वादा किया था।”

     

    रिया ने इस बार एक नई राखी निकाली।

     

    उस पर भी वही शब्द लिखा था—

     

    “वादा”

     

    कबीर ने हाथ आगे कर दिया।

     

    रिया ने राखी बांधी।

     

    फिर पूछा,

     

    “भैया, पिछले साल वाला वादा याद है?”

     

    कबीर ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “तू मुश्किल में हो और मैं तुझे अकेला छोड़ दूं—ऐसा कभी नहीं होगा।”

     

    रिया ने कहा,

     

    “और मेरा भी एक वादा है।”

     

    “क्या?”

     

    “अब मैं आपसे दूर होने से नहीं डरूंगी।”

     

    कबीर ने पूछा,

     

    “क्यों?”

     

    रिया ने उसकी कलाई पर बंधी राखी की तरफ देखा।

     

    “क्योंकि अब समझ गई हूं कि साथ रहने के लिए हमेशा पास होना जरूरी नहीं होता।”

     

    माँ दूर खड़ी दोनों को देख रही थीं।

     

    उनकी आंखों में खुशी थी।

     

    रिया ने भाई की कलाई को पकड़ते हुए कहा,

     

    “एक राखी पर लिखा छोटा-सा शब्द था—वादा।”

     

    कबीर मुस्कुराया।

     

    “और?”

     

    रिया ने कहा,

     

    “अब समझ गई हूं कि कुछ वादे सिर्फ बोले नहीं जाते… उन्हें हर दिन निभाया जाता है।”

     

    कबीर ने बहन के सिर पर हाथ रखा।

     

    “हमेशा।”

     

    और उस दिन रिया को समझ आया कि भाई का प्यार सिर्फ घर की चार दीवारों तक सीमित नहीं होता।

     

    कभी-कभी वह हजारों किलोमीटर दूर रहकर भी…

     

    बहन के सबसे करीब होता है।

     

    क्योंकि भाई ने बहन से जो सच्चा वादा किया हो, उसे दूरी नहीं तोड़ सकती।

  • एक अंजान भाई के नाम राखी

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    एक अनजान भाई के नाम राखी

     

    “दीदी, अगर आपका कोई भाई नहीं है… तो ये राखी किसके लिए है?”

     

    दस साल की छवि ने दुकान के सामने खड़े छोटे बच्चे को देखा और मुस्कुराकर बोली,

     

    “पता नहीं… शायद किसी ऐसे भाई के लिए, जो अभी मुझे मिला नहीं है।”

     

    बच्चा हंसकर आगे बढ़ गया।

     

    लेकिन छवि के हाथ में पकड़ी वह राखी उसके लिए सिर्फ राखी नहीं थी।

     

    हर साल वह एक राखी खरीदती थी।

     

    और हर साल वही सवाल उसके मन में उठता—

     

    “मेरा भाई आखिर कहां है?”

     

    छवि के पास अपने परिवार की कोई पुरानी तस्वीर नहीं थी। उसे सिर्फ इतना पता था कि बचपन में उसकी माँ के साथ एक छोटा लड़का भी रहता था।

     

    माँ उसे हमेशा “तेरा भैया” कहती थीं।

     

    लेकिन छवि को उसका चेहरा याद नहीं था।

     

    एक दिन उसने माँ से पूछा था,

     

    “माँ, मेरा भाई कहां है?”

     

    माँ की आंखें भर आई थीं।

     

    “बहुत दूर।”

     

    “कब आएगा?”

     

    “जब भगवान चाहेंगे।”

     

    बस यही जवाब उसे हमेशा मिला।

     

    साल गुजरते गए।

     

    छवि बड़ी हो गई।

     

    माँ की तबीयत भी अब पहले जैसी नहीं रहती थी।

     

    एक दिन माँ ने उसे अपने पास बुलाया।

     

    “छवि, मेरे पास तुझे देने के लिए कुछ है।”

     

    उन्होंने पुराने संदूक से एक कपड़े में लिपटा छोटा-सा डिब्बा निकाला।

     

    छवि ने डिब्बा खोला।

     

    अंदर एक पुरानी तस्वीर थी।

     

    तस्वीर में एक छोटी बच्ची और लगभग पांच साल का लड़का खड़ा था।

     

    लड़के के हाथ में राखी बंधी थी।

     

    छवि तस्वीर देखते ही चुप हो गई।

     

    “माँ… ये?”

     

    माँ ने कहा,

     

    “तेरा भाई है।”

     

    “नाम?”

     

    “आर्यन।”

     

    छवि ने तस्वीर सीने से लगा ली।

     

    “वो कहां है?”

     

    माँ की आंखों से आंसू निकल आए।

     

    “तेरे पिता के गुजरने के बाद हालात बहुत खराब हो गए थे। आर्यन को उसके मामा अपने साथ ले गए थे। फिर संपर्क टूट गया।”

     

    छवि ने पूछा,

     

    “आपने उसे ढूंढा नहीं?”

     

    “बहुत कोशिश की।”

     

    “फिर?”

     

    “किस्मत ने साथ नहीं दिया।”

     

    उस रात छवि ने तस्वीर अपने तकिए के नीचे रख ली।

     

    अगले दिन उसने इंटरनेट और पुराने कागजों की मदद से आर्यन को ढूंढना शुरू किया।

     

    कई नाम मिले।

     

    कई पते मिले।

     

    लेकिन कोई पक्का सुराग नहीं मिला।

     

    फिर उसे एक पुराने स्कूल रिकॉर्ड में एक नाम मिला—

     

    आर्यन मिश्रा।

     

    पता था—एक छोटे से शहर का।

     

    छवि ने तुरंत वहां जाने का फैसला किया।

     

    कई घंटों की यात्रा के बाद वह उस पते पर पहुंची।

     

    वहां अब एक छोटी-सी किताबों की दुकान थी।

     

    छवि ने दुकानदार से पूछा,

     

    “क्या यहां आर्यन नाम का कोई आदमी रहता था?”

     

    दुकानदार ने उसे गौर से देखा।

     

    “आप कौन हैं?”

     

    “मैं… उसकी बहन हूं।”

     

    दुकानदार कुछ पल चुप रहा।

     

    फिर उसने सामने बैठे एक युवक की तरफ इशारा किया।

     

    “वो रहा।”

     

    छवि की धड़कन रुक गई।

     

    युवक लगभग तीस साल का था।

     

    सादा कपड़े, शांत चेहरा और आंखों में एक अजीब-सी उदासी।

     

    छवि धीरे-धीरे उसके पास गई।

     

    “आपका नाम आर्यन है?”

     

    उसने किताब से नजर उठाई।

     

    “जी।”

     

    छवि ने कांपते हाथों से पुरानी तस्वीर उसके सामने रख दी।

     

    आर्यन ने तस्वीर देखी।

     

    उसका चेहरा अचानक बदल गया।

     

    “ये तस्वीर… आपको कहां मिली?”

     

    “माँ के पास।”

     

    आर्यन खड़ा हो गया।

     

    “माँ?”

     

    छवि की आंखों में आंसू आ गए।

     

    “हां… हमारी माँ।”

     

    आर्यन कुछ बोल नहीं पाया।

     

    छवि ने धीरे से कहा,

     

    “मैं छवि हूं।”

     

    आर्यन ने उसे देखा।

     

    कुछ पल बाद उसके चेहरे पर हल्की मुस्कान आई।

     

    “मेरी छोटी बहन?”

     

    छवि ने सिर हिला दिया।

     

    अगले ही पल आर्यन ने उसे गले लगा लिया।

     

    दोनों की आंखों से आंसू बह रहे थे।

     

    पंद्रह साल की दूरी कुछ ही सेकंड में खत्म हो गई।

     

    आर्यन ने पूछा,

     

    “माँ कैसी हैं?”

     

    “कमजोर हो गई हैं।”

     

    “मैंने उन्हें बहुत याद किया।”

     

    “उन्होंने भी।”

     

    आर्यन ने आंखें पोंछीं।

     

    “मुझे लगा था शायद वो मुझे भूल गई होंगी।”

     

    छवि ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “माँ आपको हर रक्षाबंधन याद करती थीं।”

     

    आर्यन की नजर उसके हाथ में पकड़ी राखी पर पड़ी।

     

    “ये किसके लिए है?”

     

    छवि ने राखी आगे कर दी।

     

    “आपके लिए।”

     

    आर्यन ने अपनी कलाई आगे कर दी।

     

    छवि ने राखी बांधते हुए कहा,

     

    “मैं हर साल एक राखी खरीदती थी।”

     

    आर्यन ने पूछा,

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि मुझे विश्वास था कि एक दिन मेरा भाई मुझे जरूर मिलेगा।”

     

    आर्यन की आंखों में आंसू आ गए।

     

    उसने जेब से एक पुराना कागज निकाला।

     

    “मैं भी हर साल एक राखी संभालकर रखता था।”

     

    छवि ने हैरानी से पूछा,

     

    “किसकी?”

     

    आर्यन मुस्कुराया।

     

    “तुम्हारी।”

     

    “लेकिन मैंने तो आपको कोई राखी भेजी ही नहीं।”

     

    “मुझे पता था।”

     

    “फिर?”

     

    आर्यन ने कहा,

     

    “मैं बाजार से राखी खरीदता था और खुद से कहता था कि जब मेरी बहन मिलेगी, तब उसकी कलाई पर बांधूंगा।”

     

    छवि कुछ बोल नहीं पाई।

     

    दोनों भाई-बहन उसी दुकान के बाहर बैठ गए।

     

    आर्यन ने कहा,

     

    “तुम्हें बचपन की कुछ बातें याद हैं?”

     

    छवि ने हंसकर कहा,

     

    “बस इतना कि आप मेरी चॉकलेट चुरा लेते थे।”

     

    आर्यन जोर से हंसा।

     

    “अच्छा! ये याद है?”

     

    “हां।”

     

    “तो मैं मान गया कि तू सच में मेरी बहन है।”

     

    छवि भी हंस पड़ी।

     

    कुछ देर बाद दोनों माँ के पास लौटने के लिए निकल पड़े।

     

    दरवाजा खुलते ही माँ की नजर आर्यन पर पड़ी।

     

    वह कुछ सेकंड उसे देखती रहीं।

     

    फिर उनकी आंखों से आंसू बह निकले।

     

    “आर्यन…”

     

    आर्यन उनके पैरों में बैठ गया।

     

    “माँ… देर हो गई।”

     

    माँ ने उसके सिर पर हाथ रखा।

     

    “लेकिन तू आ गया।”

     

    छवि एक तरफ खड़ी मुस्कुरा रही थी।

     

    उसने देखा कि आर्यन की कलाई पर राखी चमक रही थी।

     

    माँ ने पूछा,

     

    “तूने राखी बांधी?”

     

    छवि ने कहा,

     

    “हां।”

     

    आर्यन ने बहन की तरफ देखकर कहा,

     

    “और इस बार ये राखी कभी नहीं उतारूंगा।”

     

    छवि मुस्कुराई।

     

    “भैया, राखी कुछ दिन बाद खुद टूट जाएगी।”

     

    “तो?”

     

    “नई बांध दूंगी।”

     

    आर्यन ने कहा,

     

    “हर साल?”

     

    “हर साल।”

     

    उस दिन छवि ने अपनी जिंदगी में पहली बार महसूस किया कि उसके पास सिर्फ एक भाई नहीं था।

     

    उसके पास खोई हुई यादों का एक पूरा संसार वापस आ गया था।

     

    रात को उसने अपनी पुरानी डायरी खोली और लिखा—

     

    “आज मैंने एक अनजान इंसान की कलाई पर राखी बांधी थी। लेकिन राखी बंधते ही वह अनजान नहीं रहा। वह मेरा भाई बन गया।”

     

    फिर उसने नीचे एक और लाइन लिखी—

     

    “कभी-कभी रिश्ते जन्म से नहीं, पहचान से मिलते हैं… और कभी एक छोटी-सी राखी किसी खोए हुए रिश्ते को वापस घर ले आती है।”

     

    अगली सुबह आर्यन ने छवि को आवाज दी।

     

    “छोटी!”

     

    छवि दौड़कर आई।

     

    “क्या हुआ?”

     

    आर्यन ने एक राखी उसके हाथ में रखी।

     

    “अगली राखी के लिए इसे संभालकर रखना।”

     

    छवि ने पूछा,

     

    “इतनी जल्दी?”

     

    • आर्यन मुस्कुराया।

     

    “अब मैं तुझे सिर्फ एक रक्षाबंधन का भाई नहीं बनना चाहता।”

     

    छवि ने उसकी बात समझते हुए मुस्कुराकर कहा,

     

    “फिर?”

     

    आर्यन ने कहा,

     

    “पूरी जिंदगी का भाई।”

     

    छवि ने उसकी कलाई पकड़ ली।

     

    “वादा?”

    आर्यन ने कहा,

    “वादा।”

     

    और उस दिन एक बहन की बरसों पुरानी तलाश खत्म हुई।

     

    उसकी राखी को आखिरकार अपनी कलाई मिल गई थी।

     

    और एक भाई को…

     

    अपनी बहन।

  • एक भाई जिसे अपनी बहन याद नहीं थी

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    जिस भाई को अपनी बहन याद नहीं थी

     

    “माफ कीजिए… क्या आप मुझे जानती हैं?”

     

    ये सवाल सुनते ही अनामिका के हाथ से राखी का डिब्बा नीचे गिर गया।

     

    सामने खड़ा आदमी उसका अपना भाई विवान था।

     

    वही भाई, जिसके साथ उसने बचपन की हर छोटी-बड़ी याद बांटी थी।

     

    लेकिन आज उसकी आंखों में अनजानापन था।

     

    अनामिका ने कांपती आवाज में पूछा,

     

    “भैया… मुझे पहचान नहीं रहे?”

     

    विवान ने कुछ पल उसे देखा।

     

    फिर सिर हिलाते हुए कहा,

     

    “नहीं।”

     

    अनामिका को लगा जैसे उसके पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई हो।

     

    विवान की मां यानी उनकी माँ पीछे खड़ी थीं। उनकी आंखों से आंसू बह रहे थे।

     

    कुछ महीने पहले एक दुर्घटना के बाद विवान की याददाश्त चली गई थी। डॉक्टरों ने कहा था कि उसे पुरानी बातें याद आने में समय लग सकता है।

     

    लेकिन अनामिका को उम्मीद थी कि शायद उसे देखकर उसका भाई उसे पहचान लेगा।

     

    आखिर वह उसकी छोटी बहन थी।

     

    जिसे वह बचपन में प्यार से “नन्ही” कहता था।

     

    जिसके बिना खाना नहीं खाता था।

     

    जिसे स्कूल छोड़ने रोज जाता था।

     

    लेकिन आज…

     

    उसे कुछ याद नहीं था।

     

    अनामिका ने मुस्कुराने की कोशिश की।

     

    “कोई बात नहीं भैया। मैं… आपकी बहन हूं।”

     

    विवान ने उसकी तरफ देखा।

     

    “मुझे सच में कुछ याद नहीं।”

     

    अनामिका ने सिर हिला दिया।

     

    “कोई बात नहीं।”

     

    वह अपने आंसू छिपाकर बाहर चली गई।

     

    उस दिन के बाद अनामिका रोज भाई से मिलने आती।

     

    कभी उसके लिए पसंद की मिठाई लाती।

     

    कभी बचपन की तस्वीरें दिखाती।

     

    कभी पुरानी बातें सुनाती।

     

    “भैया, आपको याद है? आपने एक बार मेरी गुल्लक तोड़ दी थी।”

     

    विवान हंसता।

     

    “मैंने?”

     

    “हां।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि आपको क्रिकेट खेलने के लिए पैसे चाहिए थे।”

     

    विवान मुस्कुराता।

     

    “फिर?”

     

    “फिर आपने अपनी सारी बचत मुझे दे दी थी और कहा था कि गुल्लक वापस खरीद लेंगे।”

     

    विवान ध्यान से सुनता, लेकिन उसके चेहरे पर कोई पहचान नहीं आती।

     

    अनामिका को दुख होता।

     

    लेकिन उसने हार नहीं मानी।

     

    रक्षाबंधन आने वाला था।

     

    माँ ने कहा,

     

    “बेटा, इस बार राखी मत बांधना। अगर उसे कुछ याद नहीं है तो उसे अजीब लगेगा।”

     

    अनामिका ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं माँ। मैं राखी जरूर बांधूंगी।”

     

    “लेकिन वह तुझे पहचानता भी नहीं।”

     

    अनामिका ने धीरे से कहा,

     

    “राखी पहचान के लिए नहीं बांधी जाती माँ… रिश्ते के लिए बांधी जाती है।”

     

    रक्षाबंधन के दिन अनामिका एक छोटी-सी थाली लेकर भाई के कमरे में गई।

     

    विवान खिड़की के पास बैठा था।

     

    अनामिका ने पूछा,

     

    “भैया, आज आपको पता है कौन-सा दिन है?”

     

    विवान ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं।”

     

    “आज रक्षाबंधन है।”

     

    “अच्छा।”

     

    “आज बहन अपने भाई की कलाई पर राखी बांधती है।”

     

    विवान ने अपनी कलाई आगे कर दी।

     

    “तो बांध दो।”

     

    अनामिका कुछ पल उसे देखती रही।

     

    उसकी आंखों में आंसू आ गए।

     

    उसने धीरे-धीरे राखी उसकी कलाई पर बांध दी।

     

    राखी बांधते समय उसके हाथ कांप रहे थे।

     

    विवान ने पूछा,

     

    “तुम रो क्यों रही हो?”

     

    अनामिका ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “खुशी के आंसू हैं।”

     

    राखी बांधने के बाद उसने उसके सामने मिठाई रखी।

     

    विवान ने मिठाई उठाई।

     

    फिर अचानक रुक गया।

     

    उसने राखी को गौर से देखा।

     

    “ये राखी…”

     

    अनामिका का दिल जोर से धड़कने लगा।

     

    “क्या हुआ?”

     

    “कुछ याद आ रहा है।”

     

    अनामिका तुरंत उसके पास बैठ गई।

     

    “क्या?”

     

    विवान ने आंखें बंद कर लीं।

     

    “एक छोटी लड़की…”

     

    अनामिका की सांस रुक गई।

     

    “वो बहुत रो रही है।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि उसकी राखी टूट गई है।”

     

    अनामिका की आंखों से आंसू बह निकले।

     

    विवान माथे पर हाथ रखकर बोला,

     

    “मैं उसे नई राखी देने के लिए बाजार जा रहा हूं।”

     

    अनामिका ने कांपते हुए पूछा,

     

    “फिर?”

     

    विवान ने आंखें खोलीं।

     

    “वो लड़की मुझे भैया कहती है।”

     

    अनामिका रोते हुए हंस पड़ी।

     

    “हां भैया… वही लड़की मैं हूं।”

     

    विवान उसे देखने लगा।

     

    कुछ पल बाद उसकी आंखों में पहचान की हल्की चमक आई।

     

    “नन्ही?”

     

    अनामिका जैसे जम गई।

     

    उसके मुंह से आवाज नहीं निकली।

     

    फिर वह भाई के गले लगकर रो पड़ी।

     

    “भैया!”

     

    विवान भी भावुक हो गया।

     

    “नन्ही…”

     

    दोनों काफी देर तक एक-दूसरे को पकड़े रहे।

     

    माँ दरवाजे पर खड़ी रो रही थीं।

     

    लेकिन तभी विवान अचानक पीछे हट गया।

     

    उसने सिर पकड़ लिया।

     

    “मुझे सब याद नहीं आ रहा।”

     

    अनामिका ने उसका हाथ पकड़ा।

     

    “कोई बात नहीं।”

     

    “लेकिन मुझे इतना याद है कि तू मेरी बहन है।”

     

    अनामिका मुस्कुराई।

     

    “मेरे लिए इतना ही काफी है।”

     

    उस दिन के बाद विवान की याददाश्त धीरे-धीरे वापस आने लगी।

     

    कुछ बातें पहले याद आईं।

     

    फिर कुछ चेहरे।

     

    फिर घर की यादें।

     

    लेकिन सबसे ज्यादा उसे अपनी बहन की बातें याद आने लगीं।

     

    एक दिन उसने अनामिका से कहा,

     

    “तू रोज मेरे पास क्यों आती थी?”

     

    अनामिका ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “क्योंकि मुझे डर था कि अगर मैं आना बंद कर दूंगी तो शायद आपको लगेगा कि मैं सच में आपकी बहन नहीं हूं।”

     

    विवान की आंखें नम हो गईं।

     

    “तूने मुझे याद दिलाने की कोशिश क्यों नहीं छोड़ी?”

     

    “क्योंकि आप भूल सकते थे कि मैं कौन हूं… लेकिन मैं कैसे भूल जाती कि आप कौन हैं?”

     

    विवान ने बहन के सिर पर हाथ रखा।

     

    “मुझे माफ कर दे।”

     

    “किस बात के लिए?”

     

    “तुझे पहचान नहीं पाया।”

     

    अनामिका ने सिर हिलाया।

     

    “इसमें आपकी गलती नहीं थी।”

     

    “लेकिन तूने मेरा साथ नहीं छोड़ा।”

     

    “भाई को याददाश्त खोने पर बहन थोड़ी छोड़ देती है।”

     

    कुछ महीनों बाद विवान पूरी तरह ठीक होने लगा।

     

    एक दिन उसने अपनी पुरानी अलमारी खोली।

     

    अंदर एक छोटा-सा डिब्बा रखा था।

     

    उसने डिब्बा निकाला।

     

    अंदर कई पुरानी राखियां थीं।

     

    विवान ने एक राखी उठाई।

     

    “ये किसकी है?”

     

    अनामिका ने देखकर कहा,

     

    “मेरी।”

     

    “इतनी सारी?”

     

    “हर साल की।”

     

    विवान मुस्कुराया।

     

    फिर उसने अपनी कलाई आगे कर दी।

     

    “अगली राखी के लिए नई राखी मत बनाना।”

     

    अनामिका ने पूछा,

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि इस बार मैं खुद चुनूंगा।”

     

    “क्या?”

     

    “एक ऐसी राखी जिसमें सबसे मजबूत धागा हो।”

     

    अनामिका हंस पड़ी।

     

    “इतनी मजबूत क्यों?”

     

    विवान ने उसकी तरफ देखकर कहा,

     

    “ताकि अगर मेरी याददाश्त फिर कभी मेरा साथ छोड़ दे… तो भी वो धागा मुझे तेरे रिश्ते की याद दिलाता रहे।”

     

    अनामिका की आंखें भर आईं।

     

    उसने भाई की कलाई पकड़कर कहा,

     

    “अब आपको कभी भूलने नहीं दूंगी।”

     

    विवान मुस्कुराया।

     

    “और मैं तुझे कभी अकेला नहीं छोड़ूंगा।”

     

    उस रक्षाबंधन ने दोनों को एक बात सिखा दी थी—

     

    रिश्ते सिर्फ यादों से नहीं चलते।

     

    कभी-कभी यादें चली जाती हैं, चेहरे भूल जाते हैं, नाम मिट जाते हैं…

     

    लेकिन सच्चा प्यार अपना रास्ता खुद ढूंढ लेता है।

     

    और एक छोटी-सी राखी…

     

    कभी-कभी उस रास्ते की पहली निशानी बन जाती है।

  • एक सच्चा आशिक

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    एक सच्चा आशिक कभी झूठ नहीं बोलता

     

    शहर के पुराने हिस्से में एक छोटी-सी किताबों की दुकान थी। दुकान के मालिक का नाम राघव था। उम्र करीब पच्चीस साल और स्वभाव बहुत शांत। वह ज्यादा बोलता नहीं था, लेकिन जो भी कहता, साफ-साफ कहता था।

     

    उसी शहर में अनाया नाम की लड़की रहती थी। वह कॉलेज में पढ़ती थी और अक्सर राघव की दुकान से किताबें लेने आती थी।

     

    पहली बार जब अनाया दुकान पर आई, उसने पूछा, “आपके पास पुराने उपन्यास मिल जाएंगे?”

     

    राघव ने मुस्कुराकर कहा, “हां, लेकिन अगर पढ़ने के लिए चाहिए तो अच्छे वाले दूंगा। सिर्फ दिखावे के लिए चाहिए तो कोई भी दे दूंगा।”

     

    अनाया हंस पड़ी।

     

    “आप हर ग्राहक से ऐसे ही बात करते हैं?”

     

    “नहीं,” राघव ने कहा, “हर किसी से इतनी बात भी नहीं करता।”

     

    अनाया को उसकी बात अजीब लगी, लेकिन अच्छी भी लगी।

     

    धीरे-धीरे वह रोज दुकान पर आने लगी। कभी किताब खरीदती, कभी बस थोड़ी देर बैठकर बातें करती।

     

    एक दिन अनाया ने पूछा, “राघव, तुम्हें कभी किसी से प्यार हुआ है?”

     

    राघव कुछ पल चुप रहा।

     

    फिर बोला, “हां।”

     

    अनाया ने मुस्कुराते हुए पूछा, “कौन है?”

     

    राघव ने उसकी आंखों में देखा और कहा, “तुम।”

     

    अनाया अचानक शांत हो गई।

     

    कुछ सेकंड तक दुकान में बिल्कुल सन्नाटा रहा।

     

    फिर उसने नजरें झुका लीं।

     

    “तुम मजाक तो नहीं कर रहे?”

     

    “नहीं।”

     

    “अगर मैं मना कर दूं तो?”

     

    राघव ने सहजता से कहा, “तब भी मेरी बात झूठ नहीं हो जाएगी। प्यार करना मेरे हाथ में है, तुम्हारा जवाब नहीं।”

     

    अनाया के दिल में उसकी बात उतर गई।

     

    धीरे-धीरे दोनों के बीच एक खूबसूरत रिश्ता बन गया। वे घंटों बातें करते। भविष्य के सपने देखते। राघव हमेशा अनाया से एक बात कहता था—

     

    “मैं तुमसे कभी झूठ नहीं बोलूंगा।”

     

    अनाया हंसकर कहती, “इतना भरोसा?”

     

    राघव जवाब देता, “प्यार में अगर सच छिपाना पड़े तो वह प्यार कैसा?”

     

    सब कुछ अच्छा चल रहा था, लेकिन एक दिन राघव को अपने पिता की पुरानी बीमारी के बारे में पता चला। डॉक्टर ने बताया कि इलाज के लिए बहुत पैसे चाहिए।

     

    राघव ने दुकान बेचने का फैसला कर लिया।

     

    अनाया को जब पता चला तो उसने पूछा, “तुमने मुझे बताया क्यों नहीं?”

     

    राघव ने कहा, “क्योंकि मैं नहीं चाहता कि तुम्हें मेरी परेशानी की वजह से अपने परिवार से लड़ना पड़े।”

     

    “लेकिन मैं तुम्हारी जिंदगी का हिस्सा हूं।”

     

    राघव ने उसकी तरफ देखा।

     

    “इसीलिए तो तुम्हें झूठ नहीं बोल सकता।”

     

    कुछ ही दिनों बाद अनाया के घर में उसकी शादी की बात चलने लगी। उसके पिता ने एक बड़े कारोबारी परिवार के लड़के का रिश्ता बताया।

     

    अनाया ने साफ मना कर दिया।

     

    लेकिन उसके पिता ने कहा, “राघव के पास क्या है? न बड़ा घर, न पैसा, न कोई स्थिर भविष्य।”

     

    अनाया चुप रही।

     

    उस रात उसने राघव को फोन किया।

     

    “अगर मैं तुम्हारे साथ खड़ी रहूं तो क्या तुम मुझे कभी दुखी नहीं होने दोगे?”

     

    राघव कुछ पल चुप रहा।

     

    फिर बोला, “मैं तुम्हें दुखी होने से बचाने का वादा नहीं कर सकता। जिंदगी में दुख आएंगे। लेकिन मैं यह वादा कर सकता हूं कि जब दुख आएगा, तब तुम्हारा हाथ छोड़कर भागूंगा नहीं।”

     

    अनाया की आंखों में आंसू आ गए।

     

    उसने कहा, “बस यही सुनना था।”

     

    लेकिन अगले ही दिन राघव को एक बड़ा झटका लगा।

     

    उसके पिता की हालत अचानक बहुत खराब हो गई। डॉक्टर ने तुरंत इलाज के लिए शहर से बाहर ले जाने को कहा।

     

    राघव के पास पैसे नहीं थे।

     

    उसने अपनी दुकान बेच दी।

     

    इलाज शुरू हुआ, लेकिन पिता को बचाया नहीं जा सका।

     

    राघव पूरी तरह टूट गया।

     

    इसी बीच अनाया के घरवालों ने उसे राघव से रिश्ता खत्म करने के लिए मजबूर करना शुरू कर दिया।

     

    एक दिन अनाया के पिता ने राघव को बुलाया।

     

    उन्होंने कहा, “तुम अच्छे लड़के हो, लेकिन मेरी बेटी की जिंदगी तुम्हारे साथ मुश्किल होगी। अगर सच में उससे प्यार करते हो तो उसे छोड़ दो।”

     

    राघव ने सिर झुका लिया।

     

    उस रात उसने अनाया को मिलने बुलाया।

     

    अनाया आते ही बोली, “क्या हुआ?”

     

    राघव ने धीरे से कहा, “अनाया, मैं चाहता हूं कि तुम मुझसे शादी मत करो।”

     

    अनाया का चेहरा उतर गया।

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि मेरे पास अब कुछ नहीं है।”

     

    “मुझे पैसे नहीं चाहिए।”

     

    “लेकिन मैं तुम्हें झूठा सपना भी नहीं दिखाऊंगा।”

     

    अनाया की आंखों से आंसू बहने लगे।

     

    “तो क्या तुम्हारा प्यार खत्म हो गया?”

     

    राघव ने तुरंत कहा, “नहीं।”

     

    “फिर मुझे छोड़ क्यों रहे हो?”

     

    राघव ने कहा, “क्योंकि मैं तुमसे प्यार करता हूं। मैं तुम्हें अपनी मजबूरी में बांधना नहीं चाहता।”

     

    अनाया ने गुस्से में कहा, “तुम्हें लगता है मैं इतनी कमजोर हूं कि तुम्हारे साथ गरीबी में नहीं रह सकती?”

     

    राघव चुप रहा।

     

    अनाया ने कहा, “तुमने मुझे हमेशा सच बोलने का वादा किया था। आज सच बताओ—क्या तुम मुझे चाहते हो?”

     

    राघव की आंखों में आंसू आ गए।

     

    “हर दिन। हर पल। लेकिन तुम्हारी खुशी भी चाहता हूं।”

     

    अनाया ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “तो फिर मेरी खुशी का फैसला तुम क्यों कर रहे हो?”

     

    राघव के पास कोई जवाब नहीं था।

     

    अनाया ने कहा, “मैं तुम्हारे साथ रहना चाहती हूं। अगर रास्ता मुश्किल होगा तो दोनों मिलकर चलेंगे। लेकिन मुझे यह मत कहो कि मेरे भले के लिए मुझे छोड़ रहे हो।”

     

    राघव की आंखों से आंसू निकल आए।

     

    उसने पहली बार अनाया को अपने करीब आने दिया।

     

    कुछ समय बाद दोनों ने अपने परिवारों को समझाने की कोशिश की।

     

    अनाया के पिता अब भी तैयार नहीं थे।

     

    राघव ने उनसे कहा, “मैं आपकी बेटी को बड़े-बड़े सपने दिखाने का झूठ नहीं बोलूंगा। मेरे पास आज बहुत कुछ नहीं है। लेकिन मैं मेहनत करूंगा। और अगर कभी मैं असफल हुआ तो भी उससे अपनी असफलता नहीं छिपाऊंगा।”

     

    उसकी सच्चाई ने अनाया के पिता को सोचने पर मजबूर कर दिया।

     

    उन्होंने पूछा, “अगर मेरी बेटी को कभी लगे कि उसने गलत फैसला किया है तो?”

     

    राघव ने जवाब दिया, “तब मैं उसे रोकूंगा नहीं। प्यार कैद नहीं होता।”

     

    कुछ महीनों बाद राघव ने एक नई छोटी-सी दुकान शुरू की। इस बार दुकान पहले से भी छोटी थी, लेकिन उसमें मेहनत और उम्मीद दोनों थीं।

     

    अनाया भी पढ़ाई पूरी करने के बाद उसके साथ काम करने लगी।

     

    धीरे-धीरे दुकान चल निकली।

     

    एक शाम अनाया ने मुस्कुराकर पूछा, “राघव, याद है तुमने पहली बार कहा था कि तुम मुझसे प्यार करते हो?”

     

    राघव हंस पड़ा।

     

    “हां।”

     

    “तब तुम्हारे पास कुछ नहीं था।”

     

    “अब भी बहुत कुछ नहीं है।”

     

    अनाया ने उसकी ओर देखकर कहा, “गलत। अब तुम्हारे पास मैं हूं।”

     

    राघव मुस्कुराया।

     

    “और मेरे पास तुम्हारा भरोसा है।”

     

    अनाया ने कहा, “एक बात बताओ, अगर उस दिन तुमने मुझसे झूठ बोला होता कि सब ठीक है, पैसे हैं, भविष्य सुरक्षित है, तो शायद मैं तुम्हारे साथ आ जाती।”

     

    राघव ने कहा, “लेकिन तब तुम्हें सच्चा राघव नहीं मिलता।”

     

    अनाया ने मुस्कुराकर उसका हाथ थाम लिया।

     

    “और मुझे खुशी है कि तुमने मुझे सच बताया।”

     

    कई साल बाद उनकी वही छोटी-सी किताबों की दुकान शहर की मशहूर दुकान बन गई।

     

    दुकान के बाहर एक छोटी-सी पंक्ति लिखी थी—

     

    “प्यार वह नहीं जो हर बात को खूबसूरत बनाकर बताए, प्यार वह है जो सच बताकर भी साथ निभाने का हौसला रखे।”

     

    राघव जब भी उस पंक्ति को देखता, अनाया की तरफ मुस्कुरा देता।

     

    क्योंकि उसने एक बात जिंदगी भर नहीं भूली थी—

     

    सच्चा आशिक अपने प्यार को खुश करने के लिए झूठ नहीं बोलता। वह सच बोलता है, चाहे सच कितना भी मुश्किल क्यों न हो। क्योंकि सच्चा प्यार भरोसे पर टिकता है, और भरोसा कभी झूठ की नींव पर खड़ा नहीं हो सकता।

  • एक कमरा दो अजनबी

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    एक कमरा, दो अजनबी और एक अनकहा एहसास

     

    विदेश के एक बड़े कॉलेज में पढ़ाई करने वाले छात्रों के लिए हॉस्टल की व्यवस्था थोड़ी अलग थी। वहाँ लड़के और लड़कियों के लिए अलग-अलग हॉस्टल तो थे, लेकिन कुछ खास कमरों में अलग-अलग देशों के छात्रों को साथ रहने की अनुमति थी। कॉलेज का मानना था कि इससे छात्रों को अलग-अलग संस्कृतियों और लोगों को समझने का मौका मिलता है।

     

    ऐसे ही एक कमरे में पहले से तीन लड़कियाँ रहती थीं —सोम्या, एलिना और कैथरीन।

     

    सोम्या भारत से आई थी। वह बेहद शांत, मासूम और प्यारी लड़की थी। बात करते समय उसकी आवाज में एक अजीब-सी नरमी रहती थी। वह हर किसी से जल्दी घुलती-मिलती नहीं थी, लेकिन जिसे अपना मान लेती, उसके लिए पूरी तरह खड़ी रहती।

     

    एक शाम कमरे का दरवाजा खुला और कॉलेज का वार्डन एक लड़के के साथ अंदर आया।

     

    “यह तुम्हारा नया रूममेट है। नाम है सुशांत।”

     

    तीनों लड़कियाँ एक-दूसरे का चेहरा देखने लगीं।

     

    सुशांत ने बस हल्का-सा सिर हिलाया।

     

    “हैलो।”

     

    “बस इतना?” एलिना हँसते हुए बोली, “हमने सोचा था नए रूममेट का कम से कम परिचय तो होगा।”

     

    सुशांत ने अपना बैग नीचे रखा।

     

    “सुशांत। इंडिया से हूँ। बाकी… बाद में।”

     

    कैथरीन ने धीरे से एलिना के कान में कहा, “ये तो बहुत सीरियस है।”

     

    एलिना हँस पड़ी।

     

    सोम्या चुपचाप उसे देख रही थी।

     

    सुशांत ने कमरे में नजर दौड़ाई और फिर अपना सामान एक खाली कोने में रखने लगा। उसे इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ रहा था कि कमरे में तीन लड़कियाँ हैं।

     

    एलिना ने पूछा, “तुम्हें अजीब नहीं लग रहा?”

     

    “क्या?”

     

    “हम तीन लड़कियाँ हैं और तुम अकेले लड़के।”

     

    सुशांत ने बिना उसकी तरफ देखे कहा, “मुझे पढ़ाई करनी है। कमरे में कौन है, इससे मुझे फर्क नहीं पड़ता।”

     

    कैथरीन ने मजाक में कहा, “वाह! इतना सीरियस इंसान हमने पहली बार देखा है।”

     

    सोम्या के चेहरे पर हल्की मुस्कान आ गई।

     

    उस रात सुशांत देर तक पढ़ता रहा। बाकी तीनों आपस में बातें करती रहीं। एलिना और कैथरीन लगातार उससे बात करने की कोशिश करतीं, लेकिन सुशांत के जवाब छोटे होते।

     

    “तुम्हारी गर्लफ्रेंड है?”

     

    “नहीं।”

     

    “क्यों?”

     

    “दिलचस्पी नहीं।”

     

    “कभी प्यार हुआ?”

     

    “नहीं।”

     

    “होगा भी नहीं लगता।”

     

    “शायद।”

     

    एलिना ने हँसते हुए कहा, “तुम इंसान हो या किताब?”

     

    सुशांत ने पहली बार मुस्कुराकर उसकी तरफ देखा।

     

    “किताब शायद ज्यादा अच्छी होती।”

     

    सब हँस पड़ीं।

     

    बस सोम्या उसे चुपचाप देखती रही।

     

    अगले कुछ दिनों में कमरे का माहौल थोड़ा बदलने लगा। एलिना और कैथरीन सुशांत को परेशान करने के नए-नए तरीके ढूँढतीं। कभी उसका पेन छिपा देतीं, कभी उसकी किताब के ऊपर मजाकिया पर्ची रख देतीं।

     

    लेकिन सोम्या कभी उसे परेशान नहीं करती थी।

     

    एक दिन सुशांत लाइब्रेरी से वापस आया तो उसने देखा कि उसकी मेज पर खाना रखा था।

     

    वह हैरान हुआ।

     

    “ये किसने रखा?”

     

    सोम्या ने किताब से नजर उठाई।

     

    “मैंने।”

     

    “क्यों?”

     

    “सुबह से तुमने कुछ नहीं खाया था।”

     

    सुशांत कुछ पल उसे देखता रहा।

     

    “तुम्हें कैसे पता?”

     

    सोम्या मुस्कुराई।

     

    “जब कोई रोज एक ही समय पर खाना खाता हो और आज नहीं खाए, तो पता चल जाता है।”

     

    सुशांत ने पहली बार महसूस किया कि कमरे में कोई ऐसा भी था जो उसकी चुप्पी को समझने की कोशिश करता था।

     

    “थैंक यू।”

     

    “कोई बात नहीं।”

     

    बस इतना ही।

     

    लेकिन उस छोटे-से पल के बाद सुशांत के अंदर कुछ बदलने लगा।

     

    अब कमरे में आते ही उसकी नजर सबसे पहले सोम्या को ढूँढती।

     

    वह खुद इस बदलाव को समझ नहीं पा रहा था।

     

    एक शाम बारिश हो रही थी। बिजली चली गई और कमरे में अंधेरा छा गया।

     

    एलिना और कैथरीन मोमबत्ती लेने बाहर चली गईं।

     

    कमरे में सिर्फ सुशांत और सोम्या रह गए।

     

    सोम्या खिड़की के पास बैठी बारिश देख रही थी।

     

    “तुम्हें बारिश पसंद है?” सुशांत ने अचानक पूछा।

     

    सोम्या ने पलटकर देखा।

     

    “हाँ।”

     

    “क्यों?”

     

    “पता नहीं। बारिश में सब कुछ थोड़ा सच्चा लगता है।”

     

    सुशांत चुप हो गया।

     

    सोम्या ने पूछा, “तुम हमेशा इतने चुप क्यों रहते हो?”

     

    “शायद आदत है।”

     

    “किसी से बात करने का मन नहीं करता?”

     

    सुशांत ने कुछ पल सोचा।

     

    “पहले नहीं करता था।”

     

    सोम्या ने उसकी तरफ देखा।

     

    “और अब?”

     

    सुशांत ने नजरें झुका लीं।

     

    “अब… कभी-कभी करता है।”

     

    सोम्या समझ नहीं पाई कि वह किसके बारे में कह रहा है।

     

    तभी एलिना और कैथरीन वापस आ गईं और कमरे का माहौल फिर सामान्य हो गया।

     

    लेकिन उस रात सुशांत देर तक सो नहीं पाया।

     

    उसे बार-बार सोम्या की मुस्कान याद आ रही थी।

     

    कुछ दिनों बाद कॉलेज में सांस्कृतिक कार्यक्रम था। सभी छात्र तैयारी में व्यस्त थे। सोम्या भी एक प्रस्तुति की तैयारी कर रही थी। वह मंच के पीछे घबराई हुई खड़ी थी।

     

    सुशांत ने उसे देखा।

     

    “डर लग रहा है?”

     

    सोम्या ने धीरे से कहा, “थोड़ा।”

     

    “तुम कर लोगी।”

     

    “तुम्हें इतना भरोसा कैसे है?”

     

    “क्योंकि तुम जब किसी चीज को दिल से करती हो, तो उसे अच्छा ही करती हो।”

     

    सोम्या कुछ पल उसे देखती रही।

     

    “तुम आजकल बहुत बातें करने लगे हो।”

     

    सुशांत मुस्कुरा दिया।

     

    “शायद किसी की वजह से।”

     

    सोम्या के चेहरे पर हल्की-सी लाली आ गई।

     

    उस दिन सोम्या ने मंच पर शानदार प्रस्तुति दी।

     

    सबसे ज्यादा खुशी सुशांत के चेहरे पर थी।

     

    एलिना ने यह देख लिया।

     

    वह कैथरीन के पास जाकर धीरे से बोली, “मुझे लगता है हमारे सीरियस साहब बदल रहे हैं।”

     

    कैथरीन हँसते हुए बोली, “और वजह भी साफ है।”

     

    दोनों ने सोम्या और सुशांत की तरफ देखा।

     

    सुशांत को अब खुद से एक सवाल पूछना पड़ रहा था।

     

    जिस लड़के को कभी रिश्तों में कोई दिलचस्पी नहीं थी, वह अब हर दिन किसी एक लड़की के कमरे में आने का इंतजार क्यों करता था?

     

    उसे सोम्या की आवाज अच्छी क्यों लगती थी?

     

    उसकी मुस्कान देखकर मन हल्का क्यों हो जाता था?

     

    और सबसे बड़ी बात…

     

    अगर सोम्या एक दिन कमरे में न हो, तो पूरा कमरा खाली-खाली क्यों लगता था?

     

    सुशांत को जवाब पता था।

     

    बस वह उसे स्वीकार करने से डर रहा था।

     

    क्योंकि यह सिर्फ पसंद नहीं थी।

    उसके दिल में सोम्या के लिए एक ऐसा एहसास जन्म ले चुका था, जिसकी उसे खुद कभी उम्मीद नहीं थी।

     

    और सोम्या?

    वह भी शायद उस एहसास को महसूस करने लगी थी…

     

    लेकिन दोनों में से किसी ने अभी तक उसे शब्द नहीं दिए थे।

  • बेपरवाह लड़का

    बेपरवाह लड़का

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    एक समय की बात है। एक छोटे से शहर में कबीर नाम का लड़का रहता था। पूरे मोहल्ले में उसकी पहचान एक नादान, बेपरवाह और मस्तमौला लड़के के रूप में थी। उसे न किसी से प्यार था, न किसी रिश्ते की परवाह। दोस्त कहते, “कबीर, कभी तो किसी लड़की को देखकर दिल धड़केगा।”

     

    वह हंसकर जवाब देता, “मुझे इन सब चक्करों में नहीं पड़ना। जिंदगी बस खुलकर जीने के लिए मिली है।”

     

    दिन बीतते रहे। एक दिन कबीर पार्क में अपने दोस्त का इंतजार कर रहा था। तभी उसकी नजर कुछ दूर बच्चों के साथ खेल रही एक लड़की पर पड़ी। वह बच्चों के साथ कभी झूला झूलती, कभी उन्हें पकड़म-पकड़ाई खिलाती, कभी उनकी छोटी-छोटी बातों पर खिलखिलाकर हंस पड़ती।

     

    उसकी हंसी में ऐसा अपनापन था कि कबीर पहली बार किसी को देखकर चुप हो गया।

     

    वह खुद से बोला, “यार… कोई इतना मुस्कुरा कैसे सकता है?”

     

    उस दिन वह बिना दोस्त से मिले ही घर लौट आया, लेकिन उसका मन बार-बार उसी मुस्कुराती लड़की के पास चला जाता।

     

    अगले दिन वह फिर उसी समय पार्क पहुंच गया।

     

    लड़की फिर वहीं थी।

     

    कबीर अब रोज पार्क आने लगा। कभी दूर बैठकर उसे देखता, कभी बच्चों के साथ खेलते हुए उसकी हंसी सुनता। धीरे-धीरे उसे एहसास हुआ कि जिसे वह प्यार जैसी बेकार चीज समझता था, वही उसके दिल में घर बना चुकी है।

     

    एक दिन उसने हिम्मत जुटाई।

     

    “हाय… मैं कबीर।”

     

    लड़की मुस्कुराई।

     

    “मैं अन्वी।”

     

    “तुम रोज यहां आती हो?”

     

    “हां… बच्चों के साथ समय बिताना अच्छा लगता है।”

     

    “और मुझे…”

     

    वह रुक गया।

     

    अन्वी हंस पड़ी।

     

    “क्या?”

     

    “मुझे तुम्हें देखना अच्छा लगता है।”

     

    अन्वी हल्का सा शर्माकर दूसरी तरफ देखने लगी।

     

    उस दिन दोनों देर तक बातें करते रहे।

     

    अब उनकी मुलाकातें रोज होने लगीं। कबीर की जिंदगी पूरी तरह बदल चुकी थी। जो लड़का पहले किसी की परवाह नहीं करता था, अब अन्वी के लिए फूल खरीदता, उसकी पसंद का खाना लाता और उसकी छोटी-छोटी खुशियों का ध्यान रखता।

     

    एक दिन कबीर ने कहा,

     

    “अन्वी… मुझे तुमसे प्यार हो गया है।”

     

    अन्वी कुछ पल चुप रही।

     

    उसकी आंखों में आंसू आ गए।

     

    “कबीर… ऐसा मत कहो।”

     

    “क्यों?”

     

    “बस… मत कहो।”

     

    लेकिन कबीर कहां मानने वाला था।

     

    उसने कई दिनों तक उसे मनाया, समझाया और आखिर एक शाम पार्क के उसी पुराने पेड़ के नीचे घुटनों पर बैठकर बोला,

     

    “अगर तुम हां नहीं कहोगी तो मैं जिंदगी भर इंतजार करूंगा।”

     

    अन्वी की आंखों से आंसू बह निकले।

     

    उसने कांपते हुए हाथ से कबीर का हाथ पकड़ लिया।

     

    “हां… मैं भी तुमसे प्यार करती हूं।”

     

    कबीर खुशी से झूम उठा।

     

    उसे लगा जैसे पूरी दुनिया उसकी हो गई।

     

    दोनों ने साथ घूमना शुरू किया। बारिश में भीगना, सड़क किनारे चाय पीना, बच्चों के साथ खेलना, छोटी-छोटी लड़ाइयां करना… हर दिन एक नई याद बन जाता।

     

    लेकिन कबीर ने एक बात नोटिस की।

     

    अन्वी बहुत जल्दी थक जाती थी।

     

    कभी अचानक पेट पकड़कर बैठ जाती।

     

    कभी दर्द में भी मुस्कुराने की कोशिश करती।

     

    एक दिन कबीर ने पूछा,

     

    “सच बताओ… तुम ठीक तो हो?”

     

    “हां… बस थोड़ी कमजोरी है।”

     

    वह बात टाल गई।

     

    कुछ दिन बाद अन्वी अचानक पार्क आना बंद हो गई।

     

    कबीर परेशान हो गया।

     

    उसने उसके घर का पता ढूंढ लिया और वहां पहुंच गया।

     

    दरवाजा उसकी मां ने खोला।

     

    कबीर ने पूछा,

     

    “आंटी… अन्वी कहां है?”

     

    उनकी आंखें भर आईं।

     

    “बेटा… अस्पताल में है।”

     

    कबीर के पैरों तले जमीन खिसक गई।

     

    वह दौड़ता हुआ अस्पताल पहुंचा।

     

    कमरे में अन्वी बिस्तर पर लेटी थी।

     

    चेहरा पहले जैसा मुस्कुराता जरूर था, लेकिन बहुत कमजोर हो चुका था।

     

    कबीर ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “क्या हुआ है तुम्हें?”

     

    अन्वी चुप रही।

     

    तभी डॉक्टर अंदर आए।

     

    उन्होंने धीरे से कहा,

     

    “उन्हें स्टमक कैंसर है… और बीमारी आखिरी स्टेज पर है।”

     

    यह सुनते ही कबीर जैसे पत्थर का हो गया।

     

    उसकी आंखों से आंसू बह निकले।

     

    वह डॉक्टर से बोला,

     

    “कुछ तो होगा… इलाज… ऑपरेशन… कुछ भी।”

     

    डॉक्टर ने सिर झुका लिया।

     

    “हम पूरी कोशिश कर रहे हैं, लेकिन अब समय बहुत कम है।”

     

    कबीर वहीं फूट-फूटकर रो पड़ा।

     

    उस रात उसने पहली बार भगवान से प्रार्थना की।

     

    “मेरी सारी खुशियां ले लो… बस उसे ठीक कर दो।”

     

    लेकिन जिंदगी हर दुआ नहीं सुनती।

     

    अगले दिन कबीर अस्पताल पहुंचा तो देखा अन्वी खिड़की से बाहर बच्चों को खेलते हुए देख रही थी।

     

    वह मुस्कुराई।

     

    “देखो… कितने खुश हैं ना?”

     

    कबीर ने आंसू छिपाते हुए कहा,

     

    “तुम भी ठीक होकर इनके साथ खेलोगी।”

     

    अन्वी ने धीरे से सिर हिला दिया।

     

    “शायद नहीं।”

     

    “ऐसा मत बोलो।”

     

    “कबीर… सच से भागने से सच बदल नहीं जाता।”

     

    कुछ देर बाद उसने अपने बैग से एक छोटी डायरी निकाली।

     

    “ये तुम्हारे लिए है।”

     

    कबीर ने खोला।

     

    पहले पन्ने पर लिखा था—

     

    “जिस दिन तुमने पहली बार कहा था कि तुम्हें मुझे देखना अच्छा लगता है, उसी दिन मुझे तुमसे प्यार हो गया था। लेकिन मैं तुम्हें अपने दर्द में बांधना नहीं चाहती थी। इसलिए बार-बार तुम्हें दूर करती रही।”

     

    कबीर रो पड़ा।

     

    “तुमने मुझसे छिपाया क्यों?”

     

    अन्वी बोली,

     

    “क्योंकि मैं नहीं चाहती थी कि मेरी वजह से तुम्हारी जिंदगी रुक जाए।”

     

    कबीर ने उसका हाथ कसकर पकड़ लिया।

     

    “अगर जिंदगी तुम्हारे बिना है… तो वह जिंदगी नहीं है।”

     

    अन्वी मुस्कुराई।

     

    “नहीं… तुम जीओगे। मेरे हिस्से की मुस्कान भी तुम ही बांटोगे।”

     

    उस दिन दोनों ने घंटों बातें कीं।

     

    उन्होंने अपनी अधूरी इच्छाओं की एक सूची बनाई।

     

    एक साथ आइसक्रीम खाना।

     

    बारिश में भीगना।

     

    बच्चों को खिलौने बांटना।

     

    सूर्योदय देखना।

     

    अनाथालय जाकर बच्चों के साथ पूरा दिन बिताना।

     

    डॉक्टर की अनुमति से कबीर उसे व्हीलचेयर पर बाहर ले गया।

     

    दोनों ने हर छोटी इच्छा पूरी की।

     

    अन्वी दर्द में होती थी, लेकिन हर तस्वीर में मुस्कुरा रही थी।

     

    कुछ दिनों बाद उसकी तबीयत और बिगड़ गई।

     

    अब वह ठीक से बोल भी नहीं पाती थी।

     

    एक रात कबीर उसके पास बैठा था।

     

    अन्वी ने बहुत मुश्किल से कहा,

     

    “कबीर…”

     

    “हां… मैं यहीं हूं।”

     

    “एक वादा करोगे?”

     

    “हजार करूँगा।”

     

    “मेरे जाने के बाद… फिर से पहले वाले कबीर मत बन जाना। लोगों से प्यार करना, बच्चों के साथ खेलना, मुस्कुराना… और अगर कभी कोई लड़की तुम्हारी जिंदगी में आए, तो उसे ये मत कहना कि प्यार बेकार होता है।”

     

    कबीर की रुलाई छूट गई।

     

    उसने सिर हिलाकर कहा,

     

    “वादा है।”

     

    अन्वी ने आखिरी बार उसकी तरफ देखा।

     

    उसके होंठों पर वही पहली मुलाकात वाली मासूम मुस्कान थी।

     

    धीरे-धीरे उसकी आंखें बंद हो गईं।

     

    कमरे में मशीन की सीधी आवाज गूंज उठी।

     

    कबीर का संसार उसी पल जैसे थम गया।

     

    कई महीने तक वह हर शाम उसी पार्क में जाता रहा, जहां पहली बार उसने अन्वी को बच्चों के साथ खिलखिलाते देखा था।

     

    एक दिन उसने देखा कि कुछ गरीब बच्चे पुराने झूले के पास उदास बैठे हैं।

     

    उसे अन्वी की बात याद आई—”मेरे हिस्से की मुस्कान भी तुम ही बांटोगे।”

     

    उसने बच्चों के लिए खिलौने खरीदे, किताबें लाया और हर रविवार उनके साथ खेलना शुरू कर दिया।

     

    धीरे-धीरे शहर के लोग भी उससे जुड़ते गए। उसने अन्वी के नाम से एक छोटी संस्था बनाई, जहां कैंसर से जूझ रहे बच्चों और जरूरतमंद परिवारों की मदद की जाने लगी।

    अब जब भी कोई उससे पूछता, “क्या तुम्हें कभी सच्चा प्यार मिला था?”

     

    वह आसमान की ओर देखकर मुस्कुरा देता और कहता,

     

    “हां… मुझे प्यार मिला था। वह बहुत कम समय के लिए मेरी जिंदगी में आई, लेकिन उसने मुझे पूरी जिंदगी के लिए इंसान बना दिया। कुछ लोग सालों साथ रहकर भी याद नहीं बनते, और कुछ लोग कुछ महीनों में पूरी जिंदगी की सबसे खूबसूरत याद बन जाते हैं। अन्वी चली गई, लेकिन उसकी मुस्कान आज भी हर उस बच्चे की हंसी में जिंदा है, जिसे देखकर कभी एक बेपरवाह लड़के को पहली बार प्यार का मतलब समझ आया।”

     

  • बेवफ़ा

    बेवफ़ा

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    “तुम जैसी बेवफा लड़की मैंने आज तक नहीं देखी!”

     

    रोहन की आवाज़ पूरे मोहल्ले में गूंज रही थी। उसके हाथ में एक शादी का कार्ड था और सामने खड़ी थी नंदिनी, जिसकी आंखों से लगातार आंसू बह रहे थे।

     

    “आज के बाद कभी अपनी शक्ल मत दिखाना मुझे। तुमने सिर्फ मेरा दिल नहीं तोड़ा, मेरे भरोसे को भी मार दिया।”

     

    इतना कहकर रोहन वहां से चला गया।

     

    नंदिनी चाहकर भी उसे रोक नहीं पाई। उसके होंठ कांप रहे थे, लेकिन शब्द जैसे गले में ही अटक गए थे।

     

    उस दिन उसने सिर्फ एक बात धीरे से कही थी…

     

    “हकीकत क्या थी, ये कभी तुमने जाना ही नहीं… और मुझे दे दिया एक नया नाम—बेवफा।”

     

    लेकिन उस आवाज़ को सुनने वाला वहां कोई नहीं था।

     

     

    रोहन और नंदिनी एक ही कॉलेज में पढ़ते थे। दोस्ती हुई, फिर दोस्ती कब प्यार में बदल गई, दोनों को खुद भी पता नहीं चला।

     

    चार साल तक दोनों ने हर सपना साथ देखा था।

     

    रोहन हमेशा कहता था, “अगर मेरी जिंदगी में कोई सबसे जरूरी है, तो वो सिर्फ तुम हो।”

     

    नंदिनी मुस्कुराकर जवाब देती, “और मेरी दुनिया भी तुमसे ही शुरू होकर तुम पर ही खत्म होती है।”

     

    दोनों ने शादी करने का फैसला भी कर लिया था।

     

    लेकिन जिंदगी हमेशा इंसान की सोच के हिसाब से नहीं चलती।

     

    एक दिन नंदिनी के पिता को अचानक हार्ट अटैक आ गया।

     

    घर में पहले से ही बहुत कर्ज था। इलाज के लिए पैसे नहीं थे।

     

    उसी समय एक अमीर परिवार ने रिश्ता भेजा।

     

    लड़के का नाम आदित्य था। उसने साफ कहा था, “अगर नंदिनी शादी के लिए हां कह दे, तो मैं उसके पिता का पूरा इलाज करवाऊंगा और उनका सारा कर्ज भी चुका दूंगा।”

     

    नंदिनी के सामने एक तरफ उसका प्यार था…

    और दूसरी तरफ उसके पिता की सांसें।

    उसने पूरी रात रो-रोकर बिताई।

     

    सुबह जब अस्पताल में डॉक्टर ने कहा, “अगर जल्दी ऑपरेशन नहीं हुआ तो मरीज को बचाना मुश्किल होगा।”

     

    तब उसने अपने दिल को मार दिया।

    उसने आदित्य से शादी के लिए हां कह दी।

    लेकिन रोहन को कुछ भी नहीं बताया।क्योंकि उसे पता था…

    अगर वह सच बताएगी, तो रोहन अपनी जान तक लगा देगा।

     

    वह कर्ज लेगा…

    घर बेच देगा…

    अपना भविष्य खत्म कर देगा और नंदिनी कभी नहीं चाहती थी कि उसकी वजह से रोहन बर्बाद हो।

     

    इसलिए उसने खुद को ही गलत बना लिया।

     

    जब रोहन को नंदिनी की शादी की खबर मिली, तो उसकी पूरी दुनिया उजड़ गई।

     

    उसने नंदिनी को फोन किया। लेकिन नंदिनी ने फोन नहीं उठाया।

    उसने मैसेज किया।

    “बस एक बार मिल लो। लेकिन कोई जवाब नहीं आया।

     

    असल में नंदिनी हर मैसेज पढ़ती थी…और रोते-रोते फोन बंद कर देती थी।

     

    उसे डर था कि अगर उसने एक बार भी रोहन की आवाज़ सुन ली, तो वह अपने फैसले से पीछे हट जाएगी।

     

    शादी हो गई। रोहन टूट गया।

     

    उसने अपने दोस्तों से सिर्फ एक बात कही—

    “जिस लड़की के लिए मैं सब कुछ छोड़ सकता था… उसने मुझे पैसों के लिए छोड़ दिया।”

     

    धीरे-धीरे यही बात सबकी जुबान पर आ गई।

     

    हर कोई नंदिनी को एक ही नाम से बुलाने लगा…

     

    “बेवफा।”

    शादी के बाद नंदिनी की जिंदगी बिल्कुल वैसी नहीं थी जैसी लोगों ने सोची थी।

     

    आदित्य बुरा इंसान नहीं था।

    उसे शादी से पहले ही सब सच पता चल गया था।

     

    उसने एक दिन नंदिनी से कहा,

    “मैं जानता हूं कि तुम्हारे दिल में किसी और का नाम है। मैंने सिर्फ एक इंसान की जान बचाने के लिए तुमसे शादी की है। मैं कभी तुम पर किसी रिश्ते का दबाव नहीं डालूंगा।”

     

    ये सुनकर नंदिनी और भी ज्यादा रो पड़ी।

     

    वह हर रात अपने कमरे में बैठकर रोहन की पुरानी तस्वीरें देखती।

     

    लेकिन कभी उसे फोन नहीं करती।

     

    क्योंकि अब उसके पास कोई हक नहीं बचा था।

     

    उधर रोहन ने खुद को काम में डुबो दिया।

     

    उसने कभी शादी नहीं की।

    जब भी कोई उससे शादी की बात करता, वह सिर्फ मुस्कुरा देता।

     

    लेकिन उसकी मुस्कान में दर्द साफ दिखाई देता था।

     

    पांच साल बीत गए।

     

    एक दिन रोहन की मां की तबीयत अचानक खराब हो गई।

     

    उन्हें उसी अस्पताल में भर्ती कराया गया जहां कभी नंदिनी के पिता का इलाज हुआ था।

     

    वहीं अस्पताल में रोहन की मुलाकात पुराने डॉक्टर से हुई।

     

    डॉक्टर ने उसे पहचान लिया।

     

    बातों-बातों में उन्होंने कहा,

     

    “तुम वही रोहन हो ना? नंदिनी वाला लड़का?”

    रोहन चुप रहा।

    डॉक्टर बोले,बहुत बड़ी लड़की थी वो। अपने पिता को बचाने के लिए उसने अपना प्यार कुर्बान कर दिया।

     

    रोहन ने चौंककर पूछा,”क्या मतलब?”

     

    फिर डॉक्टर ने उसे पूरी कहानी बता दी।कर्ज…

    ऑपरेशन…

    समझौता…और नंदिनी की खामोश कुर्बानी।

     

    रोहन के पैरों तले जमीन खिसक गई।

     

    उसकी आंखों से आंसू अपने आप बहने लगे।

    उसे पहली बार एहसास हुआ…

     

    जिसे वह पांच साल से बेवफा कहता रहा…

     

    असल में वह सबसे ज्यादा वफादार थी।

    रोहन उसी शाम नंदिनी के घर पहुंच गया।

     

    दरवाजा आदित्य ने खोला।

     

    रोहन ने कांपती आवाज़ में पूछा,”क्या मैं नंदिनी से मिल सकता हूं?”

     

    आदित्य ने कुछ पल उसे देखा…

     

    फिर बिना कुछ कहे अंदर जाने का इशारा कर दिया।

     

    नंदिनी बरामदे में बैठी थी।

     

    वह पहले से बहुत कमजोर लग रही थी।

     

    रोहन को देखकर उसकी आंखें भर आईं।

     

    कुछ देर दोनों सिर्फ एक-दूसरे को देखते रहे।

     

    फिर रोहन उसके सामने घुटनों पर बैठ गया।

     

    “मुझे माफ कर दो…”

     

    नंदिनी ने धीरे से पूछा,

     

    “किस बात के लिए?”

     

    रोहन रो पड़ा।

     

    “मैंने तुम्हें समझने की कोशिश ही नहीं की। तुम्हारी आंखों के पीछे छिपे दर्द को पढ़ा ही नहीं। बस लोगों की बातों पर यकीन कर लिया और तुम्हें बेवफा कह दिया।”

     

    नंदिनी की आंखों से भी आंसू बह निकले।

     

    वह बोली,

     

    “मैं चाहती तो सच बता सकती थी… लेकिन फिर तुम्हारी जिंदगी बिखर जाती। मैं नहीं चाहती थी कि मेरे प्यार की कीमत तुम अपनी पूरी जिंदगी देकर चुकाओ।”

    दोनों बहुत देर तक रोते रहे।

    लेकिन अब वक्त उनके हाथ से निकल चुका था।

    कुछ महीनों बाद नंदिनी गंभीर रूप से बीमार पड़ गई।

    लगातार तनाव और दुख ने उसके शरीर को कमजोर कर दिया था।

    अस्पताल के कमरे में उसकी आखिरी सांसें चल रही थीं।

    रोहन उसके पास बैठा था।

    नंदिनी ने कांपते हुए उसका हाथ पकड़ा और मुस्कुराकर बोली,

    “देखो… इस बार रोना मत। मैं जा रही हूं, लेकिन एक बात याद रखना… किसी भी रिश्ते का फैसला सिर्फ सुनी-सुनाई बातों से मत करना। कभी-कभी जो इंसान सबसे ज्यादा गलत दिखाई देता है, वही सबसे ज्यादा टूटकर प्यार करता है।”

     

    रोहन की आंखों से आंसू रुक नहीं रहे थे।

    नंदिनी ने आखिरी बार उसकी तरफ देखा और बहुत धीमी आवाज़ में कहा,

    “हकीकत क्या थी… ये तुमने आखिर जान ही लिया… बस अफसोस इतना है कि थोड़ा देर से।”

    इतना कहकर उसकी आंखें हमेशा के लिए बंद हो गईं।

    नंदिनी के जाने के बाद रोहन अक्सर उसकी कब्र पर बैठा करता था।

    एक दिन उसने वहां एक छोटा-सा पत्थर लगवाया, जिस पर सिर्फ एक पंक्ति लिखी थी

    “जिसे दुनिया ने बेवफा कहा… वह अपने प्यार की सबसे सच्ची मिसाल थी।”

    उस दिन रोहन ने आसमान की ओर देखते हुए कहा,

    “काश… मैंने लोगों की बातें सुनने से पहले तुम्हारी खामोशी सुन ली होती। शायद आज मेरी जिंदगी इतनी खाली न होती।”

     

    हवा का एक हल्का झोंका आया, जैसे किसी ने उसके आंसू चुपचाप पोंछ दिए हों।

    और उस दिन रोहन को समझ आया कि हर अधूरी प्रेम कहानी में कोई बेवफा नहीं होता…

    कभी-कभी सिर्फ हालात ही इतने बेरहम होते हैं कि सच्चे प्यार को भी दुनिया बेवफाई का नाम दे देती है।

     

  • अधूरी मुहब्बत की डायन

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    अधूरी मोहब्बत की डायन

     

    पहाड़ों के बीच बसे एक छोटे से गांव के किनारे एक पुरानी हवेली थी। गांव वाले कहते थे कि वहां एक शातिर डायन रहती है। उसका नाम मायरा था। लोग कहते थे कि जिसने भी उसकी आंखों में देख लिया, वह कभी वापस नहीं लौटा। बच्चे शाम ढलते ही घरों में बंद हो जाते और बड़े भी उस रास्ते से गुजरने की हिम्मत नहीं करते।

     

    लेकिन कोई नहीं जानता था कि मायरा हमेशा से डायन नहीं थी।

     

    सालों पहले वह एक बेहद खूबसूरत लड़की थी। उसके चेहरे पर ऐसी मुस्कान थी कि हर कोई उसे देखकर खुश हो जाता। वह जंगल से जड़ी-बूटियां लाकर गांव वालों का इलाज करती थी। मगर गांव के कुछ लालची लोगों को उसका हुनर पसंद नहीं था। उन्होंने उस पर काला जादू करने का झूठा इल्जाम लगा दिया।

     

    उसी गांव में आरव नाम का एक युवक रहता था। वह मायरा से दिल ही दिल में प्यार करता था और मायरा भी उसे अपनी पूरी दुनिया मानती थी।

     

    एक शाम आरव ने कहा, “मायरा, मैं जल्दी ही तुम्हें अपने घर की बहू बनाऊंगा। चाहे पूरी दुनिया हमारे खिलाफ हो जाए।”

     

    मायरा मुस्कुरा दी। “बस इतना वादा है कि कभी मेरा साथ मत छोड़ना।”

     

    लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था।

     

    गांव वालों ने मायरा को पकड़कर जंगल के बीच बने पुराने मंदिर में जिंदा जलाने का फैसला कर लिया। आरव ने उसे बचाने की बहुत कोशिश की, लेकिन कुछ लोगों ने उसे बांध दिया।

     

    आग की लपटों में घिरी मायरा की आखिरी चीख पूरे जंगल में गूंज उठी।

     

    “अगर मेरा प्यार अधूरा रहा… तो मेरी आत्मा कभी शांति नहीं पाएगी…”

     

    उस रात तेज तूफान आया। बिजली कड़की और मंदिर के पास खड़ा बरगद का पेड़ दो हिस्सों में टूट गया।

     

    अगली सुबह मायरा की राख तो मिली, लेकिन उसका शरीर नहीं।

     

    उस दिन के बाद गांव में अजीब घटनाएं होने लगीं।

     

    रात होते ही लोगों को सफेद साड़ी पहने एक औरत दिखाई देती। जो भी उसका पीछा करता, वह हमेशा के लिए गायब हो जाता।

     

    धीरे-धीरे लोगों ने उसे शातिर डायन कहना शुरू कर दिया।

     

    मायरा अब इंसानों से नफरत करती थी। उसने कसम खा ली थी कि कोई भी प्रेम कहानी पूरी नहीं होने देगी।

     

    जिस गांव में शादी होती, वहां कोई न कोई अनहोनी हो जाती।

     

    कभी दूल्हा गायब हो जाता, कभी दुल्हन।

     

    लोग डर के मारे रात में शादी करना छोड़ चुके थे।

     

    लेकिन सच यह था कि मायरा हर प्रेमी जोड़े में खुद और आरव को ढूंढती थी।

     

    जब भी वह किसी को खुश देखती, उसका अपना टूटा हुआ दिल फिर से रो पड़ता।

     

    एक दिन गांव में विवान नाम का युवक अपनी मां के साथ रहने आया।

     

    वह पढ़ा-लिखा और निडर था।

     

    गांव वालों ने उसे चेतावनी दी, “हवेली के पास मत जाना। वहां मौत रहती है।”

     

    विवान हंसकर बोला, “अगर वहां कोई है, तो उसकी भी कोई कहानी होगी।”

     

    एक रात वह सच जानने के लिए हवेली पहुंच गया।

     

    अंदर चारों तरफ धूल जमी थी।

     

    अचानक ठंडी हवा चली।

     

    दरवाजा अपने आप बंद हो गया।

     

    पीछे से एक आवाज आई, “यहां आने की हिम्मत कैसे हुई?”

     

    विवान ने पलटकर देखा।

     

    सामने लाल आंखों वाली एक औरत खड़ी थी।

     

    लंबे खुले बाल, सफेद साड़ी और चेहरे पर दर्द से भरी मुस्कान।

     

    वह मायरा थी।

     

    उसने अपने लंबे नाखून विवान की गर्दन पर रख दिए।

     

    “डर नहीं लगता?”

     

    विवान बोला, “डर उस इंसान से लगता है जिसके अंदर बुराई हो। तुम्हारी आंखों में तो सिर्फ दर्द दिखाई दे रहा है।”

     

    यह सुनकर मायरा कुछ पल के लिए चुप हो गई।

     

    सदियों बाद किसी ने उसे राक्षस नहीं, इंसान समझा था।

     

    मगर अगले ही पल वह फिर कठोर बन गई।

     

    “मेरे पास दया मांगने मत आना।”

     

    विवान बोला, “मैं दया नहीं… तुम्हारी कहानी सुनने आया हूं।”

     

    मायरा ने पहली बार किसी इंसान को जिंदा छोड़ दिया।

     

    उस रात दोनों घंटों तक बात करते रहे।

     

    मायरा ने अपनी अधूरी मोहब्बत का हर दर्द उसे बताया।

     

    विवान सब सुनता रहा।

     

    अगले कई दिनों तक वह रोज हवेली जाने लगा।

     

    गांव वालों ने उसे बहुत रोका।

     

    लेकिन वह नहीं माना।

     

    धीरे-धीरे मायरा के चेहरे पर फिर मुस्कान लौटने लगी।

     

    उसे लगने लगा कि शायद इस बार किस्मत उस पर मेहरबान हो जाएगी।

     

    लेकिन उसके दिल में एक डर भी था।

     

    वह जानती थी कि वह अब इंसान नहीं रही।

     

    एक रात उसने विवान से पूछा, “अगर मैं पहले जैसी होती… तो क्या तुम मुझे अपनाते?”

     

    विवान ने बिना सोचे कहा, “दिल से चाहने वालों का चेहरा नहीं देखा जाता।”

     

    मायरा की आंखों से आंसू बह निकले।

     

    सैकड़ों साल बाद उसने फिर किसी पर भरोसा किया।

     

    लेकिन किस्मत ने एक बार फिर उसके साथ खेल खेला।

     

    गांव वालों को पता चल गया कि विवान रोज हवेली जाता है।

     

    उन्होंने फैसला किया कि इस बार डायन का हमेशा के लिए अंत कर देंगे।

     

    हथियारों और मशालों के साथ पूरा गांव हवेली पहुंच गया।

     

    विवान उनके सामने खड़ा हो गया।

     

    “कोई इसे हाथ नहीं लगाएगा।”

     

    लोग चिल्लाए, “यह डायन है। इसने हमारे लोगों की जान ली है।”

     

    मायरा धीरे-धीरे बाहर आई।

     

    उसने गांव वालों को देखा।

     

    फिर विवान की तरफ मुस्कुराकर बोली, “आज फिर इतिहास खुद को दोहरा रहा है।”

     

    विवान उसका हाथ पकड़ना चाहता था।

     

    लेकिन मायरा पीछे हट गई।

     

    “नहीं… इस बार मैं तुम्हें खोना नहीं चाहती।”

     

    उसने अपनी सारी जादुई शक्ति इकट्ठी की।

     

    पूरा आसमान काले बादलों से भर गया।

     

    हवा इतनी तेज चलने लगी कि लोगों के हाथों की मशालें बुझ गईं।

     

    मगर मायरा ने किसी पर हमला नहीं किया।

     

    उसने सिर्फ विवान की तरफ देखा।

     

    “मैंने एक बार किसी इंसान से दिल से प्यार किया था… लेकिन उसे कभी पा नहीं सकी। आज फिर वही मोड़ सामने है। अगर इस बार भी तुम्हें अपने पास रखूंगी, तो पूरी दुनिया तुम्हारी दुश्मन बन जाएगी।”

     

    विवान की आंखें भर आईं।

     

    “मैं तुम्हें छोड़कर नहीं जाऊंगा।”

     

    मायरा हल्का-सा मुस्कुराई।

     

    “कुछ प्यार साथ रहने के लिए नहीं… याद बन जाने के लिए होते हैं।”

     

    इतना कहकर उसने अपना सारा जादू खुद पर ही चला दिया।

     

    तेज रोशनी हुई।

     

    जब रोशनी खत्म हुई, तो हवेली, काला जादू और मायरा… सब गायब हो चुके थे।

     

    वह हमेशा के लिए इस दुनिया से चली गई।

     

    विवान वहीं घुटनों के बल बैठकर रोता रहा।

     

    उसके हाथ में केवल मायरा की चांदी की एक पुरानी पायल बची थी।

     

    उस दिन के बाद उस गांव में फिर कभी किसी ने डायन नहीं देखी।

     

    लेकिन हर साल उसी रात हवेली वाली जगह पर रातरानी के फूल अपने आप खिल जाते।

     

    लोग कहते हैं कि वह मायरा की

    आखिरी निशानी है।

     

    वह शातिर जरूर थी, उसने कई लोगों से बदला भी लिया था, लेकिन जब उसने पहली और आखिरी बार किसी इंसान को सच्चे दिल से चाहा, तब भी किस्मत ने उसे उसका प्यार नहीं दिया।