🔐 लॉग-इन या रजिस्टर करें  

भाई ने बहन से किया वो वादा

पढ़ने का समय : 7 मिनट

भाई ने बहन से किया वो वादा

 

“अगर मैं कभी बहुत दूर चला गया ना, तो क्या तू मुझे भूल जाएगी?”

 

रिया ने अपने भाई कबीर की तरफ हैरानी से देखा।

 

“आप ऐसी बातें क्यों कर रहे हो?”

 

कबीर ने मुस्कुराते हुए बात बदल दी।

 

“बस ऐसे ही पूछ लिया।”

 

रिया ने उसकी बांह पर हल्का-सा हाथ मारा।

 

“आप कहीं नहीं जाने वाले। और अगर गए भी ना, तो मैं आपको ढूंढकर वापस ले आऊंगी।”

 

कबीर हंस पड़ा।

 

“बहुत बहादुर हो गई है मेरी छोटी बहन।”

 

रिया ने गर्व से कहा,

 

“आपकी बहन हूं।”

 

दोनों हंस रहे थे, लेकिन रिया नहीं जानती थी कि उसके भाई के मन में पिछले कई दिनों से एक बात चल रही थी।

 

एक ऐसी बात…

 

जिसके बारे में वह उसे बताना चाहता भी था और नहीं भी।

 

कबीर और रिया के पिता की कई साल पहले मौत हो गई थी। माँ ने दोनों बच्चों को अकेले पाला।

 

कबीर उम्र में रिया से आठ साल बड़ा था।

 

इसलिए वह हमेशा भाई से ज्यादा पिता जैसा रहा।

 

रिया को स्कूल छोड़ना, उसकी फीस भरना, उसके जन्मदिन पर केक लाना—कबीर हर जिम्मेदारी अपनी समझता था।

 

लेकिन पिछले कुछ महीनों से घर की आर्थिक हालत खराब हो गई थी।

 

माँ की नौकरी छूट गई थी।

 

रिया कॉलेज में पढ़ रही थी।

 

कबीर की छोटी नौकरी से घर का खर्च मुश्किल से चलता था।

 

एक शाम रिया ने देखा कि कबीर देर रात तक किसी से फोन पर बात कर रहा था।

 

“हां, मैं तैयार हूं।”

 

रिया ने पूछा,

 

“किस बात के लिए?”

 

कबीर ने जल्दी से फोन रखा।

 

“कुछ नहीं।”

 

“भैया, आप मुझसे कुछ छिपा रहे हो।”

 

“तू हर बात जानना जरूरी समझती है क्या?”

 

रिया नाराज हो गई।

 

“पहले तो आप मुझे सब बताते थे।”

 

कबीर कुछ पल चुप रहा।

 

फिर उसके सिर पर हाथ रखकर बोला,

 

“कभी-कभी कुछ बातें समय आने पर बतानी पड़ती हैं।”

 

“कौन-सी बात?”

 

कबीर ने मुस्कुराकर कहा,

 

“जब बताऊंगा तो नाराज मत होना।”

 

रिया ने कहा,

 

“पहले बताओ तो सही।”

 

लेकिन कबीर ने बात बदल दी।

 

अगले दिन रक्षाबंधन था।

 

रिया सुबह जल्दी उठी।

 

उसने इस बार अपने भाई के लिए खुद एक राखी बनाई थी।

 

सफेद और नीले धागे की राखी।

 

कबीर को नीला रंग बहुत पसंद था।

 

राखी के बीच में उसने एक छोटा-सा शब्द लिखा था—

 

“वादा”

 

कबीर ने राखी देखकर पूछा,

 

“इस पर वादा क्यों लिखा है?”

 

रिया ने कहा,

 

“क्योंकि इस बार मुझे आपसे एक वादा लेना है।”

 

“क्या?”

 

“आप पहले राखी बंधवाओ।”

 

कबीर हंस पड़ा।

 

“ठीक है।”

 

रिया ने पूजा की थाली सजाई।

 

माँ पास बैठी थीं।

 

उसने कबीर के माथे पर तिलक लगाया।

 

मिठाई खिलाई।

 

फिर राखी उसकी कलाई पर बांधते हुए बोली,

 

“अब मेरा वादा।”

 

कबीर ने पूछा,

 

“क्या मांगोगी?”

 

रिया ने उसकी आंखों में देखकर कहा,

 

“मुझसे कभी कुछ मत छिपाना।”

 

कबीर का चेहरा गंभीर हो गया।

 

कुछ पल तक वह चुप रहा।

 

फिर उसने धीरे से कहा,

 

“ये वादा शायद मैं नहीं कर सकता।”

 

रिया के हाथ रुक गए।

 

“क्यों?”

 

माँ ने चिंतित होकर कबीर की तरफ देखा।

 

कबीर ने गहरी सांस ली।

 

“क्योंकि एक बात है, जो मैं कई दिनों से तुम दोनों से छिपा रहा हूं।”

 

रिया की धड़कन तेज हो गई।

 

“क्या बात?”

 

कबीर ने जेब से एक कागज निकाला।

 

“मुझे दूसरे शहर में नौकरी मिली है।”

 

रिया ने राहत की सांस ली।

 

“बस इतनी-सी बात?”

 

कबीर ने कहा,

 

“लेकिन ये नौकरी बहुत दूर है।”

 

“तो?”

 

“मुझे कम से कम तीन साल वहीं रहना होगा।”

 

रिया का चेहरा बदल गया।

 

“तीन साल?”

 

“हां।”

 

“और आप मुझे छोड़कर चले जाएंगे?”

 

कबीर ने कहा,

 

“छोड़कर नहीं जा रहा, रिया। हमारे लिए जा रहा हूं।”

 

“मुझे नहीं चाहिए ऐसी नौकरी!”

 

“रिया…”

 

“नहीं चाहिए पैसे, अगर उसके बदले आप नहीं होंगे।”

 

कबीर चुप रहा।

 

रिया की आंखों से आंसू निकल आए।

 

“आपने पहले क्यों नहीं बताया?”

 

“क्योंकि मुझे पता था तू रोएगी।”

 

“तो क्या हुआ? आपको लगता है मुझे रोने का भी हक नहीं?”

 

कबीर के चेहरे पर दर्द साफ दिखाई दिया।

 

“ऐसी बात नहीं है।”

 

रिया ने राखी की तरफ देखा।

 

उसने धीरे से कहा,

 

“मैंने सोचा था इस राखी पर आपसे वादा लूंगी कि हम हमेशा साथ रहेंगे।”

 

कबीर ने उसकी बात काटी।

 

“हम साथ रहेंगे।”

 

“कैसे? आप दूसरे शहर में होंगे।”

 

कबीर ने अपनी कलाई पर बंधी राखी को देखा।

 

“दूरी से रिश्ते खत्म नहीं होते।”

 

रिया चुप रही।

 

कबीर ने उसके सामने बैठते हुए कहा,

 

“याद है बचपन में तू डरती थी तो मैं क्या कहता था?”

 

रिया ने धीरे से कहा,

 

“आप कहते थे, मैं हूं ना।”

 

“तो आज भी वही कह रहा हूं।”

 

“लेकिन आप यहां नहीं होंगे।”

 

कबीर ने उसके हाथ अपने हाथों में लिए।

 

“रिया, मैं जहां भी रहूंगा, तेरे लिए हमेशा यहीं रहूंगा।”

 

रिया रो पड़ी।

 

कबीर ने कहा,

 

“अब मेरी बात सुन। मैं तुझसे एक वादा करना चाहता हूं।”

 

रिया ने उसकी तरफ देखा।

 

“क्या?”

 

“मैं कितनी भी दूर चला जाऊं, तेरे किसी भी मुश्किल समय में तुझे अकेला नहीं छोड़ूंगा।”

 

रिया चुप रही।

 

कबीर ने आगे कहा,

 

“रात हो या दिन, तू एक फोन करेगी और मैं तेरे साथ खड़ा मिलूंगा।”

 

“फोन पर?”

 

कबीर मुस्कुराया।

 

“अगर जरूरत पड़ी तो सामने।”

 

रिया की आंखें फिर भर आईं।

 

“पक्का?”

 

कबीर ने अपनी राखी वाली कलाई आगे की।

 

“इस राखी की कसम।”

 

कुछ दिनों बाद कबीर दूसरे शहर चला गया।

 

शुरुआत में रिया को बहुत खालीपन महसूस हुआ।

 

घर में हर चीज उसे भाई की याद दिलाती।

 

उसकी पुरानी किताबें।

 

उसका मग।

 

उसकी कुर्सी।

 

कभी-कभी वह भाई से नाराज होकर फोन नहीं उठाती।

 

फिर कबीर मैसेज करता—

 

“तू नाराज हो सकती है, लेकिन अकेली नहीं।”

 

रिया मैसेज पढ़कर मुस्कुरा देती।

 

समय बीतने लगा।

 

रिया अपनी पढ़ाई में व्यस्त हो गई।

 

एक दिन कॉलेज में उसे एक जरूरी इंटरव्यू के लिए जाना था।

 

वह बहुत घबराई हुई थी।

 

उसने कबीर को फोन किया।

 

“भैया, मुझे डर लग रहा है।”

 

दूसरी तरफ से वही पुरानी आवाज आई,

 

“मैं हूं ना।”

 

रिया मुस्कुराई।

 

“आप तो बहुत दूर हो।”

 

“वीडियो कॉल कर।”

 

पूरे रास्ते कबीर वीडियो कॉल पर उसके साथ रहा।

 

इंटरव्यू से पहले उसने कहा,

 

“अब जा। और याद रख, तू किसी से कम नहीं।”

 

रिया ने इंटरव्यू दिया।

 

कुछ दिनों बाद उसका चयन हो गया।

 

रिया की सबसे पहली कॉल कबीर को थी।

 

“भैया! मेरा चयन हो गया!”

 

कबीर खुशी से चिल्लाया,

 

“मुझे पता था।”

 

“आपको कैसे पता?”

 

“क्योंकि तू मेरी बहन है।”

 

कुछ महीनों बाद कबीर रक्षाबंधन पर घर लौटा।

 

रिया ने दरवाजा खोला।

 

दोनों कुछ सेकंड तक बस एक-दूसरे को देखते रहे।

 

फिर रिया दौड़कर उसके गले लग गई।

 

“आप सच में आ गए।”

 

कबीर ने कहा,

 

“वादा किया था।”

 

रिया ने इस बार एक नई राखी निकाली।

 

उस पर भी वही शब्द लिखा था—

 

“वादा”

 

कबीर ने हाथ आगे कर दिया।

 

रिया ने राखी बांधी।

 

फिर पूछा,

 

“भैया, पिछले साल वाला वादा याद है?”

 

कबीर ने मुस्कुराकर कहा,

 

“तू मुश्किल में हो और मैं तुझे अकेला छोड़ दूं—ऐसा कभी नहीं होगा।”

 

रिया ने कहा,

 

“और मेरा भी एक वादा है।”

 

“क्या?”

 

“अब मैं आपसे दूर होने से नहीं डरूंगी।”

 

कबीर ने पूछा,

 

“क्यों?”

 

रिया ने उसकी कलाई पर बंधी राखी की तरफ देखा।

 

“क्योंकि अब समझ गई हूं कि साथ रहने के लिए हमेशा पास होना जरूरी नहीं होता।”

 

माँ दूर खड़ी दोनों को देख रही थीं।

 

उनकी आंखों में खुशी थी।

 

रिया ने भाई की कलाई को पकड़ते हुए कहा,

 

“एक राखी पर लिखा छोटा-सा शब्द था—वादा।”

 

कबीर मुस्कुराया।

 

“और?”

 

रिया ने कहा,

 

“अब समझ गई हूं कि कुछ वादे सिर्फ बोले नहीं जाते… उन्हें हर दिन निभाया जाता है।”

 

कबीर ने बहन के सिर पर हाथ रखा।

 

“हमेशा।”

 

और उस दिन रिया को समझ आया कि भाई का प्यार सिर्फ घर की चार दीवारों तक सीमित नहीं होता।

 

कभी-कभी वह हजारों किलोमीटर दूर रहकर भी…

 

बहन के सबसे करीब होता है।

 

क्योंकि भाई ने बहन से जो सच्चा वादा किया हो, उसे दूरी नहीं तोड़ सकती।

Comments

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *