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एक अंजान भाई के नाम राखी

पढ़ने का समय : 6 मिनट

एक अनजान भाई के नाम राखी

 

“दीदी, अगर आपका कोई भाई नहीं है… तो ये राखी किसके लिए है?”

 

दस साल की छवि ने दुकान के सामने खड़े छोटे बच्चे को देखा और मुस्कुराकर बोली,

 

“पता नहीं… शायद किसी ऐसे भाई के लिए, जो अभी मुझे मिला नहीं है।”

 

बच्चा हंसकर आगे बढ़ गया।

 

लेकिन छवि के हाथ में पकड़ी वह राखी उसके लिए सिर्फ राखी नहीं थी।

 

हर साल वह एक राखी खरीदती थी।

 

और हर साल वही सवाल उसके मन में उठता—

 

“मेरा भाई आखिर कहां है?”

 

छवि के पास अपने परिवार की कोई पुरानी तस्वीर नहीं थी। उसे सिर्फ इतना पता था कि बचपन में उसकी माँ के साथ एक छोटा लड़का भी रहता था।

 

माँ उसे हमेशा “तेरा भैया” कहती थीं।

 

लेकिन छवि को उसका चेहरा याद नहीं था।

 

एक दिन उसने माँ से पूछा था,

 

“माँ, मेरा भाई कहां है?”

 

माँ की आंखें भर आई थीं।

 

“बहुत दूर।”

 

“कब आएगा?”

 

“जब भगवान चाहेंगे।”

 

बस यही जवाब उसे हमेशा मिला।

 

साल गुजरते गए।

 

छवि बड़ी हो गई।

 

माँ की तबीयत भी अब पहले जैसी नहीं रहती थी।

 

एक दिन माँ ने उसे अपने पास बुलाया।

 

“छवि, मेरे पास तुझे देने के लिए कुछ है।”

 

उन्होंने पुराने संदूक से एक कपड़े में लिपटा छोटा-सा डिब्बा निकाला।

 

छवि ने डिब्बा खोला।

 

अंदर एक पुरानी तस्वीर थी।

 

तस्वीर में एक छोटी बच्ची और लगभग पांच साल का लड़का खड़ा था।

 

लड़के के हाथ में राखी बंधी थी।

 

छवि तस्वीर देखते ही चुप हो गई।

 

“माँ… ये?”

 

माँ ने कहा,

 

“तेरा भाई है।”

 

“नाम?”

 

“आर्यन।”

 

छवि ने तस्वीर सीने से लगा ली।

 

“वो कहां है?”

 

माँ की आंखों से आंसू निकल आए।

 

“तेरे पिता के गुजरने के बाद हालात बहुत खराब हो गए थे। आर्यन को उसके मामा अपने साथ ले गए थे। फिर संपर्क टूट गया।”

 

छवि ने पूछा,

 

“आपने उसे ढूंढा नहीं?”

 

“बहुत कोशिश की।”

 

“फिर?”

 

“किस्मत ने साथ नहीं दिया।”

 

उस रात छवि ने तस्वीर अपने तकिए के नीचे रख ली।

 

अगले दिन उसने इंटरनेट और पुराने कागजों की मदद से आर्यन को ढूंढना शुरू किया।

 

कई नाम मिले।

 

कई पते मिले।

 

लेकिन कोई पक्का सुराग नहीं मिला।

 

फिर उसे एक पुराने स्कूल रिकॉर्ड में एक नाम मिला—

 

आर्यन मिश्रा।

 

पता था—एक छोटे से शहर का।

 

छवि ने तुरंत वहां जाने का फैसला किया।

 

कई घंटों की यात्रा के बाद वह उस पते पर पहुंची।

 

वहां अब एक छोटी-सी किताबों की दुकान थी।

 

छवि ने दुकानदार से पूछा,

 

“क्या यहां आर्यन नाम का कोई आदमी रहता था?”

 

दुकानदार ने उसे गौर से देखा।

 

“आप कौन हैं?”

 

“मैं… उसकी बहन हूं।”

 

दुकानदार कुछ पल चुप रहा।

 

फिर उसने सामने बैठे एक युवक की तरफ इशारा किया।

 

“वो रहा।”

 

छवि की धड़कन रुक गई।

 

युवक लगभग तीस साल का था।

 

सादा कपड़े, शांत चेहरा और आंखों में एक अजीब-सी उदासी।

 

छवि धीरे-धीरे उसके पास गई।

 

“आपका नाम आर्यन है?”

 

उसने किताब से नजर उठाई।

 

“जी।”

 

छवि ने कांपते हाथों से पुरानी तस्वीर उसके सामने रख दी।

 

आर्यन ने तस्वीर देखी।

 

उसका चेहरा अचानक बदल गया।

 

“ये तस्वीर… आपको कहां मिली?”

 

“माँ के पास।”

 

आर्यन खड़ा हो गया।

 

“माँ?”

 

छवि की आंखों में आंसू आ गए।

 

“हां… हमारी माँ।”

 

आर्यन कुछ बोल नहीं पाया।

 

छवि ने धीरे से कहा,

 

“मैं छवि हूं।”

 

आर्यन ने उसे देखा।

 

कुछ पल बाद उसके चेहरे पर हल्की मुस्कान आई।

 

“मेरी छोटी बहन?”

 

छवि ने सिर हिला दिया।

 

अगले ही पल आर्यन ने उसे गले लगा लिया।

 

दोनों की आंखों से आंसू बह रहे थे।

 

पंद्रह साल की दूरी कुछ ही सेकंड में खत्म हो गई।

 

आर्यन ने पूछा,

 

“माँ कैसी हैं?”

 

“कमजोर हो गई हैं।”

 

“मैंने उन्हें बहुत याद किया।”

 

“उन्होंने भी।”

 

आर्यन ने आंखें पोंछीं।

 

“मुझे लगा था शायद वो मुझे भूल गई होंगी।”

 

छवि ने मुस्कुराकर कहा,

 

“माँ आपको हर रक्षाबंधन याद करती थीं।”

 

आर्यन की नजर उसके हाथ में पकड़ी राखी पर पड़ी।

 

“ये किसके लिए है?”

 

छवि ने राखी आगे कर दी।

 

“आपके लिए।”

 

आर्यन ने अपनी कलाई आगे कर दी।

 

छवि ने राखी बांधते हुए कहा,

 

“मैं हर साल एक राखी खरीदती थी।”

 

आर्यन ने पूछा,

 

“क्यों?”

 

“क्योंकि मुझे विश्वास था कि एक दिन मेरा भाई मुझे जरूर मिलेगा।”

 

आर्यन की आंखों में आंसू आ गए।

 

उसने जेब से एक पुराना कागज निकाला।

 

“मैं भी हर साल एक राखी संभालकर रखता था।”

 

छवि ने हैरानी से पूछा,

 

“किसकी?”

 

आर्यन मुस्कुराया।

 

“तुम्हारी।”

 

“लेकिन मैंने तो आपको कोई राखी भेजी ही नहीं।”

 

“मुझे पता था।”

 

“फिर?”

 

आर्यन ने कहा,

 

“मैं बाजार से राखी खरीदता था और खुद से कहता था कि जब मेरी बहन मिलेगी, तब उसकी कलाई पर बांधूंगा।”

 

छवि कुछ बोल नहीं पाई।

 

दोनों भाई-बहन उसी दुकान के बाहर बैठ गए।

 

आर्यन ने कहा,

 

“तुम्हें बचपन की कुछ बातें याद हैं?”

 

छवि ने हंसकर कहा,

 

“बस इतना कि आप मेरी चॉकलेट चुरा लेते थे।”

 

आर्यन जोर से हंसा।

 

“अच्छा! ये याद है?”

 

“हां।”

 

“तो मैं मान गया कि तू सच में मेरी बहन है।”

 

छवि भी हंस पड़ी।

 

कुछ देर बाद दोनों माँ के पास लौटने के लिए निकल पड़े।

 

दरवाजा खुलते ही माँ की नजर आर्यन पर पड़ी।

 

वह कुछ सेकंड उसे देखती रहीं।

 

फिर उनकी आंखों से आंसू बह निकले।

 

“आर्यन…”

 

आर्यन उनके पैरों में बैठ गया।

 

“माँ… देर हो गई।”

 

माँ ने उसके सिर पर हाथ रखा।

 

“लेकिन तू आ गया।”

 

छवि एक तरफ खड़ी मुस्कुरा रही थी।

 

उसने देखा कि आर्यन की कलाई पर राखी चमक रही थी।

 

माँ ने पूछा,

 

“तूने राखी बांधी?”

 

छवि ने कहा,

 

“हां।”

 

आर्यन ने बहन की तरफ देखकर कहा,

 

“और इस बार ये राखी कभी नहीं उतारूंगा।”

 

छवि मुस्कुराई।

 

“भैया, राखी कुछ दिन बाद खुद टूट जाएगी।”

 

“तो?”

 

“नई बांध दूंगी।”

 

आर्यन ने कहा,

 

“हर साल?”

 

“हर साल।”

 

उस दिन छवि ने अपनी जिंदगी में पहली बार महसूस किया कि उसके पास सिर्फ एक भाई नहीं था।

 

उसके पास खोई हुई यादों का एक पूरा संसार वापस आ गया था।

 

रात को उसने अपनी पुरानी डायरी खोली और लिखा—

 

“आज मैंने एक अनजान इंसान की कलाई पर राखी बांधी थी। लेकिन राखी बंधते ही वह अनजान नहीं रहा। वह मेरा भाई बन गया।”

 

फिर उसने नीचे एक और लाइन लिखी—

 

“कभी-कभी रिश्ते जन्म से नहीं, पहचान से मिलते हैं… और कभी एक छोटी-सी राखी किसी खोए हुए रिश्ते को वापस घर ले आती है।”

 

अगली सुबह आर्यन ने छवि को आवाज दी।

 

“छोटी!”

 

छवि दौड़कर आई।

 

“क्या हुआ?”

 

आर्यन ने एक राखी उसके हाथ में रखी।

 

“अगली राखी के लिए इसे संभालकर रखना।”

 

छवि ने पूछा,

 

“इतनी जल्दी?”

 

  • आर्यन मुस्कुराया।

 

“अब मैं तुझे सिर्फ एक रक्षाबंधन का भाई नहीं बनना चाहता।”

 

छवि ने उसकी बात समझते हुए मुस्कुराकर कहा,

 

“फिर?”

 

आर्यन ने कहा,

 

“पूरी जिंदगी का भाई।”

 

छवि ने उसकी कलाई पकड़ ली।

 

“वादा?”

आर्यन ने कहा,

“वादा।”

 

और उस दिन एक बहन की बरसों पुरानी तलाश खत्म हुई।

 

उसकी राखी को आखिरकार अपनी कलाई मिल गई थी।

 

और एक भाई को…

 

अपनी बहन।

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