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मेरी बहन ने राखी नहीं खरीदी

पढ़ने का समय : 8 मिनट

 

मेरी बहन ने राखी क्यों नहीं खरीदी?

“माँ, इस साल दीदी ने मेरे लिए राखी खरीदी ही नहीं।”

 

रोहन ने यह बात थोड़ी नाराज़गी और थोड़े दुख के साथ कही।

 

माँ रसोई में खड़ी थीं। उन्होंने पलटकर अपने बेटे को देखा।

 

“तुझे कैसे पता?”

 

रोहन ने मोबाइल एक तरफ रखते हुए कहा,

 

“हर साल रक्षाबंधन से पहले वो मुझे फोन करके पूछती थी कि इस बार कौन-सी राखी पसंद है। इस बार उसने एक बार भी नहीं पूछा।”

 

माँ कुछ पल चुप रहीं।

 

“शायद व्यस्त होगी।”

 

रोहन ने तुरंत कहा,

 

“दीदी कभी इतनी व्यस्त नहीं होती कि राखी भूल जाए।”

 

उसकी आवाज में शिकायत थी।

 

दरअसल, रोहन और उसकी बड़ी बहन काव्या का रिश्ता बहुत खास था।

 

काव्या रोहन से सात साल बड़ी थी। बचपन से ही वह उसकी दूसरी माँ जैसी थी।

 

जब रोहन छोटा था, काव्या ही उसे स्कूल के लिए तैयार करती।

 

उसके जूते ढूंढती।

 

होमवर्क करवाती।

 

और जब वह रोता, तो माँ से पहले काव्या उसके पास पहुंचती।

 

लेकिन पिछले दो सालों में काव्या की शादी हो गई थी।

 

अब वह दूसरे शहर में रहती थी।

 

फिर भी हर रक्षाबंधन पर वह सबसे पहले घर आती थी।

 

रोहन हमेशा उसका इंतजार करता।

 

लेकिन इस बार…

 

रक्षाबंधन से तीन दिन पहले तक भी काव्या का कोई फोन नहीं आया था।

 

रोहन ने खुद भी उसे फोन नहीं किया।

 

उसने सोचा,

 

“अगर दीदी को याद होगा, तो खुद फोन करेंगी।”

 

लेकिन फोन नहीं आया।

 

अगले दिन भी नहीं।

 

रक्षाबंधन की सुबह रोहन देर तक सोता रहा।

 

माँ ने कई बार आवाज लगाई।

 

“रोहन, उठ जा बेटा।”

 

“नहीं उठना।”

 

“आज रक्षाबंधन है।”

 

“तो?”

 

माँ उसके पास बैठ गईं।

 

“तू नाराज़ है?”

 

रोहन ने करवट बदल ली।

 

“नहीं।”

 

माँ हल्का सा मुस्कुराईं।

 

“मुझे तो लग रहा है बहुत नाराज़ है।”

 

रोहन ने धीरे से कहा,

 

“दीदी भूल गईं।”

 

माँ ने उसकी पीठ पर हाथ रखा।

 

“हर बात के पीछे कोई वजह होती है।”

 

रोहन ने कहा,

 

“इस बार उनकी कोई वजह नहीं सुननी।”

 

माँ चुप हो गईं।

 

दोपहर हो गई।

 

रोहन बार-बार फोन देखने लगा।

 

लेकिन कोई कॉल नहीं।

 

शाम होने लगी।

 

तभी दरवाजे की घंटी बजी।

 

रोहन तेजी से उठा।

 

उसे लगा काव्या होगी।

 

लेकिन बाहर पड़ोस का एक बच्चा खड़ा था।

 

उसने रोहन को एक छोटा-सा लिफाफा दिया।

 

“ये आपके लिए है।”

 

रोहन ने पूछा,

 

“किसने दिया?”

 

बच्चा बोला,

 

“एक दीदी ने।”

 

रोहन ने तुरंत लिफाफा खोला।

 

अंदर एक छोटा-सा कागज था।

 

उस पर लिखा था—

 

“भैया, आज शाम 7 बजे पुराने पार्क में आ जाना। अकेले।”

 

नीचे लिखा था—

 

“तुम्हारी बहन।”

 

रोहन का गुस्सा अचानक कम होने लगा।

 

लेकिन उसने सोचा,

 

“अब याद आई राखी?”

 

माँ ने पूछा,

 

“कहां जा रहा है?”

 

रोहन ने कहा,

 

“थोड़ी देर में आता हूं।”

 

ठीक सात बजे वह पुराने पार्क पहुंच गया।

 

पार्क में हल्का अंधेरा था।

 

एक कोने में पीली रोशनी जल रही थी।

 

वहां एक बेंच पर काव्या बैठी थी।

 

रोहन को देखते ही वह खड़ी हो गई।

 

उसके चेहरे पर थकान थी।

 

रोहन उसके सामने जाकर रुक गया।

 

“अब याद आई मैं?”

 

काव्या मुस्कुराने की कोशिश करने लगी।

 

“तुझे कभी भूली थी क्या?”

 

“तो फोन क्यों नहीं किया?”

 

“काम था।”

 

रोहन नाराज़ हो गया।

 

“बस? इतनी बड़ी वजह?”

 

काव्या चुप रही।

 

“और राखी?”

 

रोहन ने पूछा।

 

काव्या ने अपने बैग की तरफ देखा।

 

“नहीं खरीदी।”

 

रोहन का दिल टूट गया।

 

“मतलब सच में भूल गईं?”

 

काव्या ने धीरे से कहा,

 

“नहीं।”

 

“तो?”

 

उसने बैग से एक छोटा-सा कपड़े का टुकड़ा निकाला।

 

उस पर लाल धागे से कुछ बनाया गया था।

 

रोहन ने ध्यान से देखा।

 

वह राखी थी।

 

बहुत साधारण।

 

धागे से बनी हुई।

 

बीच में छोटे-छोटे मोती लगे थे।

 

रोहन ने पूछा,

 

“ये आपने बनाई है?”

 

काव्या ने सिर हिलाया।

 

“हां।”

 

“लेकिन आप तो हमेशा बाजार से सबसे सुंदर राखी लाती थीं।”

 

काव्या की आंखें नम हो गईं।

 

“इस बार बाजार जाने का समय नहीं मिला।”

 

रोहन चुप हो गया।

 

फिर उसने पूछा,

 

“क्यों?”

 

काव्या ने बैग से एक और चीज निकाली।

 

एक छोटा-सा अस्पताल का बिल।

 

रोहन ने उसे देखा।

 

“ये किसका है?”

 

काव्या ने कहा,

 

“मेरा नहीं।”

 

“फिर किसका?”

 

“माँ का।”

 

रोहन का चेहरा बदल गया।

 

“माँ?”

 

“कुछ दिनों पहले उनकी तबीयत खराब हुई थी। उन्होंने तुझसे छिपाया क्योंकि तेरी परीक्षाएं थीं।”

 

रोहन स्तब्ध रह गया।

 

“लेकिन आपने मुझे क्यों नहीं बताया?”

 

काव्या ने कहा,

 

“क्योंकि तू परेशान हो जाता।”

 

रोहन को अचानक याद आया।

 

पिछले कई दिनों से माँ उससे कह रही थीं—

 

“तू अपनी पढ़ाई पर ध्यान दे।”

 

अब उसे सब समझ आने लगा।

 

काव्या ने कहा,

 

“मैं पिछले तीन दिनों से शहर में थी। माँ के इलाज और बाकी काम में लगी थी।”

 

रोहन की आंखें भर आईं।

 

“और आपने मुझे बताया भी नहीं।”

 

काव्या मुस्कुराई।

 

“बड़ी बहन होने की एक बीमारी होती है।”

 

“क्या?”

 

“छोटे भाई को परेशान नहीं होने देती।”

 

रोहन ने धीरे से कहा,

 

“लेकिन मैं अब छोटा नहीं हूं, दीदी।”

 

काव्या की आंखों से आंसू निकल आए।

 

“मेरे लिए हमेशा रहेगा।”

 

रोहन चुप हो गया।

 

काव्या ने राखी उठाई।

 

“बांध दूं?”

 

रोहन ने तुरंत अपनी कलाई आगे कर दी।

 

काव्या के हाथ कांप रहे थे।

 

राखी बांधते हुए उसने कहा,

 

“मुझे लगा था इस बार शायद तू मुझसे नाराज़ रहेगा।”

 

रोहन ने धीरे से कहा,

 

“था।”

 

“अब?”

 

“अब भी हूं।”

 

काव्या उसे देखने लगी।

 

रोहन ने पहली बार मुस्कुराते हुए कहा,

 

“क्योंकि आपने मुझे इतना बड़ा समझा ही नहीं कि सच बता सकें।”

 

काव्या की आंखों में आंसू के साथ मुस्कान आ गई।

 

“तो माफ कर दे।”

 

रोहन ने कहा,

 

“एक शर्त पर।”

 

“क्या?”

 

“अगली बार कुछ भी हो, मुझसे छिपाना नहीं।”

 

काव्या ने उसकी तरफ देखा।

 

“ठीक है।”

 

रोहन ने कहा,

 

“वादा?”

 

काव्या ने अपनी उंगली आगे की।

 

“वादा।”

 

रोहन ने अचानक पूछा,

 

“दीदी, आपने मेरे लिए कोई गिफ्ट नहीं खरीदा?”

 

काव्या ने मुस्कुराकर कहा,

 

“इस बार नहीं।”

 

रोहन ने बनावटी दुख दिखाया।

 

“वाह! राखी भी हाथ से बनी और गिफ्ट भी नहीं।”

 

काव्या हंस पड़ी।

 

“बहुत बुरे भाई हो तुम।”

 

“और आप बहुत बुरी बहन हैं।”

 

दोनों कुछ सेकंड चुप रहे।

 

फिर अचानक रोहन ने अपनी बहन को गले लगा लिया।

 

“मुझे कुछ नहीं चाहिए दीदी।”

 

काव्या ने उसके सिर पर हाथ रखा।

 

“सच?”

 

“हां।”

 

रोहन ने उसकी कलाई पर बंधी राखी को छुआ।

 

“बस अगली बार मुझे भूलना मत।”

 

काव्या ने धीरे से कहा,

 

“तू मेरे लिए सांस लेने जैसा है। कोई अपनी सांस भूल सकता है क्या?”

 

रोहन की आंखें फिर भर आईं।

 

कुछ देर बाद दोनों घर लौट आए।

 

माँ दरवाजे पर खड़ी थीं।

 

रोहन ने उन्हें देखते ही कहा,

 

“माँ, आप दोनों ने मुझे बच्चा समझ रखा है क्या?”

 

माँ और काव्या एक-दूसरे को देखने लगीं।

 

माँ ने पूछा,

 

“तुझे पता चल गया?”

 

रोहन ने कहा,

 

“हां।”

 

फिर वह माँ के पास गया।

 

“अगली बार मुझसे कुछ छिपाया तो मैं सच में नाराज़ हो जाऊंगा।”

 

माँ ने उसके सिर पर हाथ रखा।

 

“अब नहीं छिपाएंगे।”

 

रोहन ने मुस्कुराकर कहा,

 

“पक्का?”

 

माँ ने कहा,

 

“पक्का।”

 

उस रात रोहन अपने कमरे में बैठा अपनी कलाई की तरफ देख रहा था।

 

वह राखी बहुत साधारण थी।

 

न उसमें सोने की चमक थी।

 

न महंगे पत्थर।

 

न बाजार जैसी सजावट।

 

लेकिन रोहन को लगा कि उसने जिंदगी की सबसे कीमती राखी पहनी है।

 

क्योंकि उस राखी को खरीदने के लिए बहन के पास समय नहीं था…

 

लेकिन भाई के लिए अपने हाथों से बनाने का प्यार जरूर था।

 

अगले दिन काव्या वापस अपने घर जाने लगी।

 

रोहन ने दरवाजे पर उसे रोक लिया।

 

“दीदी!”

 

“हां?”

 

उसने कहा,

 

“अगले साल मुझे कौन-सी राखी बांधोगी?”

 

काव्या मुस्कुराई।

 

“तुझे कौन-सी चाहिए?”

 

रोहन ने अपनी कलाई पर बंधी राखी को देखते हुए कहा,

 

“ऐसी ही।”

 

“इतनी साधारण?”

 

रोहन ने सिर हिलाया।

 

“नहीं।”

 

काव्या ने पूछा,

 

“फिर कैसी?”

 

रोहन ने कहा,

 

“जिसे बनाने में बाजार के पैसे नहीं, मेरी बहन का दिल लगा हो।”

 

काव्या कुछ नहीं बोली।

 

बस मुस्कुराई और अपने भाई के सिर पर हाथ रख दिया।

 

और उस दिन रोहन को समझ आया—

 

हर राखी की कीमत उसके धागे से नहीं होती।

 

कुछ राखियां इसलिए सबसे कीमती होती हैं…

 

क्योंकि उन्हें बांधने वाला इंसान हमें बिना बताए भी हमारी फिक्र करता रहता है।

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