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बहन ने राखी तो बाँधी… लेकिन भाई की कलाई हमेशा के लिए खाली रह गई”

पढ़ने का समय : 5 मिनट

रक्षाबंधन की सुबह थी।

 

पूरे शहर में खुशियों का माहौल था। कहीं बहनें अपने भाइयों के लिए राखियाँ खरीद रही थीं, तो कहीं भाई अपनी बहनों के लिए मिठाई और उपहार लेकर घर लौट रहे थे।

 

लेकिन शहर के एक छोटे-से मोहल्ले में 24 साल की नंदिनी खिड़की के पास बैठी थी।

 

उसके हाथ में एक राखी थी।

 

वही राखी, जो उसने पिछले साल अपने भाई आकाश के लिए खरीदी थी।

 

आकाश अब इस दुनिया में नहीं था।

 

नंदिनी की आँखें राखी पर टिकी थीं और होंठों पर एक हल्की-सी मुस्कान थी।

 

“तू होता ना आकाश… तो आज फिर मुझे चिढ़ाता कि इतनी महंगी राखी क्यों लाई?”

 

आँखों से आँसू निकल पड़े।

 

चार साल पहले तक नंदिनी और आकाश का रिश्ता बिल्कुल सामान्य भाई-बहन जैसा था।

 

दोनों हर छोटी बात पर लड़ते थे।

 

आकाश नंदिनी की चॉकलेट खा जाता था।

 

नंदिनी उसकी किताबें छुपा देती थी।

 

आकाश कहता—

 

“तुम्हारी शादी हो जाएगी ना, तब देखना… तुम्हें तुम्हारा भाई याद आएगा।”

 

नंदिनी हँसकर कहती—

 

“पहले खुद कमाना सीख ले, फिर मेरी रक्षा करना।”

 

आकाश मुस्कुरा देता।

 

“पैसे नहीं होंगे तो क्या हुआ… जान तो है ना।”

 

नंदिनी तब हँस देती थी।

 

उसे क्या पता था कि एक दिन यही शब्द उसकी जिंदगी का सबसे बड़ा दर्द बन जाएंगे।

 

आकाश पढ़ाई में बहुत अच्छा था।

 

उसका सपना था कि वह सरकारी नौकरी करेगा और अपनी माँ और बहन को एक अच्छा घर देगा।

 

पिता पहले ही गुजर चुके थे।

 

घर की जिम्मेदारी धीरे-धीरे आकाश के कंधों पर आ गई थी।

 

दिन में पढ़ाई और रात में एक छोटी-सी दुकान पर काम।

 

कई बार नंदिनी कहती—

 

“भैया, इतनी मेहनत मत किया करो। थोड़ा आराम भी कर लिया करो।”

 

आकाश हँसकर जवाब देता—

 

“आराम गरीबों के लिए नहीं होता पगली… पहले जिंदगी बदलेंगे, फिर आराम करेंगे।”

 

रक्षाबंधन का दिन आया।

 

नंदिनी ने आकाश के लिए राखी बाँधी।

 

आकाश ने जेब से एक छोटा-सा डिब्बा निकाला।

 

“ये तेरे लिए।”

 

नंदिनी ने डिब्बा खोला।

 

अंदर एक छोटी-सी चाँदी की अंगूठी थी।

 

नंदिनी की आँखें चमक उठीं।

 

“इतने पैसे कहाँ से आए?”

 

आकाश ने मजाक में कहा—

 

“चोरी की है।”

 

“सच बताओ।”

 

आकाश कुछ पल चुप रहा।

 

फिर बोला—

 

“दो महीने से रोज दो घंटे ज्यादा काम कर रहा था।”

 

नंदिनी ने अंगूठी वापस करने की कोशिश की।

 

“मुझे नहीं चाहिए।”

 

आकाश ने उसका हाथ पकड़ लिया।

 

“बहन को दिया हुआ तोहफा वापस नहीं लेते।”

 

फिर उसने धीरे से कहा—

 

“और हाँ… एक वादा कर।”

 

“क्या?”

 

“तू अपनी पढ़ाई कभी मत छोड़ना।”

 

नंदिनी ने हँसते हुए कहा—

 

“ठीक है।”

 

आकाश बोला—

 

“नहीं। राखी की कसम खा।”

 

नंदिनी ने उसकी कलाई पकड़कर कहा—

 

“राखी की कसम… मैं पढ़ाई नहीं छोड़ूँगी।”

 

अगले कुछ महीने सब ठीक चला।

 

फिर एक रात आकाश दुकान से घर लौट रहा था।

 

बारिश बहुत तेज थी।

 

सड़क पर एक तेज रफ्तार ट्रक आया।

 

एक पल…

 

बस एक पल…

 

और आकाश की जिंदगी खत्म हो गई।

 

घर का दरवाजा खुला।

 

लोगों की भीड़ थी।

 

माँ चीख रही थीं।

 

नंदिनी पत्थर बनकर खड़ी थी।

 

उसे यकीन ही नहीं हो रहा था।

 

उसने आकाश का हाथ पकड़ा।

 

कलाई पर पिछले रक्षाबंधन की राखी अभी भी बंधी हुई थी।

 

नंदिनी फूट-फूटकर रो पड़ी।

 

“भैया उठो ना…”

 

कोई जवाब नहीं आया।

 

“तुमने कहा था ना… तुम मेरी रक्षा करोगे…”

 

फिर भी कोई जवाब नहीं आया।

 

उस दिन के बाद नंदिनी की जिंदगी बदल गई।

 

उसने पढ़ाई छोड़ने का फैसला कर लिया।

 

उसे लगा अब जीने का कोई मतलब नहीं।

 

लेकिन एक रात उसे आकाश की अलमारी से एक डायरी मिली।

 

डायरी के आखिरी पन्ने पर लिखा था—

 

“अगर मैं कभी तेरे साथ नहीं रहूँ, तो रोना मत। बस इतना याद रखना कि तेरे सपने अब मेरी जिम्मेदारी हैं।”

 

नंदिनी की आँखों से आँसू बहने लगे।

 

नीचे एक और लाइन लिखी थी—

 

“जिस दिन तू अपने पैरों पर खड़ी हो जाएगी, उस दिन समझूँगा कि मैंने अपनी बहन की रक्षा कर दी।”

 

नंदिनी ने डायरी सीने से लगा ली।

 

अगले दिन से उसने फिर पढ़ाई शुरू कर दी।

 

लोग बातें करते रहे।

 

“लड़की है, कितना पढ़ेगी?”

 

“अब घर संभालना चाहिए।”

 

“भाई भी नहीं है… कौन सहारा देगा?”

 

नंदिनी हर बात सुनती।

 

और चुपचाप पढ़ती रहती।

 

दिन में कॉलेज।

 

शाम को बच्चों को ट्यूशन।

 

रात में पढ़ाई।

 

कई बार भूखी सोई।

 

कई बार फीस भरने के पैसे नहीं थे।

 

लेकिन उसने हार नहीं मानी।

 

तीन साल बाद उसका सरकारी नौकरी में चयन हो गया।

 

जिस दिन नियुक्ति पत्र उसके हाथ में आया, वह सीधे आकाश की तस्वीर के सामने गई।

 

उसने तस्वीर के पास एक राखी रखी।

 

और बोली—

 

“भैया… आज मैंने अपना वादा पूरा कर दिया।”

 

उसकी माँ पीछे खड़ी रो रही थीं।

 

नंदिनी मुस्कुराई।

 

“अब मुझे किसी की दया नहीं चाहिए माँ। भैया ने सिखाया था कि जिंदगी चाहे कितनी भी दर्द दे… इंसान को अपने सपनों से रिश्ता नहीं तोड़ना चाहिए।”

 

रक्षाबंधन फिर आया।

 

इस बार नंदिनी ने अपनी कलाई पर खुद राखी बाँधी।

 

लोगों ने पूछा—

 

“अपने हाथ पर राखी क्यों?”

 

वह मुस्कुराई।

 

“क्योंकि अब मुझे अपने सपनों की रक्षा खुद करनी है।”

 

उस दिन उसे समझ आया—

 

राखी सिर्फ भाई की कलाई पर बंधा धागा नहीं होती।

 

वह एक वादा होती है।

 

और कभी-कभी…

 

वह वादा किसी इंसान के चले जाने के बाद भी जिंदा रहता है।

 

सीख:

जिसे हम खो देते हैं, वह हमेशा हमारे साथ नहीं रहता… लेकिन उसकी कही हुई अच्छी बातें हमारे अंदर हमेशा जिंदा रह सकती हैं। जिंदगी कितनी भी मुश्किल क्यों न हो, अपने सपनों को मरने मत देना। क्योंकि आपकी सफलता ही कभी-कभी आपके अपनों के अधूरे सपनों को पूरा करती है।

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