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जीवनभर का भाई

पढ़ने का समय : 7 मिनट

जिसे राखी बांधी, वही जीवनभर का भाई बन गया

“दीदी, आप हर साल इस पेड़ के नीचे राखी लेकर क्यों बैठती हैं?”

 

बारह साल के छोटे से लड़के ने सृष्टि से पूछा।

 

सृष्टि ने सामने सड़क की तरफ देखा और हल्की-सी मुस्कान के साथ कहा,

 

“क्योंकि शायद किसी दिन मेरा भाई यहीं से गुजरे।”

 

लड़का हैरान होकर बोला,

 

“लेकिन आपने तो कहा था कि आपका कोई भाई नहीं है।”

 

सृष्टि ने अपनी हथेली में रखी राखी को देखा।

 

“हां… मेरा कोई भाई नहीं है।”

 

“फिर?”

 

सृष्टि कुछ पल चुप रही।

 

फिर बोली,

 

“हर भाई जन्म से नहीं मिलता।”

 

यह बात कहकर वह फिर सड़क की तरफ देखने लगी।

 

सृष्टि की उम्र चौबीस साल थी। वह एक छोटे से स्कूल में पढ़ाती थी। घर में उसकी माँ थीं और दोनों का जीवन साधारण था।

 

बचपन से सृष्टि का कोई भाई नहीं था।

 

रक्षाबंधन के दिन जब उसकी सहेलियां अपने भाइयों के लिए राखियां खरीदतीं, तो वह चुपचाप उनके साथ बाजार चली जाती।

 

एक बार उसकी माँ ने पूछा था,

 

“तुझे बुरा लगता है कि तेरा भाई नहीं है?”

 

सृष्टि ने मुस्कुराकर कहा था,

 

“नहीं माँ।”

 

लेकिन उसके कमरे में एक खाली डिब्बा था।

 

उस डिब्बे में वह हर साल एक राखी रखती थी।

 

उसका कहना था—

 

“किसी दिन कोई भाई जरूर मिलेगा।”

 

माँ उसकी बात सुनकर हंस देती थीं।

 

लेकिन सृष्टि सच में ऐसा मानती थी।

 

उस साल रक्षाबंधन से एक दिन पहले स्कूल से लौटते समय उसने सड़क किनारे एक युवक को बैठा देखा।

 

उसके कपड़े साधारण थे।

 

चेहरे पर थकान थी।

 

वह अपने हाथ में एक पुरानी तस्वीर पकड़े हुए था।

 

सृष्टि आगे बढ़ गई।

 

फिर अचानक उसके कदम रुक गए।

 

उस युवक की आंखों में आंसू थे।

 

सृष्टि वापस उसके पास गई।

 

“आप ठीक हैं?”

 

युवक ने जल्दी से तस्वीर छिपा ली।

 

“हां।”

 

“आपको देखकर नहीं लग रहा।”

 

युवक ने हल्की-सी हंसी के साथ कहा,

 

“कभी-कभी ठीक दिखने के लिए बस हां बोलना पड़ता है।”

 

सृष्टि चुप हो गई।

 

फिर उसने पूछा,

 

“कुछ मदद चाहिए?”

 

“नहीं।”

 

“पक्का?”

 

युवक ने सिर हिला दिया।

 

सृष्टि जाने लगी।

 

लेकिन तभी उसकी नजर जमीन पर गिरे कागज पर पड़ी।

 

वह एक अस्पताल की पर्ची थी।

 

उसने उसे उठाकर युवक को देते हुए कहा,

 

“आपका कागज गिर गया।”

 

युवक ने पर्ची ली।

 

फिर बोला,

 

“धन्यवाद।”

 

सृष्टि ने पूछा,

 

“घर कहां है आपका?”

 

उसने धीरे से कहा,

 

“अब कोई घर नहीं है।”

 

सृष्टि को उसकी बात अजीब लगी।

 

लेकिन उसने ज्यादा सवाल नहीं किए।

 

अगली सुबह रक्षाबंधन था।

 

सृष्टि हमेशा की तरह तैयार हुई।

 

उसने अपने डिब्बे से एक राखी निकाली।

 

फिर वही पेड़।

 

वही सड़क।

 

लेकिन इस बार वहां वही युवक बैठा था।

 

सृष्टि उसके पास गई।

 

“आप फिर यहां?”

 

वह बोला,

 

“शायद यहां बैठने से कुछ पुरानी बातें याद आती हैं।”

 

सृष्टि उसके पास बैठ गई।

 

कुछ देर दोनों चुप रहे।

 

फिर उसने पूछा,

 

“आपका नाम?”

 

“अमन।”

 

“मैं सृष्टि।”

 

अमन ने उसकी थाली की तरफ देखा।

 

“आज तो राखी है।”

 

“हां।”

 

“भाई कहां है?”

 

सृष्टि मुस्कुराई।

 

“पता नहीं।”

 

अमन ने हैरानी से पूछा,

 

“मतलब?”

 

सृष्टि ने कहा,

 

“मैं हर साल एक राखी खरीदती हूं।”

 

“किसके लिए?”

 

“जिसे अभी तक नहीं मिली।”

 

अमन कुछ पल उसे देखता रहा।

 

फिर उसकी नजर अपनी कलाई पर गई।

 

“तो आज भी किसी का इंतजार कर रही हो?”

 

सृष्टि ने कहा,

 

“शायद।”

 

अमन ने धीरे से कहा,

 

“अगर तुम्हें बुरा न लगे… तो क्या मैं एक बात पूछ सकता हूं?”

 

“पूछिए।”

 

“अगर कोई भाई खून से नहीं जुड़ा हो, तो क्या उसे राखी बांधी जा सकती है?”

 

सृष्टि ने पहली बार उसे ध्यान से देखा।

 

“क्यों नहीं?”

 

अमन ने धीरे से अपनी कलाई आगे कर दी।

 

सृष्टि के हाथ रुक गए।

 

“आप सच में?”

 

अमन ने मुस्कुराकर कहा,

 

“आज मेरे पास कोई नहीं है। शायद तुम्हारे पास भी नहीं।”

 

उसकी आवाज धीमी हो गई।

 

“तो क्यों न आज हम दोनों इस खालीपन को एक रिश्ता बना दें?”

 

सृष्टि की आंखें भर आईं।

 

उसने कहा,

 

“लेकिन भाई बनने के बाद निभाना भी पड़ेगा।”

 

अमन ने कहा,

 

“मैं निभाऊंगा।”

 

सृष्टि ने उसके माथे पर तिलक लगाया।

 

फिर धीरे से उसकी कलाई पर राखी बांध दी।

 

“आज से आप मेरे भाई।”

 

अमन ने कहा,

 

“और आज से तू मेरी बहन।”

 

सृष्टि मुस्कुराई।

 

लेकिन राखी बांधने के बाद उसकी नजर अमन के हाथ में रखी तस्वीर पर गई।

 

तस्वीर जमीन पर गिर गई थी।

 

सृष्टि ने उसे उठाया।

 

तस्वीर में एक महिला और एक छोटा बच्चा था।

 

उसने पूछा,

 

“ये कौन हैं?”

 

अमन कुछ पल चुप रहा।

 

फिर बोला,

 

“मेरी माँ और मैं।”

 

“कहां हैं वो?”

 

अमन की आंखें भर आईं।

 

“माँ अब नहीं हैं।”

 

सृष्टि धीरे से बोली,

 

“मुझे माफ कीजिए।”

 

अमन ने सिर हिलाया।

 

“कोई बात नहीं।”

 

कुछ देर बाद उसने कहा,

 

“मैं पिछले कई दिनों से अस्पताल के चक्कर लगा रहा था।”

 

सृष्टि ने पूछा,

 

“क्यों?”

 

अमन ने बताया कि उसकी माँ की पुरानी चीजों में एक पत्र मिला था, जिसमें लिखा था कि अमन की एक छोटी बहन थी, जो बचपन में परिवार की मुश्किल परिस्थितियों के कारण रिश्तेदारों के पास चली गई थी।

 

अमन सालों से उसे ढूंढ रहा था।

 

लेकिन उसे कोई सुराग नहीं मिला।

 

सृष्टि चुप हो गई।

 

अमन ने कहा,

 

“आज सोच रहा था कि शायद मैं कभी अपनी बहन को ढूंढ ही नहीं पाऊंगा।”

 

सृष्टि ने उसकी तरफ देखा।

 

“तो आपने उसे ढूंढना छोड़ दिया?”

 

अमन ने सिर हिलाया।

 

“नहीं।”

 

“फिर रो क्यों रहे थे?”

 

अमन मुस्कुराया।

 

“क्योंकि कभी-कभी उम्मीद भी थक जाती है।”

 

सृष्टि ने उसकी कलाई पर बंधी राखी को देखा।

 

“तो आज से उम्मीद अकेली नहीं है।”

 

अमन ने उसकी तरफ देखा।

 

“मतलब?”

 

“मतलब अब आपकी बहन आपको ढूंढने में मदद करेगी।”

 

अमन की आंखों में पहली बार चमक आई।

 

“सच?”

 

“भाई से वादा किया है।”

 

उस दिन से दोनों ने मिलकर अमन की बहन को ढूंढना शुरू किया।

 

कई पुराने पते।

 

पुराने रिश्तेदार।

 

पुराने कागज।

 

कई जगह निराशा मिली।

 

लेकिन सृष्टि हर बार कहती,

 

“भैया, अभी हार नहीं मानेंगे।”

 

अमन मुस्कुराता।

 

“तू मुझे सच में भाई मानने लगी है?”

 

सृष्टि कहती,

 

“राखी बांध दी है, अब वापस नहीं ले सकती।”

 

समय बीत गया।

 

एक दिन दोनों को आखिरकार एक पता मिला।

 

वे वहां पहुंचे।

 

दरवाजा खुला।

 

सामने लगभग बीस साल की एक लड़की खड़ी थी।

 

अमन के हाथ कांपने लगे।

 

उसके पास बचपन की एक तस्वीर थी।

 

लड़की ने तस्वीर देखी।

 

उसकी आंखें भर आईं।

 

“अमन भैया?”

 

अमन कुछ बोल नहीं पाया।

 

उसने बहन को गले लगा लिया।

 

सृष्टि कुछ दूर खड़ी मुस्कुरा रही थी।

 

उसकी आंखों से भी आंसू निकल रहे थे।

 

अमन की बहन ने पूछा,

 

“ये कौन हैं?”

 

अमन ने सृष्टि की तरफ देखा।

 

फिर कहा,

 

“ये?”

 

वह मुस्कुराया।

 

“ये मेरी बहन है।”

 

सृष्टि हंस पड़ी।

 

“एक नहीं, दो-दो बहनें?”

 

अमन ने कहा,

 

“शायद भगवान को लगा मैं बहुत अकेला हो गया था।”

 

उस रक्षाबंधन के कुछ महीने बाद फिर राखी आई।

 

इस बार सृष्टि के हाथ में राखी थी।

 

लेकिन वह पेड़ के नीचे अकेली नहीं बैठी थी।

 

उसके सामने अमन और उसकी असली बहन दोनों बैठे थे।

 

सृष्टि ने अमन की कलाई पर राखी बांधी।

 

अमन ने कहा,

 

“याद है तूने कहा था किसी दिन कोई भाई जरूर मिलेगा?”

 

सृष्टि मुस्कुराई।

 

“हां।”

 

“मिला?”

 

सृष्टि ने उसकी कलाई की तरफ देखा।

 

“मिल गया।”

 

अमन ने कहा,

 

“लेकिन मैं तेरा असली भाई नहीं हूं।”

 

सृष्टि ने धीरे से जवाब दिया,

 

“कुछ रिश्तों को असली साबित करने के लिए खून की जरूरत नहीं होती।”

 

अमन की आंखें नम हो गईं।

 

सृष्टि ने कहा,

 

“जरूरत होती है बस निभाने की।”

 

उस दिन उस पेड़ के नीचे सृष्टि का पुराना राखियों वाला डिब्बा भी रखा था।

 

लेकिन अब उसमें कोई नई राखी नहीं रखी गई।

 

क्योंकि जिस भाई का वह सालों से इंतजार कर रही थी…

 

वह आखिरकार उसे मिल गया था।

 

और वह रिश्ता खून से नहीं, एक राखी के धागे और निभाने के वादे से बना था।

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