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टैग: #दर्द#इंतजार

  • जीवनभर का भाई

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    जिसे राखी बांधी, वही जीवनभर का भाई बन गया

    “दीदी, आप हर साल इस पेड़ के नीचे राखी लेकर क्यों बैठती हैं?”

     

    बारह साल के छोटे से लड़के ने सृष्टि से पूछा।

     

    सृष्टि ने सामने सड़क की तरफ देखा और हल्की-सी मुस्कान के साथ कहा,

     

    “क्योंकि शायद किसी दिन मेरा भाई यहीं से गुजरे।”

     

    लड़का हैरान होकर बोला,

     

    “लेकिन आपने तो कहा था कि आपका कोई भाई नहीं है।”

     

    सृष्टि ने अपनी हथेली में रखी राखी को देखा।

     

    “हां… मेरा कोई भाई नहीं है।”

     

    “फिर?”

     

    सृष्टि कुछ पल चुप रही।

     

    फिर बोली,

     

    “हर भाई जन्म से नहीं मिलता।”

     

    यह बात कहकर वह फिर सड़क की तरफ देखने लगी।

     

    सृष्टि की उम्र चौबीस साल थी। वह एक छोटे से स्कूल में पढ़ाती थी। घर में उसकी माँ थीं और दोनों का जीवन साधारण था।

     

    बचपन से सृष्टि का कोई भाई नहीं था।

     

    रक्षाबंधन के दिन जब उसकी सहेलियां अपने भाइयों के लिए राखियां खरीदतीं, तो वह चुपचाप उनके साथ बाजार चली जाती।

     

    एक बार उसकी माँ ने पूछा था,

     

    “तुझे बुरा लगता है कि तेरा भाई नहीं है?”

     

    सृष्टि ने मुस्कुराकर कहा था,

     

    “नहीं माँ।”

     

    लेकिन उसके कमरे में एक खाली डिब्बा था।

     

    उस डिब्बे में वह हर साल एक राखी रखती थी।

     

    उसका कहना था—

     

    “किसी दिन कोई भाई जरूर मिलेगा।”

     

    माँ उसकी बात सुनकर हंस देती थीं।

     

    लेकिन सृष्टि सच में ऐसा मानती थी।

     

    उस साल रक्षाबंधन से एक दिन पहले स्कूल से लौटते समय उसने सड़क किनारे एक युवक को बैठा देखा।

     

    उसके कपड़े साधारण थे।

     

    चेहरे पर थकान थी।

     

    वह अपने हाथ में एक पुरानी तस्वीर पकड़े हुए था।

     

    सृष्टि आगे बढ़ गई।

     

    फिर अचानक उसके कदम रुक गए।

     

    उस युवक की आंखों में आंसू थे।

     

    सृष्टि वापस उसके पास गई।

     

    “आप ठीक हैं?”

     

    युवक ने जल्दी से तस्वीर छिपा ली।

     

    “हां।”

     

    “आपको देखकर नहीं लग रहा।”

     

    युवक ने हल्की-सी हंसी के साथ कहा,

     

    “कभी-कभी ठीक दिखने के लिए बस हां बोलना पड़ता है।”

     

    सृष्टि चुप हो गई।

     

    फिर उसने पूछा,

     

    “कुछ मदद चाहिए?”

     

    “नहीं।”

     

    “पक्का?”

     

    युवक ने सिर हिला दिया।

     

    सृष्टि जाने लगी।

     

    लेकिन तभी उसकी नजर जमीन पर गिरे कागज पर पड़ी।

     

    वह एक अस्पताल की पर्ची थी।

     

    उसने उसे उठाकर युवक को देते हुए कहा,

     

    “आपका कागज गिर गया।”

     

    युवक ने पर्ची ली।

     

    फिर बोला,

     

    “धन्यवाद।”

     

    सृष्टि ने पूछा,

     

    “घर कहां है आपका?”

     

    उसने धीरे से कहा,

     

    “अब कोई घर नहीं है।”

     

    सृष्टि को उसकी बात अजीब लगी।

     

    लेकिन उसने ज्यादा सवाल नहीं किए।

     

    अगली सुबह रक्षाबंधन था।

     

    सृष्टि हमेशा की तरह तैयार हुई।

     

    उसने अपने डिब्बे से एक राखी निकाली।

     

    फिर वही पेड़।

     

    वही सड़क।

     

    लेकिन इस बार वहां वही युवक बैठा था।

     

    सृष्टि उसके पास गई।

     

    “आप फिर यहां?”

     

    वह बोला,

     

    “शायद यहां बैठने से कुछ पुरानी बातें याद आती हैं।”

     

    सृष्टि उसके पास बैठ गई।

     

    कुछ देर दोनों चुप रहे।

     

    फिर उसने पूछा,

     

    “आपका नाम?”

     

    “अमन।”

     

    “मैं सृष्टि।”

     

    अमन ने उसकी थाली की तरफ देखा।

     

    “आज तो राखी है।”

     

    “हां।”

     

    “भाई कहां है?”

     

    सृष्टि मुस्कुराई।

     

    “पता नहीं।”

     

    अमन ने हैरानी से पूछा,

     

    “मतलब?”

     

    सृष्टि ने कहा,

     

    “मैं हर साल एक राखी खरीदती हूं।”

     

    “किसके लिए?”

     

    “जिसे अभी तक नहीं मिली।”

     

    अमन कुछ पल उसे देखता रहा।

     

    फिर उसकी नजर अपनी कलाई पर गई।

     

    “तो आज भी किसी का इंतजार कर रही हो?”

     

    सृष्टि ने कहा,

     

    “शायद।”

     

    अमन ने धीरे से कहा,

     

    “अगर तुम्हें बुरा न लगे… तो क्या मैं एक बात पूछ सकता हूं?”

     

    “पूछिए।”

     

    “अगर कोई भाई खून से नहीं जुड़ा हो, तो क्या उसे राखी बांधी जा सकती है?”

     

    सृष्टि ने पहली बार उसे ध्यान से देखा।

     

    “क्यों नहीं?”

     

    अमन ने धीरे से अपनी कलाई आगे कर दी।

     

    सृष्टि के हाथ रुक गए।

     

    “आप सच में?”

     

    अमन ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “आज मेरे पास कोई नहीं है। शायद तुम्हारे पास भी नहीं।”

     

    उसकी आवाज धीमी हो गई।

     

    “तो क्यों न आज हम दोनों इस खालीपन को एक रिश्ता बना दें?”

     

    सृष्टि की आंखें भर आईं।

     

    उसने कहा,

     

    “लेकिन भाई बनने के बाद निभाना भी पड़ेगा।”

     

    अमन ने कहा,

     

    “मैं निभाऊंगा।”

     

    सृष्टि ने उसके माथे पर तिलक लगाया।

     

    फिर धीरे से उसकी कलाई पर राखी बांध दी।

     

    “आज से आप मेरे भाई।”

     

    अमन ने कहा,

     

    “और आज से तू मेरी बहन।”

     

    सृष्टि मुस्कुराई।

     

    लेकिन राखी बांधने के बाद उसकी नजर अमन के हाथ में रखी तस्वीर पर गई।

     

    तस्वीर जमीन पर गिर गई थी।

     

    सृष्टि ने उसे उठाया।

     

    तस्वीर में एक महिला और एक छोटा बच्चा था।

     

    उसने पूछा,

     

    “ये कौन हैं?”

     

    अमन कुछ पल चुप रहा।

     

    फिर बोला,

     

    “मेरी माँ और मैं।”

     

    “कहां हैं वो?”

     

    अमन की आंखें भर आईं।

     

    “माँ अब नहीं हैं।”

     

    सृष्टि धीरे से बोली,

     

    “मुझे माफ कीजिए।”

     

    अमन ने सिर हिलाया।

     

    “कोई बात नहीं।”

     

    कुछ देर बाद उसने कहा,

     

    “मैं पिछले कई दिनों से अस्पताल के चक्कर लगा रहा था।”

     

    सृष्टि ने पूछा,

     

    “क्यों?”

     

    अमन ने बताया कि उसकी माँ की पुरानी चीजों में एक पत्र मिला था, जिसमें लिखा था कि अमन की एक छोटी बहन थी, जो बचपन में परिवार की मुश्किल परिस्थितियों के कारण रिश्तेदारों के पास चली गई थी।

     

    अमन सालों से उसे ढूंढ रहा था।

     

    लेकिन उसे कोई सुराग नहीं मिला।

     

    सृष्टि चुप हो गई।

     

    अमन ने कहा,

     

    “आज सोच रहा था कि शायद मैं कभी अपनी बहन को ढूंढ ही नहीं पाऊंगा।”

     

    सृष्टि ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तो आपने उसे ढूंढना छोड़ दिया?”

     

    अमन ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं।”

     

    “फिर रो क्यों रहे थे?”

     

    अमन मुस्कुराया।

     

    “क्योंकि कभी-कभी उम्मीद भी थक जाती है।”

     

    सृष्टि ने उसकी कलाई पर बंधी राखी को देखा।

     

    “तो आज से उम्मीद अकेली नहीं है।”

     

    अमन ने उसकी तरफ देखा।

     

    “मतलब?”

     

    “मतलब अब आपकी बहन आपको ढूंढने में मदद करेगी।”

     

    अमन की आंखों में पहली बार चमक आई।

     

    “सच?”

     

    “भाई से वादा किया है।”

     

    उस दिन से दोनों ने मिलकर अमन की बहन को ढूंढना शुरू किया।

     

    कई पुराने पते।

     

    पुराने रिश्तेदार।

     

    पुराने कागज।

     

    कई जगह निराशा मिली।

     

    लेकिन सृष्टि हर बार कहती,

     

    “भैया, अभी हार नहीं मानेंगे।”

     

    अमन मुस्कुराता।

     

    “तू मुझे सच में भाई मानने लगी है?”

     

    सृष्टि कहती,

     

    “राखी बांध दी है, अब वापस नहीं ले सकती।”

     

    समय बीत गया।

     

    एक दिन दोनों को आखिरकार एक पता मिला।

     

    वे वहां पहुंचे।

     

    दरवाजा खुला।

     

    सामने लगभग बीस साल की एक लड़की खड़ी थी।

     

    अमन के हाथ कांपने लगे।

     

    उसके पास बचपन की एक तस्वीर थी।

     

    लड़की ने तस्वीर देखी।

     

    उसकी आंखें भर आईं।

     

    “अमन भैया?”

     

    अमन कुछ बोल नहीं पाया।

     

    उसने बहन को गले लगा लिया।

     

    सृष्टि कुछ दूर खड़ी मुस्कुरा रही थी।

     

    उसकी आंखों से भी आंसू निकल रहे थे।

     

    अमन की बहन ने पूछा,

     

    “ये कौन हैं?”

     

    अमन ने सृष्टि की तरफ देखा।

     

    फिर कहा,

     

    “ये?”

     

    वह मुस्कुराया।

     

    “ये मेरी बहन है।”

     

    सृष्टि हंस पड़ी।

     

    “एक नहीं, दो-दो बहनें?”

     

    अमन ने कहा,

     

    “शायद भगवान को लगा मैं बहुत अकेला हो गया था।”

     

    उस रक्षाबंधन के कुछ महीने बाद फिर राखी आई।

     

    इस बार सृष्टि के हाथ में राखी थी।

     

    लेकिन वह पेड़ के नीचे अकेली नहीं बैठी थी।

     

    उसके सामने अमन और उसकी असली बहन दोनों बैठे थे।

     

    सृष्टि ने अमन की कलाई पर राखी बांधी।

     

    अमन ने कहा,

     

    “याद है तूने कहा था किसी दिन कोई भाई जरूर मिलेगा?”

     

    सृष्टि मुस्कुराई।

     

    “हां।”

     

    “मिला?”

     

    सृष्टि ने उसकी कलाई की तरफ देखा।

     

    “मिल गया।”

     

    अमन ने कहा,

     

    “लेकिन मैं तेरा असली भाई नहीं हूं।”

     

    सृष्टि ने धीरे से जवाब दिया,

     

    “कुछ रिश्तों को असली साबित करने के लिए खून की जरूरत नहीं होती।”

     

    अमन की आंखें नम हो गईं।

     

    सृष्टि ने कहा,

     

    “जरूरत होती है बस निभाने की।”

     

    उस दिन उस पेड़ के नीचे सृष्टि का पुराना राखियों वाला डिब्बा भी रखा था।

     

    लेकिन अब उसमें कोई नई राखी नहीं रखी गई।

     

    क्योंकि जिस भाई का वह सालों से इंतजार कर रही थी…

     

    वह आखिरकार उसे मिल गया था।

     

    और वह रिश्ता खून से नहीं, एक राखी के धागे और निभाने के वादे से बना था।

  • बिछड़ा भाई

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    राखी के दिन मिला बिछड़ा भाई

     

    “किसी ने सही कहा है… कुछ रिश्ते कितनी भी दूर चले जाएं, दिल उन्हें ढूंढ ही लेता है।”

     

    रेलवे स्टेशन की भीड़ में पायल एक छोटे-से बच्चे का हाथ पकड़े खड़ी थी। उसकी आंखें बार-बार प्लेटफॉर्म पर जा रही थीं।

     

    आज रक्षाबंधन था।

     

    वह अपनी माँ के साथ मायके जा रही थी, लेकिन उसके मन में त्योहार की खुशी से ज्यादा एक पुरानी कमी थी।

     

    उसका भाई समीर।

     

    पंद्रह साल पहले दोनों अलग हो गए थे।

     

    तब पायल सिर्फ सात साल की थी और समीर दस साल का।

     

    उनके पिता का एक छोटे शहर में किराने का कारोबार था। घर की हालत ठीक थी, लेकिन एक दिन अचानक पिता का निधन हो गया।

     

    घर पर कर्ज बढ़ता गया।

     

    माँ ने रिश्तेदारों की मदद से किसी तरह घर चलाने की कोशिश की।

     

    लेकिन उसी दौरान एक रिश्तेदार ने बच्चों को शहर के एक आश्रम में भेजने की बात कही।

     

    माँ मजबूर थीं।

     

    पायल को रिश्तेदारों के साथ भेज दिया गया और समीर को दूसरे शहर के एक बाल गृह में।

     

    माँ ने दोनों से कहा था,

     

    “कुछ दिन की बात है बेटा। हालात ठीक होते ही मैं तुम्हें वापस ले आऊंगी।”

     

    लेकिन हालात ठीक नहीं हुए।

     

    समय बीतता गया।

     

    पायल को माँ के साथ रहने का मौका मिल गया, लेकिन समीर का पता धीरे-धीरे खो गया।

     

    किसी ने कहा वह दूसरे शहर चला गया।

     

    किसी ने कहा उसे किसी परिवार ने गोद ले लिया।

     

    और फिर एक दिन…

     

    उसका नाम सिर्फ पुरानी याद बनकर रह गया।

     

    लेकिन पायल ने कभी उसे भुलाया नहीं।

     

    हर रक्षाबंधन पर वह एक राखी खरीदती।

     

    माँ से कहती,

     

    “जब भैया मिलेंगे ना, तब मैं सारी राखियां एक साथ बांधूंगी।”

     

    माँ की आंखों में आंसू आ जाते।

     

    लेकिन वह हमेशा कहतीं,

     

    “जरूर मिलेगा।”

     

    आज पंद्रह साल बाद पायल फिर मायके जा रही थी।

     

    उसके बैग में एक राखी थी।

     

    इस बार भी वही उम्मीद थी।

     

    ट्रेन स्टेशन पर पहुंची।

     

    पायल और उसकी माँ उतरकर बाहर जाने लगीं।

     

    तभी उसकी नजर सामने बैठे एक युवक पर पड़ी।

     

    वह लगभग पच्चीस साल का था।

     

    साधारण कपड़े, हाथ में छोटा बैग और चेहरे पर थकान।

     

    पायल कुछ कदम आगे बढ़ी।

     

    फिर अचानक रुक गई।

     

    उस युवक की कलाई पर एक पुराना निशान था।

     

    बचपन में समीर के हाथ पर भी ऐसा ही निशान था।

     

    पायल का दिल जोर से धड़कने लगा।

     

    वह धीरे-धीरे उसके पास गई।

     

    “माफ कीजिए… आपका नाम क्या है?”

     

    युवक ने उसकी तरफ देखा।

     

    “समीर।”

     

    पायल की आंखें फैल गईं।

     

    “क्या?”

     

    “समीर।”

     

    पायल की आंखों से आंसू निकल पड़े।

     

    उसने कांपती आवाज में पूछा,

     

    “आपकी बहन का नाम… पायल था?”

     

    युवक अचानक चुप हो गया।

     

    “आपको मेरा नाम कैसे पता?”

     

    पायल ने अपने बैग से एक पुरानी तस्वीर निकाली।

     

    तस्वीर में दो छोटे बच्चे खड़े थे।

     

    एक लड़की और एक लड़का।

     

    लड़के के हाथ में छोटी-सी लकड़ी की कार थी।

     

    समीर ने तस्वीर देखते ही उसे अपने हाथ में ले लिया।

     

    उसका चेहरा बदल गया।

     

    “ये…”

     

    पायल रोते हुए बोली,

     

    “ये मैं हूं।”

     

    समीर कुछ बोल नहीं पाया।

     

    फिर उसकी आंखों में पहचान की चमक आई।

     

    “पायल?”

     

    पायल ने सिर हिलाया।

     

    “भैया…”

     

    अगले ही पल दोनों एक-दूसरे से लिपट गए।

     

    पंद्रह साल की दूरी उस एक पल में जैसे खत्म हो गई।

     

    समीर रोते हुए कह रहा था,

     

    “मैंने तुझे बहुत ढूंढा था।”

     

    पायल ने कहा,

     

    “मैं भी।”

     

    “मुझे लगा तू मुझे भूल गई।”

     

    “मैं हर साल तुम्हारे लिए राखी खरीदती थी।”

     

    समीर ने उसकी तरफ देखा।

     

    “हर साल?”

     

    पायल ने अपने बैग से राखी निकाली।

     

    “आज भी।”

     

    समीर की आंखें भर आईं।

     

    उसने अपनी कलाई आगे कर दी।

     

    “तो बांध दे।”

     

    पायल ने स्टेशन के एक कोने में ही भाई की कलाई पर राखी बांध दी।

     

    उसके हाथ कांप रहे थे।

     

    “भैया… इतने सालों से ये राखी आपके लिए बची थी।”

     

    समीर ने राखी को देखते हुए कहा,

     

    “और मैं सोचता रहा कि शायद मुझे कोई याद भी नहीं करता।”

     

    पायल ने कहा,

     

    “माँ ने कभी आपको भुलाया नहीं।”

     

    समीर ने तुरंत पूछा,

     

    “माँ?”

     

    “वो मेरे साथ हैं।”

     

    समीर कुछ पल के लिए चुप हो गया।

     

    “क्या वो मुझे पहचानेंगी?”

     

    पायल ने उसकी तरफ देखा।

     

    “माँ तुम्हें भूल सकती हैं क्या?”

     

    कुछ देर बाद तीनों घर पहुंचे।

     

    दरवाजे पर माँ खड़ी थीं।

     

    पायल ने कुछ नहीं कहा।

     

    बस पीछे हट गई।

     

    समीर धीरे-धीरे आगे बढ़ा।

     

    “माँ…”

     

    माँ ने उसे देखा।

     

    पहले तो उन्हें विश्वास नहीं हुआ।

     

    फिर उनकी आंखों में आंसू आ गए।

     

    “समीर?”

     

    समीर घुटनों के बल बैठ गया।

     

    “माँ…”

     

    माँ ने उसे गले लगा लिया।

     

    तीनों रोते रहे।

     

    उस दिन घर में कोई बड़ी सजावट नहीं थी।

     

    कोई महंगी मिठाई नहीं थी।

     

    लेकिन घर में पंद्रह साल बाद एक ऐसी खुशी लौटी थी, जिसकी कीमत कोई नहीं लगा सकता था।

     

    शाम को पायल ने भाई से पूछा,

     

    “भैया, आप इतने साल कहां थे?”

     

    समीर ने धीरे-धीरे अपनी कहानी सुनाई।

     

    बाल गृह से उसे एक दूसरे शहर में काम सीखने के लिए भेज दिया गया था।

     

    वह बड़ा हुआ, काम करने लगा।

     

    कई बार उसने परिवार को ढूंढने की कोशिश की, लेकिन कोई सही पता नहीं मिला।

     

    कुछ साल पहले उसे पिता का पुराना शहर पता चला था।

     

    वह वहां गया भी था।

     

    लेकिन तब तक घर बिक चुका था।

     

    उसे लगा शायद सब लोग कहीं और चले गए।

     

    “फिर आज यहां कैसे?”

     

    पायल ने पूछा।

     

    समीर मुस्कुराया।

     

    “मैं अपनी पुरानी यादों के पीछे आया था।”

     

    “मतलब?”

     

    “आज रक्षाबंधन था। बचपन में तू कहती थी कि एक दिन मुझे बहुत बड़ी राखी बांधेगी।”

     

    पायल हंसते हुए रो पड़ी।

     

    “तो आज बांध दी।”

     

    समीर ने अपनी कलाई देखी।

     

    “हां… और शायद यही राखी मुझे यहां तक खींच लाई।”

     

    पायल ने कहा,

     

    “अब कहीं मत जाना।”

     

    समीर ने उसकी तरफ देखा।

     

    “नहीं जाऊंगा।”

     

    माँ ने दोनों को पास बुलाया।

     

    “एक बात कहूं?”

     

    दोनों ने उनकी तरफ देखा।

     

    माँ बोलीं,

     

    “मैंने इतने साल भगवान से सिर्फ एक चीज मांगी थी।”

     

    “क्या?”

     

    “रक्षाबंधन के दिन मेरी बेटी की राखी मेरे बेटे की कलाई पर देखना।”

     

    माँ ने दोनों के सिर पर हाथ रखा।

     

    उस रात पायल ने अपनी पुरानी राखियों का डिब्बा निकाला।

     

    उसमें पंद्रह राखियां थीं।

     

    हर साल की एक राखी।

     

    समीर ने डिब्बा देखा तो हैरान रह गया।

     

    “तूने ये सब संभालकर रखीं?”

     

    पायल मुस्कुराई।

     

    “मैंने कहा था ना… जब तुम मिलोगे, तब सारी राखियां एक साथ बांधूंगी।”

     

    समीर ने मजाक में कहा,

     

    “पंद्रह राखियां एक साथ बांधेगी तो मेरी कलाई टूट जाएगी।”

     

    पायल हंस पड़ी।

     

    “तो अगले पंद्रह साल तक धीरे-धीरे बांध दूंगी।”

     

    माँ भी हंसने लगीं।

     

    उस रात घर में बहुत सालों बाद भाई की आवाज गूंजी।

     

    पायल को लगा जैसे उसका बचपन वापस आ गया हो।

     

    वही भाई।

     

    वही हंसी।

     

    वही रिश्ता।

     

    बस वक्त बहुत आगे निकल चुका था।

     

    अगली सुबह समीर ने अपनी बहन से कहा,

     

    “पायल, एक बात समझ आई।”

     

    “क्या?”

     

    “रिश्ते खोते नहीं हैं।”

     

    “फिर?”

     

    “बस कभी-कभी उनसे मिलने में देर हो जाती है।”

     

    पायल ने उसकी कलाई पर बंधी राखी को देखा।

     

    “और कुछ राखियां रास्ता दिखाती रहती हैं।”

     

    समीर मुस्कुराया।

     

    उसने बहन के सिर पर हाथ रखा।

     

    “अब हर रक्षाबंधन पर मैं खुद तेरे सामने बैठूंगा।”

     

    पायल ने कहा,

     

    “वादा?”

     

    “वादा।”

     

    और इस बार उस वादे का गवाह कोई तस्वीर या पुरानी राखी नहीं थी।

     

    गवाह था…

     

    पंद्रह साल बाद मिला एक भाई, उसकी बहन की कलाई में बंधा प्यार और वह घर, जिसने आखिरकार अपने दोनों बच्चों को फिर से एक साथ देख लिया था।

  • सुनियना कि मुस्कान

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    सुनैना की मुस्कान

     

    सुनैना को बचपन से ही एक बात बार-बार समझाई जाती थ उसे मुस्कुराना नहीं है।

     

    जब भी उसके होंठों पर हल्की सी मुस्कान आती, उसकी दादी तुरंत उसे घूरकर कहतीं,

    “सुनैना! दांत मत दिखाया कर। तेरी मुस्कान इस घर के लिए अच्छी नहीं है।”

     

    सुनैना छोटी थी, इसलिए उसे समझ नहीं आता था कि उसकी मुस्कान से घर को क्या नुकसान हो सकता है।

     

    एक दिन वह आंगन में अपनी सहेली के साथ खेल रही थी। सहेली ने कोई मजेदार बात कही तो सुनैना जोर से हंस पड़ी।

     

    तभी दादी की आवाज आई,

    “कितनी बार कहा है तुझे, हंसना बंद कर!”

     

    सुनैना की हंसी अचानक रुक गई।

     

    वह चुपचाप नीचे देखने लगी।

     

    दादी उसके पास आईं और बोलीं,

    “जब भी तू हंसती है, घर में कोई न कोई परेशानी आ जाती है। याद नहीं पिछले साल तू ऐसे ही हंसी थी और उसी रात तेरे पिताजी का कारोबार बंद हो गया था?”

     

    सुनैना ने मासूमियत से पूछा,

    “लेकिन दादी, मेरी हंसी से पापा का कारोबार कैसे बंद हो सकता है?”

     

    दादी ने तुरंत कहा,

    “बहस मत कर। बड़ों की बात मानना सीख।”

     

    सुनैना चुप हो गई।

     

    उस दिन के बाद उसने अपने चेहरे से मुस्कान जैसे छीन ही ली।

     

    स्कूल में उसकी सहेलियां उसे हंसाने की कोशिश करतीं, लेकिन वह बस हल्का सा मुस्कुराकर रह जाती।

     

    एक दिन उसकी दोस्त रिया ने पूछा,

    “तू इतनी उदास क्यों रहती है? पहले तो तू सबसे ज्यादा हंसती थी।”

     

    सुनैना ने धीरे से कहा,

    “मुझे हंसने से मना किया गया है।”

     

    रिया हैरान होकर बोली,

    “किसने?”

     

    “घरवालों ने।”

     

    “क्यों?”

     

    सुनैना ने कुछ पल चुप रहने के बाद कहा,

    “उन्हें लगता है कि मेरी मुस्कान से घर में दरिद्रता आती है।”

     

    रिया कुछ पल उसे देखती रही।

     

    फिर उसने कहा,

    “सुनैना, अगर मुस्कुराने से गरीबी आती तो दुनिया का हर खुश इंसान गरीब होता।”

     

    सुनैना के पास इसका कोई जवाब नहीं था।

     

    घर में वैसे भी हालात अच्छे नहीं थे। उसके पिता रमेश की छोटी सी कपड़ों की दुकान थी, लेकिन पिछले कुछ महीनों से बिक्री कम हो गई थी। घर का खर्च चलाना मुश्किल हो रहा था।

     

    दादी हर परेशानी का कारण सुनैना को ही मानतीं।

     

    कभी घर में दूध कम पड़ जाता तो कहतीं,

    “सुबह-सुबह इसे हंसते देखा था, तभी से दिन खराब जा रहा है।”

     

    कभी बिजली का बिल ज्यादा आ जाता तो कहतीं,

    “इस लड़की की हंसी घर का सुख खा रही है।”

     

    सुनैना हर बार अपना चेहरा छिपा लेती।

     

    उसकी मां कमला सब सुनतीं, लेकिन कुछ नहीं कहतीं। उन्हें डर था कि अगर उन्होंने सुनैना का साथ दिया तो घर में झगड़ा हो जाएगा।

     

    एक दिन सुनैना की छोटी बहन बीमार पड़ गई।

     

    दादी ने फिर सुनैना को दोष देते हुए कहा,

    “कल शाम तू आंगन में खिलखिला रही थी न? देख लिया उसका नतीजा!”

     

    इस बार सुनैना की आंखों में आंसू आ गए।

     

    वह अपने कमरे में गई और पहली बार अपनी मां से बोली,

    “मां, क्या सच में मेरी मुस्कान इतनी बुरी है?”

     

    कमला का दिल भर आया।

     

    उन्होंने सुनैना को गले लगा लिया।

     

    “नहीं बेटा। तेरी मुस्कान बुरी नहीं है।”

     

    “तो फिर सब मुझे हंसने से क्यों रोकते हैं?”

     

    मां के पास कोई जवाब नहीं था।

     

    उन्होंने बस उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा,

    “कभी-कभी लोग डर के कारण ऐसी बातें मान लेते हैं, जिनका कोई सच नहीं होता।”

     

    सुनैना ने मां की तरफ देखा।

     

    “तो क्या मैं हंस सकती हूं?”

     

    कमला ने हल्की मुस्कान के साथ कहा,

    “जब दिल करे, हंस लेना।”

     

    उस रात बहुत दिनों बाद सुनैना अपने कमरे में आईने के सामने खड़ी हुई।

     

    उसने खुद को देखा और धीरे से मुस्कुराई।

     

    आईने में उसे कोई अशुभ लड़की नहीं दिखाई दी।

     

    उसे बस एक मासूम लड़की दिखाई दी, जो बहुत दिनों से अपनी खुशी छिपाकर जी रही थी।

     

    अगले दिन स्कूल में उसकी अध्यापिका ने घोषणा की कि स्कूल में बच्चों के लिए एक कहानी प्रतियोगिता होने वाली है।

     

    सुनैना ने भी अपना नाम लिखवा दिया।

     

    उसने ऐसी कहानी लिखी जिसमें एक चिड़िया को उड़ने से रोक दिया जाता था क्योंकि गांव वालों को लगता था कि उसके उड़ने से तूफान आ जाएगा।

     

    प्रतियोगिता के दिन सुनैना ने पूरी कहानी सबके सामने सुनाई।

     

    कहानी खत्म होते ही पूरा कमरा तालियों से गूंज उठा।

     

    सुनैना के चेहरे पर एक बड़ी सी मुस्कान आ गई।

     

    उसे उस पल पहली बार लगा कि उसकी मुस्कान किसी मुसीबत का कारण नहीं, बल्कि उसकी ताकत है।

     

    उसे प्रतियोगिता में पहला पुरस्कार मिला।

     

    लेकिन घर लौटते समय उसे डर लग रहा था।

     

    वह सोच रही थी कि दादी को पता चला तो क्या होगा?

     

    जब वह घर पहुंची तो देखा कि पिता दुकान से लौटे हुए थे।

     

    उनके हाथ में एक बड़ा डिब्बा था।

     

    पिता ने मुस्कुराकर कहा,

    “सुनैना, पता है आज क्या हुआ?”

     

    सुनैना चुप रही।

     

    “दुकान पर एक बड़े व्यापारी का ऑर्डर मिला है। इतना बड़ा कि अगले कई महीनों तक घर की चिंता नहीं रहेगी।”

     

    सुनैना की आंखें चमक उठीं।

     

    वह खुशी से मुस्कुराने लगी।

     

    दादी वहीं बैठी थीं।

     

    उन्होंने सुनैना को मुस्कुराते देखा तो तुरंत बोलीं,

    “बस! अब इसे मत हंसने देना। कहीं फिर—”

     

    इस बार रमेश ने पहली बार अपनी मां की बात रोक दी।

     

    “बस मां।”

     

    दादी चुप हो गईं।

     

    रमेश ने कहा,

    “मेरी दुकान कई दिनों से इसलिए खराब चल रही थी क्योंकि मैं गलत जगह माल खरीद रहा था। आज मुझे सही ग्राहक मिला है। इसका सुनैना की मुस्कान से कोई लेना-देना नहीं है।”

     

    दादी कुछ नहीं बोलीं।

     

    रमेश ने सुनैना की तरफ देखा।

     

    “और अगर मेरी बेटी की मुस्कान से घर में दरिद्रता आती है, तो आज पहली बार उसकी मुस्कान के साथ मेरे घर में खुशहाली क्यों आई?”

     

    कमला की आंखों में आंसू आ गए।

     

    सुनैना ने पिता को देखा और धीरे से पूछा,

    “पापा, क्या मैं अब खुलकर हंस सकती हूं?”

     

    रमेश ने मुस्कुराते हुए कहा,

    “बिल्कुल। और आज से कोई तुम्हें हंसने से नहीं रोकेगा।”

     

    सुनैना ने पहली बार पूरे मन से हंसा।

     

    उसकी हंसी पूरे आंगन में गूंज उठी।

     

    दादी उसे देखती रहीं।

     

    कुछ दिनों बाद दादी खुद सुनैना के पास आईं।

     

    उन्होंने धीमी आवाज में कहा,

    “बेटा… शायद मैं गलत थी।”

     

    सुनैना ने हैरानी से उनकी तरफ देखा।

     

    दादी बोलीं,

    “मेरी मां भी मुझे बचपन में यही कहा करती थी। मैंने कभी सोचा ही नहीं कि ये बात सच है या नहीं। बस डरती रही और वही डर तुझ पर डाल दिया।”

     

    सुनैना की आंखें भर आईं।

     

    उसने दादी का हाथ पकड़ लिया।

     

    “दादी, अब मुझे हंसने दोगी?”

     

    दादी की आंखों में भी मुस्कान आ गई।

     

    “हां बेटा… खूब हंस।”

     

    सुनैना खिलखिलाकर हंस पड़ी।

     

    उस दिन उस छोटे से घर में पहली बार किसी को डर नहीं लगा कि मुस्कान के साथ दरिद्रता आएगी।

     

    क्योंकि सब समझ चुके थे

     

    घर की खुशियां किसी की मुस्कान से नहीं जातीं।

    खुशियां तब चली जाती हैं, जब इंसान अंधविश्वास के डर से अपने ही घर की हंसी छीन लेता है।

     

    और सुनैना ने उसी दिन तय कर लिया कि अब वह अपनी मुस्कान कभी किसी डर के हवाले नहीं करेगी।