सुनैना की मुस्कान
सुनैना को बचपन से ही एक बात बार-बार समझाई जाती थ उसे मुस्कुराना नहीं है।
जब भी उसके होंठों पर हल्की सी मुस्कान आती, उसकी दादी तुरंत उसे घूरकर कहतीं,
“सुनैना! दांत मत दिखाया कर। तेरी मुस्कान इस घर के लिए अच्छी नहीं है।”
सुनैना छोटी थी, इसलिए उसे समझ नहीं आता था कि उसकी मुस्कान से घर को क्या नुकसान हो सकता है।
एक दिन वह आंगन में अपनी सहेली के साथ खेल रही थी। सहेली ने कोई मजेदार बात कही तो सुनैना जोर से हंस पड़ी।
तभी दादी की आवाज आई,
“कितनी बार कहा है तुझे, हंसना बंद कर!”
सुनैना की हंसी अचानक रुक गई।
वह चुपचाप नीचे देखने लगी।
दादी उसके पास आईं और बोलीं,
“जब भी तू हंसती है, घर में कोई न कोई परेशानी आ जाती है। याद नहीं पिछले साल तू ऐसे ही हंसी थी और उसी रात तेरे पिताजी का कारोबार बंद हो गया था?”
सुनैना ने मासूमियत से पूछा,
“लेकिन दादी, मेरी हंसी से पापा का कारोबार कैसे बंद हो सकता है?”
दादी ने तुरंत कहा,
“बहस मत कर। बड़ों की बात मानना सीख।”
सुनैना चुप हो गई।
उस दिन के बाद उसने अपने चेहरे से मुस्कान जैसे छीन ही ली।
स्कूल में उसकी सहेलियां उसे हंसाने की कोशिश करतीं, लेकिन वह बस हल्का सा मुस्कुराकर रह जाती।
एक दिन उसकी दोस्त रिया ने पूछा,
“तू इतनी उदास क्यों रहती है? पहले तो तू सबसे ज्यादा हंसती थी।”
सुनैना ने धीरे से कहा,
“मुझे हंसने से मना किया गया है।”
रिया हैरान होकर बोली,
“किसने?”
“घरवालों ने।”
“क्यों?”
सुनैना ने कुछ पल चुप रहने के बाद कहा,
“उन्हें लगता है कि मेरी मुस्कान से घर में दरिद्रता आती है।”
रिया कुछ पल उसे देखती रही।
फिर उसने कहा,
“सुनैना, अगर मुस्कुराने से गरीबी आती तो दुनिया का हर खुश इंसान गरीब होता।”
सुनैना के पास इसका कोई जवाब नहीं था।
घर में वैसे भी हालात अच्छे नहीं थे। उसके पिता रमेश की छोटी सी कपड़ों की दुकान थी, लेकिन पिछले कुछ महीनों से बिक्री कम हो गई थी। घर का खर्च चलाना मुश्किल हो रहा था।
दादी हर परेशानी का कारण सुनैना को ही मानतीं।
कभी घर में दूध कम पड़ जाता तो कहतीं,
“सुबह-सुबह इसे हंसते देखा था, तभी से दिन खराब जा रहा है।”
कभी बिजली का बिल ज्यादा आ जाता तो कहतीं,
“इस लड़की की हंसी घर का सुख खा रही है।”
सुनैना हर बार अपना चेहरा छिपा लेती।
उसकी मां कमला सब सुनतीं, लेकिन कुछ नहीं कहतीं। उन्हें डर था कि अगर उन्होंने सुनैना का साथ दिया तो घर में झगड़ा हो जाएगा।
एक दिन सुनैना की छोटी बहन बीमार पड़ गई।
दादी ने फिर सुनैना को दोष देते हुए कहा,
“कल शाम तू आंगन में खिलखिला रही थी न? देख लिया उसका नतीजा!”
इस बार सुनैना की आंखों में आंसू आ गए।
वह अपने कमरे में गई और पहली बार अपनी मां से बोली,
“मां, क्या सच में मेरी मुस्कान इतनी बुरी है?”
कमला का दिल भर आया।
उन्होंने सुनैना को गले लगा लिया।
“नहीं बेटा। तेरी मुस्कान बुरी नहीं है।”
“तो फिर सब मुझे हंसने से क्यों रोकते हैं?”
मां के पास कोई जवाब नहीं था।
उन्होंने बस उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा,
“कभी-कभी लोग डर के कारण ऐसी बातें मान लेते हैं, जिनका कोई सच नहीं होता।”
सुनैना ने मां की तरफ देखा।
“तो क्या मैं हंस सकती हूं?”
कमला ने हल्की मुस्कान के साथ कहा,
“जब दिल करे, हंस लेना।”
उस रात बहुत दिनों बाद सुनैना अपने कमरे में आईने के सामने खड़ी हुई।
उसने खुद को देखा और धीरे से मुस्कुराई।
आईने में उसे कोई अशुभ लड़की नहीं दिखाई दी।
उसे बस एक मासूम लड़की दिखाई दी, जो बहुत दिनों से अपनी खुशी छिपाकर जी रही थी।
अगले दिन स्कूल में उसकी अध्यापिका ने घोषणा की कि स्कूल में बच्चों के लिए एक कहानी प्रतियोगिता होने वाली है।
सुनैना ने भी अपना नाम लिखवा दिया।
उसने ऐसी कहानी लिखी जिसमें एक चिड़िया को उड़ने से रोक दिया जाता था क्योंकि गांव वालों को लगता था कि उसके उड़ने से तूफान आ जाएगा।
प्रतियोगिता के दिन सुनैना ने पूरी कहानी सबके सामने सुनाई।
कहानी खत्म होते ही पूरा कमरा तालियों से गूंज उठा।
सुनैना के चेहरे पर एक बड़ी सी मुस्कान आ गई।
उसे उस पल पहली बार लगा कि उसकी मुस्कान किसी मुसीबत का कारण नहीं, बल्कि उसकी ताकत है।
उसे प्रतियोगिता में पहला पुरस्कार मिला।
लेकिन घर लौटते समय उसे डर लग रहा था।
वह सोच रही थी कि दादी को पता चला तो क्या होगा?
जब वह घर पहुंची तो देखा कि पिता दुकान से लौटे हुए थे।
उनके हाथ में एक बड़ा डिब्बा था।
पिता ने मुस्कुराकर कहा,
“सुनैना, पता है आज क्या हुआ?”
सुनैना चुप रही।
“दुकान पर एक बड़े व्यापारी का ऑर्डर मिला है। इतना बड़ा कि अगले कई महीनों तक घर की चिंता नहीं रहेगी।”
सुनैना की आंखें चमक उठीं।
वह खुशी से मुस्कुराने लगी।
दादी वहीं बैठी थीं।
उन्होंने सुनैना को मुस्कुराते देखा तो तुरंत बोलीं,
“बस! अब इसे मत हंसने देना। कहीं फिर—”
इस बार रमेश ने पहली बार अपनी मां की बात रोक दी।
“बस मां।”
दादी चुप हो गईं।
रमेश ने कहा,
“मेरी दुकान कई दिनों से इसलिए खराब चल रही थी क्योंकि मैं गलत जगह माल खरीद रहा था। आज मुझे सही ग्राहक मिला है। इसका सुनैना की मुस्कान से कोई लेना-देना नहीं है।”
दादी कुछ नहीं बोलीं।
रमेश ने सुनैना की तरफ देखा।
“और अगर मेरी बेटी की मुस्कान से घर में दरिद्रता आती है, तो आज पहली बार उसकी मुस्कान के साथ मेरे घर में खुशहाली क्यों आई?”
कमला की आंखों में आंसू आ गए।
सुनैना ने पिता को देखा और धीरे से पूछा,
“पापा, क्या मैं अब खुलकर हंस सकती हूं?”
रमेश ने मुस्कुराते हुए कहा,
“बिल्कुल। और आज से कोई तुम्हें हंसने से नहीं रोकेगा।”
सुनैना ने पहली बार पूरे मन से हंसा।
उसकी हंसी पूरे आंगन में गूंज उठी।
दादी उसे देखती रहीं।
कुछ दिनों बाद दादी खुद सुनैना के पास आईं।
उन्होंने धीमी आवाज में कहा,
“बेटा… शायद मैं गलत थी।”
सुनैना ने हैरानी से उनकी तरफ देखा।
दादी बोलीं,
“मेरी मां भी मुझे बचपन में यही कहा करती थी। मैंने कभी सोचा ही नहीं कि ये बात सच है या नहीं। बस डरती रही और वही डर तुझ पर डाल दिया।”
सुनैना की आंखें भर आईं।
उसने दादी का हाथ पकड़ लिया।
“दादी, अब मुझे हंसने दोगी?”
दादी की आंखों में भी मुस्कान आ गई।
“हां बेटा… खूब हंस।”
सुनैना खिलखिलाकर हंस पड़ी।
उस दिन उस छोटे से घर में पहली बार किसी को डर नहीं लगा कि मुस्कान के साथ दरिद्रता आएगी।
क्योंकि सब समझ चुके थे
घर की खुशियां किसी की मुस्कान से नहीं जातीं।
खुशियां तब चली जाती हैं, जब इंसान अंधविश्वास के डर से अपने ही घर की हंसी छीन लेता है।
और सुनैना ने उसी दिन तय कर लिया कि अब वह अपनी मुस्कान कभी किसी डर के हवाले नहीं करेगी।

मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं
अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं
प्रातिक्रिया दे