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राखी के साथ मिला अधूरा पत्र

पढ़ने का समय : 8 मिनट

 

राखी के साथ मिला भाई का अधूरा पत्र

रक्षाबंधन से एक दिन पहले काव्या अपने पुराने घर लौटी थी।

 

लगभग तीन साल बाद।

 

घर का दरवाजा खोलते ही उसे वही पुरानी खुशबू महसूस हुई। दीवारों पर लगी तस्वीरें, आंगन में रखा पुराना झूला और कोने में रखा लकड़ी का संदूक—सब कुछ वैसा ही था।

 

बस एक चीज बदल गई थी।

 

घर पहले जितना शोर वाला नहीं रहा था।

 

क्योंकि काव्या और उसके बड़े भाई रोहन के बीच पिछले तीन साल से ठीक से बात नहीं हुई थी।

 

एक ही शहर में रहने के बावजूद दोनों जैसे एक-दूसरे के लिए अजनबी बन गए थे।

 

माँ ने उसे देखकर कहा,

 

“आ गई बेटा?”

 

काव्या ने धीरे से माँ को गले लगाया।

 

“हां माँ।”

 

माँ की आंखों में खुशी थी।

 

“तूने कहा था इस बार नहीं आएगी।”

 

काव्या ने नजरें झुका लीं।

 

“सोचा… राखी है।”

 

माँ समझ गईं कि वह किसके लिए आई है।

 

उन्होंने धीरे से पूछा,

 

“रोहन से बात करेगी?”

 

काव्या ने कोई जवाब नहीं दिया।

 

रोहन अपने कमरे में था।

 

काव्या चाहती थी कि वह बाहर आए।

 

उससे कुछ कहे।

 

कम से कम इतना ही बोले—

 

“आ गई?”

 

लेकिन कई घंटे बीत गए।

 

रोहन बाहर नहीं आया।

 

काव्या को गुस्सा आने लगा।

 

“हमेशा की तरह।”

 

माँ ने पूछा,

 

“क्या?”

 

“कुछ नहीं।”

 

शाम को काव्या अपने पुराने कमरे में गई।

 

वहां सब कुछ लगभग वैसा ही था।

 

पुरानी किताबें।

 

कॉलेज की कुछ तस्वीरें।

 

एक कोने में रखा लकड़ी का डिब्बा।

 

काव्या ने उसे खोला।

 

अंदर उसकी बचपन की चीजें थीं।

 

पुराने कार्ड।

 

कुछ तस्वीरें।

 

और एक सफेद लिफाफा।

 

लिफाफे पर उसका नाम लिखा था—

 

“काव्या के लिए।”

 

उसने तुरंत पहचान लिया।

 

वह रोहन की लिखावट थी।

 

काव्या के हाथ कांपने लगे।

 

लिफाफा पुराना था।

 

उस पर धूल की हल्की परत थी।

 

उसने धीरे से खोलना शुरू किया।

 

अंदर एक पत्र था।

 

लेकिन पत्र अधूरा था।

 

उसमें लिखा था—

 

“काव्या, मुझे नहीं पता कि तू मुझसे कब तक नाराज रहेगी। लेकिन अगर कभी ये पत्र पढ़े तो बस इतना समझ लेना कि…”

 

उसके बाद कागज खाली था।

 

काव्या की आंखें भर आईं।

 

उसे तीन साल पुराना वह दिन याद आ गया।

 

उस दिन घर में बहुत बड़ा झगड़ा हुआ था।

 

काव्या को दूसरे शहर में नौकरी मिली थी।

 

वह बहुत खुश थी।

 

लेकिन रोहन ने कहा था,

 

“तू इतनी दूर अकेली नहीं जाएगी।”

 

काव्या को लगा कि भाई उस पर भरोसा नहीं करता।

 

उसने गुस्से में कहा,

 

“आपको हमेशा मेरी जिंदगी कंट्रोल करनी होती है।”

 

रोहन ने कहा,

 

“मैं सिर्फ चिंता कर रहा हूं।”

 

“मुझे आपकी चिंता नहीं चाहिए।”

 

ये शब्द रोहन को बहुत बुरे लगे थे।

 

उसने गुस्से में कहा,

 

“ठीक है, जो करना है कर।”

 

काव्या चली गई।

 

और उसके बाद दोनों के बीच दूरी बढ़ती चली गई।

 

फोन कम हुए।

 

बातें बंद हुईं।

 

फिर सिर्फ त्योहारों पर औपचारिक संदेश आने लगे।

 

“हैप्पी रक्षाबंधन।”

 

बस इतना।

 

काव्या पत्र को हाथ में लिए माँ के पास गई।

 

“माँ, ये पत्र?”

 

माँ का चेहरा बदल गया।

 

“तुझे कहां मिला?”

 

“मेरे कमरे में।”

 

माँ ने धीरे से कहा,

 

“रोहन ने लिखा था।”

 

“लेकिन पूरा क्यों नहीं किया?”

 

माँ की आंखें नम हो गईं।

 

“उस दिन तुम दोनों का झगड़ा हुआ था।”

 

काव्या चुप हो गई।

 

माँ बोलीं,

 

“उसके बाद वह कई बार तुझे फोन करना चाहता था।”

 

“तो किया क्यों नहीं?”

 

“शायद उसे लगा कि तू बात नहीं करना चाहती।”

 

काव्या ने पत्र को देखा।

 

“माँ, उसने ये अधूरा क्यों छोड़ दिया?”

 

माँ ने कहा,

 

“क्योंकि कभी-कभी इंसान को शब्द नहीं मिलते।”

 

काव्या की आंखों से आंसू निकल आए।

 

उस रात वह देर तक सो नहीं सकी।

 

उसे याद आने लगा कि बचपन में रोहन कैसा था।

 

जब वह स्कूल जाने से डरती थी तो रोहन उसका बैग उठाता था।

 

जब उसे गणित नहीं आती थी तो घंटों बैठकर पढ़ाता था।

 

जब कोई उसे परेशान करता तो सबसे पहले रोहन खड़ा होता।

 

और फिर वह एक दिन…

 

एक ही झगड़े में उसे अपना दुश्मन समझ बैठी थी।

 

अगली सुबह रक्षाबंधन था।

 

काव्या ने पूजा की थाली तैयार की।

 

उसने माँ से पूछा,

 

“रोहन उठ गया?”

 

माँ ने कहा,

 

“हां, बाहर बैठा है।”

 

काव्या के कदम रुक गए।

 

दिल तेजी से धड़कने लगा।

 

वह थाली लेकर बाहर गई।

 

रोहन सोफे पर बैठा था।

 

उसकी नजर काव्या पर पड़ी।

 

दोनों कुछ सेकंड तक चुप रहे।

 

रोहन ने धीरे से कहा,

 

“राखी बांधेगी?”

 

काव्या की आंखें भर आईं।

 

वह उसके सामने बैठ गई।

 

तिलक लगाया।

 

राखी उठाई।

 

लेकिन उसका हाथ कांप रहा था।

 

रोहन ने पूछा,

 

“क्या हुआ?”

 

काव्या ने धीरे से कहा,

 

“मुझे एक पत्र मिला।”

 

रोहन का चेहरा बदल गया।

 

“कौन-सा पत्र?”

 

काव्या ने अपने बैग से वह पत्र निकाला।

 

रोहन उसे देखते ही चुप हो गया।

 

काव्या ने पूछा,

 

“आपने इसे पूरा क्यों नहीं लिखा?”

 

रोहन ने नजरें झुका लीं।

 

“अब उस बात को छोड़ दे।”

 

“नहीं।”

 

काव्या की आंखों से आंसू निकल आए।

 

“आज जवाब चाहिए।”

 

रोहन कुछ देर चुप रहा।

 

फिर बोला,

 

“उस दिन मुझे बहुत गुस्सा आया था।”

 

“मुझे भी।”

 

“लेकिन उसके बाद…”

 

वह रुक गया।

 

“क्या?”

 

रोहन ने कहा,

 

“मुझे डर लगने लगा था।”

 

काव्या हैरान हुई।

 

“मुझसे?”

 

“नहीं।”

 

उसने धीरे से कहा,

 

“तुझे खोने से।”

 

काव्या की आंखें भर आईं।

 

रोहन ने कहा,

 

“तू दूर जा रही थी। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि कैसे कहूं कि मुझे तेरी चिंता है।”

 

“तो आपने गुस्सा क्यों किया?”

 

रोहन हल्का-सा हंस पड़ा।

 

“क्योंकि मैं समझदार भाई नहीं हूं।”

 

काव्या की आंखों से आंसू निकल आए।

 

“और मैं भी समझदार बहन नहीं थी।”

 

दोनों कुछ पल चुप रहे।

 

फिर काव्या ने पूछा,

 

“पत्र पूरा करोगे?”

 

रोहन ने उसे देखा।

 

“अभी?”

 

काव्या ने सिर हिलाया।

 

रोहन ने पत्र हाथ में लिया।

 

उसके आखिरी शब्द पढ़े—

 

“अगर कभी ये पत्र पढ़े तो बस इतना समझ लेना कि…”

 

वह रुक गया।

 

फिर काव्या की आंखों में देखकर बोला,

 

“…मैं तुझसे कभी नाराज नहीं था। मैं बस ये नहीं जानता था कि तुझे अपनी जिंदगी में कैसे रोकूं, बिना तेरी उड़ान रोके।”

 

काव्या रो पड़ी।

 

उसने राखी नीचे रख दी और भाई के गले लग गई।

 

रोहन ने कहा,

 

“अरे, राखी तो बांध।”

 

काव्या रोते हुए हंस पड़ी।

 

“पहले पांच मिनट ऐसे ही रहने दो।”

 

माँ दूर खड़ी रो रही थीं।

 

कुछ देर बाद काव्या फिर भाई के सामने बैठी।

 

उसने उसकी कलाई पर राखी बांधी।

 

फिर कहा,

 

“इस बार मुझे गिफ्ट नहीं चाहिए।”

 

रोहन ने पूछा,

 

“तो?”

 

काव्या ने अधूरा पत्र उसकी तरफ बढ़ाया।

 

“इसे संभालकर रखिए।”

 

“क्यों?”

 

“ताकि जब भी हम फिर से बेवकूफी में नाराज हों…”

 

रोहन हंस पड़ा।

 

“तो?”

 

“तो इसे पढ़ लें।”

 

रोहन ने कहा,

 

“ठीक है।”

 

काव्या ने पूछा,

 

“और अगर फिर भी गुस्सा रहा?”

 

रोहन ने कहा,

 

“तो तू राखी लेकर आ जाना।”

 

काव्या हंस पड़ी।

 

“हर समस्या का इलाज राखी?”

 

रोहन ने कहा,

 

“हमारे लिए तो हां।”

 

उस दिन दोनों ने साथ बैठकर खाना खाया।

 

तीन साल बाद घर में फिर से वही शोर था।

 

माँ बार-बार दोनों को देख रही थीं।

 

उन्हें विश्वास नहीं हो रहा था कि तीन साल की चुप्पी एक राखी के दिन खत्म हो सकती है।

 

शाम को काव्या वापस जाने लगी।

 

रोहन ने पूछा,

 

“कब आएगी?”

 

काव्या मुस्कुराई।

 

“फोन करूंगी।”

 

रोहन ने तुरंत कहा,

 

“फोन मत करना।”

 

काव्या हैरान हुई।

 

“क्यों?”

 

रोहन मुस्कुराया।

 

“सीधे आ जाना।”

 

काव्या हंस पड़ी।

 

“ठीक है।”

 

फिर उसने भाई की कलाई पर बंधी राखी को देखा।

 

वह साधारण-सी थी।

 

लेकिन इस बार उस राखी ने सिर्फ एक वादा नहीं बांधा था।

 

उसने तीन साल की नाराजगी खोल दी थी।

 

घर से बाहर निकलते समय काव्या ने पीछे मुड़कर देखा।

 

रोहन दरवाजे पर खड़ा था।

 

काव्या ने हाथ हिलाया।

 

रोहन ने कहा,

 

“काव्या!”

 

“क्या?”

 

रोहन ने मुस्कुराकर कहा,

 

“पत्र पूरा हो गया।”

 

काव्या की आंखें नम हो गईं।

 

वह मुस्कुराई और बोली,

 

“हां भैया।”

 

उस दिन काव्या को समझ आया कि—

 

कुछ रिश्ते टूटते नहीं हैं, बस बातों के बीच चुप्पी जमा हो जाती है।

 

और कभी-कभी…

 

उसे हटाने के लिए बस एक राखी, एक गले लगना और कुछ सच्चे शब्द काफी होते हैं।

 

क्योंकि रक्षाबंधन सिर्फ कलाई पर धागा बांधने का दिन नहीं है।

 

यह उन रिश्तों को फिर से जोड़ने का दिन भी है, जिनमें प्यार तो होता है… लेकिन बातें अधूरी रह जाती हैं।

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