जिसे मैंने पहली बार राखी बांधी
अनुष्का को बचपन से रक्षाबंधन का त्योहार बहुत पसंद था।
रक्षाबंधन आने से कई दिन पहले ही वह बाजार जाने की जिद करने लगती थी।
“माँ, इस बार सबसे सुंदर राखी लूंगी।”
माँ मुस्कुराकर कहतीं,
“इतनी तैयारी किसके लिए?”
अनुष्का तुरंत जवाब देती,
“मेरे भाई के लिए।”
उसका बड़ा भाई रवि उससे चार साल बड़ा था।
दोनों बचपन से बहुत करीब थे।
रवि उसे चिढ़ाता था।
उसकी चीजें छिपा देता था।
कभी उसके बाल खींच देता था।
और फिर जब अनुष्का रोती, तो सबसे पहले वही उसे चुप कराता।
रक्षाबंधन के दिन अनुष्का हमेशा कहती,
“भैया, हाथ आगे करो।”
रवि मजाक करता,
“पहले गिफ्ट बताओ।”
अनुष्का गुस्सा होकर कहती,
“पहले राखी।”
रवि हंसकर हाथ आगे कर देता।
सालों तक यही चलता रहा।
लेकिन समय के साथ दोनों बड़े हो गए।
रवि काम के सिलसिले में दूसरे शहर चला गया।
अनुष्का पढ़ाई करने लगी।
फिर भी हर रक्षाबंधन पर दोनों मिलते जरूर थे।
अगर मिलना संभव न होता तो वीडियो कॉल पर बात करते।
रवि हमेशा कहता,
“राखी बांधना जरूरी है, चाहे सामने हो या दूर।”
अनुष्का कहती,
“आपके बिना त्योहार अधूरा लगता है।”
एक साल रक्षाबंधन से कुछ महीने पहले रवि को दूसरे देश में एक बड़ा काम मिल गया।
वह बहुत दूर चला गया।
जाने से पहले उसने अनुष्का से कहा,
“इस बार शायद राखी पर नहीं आ पाऊंगा।”
अनुष्का ने नाराज होकर कहा,
“तो मैं भेज दूंगी।”
रवि हंस पड़ा।
“जरूर भेजना।”
लेकिन उस साल परिस्थितियां ऐसी बनीं कि रवि समय पर बात भी नहीं कर पाया।
उसका काम बहुत व्यस्त था और संपर्क करना मुश्किल हो रहा था।
अनुष्का हर दिन इंतजार करती।
रक्षाबंधन से एक दिन पहले उसने फोन किया।
कॉल नहीं लगी।
उसने संदेश भेजा।
जवाब नहीं आया।
अगले दिन सुबह वह जल्दी उठ गई।
उसने राखी की थाली सजाई।
लेकिन सामने भाई नहीं था।
उसने वीडियो कॉल की कोशिश की।
फिर भी बात नहीं हुई।
अनुष्का की आंखें भर आईं।
माँ ने उसके पास आकर कहा,
“उदास मत हो बेटा, बात हो जाएगी।”
अनुष्का ने कहा,
“माँ, पहली बार ऐसा लग रहा है जैसे रक्षाबंधन है ही नहीं।”
माँ ने प्यार से उसके सिर पर हाथ रखा।
“त्योहार सिर्फ साथ बैठने से नहीं, दिल से भी मनाए जाते हैं।”
अनुष्का ने राखी वापस डिब्बे में रखने के लिए हाथ बढ़ाया।
तभी दरवाजे पर किसी ने आवाज दी।
“मैडम… माफ कीजिए।”
अनुष्का बाहर आई।
सामने एक युवक खड़ा था।
उसके हाथ में एक पर्स था।
“ये शायद आपका है।”
अनुष्का ने देखा।
वह माँ का पर्स था।
“अरे! ये आपको कहां मिला?”
युवक ने बताया कि पर्स रास्ते में गिर गया था और अंदर मिले एक पते के आधार पर वह लौटाने आया था।
माँ ने उसे धन्यवाद दिया।
“अंदर आओ बेटा, कम से कम चाय पीकर जाना।”
युवक ने पहले मना किया।
लेकिन माँ के बार-बार कहने पर वह अंदर आ गया।
उसका नाम आर्यन था।
बातों-बातों में माँ ने कहा,
“आज रक्षाबंधन है, इसलिए बेटी थोड़ी उदास है।”
आर्यन ने अनुष्का की तरफ देखा।
“क्यों?”
अनुष्का ने हल्की मुस्कान के साथ कहा,
“भाई बहुत दूर है।”
आर्यन चुप हो गया।
कुछ देर बाद उसने धीरे से कहा,
“मैं समझ सकता हूं।”
अनुष्का ने पूछा,
“क्यों?”
आर्यन ने कहा,
“मेरी कोई बहन नहीं है।”
यह सुनकर अनुष्का कुछ पल चुप रही।
माँ ने मुस्कुराकर कहा,
“तो आज से अनुष्का तुम्हारी बहन।”
आर्यन थोड़ा असहज होकर हंस पड़ा।
“ऐसे रिश्ते बन जाते हैं क्या?”
माँ ने कहा,
“कुछ रिश्ते बनने के लिए सालों की जरूरत नहीं होती।”
अनुष्का चुपचाप राखी की थाली की तरफ देखने लगी।
फिर उसने पूछा,
“आपको राखी बंधवाने में कोई परेशानी तो नहीं?”
आर्यन ने उसकी तरफ देखा।
शायद वह भी पहली बार ऐसा अनुभव कर रहा था।
उसने धीरे से अपना हाथ आगे कर दिया।
“नहीं।”
अनुष्का ने राखी उठाई।
लेकिन राखी बांधने से पहले रुक गई।
उसके मन में आया—
क्या किसी अनजान इंसान को भाई कहना इतना आसान है?
फिर उसने आर्यन की आंखों में देखा।
वह बिल्कुल चुप था।
जैसे उसके मन में भी कोई पुरानी कमी हो।
अनुष्का ने धीरे से राखी बांध दी।
“अब आप मेरे भाई हो।”
आर्यन मुस्कुराया।
“इतनी जल्दी फैसला?”
“हां।”
“और अगर मैं अच्छा भाई नहीं निकला?”
अनुष्का ने कहा,
“तो डांट दूंगी।”
सब हंस पड़े।
आर्यन ने पूछा,
“गिफ्ट क्या चाहिए?”
अनुष्का ने कहा,
“कुछ नहीं।”
“हर बहन यही बोलती है?”
“नहीं, मुझे सच में कुछ नहीं चाहिए।”
आर्यन ने कहा,
“तो एक वादा।”
“कैसा?”
“जब भी कभी जरूरत हो, मुझे फोन करना।”
अनुष्का ने मजाक में कहा,
“और आप उठाओगे?”
आर्यन हंस पड़ा।
“कोशिश करूंगा।”
उस दिन के बाद दोनों अपने-अपने काम में व्यस्त हो गए।
अनुष्का को लगा शायद यह रिश्ता सिर्फ उसी दिन तक था।
लेकिन शाम को उसके फोन पर एक संदेश आया।
“घर पहुंच गया, बहन।”
अनुष्का मुस्कुराई।
कुछ दिनों बाद—
“पढ़ाई कैसी चल रही है?”
फिर—
“माँ की तबीयत ठीक है?”
फिर—
“कोई परेशानी हो तो बताना।”
धीरे-धीरे दोनों की बातें बढ़ने लगीं।
रवि जब विदेश से वापस आया, तो अनुष्का ने उत्साह से कहा,
“भैया, आपको किसी से मिलवाना है।”
रवि ने पूछा,
“कौन?”
“मेरे दूसरे भाई से।”
रवि हंस पड़ा।
“वाह! मैं कुछ महीने बाहर क्या गया, मेरी जगह भर दी?”
अनुष्का ने कहा,
“जगह कोई नहीं भर सकता।”
फिर वह मुस्कुराई।
“बस दिल बड़ा हो गया।”
जब रवि की मुलाकात आर्यन से हुई तो वह पहले थोड़ा हैरान हुआ।
लेकिन फिर उसने कहा,
“मेरी बहन को परेशान मत करना।”
आर्यन ने हंसते हुए जवाब दिया,
“आपकी बहन पहले से ही मुझे परेशान कर रही है।”
अनुष्का ने दोनों को गुस्से से देखा।
“आप दोनों दोस्त मत बन जाना।”
दोनों भाई हंस पड़े।
अगले साल रक्षाबंधन आया।
इस बार अनुष्का के सामने दो हाथ थे।
एक उसके बचपन के भाई रवि का।
दूसरा उस भाई का, जिसे उसने एक साल पहले पहली बार राखी बांधी थी।
अनुष्का ने पहले रवि को राखी बांधी।
फिर आर्यन की तरफ देखा।
आर्यन ने हाथ आगे करते हुए कहा,
“इस बार भी राखी बांधोगी या रिश्ता खत्म?”
अनुष्का ने तुरंत कहा,
“भाई से रिश्ता खत्म नहीं होता।”
आर्यन मुस्कुराया।
“अच्छा।”
अनुष्का ने उसे राखी बांधी।
माँ दूर खड़ी दोनों को देख रही थीं।
उनकी आंखें नम थीं।
अनुष्का ने कहा,
“माँ, उस दिन अगर पर्स नहीं गिरता तो?”
माँ ने मुस्कुराकर कहा,
“तो शायद एक रिश्ता नहीं मिलता।”
अनुष्का ने दोनों भाइयों को देखा।
उस दिन उसे समझ आया—
रिश्ते सिर्फ खून से नहीं बनते।
कुछ रिश्ते भरोसे से बनते हैं।
कुछ अपनापन देखकर।
और कुछ रिश्ते…
बस एक राखी के धागे से दिल में जगह बना लेते हैं।
उस साल अनुष्का ने महसूस किया कि उसका रक्षाबंधन पहले से कहीं ज्यादा खास था।
क्योंकि उसके पास सिर्फ एक भाई नहीं था।
उसके पास दो ऐसे लोग थे, जिन्हें वह दिल से अपना कह सकती थी।
रवि ने हंसते हुए कहा,
“अब गिफ्ट किससे पहले लेगी?”
अनुष्का ने कहा,
“दोनों से।”
आर्यन बोला,
“लो, असली बहन अब सामने आई।”
अनुष्का हंस पड़ी।
घर फिर से हंसी से भर गया।
उसने अपनी दोनों भाइयों की कलाई पर बंधी राखियों को देखा।
एक रिश्ता उसे जन्म से मिला था।
दूसरा उसे रक्षाबंधन के दिन मिला था।
लेकिन दोनों में एक बात समान थी—
अपनापन।
और अनुष्का ने उसी दिन मन ही मन सोचा—
कभी-कभी भगवान हमें रिश्ते चुनने का मौका भी देता है।
बस उन्हें पहचानने के लिए…
दिल का दरवाजा खुला होना चाहिए।
उसकी पहली राखी, जो उस साल अधूरी लग रही थी…
आखिर में उसकी जिंदगी की सबसे यादगार राखी बन गई।

मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं
अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं
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