हर साल राखी भेजती रही, पर भाई ने कभी जवाब नहीं दिया
रक्षाबंधन आने में अभी पांच दिन बाकी थे।
मीरा बाजार में राखियां देख रही थी।
उसकी नजर एक साधारण-सी लाल और सुनहरे धागे वाली राखी पर जाकर रुक गई।
उसने दुकानदार से कहा,
“भैया, ये वाली दे दीजिए।”
दुकानदार ने पूछा,
“बस एक?”
मीरा ने हल्की मुस्कान के साथ कहा,
“हां, बस एक ही भाई है।”
राखी हाथ में लेते ही उसकी आंखें नम हो गईं।
पिछले आठ सालों से वह हर रक्षाबंधन पर अपने भाई अभिषेक को राखी भेजती थी।
लेकिन पिछले आठ सालों में अभिषेक ने उसे कभी फोन करके यह नहीं कहा था—
“राखी मिल गई।”
न कोई गिफ्ट।
न कोई वीडियो कॉल।
न कोई लंबी बात।
बस कभी-कभी दो शब्दों का एक संदेश आता था—
“Thanks.”
और कई बार वह भी नहीं।
मीरा के दोस्तों को यह बात समझ नहीं आती थी।
एक दिन उसकी सहेली ने पूछा था,
“जब तुम्हारा भाई इतना दूर-दूर रहता है तो तुम हर साल राखी क्यों भेजती हो?”
मीरा ने कहा था,
“क्योंकि वो मेरा भाई है।”
“लेकिन उसे तो फर्क ही नहीं पड़ता।”
मीरा कुछ सेकंड चुप रही।
फिर बोली,
“शायद पड़ता हो।”
उसकी सहेली हंस पड़ी।
“तुझे खुद नहीं पता।”
मीरा ने जवाब नहीं दिया।
सच तो यह था कि कभी-कभी उसे भी बुरा लगता था।
बहुत बुरा।
बचपन में अभिषेक और मीरा बहुत करीब थे।
अभिषेक उससे छह साल बड़ा था।
जब मीरा छोटी थी, वह उसके पीछे-पीछे घूमती रहती।
“भैया, मुझे भी साइकिल चलानी है।”
“गिर जाएगी।”
“तो आप पकड़ लेना।”
“तू बहुत परेशान करती है।”
फिर भी अभिषेक घंटों उसके पीछे साइकिल पकड़कर दौड़ता रहता।
मीरा को स्कूल में कोई डांट देता तो वह घर आकर सबसे पहले भाई को बताती।
अभिषेक हमेशा कहता,
“रो मत, मैं हूं ना।”
लेकिन समय के साथ सब बदल गया।
अभिषेक पढ़ाई और काम के लिए दूसरे शहर चला गया।
धीरे-धीरे फोन कम हो गए।
फिर बातें कम हो गईं।
और फिर जैसे दोनों की जिंदगी अपनी-अपनी दिशा में चल पड़ी।
फिर भी हर साल मीरा राखी भेजती रही।
इस बार उसने राखी के साथ एक छोटा-सा पत्र भी लिखा।
उसने लिखा—
“भैया, इस बार भी राखी भेज रही हूं। पता नहीं आपको पसंद आएगी या नहीं। हर साल सोचती हूं कि शायद इस बार आप फोन करेंगे। लेकिन अगर नहीं भी किया तो कोई बात नहीं। बस राखी संभालकर रख लेना।”
पत्र लिखते-लिखते उसकी आंखें भर आईं।
फिर उसने आखिरी लाइन लिखी—
“आप चाहे जितने दूर हो जाओ, मेरे लिए हमेशा वही रहोगे जो बचपन में कहते थे—मैं हूं ना।”
उसने लिफाफा बंद कर दिया।
रक्षाबंधन आ गया।
सुबह से ही मीरा का मन बेचैन था।
वह बार-बार मोबाइल देखती।
कोई कॉल नहीं।
दोपहर हुई।
कोई संदेश नहीं।
शाम हो गई।
अब भी कुछ नहीं।
माँ ने पूछा,
“क्या हुआ?”
मीरा ने कहा,
“कुछ नहीं।”
माँ ने मुस्कुराकर कहा,
“अभिषेक का इंतजार कर रही है?”
मीरा ने तुरंत कहा,
“नहीं।”
लेकिन उसकी आंखें सच बता रही थीं।
रात को उसने खुद को समझाया।
“हर साल ऐसा ही होता है। इस बार इतना सोचने की क्या जरूरत है?”
उसने मोबाइल एक तरफ रख दिया।
तभी दरवाजे की घंटी बजी।
मीरा ने सोचा शायद कोई पड़ोसी होगा।
उसने दरवाजा खोला।
और सामने…
अभिषेक खड़ा था।
कुछ सेकंड तक मीरा को विश्वास ही नहीं हुआ।
“भैया?”
अभिषेक हल्का-सा मुस्कुराया।
“अंदर नहीं बुलाएगी?”
मीरा की आंखों से आंसू निकल आए।
“आप… यहां?”
वह कुछ कहे बिना भाई के गले लग गई।
कई सालों की शिकायतें उस एक पल में जैसे बाहर आ गईं।
अभिषेक ने उसके सिर पर हाथ रखा।
“इतना रोएगी तो पड़ोसी सोचेंगे मैंने कुछ किया है।”
मीरा रोते-रोते हंस पड़ी।
माँ भी बाहर आ गईं।
“अभिषेक!”
वह माँ के पैर छूने लगा।
घर में अचानक खुशी लौट आई।
कुछ देर बाद मीरा ने पूछा,
“लेकिन आप आए कैसे? आपने बताया भी नहीं।”
अभिषेक ने अपना बैग खोला।
उसने अंदर से एक डिब्बा निकाला।
मीरा ने खोला।
और वह हैरान रह गई।
अंदर…
राखियां थीं।
बहुत सारी राखियां।
लाल।
पीली।
हरी।
साधारण।
रंगीन।
पुरानी।
नई।
मीरा ने एक-एक करके उन्हें देखा।
उसकी आंखें भर आईं।
“ये सब…?”
अभिषेक ने कहा,
“तेरी भेजी हुई हैं।”
मीरा ने धीरे से पूछा,
“सभी?”
“एक भी नहीं फेंकी।”
मीरा कुछ बोल नहीं पाई।
अभिषेक ने कहा,
“तू सोचती थी मुझे फर्क नहीं पड़ता?”
मीरा की आंखों से आंसू बहने लगे।
“आपने कभी बताया नहीं।”
अभिषेक चुप रहा।
फिर बोला,
“मुझसे गलतियां हुई हैं।”
मीरा उसकी तरफ देखने लगी।
“जब मैं घर से दूर गया, मुझे लगा काम खत्म करके आराम से बात करूंगा।”
वह हल्का-सा हंसा।
“लेकिन काम कभी खत्म ही नहीं हुआ।”
मीरा चुप रही।
अभिषेक ने कहा,
“हर साल राखी आती थी। मैं उसे खोलता था। बांधता था।”
“फिर फोन क्यों नहीं किया?”
इस सवाल पर अभिषेक की आंखें झुक गईं।
“शायद आदत खराब हो गई।”
मीरा ने कहा,
“एक फोन करने की?”
“हां।”
फिर वह गंभीर होकर बोला,
“हम अक्सर सोचते रहते हैं कि अपनों से बात बाद में कर लेंगे।”
मीरा ध्यान से सुन रही थी।
“लेकिन बाद में करते-करते कई साल निकल जाते हैं।”
उसकी आवाज धीमी हो गई।
“और फिर एक दिन पता चलता है कि अपने हमसे दूर नहीं गए थे… हम खुद उनसे दूर होते गए।”
मीरा की आंखें भर आईं।
अभिषेक ने बैग से एक और चीज निकाली।
वह वही पत्र था जो मीरा ने राखी के साथ भेजा था।
“ये भी मिला।”
मीरा ने शर्म से कहा,
“पढ़ लिया?”
अभिषेक ने कहा,
“कई बार।”
मीरा ने उसकी तरफ देखा।
अभिषेक बोला,
“उस आखिरी लाइन ने मुझे बहुत देर तक सोचने पर मजबूर किया।”
“कौन-सी?”
“मैं हूं ना।”
मीरा चुप हो गई।
अभिषेक ने कहा,
“बचपन में मैं तुझे ये बात कहता था।”
फिर उसने मुस्कुराकर कहा,
“लेकिन बड़ा होकर खुद ही गायब हो गया।”
मीरा की आंखों से फिर आंसू निकल आए।
अभिषेक ने कहा,
“इस बार सोचा कि सिर्फ ‘Thanks’ लिखकर बात खत्म नहीं करूंगा।”
मीरा ने हल्के से कहा,
“तो?”
“इस बार राखी खुद बंधवाने आऊंगा।”
मीरा मुस्कुरा दी।
वह तुरंत अंदर गई और पूजा की थाली लेकर आई।
अभिषेक उसके सामने बैठ गया।
मीरा ने तिलक लगाया।
राखी उठाई।
लेकिन इस बार उसका हाथ कांप नहीं रहा था।
उसने धीरे से भाई की कलाई पर राखी बांध दी।
अभिषेक ने पूछा,
“अब क्या मांगोगी?”
मीरा ने कहा,
“कुछ नहीं।”
“पक्का?”
“हां।”
“गिफ्ट नहीं चाहिए?”
मीरा ने सिर हिलाया।
“नहीं।”
अभिषेक ने कहा,
“लेकिन इस बार मैं गिफ्ट देने के लिए तैयार होकर आया हूं।”
मीरा ने पूछा,
“क्या?”
अभिषेक ने कहा,
“एक वादा।”
मीरा की आंखें उसकी तरफ उठ गईं।
“कैसा वादा?”
अभिषेक ने अपना मोबाइल निकाला।
उसमें एक नया अलार्म लगा था।
हर रविवार शाम सात बजे।
नाम लिखा था—
“मीरा को फोन करना।”
मीरा हंस पड़ी।
“इसके लिए अलार्म लगाना पड़ेगा?”
अभिषेक ने कहा,
“हां।”
“क्यों?”
“क्योंकि कुछ रिश्ते इतने जरूरी होते हैं कि उन्हें किस्मत और व्यस्तता के भरोसे नहीं छोड़ना चाहिए।”
मीरा की आंखें नम हो गईं।
“तो हर रविवार फोन करोगे?”
“हां।”
“और अगर भूल गए?”
अभिषेक मुस्कुराया।
“तो अलार्म याद दिला देगा।”
मीरा ने कहा,
“नहीं।”
अभिषेक ने पूछा,
“फिर?”
मीरा ने उसकी राखी की तरफ देखते हुए कहा,
“ये याद दिलाएगी।”
अभिषेक कुछ सेकंड तक अपनी कलाई को देखता रहा।
फिर उसने कहा,
“पक्का।”
उस रात दोनों बहुत देर तक बातें करते रहे।
बचपन की।
स्कूल की।
पुरानी शरारतों की।
उन दिनों की, जिन्हें दोनों ने अपनी जिंदगी की जल्दी में कहीं पीछे छोड़ दिया था।
सुबह जब अभिषेक वापस जाने लगा, मीरा ने पूछा,
“भैया?”
“हां?”
“अगली राखी पर फिर आओगे?”
अभिषेक मुस्कुराया।
“अगर तू भेजेगी तो।”
मीरा ने कहा,
“नहीं भेजूंगी।”
अभिषेक हैरान हुआ।
“क्यों?”
मीरा मुस्कुराई।
“क्योंकि इस बार मैं खुद आकर बांधूंगी।”
अभिषेक हंस पड़ा।
“फिर ठीक है।”
दोनों कुछ सेकंड तक एक-दूसरे को देखते रहे।
अभिषेक ने कहा,
“मीरा।”
“हां?”
“अब भी वही कह सकता हूं।”
मीरा की आंखें नम हो गईं।
“क्या?”
अभिषेक ने मुस्कुराकर कहा—
“मैं हूं ना।”
मीरा मुस्कुरा दी।
और इस बार उसे उन शब्दों पर कोई शक नहीं था।
क्योंकि कभी-कभी प्यार खत्म नहीं होता।
बस लोग उसे जताना भूल जाते हैं।
और कभी-कभी एक छोटी-सी राखी…
सालों की दूरी को याद दिला देती है कि रिश्ता अभी भी वहीं है।
बस किसी एक को…
दरवाजा खोलकर कहना होता है—
“मैं आ गया।”

मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं
अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं
प्रातिक्रिया दे