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उस राखी ने भाई को बदल दिया

पढ़ने का समय : 4 मिनट

सूरज एक छोटे से कस्बे में अपनी बहन पूजा और मां के साथ रहता था। पिता के जाने के बाद घर की सारी उम्मीदें सूरज पर थीं।

 

लेकिन सूरज अपनी जिम्मेदारियों से दूर भाग रहा था।

 

उसे शराब और नशे की आदत लग चुकी थी। उसकी कमाई का बड़ा हिस्सा नशे में चला जाता।

 

पूजा कई बार उसे समझाती।

 

“भैया, आप ऐसा क्यों कर रहे हैं?”

 

सूरज हमेशा कहता, “मुझे अकेला छोड़ दो।”

 

मां चुपचाप रोती रहती।

 

रक्षाबंधन आने वाला था।

 

पूजा ने सोचा कि इस बार वह भाई को कोई ऐसी राखी देगी जो सिर्फ उसकी कलाई पर नहीं, उसके दिल पर बंधे।

 

रक्षाबंधन की सुबह सूरज देर से घर आया।

 

पूजा ने उसके सामने राखी रखी।

 

“भैया, बैठिए।”

 

सूरज बैठ गया।

 

पूजा ने राखी बांधते हुए कहा, “इस बार मुझे आपसे कुछ चाहिए।”

 

सूरज ने पूछा, “क्या?”

 

“आप अपनी जिंदगी वापस दे दीजिए।”

 

सूरज चौंक गया।

 

पूजा बोली, “आपने खुद को नशे में खो दिया है। मां ने अपना बेटा खो दिया। मैंने अपना भाई खो दिया। लेकिन मैं आपको वापस पाना चाहती हूं।”

 

सूरज की आंखें भर आईं।

 

पूजा ने कहा, “मुझे वादा करो कि आज के बाद तुम शराब को हाथ नहीं लगाओगे।”

 

सूरज ने सिर झुका लिया।

 

“मैं कोशिश करूंगा।”

 

पूजा बोली, “नहीं भैया। कोशिश नहीं। फैसला।”

 

सूरज ने अपनी बहन की आंखों में देखा।

 

“ठीक है। आज से फैसला।”

 

उसने उसी दिन नशा छोड़ने के लिए इलाज और परामर्श लेना शुरू किया।

 

शुरुआत में उसे बहुत परेशानी हुई।

 

लेकिन पूजा और मां उसके साथ खड़ी रहीं।

 

कुछ महीनों बाद सूरज काफी बदल चुका था।

 

उसने काम शुरू किया। घर की जिम्मेदारियां उठाने लगा।

 

एक दिन वह बाजार जा रहा था। उसने देखा कि एक लड़की अकेली सड़क पर रो रही है।

 

सूरज ने दूरी बनाकर पूछा, “बहन, कोई मदद चाहिए?”

 

लड़की ने बताया कि कुछ लड़कों ने उसका पीछा किया था।

 

सूरज ने तुरंत आसपास के दुकानदारों से मदद ली और पुलिस को सूचना दी।

 

मामला शांत होने के बाद लड़की ने कहा, “आज अगर कोई मेरी मदद नहीं करता तो मैं बहुत डर जाती।”

 

सूरज ने कहा, “डरने की जरूरत नहीं। तुम्हारी गलती नहीं है।”

 

उस दिन उसे एहसास हुआ कि उसकी बहन ने उससे कितनी बड़ी बात कही थी।

 

उसने सोचा—

 

“अगर मैं अपनी बहन की रक्षा चाहता हूं, तो मुझे हर लड़की को सम्मान देना सीखना होगा।”

 

धीरे-धीरे सूरज ने अपने दोस्तों के साथ मिलकर नशे के खिलाफ अभियान शुरू किया।

 

वह स्कूलों में जाकर युवाओं को नशे के नुकसान के बारे में बताता।

 

वह कहता—

 

“मैं खुद इस रास्ते पर चल चुका हूं। नशा आपको मजबूत नहीं बनाता। यह आपके परिवार को आपसे दूर कर देता है।”

 

कुछ वर्षों में सूरज की पहचान बदल गई।

 

जो लोग पहले उसे नशेड़ी कहते थे, अब उसे सम्मान से बुलाते थे।

 

एक दिन रक्षाबंधन पर पूजा ने उसे राखी बांधी।

 

सूरज ने कहा, “आज मुझे समझ आया कि उस दिन तुमने मुझसे सिर्फ नशा छोड़ने का वादा नहीं लिया था।”

 

पूजा मुस्कुराई।

 

“फिर क्या लिया था?”

 

सूरज ने कहा, “एक बेहतर इंसान बनने का।”

 

पूजा की आंखों से आंसू निकल आए।

 

सूरज ने अपनी कलाई की राखी को देखा और कहा—

 

“अब यह धागा मुझे हर दिन याद दिलाता है कि मेरी बहन की तरह दुनिया की हर लड़की भी सम्मान की हकदार है।”

 

पूजा ने भाई को गले लगा लिया।

 

मां दूर खड़ी मुस्कुरा रही थी।

 

उस दिन घर में कोई महंगा उपहार नहीं था। लेकिन उस घर को उससे कहीं बड़ी चीज मिल गई थी—एक सुधरा हुआ बेटा और एक जिम्मेदार भाई।

 

सीख:

इंसान कितना भी गलत रास्ते पर चला जाए, अगर वह सच्चे मन से बदलना चाहे तो नई शुरुआत कर सकता है। नशे से दूर रहना और महिलाओं का सम्मान करना सिर्फ त्योहार के दिन का वादा नहीं, बल्कि जीवनभर की जिम्मेदारी है।

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