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टैग: प्यार#दर्द#इंतजार

  • अधूरी राखी

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    “मैडम, ये राखी आप किसके लिए खरीद रही हैं?”

     

    दुकानदार के सवाल पर सोनम कुछ पल चुप रही।

     

    उसकी नजर सामने सजी रंग-बिरंगी राखियों पर थी। हर राखी चमक रही थी, लेकिन उसकी आंखें एक बहुत साधारण-सी लाल धागे वाली राखी पर टिक गईं।

     

    उसने धीरे से कहा,

     

    “उस भाई के लिए… जिसे मैंने कभी देखा ही नहीं।”

     

    दुकानदार हैरानी से उसे देखने लगा।

     

    सोनम ने राखी खरीदी और अपने बैग में रख ली।

     

    वह हर साल ऐसा करती थी।

     

    लेकिन इस बार उसके मन में एक अजीब-सी बेचैनी थी।

     

    सोनम को बचपन से यही बताया गया था कि वह अपने माता-पिता की इकलौती संतान है। उसका कोई भाई या बहन नहीं था।

     

    लेकिन जब वह लगभग दस साल की थी, तब उसने घर के पुराने संदूक में एक तस्वीर देखी थी।

     

    तस्वीर में उसकी माँ दो छोटे बच्चों के साथ बैठी थीं।

     

    एक बच्ची सोनम थी।

     

    दूसरा बच्चा एक लड़का था।

     

    सोनम ने माँ से पूछा था,

     

    “ये कौन है?”

     

    माँ ने तस्वीर उसके हाथ से ले ली और बस इतना कहा,

     

    “पुरानी बात है, इसे भूल जाओ।”

     

    लेकिन सोनम भूल नहीं पाई।

     

    हर साल रक्षाबंधन पर उसे उस अनजान लड़के की याद आती।

     

    वह सोचती—

     

    क्या सच में मेरा कोई भाई था?

     

    इस बार माँ की तबीयत काफी कमजोर थी।

     

    एक शाम सोनम उनके पास बैठी थी।

     

    उसने हिम्मत करके पूछा,

     

    “माँ, मुझे एक बात पूछनी है।”

     

    माँ ने उसकी तरफ देखा।

     

    “पूछ।”

     

    “उस पुरानी तस्वीर में जो लड़का था… वो कौन था?”

     

    माँ के हाथ से पानी का गिलास छूटते-छूटते बचा।

     

    उनकी आंखें भर आईं।

     

    “तूने उसे अभी तक नहीं भुलाया?”

     

    “मैं कैसे भूलूं माँ? मुझे तो पता ही नहीं कि वो कौन था।”

     

    माँ काफी देर चुप रहीं।

     

    फिर उन्होंने अपने तकिए के नीचे से एक पुराना लिफाफा निकाला।

     

    “शायद अब तुझे सच जान लेना चाहिए।”

     

    सोनम के हाथ कांपने लगे।

     

    लिफाफे के अंदर एक पत्र था।

     

    ऊपर लिखा था—

     

    “मेरी बहन सोनम के नाम।”

     

    सोनम की सांस जैसे रुक गई।

     

    उसने माँ की तरफ देखा।

     

    “माँ… मेरा भाई था?”

     

    माँ की आंखों से आंसू बह निकले।

     

    “हां।”

     

    “कहां है वो?”

     

    माँ ने नजरें झुका लीं।

     

    “मुझे नहीं पता।”

     

    सोनम ने पत्र खोला।

     

    पत्र कई साल पुराना था।

     

    उसमें लिखा था—

     

    “सोनम,

     

    जब तू ये पत्र पढ़ेगी, शायद मैं तुझे बहुत याद आऊंगा।

     

    मुझे नहीं पता तब मैं कहां होऊंगा।

     

    लेकिन अगर कभी तू मुझे ढूंढे, तो एक बात याद रखना।

     

    तेरा भाई तुझसे नाराज होकर नहीं गया था।

     

    मैंने सिर्फ इतना सोचा था कि तू हमेशा खुश रहे।

     

    अगर कभी रक्षाबंधन आए और मैं तेरे पास न हूं, तो मेरे लिए एक राखी जरूर रखना।

     

    क्योंकि मुझे विश्वास है कि एक दिन तू मुझे ढूंढ ही लेगी।

     

    तेरा भाई,

     

    अर्जुन।”

     

    सोनम की आंखों से आंसू लगातार बह रहे थे।

     

    उसने माँ का हाथ पकड़ लिया।

     

    “माँ, भैया कहां गए थे?”

     

    माँ ने कांपती आवाज में कहा,

     

    “तेरे पापा के जाने के बाद घर की हालत बहुत खराब हो गई थी। अर्जुन तुझसे चार साल बड़ा था। उसे समझ आ गया था कि घर में पैसे नहीं हैं।”

     

    “फिर?”

     

    “एक दिन उसने कहा कि वह काम करने शहर जाएगा।”

     

    सोनम की आंखें फैल गईं।

     

    “इतनी छोटी उम्र में?”

     

    माँ रो पड़ीं।

     

    “मैंने उसे रोका था। बहुत रोका था। लेकिन वह नहीं माना।”

     

    “उसने आपको क्यों नहीं बताया?”

     

    “क्योंकि वह चाहता था कि तू रोए नहीं।”

     

    सोनम ने पत्र को सीने से लगा लिया।

     

    “फिर उसका कोई पता नहीं चला?”

     

    माँ ने सिर हिला दिया।

     

    “शुरू में पत्र आते थे। फिर बंद हो गए।”

     

    उस रात सोनम सो नहीं पाई।

     

    वह बार-बार उस पत्र को पढ़ती रही।

     

    सुबह होते ही उसने भाई को ढूंढने का फैसला कर लिया।

     

    पत्र के साथ एक पुराना पता लिखा था।

     

    वह उसी शहर पहुंच गई।

     

    वहां एक पुरानी फैक्ट्री थी।

     

    सोनम ने आसपास के लोगों से पूछा,

     

    “क्या यहां कभी अर्जुन नाम का कोई लड़का काम करता था?”

     

    एक बूढ़े चौकीदार ने उसे ध्यान से देखा।

     

    “अर्जुन?”

     

    “हां।”

     

    “उसकी छोटी बहन सोनम?”

     

    सोनम की आंखें भर आईं।

     

    “आप जानते हैं उन्हें?”

     

    चौकीदार ने धीरे से कहा,

     

    “वह तुझे बहुत याद करता था।”

     

    सोनम की धड़कन तेज हो गई।

     

    “वो कहां हैं?”

     

    बूढ़े आदमी ने एक छोटे से कमरे की तरफ इशारा किया।

     

    “पहले वहां रहता था।”

     

    सोनम दौड़कर उस कमरे तक पहुंची।

     

    कमरा अब खाली था।

     

    दीवार पर पुराने निशान थे।

     

    एक कोने में लकड़ी का टूटा हुआ बक्सा पड़ा था।

     

    चौकीदार ने कहा,

     

    “जाने से पहले उसने ये सामान यहीं छोड़ दिया था।”

     

    सोनम ने बक्सा खोला।

     

    अंदर दर्जनों राखियां थीं।

     

    हर साल की एक।

     

    कुछ नई थीं।

     

    कुछ बहुत पुरानी।

     

    सोनम एकदम बैठ गई।

     

    हर राखी के साथ एक छोटी-सी पर्ची थी।

     

    पहली पर्ची—

     

    “सोनम शायद इस साल पहली बार स्कूल गई होगी।”

     

    दूसरी—

     

    “आज उसकी उम्र दस साल होगी। पता नहीं उसे चॉकलेट पसंद है या अब बदल गई होगी।”

     

    तीसरी—

     

    “आज रक्षाबंधन है। काश, मेरी कलाई पर उसकी राखी होती।”

     

    सोनम रोने लगी।

     

    वह राखियां अपनी हथेली में पकड़कर बोली,

     

    “भैया… आप मुझे भूल नहीं पाए थे।”

     

    बूढ़े चौकीदार ने कहा,

     

    “वो हर साल एक राखी खरीदता था।”

     

    सोनम ने पूछा,

     

    “कहां गए वो?”

     

    चौकीदार कुछ पल चुप रहा।

     

    फिर बोला,

     

    “कुछ साल पहले उसकी तबीयत खराब रहने लगी थी। फिर उसने यहां काम छोड़ दिया।”

     

    “कहां गया?”

     

    “मुझे नहीं पता।”

     

    सोनम की उम्मीद फिर टूटने लगी।

     

    तभी बूढ़े आदमी ने कहा,

     

    “लेकिन जाते समय उसने कहा था कि अगर कभी उसकी बहन आए, तो उसे एक जगह जरूर बताना।”

     

    उसने एक छोटा-सा कागज सोनम को दिया।

     

    उस पर लिखा था—

     

    “पुराने नदी किनारे वाला मंदिर।”

     

    सोनम उसी समय वहां पहुंची।

     

    मंदिर के पास एक छोटी-सी दुकान थी।

     

    दुकान पर एक आदमी बैठा था।

     

    सोनम ने पूछा,

     

    “क्या आप अर्जुन को जानते हैं?”

     

    उस आदमी ने उसे गौर से देखा।

     

    फिर मुस्कुराया।

     

    “तुम सोनम हो?”

     

    सोनम हैरान रह गई।

     

    “आपको मेरा नाम कैसे पता?”

     

    उस आदमी ने पीछे की तरफ इशारा किया।

     

    “वो तुम्हारा इंतजार कर रहा है।”

     

    सोनम के कदम रुक गए।

     

    उसका दिल इतनी तेजी से धड़क रहा था कि उसे अपनी सांसें सुनाई दे रही थीं।

     

    वह धीरे-धीरे पीछे गई।

     

    एक पेड़ के नीचे एक आदमी बैठा था।

     

    बालों में हल्की सफेदी।

     

    चेहरे पर थकान।

     

    लेकिन आंखों में वही अपनापन।

     

    सोनम ने कांपती आवाज में कहा,

     

    “अर्जुन भैया?”

     

    वह आदमी धीरे से उठा।

     

    उसकी आंखें भर आईं।

     

    “सोनम?”

     

    बस इतना सुनते ही सोनम दौड़कर उसके गले लग गई।

     

    “भैया!”

     

    अर्जुन ने उसे कसकर पकड़ लिया।

     

    दोनों रो रहे थे।

     

    “आप चले क्यों गए थे?”

     

    अर्जुन ने कहा,

     

    “ताकि तू रह सके।”

     

    “लेकिन मुझे भाई चाहिए था!”

     

    “मुझे पता था।”

     

    “तो वापस क्यों नहीं आए?”

     

    अर्जुन की आंखें झुक गईं।

     

    “जब वापस आने की हिम्मत जुटाई… तब लगा शायद तू मुझे पहचान भी नहीं पाएगी।”

     

    सोनम ने उसका चेहरा पकड़ लिया।

     

    “भैया को बहन कैसे नहीं पहचानेगी?”

     

    कुछ देर बाद सोनम ने अपने बैग से राखी निकाली।

     

    वही साधारण लाल धागे वाली राखी।

     

    उसने कहा,

     

    “ये आपके लिए है।”

     

    अर्जुन ने अपनी कलाई आगे कर दी।

     

    सोनम राखी बांधते हुए रो रही थी।

     

    “इतने सालों की सारी राखियां आज पूरी हो गईं।”

     

    अर्जुन ने कहा,

     

    “नहीं।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि हर साल की राखी नहीं बांधी जा सकती।”

     

    सोनम ने उसके पास रखे बक्से को देखा।

     

    फिर एक राखी उठाई और अपनी कलाई पर बांध ली।

     

    अर्जुन ने हैरानी से पूछा,

     

    “ये क्या कर रही है?”

     

    सोनम ने कहा,

     

    “जो राखियां आपकी कलाई तक नहीं पहुंच सकीं, वो आज हमारे रिश्ते तक पहुंच गईं।”

     

    अर्जुन रो पड़ा।

     

    सोनम ने कहा,

     

    “आज से कोई राखी अधूरी नहीं रहेगी।”

     

    अर्जुन ने उसकी तरफ देखा।

     

    “वादा?”

     

    सोनम ने कहा,

     

    “वादा।”

     

    उस दिन एक बहन को अपना अनजान भाई मिला।

     

    और एक भाई को…

     

    वह राखी, जिसका वह वर्षों से इंतजार कर रहा था।

     

    कभी-कभी एक राखी सिर्फ त्योहार नहीं होती।

     

    कभी वह सालों से बिछड़े दो लोगों के बीच बचा हुआ आखिरी धागा होती है…

     

    जिसे पकड़कर वे एक-दूसरे तक वापस पहुंच जाते हैं।

  • बारिश में मिला राजकुमार

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

    बारिश में मिला राजकुमार 

     

    बहुत समय पहले सूर्यगढ़ नाम का एक समृद्ध राज्य था। उस राज्य के राजकुमार आदित्य अपनी समझदारी और अच्छे स्वभाव के लिए जाने जाते थे। उन्हें नई-नई जगहें देखना और अलग-अलग लोगों से मिलना बहुत पसंद था। एक दिन वे अपने कुछ सैनिकों के साथ पड़ोसी राज्य की यात्रा पर निकले। रास्ता लंबा था और बीच में घना जंगल पड़ता था।

     

    सुबह मौसम बिल्कुल साफ था। ठंडी हवा चल रही थी और पक्षियों की आवाज़ पूरे जंगल में गूंज रही थी। आदित्य घोड़े पर बैठे रास्ते का आनंद ले रहे थे। लेकिन दोपहर होते-होते अचानक आसमान का रंग बदल गया। काले बादल चारों ओर फैल गए। तेज हवा चलने लगी और देखते ही देखते मूसलाधार बारिश शुरू हो गई।

     

    बारिश इतनी तेज थी कि कुछ ही मिनटों में रास्ता कीचड़ से भर गया। घोड़ों का आगे बढ़ना मुश्किल हो गया।

     

    आदित्य ने सैनिकों से कहा,

    “पास में कोई सुरक्षित जगह ढूंढो, वरना रात यहीं जंगल में बितानी पड़ेगी।”

     

    थोड़ी दूर उन्हें एक छोटा-सा मिट्टी का घर दिखाई दिया। घर गांव के आखिरी छोर पर था। उसके आसपास दूर-दूर तक कोई दूसरा घर नहीं था।

     

    आदित्य घोड़े से उतरे और दरवाजे पर दस्तक दी।

     

    कुछ पल बाद एक बुजुर्ग किसान ने दरवाजा खोला।

     

    “कौन है बेटा?”

     

    आदित्य ने हाथ जोड़कर कहा,

    “हम मुसाफिर हैं। बारिश बहुत तेज है। अगर एक रात के लिए अपने घर में जगह मिल जाए तो बड़ी कृपा होगी।”

     

    बुजुर्ग मुस्कुराए।

     

    “अरे बेटा, मेहमान को मना थोड़ी किया जाता है। अंदर आ जाओ।”

     

    उन्होंने आदित्य और उनके दो साथियों को अंदर बुला लिया। बाकी सैनिक पास की एक पुरानी सराय में चले गए।

     

    घर बहुत छोटा था, लेकिन साफ-सुथरा था। मिट्टी का आंगन, एक छोटा-सा चूल्हा और दीवारों पर टंगे मिट्टी के बर्तन पूरे घर को अपनापन दे रहे थे।

     

    तभी एक लड़की पानी का लोटा लेकर आई।

     

    उसका नाम गौरी था। वह किसान की इकलौती बेटी थी।

     

    उसने मुस्कुराकर कहा,

    “पहले हाथ-मुंह धो लीजिए। मैं अभी गरम चाय लेकर आती हूं।”

     

    आदित्य ने पहली बार उसे देखा। उसके चेहरे पर बनावटी सुंदरता नहीं थी, लेकिन उसकी सादगी और मुस्कान बहुत प्यारी थी।

     

    कुछ ही देर में गौरी गरम चाय और पकौड़े लेकर आई।

     

    वह बोली,

    “बारिश में गरम-गरम चाय मिल जाए तो सारी थकान दूर हो जाती है।”

     

    आदित्य मुस्कुराकर बोला,

    “सच कहा तुमने।”

     

    रात को गौरी की मां ने दाल, रोटी और सब्जी बनाई। सब लोग एक साथ बैठकर खाना खाने लगे।

     

    आदित्य को पहली बार लगा कि सादा खाना भी इतना स्वादिष्ट हो सकता है।

     

    खाना खाते-खाते किसान ने पूछा,

    “बेटा, तुम लोग कहां जा रहे हो?”

     

    आदित्य ने अपनी असली पहचान छिपाते हुए कहा,

    “दूसरे शहर काम से जा रहे हैं।”

     

    किसान ने ज्यादा सवाल नहीं किए।

     

    रात को बिजली कड़क रही थी। बाहर तेज बारिश हो रही थी।

     

    गौरी ने मेहमानों के लिए अपने कमरे की चारपाई दे दी और खुद अपनी मां के साथ दूसरे कमरे में सो गई।

     

    आदित्य देर रात तक जागता रहा।

     

    उसे बार-बार यही सोच आ रही थी कि इतने छोटे घर में रहने वाले लोग कितने बड़े दिल के हैं।

     

    सुबह जब बारिश रुकी तो पूरे गांव में ठंडी हवा चल रही थी।

     

    आदित्य बाहर निकले तो देखा गौरी आंगन में पक्षियों के लिए दाना डाल रही थी।

     

    वह बोली,

    “बारिश में बेचारे इन्हें भी खाना नहीं मिलता।”

     

    आदित्य उसकी दयालुता देखकर मन ही मन मुस्कुरा उठा।

     

    उसी समय दूर से घोड़ों की आवाज़ सुनाई दी।

     

    राजकुमार के बाकी सैनिक उन्हें ढूंढते हुए वहां पहुंच चुके थे।

     

    जैसे ही उन्होंने आदित्य को देखा, सभी घोड़ों से उतरकर झुक गए और एक साथ बोले—

     

    “राजकुमार आदित्य की जय हो!”

     

    यह सुनते ही गौरी, उसके माता-पिता और आसपास खड़े गांव वाले एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे।

     

    उन्हें विश्वास ही नहीं हो रहा था कि जिस मुसाफिर को उन्होंने अपने घर में ठहराया था, वह वास्तव में एक बड़े राज्य का राजकुमार था।

     

    आदित्य ने मुस्कुराकर उनकी ओर देखा, लेकिन अब सबसे बड़ी मुश्किल शुरू होने वाली थी…

     

    राजकुमार होने की बात सुनते ही गौरी के पिता घबरा गए। वे तुरंत आदित्य के सामने हाथ जोड़कर बोले,

     

    “राजकुमार जी, हमें माफ कर दीजिए। अगर हमारी सेवा में कोई कमी रह गई हो तो क्षमा कर दें। हमें क्या पता था कि आप इतने बड़े राज्य के राजकुमार हैं।”

     

    आदित्य ने तुरंत उनका हाथ पकड़ लिया।

     

    “काका, आपने मुझे मेहमान नहीं, अपने बेटे की तरह रखा। इससे बड़ा सम्मान मेरे लिए कुछ नहीं हो सकता।”

     

    गौरी चुपचाप खड़ी थी। उसे समझ नहीं आ रहा था कि क्या कहे। कल तक जो युवक उसे एक साधारण मुसाफिर लगा था, वह आज राजकुमार निकला।

     

    विदा लेते समय आदित्य ने एक बार गौरी की ओर देखा। गौरी की आंखें भी उसी की ओर थीं। दोनों बहुत कुछ कहना चाहते थे, लेकिन शब्द किसी के पास नहीं थे।

     

    कुछ ही देर बाद घोड़ों की टापों की आवाज़ दूर होती गई और राजकुमार अपनी यात्रा पर निकल गया।

     

    उसके जाने के बाद घर पहले जैसा तो था, लेकिन अब कुछ खाली-खाली सा लगने लगा था।

     

    हर शाम गौरी अनजाने में उसी रास्ते की ओर देखने लगती, जहां से वह बारिश वाली रात वह मुसाफिर आया था।

     

    उधर राजमहल पहुंचने के बाद भी आदित्य का मन कहीं नहीं लग रहा था।

     

    दरबार चलता, मंत्री बातें करते, सैनिक अभ्यास करते, लेकिन आदित्य की आंखों के सामने बार-बार वही छोटा-सा घर और गौरी की मुस्कान आ जाती।

     

    एक दिन राजा ने पूछा,

     

    “आदित्य, कई दिनों से तुम परेशान दिखाई दे रहे हो। बात क्या है?”

     

    आदित्य ने सारी बात सच-सच बता दी।

     

    राजा कुछ देर चुप रहे।

     

    फिर बोले,

     

    “वह एक किसान की बेटी है। राजघराने की अपनी मर्यादाएं होती हैं।”

     

    आदित्य ने शांत स्वर में कहा,

     

    “पिताजी, इंसान की पहचान उसके कपड़ों या घर से नहीं, उसके संस्कारों से होती है।”

     

    राजा ने कोई उत्तर नहीं दिया।

     

    कुछ दिनों बाद उन्होंने अपने विश्वसनीय मंत्री को गांव भेजा ताकि गौरी और उसके परिवार के बारे में जानकारी मिल सके।

     

    मंत्री वापस लौटे और बोले,

     

    “महाराज, वह परिवार गरीब जरूर है, लेकिन पूरे गांव में उनकी ईमानदारी और अच्छे व्यवहार की मिसाल दी जाती है।”

     

    फिर भी राजा ने एक छोटी-सी परीक्षा लेने का निश्चय किया।

     

    उन्होंने गौरी और उसके माता-पिता को राजमहल बुलवाया।

     

    महल देखकर गौरी घबरा गई, लेकिन उसने विनम्रता नहीं छोड़ी।

     

    राजा ने पूछा,

     

    “अगर तुम इस महल की रानी बन गईं, तो सबसे पहले क्या बदलोगी?”

     

    गौरी मुस्कुराई और बोली,

     

    “महाराज, मैं महल की दीवारें नहीं बदलूंगी। मैं इतना जरूर चाहूंगी कि यहां रहने वाला हर व्यक्ति एक-दूसरे का सम्मान करे। महल की असली सुंदरता सोने-चांदी से नहीं, लोगों के व्यवहार से होती है।”

     

    राजा उसके उत्तर से प्रभावित हुए।

     

    उसी समय एक सेवक घबराकर आया। उसके हाथ से पानी का घड़ा टूट गया था।

     

    वह डरते हुए बोला,

     

    “महाराज, मुझसे गलती हो गई।”

     

    राजा कुछ कहते, उससे पहले गौरी ने सेवक से कहा,

     

    “घड़ा टूट गया तो क्या हुआ? गलती इंसान से ही होती है। डरने की जगह अगली बार संभलकर काम करना।”

     

    राजा यह सब ध्यान से देख रहे थे।

     

    उन्होंने महसूस किया कि गौरी के अंदर दया, धैर्य और सम्मान जैसे गुण हैं।

     

    यही गुण एक सच्ची रानी में होने चाहिए।

     

    राजा मुस्कुराए और आदित्य की ओर देखकर बोले,

     

    “तुमने सही कहा था। जन्म नहीं, संस्कार इंसान को बड़ा बनाते हैं।”

     

    यह सुनते ही आदित्य की खुशी का ठिकाना नहीं रहा।

     

    कुछ ही दिनों बाद पूरे राज्य में उनके विवाह की तैयारियां शुरू हो गईं।

     

    जिस गांव के आखिरी छोर पर वह छोटा-सा घर था, वहां पहली बार राजमहल से सजे हुए रथ पहुंचे।

     

    पूरा गांव खुशी से झूम उठा।

     

    गौरी दुल्हन बनी तो उसकी मां की आंखों से खुशी के आंसू रुक ही नहीं रहे थे।

     

    किसान पिता बार-बार भगवान का धन्यवाद कर रहे थे।

     

    विवाह बड़े धूमधाम से हुआ।

     

    राजा ने स्वयं गौरी का हाथ पकड़कर उसे महल में प्रवेश कराया।

     

    उन्होंने कहा,

     

    “आज से यह सिर्फ मेरी बहू नहीं, इस राज्य की बेटी भी है।”

     

    रात को महल की छत पर खड़े होकर आदित्य ने मुस्कुराते हुए कहा,

     

    “याद है, उस दिन मुझे सिर्फ बारिश से बचने के लिए एक छत चाहिए थी।”

     

    गौरी मुस्कुराई और बोली,

     

    “और मुझे क्या पता था कि एक साधारण मुसाफिर मेरे जीवन का सबसे बड़ा सहारा बन जाएगा।”

     

    इतना कहते ही फिर से हल्की-हल्की बारिश शुरू हो गई।

     

    दोनों आसमान की ओर देखने लगे।

     

    आदित्य ने गौरी का हाथ थाम लिया और कहा,

     

    “कभी-कभी भगवान हमारी किस्मत बदलने के लिए तूफान भेजते हैं। अगर उस दिन बारिश न होती, तो शायद मैं तुम्हारे दरवाजे तक कभी नहीं पहुंचता।”

     

    गौरी मुस्कुराकर बोली,

     

    “इसलिए अब जब भी बारिश होगी, मुझे उस पहली मुलाकात की याद जरूर आएगी।”

     

    दोनों की मुस्कान के साथ बारिश की बूंदें महल की छत पर गिरती रहीं। उस दिन हर किसी को यकीन हो गया कि सच्चा प्यार न अमीरी देखता है, न गरीबी वह बस एक सच्चे दिल की तलाश करता है।

     

  • No love clause

    No love clause

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    भाग 1

     

    शुरुआत

     

    मुंबई… जिसे सपनों का शहर, माया नगरी जाने क्या क्या कहा जाता है। 

    लेकिन ऐसा नहीं है यहाँ आकर सभी के सपने पूरे हुए हों, बहुत ऐसे भी होते हैं जिनके सपने रास्ते में ही दम तोड़ देते हैं।

     

    कुछ सपने पैसों के आगे दम तोड़ देते हैं।

     

    और कुछ… अपनों की साँसों के साथ जुड़ जाते हैं।

     

    तो आइए कहानी की शुरुआत करते हैं।

     

     

    “मैम… प्लीज़ जल्दी आइए!”

     

    नर्स की घबराई हुई आवाज़ सुनते ही वेदा लगभग दौड़ती हुई अस्पताल के आईसीयू की तरफ भागी।

    उसके चेहरे पर डर साफ़ दिखाई दे रहा था।

    (ये है, वेदा शर्मा, 24 वर्षीय कहानी की हीरोइन)

    “क्या हुआ मेरे भाई को?” वेदा ने घबराई हुई आवाज में पूछा। 

     

    आवाज सुनकर डॉक्टर ने गंभीर नज़रों से उसकी तरफ देखा। “विहान की हालत पहले से ज़्यादा बिगड़ गई है।”

    (विहान, वेदा का भाई है और इस दुनिया में एकमात्र रिश्ता। इसकी उम्र 18 वर्ष है और ये एक सीरियस बीमारी से जूझ रहा है।)

     

    डॉक्टर की बात सुनकर वेदा का दिल जैसे धड़कना भूल गया। क्योंकि विहान के सिवा उसका पूरी दुनिया में कोई नहीं था।

     

    उसे वो पल याद आया तीन साल पहले जब उसकी मां ने दम तोड़ते हुए उससे वचन लिया था कि वो हमेशा अपने भाई का ध्यान रखेगी 

     

    वेदा ने अपने बाप को तो कभी देखा ही नहीं था, बस अपनी मां सविता जी से सुना था कि उसके भाई के जन्म के कुछ ही समय बाद उसके बाप ने उसकी मां को घर से निकाल कर दर बदर ठोकरें खाने को मजबूर कर दिया था।

     

    सविता जी ने बड़ी मुश्किल से नौकरी करके अपने दोनों बच्चों को पाला पोसा। 

     

    वेदा ने कुछ सोचते हुए कहा, “लेकिन डॉक्टर कल तो आपने कहा था कि, मेरा भाई मेरा विहान अब ठीक हो रहा है…” 

    उसने बहुत उम्मीद के साथ डॉक्टर की तरफ देखा। 

    डॉक्टर ने बहुत ही शांत लहजे में कहा, “हमने पूरी कोशिश की, लेकिन अब सिर्फ़ दवाइयों से काम नहीं चलेगा। जितनी जल्दी हो सके ऑपरेशन करना पड़ेगा।”

     

    “ ऑपरेशन…” ये सुनते ही वेदा का चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    डॉक्टर बोला, “ अब इसके सिवा दूसरा कोई रास्ता नहीं है।”

     

    वेदा ने खुद को संभाला, ऐसे समय पर वो टूट नहीं सकती थी। “क… कितना खर्च आएगा?” उसने पूछा।

    डॉक्टर ने फाइल बंद की। फिर कुछ देर सोचने की मुद्रा में बैठे रहे। फिर बहुत देर बाद सोच विचारकर बोले, “करीब करीब एक करोड़ बीस लाख रुपये।”

    “ थोड़ा बहुत कम या ज्यादा भी हो सकता है।”

    वेदा के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। एक करोड़ बीस लाख… उसने ज़िंदगी में इतने पैसे कभी देखे तक नहीं थे।

    उसे संभलने के लिए कुर्सी का सहारा लेना पड़ा।

     

    “डॉक्टर… मैं एक प्राइवेट कंपनी में नौकरी करती हूँ। इतनी बड़ी रकम…” उसकी आंखों में आंसू भरे हुए थे, लेकिन उसने उन्हें बाहर नहीं आने दिया।

    “मुझे अफसोस है, लेकिन हमारे पास समय बहुत कम है।” डॉक्टर ने अपनी बात रखी। 

     

    वेदा की आँखें भर आईं। “कितना समय है मेरे पास?”

     

    डॉक्टर बोला, “ज़्यादा से ज़्यादा बीस दिन।”

    बस… बीस दिन। अगर पैसे नहीं आए… तो उसका इकलौता भाई… उसका इकलौता सहारा… नहीं।

     

    उसने तुरंत उस खयाल को अपने मन से निकाल दिया। वह विहान को कुछ नहीं होने देगी।

     

    चाहे इसके लिए उसे पूरी दुनिया से लड़ना पड़े।

     

     

    ICU के अंदर…

     

    अठारह साल का विहान ऑक्सीजन मास्क लगाए बेहोशी की हालत में लेटा था। वो पहले से बहुत कमजोर दिखाई दे रहा था। 

    वेदा धीमे कदमों से उसके पास आकर बैठ गई, उस कमरे में मशीनों को बीप बीप की आवाज सुनाई दे रही थी।

     

    वैसे तो ICU में जाने की इजाजत किसी को नहीं थी, लेकिन वेदा को सिर्फ पाँच मिनट का समय दिया गया था।

     

    वेदा उसके बेड के पास रखे स्टूल पर बैठ गई और उसका हाथ अपने हाथ में ले लिया।

    “कुछ नहीं होगा तुझे…”  उसकी आवाज़ काँप रही थी।

     

    “तेरी दीदी है ना… मैं तुझे कुछ नहीं होने दूँगी।” उसकी आँखों से आँसू टपककर विहान के हाथ पर गिर पड़े।

     

    उसी समय उसका मोबाइल बज उठा। उसने जल्दी से अपने बैग में से मोबाइल निकाला और सबसे पहले उसे साइलेंट किया क्योंकि वहाँ शोर बिल्कुल भी अलाउड नहीं था।

     

    फिर वो वहाँ से उठकर बाहर आ गई अभी भी फोन की स्क्रीन चमक रही थी और उसपर लिखा हुआ था

    अपर्णा Calling…

    (अपर्णा वेदा की बहुत अच्छी सहेली है, जिससे वो अपने दिल की हर एक बात साझा कर सकती है। और दोनों एक ही कम्पनी में जॉब भी करती है। )

     

    “हैलो?” वेदा ने धीरे से कहा। 

     

    दूसरी तरफ से अपर्णा की जल्दी में आवाज आई, “वेदा… तू ऑफिस नहीं आई?”

     

    वेदा ने खुद को संभालने की कोशिश की। “मैं अस्पताल में हूँ…”

     

    अपर्णा की आवाज़ बदल गई। “विहान?”

     

    वेदा ने सिर हिलाया, “ हाँ… यार!” उसकी आवाज में अजीब सी टूटन थी।

    अपर्णा ने तुरंत उसकी आवाज में छुपा सूनापन पहचान लिया आखिर उनकी दोस्ती को एक लम्बा समय हो चुका था और दोनों ही एक दुसरे की खामोशी को, पानी के पीछे छिपे आंसुओं को भी पहचान लेती थी। 

     

    अपर्णा को समझ आ गया था उसकी दोस्त को अभी उसकी जरूरत है। वो बोली, “ चल मैं आधे घंटे में तेरे पास आ रही हूँ, तू परेशान मत हो।”

    कहकर उसने दूसरी तरफ से कॉल काट दिया। 

     

     

    उसी समय…

     

    मुंबई के सबसे ऊँचे कॉर्पोरेट टॉवर की टॉप फ्लोर पर…

     

    राजावत ग्रुप के बोर्डरूम में सन्नाटा पसरा हुआ था। लंबी टेबल के आखिर में बैठा एक आदमी बिना कोई भाव बदले सामने रखी फाइल देख रहा था।

     

    उसकी ठंडी नजरें फाइल में बहुत ही तल्लीनता से गढ़ी हुई थी।  चेहरे पर ऐसा रौब कि किसी की हिम्मत नहीं हो रही थी उसकी तरफ देखने की।

     

    वह था, अग्नि सिंह राजावत। राजावत ग्रुप का सीईओ।

     

    “सर…” कंपनी के लीगल एडवाइज़र ने धीरे से कहा।

     

    “आपके दादाजी की वसीयत के अनुसार आपके सत्ताईसवें जन्मदिन से पहले आपका विवाह होना अनिवार्य है।” 

     

    अग्नि ने बिना सिर उठाए पूछा,  “अगर नहीं करूँ तो?”

     

    “आधी संपत्ति चैरिटी ट्रस्ट को चली जाएगी… और बाकी आपके रिश्तेदारों में बाँट दी जाएगी।” लीगल एडवाइजर ने डरते हुए बात को पूरा किया। 

     

    कमरे में फिर खामोशी छा गई। कुछ सेकंड बाद… अग्नि ने फाइल बंद की। उसकी आँखों में कोई घबराहट नहीं थी… बस बर्फ जैसी ठंडक।

     

    “शादी…”  उसने हल्की-सी हँसी हँसी। “दुनिया का सबसे महँगा सौदा।” 

     

    वह अपनी कुर्सी से उठा और काँच की दीवार के सामने जाकर पूरे मुंबई शहर को देखने लगा।

    दादा जी अच्छे से जानते हैं, “ मुझे शादी जैसे रिश्तों में बिल्कुल भी विश्वास नहीं… इसलिए…”

    “ खेल रहे हैं वो मेरे साथ।”

     

    कहकर उसने अपने पॉकेट में से सिगरेट निकालकर उसे सुलगाया। 

    “ लेकिन वो शायद भूल रहे हैं… मैं भी उनका ही पोता हूँ।”

     

    फिर उसने अपने लीगल एडवाइजर की तरफ देखा, “ तुम चिंता मत करो… अगर वो चाहते हैं तो उनका ये पोता शादी जरूर करेगा लेकिन अपनी शर्तों पर।”

     

    क्रमशः…

  • निर्जीव भी अपने से

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

    निर्जीव से भी करती थी वो बात

     

    गाँव के किनारे एक छोटा-सा कच्चा घर था। उस घर में चौदह साल की एक लड़की रहती थी, जिसका नाम मीरा था। लोग कहते थे कि वह बहुत अजीब है। कोई उसे हँसता नहीं देखता था, फिर भी उसके चेहरे पर हमेशा एक हल्की-सी मुस्कान रहती थी।

     

    मीरा की सबसे अनोखी आदत थी कि वह निर्जीव चीज़ों से भी बातें करती थी। सुबह उठते ही वह अपने आँगन के पुराने नीम के पेड़ से कहती, “कैसे हो मेरे दोस्त? आज हवा थोड़ी तेज़ है, अपना ध्यान रखना।”

     

    फिर वह अपने मिट्टी के घड़े से बोलती, “तू हर रोज़ सबकी प्यास बुझाता है, कभी थकता नहीं क्या?”

     

    टूटी हुई चारपाई से कहती, “तू बूढ़ी हो गई है, लेकिन आज भी मेरा सहारा बनी हुई है।”

     

    जो भी उसे देखता, बस यही कहता, “लड़की का दिमाग़ ठीक नहीं है।”

     

    लेकिन कोई यह नहीं जानता था कि मीरा ऐसा क्यों करती है।

     

    जब वह बहुत छोटी थी, तभी उसके पिता का देहांत हो गया था। उसकी माँ कई महीनों से बीमार रहती थी। घर में गरीबी थी और रिश्तेदारों ने भी धीरे-धीरे साथ छोड़ दिया था। माँ अक्सर कहती, “बेटी, अगर कभी मैं न रहूँ तो हिम्मत मत हारना।”

     

    मीरा हर बार माँ का हाथ पकड़कर कहती, “आप कहीं नहीं जाएँगी।”

     

    लेकिन किस्मत ने उसकी बात नहीं सुनी।

     

    एक बरसाती रात उसकी माँ ने भी दुनिया छोड़ दी।

     

    उस दिन के बाद मीरा सचमुच अनाथ होने वाली थी। गाँव वालों ने कुछ दिन तक उसकी मदद की, फिर सब अपनी-अपनी ज़िंदगी में व्यस्त हो गए।

     

    अब उस छोटे-से घर में सिर्फ़ मीरा और उसकी यादें रहती थीं।

     

    शायद इसी अकेलेपन ने उसे निर्जीव चीज़ों से बातें करना सिखा दिया था। उसे लगता था कि अगर इंसान साथ छोड़ दें, तो भी दीवारें, पेड़, हवा और पुरानी चीज़ें इंसान का साथ नहीं छोड़तीं।

     

    वह जब रोती, तो घर की दीवार से टिककर कहती, “तूने मेरी माँ को देखा था न? मुझे लगता है वो अभी भी यहीं कहीं है।”

     

    जब तेज़ बारिश होती, तो वह छत से टपकती बूंदों से कहती, “इतना मत रोओ… मैं भी रो पड़ूँगी।”

     

    गाँव के बच्चे उसका मज़ाक उड़ाते थे।

     

    “देखो… पगली फिर से पेड़ से बातें कर रही है।”

     

    मीरा बस मुस्कुरा देती। उसे किसी से शिकायत नहीं थी।

     

    धीरे-धीरे उसका यही स्वभाव उसकी ताकत बन गया। वह हर चीज़ में जीवन ढूँढने लगी—टूटी खिड़की की आवाज़ में भी, हवा की सरसराहट में भी। उसे लगता था कि दुनिया में हर चीज़ कुछ कहना चाहती है, बस सुनने वाला चाहिए।

     

    एक दिन स्कूल से लौटते समय उसने देखा कि रास्ते में एक बूढ़े बाबा गिर गए हैं। लोग पास से निकलते रहे, लेकिन किसी ने उन्हें उठाने की कोशिश नहीं की।

     

    मीरा दौड़कर पहुँची। उसने बाबा को सहारा दिया, पानी पिलाया और उन्हें उनके घर तक छोड़ आई।

     

    बाबा ने जाते-जाते पूछा, “बेटी, तू हर किसी का दर्द कैसे समझ लेती है?”

     

    मीरा ने मुस्कुराकर कहा, “जिसने अपना सब कुछ खोया हो, उसे दूसरों का दर्द जल्दी समझ आ जाता है।”

     

    बाबा की आँखें भर आईं।

     

    कुछ दिनों बाद गाँव की एक बुज़ुर्ग अम्मा बीमार पड़ गईं। उनके बेटे शहर में रहते थे और कई महीनों से मिलने नहीं आए थे।

     

    मीरा रोज़ उनके लिए खाना बनाकर ले जाती। दवा का समय याद दिलाती। रात को उनके पास बैठती और कहानियाँ सुनाती।

     

    अम्मा कहतीं, “बेटी, तू तो मेरी अपनी बेटी से भी बढ़कर निकली।”

     

    मीरा हँसकर कहती, “रिश्ते हमेशा खून से नहीं, दिल से बनते हैं।”

     

    धीरे-धीरे गाँव के लोगों ने नोटिस किया कि जिस लड़की को वे पागल समझते थे, वही सबसे ज़्यादा संवेदनशील है।

     

    एक दिन गाँव के स्कूल में बच्चों से पूछा गया, “सबसे दयालु इंसान किसे मानते हो?”

     

    पहले तो सब चुप रहे। फिर एक बच्चे ने कहा, “मीरा दीदी।

    यह सुनकर शिक्षक भी हैरान रह गए।

    उन्होंने मीरा को बुलाया और पूछा, “तुम इतनी छोटी उम्र में सबकी मदद क्यों करती हो?”

     

    मीरा ने शांत स्वर में कहा, “क्योंकि मैं जानती हूँ कि अकेलापन कितना दर्द देता है। मैं नहीं चाहती कि कोई और वह दर्द महसूस करे।”

     

    उसकी यह बात सुनकर पूरे कमरे में सन्नाटा छा गया।

     

    कुछ समय बाद शहर से एक समाजसेवी संस्था गाँव आई। उन्हें मीरा के बारे में पता चला। उन्होंने उसकी पढ़ाई का पूरा खर्च उठाने का फैसला किया।

     

    पहली बार मीरा को लगा कि शायद भगवान देर से ही सही, लेकिन किसी न किसी रूप में मदद ज़रूर भेजते हैं।

     

    शहर जाने से पहले वह अपने पुराने घर के आँगन में गई।

     

    उसने नीम के पेड़ को गले लगाया और बोली, “मैं जा रही हूँ, लेकिन तुम्हें कभी नहीं भूलूँगी।”

     

    फिर उसने मिट्टी के घड़े पर हाथ फेरा और मुस्कुराकर कहा, “तूने मेरा अकेलापन बाँटा था।”

     

    दीवार को छूकर बोली, “तूने मेरी हर ख़ामोशी सुनी है।”

     

    उसकी आँखों से आँसू बह निकले।

     

    आज पहली बार गाँव वालों ने भी उन निर्जीव चीज़ों को अलग नज़र से देखा। उन्हें एहसास हुआ कि जिनसे मीरा बातें करती थी, वे चीज़ें नहीं, उसके जीवन के साथी थे।

     

    कई साल बाद मीरा पढ़-लिखकर एक सामाजिक कार्यकर्ता बनी। उसने अनाथ बच्चों के लिए एक छोटा-सा आश्रय गृह खोला।

     

    वहाँ आने वाले हर बच्चे से वह एक ही बात कहती थी, “अगर कभी तुम्हें लगे कि तुम अकेले हो, तो याद रखना… दुनिया में कोई न कोई तुम्हारी बात सुनने वाला ज़रूर होता है। और जब तक वह नहीं मिलता, तब तक अपने हौसले से बातें करना।”

     

    एक दिन एक छोटी बच्ची ने उससे पूछा, “दीदी, क्या आप आज भी पेड़ों और दीवारों से बातें करती हैं?”

     

    मीरा मुस्कुराई और बोली, “हाँ… क्योंकि उन्होंने उस समय मेरा साथ दिया था, जब पूरी दुनिया मुझे अकेला छोड़ चुकी थी।”

     

    उसकी आँखों में आँसू थे, लेकिन इस बार वे दुख के नहीं, कृतज्ञता के आँसू थे।

     

    और अब उसका आश्रय गृह सिर्फ बच्चों का घर नहीं था, बल्कि उम्मीदों का एक छोटा-सा संसार बन चुका था, जहाँ हर बच्चा यह सीखता था कि दर्द चाहे कितना भी गहरा क्यों न हो, अगर दिल में अपनापन हो तो दुनिया फिर से जीने लायक बन जाती है।

     

    कभी-कभी सबसे ज़्यादा दर्द सहने वाले लोग ही दूसरों के आँसू

    सबसे पहले पहचान लेते हैं। और जिनके पास अपना कोई नहीं होता, वही पूरी दुनिया को अपना बना लेते हैं।