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लेखक: Neha Goyal

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Neha Goyal

मेरा नाम नेहा गोयल है। और पिछले दो वर्ष से मैं प्रतिलिपि पर कहानियां लिखती आ रही हूँ। मुझे लेखन करते हुए बहुत ही अच्छा लगता है। वैसे मुझे लिखने से पढ़ना ज्यादा पसंद है।

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अप्रैल 2026
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  • श्री कृष्ण का अवतरण

    श्री कृष्ण का अवतरण

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

    Part 5 वो रात जब कान्हा आए 🌙

     

    मथुरा की उस रात में कुछ तो अलग था।

     

    आसमान पर काले बादल इस तरह छाए हुए थे, जैसे पूरी धरती को अपने भीतर समेट लेना चाहते हों। चारों ओर घना अंधकार था। तेज हवाएँ महल की ऊँची दीवारों से टकराकर एक अजीब-सी आवाज पैदा कर रही थीं। यमुना भी जैसे उस रात शांत नहीं थी। उसकी लहरें बार-बार किनारों से टकरा रही थीं।

     

    मथुरा के राजमहल में सब कुछ सामान्य दिखाई दे रहा था, लेकिन उसी महल की एक अंधेरी कोठरी में एक माँ अपने आठवें बच्चे के जन्म की प्रतीक्षा कर रही थी।

     

    वह थीं—देवकी।

    और उनके पास बैठे वसुदेव बार-बार अपनी पत्नी को देखते, फिर उस भारी लोहे के द्वार की ओर देखते, जिसके बाहर कंस के सैनिक पहरा दे रहे थे।

     

    छह बच्चों को अपनी आँखों के सामने खोने के बाद देवकी के भीतर अब भय से भी बड़ी एक थकान थी।

     

    सातवाँ गर्भ भी उनसे छीन लिया गया था, लेकिन उन्हें क्या पता था कि वह बालक रोहिणी की गोद में पल रहा है।

     

    और अब… उनका आठवाँ पुत्र जन्म लेने वाला था।

     

    वही आठवाँ पुत्र, जिसके जन्म से कंस भयभीत था।

     

    कंस ने जिस भविष्यवाणी को मिटाने के लिए वर्षों से निर्दोष बच्चों का रक्त बहाया था, आज उसी भविष्यवाणी का समय निकट आ चुका था।

     

    देवकी ने पीड़ा से आँखें बंद कर लीं। वसुदेव ने उनका हाथ थाम लिया।

     

    उनके पास अपनी पत्नी को दिलासा देने के लिए शब्द नहीं थे। जिस बच्चे के आने की खुशी होनी चाहिए थी, उसके जन्म के साथ मृत्यु का भय खड़ा था।

     

    देवकी के चेहरे पर आँसू थे, लेकिन उन आँसुओं में केवल डर नहीं था एक माँ की ममता भी थी।

     

    वह जानती थीं कि कंस इस बच्चे को भी नहीं छोड़ेगा।

    फिर भी उनके भीतर कहीं एक विश्वास था… शायद इस बार कुछ अलग होगा।

     

    रात गहरी होती चली गई। और फिर आधी रात के समय अचानक उस कारागार में एक अद्भुत प्रकाश फैल गया।

     

    जिस कोठरी में अब तक अंधकार था, वहाँ दिव्य आभा छा गई।

     

    देवकी ने आँखें खोलीं, उनके सामने एक अद्भुत बालक था।

    श्याम वर्ण, कमल जैसे नेत्र। मुख पर ऐसी शांति, जैसी संसार के किसी सामान्य शिशु के चेहरे पर नहीं हो सकती थी।

     

    उसके जन्म के साथ ही जैसे पूरी प्रकृति कुछ क्षणों के लिए ठहर गई।

     

    वसुदेव उस बालक को देखते ही भाव-विभोर हो गए।

    उनके भीतर पिता का प्रेम उमड़ आया, लेकिन उसी के साथ उन्हें वह भविष्यवाणी भी याद थी , यह कोई साधारण बालक नहीं था।

     

    यह वही था, जिसके लिए देवकी ने इतने दुख सहे थे, जिसके लिए वसुदेव ने अपनी असहायता का हर क्षण जिया था।

     

    देवकी ने अपने पुत्र को अपनी बाँहों में भर लिया, उस क्षण उनके चेहरे पर वर्षों बाद ऐसी शांति दिखाई दी, जैसे उनके सारे दुखों को उस छोटे-से चेहरे ने अपने भीतर समेट लिया हो।

     

    उनकी आँखों से आँसू बहते रहे, लेकिन इस बार वे आँसू दुख के नहीं थे।

     

    वे माँ बनने की पूर्णता के आँसू थे।

    कुछ ही क्षणों बाद दिव्य बालक ने अपने माता-पिता को अपने वास्तविक स्वरूप का दर्शन कराया।

     

    देवकी और वसुदेव समझ गए कि उनके सामने स्वयं नारायण हैं।

    लेकिन भगवान का उद्देश्य केवल दर्शन देना नहीं था।

     

    उन्हें गोकुल जाना था। वहीं नंद और यशोदा के घर जन्मी कन्या को लेकर मथुरा लौटना था।

     

    वसुदेव ने जैसे ही अपने पुत्र को उठाने के लिए हाथ बढ़ाया, उसी क्षण कारागार के सारे बंधन टूट गए।

    लोहे की भारी बेड़ियाँ उनके पैरों से अलग हो गईं।

     

    द्वार अपने आप खुल गए। बाहर पहरा दे रहे सैनिक गहरी नींद में सो गए।

    वसुदेव कुछ पल उस खुले द्वार को देखते रहे।

    जिस कारागार से निकलना असंभव था, आज वही उनके लिए मार्ग बन चुका था।

     

    उन्होंने बालक को एक टोकरी में रखा और उसे अपने सिर पर उठा लिया।

     

    देवकी की आँखें अपने पुत्र पर टिकी थीं।

     

    एक माँ के लिए अपने नवजात बच्चे को किसी और के हाथों सौंप देना कितना कठिन होता है, यह केवल वही जान सकती थी।

     

    देवकी जानती थीं कि यह विदाई आवश्यक है।

    फिर भी उनका मन बार-बार कह रहा था, बस एक बार और उसे अपनी बाँहों में भर लूँ।

     

    वसुदेव ने उन्हें आश्वासन भरी दृष्टि से देखा। फिर वह भारी मन से बाहर निकल पड़े। कारागार के बाहर मथुरा सो रही थी।

     

    लेकिन प्रकृति जाग रही थी। बारिश तेज हो चुकी थी।

    वसुदेव बालक को सिर पर उठाए यमुना की ओर बढ़ते रहे।

    हर कदम के साथ पानी बढ़ता जा रहा था। यमुना अपने पूरे उफान पर थी।

    एक ओर नवजात शिशु। दूसरी ओर गहरी नदी।

    और पीछे कंस का भय। लेकिन वसुदेव के कदम नहीं रुके।

     

    वह पानी में उतर गए। धीरे-धीरे पानी उनके घुटनों तक पहुँचा।

    फिर कमर तक। फिर और ऊपर।

    वसुदेव अपने बच्चे को दोनों हाथों से संभाले हुए आगे बढ़ते रहे।

    उनकी चिंता अपने लिए नहीं थी। उनकी आँखों में केवल एक डर था, कहीं उनके नवजात शिशु को कुछ हो न जाए।

     

    उसी समय आकाश में बिजली चमकी, बारिश और तेज हो गई।

    तभी एक अद्भुत घटना हुई। शेषनाग ने अपना विशाल फन फैलाकर बालक के ऊपर छत्र बना दिया।

    तेज बारिश अब उस दिव्य शिशु को छू भी नहीं पा रही थी।

     

    वसुदेव ने एक पल ऊपर देखा। उनके भीतर श्रद्धा और आश्चर्य एक साथ उमड़ पड़े।

    मानो स्वयं प्रकृति उस बालक की रक्षा कर रही हो।

    और तभी यमुना का जल धीरे-धीरे शांत होने लगा।

     

    वसुदेव आगे बढ़ते गए। कुछ ही समय बाद वह नदी पार कर गोकुल की सीमा तक पहुँच गए।

     

    गोकुल उस समय गहरी नींद में था। नंद भवन में भी सब शांत था।

    यशोदा प्रसव के बाद अचेत अवस्था में थीं। वसुदेव धीरे से भीतर पहुँचे।

     

    उन्होंने देखा, यशोदा के पास एक नवजात कन्या थी।

    वसुदेव का हृदय भारी हो गया। उन्होंने अपने पुत्र को अंतिम बार देखा।

    वह छोटा-सा श्याम चेहरा… शांत आँखें… और वह मासूम मुस्कान…

    वसुदेव के हाथ काँप उठे।

     

    जिस पुत्र को पाने के लिए उन्होंने वर्षों तक प्रतीक्षा की थी, उसे अपनी आँखों से दूर करना पड़ रहा था।

    लेकिन यह संसार के कल्याण का मार्ग था।

     

    उन्होंने कान्हा को धीरे से यशोदा के पास सुला दियाऔर वहाँ से उस कन्या को उठाकर वापस मथुरा की ओर चल पड़े।

     

    कुछ ही देर बाद वह फिर उसी कारागार में पहुँच गए।

     

    जैसे ही उन्होंने कन्या को देवकी के पास रखा, कारागार के द्वार अपने आप बंद हो गए।

     

    बेड़ियाँ फिर से उनके पैरों में पड़ गईं, सैनिकों की नींद टूट गई और नवजात कन्या के रोने की आवाज पूरे कारागार में गूँज उठी।

     

    उस रोने की आवाज सुनकर कंस को खबर दी गई, कंस दौड़ता हुआ कारागार में पहुँचा, उसके चेहरे पर भय साफ दिखाई दे रहा था।

     

    वह जिस आठवें पुत्र से डरता था, उसके जन्म की खबर मिल चुकी थी।

     

    लेकिन जब उसने देखा कि देवकी की गोद में पुत्र नहीं, बल्कि एक कन्या है, तो उसके भीतर का भय कुछ क्षणों के लिए उलझन में बदल गया।

     

    फिर भी उसका क्रूर मन नहीं बदला, वह उस बच्ची को उठाने के लिए आगे बढ़ा।

     

    देवकी ने उसे रोकने की बहुत कोशिश की।

     

    एक माँ अपने बच्चे के लिए पहली बार नहीं, बल्कि आठवीं बार मृत्यु के सामने खड़ी थी।

     

    लेकिन तभी वह कन्या कंस के हाथों से छूटकर आकाश में प्रकट हो गई। दिव्य प्रकाश से पूरा कारागार भर गया।

     

    कंस भय से पीछे हट गया, उसे समझ आ गया, जिससे वह डर रहा था… वह जन्म ले चुका है।

     

    और मथुरा से बहुत दूर, गोकुल में, उसी समय एक नन्हा श्याम बालक अपनी नई माँ की गोद में सो रहा था। बाहर बारिश अब भी हो रही थी।

    लेकिन गोकुल की उस रात में जैसे एक नई सुबह जन्म ले चुकी थी।

     

    यशोदा को अभी पता नहीं था कि उनकी गोद में कौन आया है।

    नंद को अभी पता नहीं था कि उनके घर कौन-सा अतिथि आया है।

     

    गोकुल को अभी पता नहीं था कि उसका कान्हा कौन है।

    लेकिन उस रात से संसार की दिशा बदल चुकी थी। एक कारागार में जन्मा बालक… एक माँ की गोद से दूसरी माँ की गोद तक पहुँचा था।

     

    • और शायद यही भगवान की लीला थी, जिसे संसार ने देवकी का पुत्र समझकर खोजा…

     

    वह यशोदा का कान्हा बनकर पूरे गोकुल के हृदय में बस गया।

     

    समाप्त 

    आगे और कहानियां आती रहेगी।

    प्रेम से कहिए 

    🌺 राधे राधे 🌺

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    Neha Goyal

    मेरा नाम नेहा गोयल है। और पिछले दो वर्ष से मैं प्रतिलिपि पर कहानियां लिखती आ रही हूँ। मुझे लेखन करते हुए बहुत ही अच्छा लगता है। वैसे मुझे लिखने से पढ़ना ज्यादा पसंद है।

  • 🌸 वृंदावन का वो आखिरी दिन

    🌸 वृंदावन का वो आखिरी दिन

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    भाग 4 राधा को मिला संकेत 🦚❤️

     

    बृज की धूल में अब वो पुरानी रौनक़ और वो जादुई महक नहीं रही थी। सुबह की पहली किरण जब शांत यमुना के घाटों को छूती थी, तो ऐसा प्रतीत होता था जैसे सूरज भी किसी गहरे और कभी न मिटने वाले गम में डूबा हो। 

     

    कदंब की वो छांव, जो कभी कान्हा की बंसी की सुरीली और मनमोहक धुनों से गूंजा करती थी, अब एक अजीब और डरावने सन्नाटे में लिपटी हुई थी। 

     

    इसी गहरी खामोशी के बीच राधा का जीवन जैसे थम सा गया था। उनके पैर भले ही आंगन में चलते थे, लेकिन उनकी सांसें और उनकी चेतना तो उस रास्ते पर अटक गई थी जिस पर चलकर कृष्ण कभी ब्रज से दूर चले गए थे।

     

    कृष्ण के जाने की खबर ब्रज में एक तेज आंधी की तरह आई थी। मथुरा से अचानक बुलावा आया था, और कान्हा बिना एक पल भी गंवाए, बिना किसी को बताए, चुपचाप सब कुछ पीछे छोड़कर चले गए थे। 

     

    कंस का वध करना था और अपने माता-पिता को उस कैद से छुड़ाना था, दिमाग से तो गांव का हर एक बच्चा और बुजुर्ग यह जानता था कि यह उनका एक ऐसा कर्तव्य था जिसे टाला नहीं जा सकता था। 

     

    लेकिन किसी का दिल इस बात को स्वीकार करने को तैयार नहीं था कि उनका दुलारा कान्हा अब कभी लौटकर ब्रज की उन धूल भरी गलियों में न तो गायें चराएगा और न ही अपनी बांसुरी की तान छेड़ेगा।

     

    राधा उस मनहूस सुबह अपने घर के बाहर आंगन में तुलसी के पवित्र पौधे को जल अर्पित कर रही थीं। तभी हवा का एक ऐसा ठंडा झोंका आया, जिसने उनके भीतर तक सिहरन पैदा कर दी। कान में किसी अनहोनी की फुसफुस सी गूंजी, “कान्हा चले गए।” 

     

    राधा के हाथ से पीतल का लोटा छूटकर जमीन पर गिर गया, सारा पानी चारों तरफ बिखर गया, लेकिन राधा वहीं एक पत्थर की मूरत की भांति अचल खड़ी रह गईं। 

     

    उनकी आंखों से एक भी आंसू नहीं टपका, क्योंकि दिल पर जो वज्रपात हुआ था, उसने तो आंसुओं के स्त्रोत को भी भीतर ही सुखा दिया था।

    कुछ हफ्तों बीत जाने के बाद, जब मथुरा से एक शाही दूत ब्रज की सीमा में दाखिल हुआ, तो हर किसी की सांसे थम गईं। 

     

    वह दूत अपने साथ कुछ संदेश और कुछ राजसी उपहार लेकर आया था। लेकिन जब वह दूत नंदबाबा के घर पहुंचा, तो उसके पास राधा के लिए कहने को कोई खास शब्द या संतोषजनक बातें नहीं थीं। 

     

    उसने बस रूखे शब्दों में इतना बता दिया कि अब कृष्ण द्वारका के राजा बन चुके हैं। वे बड़े-बड़े महलों और अटारियों में रहते हैं, उनके पास अब सेवकों का पहरा है और वे राज्य के जटिल कामों में पूरी तरह व्यस्त हो चुके हैं।

     

    वह खबर सुनकर राधा का दिल अंदर तक बेचैन हो उठा। उन्हें उस संदेशवाहक की बातों पर बिल्कुल यकीन नहीं हुआ। उन्होंने अपने मन में ही खुद से सवाल किया, “राजा? मेरा कान्हा किसी ईंट-पत्थर के महल का राजा कैसे बन सकता है? वो तो इन भोले-भाले ग्वाल-बालों का, इन भोली गैयाओं का, गोवर्धन पर्वत की छांव का और इस ब्रज की जर्रे-जर्रे मिट्टी का असली कान्हा है!”

     

    बेचैनी जब हद से बढ़ गई, तो राधा से और न रहा गया। उन्होंने तुरंत एक पत्र लिखने का निर्णय किया। उस कागज पर स्याही से कम और उनके भीतर के आंसुओं की नमी से ज्यादा बात कही गई थी। उस पत्र में कोई कड़वी शिकायत नहीं थी, बस एक सीधा और निश्छल सवाल था,

    “हे कान्हा, क्या वो सारे पल, वो यमुना तट की रासलीला, वो सायंकाल की बेला में दिए गए तुम्हारे सारे वादे सब झूठ थे? क्या तुम सचमुच मुझे और इस संपूर्ण ब्रज को हमेशा के लिए भूल गए हो? मुझे कोई लंबी सफाई नहीं चाहिए, बस एक छोटा सा जवाब दे दो, कोई ऐसा संकेत भेज दो जो मुझे यह भरोसा दिला सके कि तुम आज भी वहीं हो जहां मेरी हर सांस चलती है।”

     

    वह पत्र एक बेहद विश्वस्त और पुराने चरवाहे के हाथों चुपचाप मथुरा भिजवा दिया गया। उसके बाद के कई हफ्ते राधा ने दिन-रात उसी द्वारका के रास्ते की तरफ देखते हुए बिताए, जहां से किसी भी दिशा में कोई आहट आने की उम्मीद बंधी रहती थी।

     

    आखिरकार, एक शाम जब सूरज अपनी लाली समेटकर क्षितिज में डूब रहा था, मथुरा की तरफ से एक भव्य रथ धूल उड़ाता हुआ ब्रज की सीमा पर आकर रुका। उस रथ से एक शाही संदेशवाहक नीचे उतरा। 

     

    उसके दोनों हाथों में एक सुंदर संदूकड़ी थी, जिस पर द्वारका के राजघराने की मोहर लगी हुई थी। यह खबर जंगल की आग की तरह पूरे ब्रज में फैल गई और देखते ही देखते सारा गांव इकट्ठा हो गया। यशोदा मैया की आंखें भी उस संदूकड़ी को देखकर भर आईं, क्योंकि वे जानती थी कि यह उनके लाल का भेजा हुआ कुछ है।

     

    वह संदेशवाहक बिना किसी देरी के सीधे राधा के द्वार पर पहुंचा। उसने आदर के साथ राधा को प्रणाम किया और वो शाही संदूकड़ी उनके कांपते हाथों में सौंप दी। उस वक्त राधा का दिल अपनी सामान्य गति से कई गुना तेज धड़क रहा था। उन्होंने गहरी सांस ली और अपने उन्हीं कांपते हाथों से उस संदूकड़ी के ढक्कन को उठाया।

     

    अंदर झांकने पर कोई लंबा-चौड़ा प्रेम पत्र नहीं मिला। न ही कोई सफाई दी गई थी, और न ही कोई मीठी या मल्हार जैसी बातें लिखी थीं।

     

    उस संदूकड़ी के भीतर सिर्फ दो ही चीजें रखी थीं: एक सुंदर और चमकदार मयूर पंख, जिसे हमेशा कान्हा अपने मुकुट में बड़े चाव से लगाया करते थे, और दूसरी चीज थी एक सूखा हुआ, पूरी तरह मुरझाया हुआ कमल का फूल। वह वही फूल था जो कभी यमुना के निर्मल जल में खिला करता था और जिसे एक दिन राधा ने अपने हाथों से बड़े प्रेम से कान्हा को भेंट किया था।

     

    राधा ने उन दोनों पुरानी चीजों को धीरे से उठाया। उन्होंने उस मयूर पंख को श्रद्धा से अपने माथे से लगा लिया। उस स्पर्श में कोई भाषा नहीं थी, कोई वाक्य नहीं था, लेकिन एक ऐसी गहरी गूंज थी जिसे केवल वही समझ सकती थीं। 

     

    उस पंख की दमकती चमक और उस सूखे हुए फूल की अनकही खामोशी ने मिलकर राधा को एक पल में वो सब कुछ समझा दिया, जिसे समझाने के लिए हजारों शब्दों की भी जरूरत नहीं पड़ती।

     

    कृष्ण ने लिखकर एक शब्द भी नहीं भेजा था, क्योंकि वे भली-भांति जानते थे कि शब्दों के छोटे दायरे में राधा के प्रेम को बांधा नहीं जा सकता। उनका यह मौन ही ब्रह्मांड का सबसे बड़ा और सबसे सटीक उत्तर था।

     

    उस मौन का सीधा अर्थ यह था कि भौतिक दूरियां चाहे जितनी भी बढ़ जाएं, राजमहलों की ऊंची दीवारें चाहे इंसानों के बीच कितनी भी दूरी क्यों न पैदा कर दें, लेकिन जो रूहानी बंधन दो दिलों के बीच बन चुका है, उसे किसी सांसारिक पद, प्रतिष्ठा या कोसों लंबी दूरी की कोई आवश्यकता नहीं होती। कृष्ण अब केवल ब्रज की गलियों में घूमने वाला एक ग्वाला नहीं, बल्कि एक ऐसी सर्वव्यापी चेतना बन चुके थे, जो हर कण में, हर हवा के झोंके में मौजूद थे।

     

    यह अहसास होते ही राधा ने एक लंबी और सुकून भरी सांस ली। उनके उदास चेहरे पर अचानक एक बेहद हल्की और संतुष्ट मुस्कान तैर गई, वो मुस्कान जिसमें एक गहरा दर्द भी था और उससे कहीं ज्यादा एक अद्भुत आंतरिक शांति भी थी। 

     

    उन्होंने पास खड़े हैरान ग्रामीणों की तरफ देखा और धीमी आवाज में कहा, “मेरे काले ने मुझे मेरा उत्तर दे दिया है। उसने साफ कह दिया है कि वो ब्रज छोड़कर कहीं नहीं गया, वो आज भी यहीं, हम सबके भीतर मौजूद है।”

     

    गांव वाले थोड़े अचंभित थे, वे राधा के चेहरे को टकटकी लगाकर देख रहे थे कि बिना किसी पत्र के आखिर उन्होंने ऐसा क्या पढ़ लिया। लेकिन राधा इस सच्चाई को पूरी तरह जानती थीं। 

     

    उस शाम, बहुत लंबे अरसे के बाद, राधा ने अपने आंगन में तुलसी के पास फिर से सुकून भरे कदम रखे। उसी वक्त पास के कदंब के पेड़ की एक हरी पत्ती हवा के झोंके से हिली, और राधा को ऐसा आभास हुआ जैसे दूर किसी अछोर लोक से बंसी की कोई बहुत ही धीमी और मीठी सी धुन उनके कानों में गूंज रही हो। 

     

    प्रेम कभी भी शब्दों का मोहताज नहीं होता, वह तो केवल गहराई से महसूस किया जाता है, और आज राधा ने उस संपूर्ण मौन के भीतर कृष्ण को पहले से कहीं ज्यादा अपने करीब पा लिया था।

     

    क्या प्रेम करने वाला व्यक्ति अपने प्रिय को उसके कर्तव्य के लिए विदा कर सकता है?

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    Neha Goyal

    मेरा नाम नेहा गोयल है। और पिछले दो वर्ष से मैं प्रतिलिपि पर कहानियां लिखती आ रही हूँ। मुझे लेखन करते हुए बहुत ही अच्छा लगता है। वैसे मुझे लिखने से पढ़ना ज्यादा पसंद है।

  • 🌸 वृंदावन का वो आखिरी दिन

    🌸 वृंदावन का वो आखिरी दिन

    पढ़ने का समय : 9 मिनट

    भाग 3 मैया का कान्हा 🦚❤️

     

    वो रात जैसे बीती ही नहीं थी।

    नंद भवन के आँगन में रखे दीपक की लौ पूरी रात काँपती रही और उसके साथ यशोदा मैया का मन भी। कभी वह कृष्ण लल्ला के कक्ष के बाहर खड़ी हो जाती, कभी भीगती आंखों से अन्दर झांककर सोए हुए कान्हा जो देखती।

     

    फिर अगले ही क्षण वापिस लौट आती। लेकिन कुछ ही देर बाद मन उन्हें दोबारा वहाँ ले जाता।

    माँ का हृदय शायद आने वाले तूफान को सबसे पहले पहचान लेता है।

     

    उस रात भी यशोदा का हृदय बार-बार कह रहा था, “कुछ होने वाला है।”

     

    भोर की पहली किरण अभी आकाश पर उभरी भी नहीं थी कि वो उठकर रसोई में चली गईं, उन्होंने चूल्हा जलाया, माखन निकाला, मिश्री रखी।

     

    कृष्ण को जो-जो पसंद था, वह सब बनाने लगीं।

    आज वह सामान्य से कहीं अधिक भोजन बना रही थीं।

     

    जैसे उन्हें डर हो कि अगर आज कान्हा को भरपेट खिला दिया, तो शायद वह कहीं नहीं जाएगा।

    थोड़ी देर बाद पीछे से एक मधुर आवाज आई, “मैया…”

     

    मैया का हाथ वहीं रुक गया, उन्होंने धीरे से पलटकर देखा, श्री कृष्ण द्वार पर खड़े थे, बाल थोड़े बिखरे हुए, आँखों में नींद की हल्की-सी चमक और चेहरे पर वही मासूम मुस्कान।

     

    बिल्कुल वही कान्हा… जिसे देखकर यशोदा की दुनिया पूरी हो जाती थी। लेकिन आज उस चेहरे को देखकर उनकी आँखें भर आईं।

     

    कृष्ण ने तुरंत पूछ लिया, “क्या हुआ मैया?”

     

    यशोदा ने अपना चेहरा दूसरी ओर कर लिया। “कुछ नहीं।”

     

    कृष्ण धीरे-धीरे उनके पास आए। “आप रो रही हैं?”

     

    “नहीं।”

     

    “तो आँखों में पानी क्यों है?”

     

    मैया ने झुँझलाकर कहा, “धुएँ की वजह से।”

     

    कृष्ण ने चूल्हे की ओर देखा। “लेकिन धुआँ तो उधर है।”

     

    यशोदा के पास कोई उत्तर नहीं था, कृष्ण मुस्कुरा दिए।

    फिर उन्होंने अपना सिर यशोदा के कंधे पर रख दिया।

    “मैया…”

     

    यशोदा की आँखों से आँसू निकल पड़े, उन्होंने तुरंत कृष्ण को अपनी बाँहों में भर लिया। “तू कहीं नहीं जाएगा।”

     

    कृष्ण शांत रहे, यशोदा ने उन्हें और कसकर पकड़ लिया।

    “सुना तुमने?”

     

    “हाँ, मैया।”

     

    “तुम मथुरा नहीं जाओगे।”

     

    कुछ पल तक केवल चूल्हे में जलती लकड़ियों की आवाज आती रही।

    फिर कृष्ण ने बहुत धीमे स्वर में कहा, “मैया…”

     

    “नहीं!” यशोदा ने तुरंत उनकी बात रोक दी। “मुझे कुछ नहीं सुनना।”

     

    “लेकिन…”

     

    “कोई लेकिन नहीं।” उन्होंने कृष्ण का चेहरा अपने हाथों में थाम लिया।

    “तुम्हें पता भी है मथुरा कैसी जगह है? वहाँ का राजा कंस है। जिसने न जाने कितनी बार तुम्हें नुकसान पहुँचाने की कोशिश की। जिसने…”

     

    यशोदा की आवाज काँप गई। “मैं तुम्हें उसके पास कैसे भेज दूँ?”

     

    लला ने उनकी आँखों में देखा। “मैं अकेला नहीं जाऊँगा।”

     

    “तो?”

     

    “दाऊ मेरे साथ होंगे।”

     

    “मुझे बलराम पर भी भरोसा है।” मैया ने तुरंत कहा, “लेकिन मुझे उस कंस पर भरोसा नहीं है!”

     

    कृष्ण कुछ नहीं बोले। यशोदा ने थाली उठाई और उनके सामने रख दी।

    “पहले खाना खाओ।” कृष्ण बैठ गए।

     

    मैया ने उन्हें अपने हाथ से खिलाना शुरू किया।

     

    हर निवाला देते समय उनकी उँगलियाँ काँप रही थीं, कृष्ण ने देखा। “मैया, इतना सारा खाना?”

     

    “हाँ।”

     

    “क्यों?”

     

    “मथुरा में पता नहीं तुम्हें ऐसा खाना मिले या नहीं।”

     

    कृष्ण हल्का-सा मुस्कुराए। “वहाँ भी कोई मैया होगी क्या?”

     

    यशोदा का हाथ वहीं रुक गया, उन्होंने कृष्ण को देखा।

    “मेरे कान्हा को मुझ जैसी मैया कहाँ मिलेगी?”

     

    कृष्ण ने उनकी उँगली पकड़ ली, “मुझे दूसरी मैया चाहिए भी नहीं।”

     

    यशोदा का हृदय भर आया उन्होंने कृष्ण के सिर पर हाथ रख दिया।

    “तो मत जाओ।”

     

    इस बार उनकी आवाज में आदेश नहीं था, एक माँ की विनती थी। “मत जाओ, कान्हा।”

     

    कृष्ण की आँखों में भी क्षणभर के लिए नमी उतर आई।

     

    —

     

    कुछ देर बाद नंद बाबा भी वहाँ आ गए, उन्होंने यशोदा को देखा। “अब भी समझा रही हो?”

     

    यशोदा ने उनकी ओर देखा, “मैं अपने पुत्र को बचाने की कोशिश कर रही हूँ।”

     

    नंद बाबा चुप हो गए। मैया ने कहा, “आप भी कह दीजिए कि कृष्ण नहीं जाएगा।”

     

    नंद बाबा ने गहरी साँस ली। “यशोदा…”

     

    “कहिए।”

     

    “अगर बात केवल मेरे हाथ में होती…” वह रुक गए।

     

    यशोदा समझ गईं। “आप भी उसे जाने देंगे?”

     

    “मैं उसे भेजना नहीं चाहता।”

     

    “फिर?”

     

    नंद बाबा ने कृष्ण की ओर देखा। “लेकिन शायद यह केवल हमारे चाहने या न चाहने की बात नहीं है।”

     

    मैया की आँखें भर आईं। “हर कोई यही क्यों कह रहा है कि यह आवश्यक है?”

     

    कृष्ण उठे। उन्होंने दोनों के पास जाकर कहा, “क्योंकि कुछ रास्ते हमें चुनने नहीं पड़ते, मैया। वे हमें चुनते हैं।”

     

    मैया ने तुरंत उनकी ओर देखा। “तुम्हें किसने सिखाई इतनी बड़ी-बड़ी बातें?”

     

    कृष्ण मुस्कुराए। “आपने।”

     

    “मैंने?”

     

    “हाँ। आपने ही तो सिखाया था कि जब कोई गलत काम सामने हो, तो उससे डरकर पीछे नहीं हटना चाहिए।”

     

    यशोदा चुप हो गईं। कृष्ण उनके सामने बैठ गए।

    “मैया, अगर किसी पर संकट हो और हम उसे बचा सकते हों, तो क्या हमें घर में छिप जाना चाहिए?”

     

    यशोदा ने धीरे से सिर हिलाया। “नहीं।”

     

    “अगर कोई अन्याय कर रहा हो और उसे रोकने की शक्ति हमारे पास हो, तो क्या हमें आँखें बंद कर लेनी चाहिए?”

     

    “नहीं।”

     

    “तो फिर…”

     

    कृष्ण ने उनका हाथ अपने हाथों में ले लिया। “अगर मुझे मथुरा जाना पड़े, तो क्या मुझे केवल इसलिए पीछे हट जाना चाहिए कि मुझे आपसे दूर होना पड़ेगा?”

     

    मैया ने कोई उत्तर नहीं दिया, उनकी आँखों में आँसू भर आए। “लेकिन तुम मेरे पुत्र हो।”

     

    कृष्ण मुस्कुराए। “हाँ।”

     

    “मेरे लल्ला।”

     

    “हाँ।”

     

    “मेरी जान।”

     

    कृष्ण ने उनके हाथ को अपने माथे से लगा लिया। “हाँ, मैया।”

     

    यशोदा ने उन्हें खींचकर अपने सीने से लगा लिया।

    “फिर मेरा दिल कैसे मान जाए कि तू जाएगा?”

     

    कृष्ण ने आँखें बंद कर लीं। “दिल को मनाना मत, मैया।”

     

    यशोदा ने उन्हें देखा। “बस मुझे अपने साथ महसूस करना।”

     

    —

     

    उस दिन दोपहर तक मैया ने कृष्ण को अपने पास से हटने ही नहीं दिया, कभी वह उनके बालों में तेल लगातीं।

    कभी उनके लिए भोजन बनातीं।

     

    कभी पुराने कपड़े निकालकर उन्हें दिखातीं। “याद है यह?”

     

    कृष्ण हँस पड़े। “मैया, यह तो बहुत छोटा है।”

     

    “तब तुम इतने-से थे।”

     

    “और आपने तब भी मुझे बाँधने की कोशिश की थी।”

     

    यशोदा भी मुस्कुरा दीं। “हाँ।”

     

    “माखन की चोरी पर।”

     

    “तुमने पूरा घर सिर पर उठा लिया था।”

     

    कृष्ण हँसे, यशोदा उन्हें देखती रहीं, फिर अचानक उनकी मुस्कान गायब हो गई।

    उन्होंने कृष्ण के गाल को छुआ। “कान्हा…”

     

    “जी?”

     

    “वहाँ जाकर मुझे भूल तो नहीं जाओगे?”

     

    कृष्ण कुछ क्षण उन्हें देखते रहे।

     

    फिर बोले, “जिसे भूलने के लिए हृदय चाहिए होता है, उसे भूलने के लिए मैं अपना हृदय ही कैसे भूल जाऊँ?”

     

    यशोदा की आँखें नम हो गईं। “तू बातें बहुत अच्छी करने लगा है।”

     

    कृष्ण मुस्कुराए। “आपसे सीखी हैं।”

     

    “झूठे।”

     

    “सच।”

     

    दोनों कुछ देर हँसते रहे , लेकिन उस हँसी के पीछे छिपे आँसू दोनों जानते थे।

     

    —

     

    शाम ढलने लगी, कृष्ण बाहर जाने के लिए उठे।

     

    यशोदा ने उनका हाथ पकड़ लिया। “कहाँ?”

     

    “दाऊ के साथ जाना है।”

     

    “कहाँ?”

     

    “यमुना किनारे।”

     

    “नहीं।”

     

    कृष्ण ने आश्चर्य से देखा। “क्यों?”

     

    “आज नहीं।”

     

    “मैया…”

     

    “आज मेरे पास रहो।”

     

    कृष्ण कुछ नहीं बोले, फिर वापस बैठ गए।

    यशोदा ने उनका सिर अपनी गोद में रख लिया।

     

    बाहर हवा चल रही थी, तुलसी के पत्ते हिल रहे थे।

     

    दूर किसी घर से बाँसुरी की धुन सुनाई दे रही थी।

     

    यशोदा कृष्ण के बालों में उँगलियाँ फेरते हुए बोलीं, 

    “कान्हा, अगर मैं तुमसे कहूँ कि मत जाओ… तो क्या तुम मेरी बात मानोगे?”

     

    कृष्ण ने आँखें बंद रखीं, बहुत देर तक कोई उत्तर नहीं आया।

     

    फिर उन्होंने धीरे से कहा, “अगर केवल मेरा मन होता…”

     

    मैया की उँगलियाँ रुक गईं। “तो?”

     

    कृष्ण ने आँखें खोलीं। “तो मैं कभी वृंदावन से बाहर नहीं जाता।”

     

    मैया का हृदय जैसे टूट गया। “फिर भी जा रहे हो, कान्हा?”

     

    कृष्ण ने उनकी ओर देखा। “मैया, कभी-कभी अपने लोगों की रक्षा करने के लिए उनसे दूर जाना पड़ता है।”

     

    “लेकिन तुम तो सबकी रक्षा करते हो…”

     

    कृष्ण मुस्कुराए। “तो फिर मुझ पर विश्वास रखिए।”

     

    मैया ने उनकी आँखों में देखा, उन्हें पहली बार लगा…

     

    कि वह जिस बालक को अपनी गोद में लिए बैठी हैं, उसके भीतर कुछ ऐसा है जिसे वह पूरी तरह समझ नहीं सकतीं।

     

    लेकिन उनके लिए वह फिर भी वही था, उनका कान्हा।

     

    उनका लल्ला। उनकी साँस।

     

    उन्होंने कृष्ण के माथे को चूमा। “जाओ…”

     

    यह शब्द उनके होंठों से बड़ी कठिनाई से निकला।

     

    कृष्ण ने आश्चर्य से उन्हें देखा। “लेकिन…”

     

    यशोदा ने आँसू पोंछे। “मैं तुम्हें रोकूँगी नहीं।”

     

    कृष्ण ने उनका हाथ पकड़ लिया।

    “मैया…”

     

    “हाँ, डर लग रहा है।” उन्होंने सच स्वीकार किया।

    “बहुत डर लग रहा है।”

     

    फिर उन्होंने कृष्ण के सिर पर हाथ रखा। “लेकिन अगर तुम्हारा जाना किसी बड़े काम के लिए है…”

     

    उनकी आवाज काँप रही थी। “तो मेरी ममता तुम्हारे रास्ते की दीवार नहीं बनेगी।”

     

    कृष्ण की आँखें नम हो गईं, यशोदा ने उन्हें आशीर्वाद दिया।

    “बस एक बात याद रखना।”

     

    “क्या?”

     

    “जहाँ भी रहना…”

     

    उन्होंने कृष्ण के गाल पर हाथ रखा। “खाना समय पर खाना।”

     

    कृष्ण हँस पड़े, यशोदा भी रोते हुए मुस्कुरा दीं।

    “और…”

     

    “और?”

     

    “किसी से झगड़ा मत करना।”

     

    कृष्ण ने शरारती अंदाज में कहा, “अगर कोई मुझसे झगड़ा करे तो?”

     

    “तो वहाँ से चले आना।”

     

    “और अगर वह बहुत गलत हो?”

     

    यशोदा चुप हो गईं।

     

    कृष्ण मुस्कुराए। “तब?”

     

    यशोदा ने उनकी आँखों में देखते हुए कहा, “तब वही करना… जो तुम्हें सही लगे।”

     

    कृष्ण ने उनकी गोद से उठकर उनके चरण छुए।

    यशोदा घबरा गईं। “ये क्या कर रहे हो?”

     

    कृष्ण ने कहा, “आपका आशीर्वाद लेने आया हूँ।”

     

    यशोदा ने काँपते हाथों से उनके सिर पर हाथ रखा।

    “विजयी भव।”

     

    कृष्ण ने सिर उठाया, माँ की आँखों में आँसू थे।

     

    लेकिन उन आँसुओं के पीछे अब भय के साथ विश्वास भी था।

     

    —

     

    रात गहरी हो चुकी थी। नंद भवन के बाहर वृंदावन की गलियाँ शांत थीं। लेकिन यशोदा अभी भी जाग रही थीं।

    कृष्ण उनके पास बैठे थे। दोनों के बीच कोई शब्द नहीं था।

     

    फिर कृष्ण ने धीरे से अपनी बाँसुरी उठाई। “मैया?”

     

    “हूँ?”

     

    “एक बात कहूँ?”

     

    “कहो।”

     

    “अगर कभी मेरी याद आए…”

     

    उन्होंने बाँसुरी को होंठों से लगाया। “तो समझ लेना, मैं यहीं हूँ।”

    अगले ही क्षण बाँसुरी की धुन पूरे नंद भवन में फैल गई।

     

    यशोदा की आँखें बंद हो गईं, उनके आँसू गालों पर बहते रहे, लेकिन उनके चेहरे पर शांति उतर आई।

    क्योंकि उस पल उन्हें लगा, कृष्ण कहीं नहीं जा रहे।

     

    वह तो हमेशा उनके पास रहेंगे। बाँसुरी की उस धुन में…

    वृंदावन की उस हवा में… और सबसे बढ़कर… उनके हृदय में।

     

    लेकिन उन्हें क्या पता था… कि अगली सुबह अक्रूर का रथ नंद भवन के द्वार पर खड़ा होगा।

     

    और तब… यशोदा को अपने उस वचन की सबसे कठिन परीक्षा देनी होगी, “मैं तुम्हें रोकूँगी नहीं।”

     

    क्योंकि प्रेम में किसी को अपना बनाना आसान है…

    पर प्रेम में किसी अपने को उसके कर्तव्य के लिए विदा करना, 

    शायद संसार का सबसे कठिन त्याग है। 🦚❤️

     

    कहानी आगे जारी रहेगी 

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    Neha Goyal

    मेरा नाम नेहा गोयल है। और पिछले दो वर्ष से मैं प्रतिलिपि पर कहानियां लिखती आ रही हूँ। मुझे लेखन करते हुए बहुत ही अच्छा लगता है। वैसे मुझे लिखने से पढ़ना ज्यादा पसंद है।

  • 🌸 वृंदावन का वो आखिरी दिन

    🌸 वृंदावन का वो आखिरी दिन

    पढ़ने का समय : 10 मिनट

     

    भाग 2 — कंस का संदेश 🦚

     

    वृंदावन की उस सुबह के बाद दिन तो बीत गया था…

    लेकिन यशोदा मैया के मन की बेचैनी नहीं बीती।

     

    सूरज ढलने लगा था।

     

    आकाश पर लालिमा फैल चुकी थी। यमुना का जल सूर्य की अंतिम किरणों को अपने भीतर समेटे धीरे-धीरे शांत हो रहा था। गौएँ चरागाह से लौट रही थीं और उनके गलों में बंधी घंटियों की आवाज पूरे वृंदावन में एक मधुर संगीत की तरह फैल रही थी।

     

    गोपियाँ अपने-अपने घरों के बाहर खड़ी होकर गायों का स्वागत कर रही थीं।

    ग्वालबाल दिनभर की शरारतों के किस्से सुनाते हुए अपने घरों की ओर जा रहे थे।

     

    और नंद भवन के आँगन में… श्री कृष्ण अपनी बाँसुरी लेकर बैठे थे, उनके पास ही बैठे थे उनके बड़े भाई बलराम 

     

    कभी कृष्ण कुछ कहते और बलराम हँस पड़ते।

    कभी दोनों बिना कुछ बोले ही यमुना की ओर देखते रहते। सब कुछ सामान्य था। फिर भी…

     

    मैया यशोदा को कुछ सामान्य नहीं लग रहा था।

    वह रसोई में खड़ी थीं, लेकिन बार-बार उनकी नजर कृष्ण पर जा रही थी।

     

    सुबह कृष्ण ने जो बात कही थी, वह उनके मन से निकल ही नहीं रही थी।

     

    “अगर कभी आपका कान्हा आपसे दूर चला जाए तो?”

     

    मैया ने सिर झटक दिया।

     

    “नहीं…” उन्होंने खुद से कहा। “मेरा कान्हा ऐसा कुछ नहीं कह सकता।”

     

    लेकिन मन था कि मान ही नहीं रहा था। तभी बाहर से नंद बाबा की आवाज आई, “यशोदा!”

     

    मैया ने वहीं से आवाज लगाई, “जी?”

     

    “जरा बाहर आना।”

     

    वो हाथ पोंछते हुए बाहर आईं, नंद बाबा मुख्य द्वार के पास खड़े थे। उनके चेहरे पर गंभीरता थी।

     

    “क्या हुआ?” यशोदा ने पूछा।

     

    नंद बाबा ने कुछ कहने के लिए होंठ खोले ही थे कि तभी बाहर से घोड़ों के दौड़ने की आवाज सुनाई दी , टापों की आवाज धीरे-धीरे तेज होती गई।

     

    नंद भवन के द्वार पर खड़े सेवक ने बाहर झाँककर देखा।

    “महाराज…”

     

    नंद बाबा उसकी ओर मुड़े। “क्या हुआ?”

     

    “एक रथ आ रहा है।”

     

    “किसका?”

     

    सेवक ने दूर देखते हुए कहा, “पहचान में नहीं आ रहा।”

     

    नंद बाबा कुछ क्षण शांत रहे। फिर बोले, “द्वार खोल दो।”

     

    कुछ ही पल बाद एक सुंदर रथ नंद भवन के सामने आकर रुका। रथ से एक गंभीर, तेजस्वी पुरुष नीचे उतरे।

    चेहरे पर थकान थी… लेकिन आँखों में गहरी भक्ति।

     

    उन्होंने जैसे ही नंद बाबा को देखा, हाथ जोड़ दिए। “नंद महाराज।”

     

    नंद बाबा आगे बढ़े। “आप?”

     

    उन्होंने ध्यान से देखा। फिर पहचानते ही बोले, “अक्रूर जी!”

    यशोदा भी उनके पास आ गईं।

     

    अक्रूर ने दोनों को प्रणाम किया। “महाराज, मैया…”

     

    नंद बाबा ने उनका स्वागत करते हुए कहा, “आइए। इतनी संध्या के समय आपका आगमन… सब कुशल तो है?”

     

    अक्रूर ने एक क्षण नंद बाबा की ओर देखा। उनके चेहरे पर कुछ ऐसा था कि नंद बाबा का मन और भी बेचैन हो गया।

     

    “सब कुशल है ना?” इस बार नंद बाबा की आवाज में चिंता स्पष्ट थी।

     

    अक्रूर ने धीरे से सिर झुकाया। “मैं एक संदेश लेकर आया हूँ।”

     

    यशोदा के हृदय में जैसे अचानक कोई अनजाना भय जाग उठा। उन्होंने बिना जाने ही कृष्ण की ओर देखा।

    कृष्ण अब भी आँगन में बैठे थे। लेकिन उनकी आँखें…

    सीधे अक्रूर पर थीं।

     

    जैसे वह पहले से जानते हों कि अक्रूर क्यों आए हैं।

     

    —

     

    नंद बाबा अक्रूर को भीतर ले गए।

     

    कृष्ण और बलराम भी कुछ दूरी पर खड़े हो गए।

     

    मैया ने कृष्ण का हाथ पकड़ लिया। “तुम यहीं रहना।”

     

    कृष्ण ने उनकी ओर देखा। “क्यों मैया?”

     

    “बस…” यशोदा के पास कोई कारण नहीं था।

     

    उन्हें स्वयं समझ नहीं आ रहा था कि वह ऐसा क्यों कह रही हैं। अंदर सभा-कक्ष में नंद बाबा ने अक्रूर को आसन दिया।

    “बताइए।”

     

    अक्रूर कुछ क्षण मौन रहे। फिर उन्होंने कहा, “महाराज… मैं मथुरा से आया हूँ।”

     

    “मथुरा से?”

     

    “हाँ।”

     

    नंद बाबा का चेहरा गंभीर हो गया, “किसलिए?”

     

    अक्रूर ने गहरी साँस ली। “महाराज कंस ने एक धनुष यज्ञ का आयोजन किया है।”

     

    नंद बाबा ने सिर हिलाया। “यह तो सुना है।”

     

    “उसने वृंदावन से भी लोगों को आमंत्रित किया है।”

     

    “ठीक है।”

    नंद बाबा कुछ सहज हुए।

     

    लेकिन अगले ही शब्दों ने उनके चेहरे का रंग बदल दिया।

     

    “विशेष रूप से कृष्ण और बलराम को।”

     

    कमरे में अचानक सन्नाटा छा गया। यशोदा के हाथ से पानी का पात्र लगभग छूट गया।

    “कृष्ण… और बलराम?”

     

    अक्रूर ने धीरे से सिर झुका दिया। “हाँ, मैया।”

     

    यशोदा ने तुरंत कहा, “लेकिन क्यों?”

     

    अक्रूर ने उनकी ओर देखा। उनकी आँखों में करुणा थी।

     

    “राजा कंस ने उन्हें मथुरा बुलाया है।”

     

    यशोदा आगे बढ़ीं। “कितने दिनों के लिए?”

     

    अक्रूर चुप रहे, यशोदा की आँखें फैल गईं।

    “मैंने पूछा… कितने दिनों के लिए?”

     

    अक्रूर ने कोई उत्तर नहीं दिया, नंद बाबा समझ गए।

     

    उन्होंने धीमी आवाज में पूछा, “क्या यह केवल धनुष यज्ञ के लिए बुलावा है?”

     

    अक्रूर ने उनकी आँखों में देखा। “नहीं।”

     

    बस एक शब्द और नंद भवन की सारी शांति जैसे टूट गई।

     

    —

     

    यशोदा ने तुरंत कृष्ण को अपनी ओर खींच लिया। “मेरा बेटा कहीं नहीं जाएगा।”

     

    कृष्ण शांत खड़े रहे। “मैया…”

     

    “नहीं!” यशोदा की आँखों में आँसू आ गए।

     

    “मुझे नहीं पता राजा कंस ने क्यों बुलाया है। मुझे यह भी नहीं जानना कि वहाँ क्या उत्सव है, क्या यज्ञ है… मेरा कान्हा कहीं नहीं जाएगा।”

     

    नंद बाबा ने उन्हें समझाने की कोशिश की। “यशोदा…”

     

    “नहीं जी!” यशोदा ने उनकी ओर देखा।

    “आप कुछ मत कहिए।”

     

    फिर वह अक्रूर की ओर मुड़ीं। “आप वापस चले जाइए।”

     

    अक्रूर स्तब्ध रह गए। “मैया…”

     

    “कह दीजिए कंस से कि कृष्ण नहीं आएगा।”

     

    अक्रूर ने सिर झुका लिया। “काश मैं ऐसा कर पाता।”

     

    “तो कीजिए।” यशोदा की आवाज टूट गई। “आप नहीं जानते… वह मेरे लिए क्या है।”

     

    अक्रूर की आँखें नम हो गईं। “मैं जानता हूँ, मैया।”

     

    “नहीं!” यशोदा ने कृष्ण का चेहरा अपने हाथों में थाम लिया। “कोई नहीं जानता।”

     

    उन्होंने कृष्ण को अपने सीने से लगा लिया। “मेरे लिए यह भगवान नहीं है…”

    उनकी आवाज काँप रही थी। “यह मेरा पुत्र है।”

     

    कृष्ण ने धीरे से उनकी पीठ पर हाथ रखा। “मैया…”

     

    “तुम कहीं नहीं जाओगे।”

    कृष्ण चुप रहे। उनकी आँखें कुछ पल के लिए नंद बाबा पर गईं।

     

    नंद बाबा की आँखों में भी चिंता थी। लेकिन उस चिंता के पीछे कुछ और था।

     

    जैसे उन्हें भीतर से पता हो कि यह बुलावा केवल एक उत्सव का निमंत्रण नहीं है।

     

    —

     

    अक्रूर ने धीरे से कहा, “नंद महाराज, मुझे एक बात कहनी है।”

     

    नंद बाबा ने उनकी ओर देखा। “कहिए।”

     

    “मैं स्वयं भी इस यात्रा को लेकर प्रसन्न नहीं हूँ।”

     

    यशोदा ने उनकी ओर देखा।

     

    अक्रूर बोले, “लेकिन मुझे विश्वास है कि कृष्ण और बलराम का मथुरा जाना किसी बड़े उद्देश्य का भाग है।”

     

    नंद बाबा ने तुरंत पूछा, “आप ऐसा क्यों कह रहे हैं?”

     

    अक्रूर कुछ क्षण मौन रहे। फिर बोले, “क्योंकि कंस कृष्ण से भयभीत है।”

     

    कमरे में सन्नाटा छा गया। “भयभीत?” नंद बाबा ने दोहराया।

     

    अक्रूर ने सिर हिलाया। “हाँ।”

     

    “लेकिन कृष्ण ने उसका क्या बिगाड़ा है?”

     

    “यही तो बात है।”

     

    अक्रूर की आवाज धीमी थी। “कंस कृष्ण से इसलिए नहीं डरता कि कृष्ण ने उसका कुछ बिगाड़ा है… वह इसलिए डरता है क्योंकि उसे अपने अंत का भय है।”

     

    यशोदा का हृदय धक से रह गया। “कैसा अंत?”

     

    अक्रूर ने उत्तर नहीं दिया।

    नंद बाबा ने गंभीर होकर पूछा, “क्या भविष्यवाणी वाली बात…”

     

    अक्रूर ने धीरे से सिर झुका दिया, यशोदा ने कृष्ण को और कसकर पकड़ लिया। उनके मन में वर्षों पुरानी बातें कौंधने लगीं।

    कृष्ण का जन्म… उस रात की रहस्यमयी घटनाएँ…

    गोकुल में उनका आना… कंस के भेजे असुर…

    पूतना… शकटासुर… त्रिणावर्त… कालिया…

    गोवर्धन…

     

    एक-एक घटना जैसे अचानक उनके सामने जीवित हो उठी।

    क्या यह सब उसी दिन की ओर बढ़ रहा था? क्या कृष्ण का वृंदावन में रहना अब संभव नहीं था?

    यशोदा ने कृष्ण की ओर देखा, वह शांत थे।

     

    असामान्य रूप से शांत। “कान्हा…”

     

    कृष्ण ने उनकी आँखों में देखा। “हाँ, मैया।”

     

    “तुम्हें डर नहीं लग रहा?”

     

    कृष्ण मुस्कुराए। “किस बात का?”

     

    “मथुरा जाने का।”

     

    कृष्ण ने धीरे से कहा, “जहाँ आपका आशीर्वाद हो, वहाँ डर कैसा?”

     

    यशोदा की आँखों से आँसू बह निकले। उन्होंने तुरंत अपना चेहरा दूसरी ओर कर लिया।

     

    वह नहीं चाहती थीं कि कृष्ण उन्हें रोते हुए देखें, लेकिन कृष्ण सब समझ रहे थे।

     

    —

     

    उस रात नंद भवन में किसी ने ठीक से भोजन नहीं किया।

     

    गोपियों तक यह समाचार पहुँच चुका था, धीरे-धीरे पूरा वृंदावन जान गया, कृष्ण और बलराम को मथुरा बुलाया गया है।

     

    गलियों में फुसफुसाहट होने लगी।

    किसी ने कहा, “कृष्ण को नहीं जाना चाहिए।”

     

    किसी ने कहा, “कंस पर विश्वास कैसे किया जा सकता है?”

    किसी ने कहा, “यह जरूर कोई चाल है।”

     

    और किसी ने बस इतना कहा, “अगर कृष्ण चले गए तो वृंदावन का क्या होगा?”

     

    यमुना किनारे राधा खड़ी थीं, उन्हें भी समाचार मिल चुका था। हवा में वही बाँसुरी की धुन जैसे अब भी तैर रही थी।

     

    लेकिन आज… वह धुन उन्हें खुश नहीं कर रही थी।

    उनकी आँखों के सामने कृष्ण का चेहरा था। सुबह का वही प्रश्न याद आ रहा था, “अगर कभी आपका कान्हा आपसे दूर चला जाए तो?”

     

    राधा की आँखों से एक आँसू गिरा, उन्होंने यमुना की ओर देखा।

    “तो क्या सच में…” उनकी आवाज हवा में खो गई।

    “कान्हा हमसे दूर जाने वाले हैं?”

     

    —

     

    नंद भवन में उस रात कृष्ण अपने कक्ष में बैठे थे, बलराम उनके सामने थे।

    कुछ देर दोनों भाई मौन रहे। फिर बलराम ने पूछा, “तुम्हें पहले से पता था?”

     

    कृष्ण ने मुस्कुराकर उनकी ओर देखा। “क्या?”

     

    “अक्रूर के आने के बारे में।”

     

    कृष्ण ने उत्तर नहीं दिया। बलराम समझ गए। “तुम जानते थे।”

     

    कृष्ण ने धीरे से बाँसुरी उठाई। “दाऊ…”

     

    “हूँ?”

     

    “कभी-कभी जीवन हमें वहाँ ले जाता है जहाँ जाने की हमने इच्छा नहीं की होती।”

     

    बलराम ने उनकी आँखों में देखा। “और अगर कोई तुम्हें रोकना चाहे?”

     

    कृष्ण ने कुछ क्षण सोचा, फिर मुस्कुराए।

    “तो उसे प्रेम से समझाना होगा।”

     

    “और अगर प्रेम ही तुम्हें रोक ले?”

     

    इस बार कृष्ण की मुस्कान थोड़ी फीकी पड़ गई, उन्होंने बाहर देखा। आँगन में यशोदा मैया बैठी थीं, उनकी आँखें कृष्ण के कक्ष की ओर थीं।

     

    कृष्ण कुछ पल उन्हें देखते रहे। फिर धीरे से बोले, “तब सबसे कठिन होता है… जाना।”

     

    उनकी उँगलियाँ बाँसुरी पर ठहर गईं, बाहर रात गहरी होती जा रही थी।

    वृंदावन सो रहा था, लेकिन उस रात… नंद भवन में कोई नहीं सोया।

    एक माँ अपने पुत्र को खोने के भय में जाग रही थी।

     

    एक पिता अपने कर्तव्य और पुत्र के बीच खड़ा था।

    एक भाई आने वाले संघर्ष को महसूस कर रहा था।

     

    एक युवती यमुना किनारे अपने प्रिय के जाने की आहट सुन रही थी।

     

    और कृष्ण… वह सबसे शांत बैठे थे।

    जैसे उन्हें पता हो कि अगली सुबह से वृंदावन की हर साँस बदलने वाली है।

     

    क्योंकि अक्रूर केवल कंस का संदेश लेकर नहीं आए थे।

     

    वह अपने साथ…

    वृंदावन के विरह की पहली सुबह भी लेकर आए थे। 🦚❤️

     

    हम दिन में जाने कितने बुरे विचार लाते हैं या कहते हैं इसलिए एक बार साफ मन से 

    🌺 राधे राधे 🌺 कहते जाइए।

    और अगर आपको कहानी अच्छी लगी हो तो लाइक और कमेंट भी कर देना

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    Neha Goyal

    मेरा नाम नेहा गोयल है। और पिछले दो वर्ष से मैं प्रतिलिपि पर कहानियां लिखती आ रही हूँ। मुझे लेखन करते हुए बहुत ही अच्छा लगता है। वैसे मुझे लिखने से पढ़ना ज्यादा पसंद है।

  • 🌸 वृंदावन का वो आखिरी दिन

    🌸 वृंदावन का वो आखिरी दिन

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

     

    भाग 1 — वृंदावन की वो सुबह 🦚

     

    वृंदावन में सुबह कभी केवल सुबह नहीं होती थी।

     

    वहाँ सूरज की पहली किरण के साथ जैसे कोई बाँसुरी जन्म लेती थी…

    यमुना की लहरें उसे सुनती थीं, कदंब के वृक्ष झूमकर उसका स्वागत करते थे और गलियों में बिखरी धूल भी जैसे उस धुन पर नाचने लगती थी।

     

    उस दिन भी वृंदावन वैसा ही जागा था।

     

    आकाश अभी पूरी तरह लालिमा से नहीं भरा था। पूर्व दिशा में हल्की सुनहरी आभा फैल रही थी। यमुना का जल शांत था और उसके ऊपर तैरती धुंध की पतली चादर धीरे-धीरे सूरज की किरणों में घुल रही थी।

     

    कहीं गौशाला से गायों के रंभाने की आवाज आ रही थी, तो कहीं घरों के आँगन में गोपियाँ मटके लिए निकल चुकी थीं।

     

    लेकिन उस सुबह वृंदावन की हवा में कुछ अलग था।

    बहुत हल्का-सा…

     

    इतना हल्का कि कोई उसे महसूस तो कर सकता था, पर उसका नाम नहीं रख सकता था।

    नंद भवन में यशोदा मैया रोज की तरह सुबह-सुबह उठ चुकी थीं।

     

    उन्होंने आँगन में गोबर से सुंदर-सी रंगोली बनाई, तुलसी माता को जल चढ़ाया और फिर माखन मथने बैठ गईं।

     

    मथानी की आवाज पूरे आँगन में गूँज रही थी।

     

    छन्न… छन्न… छन्न…

     

    यशोदा मैया के होंठों पर मुस्कान थी।

    लेकिन उनकी आँखें बार-बार उस कमरे की ओर उठ जातीं जहाँ उनका कान्हा सो रहा था।

    “पता नहीं कब बड़ा हो गया मेरा लल्ला…”

    उन्होंने धीरे से खुद से कहा।

     

    फिर मुस्कुराकर सिर हिलाया।

    “बड़ा कहाँ हुआ है? अभी भी तो सुबह उठते ही माखन के पीछे भागता है।”

     

    उसी क्षण कमरे के भीतर से कुछ गिरने की आवाज आई।

    धड़ाम!

     

    मैया यशोदा की मथानी रुक गई। उन्होंने आँखें बंद कर लीं।

    “लो… उठ गया मेरा नटखट।” उनके चेहरे पर हल्की मुस्कान उभर आई। 

     

    अगले ही पल उनकी आवाज पूरे भवन में गूँज उठी, “कान्हा!”

     

    अंदर से कोई उत्तर नहीं आया। “कान्हा!”

     

    फिर भी शांति। मैया यशोदा ने हाथ कमर पर रखे और कमरे की ओर बढ़ गईं।

    दरवाजा खोलते ही उनकी नजर बिखरे हुए बिस्तर पर पड़ी।

     

    सबकुछ अस्त व्यस्त था लेकिन कृष्णा… कमरे में थे ही नहीं।

     

    मैया यशोदा कुछ क्षण उन्हें ढूँढती रहीं। फिर उनकी नजर खिड़की से बाहर गई।

    कदंब के पेड़ के पास वो खड़े थे।

     

    हाथ में बाँसुरी लिए। 

    नीली आभा से घिरा उनका मुख सुबह की पहली किरणों में ऐसा चमक रहा था जैसे स्वयं आकाश ने उन्हें अपने रंग में रंग दिया हो।

     

    कृष्ण की आँखें यमुना की ओर थीं और उनके होंठों पर एक हल्की मुस्कान।

     

    यशोदा खिड़की से ही पुकार उठीं, 

    “कान्हा! इतनी सुबह-सुबह वहाँ क्या कर रहे हो?”

     

    कृष्ण ने पीछे मुड़कर देखा। “मैया…”

     

    उनकी आवाज में वही मासूमियत थी। “आप जाग गईं?”

     

    यशोदा ने भौंहें चढ़ाईं। “हाँ, क्योंकि मेरा लाल कमरे में सोने के बजाय पता नहीं कहाँ-कहाँ घूम रहा है।”

     

    कृष्ण मुस्कुराए। “मैं तो बस जल्दी भोर में ही यमुना मैया से मिलने आया था।”

     

    “यमुना मैया से मिलने?” यशोदा बाहर आईं और उनके पास पहुँचकर कान पकड़ लिया। “और मुझे बिना बताए?”

     

    कृष्ण हँस पड़े। “मैया, आप तो सो रही थीं।”

     

    “तो क्या मुझे जगाते?”

     

    “जगाता तो आप मुझे जाने देतीं?”

     

    मैया यशोदा कुछ पल उन्हें देखती रहीं। फिर उनके चेहरे पर अनायास मुस्कान आ गई। “नहीं।”

     

    कृष्ण ने धीरे से कहा, “इसीलिए तो नहीं जगाया।”

     

    यशोदा ने उनके गाल पर हल्की-सी चपत लगाई।

    “बहुत चालाक हो गए हो, रे।”

     

    कृष्ण हँसने लगे। उनकी हँसी सुनकर पास से गुजरती एक गोपी भी मुस्कुरा उठी।

     

    “मैया, आपका कान्हा तो आज फिर माखन चुराने की तैयारी में है।”

     

    कृष्ण तुरंत बोले, “मैंने आज माखन नहीं चुराया।”

     

    यशोदा ने आँखें तरेरीं। “आज?”

     

    कृष्ण चुप हो गए, गोपी हँस पड़ी।

     

    “मैया, कल की मटकी याद है?”

     

    यशोदा ने कृष्ण की ओर देखा। “तो कल किसने माखन चुराया था?”

     

    कृष्ण ने तुरंत आकाश की ओर देखा। “मैया, मुझे लगता है आज मौसम बहुत सुंदर है।”

     

    और इतना कहकर भागने लगे। “कान्हा!”

     

    मैया यशोदा उनके पीछे दौड़ पड़ीं।

     

    पूरा आँगन कृष्ण की हँसी से भर गया। कुछ ही देर में नंद भवन की वही पुरानी चहल-पहल लौट आई।

     

    कहीं ग्वाल-बाल कृष्ण को ढूँढते हुए आ रहे थे। कहीं गोपियाँ उनकी शिकायत लेकर यशोदा के पास पहुँच रही थीं।

     

    कहीं गायों के बीच जाकर कृष्ण उन्हें पुकार रहे थे।

     

    वृंदावन के लिए कृष्ण केवल नंद बाबा के पुत्र नहीं थे, वह वृंदावन की धड़कन थे।

     

    उनके बिना जैसे हर चीज अधूरी लगती थी।

     

    —

     

    सुबह कुछ और चढ़ी तो कृष्ण अपने सखाओं के साथ यमुना किनारे जा पहुँचे।

     

    बलराम भी उनके साथ थे। मित्र ने कृष्ण के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा, “कान्हा, आज कहाँ चलें?”

     

    कृष्ण ने मुस्कुराकर सामने देखा। “जहाँ मन करे।”

     

    “तो फिर कदंब वन!” एक ग्वालबाल चिल्लाया।

     

    सब दौड़ पड़े, कृष्ण पीछे रह गए।

    उनकी नजर यमुना पर टिक गई। बलराम ने यह देखा तो उनके कदम भी रुक गए। “कृष्ण?”

     

    कृष्ण ने उनकी ओर देखा। “हाँ, दाऊ?”

     

    “क्या हुआ?”

     

    “कुछ नहीं।”

     

    बलराम कुछ क्षण उन्हें देखते रहे। “तुम आज कुछ बदले-बदले लग रहे हो।”

     

    कृष्ण मुस्कुराए। “मैं तो वही हूँ।”

     

    बलराम ने सिर हिलाया। “नहीं। आज तुम्हारी आँखें कुछ और कह रही हैं।”

     

    कृष्ण ने कोई उत्तर नहीं दिया। उन्होंने अपनी बाँसुरी निकाली।

     

    और अगले ही क्षण यमुना के किनारे वह धुन गूँज उठी।

     

    मधुर… शांत… और ऐसी कि जैसे किसी ने हवा में प्रेम घोल दिया हो।

     

    बांसुरी की वो धुन सुनकर, गायें चरना भूल गईं। पक्षियों का कलरव थम गया।

     

    यमुना की लहरें जैसे धीमी हो गईं। दूर खड़ी कुछ गोपियाँ भी उस धुन को सुनकर ठिठक गईं।

     

    उनमें राधा भी थीं। राधा ने आँखें बंद कर लीं। लेकिन आज…

    उस बाँसुरी में कुछ अलग था। वही धुन थी, वही कृष्ण थे, वही वृंदावन था।

    फिर भी दिल के भीतर एक अनजाना डर उतर आया था।

     

    राधा ने धीरे से आँखें खोलीं। “कान्हा…”

     

    उनके होंठों से बस इतना ही निकला।

     

    —

     

    उधर नंद भवन में यशोदा कृष्ण के लिए भोजन तैयार कर रही थीं।

     

    उन्होंने थाली में माखन रखा, मिश्री रखी।

     

    गरम-गरम रोटियाँ रखीं फिर अचानक उनके हाथ रुक गए। उनकी नजर थाली पर टिक गई।

    उन्हें जाने क्यों आज मन में एक अजीब-सी बेचैनी महसूस हो रही थी।

     

    उन्होंने खुद को समझाया, “शायद थक गई हूँ।”

     

    लेकिन मन नहीं माना। उन्होंने आँगन में बैठे नंद बाबा को देखा। “सुनते हो?”

     

    नंद बाबा ने उनकी ओर देखा। “क्या हुआ?”

     

    मैया यशोदा कुछ पल चुप रहीं। “आज न जाने क्यों मन घबरा रहा है।”

     

    नंद बाबा ने मुस्कुराकर कहा, “लल्ला को लेकर?”

     

    मैया यशोदा ने सिर हिला दिया। “पता नहीं… बस ऐसा लगता है जैसे…” वह रुक गईं।

     

    “जैसे क्या?”

     

    मैया यशोदा के पास कोई उत्तर नहीं था। उन्होंने धीरे से कहा, “जैसे कुछ बदलने वाला है।”

     

    नंद बाबा का चेहरा भी कुछ क्षण गंभीर हो गया। उन्होंने आकाश की ओर देखा। “सब कुछ तो भगवान की इच्छा से होता है, यशोदा।”

     

    मैया ने तुरंत उनकी बात काट दी। “भगवान की इच्छा अपनी जगह है। लेकिन मेरा लल्ला…”

     

    उनकी आवाज भर्रा गई। “मेरा कान्हा मेरी आँखों के सामने रहे… बस इतनी-सी इच्छा है।”

     

    नंद बाबा ने उनकी ओर देखा। लेकिन इस बार उनके पास भी कोई उत्तर नहीं था।

     

    —

     

    दोपहर होने लगी थी। कृष्ण वापस लौटे। मैया यशोदा ने उन्हें देखते ही थाली आगे कर दी। “आओ, लल्ला। खाना खा लो।”

     

    कृष्ण उनके पास बैठ गए, यशोदा अपने हाथों से उन्हें खिलाने लगीं।

    एक निवाला… फिर दूसरा… कृष्ण उन्हें देखते रहे।

    “क्या हुआ?” मैया ने पूछा।

     

    कृष्ण ने सिर हिलाया। “कुछ नहीं।”

     

    “तो ऐसे क्यों देख रहे हो?”

     

    कृष्ण ने उनकी उँगलियों को अपने हाथ में ले लिया। “मैया…”

     

    “हम्म?”

     

    “अगर कभी आपका कान्हा आपसे दूर चला जाए तो?”

     

    यशोदा के हाथ अचानक रुक गए, अनायास ही उनके चेहरे की मुस्कान गायब हो गई। “ऐसी बातें क्यों कर रहे हो?” उनकी आँखें गमगीन हो चुकी थी। 

     

    कृष्ण चुप रहे, यशोदा ने उनका चेहरा अपने हाथों में थाम लिया। 

     

    “कहीं नहीं जाओगे तुम।”

     

    कृष्ण ने धीरे से मुस्कुराकर कहा, “और अगर जाना पड़ा तो?”

     

    “नहीं।” यशोदा की आवाज इस बार दृढ़ थी।

    “तुम्हें कहीं नहीं जाना।”

     

    कृष्ण उनकी आँखों में देखते रहे, उन आँखों में माँ का प्रेम था।

    ऐसा प्रेम जिसे संसार की कोई शक्ति बाँट नहीं सकती थी।

    कृष्ण ने धीरे से अपना सिर अपनी मैया की गोद में रख दिया।

    “ठीक है मैया।”

     

    उन्होंने उनके बाल सहलाने शुरू कर दिए। उन्हें क्या पता था… कि कभी-कभी कृष्ण अपने सबसे प्रिय लोगों को भी आने वाले समय का पूरा सत्य नहीं बताते।

     

    क्योंकि कुछ यात्राएँ ऐसी होती हैं… जिन्हें रोकने का अधिकार प्रेम के पास भी नहीं होता।

     

    और वृंदावन की उस शांत सुबह में… किसी को नहीं पता था कि समय की धारा धीरे-धीरे उस क्षण की ओर बढ़ रही है…

     

    जब कृष्ण को अपना सबसे प्रिय स्थान छोड़ना होगा।

    लेकिन अभी… वृंदावन अनजान था। यमुना अनजान थी।

    गोपियाँ अनजान थीं। राधा अनजान थीं।

     

    और सबसे ज्यादा… यशोदा मैया अनजान थीं।

    कि उनके कान्हा के साथ बिताई जा रही यह साधारण-सी सुबह…

    वास्तव में वृंदावन की सबसे अनमोल सुबहों में से एक थी।

     

    क्योंकि आने वाला समय… वृं

    दावन से उसका कृष्ण माँगने वाला था।

     

    और उस दिन… पूरे वृंदावन को पहली बार समझ आएगा—

     

    कृष्ण सा प्रेम करना कितना आसान है…

    लेकिन कृष्ण से विरह सहना कितना कठिन। 🦚❤️

     

    अगर आपको कहानी पसंद आए तो कमेंट में राधे राधे जरूर लिखें।

    🌺 राधे राधे 🌺 

     

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    Neha Goyal

    मेरा नाम नेहा गोयल है। और पिछले दो वर्ष से मैं प्रतिलिपि पर कहानियां लिखती आ रही हूँ। मुझे लेखन करते हुए बहुत ही अच्छा लगता है। वैसे मुझे लिखने से पढ़ना ज्यादा पसंद है।

  • No love clause

    No love clause

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

    Part 7

     

     

    शुभम हल्का-सा मुस्कुराया। “ठीक है… फिर देखते हैं छह महीने बाद कौन सही साबित होता है।”

     

    अग्नि ने उसकी बात को नजरअंदाज कर दिया। उसने टेबल पर रखा अपना फोन उठाया। स्क्रीन पर कई नोटिफिकेशन थे। उसने एक-एक करके उन्हें देखा।

    फिर अचानक उसकी उंगली एक नाम पर जाकर रुक गई।

    Veda Sharma.

     

    अग्नि ने मैसेज पढ़ा और फोन वापिस टेबल पर रख दिया और अपने लिए ड्रिंक बनाने लगा। लेकिन वो शायद कुछ सोच भी रहा था। 

     

    शुभम ने उसकी हरकत नोटिस कर ली। “क्या हुआ?”

     

    अग्नि, “कुछ नहीं।”

     

    शुभम ने पूछा, “किसका मैसेज था?”

     

    अग्नि बोला, “ऑफिस का।”

     

    शुभम ने आँखें सिकोड़कर उसकी तरफ देखा। “वेदा का?”

     

    अग्नि ने उसकी तरफ देखा। “तुझे उसका नाम कैसे पता?”

     

    शुभम हँस पड़ा। “भाई, मैं तेरा दोस्त हूँ। तेरी सेक्रेटरी के बारे में इतना तो जानता ही हूँ कि वो पिछले तीन साल से तेरे साथ काम कर रही है।”

     

    अग्नि ने कोई जवाब नहीं दिया। शुभम ने मुस्कुराकर पूछा, “वैसे कैसी है?”

     

    अग्नि ने सामान्य स्वर में कहा, “कौन?”

     

    शुभम कूल अंदाज में, “वेदा।”

     

    अग्नि ने कंधे उचकाए, “मुझे क्या पता?”

     

    “अच्छा?” शुभम ने शरारत से कहा, “अभी दो मिनट पहले तक तू बता रहा था कि तुझे एक समझदार, सादगी पसंद लड़की चाहिए…”

     

    अग्नि ने उसे घूरा। “शुभम।”

     

    शुभम, “हाँ भाई?”

     

    अग्नि बोला, “अपनी बकवास बंद कर।” क्योंकि वो समझ गया था कि शुभम कहना क्या चाह रहा है,लेकिन उसे शुभम की बात बुरी भी नहीं लगी। 

     

    शुभम हँस पड़ा। लेकिन अग्नि के मन में पहली बार एक विचार आया। 

    एक ऐसा विचार जिसे उसने तुरंत अपने दिमाग से निकालने की कोशिश की।

     

    वेदा शर्मा।

     

    अग्नि ने गिलास में ड्रिंक डाली और उसे धीरे-धीरे घुमाने लगा।

     

    शुभम अब भी उसे ही देख रहा था। “क्या सोच रहा है?”

     

    अग्नि ने गिलास होंठों तक ले जाते हुए कहा, “कुछ नहीं।” लेकिन इस बार उसकी आवाज़ में पहले जैसी सहजता नहीं थी।

     

    शुभम ने भौंहें उठाईं। “तू जब ‘कुछ नहीं’ बोलता है ना, तब समझ आता है कि दिमाग में बहुत कुछ चल रहा है।”

     

    अग्नि ने उसे घूरा। “तू मेरा दिमाग पढ़ना कब से सीख गया?”

     

    “जब से तू मेरा दोस्त बना है।” शुभम ने आराम से सोफे की पीठ से सिर टिकाया। “वैसे एक बात बता… तेरी सेक्रेटरी शादीशुदा तो नहीं है?”

     

    अग्नि ने तुरंत उसकी तरफ देखा। “नहीं।” जवाब इतना जल्दी आया कि शुभम के चेहरे पर शरारती मुस्कान और गहरी हो गई।

    “ओहो… तो जानकारी पूरी है।”

     

    अग्नि ने गिलास टेबल पर रख दिया। “शुभम।”

     

    शुभम, “अरे मैं तो बस पूछ रहा था।”

     

    अग्नि, “और मैं बस जवाब दे रहा हूँ।” 

     

    शुभम, “ चल तू अब ज्यादा मत सोच, मैं कुछ करता हूँ।”

     

    अग्नि में हां में सिर हिलाया और बोला, “ बस इसी जवाब की उम्मीद थी।”

     

     

    अगली सुबह… राजावत ग्रुप।

    सुबह के ठीक नौ बजे।

     

    अग्नि हमेशा की तरह अपने ऑफिस पहुँच चुका था।

    उसका केबिन पूरी तरह व्यवस्थित था।

    टेबल पर जरूरी फाइलें रखी थीं। कॉफी उसके सामने थी।

     

    लेकिन आज पहली बार… उसकी नजर बार-बार दरवाजे की तरफ जा रही थी।

     

    तभी डोर नॉक हुआ।

    अग्नि, “ come in!”

     

    निशांत अंदर आया। “Good morning, sir.”

     

    अग्नि, “Morning.” निशांत ने फाइल आगे बढ़ाई।

    “आज दस बजे की बोर्ड मीटिंग है। ग्यारह बजे मल्होत्रा ग्रुप के साथ मीटिंग और दोपहर में…”

     

    अग्नि, “निशांत।”

     

    निशांत, “जी, सर?”

     

    अग्नि ने बिना किसी रिएक्शन के पूछा, “वेदा आई?”

     

    निशांत कुछ पल उसे देखता रहा। फिर बोला, “अभी तक नहीं, सर।”

     

    अग्नि ने अपनी घड़ी देखी। नौ बजकर दस मिनट।

    “आते ही उसे मेरे केबिन में भेजना।”

     

    निशांत ने सिर हिलाया, “जी सर।”

     

    निशांत जाने लगा। फिर अग्नि ने उसे रोक लिया। “और निशांत…”

     

    निशांत रूककर पीछे मुड़ा, “जी?”

     

    “अगर वो आज भी ऑफिस नहीं आ पाए तो…” अग्नि कुछ पल रुका। “पहले मुझसे बात करना।”

     

    निशांत ने सिर हिलाया। “जी सर।”

     

    दरवाजा बंद हो गया। अग्नि कुर्सी पर पीछे टिक गया।

    उसने खुद से सवाल किया, वो आखिर वेदा का इंतजार क्यों कर रहा था?

     

    उसे अपनी ही बेचैनी अजीब लग रही थी। तभी दरवाजे पर दस्तक हुई।

     

    अग्नि की नजर दरवाजे पर गई। “Come in.”

     

    दरवाजा खुला। और सामने… वेदा खड़ी थी।

    आज भी उसकी आँखों के नीचे नींद की कमी साफ दिखाई दे रही थी। बाल जल्दी में बाँधे हुए थे।

    चेहरा थका हुआ था।

    लेकिन हाथ में हमेशा की तरह ऑफिस की फाइलें थीं।

    “Good morning, sir.”

     

    अग्नि कुछ सेकंड उसे देखता रहा। फिर बोला, “Sit.”

     

    वेदा चुपचाप सामने वाली कुर्सी पर बैठ गई।

    अग्नि ने अपने सामने रखी फाइल बंद कर दी।

    कुछ पल तक वो उसे देखता रहा।

    फिर धीमे स्वर में बोला, “वेदा…”

     

    वेदा ने हैरानी से अग्नि की तरफ देखा, क्योंकि ये शायद पहली बार था जब वो उसे इस तरह से पुकार रहा था। “जी, सर?”

     

    “मुझे तुमसे ऑफिस के काम के अलावा…”

    वो एक पल के लिए रुका। “…एक बेहद निजी बात करनी है।”

     

    वेदा की भौंहें सिकुड़ गईं। उसे समझ नहीं आया कि अग्नि आखिर उससे क्या पूछने वाला है।

     

    और अग्नि…

    वो भी शायद पहली बार अपने जीवन का सबसे असामान्य प्रस्ताव किसी के

    सामने रखने जा रहा था।

     

    क्रमशः…

     

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    कभी-कभी जिंदगी सबसे बड़ा सौदा वहीं रखती है, जहाँ इंसान सबसे ज्यादा मजबूर होता है।

     

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    पढ़ने का समय : 7 मिनट

     

    Part 6

    राजावत मेंशन से बाहर निकलते ही अग्नि अपनी कार की पिछली सीट पर आकर बैठ गया। कार का दरवाजा बंद होते ही बाहर की दुनिया की आवाजें जैसे अचानक उससे दूर हो गईं।

     

    ड्राइवर ने रियर-व्यू मिरर से उसकी तरफ देखा। “सर, विला चलें?”

     

    अग्नि कुछ नहीं बोला।

     

    उसकी नजर कार की खिड़की से बाहर टिकी थी। मुंबई की सड़कें हमेशा की तरह अपनी रफ्तार से भाग रही थीं। कहीं ट्रैफिक में फँसी गाड़ियाँ थीं, कहीं सड़क किनारे भागते लोग, कहीं चमचमाती इमारतें और कहीं फुटपाथ पर अपनी जिंदगी समेटे बैठे लोग।

     

    लेकिन अग्नि का ध्यान इनमें से किसी पर नहीं था।

    उसके दिमाग में सिर्फ एक शब्द घूम रहा था।

    शादी।

     

    उसने आँखें बंद कर लीं। उसे दादाजी की आवाज़ याद आ रही थी। “तुम्हारे पास बहुत कम समय है।”

    फिर उनकी दूसरी बात…

    “तुम जितना समझ रहे हो, उससे भी कम।”

    आखिर ऐसा क्या था जिसे दादा जी उससे छिपा रहे थे?

     

    वो फाइल… उसमें मौजूद वो अतिरिक्त हिस्सा…

    और फिर उनका इतना आसानी से उसकी शर्त मान लेना।

     

    अग्नि ने भौंहें सिकोड़ लीं। उसे आज अपने दादा जी का व्यवहार कुछ ठीक नहीं लग रहा था। वो उन्हें सालों से जानता और समझता था। दादा जी कभी किसी बात को इतनी आसानी से नहीं मानते थे।

     

    खासकर तब…

     

    जब बात राजावत परिवार और उसकी विरासत की हो।

    लेकिन आज उन्होंने उसकी हर शर्त बिना किसी सवाल के स्वीकार कर ली थी।

    “लड़की मैं खुद चुनूँगा।”

     

    अग्नि के अपने ही शब्द उसके कानों में गूँज गए।

    उसने आँखें खोलीं।

     

    “सर?” ड्राइवर की आवाज़ सुनकर उसका ध्यान टूटा।

     

    अग्नि, “बोलो!”

     

    ड्राइवर ने पूछा, “विला चलना है?”

     

    अग्नि कुछ सेकंड चुप रहा। फिर उसने बिना किसी भाव के कहा, “नहीं।” 

     

    ड्राइवर ने रियर-व्यू मिरर से उसकी तरफ देखा। “सर?”

     

    अग्नि ने अपनी घड़ी पर नजर डाली। शाम के करीब साढ़े आठ बज रहे थे। उसने धीमे स्वर में कहा, “कार क्लब ले चलो”

     

    ड्राइवर ने तुरंत सिर हिलाया। “जी सर।” कहकर उसने कार की दिशा बदल दी।

    वहीं अग्नि ने अपने फोन से अपने दोस्त शुभम को भी क्लब आने का मैसेज कर दिया। 

    क्योंकि उसे पता था उसके सामने जो दुविधा अभी है उसका हल शुभम में बेहतर कोई नहीं दे सकता। क्योंकि उसके पास हर बात का सॉल्यूशन होता है। 

     

    कुछ देर बाद…

     

    मुंबई के सबसे प्राइवेट और एलीट क्लबों में से एक के बाहर काली कार आकर रुकी। कार के रुकते ही एक स्टाफ मेंबर तुरंत आगे बढ़ा और पीछे का दरवाजा खोल दिया।

     

    अग्नि कार से बाहर निकला। ब्लैक शर्ट, ब्लैक ट्राउजर और उसके ऊपर पहना डार्क ब्लेजर…

    उसके चेहरे पर वही ठंडा आत्मविश्वास था जिसके कारण राजावत ग्रुप में हर कोई उससे एक दूरी बनाकर रखता था।

     

    क्लब का स्टाफ उसे देखते ही सतर्क हो गया। “Good evening, Mr. Rajawat.”

     

    अग्नि ने सिर्फ़ हल्का-सा सिर हिलाया और अंदर चला गया। क्लब का माहौल हमेशा की तरह शांत लेकिन आलीशान था।

     

    हल्की रोशनी… धीमा म्यूजिक…

    बार के पीछे सजी महँगी शराब की बोतलें…

    और शहर के कुछ बेहद प्रभावशाली लोग अपने-अपने ग्रुप में बैठे हुए थे, तो वहीं कुछ लड़के लड़कियां फ्लोर पर डांस कर रहे थे। कही छोटे छोटे कपड़े पहने लड़कियां गेस्ट को ड्रिंक सर्व कर रहे थे। 

     

    अग्नि की नजर किसी पर नहीं गई। वह सीधे अपने हमेशा वाले प्राइवेट लाउंज की तरफ बढ़ गया।

     

    लेकिन जैसे ही उसने दरवाजा खोला, “आ गया हमारा दूल्हा!” अंदर से आवाज आई।

     

    अग्नि के कदम वहीं रुक गए। उसने सामने देखा।

    शुभम उसका दोस्त सोफे पर आराम से बैठा हुआ था।

    उसके हाथ में ड्रिंक थी और चेहरे पर हमेशा वाली शरारती मुस्कान।

     

    अग्नि ने उसे घूरा। “बकवास बंद कर।”

     

    शुभम ने मुस्कुराते हुए ग्लास उठाया।

    “ये बकवास… बहुत ही जल्द हकीकत में बदलने वाली है मेरे दोस्त…।”

     

    अग्नि अंदर आया और सामने वाले सोफे पर बैठ गया।

    “बकवास मत कर।”

     

    शुभम ने उसे गौर से देखा। “ कुछ बात है…?” अग्नि के फेस के रिएक्शन देखते ही वो समझ गया कि आज अग्नि के साथ कुछ तो अजीब है। 

     

    अग्नि ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    शुभम ने अपना ग्लास टेबल पर रखा। “दादाजी से मिलने गया था ना?”

     

    अग्नि ने बस सिर हिलाया। 

     

    “और?”

     

    “वही शादी का मुद्दा।” अग्नि ने जवाब दिया। 

     

    शुभम ने गहरी साँस ली। “मुझे पता था।”

     

    कुछ पल चुप्पी रही। फिर शुभम ने पूछा, “तो इस बार भी मना कर दिया?”

     

    अग्नि ने उसकी तरफ देखा। “नहीं।”

     

    शुभम की भौंहें ऊपर उठ गईं। “क्या?”

     

    अग्नि ने बिल्कुल सपाट स्वर में कहा, “मैं शादी करने के लिए तैयार हूँ।”

     

    शुभम के हाथ से ग्लास लगभग छूटते छूटते बचा। वो आँखें बड़ी किए अग्नि को देख रहा था। “तू?”

     

    अग्नि ने उसे घूरा। “हाँ, मैं।”

     

    शुभम, “तू सच में शादी करेगा?”

     

    अग्नि, “क्यों? मैं इंसान नहीं हूँ क्या?”

     

    शुभम हँस पड़ा। “नहीं… तू इंसान तो है। लेकिन पिछले पाँच सालों से तेरी बातें सुनकर मुझे शक होने लगा था।”

     

    अग्नि ने आँखें बंद कर लीं। “शुभम…”

     

    “ओके। ओके।” शुभम ने खुद को संभाला। “लेकिन अचानक ऐसा क्या हुआ?”

     

    अग्नि कुछ पल चुप रहा। फिर बोला, “दादा जी ने कुछ ऐसी बातें बताईं जिनके बाद मेरे पास कोई दूसरा रास्ता नहीं बचा।”

     

    शुभम की मुस्कान गायब हो गई। “क्या बात है?”

     

    “मैं अभी नहीं बता सकता।” अग्नि ने बताने से साफ इनकार कर दिया। 

     

    शुभम ने घूरा, “अग्नि…”

     

    अग्नि ने सख्त लहजे में कहा, “मैंने कहा ना, अभी नहीं।”

     

    शुभम ने उसकी आँखों में देखा। उसे समझ आ गया कि इस बार मामला सचमुच गंभीर है।

     

    उसने बात बदलते हुए पूछा, “ठीक है। लेकिन एक बात बता… लड़की कौन है?”

     

    अग्नि ने उसकी तरफ देखा। “कोई लड़की नहीं है।”

     

    शुभम, “मतलब?”

     

    अग्नि, “मैंने अभी तक किसी को चुना ही नहीं।”

     

    शुभम ने हैरानी से कहा, “तो फिर शादी करेगा किससे?”

     

    अग्नि ने धीमे स्वर में कहा, “ इसलिए ही तो तुझे यहाँ बुलाया है?”

     

    शुभम उसकी बात समझने की कोशिश करने लगा। “मतलब? मेरा मैरिज breau नहीं है।”

     

    अग्नि आगे झुक गया। “ उसकी जरूरत भी नहीं। देख, मुझे प्यार नहीं चाहिए। मुझे कोई ऐसी लड़की नहीं चाहिए जो मेरे पैसे, मेरे नाम या राजावत परिवार की जिंदगी का हिस्सा बनने के सपने देखे।”

     

    “मुझे सिर्फ़ एक समझदार लड़की चाहिए। जो छह महीने के बाद अपनी जिंदगी में वापस चली जाए।”

     

    शुभम कुछ पल उसे देखता रहा। फिर उसने धीरे से पूछा, “तू कॉन्ट्रैक्ट मैरिज की बात कर रहा है?”

     

    अग्नि की आँखों में हल्की-सी ठंडक उतर आई। “Exactly.”

     

    शुभम कुछ सेकंड चुप रहा। फिर अचानक हँस पड़ा।

    “तू पागल हो गया है!”

     

    अग्नि ने उसे घूरा। “मुझे इसमें मजाक की कोई बात नहीं दिख रही।”

     

    “मुझे दिख रही है।” शुभम ने हँसी रोकते हुए कहा, “तू शादी से इतना नफरत करता था कि अब तूने शादी को बिजनेस डील बना दिया।”

     

    अग्नि ने बिना मुस्कुराए कहा, “मेरे लिए शादी हमेशा से एक डील ही थी।”

     

    शुभम उसकी बात सुनकर गंभीर हो गया। उसे मालूम था कि अग्नि शादी को लेकर इतना कठोर क्यों था।

    उसने धीरे से पूछा, “और अगर वो लड़की तुझसे प्यार कर बैठी तो?”

     

    अग्नि ने तुरंत जवाब दिया, “नहीं करेगी।”

     

    शुभम, “तुझे इतना यकीन कैसे है?”

     

    अग्नि कुछ पल शांत रहा। फिर बोला, “क्योंकि कॉन्ट्रैक्ट में साफ लिखा होगा… छह महीने बाद कोई रिश्ता नहीं रहेगा।”

     

    शुभम ने सिर हिलाया। ” चल मान लिया उसे प्यार नहीं भी हुआ लेकिन अगर तू प्यार कर बैठा तो?”

     

    इस बार अग्नि चुप हो गया। कुछ सेकंड तक उसने कोई जवाब नहीं दिया।

    फिर उसकी आवाज़ बेहद ठंडी थी। “ऐसा नहीं होगा।”

     

    शुभम ने उसकी आँखों में देखा। “तुझे खुद पर इतना भरोसा है?”

     

    अग्नि ने बिना झिझके कहा, “हाँ।”

     

    शुभम हल्का-सा मुस्कुराया। “ठीक है… फिर देखते हैं छह महीने बाद कौन सही साबित होता है।”

     

    अग्नि ने उसकी बा

    त को नजरअंदाज कर दिया। उसने टेबल पर रखा अपना फोन उठाया। स्क्रीन पर कई नोटिफिकेशन थे। उसने एक-एक करके उन्हें देखा।

    फिर अचानक उसकी उंगली एक नाम पर जाकर रुक गई।

    Veda Sharma.

    कहानी आगे जारी रहेगी.

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    Neha Goyal

    मेरा नाम नेहा गोयल है। और पिछले दो वर्ष से मैं प्रतिलिपि पर कहानियां लिखती आ रही हूँ। मुझे लेखन करते हुए बहुत ही अच्छा लगता है। वैसे मुझे लिखने से पढ़ना ज्यादा पसंद है।

  • No love clause

    No love clause

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    Part 5 

    No love clause 

     

    अग्नि हँस पड़ा। लेकिन उसकी हँसी में खुशी नहीं थी। “ये कोई जवाब नहीं है।”

     

    विक्रम जी चुप रहे। अग्नि ने आगे झुककर कहा,

    “आप जानते हैं कि मैं शादी क्यों नहीं करना चाहता।”

     

    विक्रम जी की आँखों में एक पल के लिए पुराना दर्द उभरा। “जानता हूँ।”

     

    “तो फिर?” अग्नि की आवाज़ थोड़ी ऊँची हो गई।

    “मैंने अपने माता-पिता का रिश्ता अपनी आँखों के सामने टूटते देखा है। मैंने देखा है कि एक शादी किस तरह दो लोगों को एक-दूसरे का दुश्मन बना सकती है। मैंने अपनी माँ को हर रात रोते देखा है।”

     

    विक्रम जी की आँखें झुक गईं। अग्नि ने गहरी साँस ली।

    “और अब आप चाहते हैं कि मैं भी वही गलती करूँ? मैं किसी लड़की की जिंदगी बर्बाद नहीं करना चाहता।”

    कुछ पल तक विक्रम जी उसे देखते रहे।

     

    फिर उन्होंने बहुत धीमे स्वर में कहा, “तुम्हें ऐसा क्यों लगता है कि तुम अपने बाप की तरह खुदगर्ज निकलोगे।”

     

    अग्नि ने तुरंत जवाब दिया, “ क्योंकि मेरी रगो में उस आदमी का खून दौड़ रहा है दादा जी।”

     

    “नहीं! अग्नि!” विक्रम जी के शब्द सख्त थे, “ तुम्हारी रगो में जितना मेरे बेटे का खून है उतना ही तुम्हारी मां मेरी बहू का भी है। और हमारे दिए हुए संस्कार हैं। इसलिए मुझे पूरा यकीन है तुम एक बेहतर जीवन साथी बनोगे।”

     

    अग्नि बोला, “लेकिन दादा जी ये शादी मेरे लिए एक जिम्मेदारी होगी। और मैं वो जिम्मेदारी लेने के लिए तैयार नहीं हूँ।”

     

    विक्रम जी की आँखों में हल्की-सी मुस्कान आई। “फिर भी शादी करोगे?”

     

    अग्नि कुछ पल चुप रहा। फिर बोला, “आपकी शर्त है। आपके पास मुझे मजबूर करने की वजह है। तो ठीक है… मैं शादी करूँगा।”

     

    विक्रम जी ने राहत की साँस ली। लेकिन अग्नि ने तुरंत अपनी बात पूरी की। “मगर मेरी शर्त पर।”

     

    विक्रम जी ने सिर उठाया। “लड़की मैं खुद चुनूँगा और आप उस लड़की के बारे में कोई सवाल नहीं करेंगे।”

     

    विक्रम जी ने कुछ क्षण उसे देखा। फिर बोले, “मंजूर है।”

     

    अग्नि को उनके इतनी आसानी से मान जाने पर थोड़ी हैरानी हुई। “बस?”

     

    विक्रम जी हल्की मुस्कान के साथ, “बस।”

     

    अग्नि, “आपको कोई आपत्ति नहीं होगी?”

     

    विक्रम जी “नहीं।”

     

    अग्नि हैरानी से, “चाहे लड़की कोई भी हो?”

     

    विक्रम जी ने हल्की मुस्कान के साथ कहा, “बस वो लड़की तुम्हें इंसान बनाना जानती हो।”

     

    अग्नि की भौंहें सिकुड़ गईं। “मैं कोई बिगड़ा हुआ बच्चा नहीं हूँ।”

     

    विक्रम जी हँस पड़े। “ये बात अपनी माँ को जाकर बताना।”

     

    अग्नि का चेहरा तुरंत बदल गया। उसके चेहरे पर आई हल्की नरमी एक पल में गायब हो गई। “मुझे उनके बारे में बात नहीं करनी।”

     

    विक्रम जी समझ गए। उन्होंने विषय बदल दिया। “ठीक है।”

     

    फिर कुछ पल बाद बोले, “लेकिन एक बात याद रखना।”

    अग्नि ने उनकी तरफ देखा। “तुम्हारे पास बहुत कम समय है।”

     

    अग्नि “मैं जानता हूँ।”

     

    “नहीं…” विक्रम जी ने गंभीरता से कहा, “तुम जितना समझ रहे हो, उससे भी कम।”

     

    अग्नि कुछ पल उन्हें देखता रहा। “आप आखिर कहना क्या चाहते हैं?”

     

    विक्रम जी ने सीधे कोई जवाब नहीं दिया।

    बस इतना कहा, “समय आने पर सब समझ जाओगे।”

     

    अग्नि को उनका जवाब बिल्कुल पसंद नहीं आया।

    वह कुर्सी से उठ खड़ा हुआ। “ठीक है।”

     

    उसने फाइल मेज पर रखी। “मैं शादी करूँगा।”

     

    फिर उसने विक्रम जी की आँखों में देखते हुए कहा,

    “लेकिन लड़की मैं खुद चुनूँगा।”

     

    विक्रम जी ने सिर हिला दिया। “जैसी तुम्हारी मर्जी।”

     

    अग्नि दरवाजे की तरफ बढ़ा। लेकिन कुछ कदम चलने के बाद रुक गया। उसने पीछे मुड़कर अपने दादा जी को देखा। “दादा जी…”

     

    विक्रम जी, “हूँ?”

     

    अग्नि, “अगर मैं शादी कर भी लूँ…” वह कुछ पल रुका।

    “तो इसका मतलब ये नहीं कि मैं इस घर का हिस्सा बन जाऊँगा।”

     

    विक्रम जी के चेहरे पर हल्की उदासी छा गई। “मुझे पता है।”

     

    अग्नि ने कुछ नहीं कहा। वह दरवाजा खोलकर बाहर निकल गया। दरवाजा बंद होते ही विक्रम जी अपनी कुर्सी पर पीछे टिक गए।

    उनकी नजर सामने लगी उसी पुरानी तस्वीर पर चली गई।

     

    छोटा-सा अग्नि… उनकी उंगली पकड़े मुस्कुरा रहा था।

    विक्रम जी की आँखों में नमी उतर आई।

    उन्होंने तस्वीर की तरफ देखते हुए बहुत धीमे स्वर में कहा, “तू चाहे जितना दूर भाग ले अग्नि… लेकिन इस बार मैं तुझे अकेला नहीं छोड़ूँगा।”

     

    नीचे… अग्नि सीढ़ियाँ उतरकर हॉल में आया।

    अब वहाँ पहले जैसे भीड़ भाड़ नहीं थी।

    अग्नि ने एक नजर सिटिंग एरिया पर डाली फिर सीधे बाहर की तरफ कदम बढ़ा दिए।

     

    जैसे ही सविता जी की नजर उस पर पड़ी, उनके चेहरे पर उम्मीद जाग गई।

     

    अग्नि सीधे मुख्य दरवाजे की तरफ बढ़ने लगा।

    “अग्नि…”

     

    सविता जी की आवाज़ सुनकर उसके कदम रुक गए।

    उसने धीरे से पीछे मुड़कर देखा। सविता जी उसकी तरफ ही आ रही थी। 

     

    उनकी आँखों में एक अजीब-सी उम्मीद थी। “इतने समय बाद तुम यहाँ आए हो…” उन्होंने धीमे स्वर में कहा, “कम से कम कुछ देर रुककर तो जा सकते हो।”

     

    अग्नि कुछ पल उन्हें देखता रहा। फिर बोला,

    “माँ… आप जानती हैं मुझे यहाँ आना बिल्कुल पसंद नहीं।”

     

    सविता जी की आँखों की चमक थोड़ी कम हो गई, उन्होंने बस सिर हिला दिया, “अगर आप मुझसे मिलना ही चाहती हैं तो मेरे विला आ सकती हैं।”

     

    अग्नि ने बेहद सामान्य स्वर में कहा, “वो घर भी आपका ही है।”

     

    सविता जी के होंठों पर हल्की-सी मुस्कान आई। “कुछ ही देर में डिनर का टाइम होने वाला है।”

    उन्होंने उम्मीद भरी नजरों से उसे देखा। “कम से कम डिनर करके जाना।”

     

    अग्नि ने तुरंत कहा, “नहीं।”

     

    सिर्फ़ एक शब्द। फिर वह मुड़ गया। 

     

    “अग्नि…” इस बार उसकी माँ की आवाज़ और धीमी थी।

     

    लेकिन वह नहीं रुका। कुछ ही पलों में मुख्य दरवाजा बंद हो गया। सविता जी वहीं खड़ी रह गईं।

    उनकी आँखों से एक आँसू निकलकर गाल पर आ गया। उन्होंने तुरंत पल्लू से उसे पोंछ लिया।

     

    लेकिन तभी पीछे से सुमित्रा की आवाज़ आई। “कितनी बेकार किस्मत है ना दीदी आपकी।”

     

    सविता जी ने पीछे मुड़कर देखा।।सुमित्रा के चेहरे पर हल्की-सी मुस्कान थी। “आपको ना पति का प्यार मिला…” वह थोड़ा रुकी। “और ना ही बेटे का।”

     

    सविता जी ने कुछ नहीं कहा। सुमित्रा उनके करीब आई। “इतने साल हो गए, लेकिन अग्नि आज भी आपको माफ नहीं कर पाया।”

     

    सविता जी ने धीमे स्वर में कहा, “वो मुझे माफ करे या ना करे…” उन्होंने दरवाजे की तरफ देखा। “मैं उसकी माँ हूँ। और माँ अपने बच्चे से उम्मीद करना नहीं छोड़ती।”

     

    सुमित्रा के चेहरे पर एक पल के लिए चुप्पी छा गई।

    लेकिन सविता जी की आँखों में उस वक्त सिर्फ़ दर्द नहीं था। 

     

    वहाँ उम्मीद भी थी। बहुत पुरानी… बहुत गहरी… और शायद उतनी ही मजबूत। उधर… राजावत मेंशन से बाहर निकलते ही अग्नि अपनी कार में बैठ गया।

     

    ड्राइवर ने पूछा, “सर, विला?”

     

    अग्नि ने कुछ नहीं कहा। उसकी नजर सामने सड़क पर थी। लेकिन उसके दिमाग में सिर्फ़

    एक ही बात घूम रही थी… शादी।

    कहानी आगे जारी रहेगी।

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    Neha Goyal

    मेरा नाम नेहा गोयल है। और पिछले दो वर्ष से मैं प्रतिलिपि पर कहानियां लिखती आ रही हूँ। मुझे लेखन करते हुए बहुत ही अच्छा लगता है। वैसे मुझे लिखने से पढ़ना ज्यादा पसंद है।

  • No love clause

    No love clause

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    Part 4

    No love clause 

     

    विक्रम राजावत ने गुस्से में कहा, “हमारे संस्कारों में सबसे पहले बड़ों के पैर छूकर उनका आशीर्वाद लिया जाता है।”

    अग्नि ने कहा, “ बड़े आशीर्वाद देने के लायक होते तो जरूर लेता।”उसकी ठंडी निगाहें सीधे विक्रम जी की आँखों में टिकी थीं।

    कुछ पल के लिए दोनों के बीच खामोशी छा गई।

    कमरे में मौजूद बाकी लोगों को शायद अग्नि की यह बेबाकी बदतमीजी लग रही थी, लेकिन विक्रम राजावत उसे बस देखते रहे। उनके चेहरे पर गुस्सा जरूर था, मगर आँखों में कुछ और ही था, जिसे वहाँ मौजूद कोई भी पढ़ नहीं पाया।

     

    आखिरकार उन्होंने अपनी आवाज़ को संयमित करते हुए कहा, “स्टडी में चलो। हमें तुमसे एक जरूरी बात करनी है।” कहकर वो हाथ पीछे बांधे आगे बढ़ गए। 

    अग्नि ने एक पल के लिए उनकी तरफ देखा, फिर बिना कुछ कहे उनके पीछे चल पड़ा।

    दोनों पहली मंजिल पर बनी स्टडी की तरफ बढ़ गए।

    कुछ ही देर में विक्रम जी ने भारी लकड़ी का दरवाजा खोला और अंदर चले गए। अग्नि भी उनके पीछे कमरे में दाखिल हुआ।

    राजावत मेंशन की बाकी जगहों की तरह यह कमरा भी बेहद आलीशान था, लेकिन इसमें दिखावे से ज्यादा एक अलग तरह की गंभीरता थी।

     

    कमरे की एक पूरी दीवार पर लकड़ी की बनी खूबसूरत लाइब्रेरी थी। उसमें लगी लंबी-लंबी रैक में बिजनेस और मैनेजमेंट की किताबों से लेकर इतिहास, राजनीति, साहित्य और पुराने उपन्यास तक करीने से सजे हुए थे।

    हर किताब अपनी जगह पर थी।

     

    कुछ किताबों के किनारों पर हल्की धूल जरूर जमी थी, लेकिन उन्हें देखकर साफ पता चलता था कि इस कमरे में किताबें सिर्फ सजावट के लिए नहीं रखी गई थीं।

    लाइब्रेरी के सामने एक बड़ी-सी आरामदायक विंग चेयर रखी थी, जिसके पास एक छोटा-सा लैम्प रखा हुआ था।

    कमरे के बीचों-बीच गहरे रंग की लकड़ी की एक बड़ी मेज थी। उस पर कुछ जरूरी दस्तावेज, एक खुली हुई डायरी, चश्मे का केस और एक पुरानी चांदी की स्याहीदानी रखी थी।

     

    कमरे की दूसरी दीवार पर राजावत परिवार की कई पुरानी तस्वीरें लगी थीं। एक तस्वीर में युवा विक्रम राजावत अपने बेटे के साथ खड़े थे।

    दूसरी तस्वीर में उनकी पत्नी थीं।

     

    और एक तस्वीर ऐसी भी थी जिसमें बहुत छोटा-सा अग्नि अपने दादा की उंगली पकड़े खड़ा था।

    अग्नि की नजर अनायास उस तस्वीर पर चली गई।

    कुछ पल के लिए उसके चेहरे की कठोरता गायब हुई।

     

    वह तस्वीर…

    उसकी जिंदगी के उन कुछ खूबसूरत पलों में से एक थी, जिन्हें वह चाहकर भी भूल नहीं पाया था।

    विक्रम जी ने उसकी नजर तस्वीर पर जाते देख ली।

    लेकिन उन्होंने कुछ नहीं कहा।

    बस धीरे से अपनी कुर्सी की तरफ बढ़े।

    अग्नि भी तस्वीर से नजर हटाकर उनकी तरफ देखने लगा।

     

     

    कुछ पल तक दोनों के बीच खामोशी रही।

    फिर अग्नि धीरे-धीरे आगे बढ़ा। और अचानक…

    वह झुक गया। उसने विक्रम राजावत के पैर छू लिए।

    विक्रम जी कुछ पल के लिए बिल्कुल स्तब्ध रह गए।

    शायद उन्हें उम्मीद नहीं थी कि अग्नि, जो कुछ सेकंड पहले तक उनसे इतनी नाराज़गी से बात कर रहा था, इस तरह उनके पैर छुएगा।

     

    उनकी आँखों में अचानक नमी उतर आई। उन्होंने तुरंत अग्नि को उठाया और उसके दोनों कंधों को पकड़कर उसे अपने सीने से लगा लिया।

    “मेरा बच्चा…” उनकी आवाज़ में अब गुस्सा नहीं था।

    सिर्फ़ अपनापन था।

     

    अग्नि ने भी आँखें बंद कर लीं। उस पल में वह राजावत ग्रुप का करोड़ों का मालिक या सख्त CEO नहीं था।

    वह बस अपने दादा का पोता था।

     

    वही बच्चा…

    जो कभी उनके पीछे-पीछे पूरे घर में घूमता था।

     

    लेकिन अगले ही पल अग्नि के चेहरे के भाव पूरी तरह शून्य हो जायेंगे। “ दादा जी, आप शादी करने के लिए मुझे ब्लैकमेल नहीं कर सकते। शादी करना या ना करना ये मेरा निजी फैसला है।”

     

    अग्नि की बात सुनकर विक्रम जी के चेहरे के भाव गंभीर हो गए, वो उसके कंधे पर हाथ रखते हुए बोले, “कभी कभी हमें कुछ पहले लेने से पहले समय की नजाकत को देखना होता है।”

    कहकर उन्होंने एक फाइल उसकी तरफ बढ़ा दी।

     

    अग्नि ने भौहें उचकाई, “ मैं आपकी शर्तें पढ़ चुका हूँ, बार बार मेरे सामने ये फाइल मत लाइए।”

     

    विक्रम जी बोले, “ ये वो फाइल नहीं है, जो तुम समझ रहे हो।”

     

    अग्नि के पहले विक्रम जी को देखा और फिर उनके हाथ में मौजूद फाइल को, फिर उसने वो फाइल अपने हाथों में पकड़ ली।

    और चेयर खींचकर उसपर बैठ गया। 

     

    अग्नि ने फाइल अपने हाथों में ली और चेयर खींचकर उस पर बैठ गया। उसने फाइल को कुछ पल तक बिना खोले देखा।

    फिर उसकी नजर अपने दादा जी पर गई। “अब इसमें और क्या है?”

     

    विक्रम जी अपनी जगह खड़े रहे। “पहले पढ़ो।”

     

    अग्नि ने हल्की-सी साँस छोड़ी और फाइल खोल दी।

    पहले पन्ने पर वही वसीयत थी, जिसे वह पहले भी कई बार पढ़ चुका था। उसकी नजर तेजी से उन पंक्तियों पर दौड़ी। राजावत परिवार की संपत्ति का उत्तराधिकारी बनने के लिए अग्नि सिंह राजावत को अपने सत्ताईसवें जन्मदिन से पहले विवाह करना अनिवार्य होगा।

    अग्नि के होंठों पर हल्की-सी व्यंग्यात्मक मुस्कान आ गई। “मैंने कहा था ना दादा जी… मैं ये सब पहले ही पढ़ चुका हूँ।”

     

    विक्रम जी ने कोई जवाब नहीं दिया। अग्नि ने अगला पन्ना पलटा। फिर एक और फिर…

    उसकी उंगलियाँ वहीं रुक गईं।

    उसके चेहरे पर आई हल्की-सी मुस्कान धीरे-धीरे गायब हो गई।

    “ये क्या है?”

     

    विक्रम जी ने शांत स्वर में पूछा, “क्या हुआ?”

     

    अग्नि ने फाइल से नजर उठाई। “ये हिस्सा पहले इस फाइल में नहीं था।”

     

    विक्रम जी धीरे-धीरे उसके सामने रखी दूसरी चेयर पर जाकर बैठ गए। “क्योंकि तुम्हें इसकी जरूरत नहीं पड़ी थी।”

     

    अग्नि की आँखें सिकुड़ गईं। “और अब पड़ गई?”

     

    “हाँ।” कमरे में फिर खामोशी छा गई।

     

    अग्नि ने उस पन्ने को दोबारा पढ़ा। उसमें वसीयत की संपत्ति से ज्यादा परिवार की कुछ जिम्मेदारियों और अधिकारों का उल्लेख था।

     

    कुछ ऐसी बातें… जिन्हें पढ़कर अग्नि समझ गया था कि मामला सिर्फ़ पैसों का नहीं है। उसने फाइल बंद कर दी। “दादा जी, आप आखिर चाहते क्या हैं?”

     

    विक्रम जी ने कुछ पल तक उसे देखा। “मैं चाहता हूँ कि तुम शादी करो।”

     

    अग्नि ठंडी साँस छोड़ते हुए, “क्यों?”

     

    विक्रम जी, “क्योंकि अब समय आ गया है।”

     

    अग्नि हँस पड़ा। लेकिन उसकी हँसी में खुशी नहीं थी। “ये कोई जवाब नहीं है।”

     

    विक्रम जी चुप रहे

    । अग्नि ने आगे झुककर कहा,

    “आप जानते हैं कि मैं शादी क्यों नहीं करना चाहता।”

     

    कहानी आगे जारी रहेगी।

     

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    Neha Goyal

    मेरा नाम नेहा गोयल है। और पिछले दो वर्ष से मैं प्रतिलिपि पर कहानियां लिखती आ रही हूँ। मुझे लेखन करते हुए बहुत ही अच्छा लगता है। वैसे मुझे लिखने से पढ़ना ज्यादा पसंद है।

  • Bound by fate

    Bound by fate

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    Bound by Fate

     

    भाग 3

     

    राधे राधे दोस्तों ❤️

    ✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️

     

    अगली सुबह

     

    सुबह के आठ बजे

     

    खिड़की से आती सूरज की हल्की किरणें धीरे-धीरे कमरे में फैल रही थीं। कमरे में रात की खामोशी अब भी मौजूद थी।

     

    तभी बेड पर लेटी लड़की के हाथों में हल्की-सी हरकत हुई। उसकी पलकों में कंपन हुआ। कुछ ही सेकंड बाद उसने धीरे-धीरे अपनी आंखें खोल दीं। कमरे में अभी भी हल्का अंधेरा था, बस कमरे के पर्दों से छनकर आती सूरज की किरणें कमरे को हल्की रोशनी से भर रही थीं।

     

    आंखें खुलते ही उसने छत की तरफ देखा। कुछ पल तक वह यूं ही देखती रही। फिर उसकी नजरें कमरे में घूमने लगीं। लेकिन उसे कुछ भी पहचान में नहीं आया।

     

    वह कहां थी?

     

    उसने उठकर बैठने की कोशिश की। लेकिन शरीर में इतनी कमजोरी थी कि वह ठीक से बैठ भी नहीं पाई।

     

    उसने दोबारा कोशिश की। इस बार किसी तरह उठकर बैठ गई।

     

    उसका सिर भारी था। शरीर में दर्द था और गला बिल्कुल सूख रहा था। उसने अपने कपड़ों की तरफ देखा।

     

    उसने जो लाल सूट पहना था…

     

    वो अब वहां नहीं था।

     

    उसकी जगह उसने एक मुलायम-सा ढीला कुर्ता पहन रखा था।

     

    वो घबरा गई।

     

    तभी…

     

    दरवाजा खुला।

     

    लड़की ने तुरंत नजरें उठाईं।

     

    सामने दरवाजे पर एक आदमी खड़ा था।

     

    वही आदमी…

     

    जिसने पिछली रात उसे सड़क से उठाया था।

     

    रूद्रांश शेखावत।

     

    गेहुआं रंग… लगभग छह फुट दो इंच लंबा कद… गहरी नीली आंखें… शार्प जॉलाइन… हल्की बियर्ड… सख्त चेहरे की बनावट…

     

    और चेहरे पर एक ऐसा अजीब-सा आकर्षण, जिससे नजरें हटाना आसान नहीं था।

     

    उसका शरीर बेहद फिट था और उसकी पूरी personality में एक अलग ही रौब था।

     

    वह जितना हैंडसम था…

     

    उतना ही रहस्यमयी भी।

     

    रूद्रांश की नजर जैसे ही लड़की पर पड़ी, उसने शांत स्वर में कहा,

     

    “आखिर तुम होश में आ ही गईं।”

     

    उसकी आवाज सुनकर लड़की का ध्यान टूटा। उसने घबराकर उसे देखा और अनजाने में ब्लैंकेट को अपनी मुट्ठियों में कस लिया।

     

    रूद्रांश ने तुरंत ही उसकी घबराहट नोटिस कर ली। वह कुछ कदम आगे बढ़ा, लेकिन उससे उचित दूरी बनाकर रुक गया।

     

    “हे, डरो मत।”

     

    उसकी आवाज इस बार थोड़ी नरम थी।

     

    “तुम यहां बिल्कुल सेफ हो।”

     

    लड़की की आंखों में अब भी डर और उलझन थी।

     

    उसने मुश्किल से अपनी आवाज निकाली।

     

    “आ… आप कौन हैं?”

     

    कुछ पल रुककर उसने पूछा,

     

    “और मैं यहां कैसे आई?”

     

    रूद्रांश के होंठों पर हल्की-सी मुस्कान आई।

     

    “ये सवाल तो मुझे तुमसे पूछना चाहिए।”

     

    फिर वह बेड के पास रखी कुर्सी पर बैठ गया और बोला,

     

    “लेकिन चलो… पहले मैं ही बता देता हूं।”

     

    उसने लड़की की तरफ देखते हुए कहा,

     

    “मेरा नाम रूद्रांश शेखावत है। शायद तुमने मेरा नाम सुना होगा।”

     

    लड़की चुप रही।

     

    रूद्रांश ने आगे पूछा,

     

    “अब तुम बताओ… तुम कौन हो?”

     

    वह कुछ पल चुप रही।

     

    जैसे अपने ही नाम को याद करने की कोशिश कर रही हो।

     

    उसके होंठ हिले।

     

    “म… मेरा नाम…”

     

    वह रुक गई।

     

    उसने अपनी आंखें बंद कीं।

     

    कुछ सोचने के बाद बहुत धीमी आवाज में बोली,

     

    “ई… ईशानी…”

     

    रूद्रांश के चेहरे के भाव सामान्य रहे।

     

    “ओके…”

     

    उसने सिर थोड़ा झुकाया।

     

    “तो मिस ईशानी… कल रात तुम उस सुनसान सड़क पर अकेली क्या कर रही थीं?”

     

    लेकिन उसकी तेज निगाहें ईशानी के चेहरे के भावों को परख रही थीं।

     

    ईशानी का चेहरा अचानक बदल गया।

     

    उसकी आंखों में बेचैनी फैल गई।

     

    वह कुछ याद करने की कोशिश करने लगी।

     

    लेकिन…

     

    कुछ भी साफ याद नहीं आया।

     

    सिर्फ धुंधली-सी तस्वीरें।

     

    उसने अपना सिर पकड़ लिया।

     

    अचानक सिर में तेज दर्द उठा।

     

    “आह…”

     

    उसके मुंह से दर्द भरी आवाज निकली।

     

    रूद्रांश तुरंत उठ खड़ा हुआ।

     

    “रिलैक्स!”

     

    उसने गंभीर लेकिन शांत आवाज में कहा,

     

    “फिलहाल, कुछ याद करने की जरूरत नहीं है।”

     

    ईशानी ने उसकी तरफ देखा।

     

    रूद्रांश कुछ पल उसे देखता रहा।

     

    उसे समझ आ गया कि मामला उसकी सोच से कहीं ज्यादा उलझा हुआ था।

     

    वह अपनी जेब की तरफ हाथ ले गया।

     

    सिगरेट निकालने वाला था…

     

    लेकिन फिर रुक गया।

     

    उसने सिगरेट वापस जेब में रख दी।

     

    वो हमेशा ऐसा ही करता था।

     

    जब कोई चीज उसे परेशान करती या कोई मामला उसकी समझ से बाहर होता, तो वह सिगरेट जला लेता था।

     

    लेकिन आज…

     

    पता नहीं क्यों, उसके सामने बैठी ये लड़की उसकी उस आदत को भी रोक रही थी।

     

    रूद्रांश ने आखिरकार कहा,

     

    “शायद तुमने काफी समय से ठीक से कुछ खाया नहीं, इसलिए मैं तुम्हारे खाने के लिए कुछ भिजवा रहा हूँ। उसके बाद तुम्हें दवाई भी लेनी है।”

     

    कहकर वह कमरे से बाहर निकला और उसने दरवाजा भी बंद कर दिया।

     

    ईशानी कुछ पल तक उसी दरवाजे को देखती रही।

     

    फिर उसने धीरे से अपनी आंखें बंद कर लीं।

     

    वह याद करने की कोशिश करने लगी।

     

    कुछ…

     

    बहुत धुंधली तस्वीरें उसके दिमाग में उभरने लगीं।

     

    एक मंडप…

     

    चारों तरफ लोग…

     

    कोई उसका हाथ जबरदस्ती पकड़कर उसे खींच रहा था…

     

    उसकी चीख…

     

    किसी की तेज आवाज…

     

    फिर अंधेरा…

     

    और उसके बाद…

     

    बारिश में भागती हुई वो खुद।

     

    अचानक उसे किसी पुरुष की गुस्से से भरी आवाज सुनाई दी।

     

    “तुम कहीं नहीं जा सकतीं!”

     

    ईशानी का पूरा शरीर कांप उठा।

     

    उसने अपनी आंखें कसकर बंद कर लीं।

     

    एक पल के लिए उसे किसी के हाथ में चमकती हुई अंगूठी दिखाई दी…

     

    फिर लाल रंग…

     

    बहुत सारा लाल रंग…

     

    और उसके कानों में किसी लड़की के रोने की आवाज गूंजने लगी।

     

    लेकिन इससे पहले कि वह उस आवाज को पहचान पाती, सब कुछ फिर से धुंधला हो गया।

     

    ईशानी ने अचानक आंखें खोल दीं।

     

    उसकी सांसें तेज हो चुकी थीं।

     

    उसने अपने सीने पर हाथ रखा।

     

    दिल बहुत तेजी से धड़क रहा था।

     

    उसकी आंखों से आंसू निकल आए।

     

    “मैं…”

     

    उसकी आवाज कांप रही थी।

     

    “मैं किसी से भाग रही थी…”

     

    वह कुछ पल के लिए चुप हुई।

     

    फिर उसकी आंखों में डर उतर आया।

     

    “लेकिन किससे?”

     

    उसने अपना सिर पकड़ लिया।

     

    “और… क्यों?”

     

    कमरे में उसकी कांपती आवाज गूंजकर रह गई।

     

    उसे नहीं पता था कि उसकी यादों में छिपा सच उसकी जिंदगी को दोबारा तोड़ने वाला था…

     

    या फिर उसी सच की वजह से उसे एक ऐसा

    रिश्ता मिलने वाला था, जिसकी उसने कभी कल्पना तक नहीं की थी।

     

    लेकिन एक बात तय थी…

     

    उसकी याददाश्त में छिपा हर राज उसे धीरे-धीरे उसी रात की तरफ ले जाने वाला था।

     

    और उस रात से जुड़ा एक नाम…

     

    शायद उसकी जिंदगी का सबसे बड़ा सच बनने वाला था।

     

    रूद्रांश शेखावत।

    क्या रूद्रांश और ईशानी की ये मुलाकात महज एक इत्तेफाक थी…

    या तकदीर ने दोनों को एक-दूसरे से मिलाने के लिए ये खेल रचा था?

    जानने के लिए पढ़िए Bound by Fate ❤️

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    Neha Goyal

    मेरा नाम नेहा गोयल है। और पिछले दो वर्ष से मैं प्रतिलिपि पर कहानियां लिखती आ रही हूँ। मुझे लेखन करते हुए बहुत ही अच्छा लगता है। वैसे मुझे लिखने से पढ़ना ज्यादा पसंद है।