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🌸 वृंदावन का वो आखिरी दिन

पढ़ने का समय : 10 मिनट

 

भाग 2 — कंस का संदेश 🦚

 

वृंदावन की उस सुबह के बाद दिन तो बीत गया था…

लेकिन यशोदा मैया के मन की बेचैनी नहीं बीती।

 

सूरज ढलने लगा था।

 

आकाश पर लालिमा फैल चुकी थी। यमुना का जल सूर्य की अंतिम किरणों को अपने भीतर समेटे धीरे-धीरे शांत हो रहा था। गौएँ चरागाह से लौट रही थीं और उनके गलों में बंधी घंटियों की आवाज पूरे वृंदावन में एक मधुर संगीत की तरह फैल रही थी।

 

गोपियाँ अपने-अपने घरों के बाहर खड़ी होकर गायों का स्वागत कर रही थीं।

ग्वालबाल दिनभर की शरारतों के किस्से सुनाते हुए अपने घरों की ओर जा रहे थे।

 

और नंद भवन के आँगन में… श्री कृष्ण अपनी बाँसुरी लेकर बैठे थे, उनके पास ही बैठे थे उनके बड़े भाई बलराम 

 

कभी कृष्ण कुछ कहते और बलराम हँस पड़ते।

कभी दोनों बिना कुछ बोले ही यमुना की ओर देखते रहते। सब कुछ सामान्य था। फिर भी…

 

मैया यशोदा को कुछ सामान्य नहीं लग रहा था।

वह रसोई में खड़ी थीं, लेकिन बार-बार उनकी नजर कृष्ण पर जा रही थी।

 

सुबह कृष्ण ने जो बात कही थी, वह उनके मन से निकल ही नहीं रही थी।

 

“अगर कभी आपका कान्हा आपसे दूर चला जाए तो?”

 

मैया ने सिर झटक दिया।

 

“नहीं…” उन्होंने खुद से कहा। “मेरा कान्हा ऐसा कुछ नहीं कह सकता।”

 

लेकिन मन था कि मान ही नहीं रहा था। तभी बाहर से नंद बाबा की आवाज आई, “यशोदा!”

 

मैया ने वहीं से आवाज लगाई, “जी?”

 

“जरा बाहर आना।”

 

वो हाथ पोंछते हुए बाहर आईं, नंद बाबा मुख्य द्वार के पास खड़े थे। उनके चेहरे पर गंभीरता थी।

 

“क्या हुआ?” यशोदा ने पूछा।

 

नंद बाबा ने कुछ कहने के लिए होंठ खोले ही थे कि तभी बाहर से घोड़ों के दौड़ने की आवाज सुनाई दी , टापों की आवाज धीरे-धीरे तेज होती गई।

 

नंद भवन के द्वार पर खड़े सेवक ने बाहर झाँककर देखा।

“महाराज…”

 

नंद बाबा उसकी ओर मुड़े। “क्या हुआ?”

 

“एक रथ आ रहा है।”

 

“किसका?”

 

सेवक ने दूर देखते हुए कहा, “पहचान में नहीं आ रहा।”

 

नंद बाबा कुछ क्षण शांत रहे। फिर बोले, “द्वार खोल दो।”

 

कुछ ही पल बाद एक सुंदर रथ नंद भवन के सामने आकर रुका। रथ से एक गंभीर, तेजस्वी पुरुष नीचे उतरे।

चेहरे पर थकान थी… लेकिन आँखों में गहरी भक्ति।

 

उन्होंने जैसे ही नंद बाबा को देखा, हाथ जोड़ दिए। “नंद महाराज।”

 

नंद बाबा आगे बढ़े। “आप?”

 

उन्होंने ध्यान से देखा। फिर पहचानते ही बोले, “अक्रूर जी!”

यशोदा भी उनके पास आ गईं।

 

अक्रूर ने दोनों को प्रणाम किया। “महाराज, मैया…”

 

नंद बाबा ने उनका स्वागत करते हुए कहा, “आइए। इतनी संध्या के समय आपका आगमन… सब कुशल तो है?”

 

अक्रूर ने एक क्षण नंद बाबा की ओर देखा। उनके चेहरे पर कुछ ऐसा था कि नंद बाबा का मन और भी बेचैन हो गया।

 

“सब कुशल है ना?” इस बार नंद बाबा की आवाज में चिंता स्पष्ट थी।

 

अक्रूर ने धीरे से सिर झुकाया। “मैं एक संदेश लेकर आया हूँ।”

 

यशोदा के हृदय में जैसे अचानक कोई अनजाना भय जाग उठा। उन्होंने बिना जाने ही कृष्ण की ओर देखा।

कृष्ण अब भी आँगन में बैठे थे। लेकिन उनकी आँखें…

सीधे अक्रूर पर थीं।

 

जैसे वह पहले से जानते हों कि अक्रूर क्यों आए हैं।

 

—

 

नंद बाबा अक्रूर को भीतर ले गए।

 

कृष्ण और बलराम भी कुछ दूरी पर खड़े हो गए।

 

मैया ने कृष्ण का हाथ पकड़ लिया। “तुम यहीं रहना।”

 

कृष्ण ने उनकी ओर देखा। “क्यों मैया?”

 

“बस…” यशोदा के पास कोई कारण नहीं था।

 

उन्हें स्वयं समझ नहीं आ रहा था कि वह ऐसा क्यों कह रही हैं। अंदर सभा-कक्ष में नंद बाबा ने अक्रूर को आसन दिया।

“बताइए।”

 

अक्रूर कुछ क्षण मौन रहे। फिर उन्होंने कहा, “महाराज… मैं मथुरा से आया हूँ।”

 

“मथुरा से?”

 

“हाँ।”

 

नंद बाबा का चेहरा गंभीर हो गया, “किसलिए?”

 

अक्रूर ने गहरी साँस ली। “महाराज कंस ने एक धनुष यज्ञ का आयोजन किया है।”

 

नंद बाबा ने सिर हिलाया। “यह तो सुना है।”

 

“उसने वृंदावन से भी लोगों को आमंत्रित किया है।”

 

“ठीक है।”

नंद बाबा कुछ सहज हुए।

 

लेकिन अगले ही शब्दों ने उनके चेहरे का रंग बदल दिया।

 

“विशेष रूप से कृष्ण और बलराम को।”

 

कमरे में अचानक सन्नाटा छा गया। यशोदा के हाथ से पानी का पात्र लगभग छूट गया।

“कृष्ण… और बलराम?”

 

अक्रूर ने धीरे से सिर झुका दिया। “हाँ, मैया।”

 

यशोदा ने तुरंत कहा, “लेकिन क्यों?”

 

अक्रूर ने उनकी ओर देखा। उनकी आँखों में करुणा थी।

 

“राजा कंस ने उन्हें मथुरा बुलाया है।”

 

यशोदा आगे बढ़ीं। “कितने दिनों के लिए?”

 

अक्रूर चुप रहे, यशोदा की आँखें फैल गईं।

“मैंने पूछा… कितने दिनों के लिए?”

 

अक्रूर ने कोई उत्तर नहीं दिया, नंद बाबा समझ गए।

 

उन्होंने धीमी आवाज में पूछा, “क्या यह केवल धनुष यज्ञ के लिए बुलावा है?”

 

अक्रूर ने उनकी आँखों में देखा। “नहीं।”

 

बस एक शब्द और नंद भवन की सारी शांति जैसे टूट गई।

 

—

 

यशोदा ने तुरंत कृष्ण को अपनी ओर खींच लिया। “मेरा बेटा कहीं नहीं जाएगा।”

 

कृष्ण शांत खड़े रहे। “मैया…”

 

“नहीं!” यशोदा की आँखों में आँसू आ गए।

 

“मुझे नहीं पता राजा कंस ने क्यों बुलाया है। मुझे यह भी नहीं जानना कि वहाँ क्या उत्सव है, क्या यज्ञ है… मेरा कान्हा कहीं नहीं जाएगा।”

 

नंद बाबा ने उन्हें समझाने की कोशिश की। “यशोदा…”

 

“नहीं जी!” यशोदा ने उनकी ओर देखा।

“आप कुछ मत कहिए।”

 

फिर वह अक्रूर की ओर मुड़ीं। “आप वापस चले जाइए।”

 

अक्रूर स्तब्ध रह गए। “मैया…”

 

“कह दीजिए कंस से कि कृष्ण नहीं आएगा।”

 

अक्रूर ने सिर झुका लिया। “काश मैं ऐसा कर पाता।”

 

“तो कीजिए।” यशोदा की आवाज टूट गई। “आप नहीं जानते… वह मेरे लिए क्या है।”

 

अक्रूर की आँखें नम हो गईं। “मैं जानता हूँ, मैया।”

 

“नहीं!” यशोदा ने कृष्ण का चेहरा अपने हाथों में थाम लिया। “कोई नहीं जानता।”

 

उन्होंने कृष्ण को अपने सीने से लगा लिया। “मेरे लिए यह भगवान नहीं है…”

उनकी आवाज काँप रही थी। “यह मेरा पुत्र है।”

 

कृष्ण ने धीरे से उनकी पीठ पर हाथ रखा। “मैया…”

 

“तुम कहीं नहीं जाओगे।”

कृष्ण चुप रहे। उनकी आँखें कुछ पल के लिए नंद बाबा पर गईं।

 

नंद बाबा की आँखों में भी चिंता थी। लेकिन उस चिंता के पीछे कुछ और था।

 

जैसे उन्हें भीतर से पता हो कि यह बुलावा केवल एक उत्सव का निमंत्रण नहीं है।

 

—

 

अक्रूर ने धीरे से कहा, “नंद महाराज, मुझे एक बात कहनी है।”

 

नंद बाबा ने उनकी ओर देखा। “कहिए।”

 

“मैं स्वयं भी इस यात्रा को लेकर प्रसन्न नहीं हूँ।”

 

यशोदा ने उनकी ओर देखा।

 

अक्रूर बोले, “लेकिन मुझे विश्वास है कि कृष्ण और बलराम का मथुरा जाना किसी बड़े उद्देश्य का भाग है।”

 

नंद बाबा ने तुरंत पूछा, “आप ऐसा क्यों कह रहे हैं?”

 

अक्रूर कुछ क्षण मौन रहे। फिर बोले, “क्योंकि कंस कृष्ण से भयभीत है।”

 

कमरे में सन्नाटा छा गया। “भयभीत?” नंद बाबा ने दोहराया।

 

अक्रूर ने सिर हिलाया। “हाँ।”

 

“लेकिन कृष्ण ने उसका क्या बिगाड़ा है?”

 

“यही तो बात है।”

 

अक्रूर की आवाज धीमी थी। “कंस कृष्ण से इसलिए नहीं डरता कि कृष्ण ने उसका कुछ बिगाड़ा है… वह इसलिए डरता है क्योंकि उसे अपने अंत का भय है।”

 

यशोदा का हृदय धक से रह गया। “कैसा अंत?”

 

अक्रूर ने उत्तर नहीं दिया।

नंद बाबा ने गंभीर होकर पूछा, “क्या भविष्यवाणी वाली बात…”

 

अक्रूर ने धीरे से सिर झुका दिया, यशोदा ने कृष्ण को और कसकर पकड़ लिया। उनके मन में वर्षों पुरानी बातें कौंधने लगीं।

कृष्ण का जन्म… उस रात की रहस्यमयी घटनाएँ…

गोकुल में उनका आना… कंस के भेजे असुर…

पूतना… शकटासुर… त्रिणावर्त… कालिया…

गोवर्धन…

 

एक-एक घटना जैसे अचानक उनके सामने जीवित हो उठी।

क्या यह सब उसी दिन की ओर बढ़ रहा था? क्या कृष्ण का वृंदावन में रहना अब संभव नहीं था?

यशोदा ने कृष्ण की ओर देखा, वह शांत थे।

 

असामान्य रूप से शांत। “कान्हा…”

 

कृष्ण ने उनकी आँखों में देखा। “हाँ, मैया।”

 

“तुम्हें डर नहीं लग रहा?”

 

कृष्ण मुस्कुराए। “किस बात का?”

 

“मथुरा जाने का।”

 

कृष्ण ने धीरे से कहा, “जहाँ आपका आशीर्वाद हो, वहाँ डर कैसा?”

 

यशोदा की आँखों से आँसू बह निकले। उन्होंने तुरंत अपना चेहरा दूसरी ओर कर लिया।

 

वह नहीं चाहती थीं कि कृष्ण उन्हें रोते हुए देखें, लेकिन कृष्ण सब समझ रहे थे।

 

—

 

उस रात नंद भवन में किसी ने ठीक से भोजन नहीं किया।

 

गोपियों तक यह समाचार पहुँच चुका था, धीरे-धीरे पूरा वृंदावन जान गया, कृष्ण और बलराम को मथुरा बुलाया गया है।

 

गलियों में फुसफुसाहट होने लगी।

किसी ने कहा, “कृष्ण को नहीं जाना चाहिए।”

 

किसी ने कहा, “कंस पर विश्वास कैसे किया जा सकता है?”

किसी ने कहा, “यह जरूर कोई चाल है।”

 

और किसी ने बस इतना कहा, “अगर कृष्ण चले गए तो वृंदावन का क्या होगा?”

 

यमुना किनारे राधा खड़ी थीं, उन्हें भी समाचार मिल चुका था। हवा में वही बाँसुरी की धुन जैसे अब भी तैर रही थी।

 

लेकिन आज… वह धुन उन्हें खुश नहीं कर रही थी।

उनकी आँखों के सामने कृष्ण का चेहरा था। सुबह का वही प्रश्न याद आ रहा था, “अगर कभी आपका कान्हा आपसे दूर चला जाए तो?”

 

राधा की आँखों से एक आँसू गिरा, उन्होंने यमुना की ओर देखा।

“तो क्या सच में…” उनकी आवाज हवा में खो गई।

“कान्हा हमसे दूर जाने वाले हैं?”

 

—

 

नंद भवन में उस रात कृष्ण अपने कक्ष में बैठे थे, बलराम उनके सामने थे।

कुछ देर दोनों भाई मौन रहे। फिर बलराम ने पूछा, “तुम्हें पहले से पता था?”

 

कृष्ण ने मुस्कुराकर उनकी ओर देखा। “क्या?”

 

“अक्रूर के आने के बारे में।”

 

कृष्ण ने उत्तर नहीं दिया। बलराम समझ गए। “तुम जानते थे।”

 

कृष्ण ने धीरे से बाँसुरी उठाई। “दाऊ…”

 

“हूँ?”

 

“कभी-कभी जीवन हमें वहाँ ले जाता है जहाँ जाने की हमने इच्छा नहीं की होती।”

 

बलराम ने उनकी आँखों में देखा। “और अगर कोई तुम्हें रोकना चाहे?”

 

कृष्ण ने कुछ क्षण सोचा, फिर मुस्कुराए।

“तो उसे प्रेम से समझाना होगा।”

 

“और अगर प्रेम ही तुम्हें रोक ले?”

 

इस बार कृष्ण की मुस्कान थोड़ी फीकी पड़ गई, उन्होंने बाहर देखा। आँगन में यशोदा मैया बैठी थीं, उनकी आँखें कृष्ण के कक्ष की ओर थीं।

 

कृष्ण कुछ पल उन्हें देखते रहे। फिर धीरे से बोले, “तब सबसे कठिन होता है… जाना।”

 

उनकी उँगलियाँ बाँसुरी पर ठहर गईं, बाहर रात गहरी होती जा रही थी।

वृंदावन सो रहा था, लेकिन उस रात… नंद भवन में कोई नहीं सोया।

एक माँ अपने पुत्र को खोने के भय में जाग रही थी।

 

एक पिता अपने कर्तव्य और पुत्र के बीच खड़ा था।

एक भाई आने वाले संघर्ष को महसूस कर रहा था।

 

एक युवती यमुना किनारे अपने प्रिय के जाने की आहट सुन रही थी।

 

और कृष्ण… वह सबसे शांत बैठे थे।

जैसे उन्हें पता हो कि अगली सुबह से वृंदावन की हर साँस बदलने वाली है।

 

क्योंकि अक्रूर केवल कंस का संदेश लेकर नहीं आए थे।

 

वह अपने साथ…

वृंदावन के विरह की पहली सुबह भी लेकर आए थे। 🦚❤️

 

हम दिन में जाने कितने बुरे विचार लाते हैं या कहते हैं इसलिए एक बार साफ मन से 

🌺 राधे राधे 🌺 कहते जाइए।

और अगर आपको कहानी अच्छी लगी हो तो लाइक और कमेंट भी कर देना

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Neha Goyal

मेरा नाम नेहा गोयल है। और पिछले दो वर्ष से मैं प्रतिलिपि पर कहानियां लिखती आ रही हूँ। मुझे लेखन करते हुए बहुत ही अच्छा लगता है। वैसे मुझे लिखने से पढ़ना ज्यादा पसंद है।

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