भाग 1 — वृंदावन की वो सुबह 🦚
वृंदावन में सुबह
कभी केवल सुबह नहीं होती थी।
वहाँ सूरज की पहली किरण के साथ जैसे कोई बाँसुरी जन्म लेती थी…
यमुना की लहरें उसे सुनती थीं, कदंब के वृक्ष झूमकर उसका स्वागत करते थे और गलियों में बिखरी धूल भी जैसे उस धुन पर नाचने लगती थी।
उस दिन भी वृंदावन वैसा ही जागा था।
आकाश अभी पूरी तरह लालिमा से नहीं भरा था। पूर्व दिशा में हल्की सुनहरी आभा फैल रही थी। यमुना का जल शांत था और उसके ऊपर तैरती धुंध की पतली चादर धीरे-धीरे सूरज की किरणों में घुल रही थी।
कहीं गौशाला से गायों के रंभाने की आवाज आ रही थी, तो कहीं घरों के आँगन में गोपियाँ मटके लिए निकल चुकी थीं।
लेकिन उस सुबह वृंदावन की हवा में कुछ अलग था।
बहुत हल्का-सा…
इतना हल्का कि कोई उसे महसूस तो कर सकता था, पर उसका नाम नहीं रख सकता था।
नंद भवन में यशोदा मैया रोज की तरह सुबह-सुबह उठ चुकी थीं।
उन्होंने आँगन में गोबर से सुंदर-सी रंगोली बनाई, तुलसी माता को जल चढ़ाया और फिर माखन मथने बैठ गईं।
मथानी की आवाज पूरे आँगन में गूँज रही थी।
छन्न… छन्न… छन्न…
यशोदा मैया के होंठों पर मुस्कान थी।
लेकिन उनकी आँखें बार-बार उस कमरे की ओर उठ जातीं जहाँ उनका कान्हा सो रहा था।
“पता नहीं कब बड़ा हो गया मेरा लल्ला…”
उन्होंने धीरे से खुद से कहा।
फिर मुस्कुराकर सिर हिलाया।
“बड़ा कहाँ हुआ है? अभी भी तो सुबह उठते ही माखन के पीछे भागता है।”
उसी क्षण कमरे के भीतर से कुछ गिरने की आवाज आई।
धड़ाम!
मैया यशोदा की मथानी रुक गई। उन्होंने आँखें बंद कर लीं।
“लो… उठ गया मेरा नटखट।” उनके चेहरे पर हल्की मुस्कान उभर आई।
अगले ही पल उनकी आवाज पूरे भवन में गूँज उठी, “कान्हा!”
अंदर से कोई उत्तर नहीं आया। “कान्हा!”
फिर भी शांति। मैया यशोदा ने हाथ कमर पर रखे और कमरे की ओर बढ़ गईं।
दरवाजा खोलते ही उनकी नजर बिखरे हुए बिस्तर पर पड़ी।
सबकुछ अस्त व्यस्त था लेकिन कृष्णा… कमरे में थे ही नहीं।
मैया यशोदा कुछ क्षण उन्हें ढूँढती रहीं। फिर उनकी नजर खिड़की से बाहर गई।
कदंब के पेड़ के पास वो खड़े थे।
हाथ में बाँसुरी लिए।
नीली आभा से घिरा उनका मुख सुबह की पहली किरणों में ऐसा चमक रहा था जैसे स्वयं आकाश ने उन्हें अपने रंग में रंग दिया हो।
कृष्ण की आँखें यमुना की ओर थीं और उनके होंठों पर एक हल्की मुस्कान।
यशोदा खिड़की से ही पुकार उठीं,
“कान्हा! इतनी सुबह-सुबह वहाँ क्या कर रहे हो?”
कृष्ण ने पीछे मुड़कर देखा। “मैया…”
उनकी आवाज में वही मासूमियत थी। “आप जाग गईं?”
यशोदा ने भौंहें चढ़ाईं। “हाँ, क्योंकि मेरा लाल कमरे में सोने के बजाय पता नहीं कहाँ-कहाँ घूम रहा है।”
कृष्ण मुस्कुराए। “मैं तो बस जल्दी भोर में ही यमुना मैया से मिलने आया था।”
“यमुना मैया से मिलने?” यशोदा बाहर आईं और उनके पास पहुँचकर कान पकड़ लिया। “और मुझे बिना बताए?”
कृष्ण हँस पड़े। “मैया, आप तो सो रही थीं।”
“तो क्या मुझे जगाते?”
“जगाता तो आप मुझे जाने देतीं?”
मैया यशोदा कुछ पल उन्हें देखती रहीं। फिर उनके चेहरे पर अनायास मुस्कान आ गई। “नहीं।”
कृष्ण ने धीरे से कहा, “इसीलिए तो नहीं जगाया।”
यशोदा ने उनके गाल पर हल्की-सी चपत लगाई।
“बहुत चालाक हो गए हो, रे।”
कृष्ण हँसने लगे। उनकी हँसी सुनकर पास से गुजरती एक गोपी भी मुस्कुरा उठी।
“मैया, आपका कान्हा तो आज फिर माखन चुराने की तैयारी में है।”
कृष्ण तुरंत बोले, “मैंने आज माखन नहीं चुराया।”
यशोदा ने आँखें तरेरीं। “आज?”
कृष्ण चुप हो गए, गोपी हँस पड़ी।
“मैया, कल की मटकी याद है?”
यशोदा ने कृष्ण की ओर देखा। “तो कल किसने माखन चुराया था?”
कृष्ण ने तुरंत आकाश की ओर देखा। “मैया, मुझे लगता है आज मौसम बहुत सुंदर है।”
और इतना कहकर भागने लगे। “कान्हा!”
मैया यशोदा उनके पीछे दौड़ पड़ीं।
पूरा आँगन कृष्ण की हँसी से भर गया। कुछ ही देर में नंद भवन की वही पुरानी चहल-पहल लौट आई।
कहीं ग्वाल-बाल कृष्ण को ढूँढते हुए आ रहे थे। कहीं गोपियाँ उनकी शिकायत लेकर यशोदा के पास पहुँच रही थीं।
कहीं गायों के बीच जाकर कृष्ण उन्हें पुकार रहे थे।
वृंदावन के लिए कृष्ण केवल नंद बाबा के पुत्र नहीं थे, वह वृंदावन की धड़कन थे।
उनके बिना जैसे हर चीज अधूरी लगती थी।
—
सुबह कुछ और चढ़ी तो कृष्ण अपने सखाओं के साथ यमुना किनारे जा पहुँचे।
बलराम भी उनके साथ थे। मित्र ने कृष्ण के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा, “कान्हा, आज कहाँ चलें?”
कृष्ण ने मुस्कुराकर सामने देखा। “जहाँ मन करे।”
“तो फिर कदंब वन!” एक ग्वालबाल चिल्लाया।
सब दौड़ पड़े, कृष्ण पीछे रह गए।
उनकी नजर यमुना पर टिक गई। बलराम ने यह देखा तो उनके कदम भी रुक गए। “कृष्ण?”
कृष्ण ने उनकी ओर देखा। “हाँ, दाऊ?”
“क्या हुआ?”
“कुछ नहीं।”
बलराम कुछ क्षण उन्हें देखते रहे। “तुम आज कुछ बदले-बदले लग रहे हो।”
कृष्ण मुस्कुराए। “मैं तो वही हूँ।”
बलराम ने सिर हिलाया। “नहीं। आज तुम्हारी आँखें कुछ और कह रही हैं।”
कृष्ण ने कोई उत्तर नहीं दिया। उन्होंने अपनी बाँसुरी निकाली।
और अगले ही क्षण यमुना के किनारे वह धुन गूँज उठी।
मधुर… शांत… और ऐसी कि जैसे किसी ने हवा में प्रेम घोल दिया हो।
बांसुरी की वो धुन सुनकर, गायें चरना भूल गईं। पक्षियों का कलरव थम गया।
यमुना की लहरें जैसे धीमी हो गईं। दूर खड़ी कुछ गोपियाँ भी उस धुन को सुनकर ठिठक गईं।
उनमें राधा भी थीं। राधा ने आँखें बंद कर लीं। लेकिन आज…
उस बाँसुरी में कुछ अलग था। वही धुन थी, वही कृष्ण थे, वही वृंदावन था।
फिर भी दिल के भीतर एक अनजाना डर उतर आया था।
राधा ने धीरे से आँखें खोलीं। “कान्हा…”
उनके होंठों से बस इतना ही निकला।
—
उधर नंद भवन में यशोदा कृष्ण के लिए भोजन तैयार कर रही थीं।
उन्होंने थाली में माखन रखा, मिश्री रखी।
गरम-गरम रोटियाँ रखीं फिर अचानक उनके हाथ रुक गए। उनकी नजर थाली पर टिक गई।
उन्हें जाने क्यों आज मन में एक अजीब-सी बेचैनी महसूस हो रही थी।
उन्होंने खुद को समझाया, “शायद थक गई हूँ।”
लेकिन मन नहीं माना। उन्होंने आँगन में बैठे नंद बाबा को देखा। “सुनते हो?”
नंद बाबा ने उनकी ओर देखा। “क्या हुआ?”
मैया यशोदा कुछ पल चुप रहीं। “आज न जाने क्यों मन घबरा रहा है।”
नंद बाबा ने मुस्कुराकर कहा, “लल्ला को लेकर?”
मैया यशोदा ने सिर हिला दिया। “पता नहीं… बस ऐसा लगता है जैसे…” वह रुक गईं।
“जैसे क्या?”
मैया यशोदा के पास कोई उत्तर नहीं था। उन्होंने धीरे से कहा, “जैसे कुछ बदलने वाला है।”
नंद बाबा का चेहरा भी कुछ क्षण गंभीर हो गया। उन्होंने आकाश की ओर देखा। “सब कुछ तो भगवान की इच्छा से होता है, यशोदा।”
मैया ने तुरंत उनकी बात काट दी। “भगवान की इच्छा अपनी जगह है। लेकिन मेरा लल्ला…”
उनकी आवाज भर्रा गई। “मेरा कान्हा मेरी आँखों के सामने रहे… बस इतनी-सी इच्छा है।”
नंद बाबा ने उनकी ओर देखा। लेकिन इस बार उनके पास भी कोई उत्तर नहीं था।
—
दोपहर होने लगी थी। कृष्ण वापस लौटे। मैया यशोदा ने उन्हें देखते ही थाली आगे कर दी। “आओ, लल्ला। खाना खा लो।”
कृष्ण उनके पास बैठ गए, यशोदा अपने हाथों से उन्हें खिलाने लगीं।
एक निवाला… फिर दूसरा… कृष्ण उन्हें देखते रहे।
“क्या हुआ?” मैया ने पूछा।
कृष्ण ने सिर हिलाया। “कुछ नहीं।”
“तो ऐसे क्यों देख रहे हो?”
कृष्ण ने उनकी उँगलियों को अपने हाथ में ले लिया। “मैया…”
“हम्म?”
“अगर कभी आपका कान्हा आपसे दूर चला जाए तो?”
यशोदा के हाथ अचानक रुक गए, अनायास ही उनके चेहरे की मुस्कान गायब हो गई। “ऐसी बातें क्यों कर रहे हो?” उनकी आँखें गमगीन हो चुकी थी।
कृष्ण चुप रहे, यशोदा ने उनका चेहरा अपने हाथों में थाम लिया।
“कहीं नहीं जाओगे तुम।”
कृष्ण ने धीरे से मुस्कुराकर कहा, “और अगर जाना पड़ा तो?”
“नहीं।” यशोदा की आवाज इस बार दृढ़ थी।
“तुम्हें कहीं नहीं जाना।”
कृष्ण उनकी आँखों में देखते रहे, उन आँखों में माँ का प्रेम था।
ऐसा प्रेम जिसे संसार की कोई शक्ति बाँट नहीं सकती थी।
कृष्ण ने धीरे से अपना सिर अपनी मैया की गोद में रख दिया।
“ठीक है मैया।”
उन्होंने उनके बाल सहलाने शुरू कर दिए। उन्हें क्या पता था… कि कभी-कभी कृष्ण अपने सबसे प्रिय लोगों को भी आने वाले समय का पूरा सत्य नहीं बताते।
क्योंकि कुछ यात्राएँ ऐसी होती हैं… जिन्हें रोकने का अधिकार प्रेम के पास भी नहीं होता।
और वृंदावन की उस शांत सुबह में… किसी को नहीं पता था कि समय की धारा धीरे-धीरे उस क्षण की ओर बढ़ रही है…
जब कृष्ण को अपना सबसे प्रिय स्थान छोड़ना होगा।
लेकिन अभी… वृंदावन अनजान था। यमुना अनजान थी।
गोपियाँ अनजान थीं। राधा अनजान थीं।
और सबसे ज्यादा… यशोदा मैया अनजान थीं।
कि उनके कान्हा के साथ बिताई जा रही यह साधारण-सी सुबह…
वास्तव में वृंदावन की सबसे अनमोल सुबहों में से एक थी।
क्योंकि आने वाला समय… वृं
दावन से उसका कृष्ण माँगने वाला था।
और उस दिन… पूरे वृंदावन को पहली बार समझ आएगा—
कृष्ण सा प्रेम करना कितना आसान है…
लेकिन कृष्ण से विरह सहना कितना कठिन। 🦚❤️
अगर आपको कहानी पसंद आए तो कमेंट में राधे राधे जरूर लिखें।
🌺 राधे राधे 🌺

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