भाग 4 राधा को मिला संकेत 🦚❤️
बृज की धूल में अब वो पुरानी रौनक़ और वो जादुई महक नहीं रही थी। सुबह की पहली किरण जब शांत यमुना के घाटों को छूती थी, तो ऐसा प्रतीत होता था जैसे सूरज भी किसी गहरे और कभी न मिटने वाले गम में डूबा हो।
कदंब की वो छांव, जो कभी कान्हा की बंसी की सुरीली और मनमोहक धुनों से गूंजा करती थी, अब एक अजीब और डरावने सन्नाटे में लिपटी हुई थी।
इसी गहरी खामोशी के बीच राधा का जीवन जैसे थम सा गया था। उनके पैर भले ही आंगन में चलते थे, लेकिन उनकी सांसें और उनकी चेतना तो उस रास्ते पर अटक गई थी जिस पर चलकर कृष्ण कभी ब्रज से दूर चले गए थे।
कृष्ण के जाने की खबर ब्रज में एक तेज आंधी की तरह आई थी। मथुरा से अचानक बुलावा आया था, और कान्हा बिना एक पल भी गंवाए, बिना किसी को बताए, चुपचाप सब कुछ पीछे छोड़कर चले गए थे।
कंस का वध करना था और अपने माता-पिता को उस कैद से छुड़ाना था, दिमाग से तो गांव का हर एक बच्चा और बुजुर्ग यह जानता था कि यह उनका एक ऐसा कर्तव्य था जिसे टाला नहीं जा सकता था।
लेकिन किसी का दिल इस बात को स्वीकार करने को तैयार नहीं था कि उनका दुलारा कान्हा अब कभी लौटकर ब्रज की उन धूल भरी गलियों में न तो गायें चराएगा और न ही अपनी बांसुरी की तान छेड़ेगा।
राधा उस मनहूस सुबह अपने घर के बाहर आंगन में तुलसी के पवित्र पौधे को जल अर्पित कर रही थीं। तभी हवा का एक ऐसा ठंडा झोंका आया, जिसने उनके भीतर तक सिहरन पैदा कर दी। कान में किसी अनहोनी की फुसफुस सी गूंजी, “कान्हा चले गए।”
राधा के हाथ से पीतल का लोटा छूटकर जमीन पर गिर गया, सारा पानी चारों तरफ बिखर गया, लेकिन राधा वहीं एक पत्थर की मूरत की भांति अचल खड़ी रह गईं।
उनकी आंखों से एक भी आंसू नहीं टपका, क्योंकि दिल पर जो वज्रपात हुआ था, उसने तो आंसुओं के स्त्रोत को भी भीतर ही सुखा दिया था।
कुछ हफ्तों बीत जाने के बाद, जब मथुरा से एक शाही दूत ब्रज की सीमा में दाखिल हुआ, तो हर किसी की सांसे थम गईं।
वह दूत अपने साथ कुछ संदेश और कुछ राजसी उपहार लेकर आया था। लेकिन जब वह दूत नंदबाबा के घर पहुंचा, तो उसके पास राधा के लिए कहने को कोई खास शब्द या संतोषजनक बातें नहीं थीं।
उसने बस रूखे शब्दों में इतना बता दिया कि अब कृष्ण द्वारका के राजा बन चुके हैं। वे बड़े-बड़े महलों और अटारियों में रहते हैं, उनके पास अब सेवकों का पहरा है और वे राज्य के जटिल कामों में पूरी तरह व्यस्त हो चुके हैं।
वह खबर सुनकर राधा का दिल अंदर तक बेचैन हो उठा। उन्हें उस संदेशवाहक की बातों पर बिल्कुल यकीन नहीं हुआ। उन्होंने अपने मन में ही खुद से सवाल किया, “राजा? मेरा कान्हा किसी ईंट-पत्थर के महल का राजा कैसे बन सकता है? वो तो इन भोले-भाले ग्वाल-बालों का, इन भोली गैयाओं का, गोवर्धन पर्वत की छांव का और इस ब्रज की जर्रे-जर्रे मिट्टी का असली कान्हा है!”
बेचैनी जब हद से बढ़ गई, तो राधा से और न रहा गया। उन्होंने तुरंत एक पत्र लिखने का निर्णय किया। उस कागज पर स्याही से कम और उनके भीतर के आंसुओं की नमी से ज्यादा बात कही गई थी। उस पत्र में कोई कड़वी शिकायत नहीं थी, बस एक सीधा और निश्छल सवाल था,
“हे कान्हा, क्या वो सारे पल, वो यमुना तट की रासलीला, वो सायंकाल की बेला में दिए गए तुम्हारे सारे वादे सब झूठ थे? क्या तुम सचमुच मुझे और इस संपूर्ण ब्रज को हमेशा के लिए भूल गए हो? मुझे कोई लंबी सफाई नहीं चाहिए, बस एक छोटा सा जवाब दे दो, कोई ऐसा संकेत भेज दो जो मुझे यह भरोसा दिला सके कि तुम आज भी वहीं हो जहां मेरी हर सांस चलती है।”
वह पत्र एक बेहद विश्वस्त और पुराने चरवाहे के हाथों चुपचाप मथुरा भिजवा दिया गया। उसके बाद के कई हफ्ते राधा ने दिन-रात उसी द्वारका के रास्ते की तरफ देखते हुए बिताए, जहां से किसी भी दिशा में कोई आहट आने की उम्मीद बंधी रहती थी।
आखिरकार, एक शाम जब सूरज अपनी लाली समेटकर क्षितिज में डूब रहा था, मथुरा की तरफ से एक भव्य रथ धूल उड़ाता हुआ ब्रज की सीमा पर आकर रुका। उस रथ से एक शाही संदेशवाहक नीचे उतरा।
उसके दोनों हाथों में एक सुंदर संदूकड़ी थी, जिस पर द्वारका के राजघराने की मोहर लगी हुई थी। यह खबर जंगल की आग की तरह पूरे ब्रज में फैल गई और देखते ही देखते सारा गांव इकट्ठा हो गया। यशोदा मैया की आंखें भी उस संदूकड़ी को देखकर भर आईं, क्योंकि वे जानती थी कि यह उनके लाल का भेजा हुआ कुछ है।
वह संदेशवाहक बिना किसी देरी के सीधे राधा के द्वार पर पहुंचा। उसने आदर के साथ राधा को प्रणाम किया और वो शाही संदूकड़ी उनके कांपते हाथों में सौंप दी। उस वक्त राधा का दिल अपनी सामान्य गति से कई गुना तेज धड़क रहा था। उन्होंने गहरी सांस ली और अपने उन्हीं कांपते हाथों से उस संदूकड़ी के ढक्कन को उठाया।
अंदर झांकने पर कोई लंबा-चौड़ा प्रेम पत्र नहीं मिला। न ही कोई सफाई दी गई थी, और न ही कोई मीठी या मल्हार जैसी बातें लिखी थीं।
उस संदूकड़ी के भीतर सिर्फ दो ही चीजें रखी थीं: एक सुंदर और चमकदार मयूर पंख, जिसे हमेशा कान्हा अपने मुकुट में बड़े चाव से लगाया करते थे, और दूसरी चीज थी एक सूखा हुआ, पूरी तरह मुरझाया हुआ कमल का फूल। वह वही फूल था जो कभी यमुना के निर्मल जल में खिला करता था और जिसे एक दिन राधा ने अपने हाथों से बड़े प्रेम से कान्हा को भेंट किया था।
राधा ने उन दोनों पुरानी चीजों को धीरे से उठाया। उन्होंने उस मयूर पंख को श्रद्धा से अपने माथे से लगा लिया। उस स्पर्श में कोई भाषा नहीं थी, कोई वाक्य नहीं था, लेकिन एक ऐसी गहरी गूंज थी जिसे केवल वही समझ सकती थीं।
उस पंख की दमकती चमक और उस सूखे हुए फूल की अनकही खामोशी ने मिलकर राधा को एक पल में वो सब कुछ समझा दिया, जिसे समझाने के लिए हजारों शब्दों की भी जरूरत नहीं पड़ती।
कृष्ण ने लिखकर एक शब्द भी नहीं भेजा था, क्योंकि वे भली-भांति जानते थे कि शब्दों के छोटे दायरे में राधा के प्रेम को बांधा नहीं जा सकता। उनका यह मौन ही ब्रह्मांड का सबसे बड़ा और सबसे सटीक उत्तर था।
उस मौन का सीधा अर्थ यह था कि भौतिक दूरियां चाहे जितनी भी बढ़ जाएं, राजमहलों की ऊंची दीवारें चाहे इंसानों के बीच कितनी भी दूरी क्यों न पैदा कर दें, लेकिन जो रूहानी बंधन दो दिलों के बीच बन चुका है, उसे किसी सांसारिक पद, प्रतिष्ठा या कोसों लंबी दूरी की कोई आवश्यकता नहीं होती। कृष्ण अब केवल ब्रज की गलियों में घूमने वाला एक ग्वाला नहीं, बल्कि एक ऐसी सर्वव्यापी चेतना बन चुके थे, जो हर कण में, हर हवा के झोंके में मौजूद थे।
यह अहसास होते ही राधा ने एक लंबी और सुकून भरी सांस ली। उनके उदास चेहरे पर अचानक एक बेहद हल्की और संतुष्ट मुस्कान तैर गई, वो मुस्कान जिसमें एक गहरा दर्द भी था और उससे कहीं ज्यादा एक अद्भुत आंतरिक शांति भी थी।
उन्होंने पास खड़े हैरान ग्रामीणों की तरफ देखा और धीमी आवाज में कहा, “मेरे काले ने मुझे मेरा उत्तर दे दिया है। उसने साफ कह दिया है कि वो ब्रज छोड़कर कहीं नहीं गया, वो आज भी यहीं, हम सबके भीतर मौजूद है।”
गांव वाले थोड़े अचंभित थे, वे राधा के चेहरे को टकटकी लगाकर देख रहे थे कि बिना किसी पत्र के आखिर उन्होंने ऐसा क्या पढ़ लिया। लेकिन राधा इस सच्चाई को पूरी तरह जानती थीं।
उस शाम, बहुत लंबे अरसे के बाद, राधा ने अपने आंगन में तुलसी के पास फिर से सुकून भरे कदम रखे। उसी वक्त पास के कदंब के पेड़ की एक हरी पत्ती हवा के झोंके से हिली, और राधा को ऐसा आभास हुआ जैसे दूर किसी अछोर लोक से बंसी की कोई बहुत ही धीमी और मीठी सी धुन उनके कानों में गूंज रही हो।
प्रेम कभी भी शब्दों का मोहताज नहीं होता, वह तो केवल गहराई से महसूस किया जाता है, और आज राधा ने उस संपूर्ण मौन के भीतर कृष्ण को पहले से कहीं ज्यादा अपने करीब पा लिया था।
क्या प्रेम करने वाला व्यक्ति अपने प्रिय को उसके कर्तव्य के लिए विदा कर सकता है?



