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टैग: प्यार#सीख#सामाजिक#प्रेरणा दायक#कहानी

  • 🌸 वृंदावन का वो आखिरी दिन

    🌸 वृंदावन का वो आखिरी दिन

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    भाग 4 राधा को मिला संकेत 🦚❤️

     

    बृज की धूल में अब वो पुरानी रौनक़ और वो जादुई महक नहीं रही थी। सुबह की पहली किरण जब शांत यमुना के घाटों को छूती थी, तो ऐसा प्रतीत होता था जैसे सूरज भी किसी गहरे और कभी न मिटने वाले गम में डूबा हो। 

     

    कदंब की वो छांव, जो कभी कान्हा की बंसी की सुरीली और मनमोहक धुनों से गूंजा करती थी, अब एक अजीब और डरावने सन्नाटे में लिपटी हुई थी। 

     

    इसी गहरी खामोशी के बीच राधा का जीवन जैसे थम सा गया था। उनके पैर भले ही आंगन में चलते थे, लेकिन उनकी सांसें और उनकी चेतना तो उस रास्ते पर अटक गई थी जिस पर चलकर कृष्ण कभी ब्रज से दूर चले गए थे।

     

    कृष्ण के जाने की खबर ब्रज में एक तेज आंधी की तरह आई थी। मथुरा से अचानक बुलावा आया था, और कान्हा बिना एक पल भी गंवाए, बिना किसी को बताए, चुपचाप सब कुछ पीछे छोड़कर चले गए थे। 

     

    कंस का वध करना था और अपने माता-पिता को उस कैद से छुड़ाना था, दिमाग से तो गांव का हर एक बच्चा और बुजुर्ग यह जानता था कि यह उनका एक ऐसा कर्तव्य था जिसे टाला नहीं जा सकता था। 

     

    लेकिन किसी का दिल इस बात को स्वीकार करने को तैयार नहीं था कि उनका दुलारा कान्हा अब कभी लौटकर ब्रज की उन धूल भरी गलियों में न तो गायें चराएगा और न ही अपनी बांसुरी की तान छेड़ेगा।

     

    राधा उस मनहूस सुबह अपने घर के बाहर आंगन में तुलसी के पवित्र पौधे को जल अर्पित कर रही थीं। तभी हवा का एक ऐसा ठंडा झोंका आया, जिसने उनके भीतर तक सिहरन पैदा कर दी। कान में किसी अनहोनी की फुसफुस सी गूंजी, “कान्हा चले गए।” 

     

    राधा के हाथ से पीतल का लोटा छूटकर जमीन पर गिर गया, सारा पानी चारों तरफ बिखर गया, लेकिन राधा वहीं एक पत्थर की मूरत की भांति अचल खड़ी रह गईं। 

     

    उनकी आंखों से एक भी आंसू नहीं टपका, क्योंकि दिल पर जो वज्रपात हुआ था, उसने तो आंसुओं के स्त्रोत को भी भीतर ही सुखा दिया था।

    कुछ हफ्तों बीत जाने के बाद, जब मथुरा से एक शाही दूत ब्रज की सीमा में दाखिल हुआ, तो हर किसी की सांसे थम गईं। 

     

    वह दूत अपने साथ कुछ संदेश और कुछ राजसी उपहार लेकर आया था। लेकिन जब वह दूत नंदबाबा के घर पहुंचा, तो उसके पास राधा के लिए कहने को कोई खास शब्द या संतोषजनक बातें नहीं थीं। 

     

    उसने बस रूखे शब्दों में इतना बता दिया कि अब कृष्ण द्वारका के राजा बन चुके हैं। वे बड़े-बड़े महलों और अटारियों में रहते हैं, उनके पास अब सेवकों का पहरा है और वे राज्य के जटिल कामों में पूरी तरह व्यस्त हो चुके हैं।

     

    वह खबर सुनकर राधा का दिल अंदर तक बेचैन हो उठा। उन्हें उस संदेशवाहक की बातों पर बिल्कुल यकीन नहीं हुआ। उन्होंने अपने मन में ही खुद से सवाल किया, “राजा? मेरा कान्हा किसी ईंट-पत्थर के महल का राजा कैसे बन सकता है? वो तो इन भोले-भाले ग्वाल-बालों का, इन भोली गैयाओं का, गोवर्धन पर्वत की छांव का और इस ब्रज की जर्रे-जर्रे मिट्टी का असली कान्हा है!”

     

    बेचैनी जब हद से बढ़ गई, तो राधा से और न रहा गया। उन्होंने तुरंत एक पत्र लिखने का निर्णय किया। उस कागज पर स्याही से कम और उनके भीतर के आंसुओं की नमी से ज्यादा बात कही गई थी। उस पत्र में कोई कड़वी शिकायत नहीं थी, बस एक सीधा और निश्छल सवाल था,

    “हे कान्हा, क्या वो सारे पल, वो यमुना तट की रासलीला, वो सायंकाल की बेला में दिए गए तुम्हारे सारे वादे सब झूठ थे? क्या तुम सचमुच मुझे और इस संपूर्ण ब्रज को हमेशा के लिए भूल गए हो? मुझे कोई लंबी सफाई नहीं चाहिए, बस एक छोटा सा जवाब दे दो, कोई ऐसा संकेत भेज दो जो मुझे यह भरोसा दिला सके कि तुम आज भी वहीं हो जहां मेरी हर सांस चलती है।”

     

    वह पत्र एक बेहद विश्वस्त और पुराने चरवाहे के हाथों चुपचाप मथुरा भिजवा दिया गया। उसके बाद के कई हफ्ते राधा ने दिन-रात उसी द्वारका के रास्ते की तरफ देखते हुए बिताए, जहां से किसी भी दिशा में कोई आहट आने की उम्मीद बंधी रहती थी।

     

    आखिरकार, एक शाम जब सूरज अपनी लाली समेटकर क्षितिज में डूब रहा था, मथुरा की तरफ से एक भव्य रथ धूल उड़ाता हुआ ब्रज की सीमा पर आकर रुका। उस रथ से एक शाही संदेशवाहक नीचे उतरा। 

     

    उसके दोनों हाथों में एक सुंदर संदूकड़ी थी, जिस पर द्वारका के राजघराने की मोहर लगी हुई थी। यह खबर जंगल की आग की तरह पूरे ब्रज में फैल गई और देखते ही देखते सारा गांव इकट्ठा हो गया। यशोदा मैया की आंखें भी उस संदूकड़ी को देखकर भर आईं, क्योंकि वे जानती थी कि यह उनके लाल का भेजा हुआ कुछ है।

     

    वह संदेशवाहक बिना किसी देरी के सीधे राधा के द्वार पर पहुंचा। उसने आदर के साथ राधा को प्रणाम किया और वो शाही संदूकड़ी उनके कांपते हाथों में सौंप दी। उस वक्त राधा का दिल अपनी सामान्य गति से कई गुना तेज धड़क रहा था। उन्होंने गहरी सांस ली और अपने उन्हीं कांपते हाथों से उस संदूकड़ी के ढक्कन को उठाया।

     

    अंदर झांकने पर कोई लंबा-चौड़ा प्रेम पत्र नहीं मिला। न ही कोई सफाई दी गई थी, और न ही कोई मीठी या मल्हार जैसी बातें लिखी थीं।

     

    उस संदूकड़ी के भीतर सिर्फ दो ही चीजें रखी थीं: एक सुंदर और चमकदार मयूर पंख, जिसे हमेशा कान्हा अपने मुकुट में बड़े चाव से लगाया करते थे, और दूसरी चीज थी एक सूखा हुआ, पूरी तरह मुरझाया हुआ कमल का फूल। वह वही फूल था जो कभी यमुना के निर्मल जल में खिला करता था और जिसे एक दिन राधा ने अपने हाथों से बड़े प्रेम से कान्हा को भेंट किया था।

     

    राधा ने उन दोनों पुरानी चीजों को धीरे से उठाया। उन्होंने उस मयूर पंख को श्रद्धा से अपने माथे से लगा लिया। उस स्पर्श में कोई भाषा नहीं थी, कोई वाक्य नहीं था, लेकिन एक ऐसी गहरी गूंज थी जिसे केवल वही समझ सकती थीं। 

     

    उस पंख की दमकती चमक और उस सूखे हुए फूल की अनकही खामोशी ने मिलकर राधा को एक पल में वो सब कुछ समझा दिया, जिसे समझाने के लिए हजारों शब्दों की भी जरूरत नहीं पड़ती।

     

    कृष्ण ने लिखकर एक शब्द भी नहीं भेजा था, क्योंकि वे भली-भांति जानते थे कि शब्दों के छोटे दायरे में राधा के प्रेम को बांधा नहीं जा सकता। उनका यह मौन ही ब्रह्मांड का सबसे बड़ा और सबसे सटीक उत्तर था।

     

    उस मौन का सीधा अर्थ यह था कि भौतिक दूरियां चाहे जितनी भी बढ़ जाएं, राजमहलों की ऊंची दीवारें चाहे इंसानों के बीच कितनी भी दूरी क्यों न पैदा कर दें, लेकिन जो रूहानी बंधन दो दिलों के बीच बन चुका है, उसे किसी सांसारिक पद, प्रतिष्ठा या कोसों लंबी दूरी की कोई आवश्यकता नहीं होती। कृष्ण अब केवल ब्रज की गलियों में घूमने वाला एक ग्वाला नहीं, बल्कि एक ऐसी सर्वव्यापी चेतना बन चुके थे, जो हर कण में, हर हवा के झोंके में मौजूद थे।

     

    यह अहसास होते ही राधा ने एक लंबी और सुकून भरी सांस ली। उनके उदास चेहरे पर अचानक एक बेहद हल्की और संतुष्ट मुस्कान तैर गई, वो मुस्कान जिसमें एक गहरा दर्द भी था और उससे कहीं ज्यादा एक अद्भुत आंतरिक शांति भी थी। 

     

    उन्होंने पास खड़े हैरान ग्रामीणों की तरफ देखा और धीमी आवाज में कहा, “मेरे काले ने मुझे मेरा उत्तर दे दिया है। उसने साफ कह दिया है कि वो ब्रज छोड़कर कहीं नहीं गया, वो आज भी यहीं, हम सबके भीतर मौजूद है।”

     

    गांव वाले थोड़े अचंभित थे, वे राधा के चेहरे को टकटकी लगाकर देख रहे थे कि बिना किसी पत्र के आखिर उन्होंने ऐसा क्या पढ़ लिया। लेकिन राधा इस सच्चाई को पूरी तरह जानती थीं। 

     

    उस शाम, बहुत लंबे अरसे के बाद, राधा ने अपने आंगन में तुलसी के पास फिर से सुकून भरे कदम रखे। उसी वक्त पास के कदंब के पेड़ की एक हरी पत्ती हवा के झोंके से हिली, और राधा को ऐसा आभास हुआ जैसे दूर किसी अछोर लोक से बंसी की कोई बहुत ही धीमी और मीठी सी धुन उनके कानों में गूंज रही हो। 

     

    प्रेम कभी भी शब्दों का मोहताज नहीं होता, वह तो केवल गहराई से महसूस किया जाता है, और आज राधा ने उस संपूर्ण मौन के भीतर कृष्ण को पहले से कहीं ज्यादा अपने करीब पा लिया था।

     

    क्या प्रेम करने वाला व्यक्ति अपने प्रिय को उसके कर्तव्य के लिए विदा कर सकता है?

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    Neha Goyal

    मेरा नाम नेहा गोयल है। और पिछले दो वर्ष से मैं प्रतिलिपि पर कहानियां लिखती आ रही हूँ। मुझे लेखन करते हुए बहुत ही अच्छा लगता है। वैसे मुझे लिखने से पढ़ना ज्यादा पसंद है।

  • 🌸 वृंदावन का वो आखिरी दिन

    🌸 वृंदावन का वो आखिरी दिन

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

     

    भाग 1 — वृंदावन की वो सुबह 🦚

     

    वृंदावन में सुबह कभी केवल सुबह नहीं होती थी।

     

    वहाँ सूरज की पहली किरण के साथ जैसे कोई बाँसुरी जन्म लेती थी…

    यमुना की लहरें उसे सुनती थीं, कदंब के वृक्ष झूमकर उसका स्वागत करते थे और गलियों में बिखरी धूल भी जैसे उस धुन पर नाचने लगती थी।

     

    उस दिन भी वृंदावन वैसा ही जागा था।

     

    आकाश अभी पूरी तरह लालिमा से नहीं भरा था। पूर्व दिशा में हल्की सुनहरी आभा फैल रही थी। यमुना का जल शांत था और उसके ऊपर तैरती धुंध की पतली चादर धीरे-धीरे सूरज की किरणों में घुल रही थी।

     

    कहीं गौशाला से गायों के रंभाने की आवाज आ रही थी, तो कहीं घरों के आँगन में गोपियाँ मटके लिए निकल चुकी थीं।

     

    लेकिन उस सुबह वृंदावन की हवा में कुछ अलग था।

    बहुत हल्का-सा…

     

    इतना हल्का कि कोई उसे महसूस तो कर सकता था, पर उसका नाम नहीं रख सकता था।

    नंद भवन में यशोदा मैया रोज की तरह सुबह-सुबह उठ चुकी थीं।

     

    उन्होंने आँगन में गोबर से सुंदर-सी रंगोली बनाई, तुलसी माता को जल चढ़ाया और फिर माखन मथने बैठ गईं।

     

    मथानी की आवाज पूरे आँगन में गूँज रही थी।

     

    छन्न… छन्न… छन्न…

     

    यशोदा मैया के होंठों पर मुस्कान थी।

    लेकिन उनकी आँखें बार-बार उस कमरे की ओर उठ जातीं जहाँ उनका कान्हा सो रहा था।

    “पता नहीं कब बड़ा हो गया मेरा लल्ला…”

    उन्होंने धीरे से खुद से कहा।

     

    फिर मुस्कुराकर सिर हिलाया।

    “बड़ा कहाँ हुआ है? अभी भी तो सुबह उठते ही माखन के पीछे भागता है।”

     

    उसी क्षण कमरे के भीतर से कुछ गिरने की आवाज आई।

    धड़ाम!

     

    मैया यशोदा की मथानी रुक गई। उन्होंने आँखें बंद कर लीं।

    “लो… उठ गया मेरा नटखट।” उनके चेहरे पर हल्की मुस्कान उभर आई। 

     

    अगले ही पल उनकी आवाज पूरे भवन में गूँज उठी, “कान्हा!”

     

    अंदर से कोई उत्तर नहीं आया। “कान्हा!”

     

    फिर भी शांति। मैया यशोदा ने हाथ कमर पर रखे और कमरे की ओर बढ़ गईं।

    दरवाजा खोलते ही उनकी नजर बिखरे हुए बिस्तर पर पड़ी।

     

    सबकुछ अस्त व्यस्त था लेकिन कृष्णा… कमरे में थे ही नहीं।

     

    मैया यशोदा कुछ क्षण उन्हें ढूँढती रहीं। फिर उनकी नजर खिड़की से बाहर गई।

    कदंब के पेड़ के पास वो खड़े थे।

     

    हाथ में बाँसुरी लिए। 

    नीली आभा से घिरा उनका मुख सुबह की पहली किरणों में ऐसा चमक रहा था जैसे स्वयं आकाश ने उन्हें अपने रंग में रंग दिया हो।

     

    कृष्ण की आँखें यमुना की ओर थीं और उनके होंठों पर एक हल्की मुस्कान।

     

    यशोदा खिड़की से ही पुकार उठीं, 

    “कान्हा! इतनी सुबह-सुबह वहाँ क्या कर रहे हो?”

     

    कृष्ण ने पीछे मुड़कर देखा। “मैया…”

     

    उनकी आवाज में वही मासूमियत थी। “आप जाग गईं?”

     

    यशोदा ने भौंहें चढ़ाईं। “हाँ, क्योंकि मेरा लाल कमरे में सोने के बजाय पता नहीं कहाँ-कहाँ घूम रहा है।”

     

    कृष्ण मुस्कुराए। “मैं तो बस जल्दी भोर में ही यमुना मैया से मिलने आया था।”

     

    “यमुना मैया से मिलने?” यशोदा बाहर आईं और उनके पास पहुँचकर कान पकड़ लिया। “और मुझे बिना बताए?”

     

    कृष्ण हँस पड़े। “मैया, आप तो सो रही थीं।”

     

    “तो क्या मुझे जगाते?”

     

    “जगाता तो आप मुझे जाने देतीं?”

     

    मैया यशोदा कुछ पल उन्हें देखती रहीं। फिर उनके चेहरे पर अनायास मुस्कान आ गई। “नहीं।”

     

    कृष्ण ने धीरे से कहा, “इसीलिए तो नहीं जगाया।”

     

    यशोदा ने उनके गाल पर हल्की-सी चपत लगाई।

    “बहुत चालाक हो गए हो, रे।”

     

    कृष्ण हँसने लगे। उनकी हँसी सुनकर पास से गुजरती एक गोपी भी मुस्कुरा उठी।

     

    “मैया, आपका कान्हा तो आज फिर माखन चुराने की तैयारी में है।”

     

    कृष्ण तुरंत बोले, “मैंने आज माखन नहीं चुराया।”

     

    यशोदा ने आँखें तरेरीं। “आज?”

     

    कृष्ण चुप हो गए, गोपी हँस पड़ी।

     

    “मैया, कल की मटकी याद है?”

     

    यशोदा ने कृष्ण की ओर देखा। “तो कल किसने माखन चुराया था?”

     

    कृष्ण ने तुरंत आकाश की ओर देखा। “मैया, मुझे लगता है आज मौसम बहुत सुंदर है।”

     

    और इतना कहकर भागने लगे। “कान्हा!”

     

    मैया यशोदा उनके पीछे दौड़ पड़ीं।

     

    पूरा आँगन कृष्ण की हँसी से भर गया। कुछ ही देर में नंद भवन की वही पुरानी चहल-पहल लौट आई।

     

    कहीं ग्वाल-बाल कृष्ण को ढूँढते हुए आ रहे थे। कहीं गोपियाँ उनकी शिकायत लेकर यशोदा के पास पहुँच रही थीं।

     

    कहीं गायों के बीच जाकर कृष्ण उन्हें पुकार रहे थे।

     

    वृंदावन के लिए कृष्ण केवल नंद बाबा के पुत्र नहीं थे, वह वृंदावन की धड़कन थे।

     

    उनके बिना जैसे हर चीज अधूरी लगती थी।

     

    —

     

    सुबह कुछ और चढ़ी तो कृष्ण अपने सखाओं के साथ यमुना किनारे जा पहुँचे।

     

    बलराम भी उनके साथ थे। मित्र ने कृष्ण के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा, “कान्हा, आज कहाँ चलें?”

     

    कृष्ण ने मुस्कुराकर सामने देखा। “जहाँ मन करे।”

     

    “तो फिर कदंब वन!” एक ग्वालबाल चिल्लाया।

     

    सब दौड़ पड़े, कृष्ण पीछे रह गए।

    उनकी नजर यमुना पर टिक गई। बलराम ने यह देखा तो उनके कदम भी रुक गए। “कृष्ण?”

     

    कृष्ण ने उनकी ओर देखा। “हाँ, दाऊ?”

     

    “क्या हुआ?”

     

    “कुछ नहीं।”

     

    बलराम कुछ क्षण उन्हें देखते रहे। “तुम आज कुछ बदले-बदले लग रहे हो।”

     

    कृष्ण मुस्कुराए। “मैं तो वही हूँ।”

     

    बलराम ने सिर हिलाया। “नहीं। आज तुम्हारी आँखें कुछ और कह रही हैं।”

     

    कृष्ण ने कोई उत्तर नहीं दिया। उन्होंने अपनी बाँसुरी निकाली।

     

    और अगले ही क्षण यमुना के किनारे वह धुन गूँज उठी।

     

    मधुर… शांत… और ऐसी कि जैसे किसी ने हवा में प्रेम घोल दिया हो।

     

    बांसुरी की वो धुन सुनकर, गायें चरना भूल गईं। पक्षियों का कलरव थम गया।

     

    यमुना की लहरें जैसे धीमी हो गईं। दूर खड़ी कुछ गोपियाँ भी उस धुन को सुनकर ठिठक गईं।

     

    उनमें राधा भी थीं। राधा ने आँखें बंद कर लीं। लेकिन आज…

    उस बाँसुरी में कुछ अलग था। वही धुन थी, वही कृष्ण थे, वही वृंदावन था।

    फिर भी दिल के भीतर एक अनजाना डर उतर आया था।

     

    राधा ने धीरे से आँखें खोलीं। “कान्हा…”

     

    उनके होंठों से बस इतना ही निकला।

     

    —

     

    उधर नंद भवन में यशोदा कृष्ण के लिए भोजन तैयार कर रही थीं।

     

    उन्होंने थाली में माखन रखा, मिश्री रखी।

     

    गरम-गरम रोटियाँ रखीं फिर अचानक उनके हाथ रुक गए। उनकी नजर थाली पर टिक गई।

    उन्हें जाने क्यों आज मन में एक अजीब-सी बेचैनी महसूस हो रही थी।

     

    उन्होंने खुद को समझाया, “शायद थक गई हूँ।”

     

    लेकिन मन नहीं माना। उन्होंने आँगन में बैठे नंद बाबा को देखा। “सुनते हो?”

     

    नंद बाबा ने उनकी ओर देखा। “क्या हुआ?”

     

    मैया यशोदा कुछ पल चुप रहीं। “आज न जाने क्यों मन घबरा रहा है।”

     

    नंद बाबा ने मुस्कुराकर कहा, “लल्ला को लेकर?”

     

    मैया यशोदा ने सिर हिला दिया। “पता नहीं… बस ऐसा लगता है जैसे…” वह रुक गईं।

     

    “जैसे क्या?”

     

    मैया यशोदा के पास कोई उत्तर नहीं था। उन्होंने धीरे से कहा, “जैसे कुछ बदलने वाला है।”

     

    नंद बाबा का चेहरा भी कुछ क्षण गंभीर हो गया। उन्होंने आकाश की ओर देखा। “सब कुछ तो भगवान की इच्छा से होता है, यशोदा।”

     

    मैया ने तुरंत उनकी बात काट दी। “भगवान की इच्छा अपनी जगह है। लेकिन मेरा लल्ला…”

     

    उनकी आवाज भर्रा गई। “मेरा कान्हा मेरी आँखों के सामने रहे… बस इतनी-सी इच्छा है।”

     

    नंद बाबा ने उनकी ओर देखा। लेकिन इस बार उनके पास भी कोई उत्तर नहीं था।

     

    —

     

    दोपहर होने लगी थी। कृष्ण वापस लौटे। मैया यशोदा ने उन्हें देखते ही थाली आगे कर दी। “आओ, लल्ला। खाना खा लो।”

     

    कृष्ण उनके पास बैठ गए, यशोदा अपने हाथों से उन्हें खिलाने लगीं।

    एक निवाला… फिर दूसरा… कृष्ण उन्हें देखते रहे।

    “क्या हुआ?” मैया ने पूछा।

     

    कृष्ण ने सिर हिलाया। “कुछ नहीं।”

     

    “तो ऐसे क्यों देख रहे हो?”

     

    कृष्ण ने उनकी उँगलियों को अपने हाथ में ले लिया। “मैया…”

     

    “हम्म?”

     

    “अगर कभी आपका कान्हा आपसे दूर चला जाए तो?”

     

    यशोदा के हाथ अचानक रुक गए, अनायास ही उनके चेहरे की मुस्कान गायब हो गई। “ऐसी बातें क्यों कर रहे हो?” उनकी आँखें गमगीन हो चुकी थी। 

     

    कृष्ण चुप रहे, यशोदा ने उनका चेहरा अपने हाथों में थाम लिया। 

     

    “कहीं नहीं जाओगे तुम।”

     

    कृष्ण ने धीरे से मुस्कुराकर कहा, “और अगर जाना पड़ा तो?”

     

    “नहीं।” यशोदा की आवाज इस बार दृढ़ थी।

    “तुम्हें कहीं नहीं जाना।”

     

    कृष्ण उनकी आँखों में देखते रहे, उन आँखों में माँ का प्रेम था।

    ऐसा प्रेम जिसे संसार की कोई शक्ति बाँट नहीं सकती थी।

    कृष्ण ने धीरे से अपना सिर अपनी मैया की गोद में रख दिया।

    “ठीक है मैया।”

     

    उन्होंने उनके बाल सहलाने शुरू कर दिए। उन्हें क्या पता था… कि कभी-कभी कृष्ण अपने सबसे प्रिय लोगों को भी आने वाले समय का पूरा सत्य नहीं बताते।

     

    क्योंकि कुछ यात्राएँ ऐसी होती हैं… जिन्हें रोकने का अधिकार प्रेम के पास भी नहीं होता।

     

    और वृंदावन की उस शांत सुबह में… किसी को नहीं पता था कि समय की धारा धीरे-धीरे उस क्षण की ओर बढ़ रही है…

     

    जब कृष्ण को अपना सबसे प्रिय स्थान छोड़ना होगा।

    लेकिन अभी… वृंदावन अनजान था। यमुना अनजान थी।

    गोपियाँ अनजान थीं। राधा अनजान थीं।

     

    और सबसे ज्यादा… यशोदा मैया अनजान थीं।

    कि उनके कान्हा के साथ बिताई जा रही यह साधारण-सी सुबह…

    वास्तव में वृंदावन की सबसे अनमोल सुबहों में से एक थी।

     

    क्योंकि आने वाला समय… वृं

    दावन से उसका कृष्ण माँगने वाला था।

     

    और उस दिन… पूरे वृंदावन को पहली बार समझ आएगा—

     

    कृष्ण सा प्रेम करना कितना आसान है…

    लेकिन कृष्ण से विरह सहना कितना कठिन। 🦚❤️

     

    अगर आपको कहानी पसंद आए तो कमेंट में राधे राधे जरूर लिखें।

    🌺 राधे राधे 🌺 

     

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    Neha Goyal

    मेरा नाम नेहा गोयल है। और पिछले दो वर्ष से मैं प्रतिलिपि पर कहानियां लिखती आ रही हूँ। मुझे लेखन करते हुए बहुत ही अच्छा लगता है। वैसे मुझे लिखने से पढ़ना ज्यादा पसंद है।

  • नन्ही कोमल की अधूरी विदाई

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    नन्ही कोमल की अधूरी विदाई

     

    राजस्थान के एक छोटे से गांव में वर्षों से एक ऐसी परंपरा चली आ रही थी, जिसे वहां के लोग अपनी शान और संस्कृति का हिस्सा मानते थे। सिर्फ वही गांव नहीं, बल्कि उसके आसपास के सभी गांवों में भी बचपन में ही बच्चों की शादी कर दी जाती थी। चार-पाँच साल के बच्चों का रिश्ता तय कर दिया जाता और आठ-दस साल की उम्र तक उनकी शादी भी कर दी जाती। गांव वालों का मानना था कि जल्दी शादी करने से परिवार की इज्जत बनी रहती है और बड़े होकर बच्चे कोई गलती नहीं करते।

    इसी बीच सरकार की ओर से गांव के प्राथमिक विद्यालय में नए शिक्षक राघव का तबादला हो गया। राघव अपनी पत्नी सीमा और अपनी पाँच साल की प्यारी बेटी कोमल के साथ उस गांव में रहने आ गए।

    कोमल बहुत ही मासूम और चंचल बच्ची थी। कभी गुड़ियों से खेलती, कभी तितलियों के पीछे भागती और कभी अपने पापा के स्कूल में जाकर बच्चों के साथ बैठ जाती। उसे दुनिया की किसी भी परंपरा या रीति-रिवाज की कोई समझ नहीं थी।

    गांव में उनके आने की खबर फैलते ही कई लोग उनसे मिलने पहुंचे।

    एक बुजुर्ग मुस्कुराते हुए बोले, “मास्टर जी, सुना है आपकी एक बेटी भी है?”

     

    राघव ने हँसते हुए कहा, “हाँ, पाँच साल की है।”

    दूसरे बुजुर्ग ने कहा, “तो फिर उसकी शादी की बात भी शुरू कर दीजिए। हमारे यहां लड़कियों की शादी बचपन में ही कर दी जाती है। बड़े होकर बच्चे अपने मन की करने लगते हैं।”

     

    राघव ने विनम्रता से जवाब दिया, “अभी तो उसे ठीक से लिखना-पढ़ना भी नहीं आता। उसकी शादी की बात करना तो बहुत दूर की बात है।”

     

    बुजुर्गों ने एक-दूसरे की ओर देखा और बोले, “मास्टर जी, यहां का यही रिवाज है।”

     

    राघव मुस्कुरा तो दिए, लेकिन उनके मन में चिंता घर कर गई।

     

    अगले दिन जब वे स्कूल पहुंचे तो उन्हें एक अजीब बात दिखाई दी। स्कूल में लड़कियों की संख्या बहुत कम थी। कई बच्चियों के नाम रजिस्टर में दर्ज थे, लेकिन वे महीनों से स्कूल नहीं आई थीं।

     

    उन्होंने एक बच्चे से पूछा, “रीना स्कूल क्यों नहीं आती?”

     

    बच्चे ने सहजता से कहा, “सर, उसकी शादी हो गई। अब ससुराल वाले पढ़ने नहीं भेजते।”

     

    यह सुनकर राघव का दिल बैठ गया।

     

    शाम को कोमल घर के बाहर मिट्टी में खेल रही थी। तभी लगभग दस साल की एक लड़की वहां आई। उसकी मांग में सिंदूर था और गले में मंगलसूत्र।

     

    कोमल ने मासूमियत से पूछा, “दीदी, आपने ये लाल-लाल क्या लगाया है?”

     

    लड़की ने फीकी मुस्कान के साथ कहा, “मेरी शादी हो गई है।”

     

    कोमल खुश होकर बोली, “शादी में तो बहुत सारी मिठाइयाँ मिलती होंगी ना?”

     

    लड़की की आंखें भर आईं। उसने बस सिर हिला दिया और वहां से चली गई।

     

    राघव दूर खड़े यह सब देख रहे थे। उन्हें उस बच्ची की आंखों में छिपा दर्द साफ दिखाई दे रहा था।

     

    कुछ दिनों बाद गांव की पंचायत बुलाई गई।

     

    सरपंच ने कहा, “मास्टर जी, गांव वाले चाहते हैं कि आपकी बेटी का रिश्ता भी तय कर दिया जाए। इससे गांव की परंपरा बनी रहेगी।”

     

    राघव अपनी जगह से उठे और पूरे आत्मविश्वास के साथ बोले,

     

    “मेरी बेटी कोई बोझ नहीं है जिसे जल्दी विदा कर दूँ। वह पढ़ेगी, अपने सपने पूरे करेगी और जब समझदार होगी, तभी अपनी जिंदगी का फैसला खुद करेगी।”

     

    यह सुनकर पंचायत में सन्नाटा छा गया।

     

    कुछ लोगों को उनकी बात पसंद नहीं आई। धीरे-धीरे गांव वालों ने उनके परिवार का बहिष्कार करना शुरू कर दिया। कोई दूध नहीं देता, कोई सब्जी नहीं बेचता और कई लोग उनसे बात तक नहीं करते।

     

    सीमा परेशान हो गईं। उन्होंने एक दिन कहा, “इतनी परेशानी हो रही है। अगर हम झुक जाएँ तो शायद सब ठीक हो जाए।”

     

    राघव ने शांत स्वर में कहा, “अगर आज हम डर गए, तो कल हमारी बेटी का बचपन भी छिन जाएगा।”

     

    कुछ ही दिनों बाद गांव में एक दुखद घटना हुई। बारह साल की पूजा, जिसकी शादी बचपन में हो गई थी, अचानक गंभीर रूप से बीमार पड़ गई। उसे शहर के अस्पताल ले जाया गया।

     

    डॉक्टर ने गांव वालों से कहा, “बच्चों पर समय से पहले जिम्मेदारियाँ डालना उनके शरीर और मन दोनों के लिए नुकसानदायक है। इन्हें खेलने, पढ़ने और आगे बढ़ने का अधिकार है।”

     

    डॉक्टर की बातें कई लोगों के दिल को छू गईं।

     

    राघव ने उसी समय स्कूल में एक जागरूकता कार्यक्रम रखा। डॉक्टर, पुलिस अधिकारी और बाल विकास विभाग के कर्मचारी भी आए। उन्होंने गांव वालों को बताया कि बाल विवाह सिर्फ एक पुरानी परंपरा नहीं, बल्कि कानूनन अपराध भी है। इससे बच्चों की पढ़ाई छूट जाती है, उनका भविष्य अंधकार में चला जाता है और उनका बचपन उनसे छिन जाता है।

     

    गांव वाले अब भी चुपचाप बैठे थे।

     

    तभी छोटी-सी कोमल अपनी कॉपी हाथ में लेकर मंच पर पहुंची।

     

    उसने मासूम आवाज में कहा,

     

    “मेरे पापा कहते हैं कि मैं बड़ी होकर डॉक्टर बन सकती हूँ… टीचर बन सकती हूँ… पुलिस बन सकती हूँ… या फिर जो चाहूँ, वो बन सकती हूँ। लेकिन अगर मेरी अभी शादी कर दी गई… तो क्या मैं अपने सपने पूरे कर पाऊँगी?”

     

    पूरा मैदान बिल्कुल शांत हो गया।

     

    किसी के पास उस पाँच साल की बच्ची के सवाल का जवाब नहीं था।

     

    उसी समय वह दस साल की शादीशुदा लड़की रोते हुए उठी और बोली,

     

    “काश… मुझे भी पढ़ने दिया होता। आज मैं भी अपने सपने पूरे कर रही होती।”

     

    उसकी बात सुनकर कई महिलाओं की आँखें भर आईं।

     

    सरपंच धीरे-धीरे खड़े हुए। उन्होंने गांव वालों की ओर देखा और कहा,

     

    “हमने हमेशा यही समझा कि हम सही कर रहे हैं, लेकिन आज एहसास हुआ कि हम अपने ही बच्चों से उनका बचपन छीन रहे थे।”

     

    उन्होंने ऊँची आवाज में घोषणा की,

     

    “आज से इस गांव और आसपास के किसी भी गांव में कोई भी बाल विवाह नहीं होगा। जो भी ऐसा करेगा, पंचायत उसका साथ नहीं देगी, बल्कि कानून का साथ देगी।”

     

    पूरा गांव तालियों की गूंज से भर उठा।

     

    कुछ महीनों बाद गांव पूरी तरह बदल चुका था। जहां पहले छोटी-छोटी बच्चियों के रिश्ते तय होते थे, वहां अब उनके स्कूल में दाखिले करवाए जाने लगे। माता-पिता अपनी बेटियों को गर्व से पढ़ने भेजने लगे।

     

    वही दस साल की लड़की भी दोबारा स्कूल आने लगी। उसके चेहरे पर अब उदासी नहीं, बल्कि नई उम्मीद दिखाई देती थी।

     

    कोमल भी हर सुबह अपने बैग के साथ खुशी-खुशी स्कूल जाती। उसकी मुस्कान देखकर राघव और सीमा की आँखों में सुकून झलकने लगता।

     

    एक दिन स्कूल से लौटते समय कोमल ने अपने पापा का हाथ पकड़कर पूछा,

     

    “पापा… मेरी शादी कब होगी?”

     

    राघव मुस्कुराए, उसे गोद में उठाया और प्यार से बोले,

     

    “जब मेरी बेटी अपने सारे सपने पूरे कर लेगी, अपने पैरों पर खड़ी हो जाएगी और अपनी जिंदगी का फैसला खुद करने लायक बन जाएगी… तभी उसकी शादी होगी।”

     

    कोमल खिलखिलाकर हँस पड़ी।

     

    उसकी वह हँसी सिर्फ एक बच्ची की हँसी नहीं थी, बल्कि उस गांव में लौट आए बचपन, शिक्षा और नई सोच की सबसे प्यारी आवाज बन चुकी थी।

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    Auther preeti Sharma

    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

  • आईना जो कभी टूटता नही…।।

    पढ़ने का समय : 5 मिनट
    • गांव की सुबह हमेशा की तरह धूप से नहीं, बल्कि उम्मीदों से जागती थी। मिट्टी की खुशबू, कच्चे रास्तों पर चलते लोग, और दूर मंदिर की घंटी—सब कुछ एक सुकून देता था। इसी गांव में रहती थी सावित्री, एक साधारण सी औरत, जिसकी आंखों में असाधारण हिम्मत थी। उसका जीवन आसान नहीं था, लेकिन उसके सपने बहुत बड़े थे—अपने बेटे अमन को पढ़ा-लिखाकर एक अच्छा इंसान बनाना।
    • सावित्री का पति कई साल पहले शहर कमाने गया था और फिर कभी लौटा नहीं। गांव वालों ने तरह-तरह की बातें बनाई—किसी ने कहा वो दूसरी शादी कर चुका है, तो किसी ने कहा वो अब इस दुनिया में नहीं। लेकिन सावित्री ने कभी हार नहीं मानी। उसने दूसरों के घरों में काम करके, खेतों में मजदूरी करके अपने बेटे को पाला।
    • अमन पढ़ाई में बहुत तेज था। स्कूल में हमेशा अव्वल आता था। गांव के मास्टर जी भी उसकी तारीफ करते नहीं थकते थे। लेकिन गांव के कुछ लोग उसकी तरक्की से खुश नहीं थे। उन्हें लगता था कि एक गरीब औरत का बेटा इतना आगे कैसे बढ़ सकता है।
    • एक दिन, गांव में एक बड़ा कार्यक्रम रखा गया—“सामाजिक विकास सम्मेलन।” इसमें शहर से बड़े-बड़े लोग आने वाले थे। गांव के प्रधान ने घोषणा की कि इस कार्यक्रम में गांव के होनहार बच्चों को सम्मानित किया जाएगा। अमन का नाम भी उस सूची में था।
    • सावित्री बहुत खुश थी। उसने अपने बेटे के लिए नया कुर्ता खरीदा, जो उसने अपनी महीनों की बचत से लिया था। अमन भी बहुत उत्साहित था। उसे लग रहा था कि उसकी मेहनत रंग ला रही है।
    • कार्यक्रम का दिन आया। मंच सजा हुआ था, बड़े-बड़े नेता और अधिकारी आए हुए थे। भाषणों का दौर शुरू हुआ। सब लोग समाज की तरक्की, समानता और शिक्षा की बात कर रहे थे। शब्द बड़े-बड़े थे, लेकिन उनमें सच्चाई कितनी थी, यह कोई नहीं जानता था।
    • जब अमन का नाम पुकारा गया, तो सावित्री की आंखों में आंसू आ गए। वह गर्व से भर गई। अमन मंच की ओर बढ़ा। लेकिन तभी एक अप्रत्याशित घटना हुई।
    • गांव के एक प्रभावशाली आदमी, ठाकुर साहब, ने अचानक विरोध जताया। उन्होंने कहा, “यह लड़का इस सम्मान के लायक नहीं है। इसका बाप कौन है, किसी को नहीं पता। ऐसे बच्चों को मंच पर लाना समाज के लिए सही नहीं है।”
    • पूरे कार्यक्रम में सन्नाटा छा गया। लोग एक-दूसरे की ओर देखने लगे। किसी ने कुछ नहीं कहा। मंच पर बैठे अधिकारी भी चुप थे। जो लोग अभी तक समानता की बातें कर रहे थे, वे अब खामोश थे।
    • अमन वहीं रुक गया। उसके कदम थम गए। उसकी आंखों में आंसू थे, लेकिन उसने खुद को संभालने की कोशिश की। सावित्री भीड़ में खड़ी थी, उसका दिल टूट चुका था। लेकिन उसने हिम्मत नहीं हारी।
    • वह आगे बढ़ी और सीधे मंच पर चढ़ गई। सब लोग हैरान रह गए। उसने माइक उठाया और बोली—
    • “आज आप सब समाज की बात कर रहे हैं। लेकिन यह कैसा समाज है, जहां एक बच्चे की मेहनत से ज्यादा उसके बाप का नाम मायने रखता है? मेरा बेटा मेहनती है, ईमानदार है। क्या यह काफी नहीं है?”
    • उसकी आवाज कांप रही थी, लेकिन उसके शब्दों में ताकत थी। उसने आगे कहा—
    • “अगर बाप का नाम ही सब कुछ है, तो फिर उन बच्चों का क्या, जिनके बाप उन्हें छोड़कर चले गए? क्या उन्हें जीने का हक नहीं? क्या उनके सपनों की कोई कीमत नहीं?”
    • भीड़ में कुछ लोग सिर झुकाने लगे। लेकिन ठाकुर साहब अब भी अड़े हुए थे। उन्होंने कहा, “समाज नियमों से चलता है, भावनाओं से नहीं।”
    • सावित्री ने जवाब दिया, “समाज इंसानों से बनता है, नियमों से नहीं। और अगर नियम इंसानियत को कुचल दें, तो उन्हें बदलना ही चाहिए।”
    • यह सुनकर कुछ लोग तालियां बजाने लगे। धीरे-धीरे पूरा माहौल बदलने लगा। जो लोग चुप थे, वे अब बोलने लगे। मास्टर जी आगे आए और बोले—
    • “अमन इस गांव का सबसे होनहार बच्चा है। अगर उसे सम्मान नहीं मिलेगा, तो यह हम सबकी हार होगी।”
    • अधिकारियों को भी अब समझ आ गया कि चुप रहना सही नहीं है। उन्होंने अमन को मंच पर बुलाया और उसे सम्मानित किया। तालियों की गूंज पूरे गांव में फैल गई।
    • लेकिन यह जीत सिर्फ अमन की नहीं थी। यह जीत उस सोच की थी, जो समाज को बदलना चाहती है।
    • कार्यक्रम खत्म होने के बाद भी लोग इस घटना की चर्चा करते रहे। कुछ लोग अब भी ठाकुर साहब के साथ थे, लेकिन बहुत से लोग अब बदल चुके थे। उन्हें एहसास हो गया था कि समाज का असली चेहरा वही है, जो हम अपने कर्मों से दिखाते हैं, न कि अपने शब्दों से।
    • अमन ने उस दिन सिर्फ एक पुरस्कार नहीं जीता, बल्कि उसने समाज को एक आईना दिखाया—एक ऐसा आईना, जो टूटता नहीं, बल्कि सच्चाई को साफ-साफ दिखाता है।
    • सालों बाद, अमन एक बड़ा अधिकारी बना। उसने अपने गांव में एक स्कूल खोला, जहां हर बच्चे को बिना भेदभाव के शिक्षा मिलती थी। सावित्री अब बूढ़ी हो चुकी थी, लेकिन उसकी आंखों में वही चमक थी।
    • एक दिन, गांव में फिर एक कार्यक्रम हुआ। इस बार मंच पर अमन था, और सामने वही लोग बैठे थे। उसने अपने भाषण में कहा—
    • “समाज बदलता है, जब हम बदलते हैं। उस दिन मेरी मां ने जो कहा था, वह सिर्फ मेरे लिए नहीं था, बल्कि हम सबके लिए था। हमें यह तय करना है कि हम कैसा समाज बनाना चाहते हैं—वह जो लोगों को तोड़ता है, या वह जो उन्हें जोड़ता है।”
    • भीड़ में बैठे लोग चुपचाप सुन रहे थे। इस बार उनकी खामोशी में शर्म नहीं, बल्कि समझ थी।
    • कहानी यहीं खत्म नहीं होती, क्योंकि समाज की कहानी कभी खत्म नहीं होती। हर दिन, हर जगह, यह कहानी दोहराई जाती है। फर्क सिर्फ इतना है कि कहीं कोई सावित्री बोलने की हिम्मत करती है, और कहीं कोई चुप रह जाता है।
    • अंत में, यह कहानी हमें एक सवाल छोड़ जाती है—
    • क्या हम उस समाज का हिस्सा बनना चाहते हैं, जो दूसरों को उनके हालात से आंकता है, या उस समाज का, जो उन्हें उनके प्रयासों से पहचानता है?
    • क्योंकि असली चेहरा वही है, जो हम रोज आईने में देखते हैं… और वह आईना कभी झूठ नहीं बोलता।
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    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।