नन्ही कोमल की अधूरी विदाई
राजस्थान के एक छोटे से गांव में वर्षों से एक ऐसी परंपरा चली आ रही थी, जिसे वहां के लोग अपनी शान और संस्कृति का हिस्सा मानते थे। सिर्फ वही गांव नहीं, बल्कि उसके आसपास के सभी गांवों में भी बचपन में ही बच्चों की शादी कर दी जाती थी। चार-पाँच साल के बच्चों का रिश्ता तय कर दिया जाता और आठ-दस साल की उम्र तक उनकी शादी भी कर दी जाती। गांव वालों का मानना था कि जल्दी शादी करने से परिवार की इज्जत बनी रहती है और बड़े होकर बच्चे कोई गलती नहीं करते।
इसी बीच सरकार की ओर से गांव के प्राथमिक विद्यालय में नए शिक्षक राघव का तबादला हो गया। राघव अपनी पत्नी सीमा और अपनी पाँच साल की प्यारी बेटी कोमल के साथ उस गांव में रहने आ गए।
कोमल बहुत ही मासूम और चंचल बच्ची थी। कभी गुड़ियों से खेलती, कभी तितलियों के पीछे भागती और कभी अपने पापा के स्कूल में जाकर बच्चों के साथ बैठ जाती। उसे दुनिया की किसी भी परंपरा या रीति-रिवाज की कोई समझ नहीं थी।
गांव में उनके आने की खबर फैलते ही कई लोग उनसे मिलने पहुंचे।
एक बुजुर्ग मुस्कुराते हुए बोले, “मास्टर जी, सुना है आपकी एक बेटी भी है?”
राघव ने हँसते हुए कहा, “हाँ, पाँच साल की है।”
दूसरे बुजुर्ग ने कहा, “तो फिर उसकी शादी की बात भी शुरू कर दीजिए। हमारे यहां लड़कियों की शादी बचपन में ही कर दी जाती है। बड़े होकर बच्चे अपने मन की करने लगते हैं।”
राघव ने विनम्रता से जवाब दिया, “अभी तो उसे ठीक से लिखना-पढ़ना भी नहीं आता। उसकी शादी की बात करना तो बहुत दूर की बात है।”
बुजुर्गों ने एक-दूसरे की ओर देखा और बोले, “मास्टर जी, यहां का यही रिवाज है।”
राघव मुस्कुरा तो दिए, लेकिन उनके मन में चिंता घर कर गई।
अगले दिन जब वे स्कूल पहुंचे तो उन्हें एक अजीब बात दिखाई दी। स्कूल में लड़कियों की संख्या बहुत कम थी। कई बच्चियों के नाम रजिस्टर में दर्ज थे, लेकिन वे महीनों से स्कूल नहीं आई थीं।
उन्होंने एक बच्चे से पूछा, “रीना स्कूल क्यों नहीं आती?”
बच्चे ने सहजता से कहा, “सर, उसकी शादी हो गई। अब ससुराल वाले पढ़ने नहीं भेजते।”
यह सुनकर राघव का दिल बैठ गया।
शाम को कोमल घर के बाहर मिट्टी में खेल रही थी। तभी लगभग दस साल की एक लड़की वहां आई। उसकी मांग में सिंदूर था और गले में मंगलसूत्र।
कोमल ने मासूमियत से पूछा, “दीदी, आपने ये लाल-लाल क्या लगाया है?”
लड़की ने फीकी मुस्कान के साथ कहा, “मेरी शादी हो गई है।”
कोमल खुश होकर बोली, “शादी में तो बहुत सारी मिठाइयाँ मिलती होंगी ना?”
लड़की की आंखें भर आईं। उसने बस सिर हिला दिया और वहां से चली गई।
राघव दूर खड़े यह सब देख रहे थे। उन्हें उस बच्ची की आंखों में छिपा दर्द साफ दिखाई दे रहा था।
कुछ दिनों बाद गांव की पंचायत बुलाई गई।
सरपंच ने कहा, “मास्टर जी, गांव वाले चाहते हैं कि आपकी बेटी का रिश्ता भी तय कर दिया जाए। इससे गांव की परंपरा बनी रहेगी।”
राघव अपनी जगह से उठे और पूरे आत्मविश्वास के साथ बोले,
“मेरी बेटी कोई बोझ नहीं है जिसे जल्दी विदा कर दूँ। वह पढ़ेगी, अपने सपने पूरे करेगी और जब समझदार होगी, तभी अपनी जिंदगी का फैसला खुद करेगी।”
यह सुनकर पंचायत में सन्नाटा छा गया।
कुछ लोगों को उनकी बात पसंद नहीं आई। धीरे-धीरे गांव वालों ने उनके परिवार का बहिष्कार करना शुरू कर दिया। कोई दूध नहीं देता, कोई सब्जी नहीं बेचता और कई लोग उनसे बात तक नहीं करते।
सीमा परेशान हो गईं। उन्होंने एक दिन कहा, “इतनी परेशानी हो रही है। अगर हम झुक जाएँ तो शायद सब ठीक हो जाए।”
राघव ने शांत स्वर में कहा, “अगर आज हम डर गए, तो कल हमारी बेटी का बचपन भी छिन जाएगा।”
कुछ ही दिनों बाद गांव में एक दुखद घटना हुई। बारह साल की पूजा, जिसकी शादी बचपन में हो गई थी, अचानक गंभीर रूप से बीमार पड़ गई। उसे शहर के अस्पताल ले जाया गया।
डॉक्टर ने गांव वालों से कहा, “बच्चों पर समय से पहले जिम्मेदारियाँ डालना उनके शरीर और मन दोनों के लिए नुकसानदायक है। इन्हें खेलने, पढ़ने और आगे बढ़ने का अधिकार है।”
डॉक्टर की बातें कई लोगों के दिल को छू गईं।
राघव ने उसी समय स्कूल में एक जागरूकता कार्यक्रम रखा। डॉक्टर, पुलिस अधिकारी और बाल विकास विभाग के कर्मचारी भी आए। उन्होंने गांव वालों को बताया कि बाल विवाह सिर्फ एक पुरानी परंपरा नहीं, बल्कि कानूनन अपराध भी है। इससे बच्चों की पढ़ाई छूट जाती है, उनका भविष्य अंधकार में चला जाता है और उनका बचपन उनसे छिन जाता है।
गांव वाले अब भी चुपचाप बैठे थे।
तभी छोटी-सी कोमल अपनी कॉपी हाथ में लेकर मंच पर पहुंची।
उसने मासूम आवाज में कहा,
“मेरे पापा कहते हैं कि मैं बड़ी होकर डॉक्टर बन सकती हूँ… टीचर बन सकती हूँ… पुलिस बन सकती हूँ… या फिर जो चाहूँ, वो बन सकती हूँ। लेकिन अगर मेरी अभी शादी कर दी गई… तो क्या मैं अपने सपने पूरे कर पाऊँगी?”
पूरा मैदान बिल्कुल शांत हो गया।
किसी के पास उस पाँच साल की बच्ची के सवाल का जवाब नहीं था।
उसी समय वह दस साल की शादीशुदा लड़की रोते हुए उठी और बोली,
“काश… मुझे भी पढ़ने दिया होता। आज मैं भी अपने सपने पूरे कर रही होती।”
उसकी बात सुनकर कई महिलाओं की आँखें भर आईं।
सरपंच धीरे-धीरे खड़े हुए। उन्होंने गांव वालों की ओर देखा और कहा,
“हमने हमेशा यही समझा कि हम सही कर रहे हैं, लेकिन आज एहसास हुआ कि हम अपने ही बच्चों से उनका बचपन छीन रहे थे।”
उन्होंने ऊँची आवाज में घोषणा की,
“आज से इस गांव और आसपास के किसी भी गांव में कोई भी बाल विवाह नहीं होगा। जो भी ऐसा करेगा, पंचायत उसका साथ नहीं देगी, बल्कि कानून का साथ देगी।”
पूरा गांव तालियों की गूंज से भर उठा।
कुछ महीनों बाद गांव पूरी तरह बदल चुका था। जहां पहले छोटी-छोटी बच्चियों के रिश्ते तय होते थे, वहां अब उनके स्कूल में दाखिले करवाए जाने लगे। माता-पिता अपनी बेटियों को गर्व से पढ़ने भेजने लगे।
वही दस साल की लड़की भी दोबारा स्कूल आने लगी। उसके चेहरे पर अब उदासी नहीं, बल्कि नई उम्मीद दिखाई देती थी।
कोमल भी हर सुबह अपने बैग के साथ खुशी-खुशी स्कूल जाती। उसकी मुस्कान देखकर राघव और सीमा की आँखों में सुकून झलकने लगता।
एक दिन स्कूल से लौटते समय कोमल ने अपने पापा का हाथ पकड़कर पूछा,
“पापा… मेरी शादी कब होगी?”
राघव मुस्कुराए, उसे गोद में उठाया और प्यार से बोले,
“जब मेरी बेटी अपने सारे सपने पूरे कर लेगी, अपने पैरों पर खड़ी हो जाएगी और अपनी जिंदगी का फैसला खुद करने लायक बन जाएगी… तभी उसकी शादी होगी।”
कोमल खिलखिलाकर हँस पड़ी।
उसकी वह हँसी सिर्फ
एक बच्ची की हँसी नहीं थी, बल्कि उस गांव में लौट आए बचपन, शिक्षा और नई सोच की सबसे प्यारी आवाज बन चुकी थी।

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