बहुत समय पहले घने जंगलों और ऊँचे पहाड़ों के बीच शिवपुर नाम का एक छोटा-सा गाँव बसा हुआ था। गाँव के लोग बहुत ही सीधे-सादे, मेहनती और भगवान पर अटूट विश्वास रखने वाले थे। गाँव के ठीक बीचोंबीच मां भवानी का एक प्राचीन मंदिर था। हर सुबह और हर शाम पूरा गाँव वहीं इकट्ठा होकर आरती करता और अपनी खुशियों की प्रार्थना करता था। लेकिन कई वर्षों से उस गाँव पर एक भयानक संकट मंडरा रहा था। जंगल की सबसे ऊँची पहाड़ी पर कालमुख नाम का एक राक्षस रहता था। उसका शरीर पहाड़ जैसा विशाल, आँखें जलते अंगारों जैसी लाल और उसकी दहाड़ सुनकर पेड़ों के पत्ते तक काँप उठते थे। जब भी उसे तेज भूख लगती, वह गाँव में आ धमकता और किसी एक छोटे बच्चे को उठाकर ले जाता। उसके जाने के बाद पूरे गाँव में सिर्फ मातम और चीख-पुकार रह जाती। हर माँ अपने बच्चे को सीने से लगाए रहती। कोई भी बच्चा अकेले घर से बाहर नहीं निकलता था। शाम ढलते ही पूरा गाँव अपने घरों के दरवाजे बंद कर लेता। एक दिन फिर वही मनहूस घड़ी आ गई। जंगल की ओर से कालमुख की भयानक दहाड़ गूँजी। “वो आ गया… राक्षस आ गया…!” किसी ने घबराकर चिल्लाया। लोग अपने बच्चों को लेकर इधर-उधर भागने लगे। लेकिन कालमुख ने एक सात साल के मासूम बच्चे को पकड़ लिया। उसकी माँ रोते हुए उसके पैरों में गिर पड़ी। “मेरे बच्चे को छोड़ दे… मैं तेरे हाथ जोड़ती हूँ… उसे मत ले जा…” कालमुख ज़ोर-ज़ोर से हँसने लगा। “हा… हा… हा… तुम्हारे आँसू देखकर ही मेरी भूख और बढ़ जाती है।” इतना कहकर वह बच्चे को लेकर जंगल की ओर चला गया। पूरा गाँव सन्न रह गया। किसी घर में उस दिन चूल्हा नहीं जला। अगली सुबह गाँव के सभी लोग मां भवानी के मंदिर पहुँचे। सबकी आँखों में आँसू थे। गाँव के बुज़ुर्ग ने हाथ जोड़कर कहा, “हे मां… अब हमसे अपने बच्चों का दुख नहीं देखा जाता। हमारी रक्षा करो।” पूरा मंदिर “जय मां भवानी” के जयकारों से गूँज उठा। तभी मंदिर के बाहर जोरदार ठहाका सुनाई दिया। सबने बाहर देखा। कालमुख मंदिर की सीढ़ियों पर खड़ा था। वह हँसते हुए बोला, “हर बार इसी मूर्ति से मदद माँगते हो? अगर तुम्हारी देवी में शक्ति है तो मुझे रोककर दिखाए।” उसने मंदिर की ओर देखकर उपहास किया और बोला, “अगली पूर्णिमा को मैं फिर आऊँगा… और इस बारपहले से भी छोटे बच्चे को लेकर जाऊँगा।” इतना कहकर वह हँसता हुआ जंगल की ओर लौट गया। पूरा गाँव डर से काँप उठा। उसी गाँव में हरिराम और सीता नाम का एक गरीब दंपति रहता था। दोनों की शादी को कई साल हो चुके थे, लेकिन उनकी कोई संतान नहीं थी। फिर भी उन्होंने कभी भगवान से शिकायत नहीं की। वे रोज़ मंदिर की सफाई करते, दीपक जलाते और मां भवानी की सेवा करते। एक रात सीता मंदिर में बैठी रो रही थी। “हे मां… अगर मेरी गोद भरनी है, तो ऐसी संतान देना जो सिर्फ मेरी नहीं, पूरे गाँव की रक्षा करे।” उसकी आँखों से लगातार आँसू बह रहे थे। अचानक मंदिर में रखा दीपक अपने आप तेज़ जलने लगा। बिना हवा के मंदिर की घंटियाँ बजने लगीं। पूरा मंदिर दिव्य प्रकाश से भर गया। सीता ने काँपते हुए सिर उठाया। उसे लगा जैसे मां भवानी की मूर्ति मुस्कुरा रही हो। तभी एक मधुर आवाज़ गूँजी— “डर मत पुत्री। तुम्हारी भक्ति व्यर्थ नहीं जाएगी। समय आने पर मेरी शक्ति तुम्हारे घर जन्म लेगी। वह दिव्य कन्या इस गाँव को राक्षस के आतंक से मुक्त करेगी।” इतना कहकर प्रकाश धीरे-धीरे गायब हो गया। सीता ने यह बात हरिराम को बताई, लेकिन दोनों ने इसे किसी और से नहीं कहा। कुछ दिनों बाद एक चमत्कार हुआ। सालों से निसंतान रही सीता गर्भवती हो गई। जब यह खबर पूरे गाँव में फैली तो लोगों की आँखों में बरसों बाद उम्मीद की चमक दिखाई दी। सबने इसे मां भवानी का आशीर्वाद माना। लेकिन जब यह बात कालमुख तक पहुँची तो वह ज़ोर से हँस पड़ा। “एक बच्ची मेरा अंत करेगी? हा… हा… हा… इंसानों की उम्मीद भी कितनी मज़ेदार होती है।” उसने गुस्से में पहाड़ की एक विशाल चट्टान पर मुक्का मारा और वह चट्टान टुकड़े-टुकड़े होकर बिखर गई। “जिस दिन वह बच्ची पैदा होगी, उसी दिन मैं उसे खा जाऊँगा। फिर देखूँगा तुम्हारी मां भवानी क्या कर लेती हैं।” यह सुनकर गाँव वाले और भी डर गए, लेकिन उन्होंने मां भवानी पर विश्वास नहीं छोड़ा। हर दिन पूरा गाँव मंदिर में दीप जलाकर सीता और उसके होने वाले बच्चे की सलामती की प्रार्थना करने लगा। आखिर वह रात आ ही गई। नौ महीने पूरे हो चुके थे।आसमान में काले बादल छा गए। बिजलियाँ चमकने लगीं।तेज़ हवाएँ चलने लगीं। मां भवानी के मंदिर की घंटियाँ बिना किसी के छुए अपने आप बजने लगीं। पूरा गाँव उस दिव्य प्रकाश से नहा उठा जो मंदिर से निकल रहा था। उसी समय सीता ने एक सुंदर कन्या को जन्म दिया। जैसे ही उस बच्ची ने पहली बार अपनी आँखें खोलीं, उसके माथे पर लाल रंग का एक छोटा-सा त्रिशूल चमक उठा। उसी क्षण मंदिर की अखंड ज्योति पहले से कई गुना अधिक तेज़ हो गई। गाँव के बुज़ुर्ग भावुक होकर बोले, “यह कोई साधारण कन्या नहीं… यह मां भवानी के आशीर्वाद से जन्मी दिव्य शक्ति है।” लेकिन तभी दूर पहाड़ी से कालमुख की भयानक दहाड़ सुनाई दी। “मैं आ रहा हूँ… आज कोई देवी मुझे नहीं रोक पाएगी। सबसे पहले मैं इसी बच्ची को अपना शिकार बनाऊँगा!” उसकी दहाड़ सुनकर पूरे गाँव में सन्नाटा छा गया। लेकिन उसी समय मां भवानी के मंदिर से तेज़ दिव्य प्रकाश निकला। ऐसा लगा जैसे स्वयं मां भवानी मुस्कुराकर कह रही हों “अब अधर्म का अंत निश्चित है… मेरी पुत्री इस धरती पर अपना पहला कदम रख चुकी है।” और इसी के साथ उस राक्षस के अंत की शुरुआत हो गई… राक्षस कालमुख को जैसे ही दिव्य कन्या के जन्म की खबर मिली, वह गुस्से से पागल हो उठा। उसकी भयानक दहाड़ से पूरा जंगल काँपने लगा। हाथ में विशाल गदा लिए वह तेज़ी से शिवपुर की ओर बढ़ा। गाँव वालों ने उसे आते देखा तो सभी अपने घरों से निकलकर मां भवानी के मंदिर में पहुँच गए। हरिराम और सीता अपनी नवजात बेटी को गोद में लिए मां भवानी के चरणों में बैठ गए। सभी लोग हाथ जोड़कर एक ही प्रार्थना कर रहे थे, “हे मां, हमारी रक्षा कीजिए।” कुछ ही देर में कालमुख मंदिर के सामने आ खड़ा हुआ। वह ज़ोर-ज़ोर से हँसते हुए बोला, “यही है वह बच्ची जो मेरा अंत करेगी? आज सबसे पहले मैं इसी को खाऊँगा, फिर पूरे गाँव को खत्म कर दूँगा।” इतना कहकर वह मंदिर की ओर बढ़ा। लेकिन जैसे ही उसने मंदिर की पहली सीढ़ी पर कदम रखा, उसके पैर वहीं रुक गए। उसे लगा जैसे कोई अदृश्य शक्ति उसे आगे बढ़ने नहीं दे रही हो। गुस्से में उसने अपनी पूरी ताकत से गदा मंदिर पर फेंकी, लेकिन गदा मंदिर से टकराने से पहले ही राख बनकर हवा में उड़ गई। उसी क्षण मंदिर के गर्भगृह से तेज़ प्रकाश निकला। वह प्रकाश सीधा उस नवजात कन्या पर पड़ा। बच्ची मुस्कुराई और उसके माथे पर बना त्रिशूल चमकने लगा। देखते ही देखते वह दिव्य आभा से घिर गई। आसमान में बिजली चमकी और मां भवानी का दिव्य स्वर गूँजा, “कालमुख! तेरे पापों का अंत आज निश्चित है।” यह सुनते ही कन्या के सामने एक दिव्य त्रिशूल प्रकट हुआ। बिना किसी के छुए वह त्रिशूल तेज़ी से उड़ता हुआ कालमुख की ओर बढ़ा। राक्षस ने उसे रोकने की बहुत कोशिश की। उसने बड़े-बड़े पत्थर उठाकर फेंके, ज़ोरदार दहाड़ लगाई, लेकिन दिव्य त्रिशूल को कोई नहीं रोक सका। अगले ही पल त्रिशूल कालमुख के सीने में जा धँसा। “नहीं… यह नहीं हो सकता!” राक्षस दर्द से चीख उठा। उसका विशाल शरीर काँपने लगा। धीरे-धीरे वह धुएँ में बदलने लगा और कुछ ही क्षणों में राख बनकर धरती पर बिखर गया। राक्षस के मरते ही आसमान साफ़ हो गया। मंदिर की घंटियाँ अपने आप बजने लगीं और पूरे गाँव में फूलों की वर्षा होने लगी। गाँव वाले खुशी से झूम उठे। हर तरफ़ “जय मां भवानी!” के जयकारे गूँजने लगे। हरिराम और सीता की आँखों से खुशी के आँसू बह रहे थे। उन्होंने अपनी बेटी को सीने से लगा लिया और मां भवानी का धन्यवाद किया। उस दिन के बाद शिवपुर में कभी किसी बच्चे पर कोई संकट नहीं आया। गाँव फिर से हँसी, खुशियों और बच्चों की किलकारियों से गूँज उठा। आज भी लोग उस मंदिर में जाकर यही कहते हैं “जहाँ सच्ची श्रद्धा और मां भवानी का आशीर्वाद हो, वहाँ अधर्म और बुराई का अंत निश्चित होता है।”

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