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श्रेणी: कहानी लेखन पुरस्कार प्रतियोगिता

  • No love clause

    No love clause

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

    Part 7

     

     

    शुभम हल्का-सा मुस्कुराया। “ठीक है… फिर देखते हैं छह महीने बाद कौन सही साबित होता है।”

     

    अग्नि ने उसकी बात को नजरअंदाज कर दिया। उसने टेबल पर रखा अपना फोन उठाया। स्क्रीन पर कई नोटिफिकेशन थे। उसने एक-एक करके उन्हें देखा।

    फिर अचानक उसकी उंगली एक नाम पर जाकर रुक गई।

    Veda Sharma.

     

    अग्नि ने मैसेज पढ़ा और फोन वापिस टेबल पर रख दिया और अपने लिए ड्रिंक बनाने लगा। लेकिन वो शायद कुछ सोच भी रहा था। 

     

    शुभम ने उसकी हरकत नोटिस कर ली। “क्या हुआ?”

     

    अग्नि, “कुछ नहीं।”

     

    शुभम ने पूछा, “किसका मैसेज था?”

     

    अग्नि बोला, “ऑफिस का।”

     

    शुभम ने आँखें सिकोड़कर उसकी तरफ देखा। “वेदा का?”

     

    अग्नि ने उसकी तरफ देखा। “तुझे उसका नाम कैसे पता?”

     

    शुभम हँस पड़ा। “भाई, मैं तेरा दोस्त हूँ। तेरी सेक्रेटरी के बारे में इतना तो जानता ही हूँ कि वो पिछले तीन साल से तेरे साथ काम कर रही है।”

     

    अग्नि ने कोई जवाब नहीं दिया। शुभम ने मुस्कुराकर पूछा, “वैसे कैसी है?”

     

    अग्नि ने सामान्य स्वर में कहा, “कौन?”

     

    शुभम कूल अंदाज में, “वेदा।”

     

    अग्नि ने कंधे उचकाए, “मुझे क्या पता?”

     

    “अच्छा?” शुभम ने शरारत से कहा, “अभी दो मिनट पहले तक तू बता रहा था कि तुझे एक समझदार, सादगी पसंद लड़की चाहिए…”

     

    अग्नि ने उसे घूरा। “शुभम।”

     

    शुभम, “हाँ भाई?”

     

    अग्नि बोला, “अपनी बकवास बंद कर।” क्योंकि वो समझ गया था कि शुभम कहना क्या चाह रहा है,लेकिन उसे शुभम की बात बुरी भी नहीं लगी। 

     

    शुभम हँस पड़ा। लेकिन अग्नि के मन में पहली बार एक विचार आया। 

    एक ऐसा विचार जिसे उसने तुरंत अपने दिमाग से निकालने की कोशिश की।

     

    वेदा शर्मा।

     

    अग्नि ने गिलास में ड्रिंक डाली और उसे धीरे-धीरे घुमाने लगा।

     

    शुभम अब भी उसे ही देख रहा था। “क्या सोच रहा है?”

     

    अग्नि ने गिलास होंठों तक ले जाते हुए कहा, “कुछ नहीं।” लेकिन इस बार उसकी आवाज़ में पहले जैसी सहजता नहीं थी।

     

    शुभम ने भौंहें उठाईं। “तू जब ‘कुछ नहीं’ बोलता है ना, तब समझ आता है कि दिमाग में बहुत कुछ चल रहा है।”

     

    अग्नि ने उसे घूरा। “तू मेरा दिमाग पढ़ना कब से सीख गया?”

     

    “जब से तू मेरा दोस्त बना है।” शुभम ने आराम से सोफे की पीठ से सिर टिकाया। “वैसे एक बात बता… तेरी सेक्रेटरी शादीशुदा तो नहीं है?”

     

    अग्नि ने तुरंत उसकी तरफ देखा। “नहीं।” जवाब इतना जल्दी आया कि शुभम के चेहरे पर शरारती मुस्कान और गहरी हो गई।

    “ओहो… तो जानकारी पूरी है।”

     

    अग्नि ने गिलास टेबल पर रख दिया। “शुभम।”

     

    शुभम, “अरे मैं तो बस पूछ रहा था।”

     

    अग्नि, “और मैं बस जवाब दे रहा हूँ।” 

     

    शुभम, “ चल तू अब ज्यादा मत सोच, मैं कुछ करता हूँ।”

     

    अग्नि में हां में सिर हिलाया और बोला, “ बस इसी जवाब की उम्मीद थी।”

     

     

    अगली सुबह… राजावत ग्रुप।

    सुबह के ठीक नौ बजे।

     

    अग्नि हमेशा की तरह अपने ऑफिस पहुँच चुका था।

    उसका केबिन पूरी तरह व्यवस्थित था।

    टेबल पर जरूरी फाइलें रखी थीं। कॉफी उसके सामने थी।

     

    लेकिन आज पहली बार… उसकी नजर बार-बार दरवाजे की तरफ जा रही थी।

     

    तभी डोर नॉक हुआ।

    अग्नि, “ come in!”

     

    निशांत अंदर आया। “Good morning, sir.”

     

    अग्नि, “Morning.” निशांत ने फाइल आगे बढ़ाई।

    “आज दस बजे की बोर्ड मीटिंग है। ग्यारह बजे मल्होत्रा ग्रुप के साथ मीटिंग और दोपहर में…”

     

    अग्नि, “निशांत।”

     

    निशांत, “जी, सर?”

     

    अग्नि ने बिना किसी रिएक्शन के पूछा, “वेदा आई?”

     

    निशांत कुछ पल उसे देखता रहा। फिर बोला, “अभी तक नहीं, सर।”

     

    अग्नि ने अपनी घड़ी देखी। नौ बजकर दस मिनट।

    “आते ही उसे मेरे केबिन में भेजना।”

     

    निशांत ने सिर हिलाया, “जी सर।”

     

    निशांत जाने लगा। फिर अग्नि ने उसे रोक लिया। “और निशांत…”

     

    निशांत रूककर पीछे मुड़ा, “जी?”

     

    “अगर वो आज भी ऑफिस नहीं आ पाए तो…” अग्नि कुछ पल रुका। “पहले मुझसे बात करना।”

     

    निशांत ने सिर हिलाया। “जी सर।”

     

    दरवाजा बंद हो गया। अग्नि कुर्सी पर पीछे टिक गया।

    उसने खुद से सवाल किया, वो आखिर वेदा का इंतजार क्यों कर रहा था?

     

    उसे अपनी ही बेचैनी अजीब लग रही थी। तभी दरवाजे पर दस्तक हुई।

     

    अग्नि की नजर दरवाजे पर गई। “Come in.”

     

    दरवाजा खुला। और सामने… वेदा खड़ी थी।

    आज भी उसकी आँखों के नीचे नींद की कमी साफ दिखाई दे रही थी। बाल जल्दी में बाँधे हुए थे।

    चेहरा थका हुआ था।

    लेकिन हाथ में हमेशा की तरह ऑफिस की फाइलें थीं।

    “Good morning, sir.”

     

    अग्नि कुछ सेकंड उसे देखता रहा। फिर बोला, “Sit.”

     

    वेदा चुपचाप सामने वाली कुर्सी पर बैठ गई।

    अग्नि ने अपने सामने रखी फाइल बंद कर दी।

    कुछ पल तक वो उसे देखता रहा।

    फिर धीमे स्वर में बोला, “वेदा…”

     

    वेदा ने हैरानी से अग्नि की तरफ देखा, क्योंकि ये शायद पहली बार था जब वो उसे इस तरह से पुकार रहा था। “जी, सर?”

     

    “मुझे तुमसे ऑफिस के काम के अलावा…”

    वो एक पल के लिए रुका। “…एक बेहद निजी बात करनी है।”

     

    वेदा की भौंहें सिकुड़ गईं। उसे समझ नहीं आया कि अग्नि आखिर उससे क्या पूछने वाला है।

     

    और अग्नि…

    वो भी शायद पहली बार अपने जीवन का सबसे असामान्य प्रस्ताव किसी के

    सामने रखने जा रहा था।

     

    क्रमशः…

     

    💕 No Love Clause

    कभी-कभी जिंदगी सबसे बड़ा सौदा वहीं रखती है, जहाँ इंसान सबसे ज्यादा मजबूर होता है।

     

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    Neha Goyal

    मेरा नाम नेहा गोयल है। और पिछले दो वर्ष से मैं प्रतिलिपि पर कहानियां लिखती आ रही हूँ। मुझे लेखन करते हुए बहुत ही अच्छा लगता है। वैसे मुझे लिखने से पढ़ना ज्यादा पसंद है।

  • No love clause

    No love clause

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

     

    Part 6

    राजावत मेंशन से बाहर निकलते ही अग्नि अपनी कार की पिछली सीट पर आकर बैठ गया। कार का दरवाजा बंद होते ही बाहर की दुनिया की आवाजें जैसे अचानक उससे दूर हो गईं।

     

    ड्राइवर ने रियर-व्यू मिरर से उसकी तरफ देखा। “सर, विला चलें?”

     

    अग्नि कुछ नहीं बोला।

     

    उसकी नजर कार की खिड़की से बाहर टिकी थी। मुंबई की सड़कें हमेशा की तरह अपनी रफ्तार से भाग रही थीं। कहीं ट्रैफिक में फँसी गाड़ियाँ थीं, कहीं सड़क किनारे भागते लोग, कहीं चमचमाती इमारतें और कहीं फुटपाथ पर अपनी जिंदगी समेटे बैठे लोग।

     

    लेकिन अग्नि का ध्यान इनमें से किसी पर नहीं था।

    उसके दिमाग में सिर्फ एक शब्द घूम रहा था।

    शादी।

     

    उसने आँखें बंद कर लीं। उसे दादाजी की आवाज़ याद आ रही थी। “तुम्हारे पास बहुत कम समय है।”

    फिर उनकी दूसरी बात…

    “तुम जितना समझ रहे हो, उससे भी कम।”

    आखिर ऐसा क्या था जिसे दादा जी उससे छिपा रहे थे?

     

    वो फाइल… उसमें मौजूद वो अतिरिक्त हिस्सा…

    और फिर उनका इतना आसानी से उसकी शर्त मान लेना।

     

    अग्नि ने भौंहें सिकोड़ लीं। उसे आज अपने दादा जी का व्यवहार कुछ ठीक नहीं लग रहा था। वो उन्हें सालों से जानता और समझता था। दादा जी कभी किसी बात को इतनी आसानी से नहीं मानते थे।

     

    खासकर तब…

     

    जब बात राजावत परिवार और उसकी विरासत की हो।

    लेकिन आज उन्होंने उसकी हर शर्त बिना किसी सवाल के स्वीकार कर ली थी।

    “लड़की मैं खुद चुनूँगा।”

     

    अग्नि के अपने ही शब्द उसके कानों में गूँज गए।

    उसने आँखें खोलीं।

     

    “सर?” ड्राइवर की आवाज़ सुनकर उसका ध्यान टूटा।

     

    अग्नि, “बोलो!”

     

    ड्राइवर ने पूछा, “विला चलना है?”

     

    अग्नि कुछ सेकंड चुप रहा। फिर उसने बिना किसी भाव के कहा, “नहीं।” 

     

    ड्राइवर ने रियर-व्यू मिरर से उसकी तरफ देखा। “सर?”

     

    अग्नि ने अपनी घड़ी पर नजर डाली। शाम के करीब साढ़े आठ बज रहे थे। उसने धीमे स्वर में कहा, “कार क्लब ले चलो”

     

    ड्राइवर ने तुरंत सिर हिलाया। “जी सर।” कहकर उसने कार की दिशा बदल दी।

    वहीं अग्नि ने अपने फोन से अपने दोस्त शुभम को भी क्लब आने का मैसेज कर दिया। 

    क्योंकि उसे पता था उसके सामने जो दुविधा अभी है उसका हल शुभम में बेहतर कोई नहीं दे सकता। क्योंकि उसके पास हर बात का सॉल्यूशन होता है। 

     

    कुछ देर बाद…

     

    मुंबई के सबसे प्राइवेट और एलीट क्लबों में से एक के बाहर काली कार आकर रुकी। कार के रुकते ही एक स्टाफ मेंबर तुरंत आगे बढ़ा और पीछे का दरवाजा खोल दिया।

     

    अग्नि कार से बाहर निकला। ब्लैक शर्ट, ब्लैक ट्राउजर और उसके ऊपर पहना डार्क ब्लेजर…

    उसके चेहरे पर वही ठंडा आत्मविश्वास था जिसके कारण राजावत ग्रुप में हर कोई उससे एक दूरी बनाकर रखता था।

     

    क्लब का स्टाफ उसे देखते ही सतर्क हो गया। “Good evening, Mr. Rajawat.”

     

    अग्नि ने सिर्फ़ हल्का-सा सिर हिलाया और अंदर चला गया। क्लब का माहौल हमेशा की तरह शांत लेकिन आलीशान था।

     

    हल्की रोशनी… धीमा म्यूजिक…

    बार के पीछे सजी महँगी शराब की बोतलें…

    और शहर के कुछ बेहद प्रभावशाली लोग अपने-अपने ग्रुप में बैठे हुए थे, तो वहीं कुछ लड़के लड़कियां फ्लोर पर डांस कर रहे थे। कही छोटे छोटे कपड़े पहने लड़कियां गेस्ट को ड्रिंक सर्व कर रहे थे। 

     

    अग्नि की नजर किसी पर नहीं गई। वह सीधे अपने हमेशा वाले प्राइवेट लाउंज की तरफ बढ़ गया।

     

    लेकिन जैसे ही उसने दरवाजा खोला, “आ गया हमारा दूल्हा!” अंदर से आवाज आई।

     

    अग्नि के कदम वहीं रुक गए। उसने सामने देखा।

    शुभम उसका दोस्त सोफे पर आराम से बैठा हुआ था।

    उसके हाथ में ड्रिंक थी और चेहरे पर हमेशा वाली शरारती मुस्कान।

     

    अग्नि ने उसे घूरा। “बकवास बंद कर।”

     

    शुभम ने मुस्कुराते हुए ग्लास उठाया।

    “ये बकवास… बहुत ही जल्द हकीकत में बदलने वाली है मेरे दोस्त…।”

     

    अग्नि अंदर आया और सामने वाले सोफे पर बैठ गया।

    “बकवास मत कर।”

     

    शुभम ने उसे गौर से देखा। “ कुछ बात है…?” अग्नि के फेस के रिएक्शन देखते ही वो समझ गया कि आज अग्नि के साथ कुछ तो अजीब है। 

     

    अग्नि ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    शुभम ने अपना ग्लास टेबल पर रखा। “दादाजी से मिलने गया था ना?”

     

    अग्नि ने बस सिर हिलाया। 

     

    “और?”

     

    “वही शादी का मुद्दा।” अग्नि ने जवाब दिया। 

     

    शुभम ने गहरी साँस ली। “मुझे पता था।”

     

    कुछ पल चुप्पी रही। फिर शुभम ने पूछा, “तो इस बार भी मना कर दिया?”

     

    अग्नि ने उसकी तरफ देखा। “नहीं।”

     

    शुभम की भौंहें ऊपर उठ गईं। “क्या?”

     

    अग्नि ने बिल्कुल सपाट स्वर में कहा, “मैं शादी करने के लिए तैयार हूँ।”

     

    शुभम के हाथ से ग्लास लगभग छूटते छूटते बचा। वो आँखें बड़ी किए अग्नि को देख रहा था। “तू?”

     

    अग्नि ने उसे घूरा। “हाँ, मैं।”

     

    शुभम, “तू सच में शादी करेगा?”

     

    अग्नि, “क्यों? मैं इंसान नहीं हूँ क्या?”

     

    शुभम हँस पड़ा। “नहीं… तू इंसान तो है। लेकिन पिछले पाँच सालों से तेरी बातें सुनकर मुझे शक होने लगा था।”

     

    अग्नि ने आँखें बंद कर लीं। “शुभम…”

     

    “ओके। ओके।” शुभम ने खुद को संभाला। “लेकिन अचानक ऐसा क्या हुआ?”

     

    अग्नि कुछ पल चुप रहा। फिर बोला, “दादा जी ने कुछ ऐसी बातें बताईं जिनके बाद मेरे पास कोई दूसरा रास्ता नहीं बचा।”

     

    शुभम की मुस्कान गायब हो गई। “क्या बात है?”

     

    “मैं अभी नहीं बता सकता।” अग्नि ने बताने से साफ इनकार कर दिया। 

     

    शुभम ने घूरा, “अग्नि…”

     

    अग्नि ने सख्त लहजे में कहा, “मैंने कहा ना, अभी नहीं।”

     

    शुभम ने उसकी आँखों में देखा। उसे समझ आ गया कि इस बार मामला सचमुच गंभीर है।

     

    उसने बात बदलते हुए पूछा, “ठीक है। लेकिन एक बात बता… लड़की कौन है?”

     

    अग्नि ने उसकी तरफ देखा। “कोई लड़की नहीं है।”

     

    शुभम, “मतलब?”

     

    अग्नि, “मैंने अभी तक किसी को चुना ही नहीं।”

     

    शुभम ने हैरानी से कहा, “तो फिर शादी करेगा किससे?”

     

    अग्नि ने धीमे स्वर में कहा, “ इसलिए ही तो तुझे यहाँ बुलाया है?”

     

    शुभम उसकी बात समझने की कोशिश करने लगा। “मतलब? मेरा मैरिज breau नहीं है।”

     

    अग्नि आगे झुक गया। “ उसकी जरूरत भी नहीं। देख, मुझे प्यार नहीं चाहिए। मुझे कोई ऐसी लड़की नहीं चाहिए जो मेरे पैसे, मेरे नाम या राजावत परिवार की जिंदगी का हिस्सा बनने के सपने देखे।”

     

    “मुझे सिर्फ़ एक समझदार लड़की चाहिए। जो छह महीने के बाद अपनी जिंदगी में वापस चली जाए।”

     

    शुभम कुछ पल उसे देखता रहा। फिर उसने धीरे से पूछा, “तू कॉन्ट्रैक्ट मैरिज की बात कर रहा है?”

     

    अग्नि की आँखों में हल्की-सी ठंडक उतर आई। “Exactly.”

     

    शुभम कुछ सेकंड चुप रहा। फिर अचानक हँस पड़ा।

    “तू पागल हो गया है!”

     

    अग्नि ने उसे घूरा। “मुझे इसमें मजाक की कोई बात नहीं दिख रही।”

     

    “मुझे दिख रही है।” शुभम ने हँसी रोकते हुए कहा, “तू शादी से इतना नफरत करता था कि अब तूने शादी को बिजनेस डील बना दिया।”

     

    अग्नि ने बिना मुस्कुराए कहा, “मेरे लिए शादी हमेशा से एक डील ही थी।”

     

    शुभम उसकी बात सुनकर गंभीर हो गया। उसे मालूम था कि अग्नि शादी को लेकर इतना कठोर क्यों था।

    उसने धीरे से पूछा, “और अगर वो लड़की तुझसे प्यार कर बैठी तो?”

     

    अग्नि ने तुरंत जवाब दिया, “नहीं करेगी।”

     

    शुभम, “तुझे इतना यकीन कैसे है?”

     

    अग्नि कुछ पल शांत रहा। फिर बोला, “क्योंकि कॉन्ट्रैक्ट में साफ लिखा होगा… छह महीने बाद कोई रिश्ता नहीं रहेगा।”

     

    शुभम ने सिर हिलाया। ” चल मान लिया उसे प्यार नहीं भी हुआ लेकिन अगर तू प्यार कर बैठा तो?”

     

    इस बार अग्नि चुप हो गया। कुछ सेकंड तक उसने कोई जवाब नहीं दिया।

    फिर उसकी आवाज़ बेहद ठंडी थी। “ऐसा नहीं होगा।”

     

    शुभम ने उसकी आँखों में देखा। “तुझे खुद पर इतना भरोसा है?”

     

    अग्नि ने बिना झिझके कहा, “हाँ।”

     

    शुभम हल्का-सा मुस्कुराया। “ठीक है… फिर देखते हैं छह महीने बाद कौन सही साबित होता है।”

     

    अग्नि ने उसकी बा

    त को नजरअंदाज कर दिया। उसने टेबल पर रखा अपना फोन उठाया। स्क्रीन पर कई नोटिफिकेशन थे। उसने एक-एक करके उन्हें देखा।

    फिर अचानक उसकी उंगली एक नाम पर जाकर रुक गई।

    Veda Sharma.

    कहानी आगे जारी रहेगी.

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    Neha Goyal

    मेरा नाम नेहा गोयल है। और पिछले दो वर्ष से मैं प्रतिलिपि पर कहानियां लिखती आ रही हूँ। मुझे लेखन करते हुए बहुत ही अच्छा लगता है। वैसे मुझे लिखने से पढ़ना ज्यादा पसंद है।

  • आत्मग्लानि भाग 4

    पढ़ने का समय : 3 मिनट

    अब तक आपने पढ़ा :-––

    कुछ दिनों की छुट्टी ले ली थी रीया ने स्कूल से क्योंकि मन तो वैसे ही खिन्न हो गया था उसका संजय व्यास जी की अनदेखी से इससे बेहतर उसने घर रहकर खुद को अपने परिवार के साथ रहना सही समझा, 

    अब आगे :—–

    और जल्दी ही संजय व्यास जी को अपना बनाने की कोशिश करेगी यह सोचकर खुद को शांत किया ।

    इधर संजय जी को फर्क तो नहीं पड़ रहा था रीया के आने या ना जाने से लेकिन स्कूल में एक छात्रा के साथ नाम जुड़ना एक बहुत ही शर्मनाक बात थी जिससे वो परेशान रहने लगे, एक शाम वो थके हुए से घर पहुंचे और सोफे पर टाई ढी़ली करते हुए आंखों को बंद करके बैठे रहे तभी उनके माथे पर उंगलियों के पोरों से हल्की सी मालिश महसूस हुई और संजय जी के होंठों पर मुस्कान आ गई और उन्होंने अपनी आंखों को खोलकर अपने सर के ऊपर गर्दन घुमाकर देखा तो उनकी बीवी होंठों पर मुस्कान सजाये उन्हें ही देखते दिखाई दी और हौले से संजय जी के माथे पर अपने होंठ रख दिए जिससे संजय जी के होंठों पर मुस्कान आ गई और उन्होंने अपनी आंखों को सुकून से बंद कर दिया है कुछ सेकंड बाद खोलकर अपनी बीवी को अपने नजदीक बैठा लिया और उनके कोमल चेहरे को देखने लगे जो प्रेग्नेंसी की वजह से थकान से चूर चूर लग रहा था, उन्होंने अपनी हथेलियों में उनका चेहरा थाम लिया और प्रेम से उसे देखने लगे, और बोले – ” संध्या तुम्हारे बिना मैं अपने जीवन की कल्पना भी नहीं कर सकता “, अगर तुम मेरी जिंदगी में शामिल नहीं होती तो न जाने मैं अपने होशोहवास कब का खोकर दर-बदर भटक रहा होता , “संध्या तुम मेरी जिंदगी में सुनहरी सुबह बनकर आई और मेरी जिंदगी में बहार हो गई ” मैं खुशनसीब हूं जो तुम संग मेरी जिंदगी है और अब हम दो से तीन होने वाले हैं “…।।

    संजय जी की बात सुनकर संध्या मुस्कुरा दी और बोली आप परेशान लग रहें हैं कुछ हुआ है क्या, संजय जी इस बात पर चुप हो गए और बोले ” नहीं ! कुछ नहीं हुआ है। भला क्या होगा, तुम ज्यादा मत सोचो, तुम्हारे और हमारे बच्चे के लिए ठीक नहीं है , और अपने होंठ संध्या के माथे पर रखकर पीछे हो गये, संध्या! जिसे कुछ कहना था उनके हल्के से चुम्बन से शांत हो गई और मुस्कुराते हुए उन्हें देखने लगी और बोली ” मैं जानती इस अवस्था में आपकी परेशानियों की भागीदार नहीं बनाना चाहते आप मुझे, लेकिन याद रखना कोई बात हो जो आपको परेशान कर रही है तो प्लीज़ मुझे बता दीजियेगा, हम साथ मिलकर हल कर सकते हैं हर परिस्थिति का., संजय जी ने स्नेह से संध्या को गले लगा लिया और बोले मैं जानता हूं मेरी अर्धांगिनी, तुम चिंता मत करो सब ठीक है…..।।

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    shalini rawat

    NSW उभरते लेखक – 🥈 लेखक नहीं हूं। फिर भी कुछ ना कुछ लिखती हूं।

  • मेरे बनाए नियम

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    मेरे बनाए नियम मुझ पर ही पड़ गए भारी

     

    राघव को अपने घर में नियम बनाना बहुत पसंद था। उसे लगता था कि अगर हर काम उसके बनाए नियमों के हिसाब से हो, तो घर में कभी कोई परेशानी नहीं होगी।

     

    वह अक्सर अपनी पत्नी मीरा, बेटे आरव और छोटी बेटी परी से कहता, “घर नियमों से चलता है। जो नियम मैंने बनाए हैं, उन्हें सबको मानना होगा।”

     

    मीरा कई बार मुस्कुराकर कहती, “नियम अच्छे होते हैं, लेकिन कभी-कभी परिस्थिति देखकर बदलाव भी जरूरी होता है।”

     

    राघव तुरंत जवाब देता, “नहीं। नियम अगर एक बार बन गए, तो फिर सबके लिए बराबर होने चाहिए।”

     

    उसे अपने इस विचार पर बहुत गर्व था।

     

    उसने घर में कई नियम बना रखे थे।

     

    सुबह छह बजे से पहले कोई टीवी नहीं देखेगा।

     

    खाने के समय कोई मोबाइल नहीं चलाएगा।

     

    रात दस बजे के बाद घर का मुख्य दरवाजा किसी के लिए नहीं खुलेगा।

     

    घर में जो चीज जहां रखी है, उसे वहीं रखा जाएगा।

     

    और सबसे बड़ा नियम था—

     

    “घर का कोई सदस्य अपनी परेशानी छिपाएगा नहीं, लेकिन किसी बाहरी व्यक्ति को घर की बात नहीं बताएगा।”

     

    राघव को लगता था कि इससे परिवार हमेशा सुरक्षित रहेगा।

     

    एक दिन आरव स्कूल से घर आया तो बहुत परेशान था।

     

    राघव ने पूछा, “क्या हुआ?”

     

    आरव ने सिर झुका लिया।

     

    “कुछ नहीं पापा।”

     

    राघव ने तुरंत कहा, “हमारे घर का नियम याद है? परेशानी छिपानी नहीं है।”

     

    आरव चुप रहा।

     

    कुछ देर बाद उसने बताया कि स्कूल में उसके कुछ दोस्तों ने उसका मजाक उड़ाया था।

     

    राघव ने उसे समझाया।

     

    “बेटा, किसी बात से परेशान हो तो घर आकर बताओ। बाहर किसी से शिकायत करने की जरूरत नहीं।”

     

    आरव ने सिर हिला दिया।

     

    मीरा ने बाद में राघव से कहा, “बच्चे की बात ध्यान से सुनना जरूरी है। सिर्फ नियम बताना काफी नहीं।”

     

    राघव ने कहा, “मैं सब समझता हूं।”

     

    समय बीतता गया।

     

    राघव के बनाए नियमों के कारण घर में व्यवस्था तो रहती थी, लेकिन धीरे-धीरे सब अपने मन की बात कहने से डरने लगे।

     

    परी एक दिन खेलते-खेलते गिर गई।

     

    उसके घुटने में चोट लग गई।

     

    मीरा उसे डॉक्टर के पास ले जाना चाहती थी।

     

    लेकिन राघव ने कहा, “पहले घर पर देखो। छोटी चोट के लिए अस्पताल जाने की जरूरत नहीं।”

     

    मीरा ने कहा, “लेकिन दर्द बहुत है।”

     

    राघव बोला, “हर छोटी बात पर घबराना ठीक नहीं।”

     

    मीरा चुप हो गई।

     

    कुछ दिन बाद परी ठीक हो गई।

     

    राघव को लगा कि उसका फैसला सही था।

     

    फिर एक दिन अचानक राघव के ऑफिस में बहुत बड़ा नुकसान हो गया।

     

    जिस कंपनी में वह काम करता था, वहां कुछ कर्मचारियों की नौकरी जाने वाली थी।

     

    राघव को भी डर था कि कहीं उसका नाम उस सूची में न हो।

     

    उसने यह बात घर में नहीं बताई।

     

    मीरा ने पूछा, “आप आजकल इतने परेशान क्यों हैं?”

     

    राघव ने कहा, “ऑफिस का काम है।”

     

    आरव ने पूछा, “पापा, कोई परेशानी है?”

     

    राघव ने भी वही जवाब दिया।

     

    “कुछ नहीं।”

     

    लेकिन रात को उसे नींद नहीं आई।

     

    वह छत पर जाकर बैठ गया।

     

    उसके मन में डर था।

     

    “अगर नौकरी चली गई तो घर कैसे चलेगा?”

     

    उसने पहली बार महसूस किया कि परेशानी छिपाना कितना मुश्किल होता है।

     

    सुबह ऑफिस से फोन आया।

     

    राघव को तुरंत बुलाया गया।

     

    वह जल्दी-जल्दी तैयार हुआ और घर से निकल गया।

     

    उस दिन उसे पता चला कि उसकी नौकरी बच गई है, लेकिन कंपनी में उसका पद बदल दिया गया है और वेतन कम हो गया है।

     

    राघव के लिए यह बड़ा झटका था।

     

    वह घर लौटा।

     

    मीरा ने पूछा, “क्या हुआ?”

     

    राघव ने कहा, “कुछ नहीं।”

     

    फिर अचानक उसे अपने ही बनाए नियम की याद आई।

     

    “घर का कोई सदस्य अपनी परेशानी छिपाएगा नहीं।”

     

    वह कुछ देर चुप रहा।

     

    फिर पहली बार उसने परिवार के सामने अपनी परेशानी रख दी।

     

    “मेरी नौकरी बच गई है, लेकिन वेतन कम हो गया है।”

     

    मीरा ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “तो इसमें छिपाने की क्या जरूरत थी?”

     

    राघव ने कहा, “पता नहीं। शायद मैं खुद को बहुत मजबूत समझता था।”

     

    आरव बोला, “पापा, आपने ही तो कहा था कि परेशानी घर में बतानी चाहिए।”

     

    राघव मुस्कुराया।

     

    “हां बेटा। लेकिन आज समझ आया कि नियम सिर्फ दूसरों के लिए नहीं होते।”

     

    अगले कुछ दिनों में घर का माहौल बदल गया।

     

    राघव ने अपने कई नियमों पर दोबारा विचार किया।

     

    उसने कहा, “अब से घर में नियम होंगे, लेकिन जरूरत पड़ने पर हम उन्हें बदल भी सकेंगे।”

     

    परी ने पूछा, “मतलब टीवी सुबह भी देख सकते हैं?”

     

    राघव हंस पड़ा।

     

    “जरूरत के हिसाब से।”

     

    परी खुशी से उछल पड़ी।

     

    लेकिन असली परीक्षा अभी बाकी थी।

     

    एक रात लगभग साढ़े दस बजे दरवाजे पर जोर से दस्तक हुई।

     

    राघव ने घड़ी देखी।

     

    दस बजकर तीस मिनट।

     

    उसने कहा, “नियम है कि दस बजे के बाद दरवाजा नहीं खुलेगा।”

     

    दस्तक फिर हुई।

     

    मीरा ने कहा, “शायद किसी को मदद चाहिए।”

     

    राघव कुछ देर चुप रहा।

     

    फिर बोला, “नियम तो नियम है।”

     

    तभी बाहर से आवाज आई—

     

    “राघव भैया!”

     

    आवाज पहचान में आ गई।

     

    वह उनके पड़ोसी मोहन की थी।

     

    राघव ने दरवाजा खोला।

     

    मोहन घबराया हुआ था।

     

    “भैया, मेरी मां की तबीयत अचानक खराब हो गई है। हमें तुरंत अस्पताल जाना है। आपकी गाड़ी मिल सकती है?”

     

    राघव कुछ पल के लिए शांत हो गया।

     

    उसे अपना नियम याद आया।

     

    फिर उसने मोहन की आंखों में चिंता देखी।

     

    उसने तुरंत चाबी उठाई।

     

    “चलो।”

     

    मीरा मुस्कुराई।

     

    राघव ने कहा, “आज मेरा नियम टूट गया।”

     

    मीरा बोली, “नियम नहीं, आज इंसानियत जीत गई।”

     

    मोहन की मां को समय पर अस्पताल पहुंचा दिया गया।

     

    कुछ देर बाद डॉक्टर ने बताया कि वह खतरे से बाहर हैं।

     

    मोहन ने राघव का हाथ पकड़कर कहा, “भैया, अगर आज आपने दरवाजा नहीं खोला होता तो पता नहीं क्या होता।”

     

    राघव ने उसकी ओर देखा।

     

    उस रात घर लौटते समय वह बहुत शांत था।

     

    मीरा ने पूछा, “क्या सोच रहे हैं?”

     

    राघव ने कहा, “मैंने इतने साल नियम बनाए और दूसरों से उनका पालन करवाया। लेकिन आज समझ आया कि नियम इंसान के लिए होते हैं, इंसान नियमों के लिए नहीं।”

     

    मीरा मुस्कुरा दी।

     

    घर पहुंचकर राघव ने एक कागज लिया।

     

    उस पर उसके सारे पुराने नियम लिखे थे।

     

    उसने नीचे एक नया नियम जोड़ दिया—

     

    “जब किसी नियम और किसी इंसान की जरूरत के बीच चुनाव करना पड़े, तो पहले इंसानियत को समझो।”

     

    आरव ने कागज पढ़ा।

     

    “पापा, यह सबसे अच्छा नियम है।”

     

    राघव ने कहा, “और सबसे जरूरी बात—इसे मैं सबसे पहले खुद मानूंगा।”

     

    कुछ दिनों बाद घर में फिर वही हंसी सुनाई देने लगी।

     

    परी कभी-कभी खिलौने गलत जगह रख देती।

     

    राघव पहले की तरह गुस्सा नहीं करता।

     

    आरव कभी मोबाइल थोड़ा ज्यादा चला लेता तो राघव समझाता, डांटता नहीं।

     

    मीरा अपनी बात खुलकर कहती।

     

    और राघव भी अब अपनी परेशानियां छिपाता नहीं था।

     

    एक शाम परिवार साथ बैठा था।

     

    आरव ने पूछा, “पापा, क्या आपको अपने पुराने नियमों पर पछतावा है?”

     

    राघव ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “नहीं। क्योंकि उन्हीं नियमों ने मुझे मेरी सबसे बड़ी गलती दिखाई।”

     

    “क्या?”

     

    “मैं समझता था कि अच्छा घर वह होता है जहां कोई नियम नहीं तोड़ता। लेकिन अब समझ आया है कि अच्छा घर वह होता है जहां लोग एक-दूसरे को समझते हैं।”

     

    मीरा ने कहा, “तो अब आपका सबसे बड़ा नियम क्या है?”

     

    राघव ने अपने परिवार को देखा।

     

    “मुश्किल समय में एक-दूसरे का हाथ कभी नहीं छोड़ना।”

     

    सब मुस्कुरा दिए।

     

    राघव ने उस दिन अपनी जिंदगी का सबसे बड़ा सबक सीखा—

     

    नियम जरूरी हैं, लेकिन परिस्थितियों से बड़े नहीं। अनुशासन जरूरी है, लेकिन इंसानियत से बड़ा नहीं। और सबसे बड़ी गलती तब होती है जब हम अपने बनाए नियमों को इतना कठोर बना देते हैं कि उनके कारण अपनों की जरूरत ही दिखाई देना बंद हो जाए।

     

    उस दिन से राघव ने नियम बनाना बंद नहीं किया।

     

    बस एक बात हमेशा याद रखी—

     

    “नियम मेरे बनाए हैं, इसलिए जरूरत पड़ने पर उन्हें बदलने का अधिकार भी मेरा है। लेकिन किसी इंसान की मदद का मौका मिले, तो वहां नियम नहीं, दिल की सुननी चाहिए।”

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    Auther preeti Sharma

    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

  • एक लड़की का श्राप

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    जिस लड़की को मिला श्राप — पानी पिया तो जिंदगी छिन जाएगी

     

    एक छोटे से गांव में नैना नाम की सोलह साल की लड़की रहती थी। वह बहुत हंसमुख और दयालु थी। गांव में कोई भी परेशान होता, नैना उसकी मदद करने पहुंच जाती। उसे पानी से बहुत प्यार था। गांव के पुराने कुएं से पानी भरकर लाना उसे अच्छा लगता था और गर्मियों में वह अक्सर नदी के किनारे बैठकर घंटों बातें करती।

     

    लेकिन एक दिन उसकी जिंदगी अचानक बदल गई।

     

    गांव के बाहर एक बहुत पुराना मंदिर था। लोग कहते थे कि उस मंदिर के पास शाम के बाद नहीं जाना चाहिए। वहां एक पुराना पत्थर रखा था, जिस पर अजीब निशान बने थे।

     

    एक शाम नैना अपनी छोटी बकरी को ढूंढते-ढूंढते मंदिर तक पहुंच गई।

     

    “मुन्नी! कहां चली गई?”

     

    बकरी मंदिर के पीछे खड़ी थी।

     

    नैना उसे पकड़ने आगे बढ़ी तभी उसकी नजर मंदिर की सीढ़ियों के पास बैठे एक बूढ़े साधु पर पड़ी।

     

    साधु ने नैना को देखते ही कहा, “बेटी, यहां से चली जाओ।”

     

    नैना घबरा गई।

     

    “बाबा, मैं अपनी बकरी लेने आई हूं।”

     

    साधु ने गंभीर होकर कहा, “बकरी ले जाओ, लेकिन इस जगह की कोई चीज अपने साथ मत ले जाना।”

     

    नैना ने सिर हिलाया।

     

    “जी बाबा।”

     

    वह बकरी को लेकर लौटने लगी, लेकिन तभी उसके पैर के पास रखा एक छोटा मिट्टी का कटोरा गिर गया। उसमें से थोड़ा पानी जमीन पर फैल गया।

     

    नैना ने अनजाने में कटोरा उठाकर पास रख दिया।

     

    साधु अचानक उठ खड़े हुए।

     

    “रुको!”

     

    नैना डर गई।

     

    “क्या हुआ बाबा?”

     

    साधु ने कटोरे को देखा और फिर नैना की ओर।

     

    उनका चेहरा चिंता से भर गया।

     

    “तुमने इसे छू लिया?”

     

    “जी… लेकिन मैंने कुछ नहीं किया।”

     

    साधु ने आंखें बंद कर लीं।

     

    “बहुत देर हो चुकी है।”

     

    नैना समझ नहीं पाई।

     

    “क्या हुआ?”

     

    साधु ने कहा, “इस कटोरे का पानी साधारण पानी नहीं था। वर्षों पहले यहां एक श्राप बांधा गया था। जो भी इस पानी को अपने शरीर के भीतर लेगा, उसके जीवन पर संकट आ जाएगा।”

     

    नैना के चेहरे का रंग उड़ गया।

     

    “लेकिन मैंने तो पानी पिया ही नहीं!”

     

    साधु ने राहत की सांस ली।

     

    “तुमने नहीं पिया, इसलिए अभी उम्मीद है।”

     

    नैना ने पूछा, “तो अब क्या होगा?”

     

    साधु ने कहा, “श्राप तुम तक पहुंच चुका है, लेकिन वह तभी पूरा होगा जब तुम किसी स्रोत का पानी अपने शरीर में लोगी।”

     

    नैना की आंखें फैल गईं।

     

    “मतलब मैं पानी नहीं पी सकती?”

     

    साधु ने सिर झुका लिया।

     

    “जब तक श्राप का रहस्य नहीं टूटता।”

     

    नैना भागती हुई घर पहुंची।

     

    मां ने उसे देखा तो पूछा, “क्या हुआ? इतनी घबराई क्यों हो?”

     

    नैना ने सारी बात बता दी।

     

    मां ने पहले इसे डर समझा, लेकिन जब नैना ने मंदिर और साधु के बारे में बताया तो मां उसे लेकर गांव के बुजुर्ग हरिदास के पास गईं।

     

    हरिदास ने बात सुनी तो उनका चेहरा गंभीर हो गया।

     

    “यह वही श्राप है।”

     

    मां ने पूछा, “आप जानते हैं इसके बारे में?”

     

    हरिदास बोले, “बहुत साल पहले गांव में एक लालची जमींदार रहता था। उसने मंदिर के पवित्र जल को अपने कब्जे में करने की कोशिश की थी। तब मंदिर के रक्षक ने उसे चेतावनी दी थी कि जो इस जल का गलत इस्तेमाल करेगा, वह कभी पानी का सच्चा सुख नहीं पा सकेगा।”

     

    नैना ने पूछा, “लेकिन इसका मुझसे क्या संबंध है?”

     

    हरिदास बोले, “शायद तुम्हें इसलिए चुना गया है क्योंकि तुमने उस कटोरे को बिना किसी लालच के उठाया था। श्राप तुम्हें डराकर नहीं, तुम्हारी परीक्षा लेकर आया है।”

     

    नैना ने दृढ़ होकर कहा, “तो मुझे इसका रास्ता ढूंढना होगा।”

     

    अगले दिन नैना मंदिर पहुंची।

     

    साधु वहीं बैठे थे।

     

    नैना ने पूछा, “बाबा, श्राप कैसे टूटेगा?”

     

    साधु ने कहा, “मुझे पूरी जानकारी नहीं है। लेकिन मंदिर की दीवार पर एक पुराना शिलालेख है।”

     

    दोनों मंदिर के अंदर गए।

     

    दीवार पर धूल से ढका एक संदेश लिखा था—

     

    “जिसे जीवन चाहिए, वह जीवन देने का रास्ता खोजे। जिस दिन स्वार्थ खत्म होगा, उसी दिन श्राप कमजोर होगा।”

     

    नैना देर तक उस संदेश को देखती रही।

     

    “इसका मतलब क्या है?”

     

    साधु बोले, “शायद तुम्हें किसी ऐसे काम की तलाश करनी होगी जिसमें तुम्हारा अपना लाभ न हो।”

     

    नैना ने पूरे गांव के बारे में सोचना शुरू किया।

     

    तभी उसे याद आया कि गांव के कई गरीब परिवार गर्मियों में पानी के लिए बहुत दूर जाते थे। गांव का पुराना तालाब भी सूखने लगा था।

     

    नैना ने फैसला किया कि वह तालाब को साफ करवाएगी।

     

    उसने गांव के बच्चों को बुलाया।

     

    “अगर हम सब मिलकर तालाब साफ करें तो शायद पानी फिर जमा हो सके।”

     

    कुछ बच्चों ने हामी भर दी।

     

    धीरे-धीरे बड़े लोग भी जुड़ने लगे।

     

    नैना खुद सबसे आगे काम करने लगी।

     

    लेकिन उसके मन में डर था।

     

    हर बार जब कोई पानी की बात करता, उसका दिल घबरा जाता।

     

    एक दिन उसकी छोटी सहेली बोली, “नैना, तुम इतनी परेशान क्यों रहती हो?”

     

    नैना ने सच बता दिया।

     

    सहेली ने उसका हाथ पकड़कर कहा, “डर मत। हम तुम्हारे साथ हैं।”

     

    कई दिनों की मेहनत के बाद तालाब की सफाई पूरी हुई।

     

    अगली बारिश में तालाब पानी से भर गया।

     

    पूरा गांव खुश हो गया।

     

    लोगों ने कहा, “नैना ने कमाल कर दिया।”

     

    लेकिन नैना चुप थी।

     

    उसे शिलालेख की बात याद आ रही थी—

     

    “जिसे जीवन चाहिए, वह जीवन देने का रास्ता खोजे।”

     

    उसी रात वह फिर मंदिर गई।

     

    साधु ने उसे देखते ही मुस्कुराकर कहा, “अब तुम समझ गई हो।”

     

    “क्या?”

     

    “श्राप पानी का नहीं था। श्राप उस लालच का था जिसने पानी को अपना अधिकार समझ लिया था।”

     

    नैना की आंखों में चमक आ गई।

     

    “तो क्या मैं अब सुरक्षित हूं?”

     

    साधु ने कहा, “यह तुम खुद जानोगी।”

     

    नैना ने सामने रखे साफ पानी के पात्र को देखा।

     

    कई दिनों से उसके मन में पानी को लेकर डर था।

     

    साधु ने कहा, “डर के कारण जिंदगी रुकती नहीं। समझ के साथ आगे बढ़ना ही साहस है।”

     

    नैना ने कुछ पल सोचा।

     

    फिर गांव के लोगों को याद किया, जिन्होंने उसके साथ तालाब साफ किया था।

     

    उसने समझ लिया कि असली श्राप उसके डर में था।

     

    तभी मंदिर के अंदर तेज प्रकाश हुआ।

     

    दीवार पर बने पुराने निशान धीरे-धीरे मिटने लगे।

     

    साधु ने मुस्कुराकर कहा, “श्राप टूट गया।”

     

    नैना की आंखों में खुशी के आंसू आ गए।

     

    वह घर लौटी और मां से लिपट गई।

     

    मां ने पूछा, “क्या हुआ?”

     

    नैना मुस्कुराई।

     

    “मां, आज मुझे समझ आया कि डर हमें उतना नहीं रोकता जितना हम खुद डर को अपने ऊपर हावी होने देते हैं।”

     

    कुछ दिनों बाद गांव में एक नया नियम बना।

     

    तालाब का पानी किसी एक व्यक्ति का नहीं होगा।

     

    वह पूरे गांव का होगा।

     

    नैना अक्सर तालाब के किनारे बैठती और पानी की लहरों को देखती।

     

    एक दिन उसकी सहेली ने पूछा, “तुम यहां इतनी देर क्यों बैठती हो?”

     

    नैना मुस्कुराकर बोली—

     

    “क्योंकि कभी मुझे पानी से डर लगता था। अब यही पानी मुझे याद दिलाता है कि जिंदगी में सबसे बड़ा श्राप डर है और सबसे बड़ी ताकत उम्मीद।”

     

    उस दिन से नैना ने गांव के बच्चों को एक बात हमेशा सिखाई—

     

    किसी डर को अपनी जिंदगी का मालिक मत बनने देना। कई बार जिस चीज से हम सबसे ज्यादा डरते हैं, उसी के पीछे हमारी सबसे बड़ी सीख छिपी होती है।

     

    और पुराने मंदिर की दीवार पर जहां कभी श्राप लिखा था, वहां अब केवल एक नई पंक्ति दिखाई देती थी—

     

    “जीवन बांटने वाला कभी अकेला नहीं पड़ता।”

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  • इस जिंदगी ने

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    इस जिंदगी ने मुझे बहुत कुछ सिखाया

     

    अमन की उम्र अभी सिर्फ पच्चीस साल थी, लेकिन वह अक्सर कहता था, “इस जिंदगी ने मुझे मेरी उम्र से कहीं ज्यादा सिखा दिया है।”

     

    कभी वह बहुत खुश रहने वाला लड़का था। छोटी-सी सफलता पर खुश हो जाता, दोस्तों के साथ घंटों हंसता और भविष्य को लेकर बड़े-बड़े सपने देखता था। उसे लगता था कि जिंदगी वैसी ही चलेगी जैसी वह चाहता है।

     

    लेकिन जिंदगी हमेशा हमारी इच्छा के हिसाब से नहीं चलती।

     

    अमन एक छोटे से शहर में अपनी मां, पिता और छोटी बहन के साथ रहता था। उसके पिता की छोटी-सी कपड़ों की दुकान थी। घर बहुत बड़ा नहीं था, मगर उसमें प्यार की कोई कमी नहीं थी।

     

    अमन का सपना था कि वह एक दिन अपना बड़ा कारोबार शुरू करेगा।

     

    कॉलेज खत्म होते ही उसने नौकरी के लिए कई जगह आवेदन किए। उसे पूरा भरोसा था कि जल्दी ही अच्छी नौकरी मिल जाएगी।

     

    लेकिन महीने गुजरते गए।

     

    कहीं से जवाब नहीं आया।

     

    कई जगह इंटरव्यू दिए, लेकिन हर बार कोई न कोई कमी निकाल दी जाती।

     

    एक दिन अमन बहुत परेशान होकर घर लौटा।

     

    मां ने पूछा, “क्या हुआ बेटा?”

     

    अमन ने गुस्से में कहा, “कुछ नहीं हुआ मां। लगता है मेरी किस्मत ही खराब है।”

     

    पिता दुकान से लौटे तो उन्होंने बेटे को चुप बैठे देखा।

     

    उन्होंने पूछा, “कोशिश छोड़ दी?”

     

    अमन बोला, “नहीं।”

     

    पिता मुस्कुराए।

     

    “तो फिर हार कैसे गए?”

     

    अमन कुछ नहीं बोला।

     

    पिता ने कहा, “बेटा, जिंदगी में हर दरवाजा पहली बार में नहीं खुलता। कभी-कभी बार-बार दस्तक देनी पड़ती है।”

     

    अमन ने उनकी बात सुनी, लेकिन उस समय उसे वह बात सिर्फ एक सलाह लगी।

     

    कुछ दिनों बाद उसे एक कंपनी में नौकरी मिल गई।

     

    उसकी खुशी का ठिकाना नहीं था।

     

    पहली तनख्वाह मिलने पर उसने मां के लिए साड़ी खरीदी और पिता के लिए नई घड़ी।

     

    घर लौटकर उसने दोनों चीजें उनके सामने रख दीं।

     

    मां की आंखें भर आईं।

     

    पिता ने घड़ी पहनते हुए कहा, “आज मेरी मेहनत सफल हो गई।”

     

    अमन ने पहली बार महसूस किया कि उसकी छोटी-सी सफलता भी उसके परिवार के लिए कितनी बड़ी खुशी थी।

     

    लेकिन नौकरी शुरू होने के कुछ महीनों बाद अमन बदलने लगा।

     

    अब उसके पास समय नहीं था।

     

    मां फोन करतीं तो वह कहता, “मां, बाद में बात करता हूं।”

     

    बहन कहती, “भैया, रविवार को कहीं घूमने चलेंगे?”

     

    वह कहता, “देखेंगे।”

     

    पिता दुकान की परेशानी बताते तो अमन कहता, “पापा, अभी बहुत काम है।”

     

    उसे लगने लगा था कि पैसे और सफलता ही जिंदगी की सबसे बड़ी चीजें हैं।

     

    फिर एक दिन कंपनी में अचानक छंटनी शुरू हो गई।

     

    अमन की नौकरी भी चली गई।

     

    उसने कई दिनों तक यह बात घर में नहीं बताई।

     

    सुबह तैयार होकर घर से निकलता और पूरा दिन इधर-उधर घूमता रहता।

     

    शाम को वापस आ जाता।

     

    एक दिन पिता ने उसे रास्ते में देख लिया।

     

    उन्होंने कुछ नहीं पूछा।

     

    बस घर पहुंचकर बोले, “नौकरी चली गई है?”

     

    अमन चौंक गया।

     

    “आपको कैसे पता?”

     

    पिता ने कहा, “बेटे, पिता से अपनी परेशानी छिपाना आसान नहीं होता।”

     

    अमन की आंखों में आंसू आ गए।

     

    “पापा, मैं हार गया।”

     

    पिता ने उसके कंधे पर हाथ रखा।

     

    “नौकरी गई है, तुम नहीं।”

     

    यह बात अमन के दिल में उतर गई।

     

    अगले दिन उसने फिर से काम तलाशना शुरू किया।

     

    इस बार उसे एक छोटे ऑफिस में नौकरी मिली। तनख्वाह पहले से कम थी।

     

    उसके कुछ पुराने दोस्तों ने मजाक उड़ाया।

     

    “इतनी पढ़ाई करके इतनी छोटी नौकरी?”

     

    अमन को बुरा लगा।

     

    लेकिन इस बार उसने जवाब नहीं दिया।

     

    उसने सोचा, “काम छोटा या बड़ा नहीं होता। सोच छोटी या बड़ी होती है।”

     

    वह पूरी मेहनत से काम करने लगा।

     

    कुछ महीनों बाद उसकी मुलाकात एक बुजुर्ग व्यक्ति से हुई, जो उसी ऑफिस के बाहर चाय की दुकान लगाते थे।

     

    एक दिन अमन उनके पास बैठ गया।

     

    बुजुर्ग ने पूछा, “बेटा, परेशान लग रहे हो।”

     

    अमन ने कहा, “जिंदगी समझ नहीं आ रही।”

     

    बुजुर्ग हंस पड़े।

     

    “जिंदगी समझने की चीज नहीं है। उसे जीने की चीज है।”

     

    अमन चुपचाप उनकी बात सुनता रहा।

     

    बुजुर्ग बोले, “मैंने भी बहुत खोया है। लेकिन एक बात सीखी—जो चला गया, उसके पीछे रोते रहोगे तो जो सामने है, उसे भी खो दोगे।”

     

    अमन ने उस दिन बहुत कुछ सोचा।

     

    उसे समझ आया कि वह हमेशा उस चीज के पीछे भागता रहा जो उसके पास नहीं थी।

     

    जब नौकरी नहीं थी, तब नौकरी चाहिए थी।

     

    नौकरी मिली तो ज्यादा पैसे चाहिए थे।

     

    पैसे मिले तो ज्यादा नाम चाहिए था।

     

    वह जिंदगी जी ही नहीं रहा था।

     

    बस अगली मंजिल के पीछे भाग रहा था।

     

    उसने अपना रवैया बदलने का फैसला किया।

     

    अब वह मां के साथ बैठकर खाना खाने लगा।

     

    पिता की दुकान पर जाकर हाथ बंटाता।

     

    बहन की बातें ध्यान से सुनता।

     

    छुट्टी के दिन दोस्तों से मिलता।

     

    और सबसे जरूरी बात—उसने खुद की तुलना दूसरों से करना बंद कर दिया।

     

    एक दिन उसकी बहन ने पूछा, “भैया, आप इतने बदल कैसे गए?”

     

    अमन मुस्कुराया।

     

    “जिंदगी ने सिखाया है।”

     

    “क्या?”

     

    अमन ने कहा, “यह कि हर चीज हमारे हिसाब से नहीं मिलेगी। कुछ लोग हमें छोड़कर जाएंगे, कुछ मौके हाथ से निकलेंगे, कुछ सपने पूरे होने में समय लगेगा। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि जिंदगी खत्म हो गई।”

     

    बहन मुस्कुराई।

     

    “और क्या सिखाया?”

     

    अमन ने कहा, “यह कि परिवार की कीमत तब मत समझना जब उनके पास बैठने का समय ही न बचे।”

     

    कुछ साल बीत गए।

     

    अमन ने धीरे-धीरे अपना छोटा कारोबार शुरू किया।

     

    इस बार उसने शुरुआत बहुत छोटे स्तर से की।

     

    पहले महीने बहुत कम कमाई हुई।

     

    दूसरे महीने थोड़ा सुधार हुआ।

     

    कई बार नुकसान भी हुआ।

     

    लेकिन अब वह घबराता नहीं था।

     

    उसे पता था कि गिरना रास्ते का हिस्सा है।

     

    एक दिन उसका कारोबार अच्छा चलने लगा।

     

    लोग उसे सफलता की मिसाल बताने लगे।

     

    एक पत्रकार ने उससे पूछा, “आपकी सफलता का राज क्या है?”

     

    अमन कुछ देर चुप रहा।

     

    फिर मुस्कुराकर बोला—

     

    “मेरी सफलता का राज मेरी असफलताएं हैं।”

     

    पत्रकार ने पूछा, “कैसे?”

     

    अमन ने कहा, “क्योंकि जब जिंदगी ने मुझे गिराया, तब मैंने सीखा कि उठना कैसे है। जब लोगों ने मेरा साथ छोड़ा, तब मैंने अपने परिवार की कीमत समझी। जब नौकरी गई, तब मैंने जाना कि इंसान की पहचान उसकी नौकरी नहीं होती। जब पैसे कम थे, तब मैंने छोटी खुशियों का महत्व समझा। और जब सब कुछ मिल गया, तब समझ आया कि सुकून सबसे बड़ी दौलत है।”

     

    उस शाम अमन घर लौटा।

     

    पिता बरामदे में बैठे थे।

     

    अमन उनके पास जाकर बैठ गया।

     

    पिता ने पूछा, “आज बहुत खुश लग रहे हो।”

     

    अमन मुस्कुराया।

     

    “पापा, आज समझ आया कि मैं इतने साल से जिंदगी से शिकायत करता रहा।”

     

    “अब?”

     

    “अब शुक्रिया करता हूं।”

     

    पिता ने उसकी पीठ थपथपाई।

     

    मां अंदर से चाय लेकर आईं।

     

    बहन भी आकर पास बैठ गई।

     

    चारों साथ बैठे और बातें करने लगे।

     

    अमन उन्हें देखता रहा।

     

    उसे लगा कि उसकी सबसे बड़ी सफलता उसके पास मौजूद पैसा या कारोबार नहीं था।

     

    उसकी सबसे बड़ी सफलता यह थी कि उसने जिंदगी को समझना सीख लिया था।

     

    उसने डायरी खोली और लिखा—

     

    “इस जिंदगी ने मुझे बहुत कुछ सिखाया।

    सिखाया कि हर हार अंत नहीं होती।

    हर बिछड़ना जिंदगी का अंत नहीं होता।

    हर असफलता इंसान को कमजोर नहीं बनाती।

    और हर मुश्किल अपने साथ एक सीख लेकर आती है।”

     

    उसने आखिरी लाइन लिखी—

     

    “जिंदगी हमेशा आसान नहीं होगी, लेकिन अगर हम हर मुश्किल से कुछ सीखते रहें, तो एक दिन पीछे मुड़कर देखने पर वही मुश्किलें हमारी सबसे बड़ी ताकत बन जाती हैं।”

     

    अमन ने डायरी बंद की और मुस्कुरा दिया।

     

    अब उसे जिंदगी से कोई शिकायत नहीं थी।

     

    क्योंकि उसने आखिरकार समझ लिया था—

     

    जिंदगी हमें हर दिन कुछ न कुछ सिखाती है। बस जरूरत है तो उसकी सीख को समझने की।

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    Auther preeti Sharma

    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

  • खुद को मिटा दिया

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    क्यों मैंने खुद को मिटा दिया

     

    राधिका हमेशा से हंसने वाली लड़की थी। घर में कोई परेशानी हो, वह मुस्कुराकर कहती, “सब ठीक हो जाएगा।” किसी दोस्त को दुख हो, तो वह रात देर तक उसकी बातें सुनती। मां थकी हुई हों, तो बिना कहे काम संभाल लेती। पिता परेशान हों, तो उनके सामने कभी अपनी चिंता नहीं रखती।

     

    सबको लगता था कि राधिका बहुत मजबूत है।

     

    लेकिन कोई यह नहीं देखता था कि दूसरों को संभालते-संभालते वह खुद अंदर से कितनी थक चुकी थी।

     

    राधिका की उम्र सिर्फ चौबीस साल थी, मगर उसके चेहरे पर उम्र से ज्यादा जिम्मेदारियां दिखाई देती थीं।

     

    एक दिन उसकी छोटी बहन ने पूछा, “दीदी, तुम्हें क्या चाहिए?”

     

    राधिका हंस पड़ी।

     

    “मुझे? कुछ नहीं।”

     

    बहन ने फिर पूछा, “सच में? कभी अपने लिए भी कुछ मांग लिया करो।”

     

    राधिका कुछ पल चुप रही।

     

    फिर बोली, “शायद मुझे खुद भी नहीं पता कि मुझे क्या चाहिए।”

     

    उस रात राधिका अपने कमरे में अकेली बैठी थी। सामने आईना था। उसने आईने में खुद को देखा और अचानक उसके मुंह से निकला—

     

    “मैं इतनी बदल क्यों गई?”

     

    कभी उसे किताबें पढ़ने का शौक था। कभी वह घंटों गाने सुनती थी। उसे बारिश में छत पर खड़े होकर भीगना पसंद था। वह छोटी-छोटी बातों पर खुश हो जाती थी।

     

    लेकिन पिछले कुछ सालों में उसने अपनी पसंद को धीरे-धीरे पीछे कर दिया था।

     

    किसी ने कहा, “यह मत करो।”

     

    उसने नहीं किया।

     

    किसी ने कहा, “तुम्हें यह नौकरी करनी चाहिए।”

     

    उसने कर ली।

     

    किसी ने कहा, “घर की जिम्मेदारी पहले है।”

     

    उसने अपनी इच्छाएं छोड़ दीं।

     

    किसी ने कहा, “लोग क्या कहेंगे?”

     

    उसने अपनी आवाज दबा दी।

     

    और धीरे-धीरे एक दिन ऐसा आया जब राधिका को समझ ही नहीं आया कि वह खुद चाहती क्या है।

     

    उसने डायरी निकाली और पहली बार अपने मन की बात लिखी—

     

    “क्यों मैंने खुद को मिटा दिया?”

     

    कलम कुछ देर रुक गई।

     

    फिर उसने लिखा—

     

    “मैंने सबको खुश करने के चक्कर में खुद को ही भूल दिया।”

     

    अगले दिन ऑफिस में राधिका से एक छोटी-सी गलती हो गई। उसके बॉस ने सबके सामने उसे डांट दिया।

     

    “तुमसे इतनी सी बात भी ठीक से नहीं होती?”

     

    राधिका ने सिर झुका लिया।

     

    “सॉरी सर।”

     

    ऑफिस से बाहर निकलते समय उसकी सहेली ने कहा, “तुम हर बात पर सॉरी क्यों बोलती हो?”

     

    राधिका ने हंसने की कोशिश की।

     

    “आदत हो गई है।”

     

    “और अपनी बात कब कहोगी?”

     

    राधिका ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    घर पहुंचकर मां ने कहा, “राधिका, पड़ोस की आंटी के बेटे की शादी है। रविवार को चलना है।”

     

    “मां, रविवार को मुझे आराम करना था।”

     

    मां ने तुरंत कहा, “बस एक दिन की तो बात है।”

     

    राधिका कुछ बोलना चाहती थी, लेकिन फिर वही पुरानी आदत सामने आ गई।

     

    “ठीक है मां।”

     

    कमरे में जाकर उसने बैग बिस्तर पर फेंका और चुपचाप बैठ गई।

     

    उस दिन पहली बार उसे खुद पर गुस्सा आया।

     

    “मैं हर बार हां क्यों कह देती हूं?”

     

    उसकी आंखों में आंसू आ गए।

     

    “मेरी जिंदगी में मेरी इच्छा की कोई जगह क्यों नहीं है?”

     

    अचानक दरवाजे पर उसकी छोटी बहन खड़ी थी।

     

    “दीदी…”

     

    राधिका ने जल्दी से आंसू पोंछे।

     

    “कुछ नहीं हुआ।”

     

    बहन उसके पास बैठ गई।

     

    “हर बार यही कहती हो। लेकिन आज मुझे झूठ मत बोलो।”

     

    राधिका चुप रही।

     

    बहन ने उसका हाथ पकड़कर कहा, “दीदी, तुमने सबके लिए बहुत कुछ किया है। लेकिन खुद के लिए क्या किया?”

     

    यह सवाल राधिका के दिल में उतर गया।

     

    वह रो पड़ी।

     

    “शायद कुछ भी नहीं।”

     

    बहन ने कहा, “तो अब शुरू करो।”

     

    “क्या?”

     

    “खुद को वापस पाना।”

     

    अगले दिन राधिका ने एक छोटा-सा फैसला लिया।

     

    सुबह उठकर उसने अपना पुराना गिटार निकाला।

     

    धूल साफ की।

     

    कई साल बाद उसने उस पर उंगलियां रखीं।

     

    पहले सुर गलत निकला।

     

    वह हंस पड़ी।

     

    फिर दूसरा सुर बजाया।

     

    कमरे में एक छोटी-सी धुन गूंज उठी।

     

    उसे लगा जैसे उसके अंदर कोई पुराना दरवाजा खुल गया हो।

     

    उस दिन उसने खुद से कहा—

     

    “मुझे परफेक्ट नहीं बनना। मुझे बस फिर से खुद बनना है।”

     

    अब उसने हर बात पर हां कहना बंद कर दिया।

     

    मां ने पूछा, “आज बाजार चलोगी?”

     

    राधिका ने मुस्कुराकर कहा, “आज नहीं मां। आज मुझे अपने लिए थोड़ा समय चाहिए। कल चलेंगे।”

     

    पहले मां को अजीब लगा।

     

    लेकिन कुछ समय बाद उन्होंने भी समझना शुरू कर दिया कि अपनी इच्छा बताना स्वार्थ नहीं होता।

     

    ऑफिस में भी राधिका ने अपनी बात रखना शुरू किया।

     

    एक दिन बॉस ने कहा, “यह काम आज ही पूरा करना होगा।”

     

    राधिका ने शांत होकर कहा, “मैं कोशिश करूंगी, लेकिन इसे ठीक से करने के लिए मुझे थोड़ा और समय चाहिए।”

     

    पहले वह डरती।

     

    उस दिन नहीं डरी।

     

    धीरे-धीरे उसकी जिंदगी बदलने लगी।

     

    उसने फिर से किताबें पढ़नी शुरू कीं। रविवार को गिटार बजाती। कभी अकेले पार्क में बैठती। अपनी सहेली से मिलती। मां के साथ चाय पीते हुए खुलकर बातें करती।

     

    सबसे बड़ी बात—उसने खुद को दोष देना बंद कर दिया।

     

    एक शाम वही छोटी बहन उसके कमरे में आई।

     

    “दीदी, आज तुम बहुत खुश लग रही हो।”

     

    राधिका मुस्कुराई।

     

    “क्योंकि आज मुझे मेरी पुरानी राधिका मिल गई।”

     

    बहन ने पूछा, “कहां थी इतने दिन?”

     

    राधिका कुछ पल सोचती रही।

     

    फिर बोली—

     

    “दूसरों की उम्मीदों के नीचे दब गई थी।”

     

    दोनों हंस पड़ीं।

     

    कुछ महीने बाद राधिका ने अपनी पहली छोटी-सी संगीत प्रस्तुति दी। मंच पर जाने से पहले उसके हाथ कांप रहे थे।

     

    उसे लगा, शायद वह नहीं कर पाएगी।

     

    फिर उसे अपनी पुरानी डायरी की वह लाइन याद आई—

     

    “क्यों मैंने खुद को मिटा दिया?”

     

    उसने मन ही मन जवाब दिया—

     

    “अब नहीं।”

     

    वह मंच पर गई।

     

    गिटार उठाया।

     

    और अपनी धुन शुरू कर दी।

     

    तालियां बजने लगीं।

     

    मंच से उतरते समय उसकी आंखों में खुशी के आंसू थे।

     

    मां ने उसे गले लगा लिया।

     

    “मुझे नहीं पता था कि मेरी बेटी इतना अच्छा गा सकती है।”

     

    राधिका ने मां के कंधे पर सिर रख दिया।

     

    “मुझे भी नहीं पता था मां… क्योंकि मैंने खुद को मौका ही नहीं दिया था।”

     

    उस रात उसने अपनी डायरी खोली।

     

    पुराने सवाल के नीचे उसने एक नई लाइन लिखी—

     

    “मैंने खुद को इसलिए मिटा दिया था क्योंकि मुझे लगा था कि दूसरों की खुशी मेरी खुशी से ज्यादा जरूरी है। लेकिन अब समझ आया है कि खुद की जिंदगी में खुद की जगह बनाना गलत नहीं है।”

     

    उसने डायरी बंद की।

     

    आईने के सामने खड़ी हुई।

     

    इस बार आईने में उसे कोई थकी हुई लड़की नहीं दिखी।

     

    उसे वही पुरानी राधिका दिखाई दी—जो सपने देखती थी, हंसती थी, गाती थी और छोटी-छोटी चीजों में खुश होना जानती थी।

     

    उसने आईने में देखकर धीरे से कहा—

     

    “मैं वापस आ गई हूं।”

     

    और शायद जिंदगी में सबसे जरूरी बात यही है।

     

    कभी-कभी हम दूसरों के लिए इतना जीने लगते हैं कि खुद को भूल जाते हैं। लेकिन खुद को भूल जाना प्यार नहीं है, और अपनी इच्छाओं को हमेशा दबा देना त्याग नहीं है।

     

    दूसरों की परवाह करो, जरूर करो।

     

    लेकिन अपने दिल की आवाज भी सुनो।

     

    क्योंकि जिंदगी सिर्फ यह पूछने के लिए नहीं मिली कि—

     

    “मैंने दूसरों के लिए क्या किया?”

     

    कभी-कभी खुद से यह भी पूछना चाहिए—

     

    “मैंने अपने लिए क्या किया?”

     

    राधिका ने देर से सही, लेकिन यह सीख लिया था।

     

    उसने खुद को मिटाया नहीं था।

     

    बस कुछ समय के लिए खुद से दूर हो गई थी।

     

    और जब उसने खुद को दोबारा खोज लिया, तब उसे समझ आया—

     

    खुद को खो देना जिंदगी का अंत नहीं होता। खुद को फिर से पाना ही असली शुरुआत होती है।

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    Auther preeti Sharma

    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

  • मेरी दादी मां की सीख

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    मेरी दादी माँ की सीख

     

    शहर से दूर एक छोटे से गाँव में अयान अपनी दादी माँ के साथ रहता था। अयान के माता-पिता शहर में नौकरी करते थे और महीने में एक-दो बार ही गाँव आ पाते थे। इसलिए अयान की दुनिया उसकी दादी माँ के आसपास ही थी।

     

    दादी माँ बहुत साधारण जीवन जीती थीं। सुबह जल्दी उठतीं, आँगन में झाड़ू लगातीं, तुलसी को पानी देतीं और फिर अयान के लिए नाश्ता बनातीं।

     

    अयान अक्सर उनसे कहता, “दादी माँ, आप इतना काम क्यों करती हैं? अब जमाना बदल गया है।”

     

    दादी हँसकर कहतीं, “जमाना बदल गया है बेटा, लेकिन अच्छी आदतों की कीमत कभी नहीं बदलती।”

     

    अयान उनकी बात सुनता जरूर था, लेकिन कई बार उसे लगता कि दादी माँ की बातें पुराने जमाने की हैं।

     

    एक दिन अयान के स्कूल में परीक्षा का परिणाम आने वाला था। उसे पूरा विश्वास था कि वह कक्षा में सबसे अच्छे अंक लाएगा। उसने बहुत मेहनत की थी, लेकिन जब परिणाम आया तो उसके अंक उम्मीद से कम थे।

     

    वह घर लौटकर गुस्से में बैग पटककर बैठ गया।

     

    दादी ने पूछा, “क्या हुआ?”

     

    अयान बोला, “सब बेकार है। मैंने इतनी मेहनत की और फिर भी मेरे अंक कम आए।”

     

    दादी ने प्यार से कहा, “अंक कम आए हैं, मेहनत नहीं।”

     

    अयान चुप हो गया।

     

    दादी बोलीं, “हार के बाद बैठ जाना आसान है। हार के बाद फिर से कोशिश करना असली सीख है।”

     

    अयान ने उनकी बात ध्यान से सुनी।

     

    अगले दिन से उसने अपनी गलतियाँ देखनी शुरू कीं। कुछ ही महीनों में उसके अंक बेहतर होने लगे।

     

    एक दिन दादी ने उसे बाजार से सामान लाने के लिए पैसे दिए।

     

    अयान रास्ते में गया तो उसे सड़क के किनारे एक बटुआ मिला। उसमें काफी पैसे थे।

     

    उसके मन में आया कि वह पैसे रख ले।

     

    “दादी को क्या पता चलेगा?” उसने सोचा।

     

    लेकिन तुरंत उसे दादी की बात याद आई—

     

    “ईमानदारी तब असली होती है, जब कोई तुम्हें गलत काम करते हुए देख न रहा हो।”

     

    अयान बटुआ लेकर पास की दुकान पर गया और आसपास पूछताछ करने लगा।

     

    कुछ देर बाद एक बुजुर्ग आदमी घबराते हुए वहाँ पहुँचे।

     

    “मेरा बटुआ कहीं गिर गया है। उसमें मेरी दवाई के पैसे थे।”

     

    अयान ने बटुआ उन्हें दे दिया।

     

    बुजुर्ग की आँखों में खुशी आ गई।

     

    उन्होंने कहा, “बेटा, तुमने आज मेरा बहुत बड़ा काम कर दिया।”

     

    अयान घर लौटकर दादी को सारी बात बताने लगा।

     

    दादी ने उसके सिर पर हाथ रखा।

     

    “आज तुमने मेरी नहीं, अपनी अंतरात्मा की बात मानी है।”

     

    अयान मुस्कुराया।

     

    कुछ दिन बाद गाँव में तेज बारिश हुई। गाँव की सड़क पर पानी भर गया। कई लोगों के घरों में पानी घुसने लगा।

     

    अयान अपने घर में सुरक्षित बैठा था। तभी दादी ने कहा, “चल बेटा, पड़ोस वाली अम्मा के घर चलते हैं।”

     

    अयान बोला, “दादी, इतनी बारिश में?”

     

    दादी ने कहा, “मुसीबत में किसी का साथ देना मौसम देखकर नहीं होता।”

     

    दोनों पड़ोस की बुजुर्ग अम्मा के घर पहुँचे। उनका घर पानी से भरने लगा था।

     

    अयान ने सामान बाहर निकाला और उन्हें सुरक्षित जगह पहुँचाने में मदद की।

     

    उस दिन उसने महसूस किया कि दादी की सीख सिर्फ बातें नहीं थीं।

     

    वे जिंदगी जीने का तरीका थीं।

     

    समय बीतता गया।

     

    एक दिन अयान के पिता ने शहर से फोन किया।

     

    उन्होंने कहा, “बेटा, हम चाहते हैं कि तुम शहर आकर हमारे साथ रहो। वहाँ तुम्हारे लिए अच्छे स्कूल और ज्यादा सुविधाएँ हैं।”

     

    अयान खुश भी हुआ और उदास भी।

     

    उसने दादी से पूछा, “मैं शहर चला जाऊँ तो आपका क्या होगा?”

     

    दादी मुस्कुराईं।

     

    “तू आगे बढ़ेगा तो मुझे खुशी होगी।”

     

    अयान ने पूछा, “लेकिन आपकी सीख?”

     

    दादी ने कहा, “उसे अपने साथ ले जाना।”

     

    अयान शहर चला गया।

     

    शहर की जिंदगी गाँव से बिल्कुल अलग थी। यहाँ हर कोई जल्दी में रहता था। लोग एक-दूसरे को जानते तक नहीं थे।

     

    एक दिन स्कूल में अयान का एक नया दोस्त बना। उसका नाम कुणाल था।

     

    कुणाल पढ़ाई में कमजोर था। दूसरे बच्चे उसका मजाक उड़ाते थे।

     

    अयान को दादी की एक और बात याद आई—

     

    “जिसे सहारे की जरूरत हो, उसे धक्का मत देना।”

     

    अयान ने कुणाल की पढ़ाई में मदद करनी शुरू कर दी।

     

    कुछ महीनों बाद कुणाल के अंक बहुत अच्छे हो गए।

     

    उसने अयान से कहा, “तुमने मेरा मजाक उड़ाने के बजाय मेरी मदद की। क्यों?”

     

    अयान ने कहा, “मेरी दादी कहती हैं कि किसी को नीचे गिराकर कोई बड़ा नहीं बनता।”

     

    कुणाल मुस्कुरा दिया।

     

    समय बीतता गया और अयान बड़ा होने लगा।

     

    एक दिन उसे एक बड़ी कंपनी में काम करने का मौका मिला। वहाँ उससे कहा गया कि अगर वह कुछ गलत आँकड़े दिखा दे तो उसे जल्दी पदोन्नति मिल सकती है।

     

    अयान कुछ पल सोच में पड़ गया।

     

    उसके सामने बड़ा फायदा था।

     

    लेकिन फिर उसे दादी की आवाज याद आई—

     

    “ईमानदारी का रास्ता लंबा हो सकता है, लेकिन मंजिल पर पहुँचकर सिर झुकाना नहीं पड़ता।”

     

    अयान ने गलत काम करने से मना कर दिया।

     

    कुछ लोगों ने उसका मजाक उड़ाया।

     

    “इतना अच्छा मौका छोड़ दिया!”

     

    अयान चुप रहा।

     

    कुछ महीनों बाद कंपनी में उस गलत काम की जाँच हुई और कई लोगों पर कार्रवाई हुई।

     

    अयान की ईमानदारी सबके सामने आ गई।

     

    उसे उसी काम के लिए बड़ी जिम्मेदारी दी गई जिसे उसने ईमानदारी से करने से इनकार किया था।

     

    उस शाम उसने दादी को फोन किया।

     

    “दादी माँ, आपकी सीख काम आ गई।”

     

    दादी हँसकर बोलीं, “कौन-सी?”

     

    “दादी, आपने सिखाया था कि सही रास्ता मुश्किल हो सकता है, लेकिन गलत रास्ते पर चलकर मिली सफलता ज्यादा देर नहीं टिकती।”

     

    दादी कुछ पल चुप रहीं।

     

    फिर बोलीं, “अब तू मेरी सीख दूसरों को देना।”

     

    कई साल बाद अयान अपने गाँव वापस आया।

     

    दादी अब काफी बूढ़ी हो चुकी थीं।

     

    अयान उनके पास बैठ गया और बोला, “दादी माँ, आपने मुझे इतना कुछ सिखाया, लेकिन मैंने कभी आपको धन्यवाद नहीं कहा।”

     

    दादी ने उसके सिर पर हाथ रखा।

     

    “मुझे धन्यवाद नहीं चाहिए। बस इतना वादा कर कि जब जिंदगी में तू किसी कमजोर इंसान को देखे, तो उसका हाथ थामेगा।”

     

    अयान की आँखें भर आईं।

     

    उसने दादी का हाथ पकड़कर कहा, “वादा।”

     

    कुछ समय बाद दादी इस दुनिया से चली गईं।

     

    घर वही था, आँगन वही था, तुलसी का पौधा वही था, लेकिन उनकी आवाज अब नहीं थी।

     

    अयान आँगन में बैठा उनकी पुरानी चारपाई को देख रहा था।

     

    उसे लगा जैसे दादी अभी कहेंगी—

     

    “बेटा, खाना खा लिया?”

     

    उसकी आँखों से आँसू निकल आए।

     

    लेकिन उसी पल उसे समझ आया कि दादी माँ सच में कहीं नहीं गईं।

     

    उनकी सीख उसके व्यवहार में जीवित थी।

     

    उसने उसी दिन फैसला किया कि वह गाँव के बच्चों के लिए एक छोटी-सी पुस्तकालय खोलेगा, जहाँ वे पढ़ सकें और अच्छी बातें सीख सकें।

     

    पुस्तकालय के दरवाजे पर उसने एक पंक्ति लिखवाई—

     

    “अच्छा इंसान बनना सबसे बड़ी सफलता है।”

     

    नीचे उसने लिखा—

     

    “मेरी दादी माँ की सीख।”

     

    जब भी कोई बच्चा उससे पूछता, “ये बात किसने सिखाई?”

     

    अयान मुस्कुराकर कहता—

     

    “मेरी दादी माँ ने। उन्होंने मुझे बताया था कि जिंदगी में पैसा, पद और सफलता सब जरूरी हैं, लेकिन अगर इंसानियत खो गई तो सब बेकार है।”

     

    और इस तरह दादी माँ की सीख सिर्फ अयान तक सीमित नहीं रही।

     

    वह गाँव के कई बच्चों की जिंदगी का हिस्सा बन गई।

     

    क्योंकि कुछ लोग हमारे साथ हमेशा नहीं रहते, लेकिन उनकी दी हुई सीख हमारे साथ पूरी जिंदगी चलती है।

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    Auther preeti Sharma

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  • दुनियां से मेरा नाता

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    दुनिया से मेरा नाता

     

    एक छोटे से शहर में विहान नाम का एक लड़का रहता था। वह बहुत शांत स्वभाव का था। उसे भीड़ पसंद नहीं थी और वह अक्सर शहर की भागदौड़ से दूर नदी के किनारे जाकर बैठता था।

     

    लोग उसे देखकर कहते, “पता नहीं यह लड़का इतना चुप क्यों रहता है।”

     

    विहान बस मुस्कुरा देता।

     

    उसकी दादी अक्सर उससे पूछतीं, “बेटा, दुनिया से इतना दूर क्यों भागते हो?”

     

    विहान कहता, “दादी, दुनिया बहुत शोर करती है। मुझे शांति पसंद है।”

     

    दादी हँसकर कहतीं, “दुनिया से नाता तोड़कर शांति नहीं मिलती। दुनिया को समझकर जीना सीखो।”

     

    विहान उनकी बात सुनता, लेकिन पूरी तरह समझ नहीं पाता।

     

    एक दिन उसके पिता ने उसे शहर के बाजार में अपनी दुकान संभालने के लिए कहा।

     

    विहान को यह बिल्कुल पसंद नहीं था।

     

    “मैं दुकान पर बैठकर क्या करूँगा?”

     

    पिता बोले, “लोगों से मिलोगे, उनकी बातें सुनोगे और समझोगे कि जिंदगी सिर्फ अपने बारे में सोचने का नाम नहीं है।”

     

    अगले दिन से विहान दुकान पर बैठने लगा।

     

    पहले दिन ही एक बूढ़ा आदमी आया।

     

    उसने कुछ सामान खरीदा और पैसे देते समय उसके हाथ काँप रहे थे।

     

    विहान ने पूछा, “बाबा, आप ठीक हैं?”

     

    बूढ़े ने मुस्कुराकर कहा, “हाँ बेटा। उम्र हो गई है।”

     

    विहान ने सामान उनके घर तक पहुँचाने की बात कही।

     

    बूढ़े ने मना किया, लेकिन विहान उनके साथ चला गया।

     

    घर पहुँचकर उसे पता चला कि बूढ़ा आदमी अकेला रहता था।

     

    विहान ने पूछा, “आपके बच्चे?”

     

    बूढ़े ने कहा, “सब अपने-अपने शहर में हैं।”

     

    विहान को पहली बार महसूस हुआ कि किसी इंसान की मुस्कान के पीछे भी अकेलापन छिपा हो सकता है।

     

    कुछ दिनों बाद एक छोटी लड़की दुकान पर आई।

     

    उसके पास पैसे कम थे।

     

    वह चुपचाप एक कॉपी उठाकर खड़ी हो गई।

     

    विहान ने पूछा, “पैसे कम हैं?”

     

    लड़की ने सिर झुका लिया।

     

    “हाँ।”

     

    विहान ने उसे कॉपी दे दी।

     

    लड़की ने पूछा, “आप बाकी पैसे नहीं लेंगे?”

     

    विहान मुस्कुराया।

     

    “जब बड़े होकर कमाओ, तब किसी और की मदद कर देना।”

     

    लड़की खुशी से चली गई।

     

    उस दिन विहान देर तक सोचता रहा।

     

    उसे समझ आने लगा कि दुनिया सिर्फ शोर, भीड़ और परेशानी का नाम नहीं है।

     

    इस दुनिया में ऐसे लोग भी हैं जो बिना किसी स्वार्थ के दूसरों की मदद करते हैं।

     

    एक रात शहर में बहुत तेज बारिश हुई।

     

    नदी का पानी बढ़ने लगा।

     

    कई घरों में पानी घुस गया।

     

    विहान अपने पिता के साथ लोगों की मदद करने निकल पड़ा।

     

    जिस दुनिया से वह दूर रहना चाहता था, उसी दुनिया के लोग उस रात एक-दूसरे का सहारा बने हुए थे।

     

    कोई खाना बाँट रहा था।

     

    कोई बच्चों को सुरक्षित जगह ले जा रहा था।

     

    कोई बुजुर्गों को घर से बाहर निकाल रहा था।

     

    विहान ने देखा कि एक आदमी अपने पड़ोसी के घर से सामान निकालने में मदद कर रहा है, जबकि वह खुद भी मुश्किल में था।

     

    विहान ने पूछा, “आप पहले अपना घर क्यों नहीं देखते?”

     

    आदमी ने कहा, “अगर पड़ोसी का घर डूब गया तो मेरा घर भी सुरक्षित नहीं रहेगा।”

     

    यह बात विहान के दिल में उतर गई।

     

    अगली सुबह बारिश रुक गई।

     

    शहर को बहुत नुकसान हुआ था, लेकिन लोग एक-दूसरे के साथ खड़े थे।

     

    विहान नदी के किनारे गया।

     

    वह काफी देर तक पानी को देखता रहा।

     

    तभी दादी उसके पास आ गईं।

     

    उन्होंने पूछा, “अब भी दुनिया से दूर रहना चाहते हो?”

     

    विहान मुस्कुराया।

     

    “नहीं दादी।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि अब समझ आया है कि दुनिया सिर्फ बुरी चीजों से नहीं बनी। इसमें दुख है तो खुशी भी है, परेशानी है तो मदद करने वाले हाथ भी हैं।”

     

    दादी ने कहा, “अब तुम दुनिया को समझने लगे हो।”

     

    कुछ समय बाद विहान ने फैसला किया कि वह सिर्फ अपने परिवार के लिए नहीं, बल्कि अपने शहर के लिए भी कुछ करेगा।

     

    उसने अपने दोस्तों के साथ मिलकर एक छोटा-सा समूह बनाया। वे जरूरतमंद बच्चों को किताबें देते, बुजुर्गों की मदद करते और पेड़ लगाते।

     

    शुरुआत में लोग उनका मजाक उड़ाते थे।

     

    “तुम लोग दुनिया बदल दोगे क्या?”

     

    विहान हँसकर कहता, “पूरी दुनिया नहीं, लेकिन किसी एक इंसान की परेशानी जरूर कम कर सकते हैं।”

     

    धीरे-धीरे उनके साथ और लोग जुड़ते गए।

     

    वही शहर, जो विहान को पहले शोर से भरा लगता था, अब उसे अपनेपन से भरा महसूस होने लगा।

     

    एक दिन वही छोटी लड़की, जिसे उसने कॉपी दी थी, उसके पास आई।

     

    अब वह स्कूल की वर्दी में थी।

     

    उसने कहा, “भैया, मैंने आपकी बात याद रखी।”

     

    विहान ने पूछा, “क्या?”

     

    लड़की ने एक दूसरी गरीब बच्ची को कॉपी देते हुए कहा, “जब बड़े होकर कमाओ, तो किसी और की मदद करना।”

     

    विहान की आँखें खुशी से भर आईं।

     

    उसे लगा कि उसकी छोटी-सी मदद अब किसी और के जीवन में आगे बढ़ रही है।

     

    समय बीतता गया।

     

    विहान बड़ा हुआ और उसने शहर छोड़ने के बजाय वहीं रहने का फैसला किया।

     

    लोगों ने पूछा, “तुम बड़े शहर में जाकर ज्यादा पैसे कमा सकते थे।”

     

    विहान मुस्कुराया।

     

    “पैसा जरूरी है, लेकिन अपनेपन की कीमत भी होती है।”

     

    एक शाम वह उसी नदी के किनारे बैठा था, जहाँ वह बचपन में दुनिया से दूर भागकर आया करता था।

     

    अब वही नदी उसे अलग दिखाई दे रही थी।

     

    उसने धीरे से कहा—

     

    “मैं सोचता था दुनिया से मेरा कोई नाता नहीं। लेकिन अब समझ आया कि मेरा नाता तो हर उस इंसान से है जिसे मेरी मदद की जरूरत है।”

     

    उसके पीछे खड़े दादाजी मुस्कुरा रहे थे।

     

    विहान ने आसमान की तरफ देखा।

     

    उसे महसूस हुआ कि दुनिया कोई ऐसी जगह नहीं थी जिससे भागना जरूरी हो।

     

    दुनिया रिश्तों से बनी थी।

     

    किसी की मुस्कान में, किसी की परेशानी में, किसी की मदद में और किसी के भरोसे में।

     

    उस दिन उसने खुद से एक वादा किया—

     

    वह दुनिया की सारी परेशानियाँ ठीक नहीं कर सकता, लेकिन जहाँ तक उसके हाथ पहुँचेंगे, वहाँ तक किसी के लिए रोशनी जरूर बनेगा।

     

    और तभी उसे दादी की पुरानी बात पूरी तरह समझ आई—

     

    दुनिया से नाता तोड़कर इंसान अकेला हो जाता है, लेकिन दुनिया से जुड़कर वह किसी की जिंदगी का सहारा बन सकता है।

     

    विहान मुस्कुराया।

     

    अब उसे दुनिया से शिकायत नहीं थी।

     

    अब वह कह सकता था—

     

    “दुनिया से मेरा नाता है, क्योंकि इस दुनिया में मेरा अपना कोई एक नहीं… बल्कि हर अच्छा दिल मेरा अपना है।”

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    Auther preeti Sharma

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  • तुमसे वास्ता

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    मेरे तुमसे वास्ता

     

    शहर के एक छोटे से मोहल्ले में आरव नाम का लड़का रहता था। वह बहुत शांत और कम बोलने वाला था। उसके पड़ोस में नैना रहती थी। दोनों बचपन से एक-दूसरे को जानते थे, लेकिन उनकी दोस्ती धीरे-धीरे एक खास रिश्ते में बदल गई थी—ऐसा रिश्ता जिसमें बिना कहे भी बहुत कुछ समझ आ जाता था।

     

    नैना अक्सर आरव से कहती, “तुम इतने चुप क्यों रहते हो?”

     

    आरव मुस्कुराकर कहता, “क्योंकि तुम मेरी तरफ से भी बोल देती हो।”

     

    नैना हँस पड़ती।

     

    दोनों रोज शाम को मोहल्ले के पुराने पार्क में मिलते। कभी पढ़ाई की बातें होतीं, कभी भविष्य के सपने, और कभी बिना किसी खास वजह के घंटों बातें चलती रहतीं।

     

    एक दिन नैना ने पूछा, “अगर मैं कभी बहुत दूर चली गई तो?”

     

    आरव कुछ पल चुप रहा।

     

    फिर बोला, “तो भी तुमसे मेरा वास्ता रहेगा।”

     

    “कैसे?”

     

    “यादों से।”

     

    नैना ने हँसकर कहा, “बहुत फिल्मी हो।”

     

    आरव भी हँस पड़ा।

     

    लेकिन दोनों को नहीं पता था कि कुछ ही दिनों बाद यह बात उनके लिए सच बनने वाली थी।

     

    नैना के पिता का दूसरे शहर में तबादला हो गया। पूरे परिवार को वहाँ जाना था।

     

    नैना ने जब आरव को बताया तो उसकी आँखों में उदासी थी।

     

    “मुझे अगले हफ्ते जाना है।”

     

    आरव ने खुद को संभालते हुए पूछा, “इतनी जल्दी?”

     

    “हाँ।”

     

    कुछ देर दोनों चुप रहे।

     

    फिर नैना ने कहा, “तुम मुझे भूल तो नहीं जाओगे?”

     

    आरव ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं।”

     

    “वादा?”

     

    “वादा।”

     

    अगले हफ्ते नैना अपने परिवार के साथ चली गई।

     

    पार्क वही था, पेड़ वही थे, लेकिन आरव को सब कुछ खाली-खाली लगता था।

     

    वह रोज उसी बेंच पर बैठता जहाँ दोनों बैठा करते थे।

     

    कुछ महीने बीत गए।

     

    पहले दोनों फोन पर बात करते रहे, लेकिन धीरे-धीरे पढ़ाई और घर की जिम्मेदारियों के कारण बातचीत कम होने लगी।

     

    एक दिन आरव को नैना का संदेश मिला—

     

    “तुम ठीक हो?”

     

    आरव ने लिखा—

     

    “हाँ। तुम?”

     

    नैना ने जवाब दिया—

     

    “मैं भी।”

     

    बस इतनी-सी बात हुई।

     

    आरव फोन रखकर सोचने लगा कि कभी दोनों घंटों बातें करते थे, और आज दो शब्द भी मुश्किल से निकलते हैं।

     

    समय गुजरता गया।

     

    आरव ने पढ़ाई पूरी की और अपने पिता की छोटी-सी दुकान संभालने लगा।

     

    एक दिन दुकान पर एक बुजुर्ग महिला आईं।

     

    उन्होंने कुछ सामान खरीदा और जाते-जाते एक पुराना लिफाफा गिरा दिया।

     

    आरव ने लिफाफा उठाकर उन्हें दिया।

     

    महिला ने कहा, “बेटा, धन्यवाद। इसमें मेरे लिए बहुत जरूरी चीज है।”

     

    आरव ने पूछा, “क्या?”

     

    महिला मुस्कुराईं।

     

    “मेरे पति की पुरानी चिट्ठियाँ।”

     

    आरव ने पहली बार महसूस किया कि कुछ चीजों की कीमत पैसे से नहीं होती।

     

    उसी शाम उसे नैना की याद आई।

     

    उसने फोन उठाया, लेकिन कॉल नहीं किया।

     

    वह सोचने लगा, “शायद अब हमारे रास्ते अलग हैं।”

     

    कुछ दिनों बाद आरव के पास एक पत्र आया।

     

    पत्र नैना का था।

     

    उसने लिखा था कि उसके पिता की नौकरी फिर से बदल गई है और अब वह अपने पुराने शहर लौटने वाली है।

     

    आरव ने पत्र पढ़कर कई बार देखा।

     

    उसके मन में पुरानी यादें ताजा हो गईं।

     

    कुछ दिनों बाद नैना वापस आ गई।

     

    लेकिन इस बार वह पहले जैसी नहीं थी।

     

    वह अधिक समझदार और शांत हो गई थी।

     

    दोनों पार्क में मिले।

     

    नैना ने मुस्कुराकर कहा, “बहुत बदल गए हो।”

     

    आरव बोला, “तुम भी।”

     

    “मुझे लगा था तुम मुझे भूल गए।”

     

    “तुम्हें क्या लगता है, मैं इतना जल्दी भूल सकता हूँ?”

     

    नैना ने कुछ नहीं कहा।

     

    दोनों कुछ देर चुपचाप बैठे रहे।

     

    फिर नैना बोली, “तुम्हें याद है, मैंने पूछा था कि अगर मैं दूर चली गई तो?”

     

    आरव मुस्कुराया।

     

    “और मैंने कहा था—मेरे तुमसे वास्ता रहेगा।”

     

    नैना की आँखें नम हो गईं।

     

    “वो बात मुझे हमेशा याद रही।”

     

    आरव ने कहा, “लेकिन एक बात मैंने वहाँ से लौटकर समझी।”

     

    “क्या?”

     

    “रिश्ते सिर्फ रोज बात करने से नहीं बने रहते। अगर दिल में किसी की जगह सच्ची हो, तो दूरी भी उसे खत्म नहीं कर सकती।”

     

    नैना ने धीरे से कहा, “शायद इसी वजह से मैं वापस आकर सबसे पहले तुमसे मिलने आई।”

     

    दोनों के बीच फिर से दोस्ती की वही गर्माहट लौटने लगी।

     

    लेकिन इस बार वे पहले से ज्यादा समझदार थे।

     

    अब वे एक-दूसरे से हर दिन बात करने की जिद नहीं करते थे। जरूरत पड़ने पर एक-दूसरे का साथ देते थे।

     

    एक दिन आरव की दुकान में अचानक बड़ा नुकसान हो गया। वह बहुत परेशान था।

     

    नैना को पता चला तो उसने कहा, “तुम अकेले क्यों परेशान हो रहे हो?”

     

    आरव बोला, “मैं संभाल लूँगा।”

     

    नैना ने कहा, “मुझे पता है। लेकिन किसी अपने का साथ लेना कमजोरी नहीं होती।”

     

    उसने आरव के साथ मिलकर दुकान का हिसाब देखा। दोनों ने मिलकर नुकसान का कारण समझा और धीरे-धीरे दुकान फिर संभल गई।

     

    कुछ महीने बाद नैना को फिर दूसरे शहर में नौकरी का मौका मिला।

     

    इस बार उसने आरव से कहा, “मैं फिर जा रही हूँ।”

     

    आरव कुछ पल चुप रहा।

     

    नैना ने पूछा, “इस बार भी कहोगे कि हमारा वास्ता रहेगा?”

     

    आरव मुस्कुराया।

     

    “अब कहने की जरूरत नहीं है। हम दोनों जानते हैं।”

     

    नैना की आँखों में खुशी थी।

     

    “सच।”

     

    आरव बोला, “रिश्ता पास रहने से नहीं, भरोसे से चलता है।”

     

    नैना चली गई।

     

    लेकिन इस बार दोनों को डर नहीं था।

     

    वे जानते थे कि जिंदगी उन्हें जहाँ भी ले जाए, उनके बीच सम्मान, विश्वास और अपनापन बना रहेगा।

     

    कई साल बाद नैना फिर अपने शहर आई।

     

    वह सीधे उसी पुराने पार्क में गई।

     

    आरव पहले से वहाँ बैठा उसका इंतजार कर रहा था।

     

    नैना ने हँसकर पूछा, “तुम्हें कैसे पता मैं यहाँ आऊँगी?”

     

    आरव बोला, “कुछ जगहें हमें बुलाती नहीं, बस हमारा इंतजार करती हैं।”

     

    दोनों उसी पुरानी बेंच पर बैठ गए।

     

    नैना ने कहा, “कितना कुछ बदल गया।”

     

    आरव ने पेड़ों की तरफ देखते हुए कहा, “हाँ, लेकिन कुछ चीजें नहीं बदलीं।”

     

    “जैसे?”

     

    आरव ने उसकी तरफ देखकर कहा—

     

    “मेरे तुमसे वास्ता।”

     

    नैना मुस्कुरा दी।

     

    उसे अब समझ आ चुका था कि सच्चे रिश्तों को रोज साबित करने की जरूरत नहीं पड़ती।

     

    वे समय, दूरी और परिस्थितियों से गुजरकर और मजबूत होते हैं।

     

    उनकी कहानी किसी बड़े वादे या दिखावे की कहानी नहीं थी।

     

    वह बस दो ऐसे लोगों की कहानी थी, जिन्होंने एक-दूसरे की जिंदगी में जगह बनाई और फिर उस जगह का सम्मान करना सीखा।

     

    क्योंकि कुछ रिश्ते नाम से नहीं, एहसास से पहचाने जाते हैं। और जिनसे दिल का सच्चा वास्ता हो, उनसे दूरी चाहे जितनी हो जाए, रिश्ता कभी सच में दूर नहीं होता।

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