🔐 लॉग-इन या रजिस्टर करें  

” प्रेम : एक अधूरा अध्याय”

पढ़ने का समय : 6 मिनट

                    “प्रेम : एक अधूरा अध्याय “  

उसका नाम प्रेम था, हां मेरा वाला प्रेम, जो सिर्फ मेरा था, लोग कहते हैं अधूरा प्यार दर्द देता है, मैं हंसती थी उनकी बातों पर , जब तक प्रेम मुझे छोड़कर नहीं गया , 

मेरी पहली मुलाकात उससे हमारी काॅलोनी के शर्मा जी के यहां हुई थी, वहां मैंने पहली दफा उसे देखा था, वैसे तो और लोग भी शामिल थे वहां क्योंकि शर्मा जी ने अपने घर में सत्यनारायण भगवान की पूजा रखवाई थी और हमें सपरिवार आमंत्रित किया गया था, मैं अपने परिवार के साथ उनके यहां सम्मिलित हुई थी, वहीं वो मुझे मिला, पता करने से पहले ही उसने हमारे बारे में जानकारी ली उनसे, बाद में हमें पता चला कि वो शर्मा जी के रिश्ते में दूर का भतीजा लगता है , पूजा करते वक्त भी किसी गैर की नजरें खुद पर महसूस करते हुए मैंने नज़रें उठाई तो वो मुझे ही देखता मिला, जिससे मैं असहज महसूस करते हुए अपनी आंखों को बंद करते हुए पूजा में ध्यान लगाने लगी, थोड़ी देर में पूजा समाप्त हो गई और प्रसाद लेकर हम-सब घर वापस आ गए, 

वो मेरा ग्रेजुएशन का पहला साल था जिसकी वजह से मुझे खूब मेहनत करनी थी, मेरा पूरा ध्यान अपनी पढ़ाई पर लगा रहता था, मोबाइल फोन मेरे लिए सपने जैसा था, क्योंकि पापा ने कहा था कि पहले रिजल्ट अच्छा लाओ फिर मोबाइल फोन मिलेगा, घर में मोबाइल फोन भी मम्मी-पापा के पास ही था, हमें अनुमति नहीं थी,जब तक हम काबिल नहीं हो जाते, एक कारण मेरी पढ़ाई का ये भी था क्योंकि स्कूल में अपने सहपाठियों के पास देखा करती थी उसके फंक्शन और सैल्फि का पागलपन जो धीरे-धीरे मुझे अपनी ओर आकर्षित कर रहा था, खैर यह सब सोचते हुए मैं अपनी पढ़ाई कर रही थी तभी शर्मा जी की बेटी ” स्वीटी” उस लड़के को लेकर मेरे पास आई और जियोग्राफी के प्रोजेक्ट्स के बारे में मुझसे जानकारी लेने लगी, वो मेरी ही क्लास में पढ़ती थी लेकिन ध्यान नहीं देती थी, मेरी भी पड़ोसी होने के नाते मैं उसे प्रोजेक्ट्स दे दिया करती थी, उस शाम वह उसे लेकर आई और उसका नाम ” प्रेम ” है कहकर संबोधित करते हुए बोली ये मेरे दूर के भाई हैं कुछ दिन हमारे साथ ही रहेंगे, ” मैंने हाथ जोड़कर अभिवादन किया वो मुस्कुरा कर बोले – “हम सब हमउम्र है तो हाय हेलो से काम चल सकता है ” मैं अपनी बेवकूफी पर मुस्कुराई और बैठने को बोलकर हम बातों में मशगूल हो गए, सच कहूं ! तो ये जिंदगी का पहला अनुभव था कि किसी अंजान शख्स के साथ मैं इतनी जल्दी घुल-मिल गयी और मुझे अच्छा भी लगा, ऐसे ही धीरे धीरे हम दोनों आप से तुम तक आ गये, प्रेम भी मेरे साथ बहुत अच्छा व्यवहार करते थे और खुद आगे बढ़कर मेरे लिए कभी कभी कोई चाॅकलेट या टेडीबियर ले आते, मुझे यह सब अच्छा लगने लगा था, कि कोई ऐसा है जो मुझे एहमियत दे रहा है जो मुझे समझता है, पढ़ाई तो समझो जैसे भूल गयी मैं, वो रोज शाम को घर आते, मम्मी-पापा भी घुल मिल गए थे तो कोई दिक्कत नहीं थी, एक दिन ऐसे ही ये मुझे बाज़ार ले गए और एक कैफे में काॅफी पीते हुए प्रेम बोले – स्मृति देखो मैं जानता हूं ये बात तुम्हारे लिए अजीब सी है , लेकिन मैं अब अपने दिल की बात कहे बिना नहीं रह सकता, मैं सतर्क हो गई कि ये किस विषय में बात कर रहे हैं? , उन्होंने हिम्मत करके अचानक मेरा हाथ पकड़ लिया और बोले -” स्मृति! मैं तुमसे प्यार करता हूं, मैं नहीं जानता कबसे, लेकिन ये सच है मुझे तुम बहुत अच्छी लगती हो, तुम्हारी बातें, तुम्हारी ये मुस्कान, तुम्हारी ये प्यारी आंखें, मुझे तुम्हारी तरफ खिंचती है, मैं चाहकर भी तुम्हें नजरंदाज नहीं कर सकता, प्लीज़ मुझे अपना लो, उनकी बातें मेरे दिल दिमाग में असर कर रही थी, सच्चाई तो यह है कि मैं भी उन्हें पसंद करने लगी थी, लेकिन कहने की हिम्मत मुझमें नहीं थी, जब उन्होंने अपने जज्बात को मेरे सामने रखा तो मैं कुछ पल सुन्न हो गई फिर हौले से उन्होंने हाथ को दबाया तो मैं अपने होशोहवास में आईं और मुस्कुरा कर कहा – “प्रेम सच तो यह है कि मैं भी आपसे प्यार करती हूं, लेकिन कहने की हिम्मत नहीं हुई कभी ” ये सुनकर वो हल्के से मुस्कुराए और मेरे हाथों को अपने लबों तक ले गए और उन्हें चूम लिया, सच कहो तो एक अजीब सी हलचल मच गई मेरे बदन में, मैंने अपने हाथ खींच लिये वो मुस्कुरा कर मुझे देखते रहे और हम बातें करते हुए सपनों की उड़ान भरने लगे, उस समय मुझे जरा भी पता नहीं था कि ये सब मेरे लिए एक सपने जैसा हो जाएगा, हमारी नजदीकिया बढ़ने लगी और वो मुझे कभी कभी स्वीटी के साथ सिनेमाहॉल भी ले जाते मेरे परिवार से पूछकर, ऐसे ही खुशनुमा मेरे दिन बीत रहे थे, एक शाम प्रेम आए और बोले -” मुझे किसी काम से घर जाना है,हमारी जमीनी कार्यवाही कोर्ट में चल रही है, जिसके लिए मुझे पापा के साथ रहकर सारे कागजात देखने पड़ सकते हैं,हो सकता है मुझे वापस आने में कुछ दिन लग जाए, उनकी बातें सुनकर मेरी आंखों से आंसू निकलने लगे, उन्होंने प्यार से मेरा हाथ थामा और बोले -” स्मृति! तुमसे दूर रहकर मुझे भी अच्छा नहीं लगता लेकिन क्या करूं जाना जरूरी भी तो है, अगर तुम ऐसे रोओगी तो मैं कैसे जा पाऊंगा? प्लीज़ मुझे हंसते हंसते विदा करो, मैं वादा करता हूं जल्दी आने की कोशिश करुंगा, मैं भी उनकी बातों में आ गई और उन्हें मुस्कान बिखेरते हुए विदा किया, मेरा प्यार मेरा साथ मेरी आत्मा तक प्रेम अपने साथ ले गए थे,मेरा किसी चीज में मन नहीं लगता था, बहुत दिन हो गए और प्रेम वापस नहीं आये तो मैं स्वीटी के घर चली गई और बातों ही बातों में उनके बारे में पूछा, स्वीटी ने जो बताया उसे सुनकर मेरी आत्मा तक हिल गई, ऐसा कुछ मेरे साथ होगा 😔 मैंने सपने में भी नहीं सोचा था, उसने बताया कि प्रेम की बीवी प्रेगनेंट थी और उन्हें एक बेटा हुआ है, ये सुनते ही मेरे सपनों का संसार एक क्षण में धराशाई हो गया, प्रेम शादीशुदा थे यह मुझे पता नहीं था और ना ही कभी उन्होंने बताया, मैंने स्वीटी से भी कभी उनके जीवन के बारे में नहीं पूछा था तो किस मुंह से हमारे रिश्ते के बारे में उसे बताती, मैं बिखरी हुई सी किसी तरह अपने घर लौटी और कमरा बंद करके बिस्तर पर सिसकियां लेते हुए रोने लगी, ये कैसा प्यार था मेरा जो सपने सजाती आंखों से दिल में उतर गया और बेशुमार दर्द की अनुभूति दे गया, मैं शिकायत करूं भी तो किससे करुं, वो शख्स जो अजनबी बनकर मेरी जिंदगी में शामिल हुआ और दिल में घर कर गया था, मेरे हिस्से की आत्मा को घायल किया और चला गया, मेरा प्यार जिसे सबकुछ मान बैठी थी वहीं दगा दे गया, कड़वी सच्चाई को सामने रखा और प्रेम से मेरा भरोसा तोड़ दिया…

,

Comments

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *