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टैग: दर्द#प्यार

  • गरीब बहन की राखी

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    गरीब बहन की सबसे कीमती राखी

     

    “भैया, इस बार मेरी राखी थोड़ी सस्ती है… लेकिन इसमें प्यार पूरा है।”

     

    गुड़िया ने अपनी हथेली में रखी राखी को देखते हुए धीरे से कहा।

     

    राखी बहुत साधारण थी। कुछ रंगीन धागे थे, बीच में कागज से बना छोटा-सा फूल और किनारे पर दो मोती।

     

    बाजार से खरीदी हुई महंगी राखियों जैसी उसमें चमक नहीं थी।

     

    लेकिन उसे बनाने में गुड़िया ने अपनी पूरी रात लगा दी थी।

     

    उसका भाई मोहन शहर में एक छोटी-सी दुकान पर काम करता था। घर में मां और छोटी बहन गुड़िया ही थे।

     

    पिता का कई साल पहले निधन हो चुका था।

     

    मोहन ने तभी पढ़ाई छोड़ दी थी।

     

    उस समय गुड़िया बहुत छोटी थी।

     

    मोहन ने मां से कहा था,

     

    “आप चिंता मत करना। गुड़िया की पढ़ाई नहीं रुकेगी।”

     

    उस दिन से मोहन सुबह दुकान पर जाता और देर रात घर लौटता।

     

    गुड़िया पढ़ाई में बहुत अच्छी थी।

     

    वह हमेशा कहती,

     

    “भैया, एक दिन मैं बड़ी नौकरी करूंगी।”

     

    मोहन हंसकर कहता,

     

    “और तब मुझे काम नहीं करने देना।”

     

    गुड़िया तुरंत बोलती,

     

    “हां, सबसे पहले आपकी दुकान बंद करवाऊंगी।”

     

    दोनों हंस पड़ते।

     

    लेकिन इस साल घर की हालत पहले से ज्यादा खराब थी।

     

    माँ की दवाइयों का खर्च बढ़ गया था।

     

    मोहन कई दिनों से परेशान था।

     

    एक रात गुड़िया ने उसे मां की दवाइयों के बारे में दुकानदार से उधार मांगते हुए सुन लिया।

     

    “भाई, दो दिन का समय दे दो। पैसे मिलते ही दे दूंगा।”

     

    दुकानदार ने कहा,

     

    “मोहन, अब और उधार मुश्किल है।”

     

    गुड़िया चुपचाप कमरे में लौट आई।

     

    उसने अपनी छोटी-सी गुल्लक निकाली।

     

    गुल्लक तोड़ी।

     

    अंदर सिर्फ सत्ताईस रुपये थे।

     

    वह उन पैसों को देखकर उदास हो गई।

     

    “इनसे तो राखी भी नहीं आएगी।”

     

    फिर उसके मन में एक विचार आया।

     

    उसने पुराने धागे निकाले।

     

    दो मोती खोजे।

     

    एक पुराने गिफ्ट रैपर से कागज काटकर छोटा-सा फूल बनाया।

     

    और रातभर बैठकर अपने भाई के लिए राखी बना दी।

     

    अगली सुबह मोहन दुकान जाने लगा तो गुड़िया ने पूछा,

     

    “भैया, रक्षाबंधन पर छुट्टी मिलेगी?”

     

    मोहन ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “तेरे लिए तो छुट्टी लेनी पड़ेगी।”

     

    “सच?”

     

    “हां।”

     

    गुड़िया खुशी से बोली,

     

    “लेकिन मेरे पास आपके लिए बहुत महंगा गिफ्ट नहीं है।”

     

    मोहन ने उसके सिर पर हाथ रखा।

     

    “मुझे गिफ्ट नहीं चाहिए।”

     

    “तो क्या चाहिए?”

     

    “बस तू खुश रह।”

     

    गुड़िया मुस्कुरा दी।

     

    लेकिन उसी शाम घर में एक बड़ी परेशानी आ गई।

     

    माँ की तबीयत अचानक खराब हो गई।

     

    मोहन उन्हें अस्पताल ले गया।

     

    डॉक्टर ने कुछ जांचें लिख दीं।

     

    दवा और जांच का खर्च सुनकर मोहन परेशान हो गया।

     

    गुड़िया ने पूछा,

     

    “कितने पैसे चाहिए?”

     

    मोहन ने कहा,

     

    “तू इसकी चिंता मत कर।”

     

    लेकिन गुड़िया समझ गई कि पैसे बहुत ज्यादा हैं।

     

    उसने अपनी पढ़ाई की किताबों के बीच रखा एक लिफाफा निकाला।

     

    उसमें उसकी छात्रवृत्ति से बचाए हुए पैसे थे।

     

    उसने सारे पैसे मोहन को दे दिए।

     

    “ये ले लो।”

     

    मोहन ने हैरानी से पूछा,

     

    “ये कहां से आए?”

     

    “मेरी पढ़ाई के लिए थे।”

     

    “नहीं। ये मैं नहीं लूंगा।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि तेरी पढ़ाई ज्यादा जरूरी है।”

     

    गुड़िया ने उसकी आंखों में देखकर कहा,

     

    “भैया, आपने मेरी पूरी जिंदगी की चिंता की है। आज मुझे आपकी चिंता करने दीजिए।”

     

    मोहन चुप हो गया।

     

    अंततः इलाज हुआ।

     

    माँ कुछ दिनों में ठीक होने लगीं।

     

    लेकिन रक्षाबंधन का दिन आ गया।

     

    गुड़िया ने सुबह जल्दी उठकर पूजा की थाली सजाई।

     

    उसने वही साधारण राखी थाली में रखी।

     

    मोहन उसके सामने बैठा।

     

    गुड़िया ने तिलक लगाया।

     

    फिर राखी उठाई।

     

    “भैया, आंखें बंद करो।”

     

    मोहन ने आंखें बंद कर लीं।

     

    गुड़िया ने राखी उसकी कलाई पर बांध दी।

     

    मोहन ने आंखें खोलीं।

     

    राखी देखकर वह कुछ पल चुप रहा।

     

    “ये तूने बनाई?”

     

    गुड़िया ने सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

    “बहुत सुंदर है।”

     

    गुड़िया हंस पड़ी।

     

    “झूठ बोल रहे हो।”

     

    “बिल्कुल नहीं।”

     

    मोहन ने अपनी जेब से एक छोटा-सा डिब्बा निकाला।

     

    गुड़िया ने पूछा,

     

    “क्या है?”

     

    “तेरे लिए।”

     

    अंदर एक सुंदर-सी किताब थी।

     

    गुड़िया की आंखें चमक उठीं।

     

    “ये तो बहुत महंगी होगी।”

     

    मोहन मुस्कुराया।

     

    “तेरी किताबों से महंगी कोई चीज नहीं।”

     

    गुड़िया किताब को सीने से लगाकर बैठ गई।

     

    फिर उसने भाई की कलाई को देखा।

     

    “भैया, एक बात बताऊं?”

     

    “बोल।”

     

    “मैंने ये राखी बहुत सस्ते सामान से बनाई है।”

     

    “तो?”

     

    “लेकिन मेरे लिए ये सबसे महंगी राखी है।”

     

    मोहन ने पूछा,

     

    “क्यों?”

     

    गुड़िया ने धीरे से कहा,

     

    “क्योंकि इसे बनाते समय मैंने सोचा था कि अगर मेरे पास पैसे नहीं हैं, तो क्या हुआ… मेरे पास आपका प्यार तो है।”

     

    मोहन की आंखों में आंसू आ गए।

     

    उसने बहन का हाथ पकड़ लिया।

     

    “गुड़िया, तूने मुझे आज बहुत बड़ा गिफ्ट दिया है।”

     

    “क्या?”

     

    “ये याद दिलाया कि अमीर होने के लिए बहुत पैसे नहीं चाहिए।”

     

    गुड़िया मुस्कुराई।

     

    “फिर?”

     

    “बस घर में ऐसे लोग होने चाहिए, जो मुश्किल में साथ खड़े रहें।”

     

    तभी मां ने दोनों को पास बुलाया।

     

    उन्होंने राखी देखकर कहा,

     

    “मोहन, ये राखी संभालकर रखना।”

     

    मोहन ने कहा,

     

    “इसे कभी नहीं उतारूंगा।”

     

    गुड़िया हंसते हुए बोली,

     

    “कुछ दिन बाद तो धागा खुद टूट जाएगा।”

     

    मोहन ने उसकी तरफ देखकर कहा,

     

    “धागा टूटेगा… वादा नहीं।”

     

    साल बीतते गए।

     

    गुड़िया ने पढ़ाई पूरी की।

     

    उसे शहर के एक बड़े अस्पताल में नौकरी मिल गई।

     

    पहली तनख्वाह मिलने के बाद वह सीधे बाजार गई।

     

    उसने एक सुंदर डिब्बा खरीदा।

     

    घर आकर मोहन के सामने रखा।

     

    “भैया, ये आपके लिए।”

     

    मोहन ने डिब्बा खोला।

     

    अंदर एक महंगी घड़ी थी।

     

    वह चौंक गया।

     

    “इतने पैसे खर्च करने की क्या जरूरत थी?”

     

    गुड़िया मुस्कुराई।

     

    “याद है, आपने कहा था कि मैं बड़ी नौकरी करूंगी तो आपको काम नहीं करने दूंगी?”

     

    मोहन हंस पड़ा।

     

    “हां।”

     

    “तो अब दुकान बंद।”

     

    मोहन की आंखें भर आईं।

     

    “पगली…”

     

    गुड़िया ने उसकी कलाई पकड़ ली।

     

    उसकी नजर उस पुराने धागे पर पड़ी जो अब भी राखी के साथ बचा हुआ था।

     

    वह पूरी राखी नहीं थी।

     

    बस एक छोटा-सा धागा बचा था।

     

    गुड़िया ने पूछा,

     

    “आपने इसे अब तक संभालकर रखा?”

     

    मोहन ने कहा,

     

    “तूने कहा था ना, इसमें प्यार पूरा है।”

     

    गुड़िया की आंखों से आंसू निकल आए।

     

    उसने भाई को गले लगा लिया।

     

    उस दिन मोहन ने महसूस किया कि उसकी बहन ने उसे कोई महंगी घड़ी नहीं दी थी।

     

    उसने तो सालों पहले ही एक ऐसी राखी दे दी थी जिसकी कीमत पैसे से नहीं लगाई जा सकती थी।

     

    क्योंकि कुछ राखियां सोने-चांदी से नहीं बनतीं।

     

    वे बनती हैं छोटे-से धागे, सच्चे प्यार और उस भरोसे से…

     

    जो कहता है—

     

    “मुश्किल चाहे कितनी भी बड़ी हो, मैं तुम्हारा साथ कभी नहीं छोड़ूंगी।”

  • दोस्ती बेमिसाल

    दोस्ती बेमिसाल

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    दोस्ती का सबसे बड़ा तोहफ़ा

     

    एक छोटे से शहर में दो दोस्त रहते थे आरव और मोहन।

     

    दोनों की दोस्ती पूरे शहर में मिसाल थी। लेकिन उनकी ज़िंदगी एक-दूसरे से बिल्कुल अलग थी।

     

    आरव शहर के सबसे बड़े उद्योगपति का इकलौता बेटा था। उसके पास बड़ा बंगला, महंगी गाड़ियाँ, नौकर-चाकर और हर सुख-सुविधा थी। दूसरी ओर मोहन एक बेहद गरीब परिवार से था। उसके पिता दिहाड़ी मजदूर थे और माँ लोगों के घरों में काम करती थीं। कई बार तो उनके घर में दो वक्त का खाना भी मुश्किल से बन पाता था।

     

    लेकिन इन दोनों दोस्तों के बीच अमीरी और गरीबी की दीवार कभी नहीं आई।

     

    बचपन से दोनों साथ स्कूल जाते, साथ खेलते और साथ ही सपने देखते थे। अगर आरव के टिफिन में पनीर की सब्ज़ी होती और मोहन के पास सिर्फ सूखी रोटी, तो दोनों आधा-आधा बाँटकर खाते।

     

    स्कूल के बच्चे अक्सर मोहन का मज़ाक उड़ाते।

     

    “देखो, करोड़पति का दोस्त फटे कपड़ों में आया है।”

     

    लेकिन हर बार आरव उनके सामने खड़ा हो जाता।

     

    “अगर मेरे दोस्त का मज़ाक उड़ाया, तो समझ लेना मुझसे बुरा कोई नहीं होगा।”

     

    मोहन हमेशा मुस्कुराकर कहता,

    “यार, तू इतना क्यों लड़ता है?”

     

    आरव हँसकर जवाब देता,

    “दोस्ती निभाने के लिए लड़ना भी पड़ता है।”

     

    समय बीतता गया।

     

    स्कूल खत्म हुआ। आरव अपने पिता का कारोबार संभालने लगा, जबकि मोहन पढ़ाई छोड़कर मजदूरी करने लगा ताकि अपने बूढ़े माँ-बाप का सहारा बन सके।

     

    अब उनकी मुलाकातें कम होने लगीं, लेकिन दिलों की दूरी कभी नहीं बढ़ी।

     

    हर रविवार दोनों किसी चाय की दुकान पर बैठकर घंटों बातें करते।

     

    एक दिन अचानक सब कुछ बदल गया।

     

    आरव कई दिनों से थकान महसूस कर रहा था। उसका शरीर सूजने लगा था। परिवार उसे बड़े अस्पताल ले गया।

     

    जाँच हुई।

     

    रिपोर्ट देखकर डॉक्टर गंभीर हो गए।

     

    “हमें अफसोस है… आपकी दोनों किडनियाँ लगभग काम करना बंद कर चुकी हैं। इन्हें तुरंत किडनी ट्रांसप्लांट की जरूरत होगी।”

     

    यह सुनते ही पूरे परिवार के पैरों तले ज़मीन खिसक गई।

     

    आरव की माँ रोने लगीं।

     

    पिता ने तुरंत रिश्तेदारों से संपर्क किया।

     

    एक-एक करके सभी की जाँच हुई।

     

    लेकिन किसी का ब्लड ग्रुप नहीं मिला, कोई डर गया, किसी ने साफ़ मना कर दिया।

     

    जिन लोगों के लिए आरव के पिता ने लाखों रुपये खर्च किए थे, वही लोग अब बहाने बनाकर दूर हो गए।

     

    दिन बीतते जा रहे थे।

     

    आरव की हालत बिगड़ती जा रही थी।

     

    उसे हफ्ते में कई बार डायलिसिस करवाना पड़ता था।

     

    एक रात उसकी माँ अस्पताल के बाहर बैठकर रो रही थीं।

     

    उन्हें अचानक मोहन का ख्याल आया।

     

    उन्होंने किसी को बताए बिना अगले दिन मोहन के छोटे से घर का दरवाज़ा खटखटाया।

     

    मोहन ने दरवाज़ा खोला तो सामने आरव की माँ को देखकर घबरा गया।

     

    “आंटी… आप यहाँ?”

     

    उन्होंने अंदर आकर चारों तरफ देखा। टूटी चारपाई, मिट्टी का चूल्हा और साधारण-सा घर।

     

    उनकी आँखों से आँसू बह निकले।

     

    मोहन ने पानी दिया।

     

    “सब ठीक है ना?”

     

    कुछ पल चुप रहने के बाद उन्होंने काँपती आवाज़ में कहा,

     

    “बेटा… मैं आज एक माँ बनकर नहीं, अपने बेटे की दोस्ती का वास्ता लेकर आई हूँ।”

     

    मोहन समझ नहीं पाया।

     

    उन्होंने रोते हुए सारी बात बता दी।

     

    “आरव की दोनों किडनियाँ जवाब दे चुकी हैं… कोई भी उसे किडनी देने को तैयार नहीं है। डॉक्टर ने कहा है कि अगर जल्दी ट्रांसप्लांट नहीं हुआ तो…”

     

    उनकी आवाज़ भर्रा गई।

     

    कुछ देर बाद उन्होंने काँपते हाथ जोड़ दिए।

     

    “बेटा… अगर तुम्हारा ब्लड ग्रुप मिल जाए… तो क्या… क्या तुम अपने दोस्त के लिए एक किडनी दे दोगे?”

     

    यह सुनकर मोहन कुछ पल बिल्कुल शांत खड़ा रहा।

     

    उसने बिना एक पल सोचे कहा,

     

    “आंटी… आपने माँगने में देर कर दी। अगर मेरे दोस्त की जान बच सकती है, तो मेरी एक नहीं, दोनों किडनियाँ भी उसकी हैं।”

     

    आंटी रो पड़ीं।

     

    “नहीं बेटा… मुझे सिर्फ एक चाहिए।”

     

    मोहन मुस्कुराया।

     

    “दोस्ती में हिसाब नहीं होता।”

     

    अगले ही दिन चुपचाप उसकी जाँच हुई।

     

    रिपोर्ट आई।

     

    ब्लड ग्रुप भी मिला और सभी मेडिकल परीक्षण भी सफल रहे।

     

    डॉक्टर खुश हो गए।

     

    लेकिन मोहन ने एक शर्त रखी।

     

    “आरव को पता नहीं चलना चाहिए कि किडनी किसने दी है। अगर उसे पता चला तो वह कभी नहीं मानेगा।”

     

    परिवार ने उसकी बात मान ली।

     

    कुछ दिनों बाद ऑपरेशन हुआ।

     

    घंटों तक चले इस ऑपरेशन के बाद डॉक्टर बाहर आए और मुस्कुराकर बोले,

     

    “ऑपरेशन सफल रहा। अब दोनों खतरे से बाहर हैं।”

     

    पूरा परिवार खुशी से रो पड़ा।

     

    कुछ हफ्तों बाद आरव धीरे-धीरे ठीक होने लगा।

     

    लेकिन उसके मन में हमेशा एक सवाल रहता।

     

    “आख़िर वह कौन था जिसने मुझे नई ज़िंदगी दी?”

     

    हर बार डॉक्टर यही कहते,

     

    “जिसने दान किया, उसने अपना नाम गुप्त रखने की इच्छा जताई है।”

     

    एक दिन अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद आरव अपने दोस्त मोहन से मिलने उसके घर पहुँचा।

     

    मोहन पहले की तरह मुस्कुराकर मिला, लेकिन अब वह पहले से थोड़ा कमजोर लग रहा था।

     

    आरव ने पूछा,

     

    “तू इतना कमजोर क्यों हो गया?”

     

    मोहन हँस पड़ा।

     

    “अरे, बस काम ज्यादा कर लिया।”

     

    तभी मोहन की माँ से यह राज छिप न सका।

     

    उन्होंने भावुक होकर सब सच बता दिया।

     

    “बेटा… जिसने तुझे नई ज़िंदगी दी है… वो कोई और नहीं, मोहन है।”

     

    यह सुनते ही आरव जैसे पत्थर का हो गया।

     

    उसकी आँखों से आँसू बहने लगे।

     

    वह दौड़कर मोहन के गले लग गया।

     

    “पागल… तूने मुझे बताया क्यों नहीं?”

     

    मोहन मुस्कुराया।

     

    “अगर बता देता तो तू कभी मानता ही नहीं।”

     

    आरव फूट-फूटकर रो पड़ा।

     

    “मैं तेरे इस एहसान का कर्ज़ कभी नहीं चुका सकता।”

     

    मोहन ने उसके आँसू पोंछे।

     

    “दोस्ती में एहसान नहीं होते। अगर आज मेरी जगह तू होता, तो क्या तू मना कर देता?”

     

    आरव ने बिना सोचे सिर हिला दिया।

     

    “कभी नहीं।”

     

    दोनों दोस्त गले लगकर देर तक रोते रहे।

     

    कुछ महीनों बाद जब आरव पूरी तरह स्वस्थ हो गया, तब उसने पूरे परिवार को बुलाया।

     

    वहाँ मोहन और उसके माता-पिता भी मौजूद थे।

     

    सबके सामने आरव ने एक फाइल मोहन के हाथ में रखी।

     

    मोहन ने खोला तो उसके हाथ काँप गए।

     

    वह संपत्ति के कागज़ थे।

     

    आरव मुस्कुराकर बोला,

     

    “जिस दोस्त ने मुझे अपनी ज़िंदगी का हिस्सा दिया, उसके बिना मेरी दौलत भी अधूरी है।”

     

    मोहन ने तुरंत मना किया।

     

    “मुझे कुछ नहीं चाहिए।”

    आरव ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “यह कोई कीमत नहीं है… यह उस रिश्ते की इज़्ज़त है जिसने मुझे दूसरी ज़िंदगी दी है।”

    मोहन की आँखें भर आईं।

    उसने फाइल सीने से लगा ली, लेकिन उसके लिए सबसे बड़ी दौलत आज भी वही दोस्ती थी जो बचपन में आधी रोटी बाँटने से शुरू हुई थी।

     

    उस दिन आरव ने अपनी आधी जायदाद अपने गरीब दोस्त मोहन के नाम कर दी।

     

    कहते हैं, पैसा इंसान को अमीर बना सकता है, लेकिन सच्ची दोस्ती इंसान को सबसे बड़ा ख़ज़ाना दे देती है। जिस दोस्ती में न अमीरी दिखाई दे, न गरीबी, बल्कि सिर्फ़ अपनापन और त्याग हो वही दोस्ती दुनिया की सबसे अनमोल दौलत होती है।

  • ” प्रेम : एक अधूरा अध्याय”

    ” प्रेम : एक अधूरा अध्याय”

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

                        “प्रेम : एक अधूरा अध्याय “  

    उसका नाम प्रेम था, हां मेरा वाला प्रेम, जो सिर्फ मेरा था, लोग कहते हैं अधूरा प्यार दर्द देता है, मैं हंसती थी उनकी बातों पर , जब तक प्रेम मुझे छोड़कर नहीं गया , 

    मेरी पहली मुलाकात उससे हमारी काॅलोनी के शर्मा जी के यहां हुई थी, वहां मैंने पहली दफा उसे देखा था, वैसे तो और लोग भी शामिल थे वहां क्योंकि शर्मा जी ने अपने घर में सत्यनारायण भगवान की पूजा रखवाई थी और हमें सपरिवार आमंत्रित किया गया था, मैं अपने परिवार के साथ उनके यहां सम्मिलित हुई थी, वहीं वो मुझे मिला, पता करने से पहले ही उसने हमारे बारे में जानकारी ली उनसे, बाद में हमें पता चला कि वो शर्मा जी के रिश्ते में दूर का भतीजा लगता है , पूजा करते वक्त भी किसी गैर की नजरें खुद पर महसूस करते हुए मैंने नज़रें उठाई तो वो मुझे ही देखता मिला, जिससे मैं असहज महसूस करते हुए अपनी आंखों को बंद करते हुए पूजा में ध्यान लगाने लगी, थोड़ी देर में पूजा समाप्त हो गई और प्रसाद लेकर हम-सब घर वापस आ गए, 

    वो मेरा ग्रेजुएशन का पहला साल था जिसकी वजह से मुझे खूब मेहनत करनी थी, मेरा पूरा ध्यान अपनी पढ़ाई पर लगा रहता था, मोबाइल फोन मेरे लिए सपने जैसा था, क्योंकि पापा ने कहा था कि पहले रिजल्ट अच्छा लाओ फिर मोबाइल फोन मिलेगा, घर में मोबाइल फोन भी मम्मी-पापा के पास ही था, हमें अनुमति नहीं थी,जब तक हम काबिल नहीं हो जाते, एक कारण मेरी पढ़ाई का ये भी था क्योंकि स्कूल में अपने सहपाठियों के पास देखा करती थी उसके फंक्शन और सैल्फि का पागलपन जो धीरे-धीरे मुझे अपनी ओर आकर्षित कर रहा था, खैर यह सब सोचते हुए मैं अपनी पढ़ाई कर रही थी तभी शर्मा जी की बेटी ” स्वीटी” उस लड़के को लेकर मेरे पास आई और जियोग्राफी के प्रोजेक्ट्स के बारे में मुझसे जानकारी लेने लगी, वो मेरी ही क्लास में पढ़ती थी लेकिन ध्यान नहीं देती थी, मेरी भी पड़ोसी होने के नाते मैं उसे प्रोजेक्ट्स दे दिया करती थी, उस शाम वह उसे लेकर आई और उसका नाम ” प्रेम ” है कहकर संबोधित करते हुए बोली ये मेरे दूर के भाई हैं कुछ दिन हमारे साथ ही रहेंगे, ” मैंने हाथ जोड़कर अभिवादन किया वो मुस्कुरा कर बोले – “हम सब हमउम्र है तो हाय हेलो से काम चल सकता है ” मैं अपनी बेवकूफी पर मुस्कुराई और बैठने को बोलकर हम बातों में मशगूल हो गए, सच कहूं ! तो ये जिंदगी का पहला अनुभव था कि किसी अंजान शख्स के साथ मैं इतनी जल्दी घुल-मिल गयी और मुझे अच्छा भी लगा, ऐसे ही धीरे धीरे हम दोनों आप से तुम तक आ गये, प्रेम भी मेरे साथ बहुत अच्छा व्यवहार करते थे और खुद आगे बढ़कर मेरे लिए कभी कभी कोई चाॅकलेट या टेडीबियर ले आते, मुझे यह सब अच्छा लगने लगा था, कि कोई ऐसा है जो मुझे एहमियत दे रहा है जो मुझे समझता है, पढ़ाई तो समझो जैसे भूल गयी मैं, वो रोज शाम को घर आते, मम्मी-पापा भी घुल मिल गए थे तो कोई दिक्कत नहीं थी, एक दिन ऐसे ही ये मुझे बाज़ार ले गए और एक कैफे में काॅफी पीते हुए प्रेम बोले – स्मृति देखो मैं जानता हूं ये बात तुम्हारे लिए अजीब सी है , लेकिन मैं अब अपने दिल की बात कहे बिना नहीं रह सकता, मैं सतर्क हो गई कि ये किस विषय में बात कर रहे हैं? , उन्होंने हिम्मत करके अचानक मेरा हाथ पकड़ लिया और बोले -” स्मृति! मैं तुमसे प्यार करता हूं, मैं नहीं जानता कबसे, लेकिन ये सच है मुझे तुम बहुत अच्छी लगती हो, तुम्हारी बातें, तुम्हारी ये मुस्कान, तुम्हारी ये प्यारी आंखें, मुझे तुम्हारी तरफ खिंचती है, मैं चाहकर भी तुम्हें नजरंदाज नहीं कर सकता, प्लीज़ मुझे अपना लो, उनकी बातें मेरे दिल दिमाग में असर कर रही थी, सच्चाई तो यह है कि मैं भी उन्हें पसंद करने लगी थी, लेकिन कहने की हिम्मत मुझमें नहीं थी, जब उन्होंने अपने जज्बात को मेरे सामने रखा तो मैं कुछ पल सुन्न हो गई फिर हौले से उन्होंने हाथ को दबाया तो मैं अपने होशोहवास में आईं और मुस्कुरा कर कहा – “प्रेम सच तो यह है कि मैं भी आपसे प्यार करती हूं, लेकिन कहने की हिम्मत नहीं हुई कभी ” ये सुनकर वो हल्के से मुस्कुराए और मेरे हाथों को अपने लबों तक ले गए और उन्हें चूम लिया, सच कहो तो एक अजीब सी हलचल मच गई मेरे बदन में, मैंने अपने हाथ खींच लिये वो मुस्कुरा कर मुझे देखते रहे और हम बातें करते हुए सपनों की उड़ान भरने लगे, उस समय मुझे जरा भी पता नहीं था कि ये सब मेरे लिए एक सपने जैसा हो जाएगा, हमारी नजदीकिया बढ़ने लगी और वो मुझे कभी कभी स्वीटी के साथ सिनेमाहॉल भी ले जाते मेरे परिवार से पूछकर, ऐसे ही खुशनुमा मेरे दिन बीत रहे थे, एक शाम प्रेम आए और बोले -” मुझे किसी काम से घर जाना है,हमारी जमीनी कार्यवाही कोर्ट में चल रही है, जिसके लिए मुझे पापा के साथ रहकर सारे कागजात देखने पड़ सकते हैं,हो सकता है मुझे वापस आने में कुछ दिन लग जाए, उनकी बातें सुनकर मेरी आंखों से आंसू निकलने लगे, उन्होंने प्यार से मेरा हाथ थामा और बोले -” स्मृति! तुमसे दूर रहकर मुझे भी अच्छा नहीं लगता लेकिन क्या करूं जाना जरूरी भी तो है, अगर तुम ऐसे रोओगी तो मैं कैसे जा पाऊंगा? प्लीज़ मुझे हंसते हंसते विदा करो, मैं वादा करता हूं जल्दी आने की कोशिश करुंगा, मैं भी उनकी बातों में आ गई और उन्हें मुस्कान बिखेरते हुए विदा किया, मेरा प्यार मेरा साथ मेरी आत्मा तक प्रेम अपने साथ ले गए थे,मेरा किसी चीज में मन नहीं लगता था, बहुत दिन हो गए और प्रेम वापस नहीं आये तो मैं स्वीटी के घर चली गई और बातों ही बातों में उनके बारे में पूछा, स्वीटी ने जो बताया उसे सुनकर मेरी आत्मा तक हिल गई, ऐसा कुछ मेरे साथ होगा 😔 मैंने सपने में भी नहीं सोचा था, उसने बताया कि प्रेम की बीवी प्रेगनेंट थी और उन्हें एक बेटा हुआ है, ये सुनते ही मेरे सपनों का संसार एक क्षण में धराशाई हो गया, प्रेम शादीशुदा थे यह मुझे पता नहीं था और ना ही कभी उन्होंने बताया, मैंने स्वीटी से भी कभी उनके जीवन के बारे में नहीं पूछा था तो किस मुंह से हमारे रिश्ते के बारे में उसे बताती, मैं बिखरी हुई सी किसी तरह अपने घर लौटी और कमरा बंद करके बिस्तर पर सिसकियां लेते हुए रोने लगी, ये कैसा प्यार था मेरा जो सपने सजाती आंखों से दिल में उतर गया और बेशुमार दर्द की अनुभूति दे गया, मैं शिकायत करूं भी तो किससे करुं, वो शख्स जो अजनबी बनकर मेरी जिंदगी में शामिल हुआ और दिल में घर कर गया था, मेरे हिस्से की आत्मा को घायल किया और चला गया, मेरा प्यार जिसे सबकुछ मान बैठी थी वहीं दगा दे गया, कड़वी सच्चाई को सामने रखा और प्रेम से मेरा भरोसा तोड़ दिया…

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  • निगाहें👀उनकी भी चेहरे से हटती नही..❤️

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    वो आँखों से यूँ शरारत करती है….💖अपनी अदा से भी कयामत करती है,,,निगाहें👀 उनकी भी चेहरे से हटती नही….💖और वो हमारी नजरों से शिकायत करती है।।❤️🔵🔵🔴🔴❤️❤️❤️🔴❤️🔵🔴🔵❤️

  • “👉 संगिनी “💖

    पढ़ने का समय : 4 मिनट

    बरसात की हल्की-हल्की फुहारें शहर की सड़कों को जैसे कोई पुराना गीत सुना रही थीं। हवा में मिट्टी की सोंधी खुशबू घुली हुई थी, और उसी खुशबू के बीच खड़ा था आरव—अपनी छतरी को थामे, जैसे किसी का इंतज़ार कर रहा हो।

    वो इंतज़ार किसी साधारण व्यक्ति का नहीं था, बल्कि उसकी “संगिनी” का था—मीरा।

    मीरा… एक नाम, जो उसके दिल में धड़कनों की तरह बस गया था।

    आरव और मीरा की मुलाकात कोई फिल्मी अंदाज़ में नहीं हुई थी। न कोई टकराना, न कोई किताब गिरना। उनकी कहानी शुरू हुई थी एक साधारण-सी लाइब्रेरी में, जहाँ दोनों किताबों के बीच अपने-अपने ख्वाब ढूंढने आते थे।

    पहली बार जब आरव ने मीरा को देखा था, वो खिड़की के पास बैठी थी। बारिश की बूंदें कांच पर गिर रही थीं, और वो अपनी डायरी में कुछ लिख रही थी। उसके चेहरे पर एक अजीब-सी शांति थी, जैसे वो इस दुनिया में होते हुए भी कहीं और हो।

    आरव ने कई बार चाहा कि वो उससे बात करे, लेकिन हर बार कुछ न कुछ उसे रोक देता। शायद झिझक, या शायद डर कि कहीं वो उस खूबसूरत खामोशी को तोड़ न दे।

    लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था।

    एक दिन, मीरा की डायरी अचानक उसके हाथ से गिर गई। आरव पास ही खड़ा था, उसने तुरंत डायरी उठाकर उसे दी।

    “थैंक यू,” मीरा ने मुस्कुराते हुए कहा।

    उस मुस्कान में कुछ ऐसा था, जिसने आरव के दिल को छू लिया।

    “तुम… रोज़ यहां आती हो?” आरव ने हिम्मत जुटाकर पूछा।

    मीरा ने हल्का-सा सिर हिलाया, “हाँ, ये जगह मुझे सुकून देती है।”

    उस दिन से शुरू हुई उनकी बातचीत धीरे-धीरे दोस्ती में बदल गई।

    दोनों घंटों साथ बैठते, किताबों पर चर्चा करते, और कभी-कभी बस चुपचाप खिड़की से बाहर गिरती बारिश को देखते रहते।

    मीरा को कविताएं लिखना पसंद था, और आरव को उन कविताओं को पढ़ना।

    “तुम्हारी कविताओं में इतनी गहराई क्यों होती है?” एक दिन आरव ने पूछा।

    मीरा ने मुस्कुराते हुए कहा, “क्योंकि हर शब्द में एक अधूरी कहानी छुपी होती है।”

    आरव को ये जवाब हमेशा सोच में डाल देता।

    धीरे-धीरे, उसे एहसास होने लगा कि मीरा सिर्फ उसकी दोस्त नहीं रही। वो उसकी आदत बन गई थी। उसकी हर सुबह, हर शाम, हर ख्वाब में बस मीरा ही थी।

    लेकिन मीरा… वो हमेशा थोड़ी रहस्यमयी रहती।

    कभी बहुत करीब, तो कभी अचानक दूर।

    एक दिन, जब बारिश हो रही थी, दोनों लाइब्रेरी से बाहर निकले।

    “चलो, आज बिना छतरी के भीगते हैं,” मीरा ने अचानक कहा।

    आरव हैरान था, “तुम्हें बारिश पसंद है?”

    “बहुत… क्योंकि ये हर दर्द को धो देती है,” मीरा ने आसमान की ओर देखते हुए कहा।

    दोनों भीगते हुए सड़क पर चलते रहे। उस दिन, पहली बार आरव ने मीरा का हाथ पकड़ा।

    मीरा ने उसे नहीं रोका।

    उस पल में, जैसे समय ठहर गया था।

    लेकिन हर खूबसूरत कहानी में एक मोड़ जरूर आता है।

    कुछ दिनों बाद, मीरा अचानक लाइब्रेरी आना बंद कर दी।

    आरव हर दिन उसका इंतज़ार करता, लेकिन वो नहीं आई।

    उसने फोन किया, मैसेज किए—लेकिन कोई जवाब नहीं।

    उसकी दुनिया जैसे थम गई थी।

    एक दिन, आखिरकार उसे मीरा का एक मैसेज मिला—

    “मुझसे मिलने मत आना… ये हमारी आखिरी बात है।”

    आरव के हाथ कांप गए।

    “क्यों?” उसने तुरंत जवाब दिया।

    लेकिन कोई जवाब नहीं आया।

    दिन बीतते गए, और आरव अंदर से टूटता गया।

    उसे समझ नहीं आ रहा था कि मीरा ने ऐसा क्यों किया।

    आखिरकार, उसने तय किया कि वो सच्चाई जानकर ही रहेगा।

    वो मीरा के घर पहुंचा।

    दरवाजा उसकी माँ ने खोला।

    “तुम आरव हो?” उन्होंने पूछा।

    “जी…”

    उनकी आंखों में आंसू थे।

    “मीरा… अब इस शहर में नहीं है,” उन्होंने धीमे से कहा।

    आरव का दिल जैसे रुक गया।

    “क्या मतलब?”

    उन्होंने उसे अंदर बुलाया और एक डायरी उसके हाथ में दी।

    “ये उसने तुम्हारे लिए छोड़ी है।”

    आरव ने कांपते हाथों से डायरी खोली।

    उसमें लिखा था—

    “आरव,

    अगर तुम ये पढ़ रहे हो, तो इसका मतलब है कि मैं तुमसे बहुत दूर जा चुकी हूं।

    मैंने तुम्हें सच नहीं बताया… क्योंकि मैं तुम्हें खोना नहीं चाहती थी।

    मुझे एक गंभीर बीमारी है, और मेरे पास ज्यादा समय नहीं है।

    मैं नहीं चाहती थी कि तुम मुझे इस हालत में देखो।

    तुम्हारी जिंदगी में सिर्फ खुशियां होनी चाहिए, दर्द नहीं।

    तुम मेरी सबसे खूबसूरत याद हो… और हमेशा रहोगे।

    तुम्हारी संगिनी,

    मीरा।”

    हर शब्द के साथ आरव की आंखों से आंसू गिरते गए।

    अब उसे समझ आया कि मीरा क्यों दूर हो गई थी।

    लेकिन अब बहुत देर हो चुकी थी।

    कुछ महीनों बाद…

    वही लाइब्रेरी, वही खिड़की, वही बारिश।

    आरव अकेला बैठा था, हाथ में मीरा की डायरी लिए।

    वो हर दिन वहां आता, जैसे मीरा अब भी वहीं बैठी हो।

    उसने धीरे से डायरी खोली और एक नई कविता लिखी—

    “तुम गई नहीं हो,

    तुम यहीं कहीं हो…

    हर बारिश की बूंद में,

    हर खामोशी के सुकून में।

    तुम मेरी संगिनी थी,

    हो… और हमेशा रहोगी।”

    उसने खिड़की से बाहर देखा।

    बारिश अब भी हो रही थी।

    और उस बारिश में, उसे ऐसा लगा जैसे मीरा मुस्कुरा रही हो।

    क्योंकि कुछ प्यार कहानियां खत्म नहीं होतीं…

    वो बस यादों में बदल जाती हैं—हमेशा के लिए।