अध्याय 14 — पेटी में बंद आखिरी निशानी
“कृष्ण?”
सुदामा ने घबराकर बाहर देखा।
आँगन बिल्कुल शांत था।
हवा तक जैसे थम गई थी।
उन्होंने कुछ कदम बाहर बढ़ाए।
“कृष्ण… अगर तुम सच में हो, तो सामने आओ।”
कोई उत्तर नहीं मिला।
पीछे खड़ा वृद्ध धीरे से बोला,
“सुदामा जी, शायद आपको भ्रम हुआ है।”
सुदामा ने उसकी ओर देखा।
“नहीं… वह आवाज मैंने पहचानी थी।”
वृद्ध कुछ नहीं बोला।
सुदामा वापस कमरे में आए और लकड़ी की पेटी के सामने बैठ गए।
उन्होंने अपनी हथेली पेटी पर रखी।
“कृष्ण, अगर तुमने इसे मेरे लिए छोड़ा है… तो अब मुझे सच जानना है।”
उन्होंने पेटी खोल दी।
अंदर कपड़े में लिपटी एक छोटी-सी वस्तु रखी थी।
सुदामा ने उसे धीरे से उठाया।
कपड़ा हटाते ही उनकी आँखें भर आईं।
वह एक पुरानी लकड़ी की बांसुरी थी।
सुदामा उसे देखते ही पहचान गए।
“ये तो…”
वृद्ध ने पूछा,
“पहचान गए?”
सुदामा ने सिर हिलाया।
“हाँ। ये कृष्ण की बांसुरी है।”
वह बांसुरी उनके हाथों में काँप रही थी।
“लेकिन ये यहाँ कैसे?”
वृद्ध ने धीरे से कहा,
“कृष्ण इसे यहीं छोड़ गए थे।”
“कब?”
“बहुत साल पहले।”
सुदामा ने बांसुरी को ध्यान से देखा।
उस पर एक छोटा-सा निशान बना था।
उन्होंने उँगली से उस निशान को छुआ।
और अचानक उन्हें सब कुछ थोड़ा-थोड़ा याद आने लगा।
गुरुकुल की वही आखिरी शाम।
सूरज ढल रहा था।
कृष्ण और सुदामा आश्रम के पीछे बैठे थे।
कृष्ण के हाथ में यही बांसुरी थी।
सुदामा ने उस समय पूछा था,
“कृष्ण, तुम द्वारका जाओगे तो मुझे भूल तो नहीं जाओगे?”
कृष्ण हँसे थे।
“तुम्हें भूलना इतना आसान है क्या?”
सुदामा भी हँसे थे।
फिर कृष्ण कुछ देर चुप हो गए।
उन्होंने बांसुरी सुदामा के हाथ में रख दी।
“इसे रख लो।”
सुदामा ने कहा,
“मैं इसे क्या करूँगा?”
कृष्ण बोले,
“जब भी तुम्हें लगे कि मैं तुमसे दूर हूँ, इसे देख लेना।”
सुदामा की आँखों से आँसू बहने लगे।
“लेकिन मैंने तो इसे कभी लिया ही नहीं…”
वह अचानक रुक गए।
याद पूरी नहीं थी।
कृष्ण ने शायद उसके बाद कुछ कहा था।
सुदामा ने आँखें बंद कर लीं।
“कृष्ण… मुझे याद करने दो।”
काफी देर तक वह शांत बैठे रहे।
फिर अचानक उनके चेहरे पर हैरानी आ गई।
“हाँ!”
वृद्ध ने पूछा,
“क्या याद आया?”
सुदामा ने धीरे से कहा,
“उस दिन कृष्ण ने मुझसे कहा था…”
वह कुछ पल रुके।
“अगर कभी ऐसा समय आए जब तुम्हें लगे कि तुम्हारे पास देने के लिए कुछ नहीं बचा… तब भी किसी जरूरतमंद को खाली हाथ मत लौटाना।”
वृद्ध ध्यान से सुन रहा था।
सुदामा की आवाज भर्रा गई।
“मैंने उससे पूछा था—मैं खुद गरीब हुआ तो दूसरों की मदद कैसे करूँगा?”
फिर सुदामा मुस्कुराए।
“कृष्ण ने कहा था—धन से नहीं, मन से मदद करना।”
कमरे में कुछ पल सन्नाटा रहा।
वृद्ध की आँखें भी नम हो गईं।
सुदामा ने बांसुरी को सीने से लगा लिया।
“तो यही था वो वादा…”
लेकिन तभी उन्हें कुछ और याद आया।
उनका चेहरा अचानक गंभीर हो गया।
“नहीं…”
वृद्ध ने पूछा,
“क्या हुआ?”
सुदामा ने कहा,
“कृष्ण ने उस दिन मुझसे एक और बात कही थी।”
“क्या?”
“उसने कहा था कि एक दिन मैं इस गुरुकुल में वापस आऊँगा।”
वृद्ध ने धीरे से सिर हिलाया।
“हाँ।”
सुदामा ने चौंककर उसकी तरफ देखा।
“तुम्हें कैसे पता?”
वृद्ध ने पेटी के नीचे हाथ डाला और एक पुराना कागज निकाला।
“क्योंकि कृष्ण ने ये भी छोड़ा था।”
सुदामा ने कागज लिया।
उस पर सिर्फ एक वाक्य लिखा था—
“जब सुदामा लौटे, तो उसे वह जगह दिखाना जहाँ हमने पहली बार अपना वादा किया था।”
सुदामा ने चारों ओर देखा।
“कौन-सी जगह?”
वृद्ध ने कोई जवाब नहीं दिया।
वह कमरे से बाहर निकल गया।
“मेरे पीछे आइए।”
सुदामा बांसुरी और कागज लेकर उसके पीछे चल पड़े।
वृद्ध उन्हें गुरुकुल के पीछे एक पुराने पेड़ के पास ले गया।
पेड़ अब बहुत बड़ा हो चुका था।
उसकी जड़ों के पास जमीन पर पत्थरों से बना एक छोटा-सा निशान था।
वृद्ध ने कहा,
“यहीं बैठते थे तुम दोनों।”
सुदामा नीचे बैठ गए।
उन्होंने पेड़ के तने को छुआ।
और उनकी याद फिर लौट आई।
कृष्ण और सुदामा वहाँ बैठे थे।
कृष्ण ने मिट्टी पर अपनी उँगली से कुछ लिखा था।
सुदामा ने पूछा था,
“ये क्या है?”
कृष्ण ने कहा था,
“वादा।”
“कैसा वादा?”
कृष्ण मुस्कुराए थे।
“जब हम बड़े हो जाएंगे, तब चाहे हमारी जिंदगी कितनी भी बदल जाए… हम किसी ऐसे इंसान को अकेला नहीं छोड़ेंगे जिसे हमारी जरूरत हो।”
सुदामा की साँस जैसे रुक गई।
“मैंने… ये वादा किया था।”
वृद्ध ने कहा,
“और कृष्ण ने इसे कभी नहीं भुलाया।”
सुदामा ने पूछा,
“तो फिर उसने मुझे इतने सालों तक क्यों नहीं बताया?”
वृद्ध मुस्कुराया।
“शायद क्योंकि उसे भरोसा था कि आपको खुद याद आएगा।”
सुदामा की आँखों से आँसू गिर पड़े।
उन्होंने बांसुरी को देखा।
“कृष्ण… तुमने मेरी गरीबी नहीं देखी।”
वह मुस्कुराए।
“तुमने मेरा दिल देखा।”
उसी समय पीछे से घोड़े के आने की आवाज सुनाई दी।
वृद्ध ने पलटकर देखा।
एक व्यक्ति घोड़े से उतर रहा था।
उसके हाथ में द्वारका की मुहर लगी हुई थी।
वह सीधे सुदामा के पास आया।
“क्या आप सुदामा हैं?”
“हाँ।”
उसने एक पत्र आगे बढ़ाया।
“ये आपके लिए है।”
सुदामा ने पत्र लिया।
मुहर देखकर उनका दिल तेज धड़कने लगा।
वह कृष्ण का पत्र था।
सुदामा ने काँपते हाथों से पत्र खोलना शुरू किया।
लेकिन पत्र पढ़ने से पहले ही उनकी नजर आखिरी पंक्ति पर पड़ गई।
वहाँ लिखा था—
“सुदामा, अब तुम्हें वह करना है जिसका वादा हमने उस दिन किया था।”
सुदामा की आँखें फैल गईं।
“लेकिन करना क्या है?”
दूत ने उनकी तरफ देखा।
“यही बताने के लिए मुझे भेजा गया है।”
सुदामा ने पत्र कसकर पकड़ लिया।
दूत ने कहा—
“द्वारका में एक व्यक्ति तुम्हारा इंतजार कर रहा है।”
सुदामा चौंक गए।
“कौन?”
दूत ने जवाब दिया,
“जिसे देखकर आपको अपने पुराने वादे का आखिरी हिस्सा याद आ जाएगा।”
सुदामा कुछ समझ नहीं पाए।
लेकिन उनके मन में एक बात साफ हो चुकी थी।
कृष्ण ने सिर्फ अतीत याद कराने के लिए उन्हें गुरुकुल नहीं बुलाया था।
वह चाहते थे कि सुदामा अब अपने उस पुराने वादे को पूरा करें।
लेकिन वह वादा किसके लिए था?
और द्वारका में उनका इंतजार कौन कर रहा था?
क्रमशः…


