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अंजानी चाहत

पढ़ने का समय : 8 मिनट

अंजानी चाहत

 

सुबह की पहली किरण जब खिड़की से छनकर कमरे में घुसी, तब अर्णव की आँखें खुल गईं। उसने बिस्तर पर करवट बदली और छत की ओर देखा। सपना अभी भी आँखों के सामने घूम रहा था—एक अजनबी चेहरा, एक मुस्कान, और एक आवाज़ जो उसके नाम को ऐसे पुकार रही थी जैसे वह सदियों से उसे जानती हो। अर्णव ने माथा सहलाया। पिछले कई महीनों से यही सपना बार-बार आ रहा था। कोई चेहरा साफ़ नहीं दिखता था, सिर्फ़ एक धुँधली सी आकृति, और एक तीव्र चाहत जो छाती में चुभती थी।

 

अर्णव दिल्ली के एक साधारण से अपार्टमेंट में रहता था। वह एक ग्राफ़िक डिज़ाइनर था, दिन भर कंप्यूटर के सामने बैठा रहता, और रातें नींद की कमी से गुज़रतीं। उसकी ज़िंदगी में कुछ ख़ास नहीं था—न कोई गहरा रिश्ता, न कोई बड़ा सपना। सिर्फ़ एक अजीब सी ख़ालीपन, एक अनजानी चाहत जो कभी-कभी इतनी तेज़ हो जाती कि वह रात भर जागता रहता।

 

उस दिन वह काम पर नहीं जा सका। मन बेचैन था। उसने कॉफ़ी बनाई, बालकनी में खड़ा होकर शहर को देखा। नीचे सड़क पर लोग भागते-दौड़ते दिख रहे थे, जैसे कोई मंज़िल हो उनके पास। अर्णव सोचने लगा—मेरी मंज़िल कहाँ है? क्या मैं किसी को खो चुका हूँ जिसे मैं जानता तक नहीं?

 

शाम को उसने फैसला किया कि वह बाहर निकलेगा। पुरानी दिल्ली की गलियों में घूमना उसे हमेशा शांत करता था। चाँदनी चौक की भीड़, मसाले की खुशबू, रिक्शों की घंटी—ये सब उसे ज़िंदा महसूस कराते थे। वह जामा मस्जिद के पास पहुँचा, सीढ़ियों पर बैठ गया। आसमान में सूरज डूब रहा था, आसमान लाल-नारंगी हो रहा था। तभी उसकी नज़र एक लड़की पर पड़ी।

 

वह सफ़ेद सलवार कमीज़ में थी, बाल खुले हुए, और हाथ में एक पुरानी किताब। वह सीढ़ियों के दूसरी तरफ़ बैठी थी, किताब में डूबी हुई। अर्णव की साँस रुक गई। वह चेहरा… सपने वाला चेहरा नहीं था, लेकिन कुछ ऐसा था जो उसके अंदर की बेचैनी को और तेज़ कर गया। लड़की ने सिर उठाया, और उनकी नज़रें मिलीं। एक पल के लिए समय रुक गया। फिर उसने मुस्कुरा दिया—हल्की सी, शर्मीली सी मुस्कान।

 

अर्णव ने हिम्मत जुटाई और पास गया। “माफ़ कीजिए… क्या आप यहाँ अकेली हैं?”

 

लड़की ने किताब बंद की। “हाँ। मैं अक्सर यहाँ आती हूँ। शांति मिलती है।”

 

“मेरा नाम अर्णव है।”

 

“मैं दृष्टि।”

 

दृष्टि। नाम सुनते ही अर्णव के मन में कुछ हिला। जैसे कोई पुरानी याद जाग उठी हो। उन्होंने बातचीत शुरू की। दृष्टि एक लाइब्रेरियन थी, पुरानी किताबों से प्यार करती थी। अर्णव ने बताया कि वह डिज़ाइनर है। बातें होती रहीं—किताबों की, शहर की, अकेलेपन की। सूरज डूब चुका था, लेकिन वे उठना नहीं चाहते थे।

 

“क्या आपको कभी लगता है कि आप किसी को ढूँढ रहे हैं जिसे आपने कभी देखा ही नहीं?” अर्णव ने अचानक पूछ लिया।

 

दृष्टि ने उसकी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी। “हाँ… बहुत बार। जैसे कोई अधूरा सपना हो जो बार-बार याद आता है।”

 

उस रात अर्णव घर लौटा तो नींद नहीं आई। दृष्टि का चेहरा उसकी आँखों के सामने घूम रहा था। वह चाहत जो पहले धुँधली थी, अब साफ़ होने लगी थी। अगले दिन वह फिर उसी जगह गया। दृष्टि वहाँ थी। फिर अगले दिन भी। धीरे-धीरे उनकी मुलाक़ातें नियमित हो गईं। वे पुरानी दिल्ली की गलियों में घूमते, चाय पीते, किताबों की दुकानों में घंटों बिताते।

 

एक शाम दृष्टि ने कहा, “अर्णव, मुझे लगता है मैं तुम्हें पहले से जानती हूँ। जैसे कोई पुरानी कहानी हो।”

 

अर्णव की धड़कन तेज़ हो गई। “मुझे भी। मेरे सपनों में एक चेहरा आता है… और जब मैंने तुम्हें देखा, तो वह चाहत और तेज़ हो गई।”

 

वे दोनों चुप हो गए। हवा में कोई अनकही बात तैर रही थी। दृष्टि ने अपना हाथ अर्णव के हाथ पर रखा। “शायद हमने पहले भी एक-दूसरे को खोया है।”

 

उनकी दोस्ती प्यार में बदलने लगी। अर्णव पहली बार किसी के इतना क़रीब महसूस कर रहा था। दृष्टि की हँसी, उसकी बात करने का अंदाज़, यहाँ तक कि उसके बालों की खुशबू—सब कुछ जाना-पहचाना लग रहा था। एक रात वे यमुना किनारे बैठे थे। चाँद चमक रहा था। अर्णव ने दृष्टि का हाथ पकड़ा।

 

“दृष्टि… मैं तुमसे प्यार करता हूँ। लेकिन यह प्यार साधारण नहीं लगता। जैसे यह किसी और जन्म से चला आ रहा हो।”

 

दृष्टि की आँखें नम हो गईं। “मैं भी… लेकिन मुझे डर लगता है। जैसे यह खुशी अस्थायी हो।”

 

उसके बाद के दिन खुशियों भरे थे। वे साथ घूमते, फ़िल्में देखते, रात भर बातें करते। अर्णव का अकेलापन ख़त्म हो रहा था। लेकिन साथ ही एक अजीब सी बेचैनी भी बढ़ रही थी। उसके सपने और तीव्र हो गए थे। अब सपने में चेहरा साफ़ दिखने लगा था—दृष्टि का ही चेहरा, लेकिन पुराने ज़माने के कपड़ों में। एक महल, एक बगीचा, और फिर आग… चीखें… बिछड़ना।

 

एक रात अर्णव चीखते हुए जागा। पसीने से लथपथ। उसने फ़ोन उठाया और दृष्टि को कॉल किया।

 

“क्या हुआ?” दृष्टि की नींद भरी आवाज़ आई।

 

“सपना… फिर से। तुम जल रही थी… मैं तुम्हें बचा नहीं पाया।”

 

दृष्टि चुप रही। फिर धीरे से बोली, “अर्णव, मेरे भी ऐसे ही सपने आते हैं। मैंने कभी किसी को नहीं बताया। लगता है हम किसी पुरानी त्रासदी के हिस्से हैं।”

 

अगले दिन वे मिले। दृष्टि ने एक पुरानी डायरी निकाली। “यह मेरी दादी की थी। उन्होंने कहा था कि हमारे परिवार में एक कहानी चलती आ रही है… दो प्रेमियों की, जो कभी मिल नहीं पाए। एक राजकुमारी और एक साधारण सिपाही। महल में आग लग गई थी, और वे दोनों मर गए। लेकिन कहा जाता है कि उनकी आत्माएँ अब भी एक-दूसरे को ढूँढती हैं।”

 

अर्णव की साँस रुक गई। “क्या तुम सोचती हो… हम वही हैं?”

 

दृष्टि ने सिर हिलाया। “मुझे नहीं पता। लेकिन जब मैं तुम्हें देखती हूँ, तो लगता है जैसे सदियों का इंतज़ार ख़त्म हो गया हो।”

 

उनकी चाहत और गहरी हो गई। लेकिन साथ ही एक डर भी। जैसे किस्मत फिर से उन्हें अलग करने वाली हो। अर्णव ने दृष्टि से शादी का प्रस्ताव रखा। दृष्टि रो पड़ी, लेकिन हाँ कह दी।

 

शादी की तैयारियाँ शुरू हुईं। दोनों परिवार खुश थे। लेकिन अर्णव के अंदर की बेचैनी बढ़ती जा रही थी। सपने अब सिर्फ़ रात को नहीं, दिन में भी आते थे। वह कभी-कभी दृष्टि को देखकर घबरा जाता—जैसे वह फिर से खो जाएगी।

 

एक दिन, शादी से एक हफ़्ता पहले, अर्णव को एक पुराना पत्र मिला। कोई अनजान पता था। पत्र में लिखा था—

 

“तुम फिर मिल गए हो। लेकिन इस बार भी समय कम है। आग फिर लगेगी। बचा लो उसे, वरना चाहत फिर अधूरी रह जाएगी।”

 

अर्णव काँप उठा। उसने दृष्टि को बताया। दोनों डरे हुए थे, लेकिन उन्होंने एक-दूसरे का हाथ थाम लिया। “हम इस बार नहीं हारेंगे,” दृष्टि ने कहा।

 

शादी का दिन आ गया। मंडप सजा था, मेहमान आए थे। अर्णव और दृष्टि फेरे ले रहे थे। अचानक कहीं से धुआँ उठने लगा। किसी ने चीख दी—“आग!” तंबू में आग लग गई थी। लोग भागने लगे। अर्णव ने दृष्टि का हाथ पकड़ा और बाहर निकाला। लेकिन भीड़ में वे बिछड़ गए।

 

अर्णव पागलों की तरह उसे ढूँढ रहा था। धुआँ चारों तरफ़ था। तभी उसने देखा—दृष्टि एक कोने में फँसी हुई थी, आग उसके क़रीब पहुँच रही थी। अर्णव बिना सोचे दौड़ा। उसने दृष्टि को गोद में उठाया और बाहर निकाला। दोनों सुरक्षित थे, लेकिन अर्णव के हाथ जल गए थे।

 

हॉस्पिटल में दृष्टि उसके बिस्तर के पास बैठी थी। आँखों में आँसू। “तुमने मुझे बचा लिया… इस बार।”

 

अर्णव मुस्कुराया, दर्द के बावजूद। “अब कोई आग हमें अलग नहीं कर सकती।”

 

डॉक्टरों ने कहा कि जलन ठीक हो जाएगी। लेकिन उस रात अर्णव को फिर सपना आया। इस बार सपना अलग था। कोई आग नहीं थी। सिर्फ़ एक बगीचा, फूल, और दृष्टि मुस्कुरा रही थी। एक आवाज़ गूँजी—“अब तुम्हारी चाहत पूरी हो गई। इस जन्म में रहो, प्यार करो, और अगले जन्म की चिंता मत करो।”

 

अर्णव जागा। कमरे में दृष्टि बैठी थी, उसका हाथ थामे हुए। “सपना अच्छा था?” उसने पूछा।

 

अर्णव ने उसके हाथ को चूमा। “हाँ। अब कोई अनजानी चाहत नहीं रही। सब कुछ जाना-पहचाना है।”

 

उसके बाद की ज़िंदगी शांत और खुशहाल रही। अर्णव और दृष्टि ने एक छोटा सा घर लिया, पुरानी दिल्ली के पास। वे किताबें पढ़ते, साथ चाय पीते, और कभी-कभी जामा मस्जिद की सीढ़ियों पर बैठकर शहर को देखते। अर्णव के हाथ के निशान रह गए, लेकिन वे निशान अब दर्द नहीं, बल्कि एक याद थे—कि इस बार उन्होंने भाग्य को हरा दिया था।

 

साल बीतते गए। उनके बच्चे हुए। घर में हँसी-खुशी भरी रही। लेकिन कभी-कभी रात में, जब चाँद चमकता, तो अर्णव और दृष्टि एक-दूसरे की आँखों में देखते और मुस्कुरा देते। जैसे कोई पुरानी कहानी याद आ गई हो, जो अब पूरी हो चुकी थी।

 

एक दिन, बहुत साल बाद, अर्णव बूढ़ा हो चुका था। वह बालकनी में बैठा था। दृष्टि उसके पास आई, सिर उसके कंधे पर रख दिया।

 

“अर्णव, क्या तुम्हें अब भी लगता है कि हम पहले मिले थे?”

 

अर्णव ने उसकी तरफ़ देखा। आँखों में वही चमक थी जो पहली मुलाक़ात में थी। “हाँ। और मैं जानता हूँ कि हम फिर मिलेंगे। लेकिन इस बार, जब भी मिलें, कोई आग नहीं होगी। सिर्फ़ प्यार होगा।”

 

दृष्टि मुस्कुराई। “अंजानी चाहत अब जानी-पहचानी हो गई है।”

 

हवा में पुरानी खुशबू तैर रही थी—मसाले की, किताबों की, और एक प्यार की जो जन्मों से चला आ रहा था। अर्णव ने आँखें बंद कीं। उसके मन में अब कोई बेचैनी नहीं थी। सिर्फ़ एक शांति, एक पूर्णता।

 

और कहीं दूर, स

मय की धारा में, दो आत्माएँ मुस्कुरा रही थीं। क्योंकि उनकी अनजानी चाहत आख़िरकार पूरी हो गई थी।

 

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