🔐 लॉग-इन या रजिस्टर करें  

टैग: प्यार दर्द रोमांच

  • Dil sabhal ja jara part – 1

    Dil sabhal ja jara part – 1

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    Part – 1 khoi Hui pahchan 

    हिमाचल की ऊंची पहाड़ियों के बीच बसा छोटा सा कस्बा था, जहां सर्दियों में कोहरा इतना घना होता कि दिन में भी रात जैसा लगता। इसी कस्बे के बाहरी इलाके में एक पुराना अनाथ आश्रम था – “संत जोसेफ बालिका आश्रम”। इमारत पुरानी थी, दीवारें जगह-जगह से सीलन खा चुकी थीं, और छत पर टपकती बारिश की बूंदें रात-रात भर संगीत बजाती रहतीं।

    उस रात भी बारिश हो रही थी। तेज़ हवा खिड़कियों को हिला रही थी, और बूंदें छत से टप-टप करके नीचे गिर रही थीं। प्रिया अपनी पतली सी कंबल ओढ़े बिस्तर पर लेटी थी। उसकी आंखें बंद थीं, लेकिन नींद नहीं आ रही थी। उसके दिमाग में बस एक ही सवाल घूम रहा था – आज स्कॉलरशिप का रिजल्ट आएगा। अगर मिल गई तो शिमला के बड़े कॉलेज में एडमिशन हो जाएगा। अगर नहीं मिली तो… तो फिर यही आश्रम, यही पुरानी किताबें, यही छोटी सी दुनिया।

    प्रिया अठारह साल की थी। लंबी, पतली, गेहुंआ रंग, और आंखें इतनी बड़ी कि लगता था सारी उदासी उनमें समा गई हो। आश्रम की पचास लड़कियों में वो सबसे स्मार्ट थी। टॉप करती थी हर एग्जाम में, लेकिन सबसे चुप भी थी। वो कभी शोर नहीं मचाती, कभी शिकायत नहीं करती। बस पढ़ती रहती। किताबें उसकी सबसे अच्छी दोस्त थीं।

    “प्रिया… उठ ना बेटी, सुबह की प्रेयर हो रही है,” सुलेखा आंटी की धीमी लेकिन प्यार भरी आवाज़ आई। सुलेखा आंटी आश्रम की वार्डन थीं। पचास के करीब उम्र, लेकिन चेहरा इतना शांत कि देखते ही मन को सुकून मिलता। प्रिया उनके लिए मां थीं – असली मां नहीं, लेकिन उससे कहीं ज्यादा।

    प्रिया ने धीरे से कंबल हटाई और उठ बैठी। कमरे में दस बिस्तर थे, दस लड़कियां सो रही थीं। वो सबसे कोने वाले बिस्तर पर सोती थी, खिड़की के पास। उसे खिड़की से बाहर देखना अच्छा लगता था। पहाड़, पेड़, कोहरा – सब कुछ इतना शांत।

    वो उठी, जल्दी से चेहरा धोया। ठंडा पानी चेहरे पर पड़ते ही सिहरन हुई। फिर अपनी छोटी सी अलमारी खोली। अलमारी में बस तीन सलवार-कमीज, दो स्वेटर, और एक डायरी थी। वो डायरी निकाली। उसमें सिर्फ एक पेज भरा हुआ था। बाकी पेज खाली थे, जैसे उसकी जिंदगी।

    उस पेज पर एक पुरानी फोटो चिपकी थी। फोटो में एक चार-पांच साल की छोटी लड़की थी, गुलाबी फ्रॉक पहने, किसी बड़े बगीचे में झूला झूल रही थी। बगीचे में फूलों की क्यारियां थीं, दूर एक बड़ा सा बंगला दिख रहा था। लड़की हंस रही थी, लेकिन उसकी आंखें… प्रिया की आंखें। फोटो के नीचे किसी ने पेंसिल से लिखा था – “तेरा नाम प्रिया है, लेकिन ये घर तेरा नहीं रहा।”
    ये फोटो प्रिया को तेरह साल पहले मिली थी। जब वो पांच साल की थी, तब किसी ने आश्रम के गेट पर उसे छोड़ दिया था। साथ में बस ये फोटो और एक छोटा सा सोने का पेंडेंट था – एक अनोखा डिजाइन, जिस पर “P” लिखा था। पेंडेंट अब भी उसके गले में था। वो कभी नहीं उतारती थी।

    प्रिया ने फोटो को छुआ। उंगलियां कांप रही थीं। “मैं कौन हूं?” ये सवाल उसके अंदर इतना गहरा था कि कभी-कभी रातों में नींद उड़ा देता। आश्रम की बाकी लड़कियां भी अनाथ थीं, लेकिन कम से कम उन्हें याद था कि उनके माता-पिता कैसे थे, कैसे मरे। प्रिया को कुछ याद नहीं। बस एक धुंधली सी याद – किसी की गोद, किसी की लोरी, और फिर अंधेरा।

    “प्रिया, देर हो रही है,” सुलेखा आंटी ने फिर पुकारा। प्रिया ने डायरी बंद की और प्रेयर रूम की ओर चल दी। प्रेयर रूम छोटा सा था, दीवार पर यीशु की तस्वीर, और नीचे सब लड़कियां घुटनों पर बैठी थीं। प्रिया भी बैठ गई। प्रेयर शुरू हुई। सुलेखा आंटी ने बाइबिल से एक वचन पढ़ा – “भगवान तुम्हें कभी अकेला नहीं छोड़ता।”
    प्रिया ने आंखें बंद कीं। मन ही मन प्रार्थना की – “भगवान, आज स्कॉलरशिप मिल जाए। मुझे बाहर की दुनिया देखनी है। मुझे अपनी पहचान ढूंढनी है।”
    प्रेयर के बाद नाश्ता। सादा – रोटी, आलू की सब्जी, और चाय। प्रिया ने जल्दी-जल्दी खाया और स्कूल के लिए निकल पड़ी। स्कूल आधा किलोमीटर दूर था। रास्ते में बारिश रुक चुकी थी, लेकिन कीचड़ था। प्रिया ने अपने पुराने जूते सावधानी से रखे। जूते फटने की कगार पर थे।
    स्कूल में आज आखिरी पेपर था – इंग्लिश। प्रिया ने अच्छा लिखा। पेपर देकर जब बाहर निकली तो दिल तेज़ धड़क रहा था। अब बस रिजल्ट का इंतज़ार। स्कूल से लौटते वक्त वो आश्रम के पुराने लैंडलाइन के पास रुकी। आश्रम में सिर्फ एक फोन था, वो भी वार्डन रूम में।

    लेकिन स्कॉलरशिप का रिजल्ट ईमेल पर आने वाला था। प्रिया ने सुलेखा आंटी से कहा था कि वो चेक कर लें।
    आश्रम पहुंचते ही वो सीधे वार्डन रूम में गई। सुलेखा आंटी कंप्यूटर पर थीं – पुराना कंप्यूटर, जो कभी-कभी हैंग हो जाता।

    “आंटी… रिजल्ट?” प्रिया की आवाज़ कांपी।
    सुलेखा आंटी ने मुस्कुराते हुए स्क्रीन घुमाई। वहां लिखा था – “Congratulations, Priya Sharma. You have been selected for full scholarship at Shimla Women’s College. Admission confirmed.”

    प्रिया की आंखें भर आईं। वो चीखना चाहती थी, कूदना चाहती थी, लेकिन बस खड़ी रह गई। सुलेखा आंटी ने उसे गले लगा लिया। “बधाई हो बेटी। तूने कर दिखाया।”
    प्रिया ने रोते हुए कहा, “आंटी… मैं जा रही हूं ना? सच में?”

    “हां बेटी। अगले हफ्ते से सेशन शुरू। तुझे हॉस्टल मिल जाएगा।”
    शाम को आश्रम में उत्सव सा माहौल था। लड़कियां इकट्ठी हुईं। किसी ने गाना गाया, किसी ने नाच दिखाया। छोटी मीरा – दस साल की नटखट लड़की – प्रिया के पास आई और बोली, “प्रिया दीदी, तुम कॉलेज जाओगी तो हमें भूल मत जाना। तुम तो स्टार बनोगी ना? डॉक्टर या इंजीनियर?”

    प्रिया ने मीरा को गोद में उठाया और कहा, “नहीं भूलूंगी। और स्टार तो तुम सब बनोगी। मैं बस पढ़ने जा रही हूं।”
    लेकिन अंदर से प्रिया उदास थी। आश्रम उसकी दुनिया था। यहां सब उसे जानते थे, प्यार करते थे। बाहर की दुनिया? वो नहीं जानती थी। वहां लोग कैसे होंगे? क्या वो उसे अपनाएंगे? एक अनाथ लड़की को, जिसके पास न फैमिली है, न बैकग्राउंड।

    रात को सब सो गए। प्रिया फिर खिड़की के पास बैठी। उसने पेंडेंट को छुआ। सोने की चेन ठंडी थी। “मां… पापा… तुम कहां हो?” उसने मन ही मन पूछा। फोटो फिर निकाली। उस बगीचे को देखा। वो घर… क्या वो उसका था कभी? क्यों छोड़ा गया उसे?
    सुलेखा आंटी रात को उसके पास आईं। “सो नहीं रही?”
    “नहीं आंटी। डर लग रहा है।”

    “डर तो लगेगा बेटी। नई जगह, नए लोग। लेकिन याद रख, तेरी ताकत तेरे अंदर है। तेरी पहचान बाहर के लोग नहीं बताएंगे। तू खुद ढूंढेगी।”
    प्रिया ने सिर हिलाया। लेकिन दिल में सवाल फिर गूंजा – अगर पहचान ही खो गई तो कैसे ढूंढूंगी?

    अगले कुछ दिन तैयारी में बीते। कपड़े सिले गए – दो नई सलवार-कमीज। किताबें पैक की गईं। सुलेखा आंटी ने कुछ पैसे दिए – अपनी सेविंग से। “खर्चा करना बेटी।”
    आखिरकार वो दिन आया। सुबह-सुबह बस स्टेशन। प्रिया का बैग छोटा सा था – दो जोड़ी कपड़े, एक स्वेटर, कुछ किताबें, डायरी, और वो फोटो। सुलेखा आंटी और सारी लड़कियां छोड़ने आईं। मीरा रो रही थी। “दीदी मत जाओ।”

    प्रिया ने सबको गले लगाया। सुलेखा आंटी की आंखें भी नम थीं। “ज्यादा मत सोचना बेटी। बस पढ़ाई पर ध्यान देना। और हफ्ते में एक फोन जरूर करना।”
    बस आई। प्रिया चढ़ी। खिड़की से हाथ हिलाया। बस चली। आश्रम पीछे छूटता गया। पहाड़ियां आगे बढ़ती गईं। शिमला की ओर। नई जिंदगी की ओर।
    बस में प्रिया खिड़की सीट पर थी। बाहर का नजारा देख रही थी। पेड़, नदियां, गांव। दिल में उत्साह था, लेकिन डर भी। तभी उसका फोन बजा। आश्रम में फोन नहीं था, लेकिन सुलेखा आंटी ने एक पुराना नोकिया दिया था – सिर्फ कॉल के लिए।

    अनजान नंबर से फोन आया, प्रिया ने हेलो कहा।
    दूसरी तरफ से एक भारी, डरी हुई आवाज़ आई – “प्रिया? तुम्हें याद है वो रात? जिस रात तुम्हें छोड़ा गया था? कॉलेज मत जाना। आना मत शिमला। वरना… वरना सब खतरे में पड़ जाएगा।”

    आवाज़ कट गई। प्रिया का फोन हाथ से छूटते-छूटते बचा। दिल ज़ोरों से धड़क रहा था। कौन था वो? कैसे जानता था उसका नाम? वो रात… कौन सी रात?
    बस आगे बढ़ रही थी। शिमला करीब आ रहा था। लेकिन अब प्रिया को लगा – उसका नया सफर खुशी का नहीं, खतरे का शुरुआत है।

     

  • आखिरी कॉल

    आखिरी कॉल

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    दिल्ली की तेज़-तर्रार ज़िंदगी में हर रोज़ नए किस्से और कहानियाँ घटित होती हैं। मोहिनी एक साधारण सी लड़की थी, जो एक मल्टीनेशनल कंपनी में काम करती थी। उसकी ज़िंदगी में एक खास इंसान था – सूरज। सूरज उसके कॉलेज का साथी था, जो उसके लिए केवल एक दोस्त नहीं, बल्कि जीवन के हर उतार-चढ़ाव में उसका सहारा था।

     

    दोनों की दोस्ती धीरे-धीरे प्यार में बदल गई। मोहिनी को सूरज की मुस्कान और उसकी बातें बेहद पसंद थीं, और सूरज को मोहिनी की समझदारी और उसकी मासूमियत। लेकिन जीवन के ताने-बाने ने उनके रास्ते में कांटे बिखेर दिए। सूरज को विदेश में पढ़ाई के लिए मौके मिले, और इस नए सफर में उसे भारत छोड़ना पड़ा।

     

    मोहिनी और सूरज ने दूरियों के बावजूद अपने रिश्ते को बनाए रखने की कोशिश की। रात में लंबे फोन कॉल, वीडियो चेट और संदेशों के माध्यम से वे एक-दूसरे के साथ जुड़े रहे। लेकिन समय बीतने के साथ-साथ सूरज की नई ज़िंदगी में बदलाव आने लगे। वह नए लोगों से मिला, नई जगहों पर घूमने लगा, और धीरे-धीरे वह उस प्यार को भूलने लगा, जो कभी उसके लिए बहुत महत्वपूर्ण था।

     

    एक दिन मोहिनी ने सूरज से फोन पर बातें की। लेकिन सूरज का व्यवहार कुछ बदल गया था। उसके अंदर एक दूरी का एहसास था, जो मोहिनी ने पहले कभी महसूस नहीं किया था। मोहिनी ने कई बार उसे समझाने की कोशिश की कि प्यार समय और दूरी की सीमाओं से ऊपर है, पर सूरज की आंखों में चिंगारी नहीं थी। मोहिनी का दिल टूट रहा था, पर वह अपनी भावनाओं को छिपाने की कोशिश कर रही थी।

     

    एक दिन, सूरज ने मोहिनी को एक कॉल किया। वह हलका-फुलका था, लेकिन मोहिनी की नज़र में कुछ और ही था। “हाय मोहिनी, कैसे हो?” सूरज ने पूछा। “मैं ठीक हूं, और तुम?” मोहिनी ने मन में अपने डर छिपाते हुए जवाब दिया। “मैं भी ठीक हूँ, लेकिन सुनो, मुझे तुमसे कुछ ज़रूरी बात करनी है।”

     

    आखिरी कॉल की यह स्थिति एक भयानक सपने की तरह थी। सूरज ने कहा, “मोहिनी, मैं तुमसे सच बताना चाहता हूँ।” मोहिनी के दिल की धड़कन तेज़ हो गई। “क्या हुआ सूरज?” उसने पूछा। सूरज ने गहरी सांस ली और कहा, “मैंने एक नई जिंदगी शुरू की है, और मुझे लगता है कि हमें अब अलग हो जाना चाहिए।”

     

    मोहिनी के चेहरे पर एक ठंडी लहर दौड़ गई। उसने महसूस किया कि सूरज ने अपने ज़िंदगी में उसे पीछे छोड़ दिया है। “लेकिन सूरज, क्या तुम मुझे एक मौका नहीं दोगे? हम इसे फिर से ठीक कर सकते हैं,” उसने नम आँखों से कहा। “मैं जानता हूं मोहिनी, लेकिन ये सच है कि मैं अब तुमसे वो एहसास नहीं कर पा रहा हूँ।” सूरज की आवाज़ में कोई सच्चाई जरूर थी, लेकिन वह खुद को किसी मोड़ पर रोक नहीं पाया। 

     

    वह आखिरी कॉल मोहिनी के लिए एक भयानक सच के सामने आने वाला था। सूरज ने उसे कहा, “तुम हमेशा मेरी ज़िंदगी में खास रहोगी, लेकिन मैं तुम्हें तकलीफ नहीं देना चाहता। मैं चाहता हूं कि तुम अपने जीवन में आगे बढ़ो।” मोहिनी की आँखों से आँसू गिरने लगे। जैसे ही सूरज ने कॉल खत्म किया, मोहिनी को लगा जैसे उसका दिल टूट गया हो।

     

    वह उस कॉल के बाद अनिश्चितता में जीने लगी। उसने खुद को अपने रिश्ते की यादों में खो दिया। किसी ने कहा था कि प्यार कभी खत्म नहीं होता, लेकिन वह जानती थी कि यह सच नहीं था। सूरज के बिना, उसका मन उदास रहने लगा। उसकी हर सुबह एक नए दुःख के साथ शुरू होती और हर शाम एक नए अकेलेपन में खत्म होती। 

     

    लेकिन समय चलते-चलते उसे अपनी ताकत का एहसास हुआ। मोहिनी ने खुद को फिर से जुटाने की ठानी। उसने अपने करियर पर ध्यान दिया, नए दोस्त बनाए, और नए शौक भी अपनाए। सूरज को भुलाने की कोशिश की, लेकिन उसकी यादें कभी-कभी उसकी आँखों से आँसू निकाल लेती थीं।

     

    एक साल बाद, जब मोहिनी ने अपनी ज़िंदगी को पटरी पर लाने का पूरा प्रयास किया, तो उसे अपने अंदर एक नई शक्ति का एहसास हुआ। उसने अपने जुनून को फिर से खोजा, जिसमें कला और लेखन शामिल थे। एक दिन, उसे अपने शहर में एक कला प्रदर्शनी में भाग लेने का मौका मिला। यह अवसर न केवल उसके लिए एक नया अनुभव था, बल्कि यह उसके लिए अपनी भावनाओं को उजागर करने का एक साधन भी था।

     

    प्रदर्शनी के दिन, मोहिनी ने अपने दिल की बातें रंगों और चित्रों के माध्यम से व्यक्त करना शुरू किया। उसने सूरज के साथ बिताए पलों, उसके साथ किए गए वादों, और उस प्यार को स्थापित किया, जो अब उस जैसी विनम्रता से दूर हो गया था। जब लोग उसकी पेंटिंग्स को देख रहे थे, उसने महसूस किया कि वह अपने दर्द को अच्छे तरीके से व्यक्त कर रही है। कला का यह माध्यम उसे सुकून का एहसास दे रहा था।

     

    एक दिन, प्रदर्शनी के बाद, उसे एक ज़रूरी फ़ोन कॉल आया। यह कमाल का था! वह उसकी प्रशंसा करने वाले एक कला विशेषज्ञ से था, जिसने उसकी पेंटिंग्स को देखा था। उन्होंने मोहिनी को यह कहते हुए संबोधित किया, “आपकी कला में गहराई है। मैं आपकी प्रदर्शनी में और भी काम देखने के लिए उत्सुक हूँ।”

     

    इस बात ने मोहिनी के अंदर आत्मविश्वास की एक नई किरण जगाई। उसने सोचा, “अगर मैं अपने विचारों और भावनाओं को इस तरह व्यक्त कर सकती हूँ, तो मेरा जीवन क्यों न बदलूं!” उसके साथी कलाकारों ने भी उसे प्रेरित किया और वह कला की दुनिया में आगे बढ़ने लगी। उसने खुद को पूरी तरह से अपने काम में विलीन कर दिया।

     

    समय बीतने के साथ, मोहिनी ने एक आर्ट गैलरी खोली, जहां उसने अपनी पेंटिंग्स प्रदर्शित कीं। उसकी गैलरी में लोग उसकी कला देखने के लिए आते थे। वह अपनी ज़िंदगी के इस नए मोड़ को पूरी तरह से अपनाने लगी। लेकिन अक्सर, सूरज की यादें उसे घेर लेती थीं। वह सोचती थी कि शायद वह आज भी उसके लिए एक अहम हिस्सा होता, अगर उस कॉल से पहले सब कुछ सही होता।

     

    एक दिन, जब वह अपनी गैलरी में बैठी हुई थी, उसे कुछ दिखने की आवाज़ सुनाई दी। उसने देखा कि एक व्यक्ति, जो उसकी पेंटिंग्स को ध्यान से देख रहा था, वह कोई परिचित नजर आया। उसके दिल में थोड़ी धड़कन तेज हुई। जैसे ही वह करीब आया, उसने उसे पहचाना – वह सूरज था।

     

    वह जैसे उसकी नजरों से बचते हुए, अपनी पुरानी यादों में खोने लगी। सूरज ने मुस्कुराते हुए कहा, “मोहिनी, तुमने क्या कमाल कर दिया है। तुम्हारी कला अद्भुत है।” मोहिनी को अपनी आँखों में आँसू आने लगे। उसने अपने दिल की गहराइयों में छिपी भावना को फिर से जीने की कोशिश की। “धन्यवाद, सूरज। मैं बस अपने अंदर के दर्द को व्यक्त कर रही थी,” उसने कहा।

     

    सूरज ने गंभीरता से कहा, “मुझे खेद है कि मैंने तुम्हें छोड़ दिया। मैंने बहुत कुछ सीखा है, और अब मैं समझता हूँ कि प्यार क्या होता है।” मोहिनी को यह सुनकर थोड़ी राहत महसूस हुई, लेकिन वह जानती थी कि चीज़ें पहले जैसी नहीं हो सकतीं। “सूरज, मैं अब अपनी ज़िंदगी में आगे बढ़ चुकी हूँ।” उसने भी अपनी सच्चाई को सामने रखा।

     

    इस मुलाकात ने मोहिनी को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि क्या यह प्यार फिर से जीवित हो सकता है। लेकिन उसने यह भी महसूस किया कि वह अब पहले जैसी मोहिनी नहीं रही। उसने अपने अंदर एक नया आत्मसम्मान और स्वतंत्रता स्थापित कर ली थी। सूरज की पहल से उन्हें कुछ बातें साझा करने का मौका मिला, लेकिन मोहिनी ने यह सुनिश्चित किया कि वे फिर से एक-दूसरे पर निर्भर न हों।

     

    सूरज की आँखों में मोहिनी के लिए ख़ूब सारा प्यार था, लेकिन मोहिनी ने उस प्यार को उस तरह से नहीं देखा जैसा वह पहले करती थी। वह जानती थी कि उनके बीच का रिश्ता बदल चुका था। वे एक-दूसरे के लिए विशेष थे, लेकिन अब वे केवल अच्छे दोस्त बन सकते थे। मोहिनी ने सूरज को कहा, “हम दोनों के रास्ते अलग हैं, लेकिन यह जरूरी नहीं कि प्यार खत्म होता है।”

     

    सूरज ने उसकी बातों को मान लिया। उन्होंने एक दूसरी

    शुरुआत की, लेकिन उस बार एक नई दिशा में।

     

  • अंजानी चाहत

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

    अंजानी चाहत

     

    सुबह की पहली किरण जब खिड़की से छनकर कमरे में घुसी, तब अर्णव की आँखें खुल गईं। उसने बिस्तर पर करवट बदली और छत की ओर देखा। सपना अभी भी आँखों के सामने घूम रहा था—एक अजनबी चेहरा, एक मुस्कान, और एक आवाज़ जो उसके नाम को ऐसे पुकार रही थी जैसे वह सदियों से उसे जानती हो। अर्णव ने माथा सहलाया। पिछले कई महीनों से यही सपना बार-बार आ रहा था। कोई चेहरा साफ़ नहीं दिखता था, सिर्फ़ एक धुँधली सी आकृति, और एक तीव्र चाहत जो छाती में चुभती थी।

     

    अर्णव दिल्ली के एक साधारण से अपार्टमेंट में रहता था। वह एक ग्राफ़िक डिज़ाइनर था, दिन भर कंप्यूटर के सामने बैठा रहता, और रातें नींद की कमी से गुज़रतीं। उसकी ज़िंदगी में कुछ ख़ास नहीं था—न कोई गहरा रिश्ता, न कोई बड़ा सपना। सिर्फ़ एक अजीब सी ख़ालीपन, एक अनजानी चाहत जो कभी-कभी इतनी तेज़ हो जाती कि वह रात भर जागता रहता।

     

    उस दिन वह काम पर नहीं जा सका। मन बेचैन था। उसने कॉफ़ी बनाई, बालकनी में खड़ा होकर शहर को देखा। नीचे सड़क पर लोग भागते-दौड़ते दिख रहे थे, जैसे कोई मंज़िल हो उनके पास। अर्णव सोचने लगा—मेरी मंज़िल कहाँ है? क्या मैं किसी को खो चुका हूँ जिसे मैं जानता तक नहीं?

     

    शाम को उसने फैसला किया कि वह बाहर निकलेगा। पुरानी दिल्ली की गलियों में घूमना उसे हमेशा शांत करता था। चाँदनी चौक की भीड़, मसाले की खुशबू, रिक्शों की घंटी—ये सब उसे ज़िंदा महसूस कराते थे। वह जामा मस्जिद के पास पहुँचा, सीढ़ियों पर बैठ गया। आसमान में सूरज डूब रहा था, आसमान लाल-नारंगी हो रहा था। तभी उसकी नज़र एक लड़की पर पड़ी।

     

    वह सफ़ेद सलवार कमीज़ में थी, बाल खुले हुए, और हाथ में एक पुरानी किताब। वह सीढ़ियों के दूसरी तरफ़ बैठी थी, किताब में डूबी हुई। अर्णव की साँस रुक गई। वह चेहरा… सपने वाला चेहरा नहीं था, लेकिन कुछ ऐसा था जो उसके अंदर की बेचैनी को और तेज़ कर गया। लड़की ने सिर उठाया, और उनकी नज़रें मिलीं। एक पल के लिए समय रुक गया। फिर उसने मुस्कुरा दिया—हल्की सी, शर्मीली सी मुस्कान।

     

    अर्णव ने हिम्मत जुटाई और पास गया। “माफ़ कीजिए… क्या आप यहाँ अकेली हैं?”

     

    लड़की ने किताब बंद की। “हाँ। मैं अक्सर यहाँ आती हूँ। शांति मिलती है।”

     

    “मेरा नाम अर्णव है।”

     

    “मैं दृष्टि।”

     

    दृष्टि। नाम सुनते ही अर्णव के मन में कुछ हिला। जैसे कोई पुरानी याद जाग उठी हो। उन्होंने बातचीत शुरू की। दृष्टि एक लाइब्रेरियन थी, पुरानी किताबों से प्यार करती थी। अर्णव ने बताया कि वह डिज़ाइनर है। बातें होती रहीं—किताबों की, शहर की, अकेलेपन की। सूरज डूब चुका था, लेकिन वे उठना नहीं चाहते थे।

     

    “क्या आपको कभी लगता है कि आप किसी को ढूँढ रहे हैं जिसे आपने कभी देखा ही नहीं?” अर्णव ने अचानक पूछ लिया।

     

    दृष्टि ने उसकी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी। “हाँ… बहुत बार। जैसे कोई अधूरा सपना हो जो बार-बार याद आता है।”

     

    उस रात अर्णव घर लौटा तो नींद नहीं आई। दृष्टि का चेहरा उसकी आँखों के सामने घूम रहा था। वह चाहत जो पहले धुँधली थी, अब साफ़ होने लगी थी। अगले दिन वह फिर उसी जगह गया। दृष्टि वहाँ थी। फिर अगले दिन भी। धीरे-धीरे उनकी मुलाक़ातें नियमित हो गईं। वे पुरानी दिल्ली की गलियों में घूमते, चाय पीते, किताबों की दुकानों में घंटों बिताते।

     

    एक शाम दृष्टि ने कहा, “अर्णव, मुझे लगता है मैं तुम्हें पहले से जानती हूँ। जैसे कोई पुरानी कहानी हो।”

     

    अर्णव की धड़कन तेज़ हो गई। “मुझे भी। मेरे सपनों में एक चेहरा आता है… और जब मैंने तुम्हें देखा, तो वह चाहत और तेज़ हो गई।”

     

    वे दोनों चुप हो गए। हवा में कोई अनकही बात तैर रही थी। दृष्टि ने अपना हाथ अर्णव के हाथ पर रखा। “शायद हमने पहले भी एक-दूसरे को खोया है।”

     

    उनकी दोस्ती प्यार में बदलने लगी। अर्णव पहली बार किसी के इतना क़रीब महसूस कर रहा था। दृष्टि की हँसी, उसकी बात करने का अंदाज़, यहाँ तक कि उसके बालों की खुशबू—सब कुछ जाना-पहचाना लग रहा था। एक रात वे यमुना किनारे बैठे थे। चाँद चमक रहा था। अर्णव ने दृष्टि का हाथ पकड़ा।

     

    “दृष्टि… मैं तुमसे प्यार करता हूँ। लेकिन यह प्यार साधारण नहीं लगता। जैसे यह किसी और जन्म से चला आ रहा हो।”

     

    दृष्टि की आँखें नम हो गईं। “मैं भी… लेकिन मुझे डर लगता है। जैसे यह खुशी अस्थायी हो।”

     

    उसके बाद के दिन खुशियों भरे थे। वे साथ घूमते, फ़िल्में देखते, रात भर बातें करते। अर्णव का अकेलापन ख़त्म हो रहा था। लेकिन साथ ही एक अजीब सी बेचैनी भी बढ़ रही थी। उसके सपने और तीव्र हो गए थे। अब सपने में चेहरा साफ़ दिखने लगा था—दृष्टि का ही चेहरा, लेकिन पुराने ज़माने के कपड़ों में। एक महल, एक बगीचा, और फिर आग… चीखें… बिछड़ना।

     

    एक रात अर्णव चीखते हुए जागा। पसीने से लथपथ। उसने फ़ोन उठाया और दृष्टि को कॉल किया।

     

    “क्या हुआ?” दृष्टि की नींद भरी आवाज़ आई।

     

    “सपना… फिर से। तुम जल रही थी… मैं तुम्हें बचा नहीं पाया।”

     

    दृष्टि चुप रही। फिर धीरे से बोली, “अर्णव, मेरे भी ऐसे ही सपने आते हैं। मैंने कभी किसी को नहीं बताया। लगता है हम किसी पुरानी त्रासदी के हिस्से हैं।”

     

    अगले दिन वे मिले। दृष्टि ने एक पुरानी डायरी निकाली। “यह मेरी दादी की थी। उन्होंने कहा था कि हमारे परिवार में एक कहानी चलती आ रही है… दो प्रेमियों की, जो कभी मिल नहीं पाए। एक राजकुमारी और एक साधारण सिपाही। महल में आग लग गई थी, और वे दोनों मर गए। लेकिन कहा जाता है कि उनकी आत्माएँ अब भी एक-दूसरे को ढूँढती हैं।”

     

    अर्णव की साँस रुक गई। “क्या तुम सोचती हो… हम वही हैं?”

     

    दृष्टि ने सिर हिलाया। “मुझे नहीं पता। लेकिन जब मैं तुम्हें देखती हूँ, तो लगता है जैसे सदियों का इंतज़ार ख़त्म हो गया हो।”

     

    उनकी चाहत और गहरी हो गई। लेकिन साथ ही एक डर भी। जैसे किस्मत फिर से उन्हें अलग करने वाली हो। अर्णव ने दृष्टि से शादी का प्रस्ताव रखा। दृष्टि रो पड़ी, लेकिन हाँ कह दी।

     

    शादी की तैयारियाँ शुरू हुईं। दोनों परिवार खुश थे। लेकिन अर्णव के अंदर की बेचैनी बढ़ती जा रही थी। सपने अब सिर्फ़ रात को नहीं, दिन में भी आते थे। वह कभी-कभी दृष्टि को देखकर घबरा जाता—जैसे वह फिर से खो जाएगी।

     

    एक दिन, शादी से एक हफ़्ता पहले, अर्णव को एक पुराना पत्र मिला। कोई अनजान पता था। पत्र में लिखा था—

     

    “तुम फिर मिल गए हो। लेकिन इस बार भी समय कम है। आग फिर लगेगी। बचा लो उसे, वरना चाहत फिर अधूरी रह जाएगी।”

     

    अर्णव काँप उठा। उसने दृष्टि को बताया। दोनों डरे हुए थे, लेकिन उन्होंने एक-दूसरे का हाथ थाम लिया। “हम इस बार नहीं हारेंगे,” दृष्टि ने कहा।

     

    शादी का दिन आ गया। मंडप सजा था, मेहमान आए थे। अर्णव और दृष्टि फेरे ले रहे थे। अचानक कहीं से धुआँ उठने लगा। किसी ने चीख दी—“आग!” तंबू में आग लग गई थी। लोग भागने लगे। अर्णव ने दृष्टि का हाथ पकड़ा और बाहर निकाला। लेकिन भीड़ में वे बिछड़ गए।

     

    अर्णव पागलों की तरह उसे ढूँढ रहा था। धुआँ चारों तरफ़ था। तभी उसने देखा—दृष्टि एक कोने में फँसी हुई थी, आग उसके क़रीब पहुँच रही थी। अर्णव बिना सोचे दौड़ा। उसने दृष्टि को गोद में उठाया और बाहर निकाला। दोनों सुरक्षित थे, लेकिन अर्णव के हाथ जल गए थे।

     

    हॉस्पिटल में दृष्टि उसके बिस्तर के पास बैठी थी। आँखों में आँसू। “तुमने मुझे बचा लिया… इस बार।”

     

    अर्णव मुस्कुराया, दर्द के बावजूद। “अब कोई आग हमें अलग नहीं कर सकती।”

     

    डॉक्टरों ने कहा कि जलन ठीक हो जाएगी। लेकिन उस रात अर्णव को फिर सपना आया। इस बार सपना अलग था। कोई आग नहीं थी। सिर्फ़ एक बगीचा, फूल, और दृष्टि मुस्कुरा रही थी। एक आवाज़ गूँजी—“अब तुम्हारी चाहत पूरी हो गई। इस जन्म में रहो, प्यार करो, और अगले जन्म की चिंता मत करो।”

     

    अर्णव जागा। कमरे में दृष्टि बैठी थी, उसका हाथ थामे हुए। “सपना अच्छा था?” उसने पूछा।

     

    अर्णव ने उसके हाथ को चूमा। “हाँ। अब कोई अनजानी चाहत नहीं रही। सब कुछ जाना-पहचाना है।”

     

    उसके बाद की ज़िंदगी शांत और खुशहाल रही। अर्णव और दृष्टि ने एक छोटा सा घर लिया, पुरानी दिल्ली के पास। वे किताबें पढ़ते, साथ चाय पीते, और कभी-कभी जामा मस्जिद की सीढ़ियों पर बैठकर शहर को देखते। अर्णव के हाथ के निशान रह गए, लेकिन वे निशान अब दर्द नहीं, बल्कि एक याद थे—कि इस बार उन्होंने भाग्य को हरा दिया था।

     

    साल बीतते गए। उनके बच्चे हुए। घर में हँसी-खुशी भरी रही। लेकिन कभी-कभी रात में, जब चाँद चमकता, तो अर्णव और दृष्टि एक-दूसरे की आँखों में देखते और मुस्कुरा देते। जैसे कोई पुरानी कहानी याद आ गई हो, जो अब पूरी हो चुकी थी।

     

    एक दिन, बहुत साल बाद, अर्णव बूढ़ा हो चुका था। वह बालकनी में बैठा था। दृष्टि उसके पास आई, सिर उसके कंधे पर रख दिया।

     

    “अर्णव, क्या तुम्हें अब भी लगता है कि हम पहले मिले थे?”

     

    अर्णव ने उसकी तरफ़ देखा। आँखों में वही चमक थी जो पहली मुलाक़ात में थी। “हाँ। और मैं जानता हूँ कि हम फिर मिलेंगे। लेकिन इस बार, जब भी मिलें, कोई आग नहीं होगी। सिर्फ़ प्यार होगा।”

     

    दृष्टि मुस्कुराई। “अंजानी चाहत अब जानी-पहचानी हो गई है।”

     

    हवा में पुरानी खुशबू तैर रही थी—मसाले की, किताबों की, और एक प्यार की जो जन्मों से चला आ रहा था। अर्णव ने आँखें बंद कीं। उसके मन में अब कोई बेचैनी नहीं थी। सिर्फ़ एक शांति, एक पूर्णता।

     

    और कहीं दूर, स

    मय की धारा में, दो आत्माएँ मुस्कुरा रही थीं। क्योंकि उनकी अनजानी चाहत आख़िरकार पूरी हो गई थी।

     

  • बिन मौसम बरसात जैसे हो तुम

    बिन मौसम बरसात जैसे हो तुम

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    बिन मौसम बरसात जैसे हो तुम,
    मेरी यादों का पूरा आसमान हो तुम।

    कभी बूंदों बनकर चुपके से बरस जाते हो,
    तो कभी यादों का सैलाब बन दिल में उतर आते हो।

    जब भी तुम्हारी याद आती है,
    चेहरे पर एक मीठी सी मुस्कान छा जाती है।

    बीते हुए लम्हे फिर से जी उठते हैं,
    और अधूरी ख्वाहिशें भी हौले से गुनगुनाने लगती हैं।

    लेकिन जब भी तुम्हें देखने का दिल करता है,
    आँखों में अनजाने ही आँसू भर आते हैं।

    तुम्हारी कमी का एहसास
    दिल को फिर से तन्हा कर जाता है।

    बिन मौसम बरसात जैसे हो तुम,
    कभी सुकून तो कभी दर्द की बात जैसे हो तुम।

    मेरी हर दुआ, हर ख्वाब, हर एहसास में बसे हो,
    मेरी यादों के पूरे संसार जैसे हो तुम। ❤️🌹

  • अधूरा इश्क

    अधूरा इश्क

    पढ़ने का समय : 3 मिनट

     

    अधूरा इश्क

    रागिनी को हमेशा से अंधेरे कमरों से अजीब-सी खींच महसूस होती थी।
    उसके नए किराए के घर में एक कमरा था जिसका दरवाज़ा ताला लगा था। मालिक ने कहा था “कभी मत खोलना।”

    एक रात बिजली चली और वही कमरे से हल्की दस्तक आई। रागिनी डरते हुए बोली “क…कौन?”

    अंदर से एक धीमी, टूटी आवाज़ आई “डरो मत… मैं भी कैद हूँ…”

    अगली बार बिजली जाने पर आवाज़ फिर आई।
    इस बार कमरे का ताला अपने आप गिरा।
    और अंदर था… सिर्फ़ अंधेरा।

    पर उसी अंधेरे में एक परछाई उभर रही थी एक लड़का… बेहद खूबसूरत, पर धुंध जैसा।

    उसने कहा “मेरा नाम आरव है… मैं इंसान नहीं हूँ, पर तुम्हें कोई नुक़सान नहीं पहुँचाऊँगा।”

    रागिनी चाहकर भी उस कमरे से दूर नहीं रह पाती।
    आरव उसे हर रात मिलता कभी बातों में, कभी बस खामोशी में।

    रागिनी ने महसूस किया कि वह आरव की तरफ़ खिंच रही है… डर और प्यार के बीच फँसकर।

    आरव हमेशा कहता “मेरी दुनिया में मत आना रागिनी… वो अंधेरा तुम्हें वापस नहीं लौटने देगा।”

    एक दिन रागिनी ने पूछ ही लिया “तुम कौन हो? क्या हो?”

    आरव की आँखों में अजीब-सा दर्द चमका“एक गलती ने मुझे इस दुनिया के बीच कहीं अटका दिया है… ना मैं ज़िंदा हूँ, ना मरा हुआ।”

    रागिनी उससे और गहराई से जुड़ने लगी, वह डर खत्म हो चुका था। बस एक अजीब-सी मोहब्बत जन्म ले चुकी थी।

    अब रागिनी हर दिन सूरज ढलने का इंतज़ार करती।
    रात होते ही आरव उसके पास आ जाता उसे कहानियाँ सुनाता, कभी हवा बनकर उसके बालों को छूता, कभी उसके आँसू पोंछता।

    दोनों जानते थे ये रिश्ता नामुमकिन है। पर इश्क़ कभी इजाज़त थोड़े ही पूछता है।

    एक रात कमरे में सिर्फ आरव नहीं आया… उसके पीछे कुछ और भी था।

    काली, गुर्राती परछाइयाँ जो रागिनी पर झपट पड़ीं।

    आरव चिल्लाया “भागो! ये मेरी दुनिया के भूखे साए हैं—तुम्हें ले जाएँगे!”

    आरव ने उन्हें रोक लिया… पर उसके शरीर का आधा हिस्सा अंधेरे में गायब हो गया।

    रागिनी रो पड़ी “मैं तुम्हें खो दूँगी क्या?”

    आरव बोला “मैं पहले ही खो चुका हूँ…”

    आरव कमज़ोर पड़ने लगा। वह कहने लगा “रागिनी… जब तक मैं हूँ, तुम सुरक्षित हो। पर मेरा समय ख़त्म हो रहा है। इस कमरे को छोड़कर किसी और शहर चली जाओ।”

    पर रागिनी ने साफ़ कह दिया “इश्क़ भागता नहीं, लड़ता है।”

    उस रात हवा में अजीब सरसराहट थी। कमरा खुद-ब-खुद खुल गया। अंधेरा गाढ़ा और डरावना।

    आरव ने रागिनी का हाथ पकड़ लिया पहली और आखिरी बार… उसका स्पर्श ठंडा, पर गहरा था।

    “मेरे साथ मत आना…”

    पर रागिनी ने कहा “मैं अकेली रह ही नहीं सकती तुम्हारे बिना।”

    अंधेरा दोनों के चारों तरफ घूमने लगा।

    अगली सुबह घर का दरवाज़ा खुला मिला। कमरा बिल्कुल शांत। आरव की परछाई गायब थी। रागिनी भी गायब थी।

    बस दीवार पर उभरी एक धुँधली लाइन “अंधेरों में किया इश्क़… दोनों को उजाला कभी नहीं मिला।”

    कई साल बाद, उसी घर में नए किरायेदार आते हैं।
    पहली ही रात, बिजली जाती है… और बंद कमरे से आवाज़ आती है “डरो मत… मैं भी कैद हूँ…”

    इस बार कमरे में दो परछाइयाँ दिखाई देती हैं एक धुँधला लड़का… और उसके कंधे पर सिर रखे एक लड़की।

    दोनों की आँखों में एक ही बात उनकी कहानी कभी पूरी नहीं हुई… और शायद कभी होगी भी नहीं।

    “अंधेरों का इश्क़… अधूरा ही सही, पर अमर रहा।”

     

  • गुरुर

    गुरुर

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

     

    गुरूर है मुझे खुद पर…

    मैं सबसे अलग हूँ।

    मैं सबके जैसी नहीं,

    और यही मेरी पहचान है।

    कोई चाहे या ना चाहे,

    मैं अकेले भी खुश हूँ।

    जैसी भी हूँ,

    अपने माँ-पापा की बेटी हूँ।

    मैं सबसे अलग हूँ,

    पर उनके लिए सबसे प्यारी हूँ।

    गुरूर है मुझे खुद पर…

    क्योंकि मैं जैसी हूँ, वैसी ही खुश हूँ।