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श्रेणी: कहानी लेखन पुरस्कार प्रतियोगिता

  • मीठे पुलाव — अनुराधा और अनु की कहानी

    मीठे पुलाव — अनुराधा और अनु की कहानी

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

    रसोई से इलायची और घी की खुशबू पूरे घर में फैल रही थी। अनुराधा ने चावल के बर्तन में चीनी डाली, फिर मुट्ठी भर किशमिश और काजू। लकड़ी के चम्मच से धीरे-धीरे चलाते हुए उसकी आँखें भर आईं। आज भी वह मीठा पुलाव बना रही थी, लेकिन खाने वाला अब सिर्फ एक ही था—उसकी आठ साल की बेटी, अनु।

     

    अनु दौड़ती हुई रसोई में आई और माँ की साड़ी का पल्लू पकड़कर बोली, “माँ, आज फिर मीठा पुलाव? आपको तो नमकीन पुलाव ज़्यादा पसंद है ना?”

     

    अनुराधा मुस्कुराई, लेकिन वह मुस्कान आँखों तक नहीं पहुँची।

     

    “हाँ बेटा… लेकिन तुम्हारे पापा कहते थे कि मीठा पुलाव खाने से घर में मिठास बनी रहती है।”

     

    अनु कुछ पल चुप रही। उसने दीवार पर टंगी अपने पिता की तस्वीर की ओर देखा। तस्वीर पर चढ़ी माला थोड़ी सूख चुकी थी।

     

    “माँ… पापा को गए दो साल हो गए… क्या उन्हें हमारी याद आती होगी?”

     

    अनुराधा का हाथ काँप गया। चम्मच बर्तन से टकराया और हल्की सी आवाज़ आई।

     

    उसने अनु को अपनी गोद में बिठा लिया।

     

    “बहुत आती होगी… जितनी हमें उनकी आती है।”

     

    अनु ने मासूमियत से पूछा, “फिर वो वापस क्यों नहीं आते?”

     

    इस सवाल का जवाब शायद दुनिया की किसी माँ के पास नहीं होता।

     

    अनुराधा ने बस बेटी का माथा चूम लिया।

     

     

    दो साल पहले तक यही घर हँसी से भरा रहता था।

     

    हर रविवार अनु के पिता, अमन, खुद रसोई में खड़े होकर मीठा पुलाव बनाते थे। वह कहते थे, “जिस घर में मीठे पुलाव की खुशबू हो, वहाँ नाराज़गी ज़्यादा देर नहीं टिकती।”

     

    अनुराधा हँसते हुए कहती, “इतनी तारीफ़ मत किया करो अपने पुलाव की।”

     

    और अमन जवाब देते, “देख लेना, एक दिन यही पुलाव मेरी याद बन जाएगा।”

     

    तब किसी ने नहीं सोचा था कि यह बात सच हो जाएगी।

     

    एक सड़क दुर्घटना ने सब कुछ बदल दिया।

     

    अनु तब सिर्फ छह साल की थी।

     

    उसे समझ ही नहीं आया कि अस्पताल से लौटते समय लोग उसके पापा को सफेद चादर में क्यों लपेटे हुए थे।

     

    उस दिन के बाद अनुराधा ने महीनों तक रसोई में मीठा पुलाव नहीं बनाया।

     

    हर बार चावल हाथ में आते तो अमन की मुस्कान याद आ जाती।

     

     

    समय धीरे-धीरे आगे बढ़ा, लेकिन कुछ दर्द कभी पुराने नहीं होते।

     

    अनु अब बड़ी हो रही थी।

     

    वह समझने लगी थी कि उसकी माँ हर रात चुपके से रोती है।

     

    एक रात उसने देखा कि अनुराधा पुराने एलबम को सीने से लगाकर बैठी है।

     

    अनु बिना कुछ बोले माँ के पास गई।

     

    उसने अपनी छोटी हथेली माँ के आँसू पोंछने के लिए आगे बढ़ाई।

     

    “माँ…”

     

    “हाँ बेटा?”

     

    “अगर मैं बड़ी होकर पापा जैसी बन जाऊँ… तो क्या आप फिर कभी नहीं रोओगी?”

     

    अनुराधा फूट-फूटकर रो पड़ी।

     

    उसने बेटी को कसकर गले लगा लिया।

     

    “तुम्हें किसी जैसा बनने की ज़रूरत नहीं है… तुम बस मेरी अनु बनी रहना।”

     

     

    कुछ दिन बाद स्कूल में “माँ के लिए उपहार” प्रतियोगिता थी।

     

    सब बच्चे महंगे गिफ्ट बना रहे थे।

     

    किसी ने कार्ड बनाया, किसी ने पेंटिंग।

     

    लेकिन अनु चुपचाप घर आई और पड़ोस वाली दादी से बोली—

     

    “दादी… मुझे मीठा पुलाव बनाना सिखा दीजिए।”

     

    दादी ने हैरानी से पूछा, “इतनी छोटी सी बच्ची… क्यों?”

     

    अनु बोली, “माँ जब भी मीठा पुलाव बनाती हैं, रोने लगती हैं। इस बार मैं बनाऊँगी… ताकि माँ सिर्फ खाएँ… रोएँ नहीं।”

     

    दादी की आँखें भर आईं।

     

    उन्होंने बड़े प्यार से अनु को हर चीज़ सिखाई।

     

    चावल कितने धोने हैं…

     

    घी कितना डालना है…

     

    इलायची कब डालनी है…

     

    और सबसे ज़रूरी…

     

    खाना बनाते समय मन में प्यार होना चाहिए।

     

     

    मदर्स डे की सुबह अनुराधा देर तक सोती रही।

     

    रसोई से कुछ जलने जैसी हल्की खुशबू आई।

     

    वह घबराकर उठी।

     

    रसोई में पहुँची तो देखा…

     

    अनु स्टूल पर खड़ी थी।

     

    बाल बिखरे हुए।

     

    चेहरे पर पसीना।

     

    हाथ में बड़ा सा चम्मच।

     

    और सामने आधा जला, आधा पका मीठा पुलाव।

     

    अनु डर गई।

     

    “सॉरी माँ… थोड़ा जल गया…”

     

    अनुराधा कुछ पल तक उसे देखती रही।

     

    फिर उसने गैस बंद की।

     

    बेटी को गोद में उठा लिया।

     

    “ये किसने बनाया?”

     

    “मैंने…”

     

    “क्यों?”

     

    अनु की आँखें भर आईं।

     

    “क्योंकि… मैं नहीं चाहती कि आप हर बार पापा को याद करके रोओ। आज आप सिर्फ मेरी माँ बनकर खाना खाइए…”

     

    बस…

     

    इतना सुनना था कि अनुराधा की दुनिया जैसे थम गई।

     

    उसने पहली बार महसूस किया कि उसकी छोटी सी बेटी, उम्र से बहुत पहले बड़ी हो गई थी।

     

     

    दोनों ने उसी जले हुए मीठे पुलाव को प्लेट में परोसा।

     

    अनुराधा ने पहला कौर खाया।

     

    चीनी कहीं ज़्यादा थी।

     

    चावल कुछ कच्चे थे।

     

    किशमिश भी आधी जली हुई थी।

     

    लेकिन…

     

    उसे लगा कि उसने ज़िंदगी का सबसे स्वादिष्ट भोजन खाया है।

     

    क्योंकि उसमें घी कम था…

     

    प्यार ज़्यादा था।

     

     

    रात को अनु ने धीरे से पूछा—

     

    “माँ… पापा को हमारा पुलाव पसंद आता?”

     

    अनुराधा मुस्कुराई।

     

    “नहीं…”

     

    अनु उदास हो गई।

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि वो कहते… इसमें चीनी थोड़ी कम है।”

     

    दोनों हँस पड़ीं।

     

    और उसी हँसी में बरसों का दर्द धीरे-धीरे पिघलने लगा।

     

    अनुराधा ने आसमान की ओर देखा।

     

    उसे लगा जैसे कहीं दूर अमन मुस्कुरा रहे हों।

     

    उसने मन ही मन कहा—

     

    “देखो अमन… तुम्हारा मीठा पुलाव अब सिर्फ एक खाना नहीं रहा। यह हमारी याद है… हमारी ताकत है… और हमारी बेटी का सबसे खूबसूरत प्यार भी।”

     

    उस रात बहुत दिनों बाद अनुराधा बिना रोए सो गई।

     

    और अनु ने माँ का हाथ पकड़कर आँखें बंद कर लीं।

     

    कभी-कभी जीवन की सबसे बड़ी खुशियाँ महंगे उपहारों में नहीं मिलतीं।

     

    वे मिलती हैं एक छोटी-सी रसोई में, आधे जले हुए मीठे पुलाव की खुशबू में, और उस मासूम बच्चे के दिल में, जो अपने हिस्से का बचपन छोड़कर अपनी माँ की मुस्कान बचाने की कोशिश करता है।

     

    यही प्यार है।

     

    यही परिवार है।

     

    और शायद यही वह मिठास है, जो किसी भी मीठे पुलाव से कहीं अधिक मीठी होती है।

  • पुराना पन्ना

    पुराना पन्ना

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    ​पहाड़ों की ढलान पर बसा वह छोटा सा गाँव शाम ढलते ही धुंध की चादर ओढ़ लेता था। 

    अक्टूबर की ठिठुरन महसूस होने लगी थी, गाँव के मोड़ पर बनी पुरानी चाय की टपरी पर हर शाम कुछ चेहरे जुटते थे, इन्हीं चेहरों में एक चेहरा था माधव का।

     

     

    ​माधव अपनी उम्र का पचास पड़ाव पार कर चुका था, उदास आँखें, बिखरे सफेद बाल और कंधे पर लटकता एक पुराना कैनवास का थैला, यह उसकी पहचान थी। गाँव के लोग जानते थे कि माधव कभी शहर का जाना-माना चित्रकार हुआ करता था। लेकिन पिछले दस सालों से उसने ब्रश को हाथ भी नहीं लगाया था। दस साल पहले एक सड़क हादसे में उसने अपनी इकलौती बेटी, स्नेहा को खो दिया था। उस हादसे ने न सिर्फ उसकी बेटी को छीना, बल्कि उसके भीतर के कलाकार को भी हमेशा के लिए सुला दिया।

    ​तब से माधव गाँव की इस चाय की दुकान पर बैठता, अलाव के उठते धुएँ को ताकता और खामोश रहता। उसकी ज़िंदगी उस रुकी हुई घड़ी की तरह हो गई थी, जिसकी सुइयां एक ही जगह ठहर गई हों।

     

     

    ​उस दिन भी हवा में गलन थी, चाय वाले रामू काका ने अलाव में कुछ सूखी लकड़ियाँ और डालीं। तभी बस स्टैंड की तरफ से एक छोटी सी लड़की चलती हुई टपरी के पास आई। उम्र यही कोई सात-आठ साल होगी। कंधे पर बड़ा सा स्कूल बैग, हाथ में एक स्केचबुक और चेहरे पर बेफ़िक्र मुस्कान।

     

     

    ​उसने रामू काका से पूछा, “काका, थोड़ा गरम पानी मिलेगा? मेरी बोतल का पानी बर्फ जैसा ठंडा हो गया है।”

     

     

    ​रामू काका ने मुस्कुराकर उसे पानी दिया और पूछा, “बिटिया, तुम यहाँ नई आई हो क्या? पहले तो कभी नहीं देखा।”

     

     

    ​”हाँ काका! मेरे पापा का यहाँ फॉरेस्ट डिपार्टमेंट में ट्रांसफर हुआ है। हम कल ही आए हैं, मेरा नाम दिशा है,” उसने चहकते हुए जवाब दिया।

     

     

    ​दिशा की नज़र पास ही बेंच पर बैठे माधव पर पड़ी, माधव अपनी धुन में अलाव की लपटों को देख रहा था। दिशा बिना झिझक के उसके बगल में जाकर बैठ गई। उसने अपनी स्केचबुक खोली और पेंसिल से अलाव का स्केच बनाने लगी।

    ​माधव ने अनमने ढंग से उसकी तरफ देखा, तो बच्ची के हाथ कांप रहे थे, पेंसिल की रेखाएँ टेढ़ी-मेढ़ी बन रही थीं, लेकिन उसकी आँखों में एक अजीब सा जुनून था।

     

     

    ​”रेखाएँ सीधी नहीं बन रहीं,” माधव के मुँह से अचानक निकल गया।

     

     

    ​दिशा ने चौंक कर उसकी तरफ देखा, फिर अपनी ड्राइंग को देखा, वह मुस्कुराई और बोली, “हाँ अंकल, पेंसिल बहुत छोटी है और मेरे हाथ ठंड से कांप रहे हैं। पर मुझे बनाना अच्छा लगता है। क्या आप मेरी मदद करेंगे?”

     

     

    ​माधव ने एक पल के लिए हिचकिचाया, दस साल… दस साल से उसने किसी स्केचबुक को नहीं छुआ था। पर फिर भी उसने उसने धीरे से अपना कांपता हाथ बढ़ाया और दिशा के हाथ से पेंसिल ले ली।

     

     

    ​माधव की उंगलियों ने जैसे ही पेंसिल को छुआ, उसकी स्मृति में पुरानी यादें तैर गईं। उसकी बेटी स्नेहा भी ठीक इसी उम्र में ऐसे ही ज़िद किया करती थी।

     

    ​माधव ने स्केचबुक के पन्ने पर पेंसिल चलाई, और एक ही मिनट में, उस टेढ़ी-मेढ़ी ड्राइंग ने एक नया रूप ले लिया। अलाव की लपटें, उससे निकलता धुआं और पीछे धुंध में लिपटा पहाड़, सब कुछ कागज़ पर ज़िंदा हो उठा।

     

     

    ​दिशा की आँखें फटी की फटी रह गईं, और उसके मुँह से निकला, “अरे वाह अंकल! आप तो जादूगर हैं! ये स्केच तो बिल्कुल असली लग रहा है।”

     

     

    ​माधव ने स्केचबुक वापस दिशा की तरफ बढ़ा दी, उसके हाथों में एक हल्की सी थरथराहट थी। बहुत दिनों बाद उसके सीने में दबी उदासी की चट्टान थोड़ी खिसकी थी।

     

     

    ​”अंकल, क्या आप मुझे रोज़ ड्राइंग सिखाएंगे?” दिशा ने बड़े ही मासूम भाव से पूछा।

     

     

    ​माधव ने गहरी सांस ली, फिर अलाव के धुएँ को देखा और धीमे से कहा, “नहीं बेटा, मैं अब पेंटिंग नहीं करता, मैंने यह सब बहुत पहले छोड़ दिया।”

     

     

    ​”क्यों? इतनी अच्छी चीज़ को कोई कैसे छोड़ सकता है?” दिशा का सीधा सवाल माधव के दिल में तीर की तरह चुभा। वह बिना कोई जवाब दिए, अपना थैला उठाकर वहाँ से उठकर चला गया।

     

     

    ​अगले कुछ दिनों तक माधव टपरी पर नहीं आया, वह अपने पुराने, सीलन भरे कमरे में बंद रहा। पर दिशा कहाँ मानने वाली थी। उसने रामू काका से माधव का घर पूछ लिया और एक दोपहर सीधे उसके घर पहुँच गई।

     

     

    ​घर का दरवाज़ा आधा खुला था, जिसके कारण दिशा चुपके से अंदर गई, तो देखा कमरा धूल से भरा हुआ था। कोने में कई कैनवास कपड़े से ढके रखे थे। उनको देख दिशा ने उत्सुकता में एक बड़े से कैनवास से कपड़ा हटा दिया।

     

     

    ​वह एक अधूरी पेंटिंग थी, एक छोटी लड़की की मुस्कुराती हुई तस्वीर, जिसके चारों तरफ चमकीले रंग थे, लेकिन चेहरा अधूरा छोड़ दिया गया था।

     

     

    ​तभी पीछे से माधव की सख्त आवाज़ आई, “तुम यहाँ क्या कर रही हो?”

     

     

    ​दिशा उसकी आवाज़ सुन डरने की बजाय पलटकर सवाल पूछा, “अंकल, यह लड़की कौन है? और यह पेंटिंग अधूरी क्यों है?”

     

     

    ​माधव का चेहरा गुस्से और दर्द से लाल हो गया, उसने उसी लहजे में कहा, “यह मेरी बेटी है… स्नेहा! और यह अधूरी इसलिए है क्योंकि रंगों का कोई मतलब नहीं बचा। जब रोशनी ही चली जाए, तो रंगों से क्या सजाना?”

     

     

     

    ​माधव की आँखों में आँसू आ गए थे इतना कहते – कहते। उसने सोचा था कि बच्ची डरकर भाग जाएगी, लेकिन दिशा चलकर उसके पास आई। और फिर उसने अपने बैग से अपनी स्केचबुक निकाली और उसमें से एक पन्ना फाड़कर माधव के हाथ में थमा दिया।

     

     

    ​”अंकल, मेरी मम्मी कहती हैं कि जब शाम को अंधेरा होता है, तो सूरज मरता नहीं है… वह बस दूसरी तरफ रोशनी देने चला जाता है। अगर आप रंग भरना बंद कर देंगे, तो यह अंधेरा कभी खत्म ही नहीं होगा।”

     

     

     

    ​माधव ने उस फटे हुए पन्ने को देखा, उस पर दिशा ने एक स्केच बनाया था, एक बूढ़ा आदमी और एक छोटी लड़की अलाव के पास बैठे थे, और हवा में उड़ते धुएँ के बीच ऊपर बादलों में एक छोटी सी परी मुस्कुरा रही थी।

     

     

    ​उस बचकाने स्केच में जो भावना थी, उसने माधव के पत्थर बन चुके दिल को पिघलाकर रख दिया। वह घुटनों के बल बैठ गया और उस छोटे से पन्ने को सीने से लगाकर फूट-फूटकर रो पड़ा। दस सालों का जमा हुआ दर्द आँसुओं के रास्ते बह निकला।

     

    क्योंकि उसे उस स्केच में वह बादलों में मुस्कराती हुई परी को अपनी बेटी समझ कर देख रहा था। 

     

     

    ​अगली सुबह पहाड़ पर एक अलग ही ताज़गी थी, सूरज की पहली किरणें जब धुंध को चीरती हुई बाहर निकलीं, तो चाय की टपरी पर रामू काका एक अनोखा नज़ारा देख रहे थे।

     

     

    ​माधव अलाव के पास बैठा था, उसके सामने एक नया कैनवास रखा था और हाथ में रंगों की प्लेट थी। उसके बगल में दिशा बैठी हुई अपनी स्केचबुक में रंग भर रही थी।

     

     

    ​माधव ने ब्रश उठाया और कैनवास पर पहला स्ट्रोक लगाया और उसने वही दस साल पुरानी अधूरी पेंटिंग पूरी करनी शुरू की थी। लेकिन इस बार वह उदास चेहरा नहीं बना रहा था। उसने स्नेहा के चेहरे पर वही मुस्कान उकेरी जो दिशा के चेहरे पर थी, और पृष्ठभूमि में गाँव के पहाड़ों पर उगते हुए नए सूरज को चित्रित किया।

     

     

     

    ​रामू काका ने मुस्कुराते हुए दो कप कड़क चाय उनके सामने रखी।

     

     

    ​माधव ने दिशा की तरफ देखा और कहा, “दिशा, आज तुम्हें सिखाऊंगा कि जब धुंध गहरी हो, तो कैनवास पर रोशनी कैसे बनाई जाती है।”

     

     

    ​दिशा खिलखिलाकर हँस पड़ी, “आप मुझे सब सीख दो!” 

     

     

    ​उस दिन अलाव का धुआं हवा में गायब हो रहा था, पर माधव के जीवन का अंधेरा हमेशा के लिए छट चुका था। उसने समझ लिया था कि अपनों की यादों को दर्द में नहीं, बल्कि उन रंगों और खुशियों में ज़िंदा रखा जाता है जो वे हमारे लिए छोड़ जाते हैं।

     

     

     

    —-

     

    आपको क्या लगता है कि जाने वाले की यादों को याद करके दर्द में रहना चाहिए। या अपने आप को एक नई उड़ान देनी चाहिए और जाने वाले को मुस्कुरा कर याद करना चाहिए। 

     

    मगर क्या जाने वाले को भुला देना इतना आसान होता है? 

     

     

  • सपनों का शहर

    सपनों का शहर

    पढ़ने का समय : 9 मिनट

    सपनों का शहर

     

    गाँव की धूल भरी गलियों में जब सूरज ढलता था तो आकाश में एक अलग सी चमक आ जाती थी। उसी चमक को देखकर अरुण के मन में सवाल उठते थे क्या शहर में भी सूरज ऐसे ही डूबता होगा? क्या वहाँ के सपने भी गाँव के सपनों जैसे टूटते होंगे या फिर पूरे हो जाते होंगे?

     

    अरुण बाईस साल का था। पिता खेतों में काम करते थे, माँ घर का काम और बहन की शादी की चिन्ता। घर में दो कमरे थे, एक आँगन, और एक पुराना रेडियो जो शाम को फिल्मी गाने बजाता था। अरुण उन गानों को सुनते हुए सोचता था कि मुम्बई में सब कुछ सम्भव है। वहाँ लोग सपने बेचते हैं, सपने खरीदते हैं, और कभी-कभी सपनों के साथ खुद को भी बेच देते हैं।

     

    एक दिन उसने तय कर लिया। सुबह चार बजे उठकर सामान बाँधा दो कमीजें, एक पैंट, माँ का दिया हुआ जनेऊ, और पिता का पुराना घड़ी। माँ रोई, पिता चुप रहे। बहन ने कहा, “भैया, लौटना मत भूलना।” अरुण मुस्कुराया, लेकिन दिल में कुछ और था। वह लौटना नहीं चाहता था। वह शहर में अपना नाम लिखना चाहता था।

     

    ट्रेन में बीस घंटे लगे। मुम्बई पहुँचा तो स्टेशन पर भीड़ ने उसे निगल लिया। लोग दौड़ रहे थे, चीख रहे थे, धक्का दे रहे थे। अरुण ने पूछा, “भाई साहब, दादर कैसे जाऊँ?” एक आदमी ने बिना रुके कहा, “लोकल पकड़।” लोकल क्या होती है, यह उसने पहली बार देखा। लोग खिड़कियों से लटक रहे थे, दरवाजों पर चिपके हुए थे। अरुण किसी तरह घुस गया। हवा में पसीने की गन्ध, तेल की गन्ध, और सपनों की एक अजीब सी गन्ध थी।

     

    दादर पहुँचा। वहाँ एक चाय की दुकान पर बैठकर उसने सोचा। पैसे कम थे। रात कहाँ बिताए? एक बुजुर्ग व्यक्ति ने देखा और पूछा, “नया है?” अरुण ने सिर हिलाया। बुजुर्ग ने कहा, “चल, मेरे साथ। नाम है रामलाल। मैं भी कभी गाँव से आया था।” रामलाल ने उसे एक छोटी सी झुग्गी में जगह दी। झुग्गी में चार लोग रहते थे। रात को छत से पानी टपकता था, लेकिन अरुण को लगा जैसे उसने महल पा लिया हो।

     

    सुबह रामलाल ने कहा, “काम ढूँढ। यहाँ कोई मुफ्त में नहीं खिलाता।” अरुण सड़कों पर निकला। होटलों में पूछा, दुकानों में पूछा, कारखानों के बाहर खड़ा रहा। कहीं “अनुभव चाहिए”, कहीं “अंग्रेजी आनी चाहिए”, कहीं “सिफारिश चाहिए”। तीन दिन बाद एक छोटे से ढाबे में बर्तन धोने का काम मिला। मालिक ने कहा, “दो सौ रोज। खाना मुफ्त।” अरुण ने हाँ कर दी।

     

    ढाबे में दिन भर बर्तन धोता, रात को झुग्गी लौटता। शरीर थक जाता, लेकिन मन नहीं थकता था। वह सोचता था एक दिन मैं भी बड़ा आदमी बनूँगा। एक दिन मेरा नाम अखबार में छपेगा। एक दिन माँ को मैं बड़ा घर दिखाऊँगा।

     

    एक शाम ढाबे में एक लड़की आई। नाम था मेघा। वह कॉलेज की छात्रा थी, पास वाले इलाके में रहती थी। वह रोज चाय पीने आती थी। अरुण जब बर्तन धो रहा होता तो वह मुस्कुराती। एक दिन उसने पूछा, “तुम कहाँ से हो?” अरुण ने गाँव का नाम बताया। मेघा ने कहा, “सपनों का शहर में स्वागत है। लेकिन याद रखना, यहाँ सपने सस्ते नहीं मिलते।”

     

    मेघा से बातें होने लगीं। वह किताबें पढ़ती थी, फिल्में देखती थी, और शहर की सच्चाइयाँ जानती थी। अरुण को उसने सिखाया कि अंग्रेजी के कुछ शब्द कैसे बोलें, कि रिज्यूम क्या होता है, कि इंटरव्यू में कैसे बैठना चाहिए। अरुण रात को झुग्गी में बैठा-बैठा उन शब्दों को दोहराता। रामलाल हँसता, “अरे, तू फिल्म स्टार बनने वाला है क्या?”

     

    तीन महीने बाद अरुण ने ढाबा छोड़ दिया। एक छोटे से ऑफिस में क्लर्क की नौकरी मिली। वेतन तीन हजार। कमरा किराए पर लिया एक छोटा सा कमरा, जहाँ खिड़की से ट्रेन की आवाज आती थी। मेघा कभी-कभी मिलने आती। दोनों समुद्र किनारे बैठते, लहरों को देखते, और सपनों की बात करते।

     

    अरुण ने कहा, “मैं फिल्मों में काम करना चाहता हूँ।” मेघा चुप रही। फिर बोली, “बहुत लोग चाहते हैं। बहुत कम पहुँचते हैं।” अरुण ने जिद की, “मैं पहुँचूँगा।”

     

    उसने एक छोटे से थिएटर ग्रुप में दाखिला लिया। शाम को रिहर्सल, दिन को ऑफिस। थकान शरीर को तोड़ती, लेकिन आँखों में चमक रहती। एक दिन डायरेक्टर ने कहा, “तुम्हारे में कुछ है। लेकिन शहर में सिर्फ ‘कुछ’ काफी नहीं। कनेक्शन चाहिए, पैसा चाहिए, और किस्मत चाहिए।”

     

    अरुण ने कनेक्शन ढूँढे। एक असिस्टेंट डायरेक्टर से मिला, जिसने कहा, “पैसे दो, मैं तुम्हें एक छोटे रोल में डाल दूँगा।” अरुण के पास पैसे नहीं थे। उसने ऑफिस की नौकरी के साथ रात को टैक्सी चलायी। महीने भर में पैसे जमा किए और रोल खरीदा। फिल्म में उसका एक सीन था एक भीड़ में खड़ा आदमी जो सिर्फ मुस्कुराता है। फिल्म रिलीज हुई। किसी ने अरुण का नाम नहीं पूछा।

     

    मेघा ने कहा, “तुमने देखा? शहर ऐसे ही खाता है।” अरुण ने जवाब दिया, “मैं अभी नहीं हारा।”

     

    फिर एक और मौका आया। एक टीवी सीरियल में छोटा रोल। फिर एक विज्ञापन। फिर एक और फिल्म में बैकग्राउंड डांसर। पैसे आने लगे, लेकिन सम्मान नहीं। लोग पूछते, “तुम कौन हो?” अरुण जवाब देता, “मैं सपनों का शहर का एक सपना हूँ।”

     

    एक दिन रामलाल बीमार पड़ गया। अस्पताल में जगह नहीं मिली। अरुण ने सारे पैसे लगा दिए। रामलाल बच गया, लेकिन अरुण फिर से खाली हो गया। कमरा छोड़ा, फिर झुग्गी में लौटा। मेघा आई और बोली, “चलो गाँव लौट चलो। यहाँ कुछ नहीं रखा।” अरुण ने मना कर दिया। “मैं लौटूँगा तब, जब मेरे पास कहने को कुछ होगा।”

     

    समय बीतता गया। अरुण ने लिखा। कहानियाँ लिखीं, स्क्रिप्ट लिखीं। एक छोटी सी कहानी एक पत्रिका में छपी। फिर एक और। फिर एक रेडियो नाटक। पैसे कम थे, लेकिन नाम धीरे-धीरे फैलने लगा।

     

    एक शाम समुद्र किनारे बैठे हुए मेघा ने कहा, “तुम बदल गए हो।” अरुण ने पूछा, “कैसे?” मेघा बोली, “पहले तुम्हारी आँखों में भूख थी। अब समझ है।” अरुण मुस्कुराया, “शहर ने सिखाया कि सपने सिर्फ देखने की चीज नहीं। उन्हें जीना पड़ता है। और जीने के लिए कभी-कभी सपने तोड़ने भी पड़ते हैं।”

     

    फिर एक दिन एक बड़े प्रोडक्शन हाउस से फोन आया। उनकी एक स्क्रिप्ट पसंद आई थी। मीटिंग हुई। अरुण ने अपनी कहानी सुनाई गाँव से शहर आने वाले एक लड़के की कहानी, जो सपनों के पीछे भागता है, गिरता है, उठता है, और अंत में समझता है कि सपना शहर नहीं, खुद के अंदर होता है। डायरेक्टर ने कहा, “यह फिल्म बनेगी। तुम लिखोगे।”

     

    फिल्म बनी। अरुण का नाम लेखक के रूप में आया। प्रीमियर पर माँ-पिता आए। माँ ने आँसू पोंछते हुए कहा, “बेटा, तुमने कर दिखाया।” पिता ने सिर्फ कन्धे पर हाथ रखा। बहन ने कहा, “अब घर आ जाओ।” अरुण ने जवाब दिया, “घर तो अब यहीं है। लेकिन मैं आऊँगा।”

     

    फिल्म चली। लोग तारीफ करने लगे। अरुण अचानक जाना-माना नाम बन गया। इंटरव्यू में पूछा गया, “सपनों का शहर कैसा लगा?” अरुण ने कहा, “यह शहर सपनों को पूरा नहीं करता। यह सिर्फ आईना दिखाता है। जो खुद को देख पाता है, वही आगे बढ़ता है। बाकी लोग भीड़ में खो जाते हैं।”

     

    मेघा अब उसकी पत्नी थी। दोनों एक छोटे से फ्लैट में रहते थे। खिड़की से समुद्र दिखता था। रात को जब लहरें टकरातीं तो अरुण याद करता झुग्गी की रातें, बर्तन धोते हुए हाथ, रामलाल की खांसी, और वह पहला दिन जब ट्रेन से उतरा था।

     

    एक दिन रामलाल आया। बुढ़ापे में शरीर कमजोर हो गया था। अरुण ने उसे गले लगाया। रामलाल बोला, “तूने कर लिया जो मैं नहीं कर पाया।” अरुण ने कहा, “आपके बिना मैं यहाँ नहीं टिक पाता।” रामलाल मुस्कुराया, “सपनों का शहर किसी को अकेला नहीं छोड़ता। या तो तोड़ देता है, या फिर नया बना देता है।”

     

    अरुण ने एक और कहानी लिखनी शुरू की। इस बार शीर्षक था “सपनों का शहर: एक और अध्याय”। लेकिन वह जानता था कि असली कहानी कभी खत्म नहीं होती। शहर चलता रहता है। लोग आते रहते हैं। सपने टूटते रहते हैं और नए सपने जन्म लेते रहते हैं।

     

    एक शाम अरुण समुद्र किनारे अकेला बैठा था। सूरज डूब रहा था। आकाश में वही चमक थी जो कभी गाँव में देखी थी। उसने सोचा क्या मैं पहुँच गया? क्या मेरा सपना पूरा हो गया?

     

    जवाब हवा में था। शहर की रोशनियाँ जल रही थीं। दूर कोई ट्रेन की सीटी बज रही थी। पास कोई गाना गा रहा था। अरुण उठा और चला। उसके कदम अब पहले जैसे नहीं थे। अब उनमें थकान कम, समझ ज्यादा थी।

     

    वापस फ्लैट पहुँचा तो मेघा ने पूछा, “क्या सोच रहे थे?” अरुण ने कहा, “सोच रहा था कि सपनों का शहर असल में कोई जगह नहीं है। यह एक यात्रा है। और यात्रा कभी खत्म नहीं होती। बस, रास्ते बदलते रहते हैं।”

     

    मेघा ने हाथ थाम लिया। दोनों खिड़की के पास खड़े रहे। बाहर शहर चमकीला था, शोरगुल भरा था, और अनगिनत सपनों से भरा हुआ था। कुछ सपने पूरे हो रहे थे, कुछ टूट रहे थे, कुछ नए जन्म ले रहे थे।

     

    अरुण ने धीरे से कहा, “मैं गाँव लौटूँगा एक दिन। लेकिन अभी नहीं। अभी मुझे और लिखना है। और कहानियाँ सुनानी हैं। क्योंकि इस शहर में हर किसी की एक कहानी है। और मेरी कहानी अभी खत्म नहीं हुई।”

     

    रात गहरी हो गई। शहर सो नहीं रहा था। कभी सोता भी नहीं। सपनों का शहर जागता रहता है उन लोगों के लिए जो अभी आए हैं, उन लोगों के लिए जो हार चुके हैं, और उन लोगों के लिए जो अभी भी लड़ रहे हैं।

     

    अरुण बिस्तर पर लेटा। आँखें बंद कीं। नींद में उसे गाँव दिख रहा था खेत, आँगन, माँ का चेहरा, और वह पुराना रेडियो। फिर दृश्य बदला। मुम्बई का स्टेशन, भीड़, रामलाल, मेघा, समुद्र, फिल्म का सेट, और अंत में वह खुद एक लेखक, जो अपनी कहानी खुद लिख रहा था।

     

    सुबह जब उठा तो सूरज की पहली किरण खिड़की से आ रही थी। अरुण मुस्कुराया। उसने नोटबुक खोली और लिखा

     

    “सपनों का शहर में कोई अंत नहीं होता। सिर्फ नए शुरूआत होती हैं। और हर शुरूआत एक नई कहानी लेकर आती है।”

     

    कहानी यहीं खत्म होती है। लेकिन शहर में कहानियाँ कभी खत्म नहीं होतीं। अरुण की कहानी एक एपिसोड में पूरी हो गई गाँव से शहर, संघर्ष से सफलता, सपने से समझ तक। वह पहुँच गया जहाँ पहुँचना चाहता था। लेकिन असली जीत यह नहीं थी कि उसका नाम छापा। असली जीत यह थी कि उसने खुद को खोया नहीं। शहर ने उसे तोड़ा, फिर जोड़ा, और अंत में एक नया इंसान बना दिया।

     

    और यही सपनों का शहर का सच है। यह तुम्हें वह सब कुछ देता है जो तुम चाहते हो बशर्ते तुम देने के लिए तैयार हो। कभी-कभी सपने, कभी-कभी अपनी पुरानी पहचान, और कभी-कभी सिर्फ समय।

     

     

     

    अरुण अब समय के साथ चल रहा था। और शहर उसके साथ चल रहा था। दोनों एक-दूसरे को समझ चुके थे। दोनों एक-दूसरे के बिना अधूरे थे।

  • The vampire love story

    The vampire love story

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    एक बड़ी-सी ऊँची बिल्डिंग थी, जिसकी चमचमाती खिड़कियाँ रात के अँधेरे में भी रोशनी बिखेर रही थीं।उस बिल्डिंग के टॉप फ्लोर की बालकनी में एक लड़का खड़ा था। ठंडी हवा उसके बालों को हल्का-हल्का उड़ा रही थी। 

     

    उसकी गहरी आँखें सामने फैले शहर की जगमगाती लाइट्स को खामोशी से देख रही थीं, जैसे किसी गहरी सोच में डूबा हो।उसके चेहरे पर ना कोई डर था, ना कोई खुशी… बस एक अजीब-सी खामोशी थी।

     

    तभी पीछे से कदमों की आवाज आई।एक दूसरा लड़का वहाँ आया और हल्की गंभीर आवाज में बोला__भाई… तू चल रहा है? कार रेडी है।

     

    दूसरा लड़का हल्का-सा हँसते हुए बोला__तू चल… मैं आ जाऊँगा। पहला लड़का उसकी बात सुनकर बस ना में सिर हिलाता है और धीमी आवाज में बोलता है__तू नहीं सुधरेगा।”

     

    दूसरा लड़का अपने होंठों पर एक तिरछी-सी स्माइल लाते हुए बोला__कभी नहीं…

     

    इतना कहकर उसने धीरे-धीरे अपनी आँखें बंद कीं।चारों तरफ अचानक तेज हवाएँ चलने लगीं। उसके आसपास का माहौल एकदम बदल गया, जैसे हवा में कोई रहस्यमयी शक्ति फैल गई हो।

     

    फिर उसने अपनी आँखें खोलीं…और उसकी आँखें गहरे नीले रंग में चमक उठीं।

     

    उसके चेहरे पर अब इंसानों जैसी मासूमियत नहीं, बल्कि एक खतरनाक रहस्य साफ दिखाई दे रहा था।

     

    अचानक उसकी पीठ से बड़े-बड़े काले पंख निकल आए। पंखों के निकलते ही हवा का तेज झोंका पूरे टॉप फ्लोर में फैल गया।

     

    पहला लड़का बस शांत खड़ा उसे देखता रहा, जैसे ये सब उसके लिए कोई नई बात ना हो।

     

    दूसरा लड़का हल्का-सा मुस्कुराया, फिर एक झटके में हवा में उड़ा और रात के काले आसमान में गायब हो गया।

     

    दूसरे लड़के के आसमान में गायब होते ही वहाँ कुछ पल के लिए गहरी खामोशी छा गई।ठंडी हवाएँ अब भी तेज़ी से बह रही थीं।पीछे खड़ा पहला लड़का आसमान की तरफ देखते हुए धीरे से बोला__ये कभी किसी की भी नहीं सुनेगा…

     

    वहीं शहर के दूसरी तरफ…एक छोटी-सी बस्ती के मोहल्ले में सुबह-सुबह काफी शोर मचा हुआ था।

     

    एक लड़की गुस्से में एक सब्जी वाले पर चिल्लाते हुए बोल रही थी__ऐसे कैसे नहीं सुनेंगे? सुनना पड़ेगा आपको!

     

    सब्जी वाला भी परेशान होकर बोला__अरे बहनजी, बस दो ही टमाटर तो खराब निकले हैं!लेकिन लड़की और तेज आवाज में बोली__दो टमाटर के पैसे भी पैसे होते हैं!

     

    तभी मोहल्ले के एक छोटे-से घर का दरवाजा तेजी से खुला। वहाँ से एक दूसरी लड़की दौड़ते हुए बाहर आई और खुद से बड़बड़ाने लगी__ये लड़की भी कभी नहीं सुनती…

     

    वो जल्दी से वहाँ पहुँची और पहली लड़की का हाथ पकड़कर धीरे से बोली__बस कर मेरी मां! अगर तेरी आवाज मम्मी तक पहुँच गई ना, तो घर में महाभारत हो जाएगी।”

     

    दूसरी लड़की तुरंत शिकायत भरे अंदाज में बोली__दी! आप देखो ना, इन भैया ने खराब टमाटर दिए हैं!

     

    पहली लड़की ने आँखें छोटी करते हुए उसकी तरफ देखा और बोली__सीरियसली, माही? तू एक टमाटर के लिए पूरा मोहल्ला सिर पर उठा रही है?

     

    माही ने मासूम सा चेहरा बनाकर कहा__एक नहीं दी… तीन टमाटर खराब हैं। इतना सुनते ही पहली लड़की ने अपना माथा पकड़ लिया।

    आसपास खड़े लोग अपनी हँसी रोकने की कोशिश करने लगे, और सब्जी वाला मन ही मन भगवान को याद कर रहा था।

     

     

    (माही का पूरा नाम माही शुक्ला है।उम्र लगभग 20 साल, हाइट 5 फीट।उसकी बड़ी-बड़ी काली आँखें किसी की भी नजर रोक लें, छोटी-सी तीखी नाक, गुलाब की पंखुड़ियों जैसे नरम होठ और कमर तक लंबे काले बाल उसकी खूबसूरती को और बढ़ा देते थे।

     

    लेकिन माही की सबसे खूबसूरत चीज उसका चेहरा नहीं… बल्कि उसका दिल था।वो दिल की बहुत साफ, मासूम और दूसरों की मदद करने वाली लड़की थी। उसे गलत बात बिल्कुल पसंद नहीं थी, इसलिए छोटी-छोटी बातों पर भी लड़ पड़ती थी।

     

    माही की जिंदगी आसान नहीं थी।उसके माँ-पापा अब इस दुनिया में नहीं थे।उसकी दुनिया बस उसकी छोटी बहन नैंसी थी, जो अभी सिर्फ 7 साल की थी। माही अपनी छोटी बहन से बहुत प्यार करती थी और उसके लिए कुछ भी कर सकती थी।

     

    वहीं उसके साथ खड़ी लड़की थी दिव्या…रिश्ते में माही की चाची की बेटी, लेकिन दोनों का रिश्ता सगी बहनों से भी ज्यादा गहरा था।

     

    दिव्या की उम्र 21 साल थी और उसकी हाइट लगभग 5 फीट 2 इंच।भूरी आँखें, हल्के लाल होठ, छोटी-सी नाक और लंबे बाल उसकी खूबसूरती में चार चाँद लगाते थे। जहाँ माही शांत और मासूम थी, वहीं दिव्या का नेचर थोड़ा तेज था। वो बेबाक थी और किसी से डरना उसे नहीं आता था।

     

    दिव्या की माँ थीं, लेकिन उसके पापा अब इस दुनिया में नहीं थे। शायद यही वजह थी कि दोनों लड़कियाँ एक-दूसरे का सहारा बन चुकी थीं।)

     

     

    माही ने हाथ में पकड़े टमाटरों को देखते हुए धीमी आवाज में कहा__पर दी… आप इतनी मेहनत से पैसे कमाती हो…

     

    दिव्या कुछ बोल पाती, उससे पहले ही पीछे से एक तेज आवाज आई__और तू ऐश से उड़ाती है!

     

    ये कहते हुए एक औरत घर के दरवाजे से बाहर आई और आकर माही और दिव्या के सामने खड़ी हो गई।उनके चेहरे पर गुस्सा साफ दिखाई दे रहा था।

     

    ये थीं शालू जी, दिव्या की माँ। उन्हें देखते ही माही थोड़ा घबरा गई और धीरे से बोली__आप ऐसा क्यों बोल रही हो, चाची?

     

    शालू जी कुछ बोलने ही वाली थीं कि तभी पीछे खड़ी दिव्या तुरंत बोल पड़ी__माँ, बस करो अब! चलो सब अंदर।

     

    शालू जी माही से बोलती है।शालू जी __ अब चलो महारानी, चल कर खाना बना दो। मेरी बेटी को भूखा मारने का इरादा है।

    दिव्या __ मां आप भी ना।

     

    इतना बोलकर दिव्या शालू जी का हाथ पकड़ कर अंदर ले जाती है। थोड़ी देर में शालू जी अंदर हॉल में सोफे पर बैठी थी और दिव्या अपने कमरे में तैयार हो रही थी और माही किचिन में नाश्ता बना रही थी।

     

    माही का घर 🏠 ना ज्यादा छोटा था ना ज्यादा बड़ा। घर में कुल 3 कमरे थे, जिसमें एक कमरे में माही और नैंसी रहती थीं, एक कमरे में दिव्या रहती थी और एक कमरे में शालू जी।

    घर में एक छोटा-सा हॉल और एक छोटी-सी किचिन भी थी। 

     

     

    तभी दिव्या अपने कमरे से बाहर आती है और हॉल के कोने में रखी एक छोटी-सी टेबल पर बैठ जाती है। माही भी टेबल पर नाश्ता सर्व करने लगती है।

     

    तभी नैंसी भी अपनी स्कूल बैग और यूनिफॉर्म पहने बाहर आती है और बोलती है__माही, मेरे स्कूल का टाइम हो गया है।

     

    माही मुस्कुराकर बोलती है__तुम्हारा टिफिन रेडी है। तुम नाश्ता कर लो, फिर मैं तुम्हें स्कूल छोड़ आऊंगी।

     

    नैंसी भी टेबल पर बैठ जाती है और नाश्ता करने लगती है।दिव्या नैंसी का गाल खींचकर बोलती है__ कैसी चल रही पढ़ाई, नैंसी बेबी?

     

    ये सुनकर नैंसी मुंह बनाकर बोलती है__मैं कोई छोटी बच्ची नहीं हूं। I am a big girl.

     

    ये सुनकर दिव्या हंसते हुए बोलती है__ओह अच्छा! तुम बड़ी हो गई हो, फिर माही की शादी से पहले तुम्हारी शादी करनी पड़ेगी।

     

    ये सुनकर सब हंसने लगते हैं और नैंसी का मुंह बन जाता है।

     

    नाश्ता करने के बाद दिव्या माही से बोलती है__ माही, नैंसी को स्कूल छोड़कर जल्दी आ जाना। आज बुटीक में बहुत काम है।

     

    माही __ ठीक है दी! मैं जल्दी आ जाऊंगी।

    फिर दिव्या अपने बुटीक और माही नैंसी को स्कूल छोड़ने निकल जाती है। 

     

     

     

    वहीं दूसरी तरफ…

     

    एक करोड़ों की कीमत वाली काली लग्जरी कार तेज रफ्तार में सड़क पर दौड़ रही थी।कार के शीशों से बाहर शहर की चमचमाती लाइट्स साफ दिखाई दे रही थीं।

     

    कार के अंदर दो लड़के बैठे थे।एक की उम्र लगभग 27 साल थी और दूसरे की 26 साल।

    दोनों के चेहरे पर अजीब-सी गंभीरता थी, जैसे वो किसी बहुत बड़े काम के लिए निकले हों।

     

    कार चला रहा लड़का पूरी नजर सड़क पर टिकाए हुए था, जबकि उसके बगल में बैठा लड़का खिड़की से बाहर देखते हुए गहरी सोच में डूबा हुआ था।

     

    कुछ सेकंड की खामोशी के बाद पहला लड़का धीमी लेकिन गंभीर आवाज में बोला__कु

    छ पता चला उसका?

     

    आखिर कौन है ये लड़का और किस को ढूंढ़ रहा है। जानने के लिए पढ़ते रहिए हमारी कहानी।  

     

     

     

  • The vampire love story

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

  • प्रेम…

    प्रेम…

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

                          प्रेम ….

    मैं अपने दर्द भी भूल जाऊं जो तेरी बाहों में आऊं 

    ना चाहतें हैं मुझे सुनहरे सपनों की,

    ना चाहते है मुझे किसी अपने की,

    तेरे कंधे पर सर रखकर सुकून 

    दिल में उतर जाता है,

    मैं कैसे कहूं तुम पर मुझे कितना प्यार आता है,

    तुम मेरी भीगती आंखों को अपनी

    हथेलियों में थाम लो,

    मैं कहता हूं मैं ठीक हूं फिर भी

    तुम खुद के गले से लगा लो,

    ना जाने ये कैसी कशिश है जो तेरी

    आंखों से नजरें मेरी हटती नहीं ,

    मैं जाना चाहूं कहीं भी दूर तुमसे फिर भी

    शाम ढले दिल मेरा तेरा ही नाम पुकारे ,

    प्यार भरा रिश्ता ये तुम्हारा मुझ को

    लगता है जग में सबसे प्यारा , तुम से

    मिलकर सुकून दिल में उतर जाता है ,

    तेरे होठों की हंसी मेरे अल्फ़ाज़ से

    मिलकर एक ख्वाहिश सी दिल में जगाती है ,

    मैं एक घायल परिंदा तेरी बाहों में

    सिमट कर नयी सांसों को पाता हूं