रसोई से इलायची और घी की खुशबू पूरे घर में फैल रही थी। अनुराधा ने चावल के बर्तन में चीनी डाली, फिर मुट्ठी भर किशमिश और काजू। लकड़ी के चम्मच से धीरे-धीरे चलाते हुए उसकी आँखें भर आईं। आज भी वह मीठा पुलाव बना रही थी, लेकिन खाने वाला अब सिर्फ एक ही था—उसकी आठ साल की बेटी, अनु।
अनु दौड़ती हुई रसोई में आई और माँ की साड़ी का पल्लू पकड़कर बोली, “माँ, आज फिर मीठा पुलाव? आपको तो नमकीन पुलाव ज़्यादा पसंद है ना?”
अनुराधा मुस्कुराई, लेकिन वह मुस्कान आँखों तक नहीं पहुँची।
“हाँ बेटा… लेकिन तुम्हारे पापा कहते थे कि मीठा पुलाव खाने से घर में मिठास बनी रहती है।”
अनु कुछ पल चुप रही। उसने दीवार पर टंगी अपने पिता की तस्वीर की ओर देखा। तस्वीर पर चढ़ी माला थोड़ी सूख चुकी थी।
“माँ… पापा को गए दो साल हो गए… क्या उन्हें हमारी याद आती होगी?”
अनुराधा का हाथ काँप गया। चम्मच बर्तन से टकराया और हल्की सी आवाज़ आई।
उसने अनु को अपनी गोद में बिठा लिया।
“बहुत आती होगी… जितनी हमें उनकी आती है।”
अनु ने मासूमियत से पूछा, “फिर वो वापस क्यों नहीं आते?”
इस सवाल का जवाब शायद दुनिया की किसी माँ के पास नहीं होता।
अनुराधा ने बस बेटी का माथा चूम लिया।
—
दो साल पहले तक यही घर हँसी से भरा रहता था।
हर रविवार अनु के पिता, अमन, खुद रसोई में खड़े होकर मीठा पुलाव बनाते थे। वह कहते थे, “जिस घर में मीठे पुलाव की खुशबू हो, वहाँ नाराज़गी ज़्यादा देर नहीं टिकती।”
अनुराधा हँसते हुए कहती, “इतनी तारीफ़ मत किया करो अपने पुलाव की।”
और अमन जवाब देते, “देख लेना, एक दिन यही पुलाव मेरी याद बन जाएगा।”
तब किसी ने नहीं सोचा था कि यह बात सच हो जाएगी।
एक सड़क दुर्घटना ने सब कुछ बदल दिया।
अनु तब सिर्फ छह साल की थी।
उसे समझ ही नहीं आया कि अस्पताल से लौटते समय लोग उसके पापा को सफेद चादर में क्यों लपेटे हुए थे।
उस दिन के बाद अनुराधा ने महीनों तक रसोई में मीठा पुलाव नहीं बनाया।
हर बार चावल हाथ में आते तो अमन की मुस्कान याद आ जाती।
—
समय धीरे-धीरे आगे बढ़ा, लेकिन कुछ दर्द कभी पुराने नहीं होते।
अनु अब बड़ी हो रही थी।
वह समझने लगी थी कि उसकी माँ हर रात चुपके से रोती है।
एक रात उसने देखा कि अनुराधा पुराने एलबम को सीने से लगाकर बैठी है।
अनु बिना कुछ बोले माँ के पास गई।
उसने अपनी छोटी हथेली माँ के आँसू पोंछने के लिए आगे बढ़ाई।
“माँ…”
“हाँ बेटा?”
“अगर मैं बड़ी होकर पापा जैसी बन जाऊँ… तो क्या आप फिर कभी नहीं रोओगी?”
अनुराधा फूट-फूटकर रो पड़ी।
उसने बेटी को कसकर गले लगा लिया।
“तुम्हें किसी जैसा बनने की ज़रूरत नहीं है… तुम बस मेरी अनु बनी रहना।”
—
कुछ दिन बाद स्कूल में “माँ के लिए उपहार” प्रतियोगिता थी।
सब बच्चे महंगे गिफ्ट बना रहे थे।
किसी ने कार्ड बनाया, किसी ने पेंटिंग।
लेकिन अनु चुपचाप घर आई और पड़ोस वाली दादी से बोली—
“दादी… मुझे मीठा पुलाव बनाना सिखा दीजिए।”
दादी ने हैरानी से पूछा, “इतनी छोटी सी बच्ची… क्यों?”
अनु बोली, “माँ जब भी मीठा पुलाव बनाती हैं, रोने लगती हैं। इस बार मैं बनाऊँगी… ताकि माँ सिर्फ खाएँ… रोएँ नहीं।”
दादी की आँखें भर आईं।
उन्होंने बड़े प्यार से अनु को हर चीज़ सिखाई।
चावल कितने धोने हैं…
घी कितना डालना है…
इलायची कब डालनी है…
और सबसे ज़रूरी…
खाना बनाते समय मन में प्यार होना चाहिए।
—
मदर्स डे की सुबह अनुराधा देर तक सोती रही।
रसोई से कुछ जलने जैसी हल्की खुशबू आई।
वह घबराकर उठी।
रसोई में पहुँची तो देखा…
अनु स्टूल पर खड़ी थी।
बाल बिखरे हुए।
चेहरे पर पसीना।
हाथ में बड़ा सा चम्मच।
और सामने आधा जला, आधा पका मीठा पुलाव।
अनु डर गई।
“सॉरी माँ… थोड़ा जल गया…”
अनुराधा कुछ पल तक उसे देखती रही।
फिर उसने गैस बंद की।
बेटी को गोद में उठा लिया।
“ये किसने बनाया?”
“मैंने…”
“क्यों?”
अनु की आँखें भर आईं।
“क्योंकि… मैं नहीं चाहती कि आप हर बार पापा को याद करके रोओ। आज आप सिर्फ मेरी माँ बनकर खाना खाइए…”
बस…
इतना सुनना था कि अनुराधा की दुनिया जैसे थम गई।
उसने पहली बार महसूस किया कि उसकी छोटी सी बेटी, उम्र से बहुत पहले बड़ी हो गई थी।
—
दोनों ने उसी जले हुए मीठे पुलाव को प्लेट में परोसा।
अनुराधा ने पहला कौर खाया।
चीनी कहीं ज़्यादा थी।
चावल कुछ कच्चे थे।
किशमिश भी आधी जली हुई थी।
लेकिन…
उसे लगा कि उसने ज़िंदगी का सबसे स्वादिष्ट भोजन खाया है।
क्योंकि उसमें घी कम था…
प्यार ज़्यादा था।
—
रात को अनु ने धीरे से पूछा—
“माँ… पापा को हमारा पुलाव पसंद आता?”
अनुराधा मुस्कुराई।
“नहीं…”
अनु उदास हो गई।
“क्यों?”
“क्योंकि वो कहते… इसमें चीनी थोड़ी कम है।”
दोनों हँस पड़ीं।
और उसी हँसी में बरसों का दर्द धीरे-धीरे पिघलने लगा।
अनुराधा ने आसमान की ओर देखा।
उसे लगा जैसे कहीं दूर अमन मुस्कुरा रहे हों।
उसने मन ही मन कहा—
“देखो अमन… तुम्हारा मीठा पुलाव अब सिर्फ एक खाना नहीं रहा। यह हमारी याद है… हमारी ताकत है… और हमारी बेटी का सबसे खूबसूरत प्यार भी।”
उस रात बहुत दिनों बाद अनुराधा बिना रोए सो गई।
और अनु ने माँ का हाथ पकड़कर आँखें बंद कर लीं।
कभी-कभी जीवन की सबसे बड़ी खुशियाँ महंगे उपहारों में नहीं मिलतीं।
वे मिलती हैं एक छोटी-सी रसोई में, आधे जले हुए मीठे पुलाव की खुशबू में, और उस मासूम बच्चे के दिल में, जो अपने हिस्से का बचपन छोड़कर अपनी माँ की मुस्कान बचाने की कोशिश करता है।
यही प्यार है।
यही परिवार है।
और शायद यही वह मिठास है, जो किसी भी मीठे पुलाव से कहीं अधिक मीठी होती है।


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