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  • भक्ति में शक्ति

    भक्ति में शक्ति

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    शीर्षक: सावन का महीना 🌿🕉️❤️

     

    सावन की पहली फुहार जैसे ही धरती पर गिरी, पूरे गाँव का रंग ही बदल गया। सूखी पगडंडियाँ भीगकर महक उठीं, आम और नीम के पेड़ों की पत्तियाँ धुलकर चमकने लगीं और दूर शिव मंदिर की घंटियों की आवाज़ वातावरण को भक्ति से भर रही थी।

     

    सुबह का समय था।

     

    हल्की-हल्की बारिश हो रही थी। गाँव की औरतें सिर पर पल्ला किए और हाथ में पूजा की थाली लिए मंदिर की ओर जा रही थीं। कोई “ॐ नमः शिवाय” का जाप कर रहा था तो कोई भोलेनाथ के भजन गुनगुना रहा था।

     

    उसी गाँव में रहती थी गौरी।

     

    बाईस साल की गौरी… बड़ी-बड़ी काली आँखें, चेहरे पर सादगी और दिल में भगवान शिव के लिए अटूट श्रद्धा।

    गौरी बचपन से ही हर सावन सोमवार का व्रत रखती थी। लेकिन इस बार उसका व्रत किसी इच्छा के लिए नहीं था।

     

    इस बार उसने सिर्फ एक प्रार्थना की थी, 

     

    “हे महादेव… मेरे हिस्से की सारी खुशियाँ किसी और को दे देना… बस मेरे बाबा को ठीक कर देना।”

     

    उसके पिता पिछले छह महीनों से बीमार थे। इलाज में उनके खेत बिक चुके थे, घर गिरवी रखा जा चुका था और दवाइयों के लिए भी पैसे नहीं बचे थे।

     

    फिर भी हर सोमवार गौरी बिना कुछ खाए-पिए शिव मंदिर जाती, गंगाजल चढ़ाती और मुस्कुराकर लौट आती। उसके मासूम मन में जरा भी छल कपट नहीं था।

     

    गाँव वाले अक्सर कहते,  

    “इतनी पूजा से क्या होगा? इलाज के लिए पैसे चाहिए, भगवान नहीं।”

     

    गौरी बस मुस्कुरा देती और कहती, “भगवान कभी किसी को खाली हाथ नहीं लौटाते।”

     

    दूसरा सावन सोमवार… इस बार बारिश पहले से ज़्यादा तेज़ थी, जैसे भोलेनाथ उसके सब्र की परीक्षा ले रहे हों।

     

    गौरी मंदिर जा रही थी कि रास्ते में उसे लगभग सत्तर साल का एक बूढ़ा आदमी दिखाई दिया।

     

    वह पूरी तरह भीग चुका था। हाथ काँप रहे थे। लाठी भी कीचड़ में फँस गई थी।

    लोग उसके पास से निकल रहे थे लेकिन किसी ने भी रूककर मदद करने की हिम्मत नहीं की।

     

    लेकिन उन्हें देखते ही गौरी तुरंत दौड़ी। “बाबा… आइए, मैं सहारा देती हूँ।”

     

    उसने उन्हें उठाया, अपनी ओढ़नी से उनका चेहरा पोंछा और मंदिर की सीढ़ियों तक पहुँचाया।

     

    बूढ़े ने मुस्कुराकर पूछा,  “अरे बेटी… तुम खुद भी भीग रही हो।”

     

    गौरी हँस पड़ी। “सावन की बारिश में भीगने से तो भोलेनाथ भी खुश होते हैं, बाबा। आप मेरी चिंता मत कीजिए”

     

    बूढ़े ने उसकी तरफ गहरी नज़र से देखा। “अगर भगवान आज तुम्हारे सामने आ जाएँ तो क्या माँगोगी?”

     

    गौरी कुछ पल चुप रही।

    फिर बोली,  “अपने लिए कुछ नहीं चाहिए मुझे।

    बस मेरे बाबा ठीक हो जाएँ। और कोई भी बेटी कभी भी अपने पिता को इस हालत में न देखे।”

     

    गौरी की बातें सुनकर उस बूढ़े की आँखें भर आईं।

    उन्होंने आशीर्वाद दिया, “तुम्हारी हर मनोकामना पूरी होगी।”

     

    गौरी मुस्कुराकर मंदिर के अंदर चली गई। जब पूजा करके बाहर आई… तो वह बूढ़ा कहीं दिखाई नहीं दिया।

     

    उसने आसपास बहुत खोजा… लेकिन जैसे वह कभी था ही नहीं।

     

    तीसरा सोमवार…

     

    गौरी ने देखा कि मंदिर के बाहर एक छोटा बच्चा रो रहा था। उसकी माँ बेहोश पड़ी थी। लोग तमाशा देख रहे थे।

     

    गौरी तुरंत दौड़ी। अपने पूजा के लिए रखे पैसे निकालकर उसने ऑटो बुलाया और माँ-बेटे को अस्पताल पहुँचा दिया।

     

    उस दिन वह शिवलिंग पर दूध भी नहीं चढ़ा सकी।

    घर लौटी तो माँ ने देखा कि आज उसके हाथ में कुछ भी नहीं है इसलिए उन्होंने पूछ लिया,”पूजा नहीं की?”

     

    गौरी मुस्कुराई। “आज शायद महादेव मंदिर में नहीं…

    अस्पताल में मिल गए थे।”

    समय धीरे-धीरे बीतता गया। गौरी का भोलेनाथ पर विश्वास अटूट बना रहा।

     

    सावन का आखिरी सोमवार आ गया। उस दिन मंदिर में बहुत भीड़ थी। हर कोई बड़ी-बड़ी थालियाँ लेकर आया था। किसी के पास पाँच लीटर दूध था। किसी के पास चाँदी का नाग। किसी ने सोने का मुकुट चढ़ाया।

     

    गौरी के पास… सिर्फ एक लोटा पानी और बेलपत्र थे।

    वह धीरे-धीरे लाइन में लगी रही।

     

    तभी मंदिर के पुजारी ने घोषणा की,  “आज मंदिर के जीर्णोद्धार के लिए जो सबसे बड़ा दान देगा, उसका विशेष अभिषेक होगा।”

     

    लोगों ने हजारों रुपए चढ़ाने शुरू कर दिए। गौरी चुपचाप पीछे हट गई।

     

    उसे लगा… उसके पास देने के लिए कुछ भी नहीं।

    तभी मंदिर के बाहर वही बूढ़ा फिर दिखाई दिया। इस बार उनके पैरों में चोट लगी थी। गौरी बिना सोचे दौड़ी।

    अपनी पूजा की थाली नीचे रख दी।

     

    अपने दुपट्टे का किनारा फाड़कर उनके पैर पर पट्टी बाँध दी। बूढ़े ने मुस्कुराकर पूछा,  “बेटा, तुम्हारी पूजा?”

     

    गौरी ने हाथ जोड़ लिए। “बाबा… जहाँ इंसान की सेवा हो…

    वहीं भगवान की पूजा होती है।”

     

    इतना सुनते ही अचानक मंदिर की घंटियाँ अपने आप बजने लगीं। तेज़ हवा चलने लगी। बारिश की बूँदें जैसे रुक गईं।

     

    गौरी ने पलटकर देखा… वहाँ कोई बूढ़ा नहीं था। सिर्फ एक सफेद बेलपत्र पड़ा था… जिस पर तीन धारियाँ बनी थीं।

     

    उसका दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा। उसी शाम गाँव में एक बड़ी गाड़ी आकर रुकी। उसमें से एक उद्योगपति उतरे।

     

    उन्होंने पूरे गाँव को इकट्ठा किया। और कहने लगे, “बीस साल पहले… मैं इसी गाँव का रहने वाला था।

    जब मेरा सब कुछ खत्म हो गया था… तब एक किसान ने मेरी मदद की थी।

    आज मैं उसी किसान का कर्ज़ चुकाने आया हूँ।”

     

    उन्होंने नाम लिया, “रामस्वरूप।”

     

    वह गौरी के पिता थे। गौरी भी भीड़ में खड़ी थी जैसे ही उसने नाम सुना वो हैरान रह गई।

     

    उद्योगपति बोले, “उनकी ईमानदारी की वजह से आज मैं इस मुकाम पर हूँ। आज मैं उनको कर्ज चुकाने आया हूँ। मुझे पता चला है कि वो बहुत समय से बीमार है, इसलिए अब उनके इलाज का पूरा खर्च मैं उठाऊँगा।

    साथ ही उनका खेत भी वापस दिलाऊँगा।”

     

    इतना सुनते ही पूरा गाँव तालियाँ बजाने लगा।

     

    गौरी की आँखों से आँसू बहने लगे। उसने मन ही मन कहा, “महादेव… आपने मेरी सुन ली।”

     

    कुछ महीनों बाद… गौरी के पिता पूरी तरह स्वस्थ हो चुके थे। खेत फिर से हरे-भरे हो गए थे। घर की खुशियाँ लौट आई थीं।

     

    एक शाम गौरी मंदिर में दीपक जलाने गई। वहीं मंदिर के पुजारी मुस्कुराकर बोले,  “बेटी…

    क्या तुम्हें पता है? जिस बूढ़े की तुमने दो बार मदद की… उसे इस गाँव में किसी और ने कभी नहीं देखा।”

     

    गौरी चौंक गई। “क्या मतलब?”

     

    पुजारी धीरे से बोले, “उस दिन मैं भी पूरे समय मंदिर में था। तुम अकेली ही किसी से बातें कर रही थीं।”

     

    गौरी के हाथ काँपने लगे। उसने शिवलिंग की ओर देखा। उसे ऐसा लगा जैसे शिवलिंग पर जल की धार के बीच एक क्षण के लिए मुस्कुराता हुआ चेहरा दिखाई दिया।

     

    उसकी आँखों से आँसू बह निकले। वह वहीं बैठ गई।

    उसने समझ लिया, 

     

    महादेव कभी चमत्कार दिखाकर नहीं आते।

    वे किसी भूखे की भूख बनकर आते हैं…

    किसी घायल का दर्द बनकर आते हैं…

    किसी बूढ़े की लाठी बनकर आते हैं…

     

    और किसी बेटी की उम्मीद बनकर उसके आँसू पोंछ जाते हैं।

     

    उस दिन गौरी ने पहली बार अपने लिए कुछ माँगा।

    उसने हाथ जोड़कर कहा,  “भोलेनाथ…

    मुझे इतना समर्थ बना देना कि मैं हर सावन किसी ज़रूरतमंद की मदद कर सकूँ।

    यही मेरी सबसे बड़ी पूजा होगी।”

     

    मंदिर की घंटी एक बार फिर गूँज उठी।

     

    बारिश की ठंडी बूँदें उसके चेहरे पर आकर ठहर गईं।

    गौरी मुस्कुरा दी। अब उसे किसी चमत्कार की प्रतीक्षा नहीं थी।

     

    क्योंकि वह समझ चुकी थी कि सच्ची भक्ति केवल मंदिर में जल चढ़ाने से नहीं, बल्कि किसी के जीवन में आशा का दीप जलाने से पूरी होती है।

     

    उसके बाद हर सावन में गाँव की एक नई परंपरा शुरू हुई। लोग पहले किसी गरीब, बीमार या असहाय व्यक्ति की मदद करते, फिर शिव मंदिर में जल चढ़ाने जाते। 

     

    धीरे-धीरे यह परंपरा आसपास के गाँवों तक फैल गई। लोग कहते थे कि इस गाँव में सावन सिर्फ़ बरसात नहीं लाता, बल्कि इंसानियत की खुशबू भी साथ लाता है।

     

    और जब भी सावन की पहली बारिश होती, गौरी मंदिर की सीढ़ियों पर खड़ी होकर मुस्कुरा देती। उसे ऐसा महसूस होता जैसे हवा के साथ कोई धीमी-सी आवाज़ उसके कानों में फुसफुसा रही हो, 

    “जहाँ करुणा है, वहीं मैं हूँ। जहाँ प्रेम है, वहीं मेरा वास है।”

     

    उसने आसमान की ओर देखा। बादलों के पीछे छिपा चाँद दिखाई नहीं दे रहा था, लेकिन उसे विश्वास था कि जैसे बादलों के पीछे चाँद हमेशा मौजूद रहता है, वैसे ही हर सच्चे मन के पीछे महादेव की कृपा भी हमेशा रहती है।

    समाप्त। 🕉️🌿

     

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    धन्यवाद 🙏🏻

  • एक गांव का राक्षस

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    बहुत समय पहले घने जंगलों और ऊँचे पहाड़ों के बीच शिवपुर नाम का एक छोटा-सा गाँव बसा हुआ था। गाँव के लोग बहुत ही सीधे-सादे, मेहनती और भगवान पर अटूट विश्वास रखने वाले थे। गाँव के ठीक बीचोंबीच मां भवानी का एक प्राचीन मंदिर था। हर सुबह और हर शाम पूरा गाँव वहीं इकट्ठा होकर आरती करता और अपनी खुशियों की प्रार्थना करता था। लेकिन कई वर्षों से उस गाँव पर एक भयानक संकट मंडरा रहा था। जंगल की सबसे ऊँची पहाड़ी पर कालमुख नाम का एक राक्षस रहता था। उसका शरीर पहाड़ जैसा विशाल, आँखें जलते अंगारों जैसी लाल और उसकी दहाड़ सुनकर पेड़ों के पत्ते तक काँप उठते थे। जब भी उसे तेज भूख लगती, वह गाँव में आ धमकता और किसी एक छोटे बच्चे को उठाकर ले जाता। उसके जाने के बाद पूरे गाँव में सिर्फ मातम और चीख-पुकार रह जाती। हर माँ अपने बच्चे को सीने से लगाए रहती। कोई भी बच्चा अकेले घर से बाहर नहीं निकलता था। शाम ढलते ही पूरा गाँव अपने घरों के दरवाजे बंद कर लेता। एक दिन फिर वही मनहूस घड़ी आ गई। जंगल की ओर से कालमुख की भयानक दहाड़ गूँजी। “वो आ गया… राक्षस आ गया…!” किसी ने घबराकर चिल्लाया। लोग अपने बच्चों को लेकर इधर-उधर भागने लगे। लेकिन कालमुख ने एक सात साल के मासूम बच्चे को पकड़ लिया। उसकी माँ रोते हुए उसके पैरों में गिर पड़ी। “मेरे बच्चे को छोड़ दे… मैं तेरे हाथ जोड़ती हूँ… उसे मत ले जा…” कालमुख ज़ोर-ज़ोर से हँसने लगा। “हा… हा… हा… तुम्हारे आँसू देखकर ही मेरी भूख और बढ़ जाती है।” इतना कहकर वह बच्चे को लेकर जंगल की ओर चला गया। पूरा गाँव सन्न रह गया। किसी घर में उस दिन चूल्हा नहीं जला। अगली सुबह गाँव के सभी लोग मां भवानी के मंदिर पहुँचे। सबकी आँखों में आँसू थे। गाँव के बुज़ुर्ग ने हाथ जोड़कर कहा, “हे मां… अब हमसे अपने बच्चों का दुख नहीं देखा जाता। हमारी रक्षा करो।” पूरा मंदिर “जय मां भवानी” के जयकारों से गूँज उठा। तभी मंदिर के बाहर जोरदार ठहाका सुनाई दिया। सबने बाहर देखा। कालमुख मंदिर की सीढ़ियों पर खड़ा था। वह हँसते हुए बोला, “हर बार इसी मूर्ति से मदद माँगते हो? अगर तुम्हारी देवी में शक्ति है तो मुझे रोककर दिखाए।” उसने मंदिर की ओर देखकर उपहास किया और बोला, “अगली पूर्णिमा को मैं फिर आऊँगा… और इस बारपहले से भी छोटे बच्चे को लेकर जाऊँगा।” इतना कहकर वह हँसता हुआ जंगल की ओर लौट गया। पूरा गाँव डर से काँप उठा। उसी गाँव में हरिराम और सीता नाम का एक गरीब दंपति रहता था। दोनों की शादी को कई साल हो चुके थे, लेकिन उनकी कोई संतान नहीं थी। फिर भी उन्होंने कभी भगवान से शिकायत नहीं की। वे रोज़ मंदिर की सफाई करते, दीपक जलाते और मां भवानी की सेवा करते। एक रात सीता मंदिर में बैठी रो रही थी। “हे मां… अगर मेरी गोद भरनी है, तो ऐसी संतान देना जो सिर्फ मेरी नहीं, पूरे गाँव की रक्षा करे।” उसकी आँखों से लगातार आँसू बह रहे थे। अचानक मंदिर में रखा दीपक अपने आप तेज़ जलने लगा। बिना हवा के मंदिर की घंटियाँ बजने लगीं। पूरा मंदिर दिव्य प्रकाश से भर गया। सीता ने काँपते हुए सिर उठाया। उसे लगा जैसे मां भवानी की मूर्ति मुस्कुरा रही हो। तभी एक मधुर आवाज़ गूँजी— “डर मत पुत्री। तुम्हारी भक्ति व्यर्थ नहीं जाएगी। समय आने पर मेरी शक्ति तुम्हारे घर जन्म लेगी। वह दिव्य कन्या इस गाँव को राक्षस के आतंक से मुक्त करेगी।” इतना कहकर प्रकाश धीरे-धीरे गायब हो गया। सीता ने यह बात हरिराम को बताई, लेकिन दोनों ने इसे किसी और से नहीं कहा। कुछ दिनों बाद एक चमत्कार हुआ। सालों से निसंतान रही सीता गर्भवती हो गई। जब यह खबर पूरे गाँव में फैली तो लोगों की आँखों में बरसों बाद उम्मीद की चमक दिखाई दी। सबने इसे मां भवानी का आशीर्वाद माना। लेकिन जब यह बात कालमुख तक पहुँची तो वह ज़ोर से हँस पड़ा। “एक बच्ची मेरा अंत करेगी? हा… हा… हा… इंसानों की उम्मीद भी कितनी मज़ेदार होती है।” उसने गुस्से में पहाड़ की एक विशाल चट्टान पर मुक्का मारा और वह चट्टान टुकड़े-टुकड़े होकर बिखर गई। “जिस दिन वह बच्ची पैदा होगी, उसी दिन मैं उसे खा जाऊँगा। फिर देखूँगा तुम्हारी मां भवानी क्या कर लेती हैं।” यह सुनकर गाँव वाले और भी डर गए, लेकिन उन्होंने मां भवानी पर विश्वास नहीं छोड़ा। हर दिन पूरा गाँव मंदिर में दीप जलाकर सीता और उसके होने वाले बच्चे की सलामती की प्रार्थना करने लगा। आखिर वह रात आ ही गई। नौ महीने पूरे हो चुके थे।आसमान में काले बादल छा गए। बिजलियाँ चमकने लगीं।तेज़ हवाएँ चलने लगीं। मां भवानी के मंदिर की घंटियाँ बिना किसी के छुए अपने आप बजने लगीं। पूरा गाँव उस दिव्य प्रकाश से नहा उठा जो मंदिर से निकल रहा था। उसी समय सीता ने एक सुंदर कन्या को जन्म दिया। जैसे ही उस बच्ची ने पहली बार अपनी आँखें खोलीं, उसके माथे पर लाल रंग का एक छोटा-सा त्रिशूल चमक उठा। उसी क्षण मंदिर की अखंड ज्योति पहले से कई गुना अधिक तेज़ हो गई। गाँव के बुज़ुर्ग भावुक होकर बोले, “यह कोई साधारण कन्या नहीं… यह मां भवानी के आशीर्वाद से जन्मी दिव्य शक्ति है।” लेकिन तभी दूर पहाड़ी से कालमुख की भयानक दहाड़ सुनाई दी। “मैं आ रहा हूँ… आज कोई देवी मुझे नहीं रोक पाएगी। सबसे पहले मैं इसी बच्ची को अपना शिकार बनाऊँगा!” उसकी दहाड़ सुनकर पूरे गाँव में सन्नाटा छा गया। लेकिन उसी समय मां भवानी के मंदिर से तेज़ दिव्य प्रकाश निकला। ऐसा लगा जैसे स्वयं मां भवानी मुस्कुराकर कह रही हों “अब अधर्म का अंत निश्चित है… मेरी पुत्री इस धरती पर अपना पहला कदम रख चुकी है।” और इसी के साथ उस राक्षस के अंत की शुरुआत हो गई… राक्षस कालमुख को जैसे ही दिव्य कन्या के जन्म की खबर मिली, वह गुस्से से पागल हो उठा। उसकी भयानक दहाड़ से पूरा जंगल काँपने लगा। हाथ में विशाल गदा लिए वह तेज़ी से शिवपुर की ओर बढ़ा। गाँव वालों ने उसे आते देखा तो सभी अपने घरों से निकलकर मां भवानी के मंदिर में पहुँच गए। हरिराम और सीता अपनी नवजात बेटी को गोद में लिए मां भवानी के चरणों में बैठ गए। सभी लोग हाथ जोड़कर एक ही प्रार्थना कर रहे थे, “हे मां, हमारी रक्षा कीजिए।” कुछ ही देर में कालमुख मंदिर के सामने आ खड़ा हुआ। वह ज़ोर-ज़ोर से हँसते हुए बोला, “यही है वह बच्ची जो मेरा अंत करेगी? आज सबसे पहले मैं इसी को खाऊँगा, फिर पूरे गाँव को खत्म कर दूँगा।” इतना कहकर वह मंदिर की ओर बढ़ा। लेकिन जैसे ही उसने मंदिर की पहली सीढ़ी पर कदम रखा, उसके पैर वहीं रुक गए। उसे लगा जैसे कोई अदृश्य शक्ति उसे आगे बढ़ने नहीं दे रही हो। गुस्से में उसने अपनी पूरी ताकत से गदा मंदिर पर फेंकी, लेकिन गदा मंदिर से टकराने से पहले ही राख बनकर हवा में उड़ गई। उसी क्षण मंदिर के गर्भगृह से तेज़ प्रकाश निकला। वह प्रकाश सीधा उस नवजात कन्या पर पड़ा। बच्ची मुस्कुराई और उसके माथे पर बना त्रिशूल चमकने लगा। देखते ही देखते वह दिव्य आभा से घिर गई। आसमान में बिजली चमकी और मां भवानी का दिव्य स्वर गूँजा, “कालमुख! तेरे पापों का अंत आज निश्चित है।” यह सुनते ही कन्या के सामने एक दिव्य त्रिशूल प्रकट हुआ। बिना किसी के छुए वह त्रिशूल तेज़ी से उड़ता हुआ कालमुख की ओर बढ़ा। राक्षस ने उसे रोकने की बहुत कोशिश की। उसने बड़े-बड़े पत्थर उठाकर फेंके, ज़ोरदार दहाड़ लगाई, लेकिन दिव्य त्रिशूल को कोई नहीं रोक सका। अगले ही पल त्रिशूल कालमुख के सीने में जा धँसा। “नहीं… यह नहीं हो सकता!” राक्षस दर्द से चीख उठा। उसका विशाल शरीर काँपने लगा। धीरे-धीरे वह धुएँ में बदलने लगा और कुछ ही क्षणों में राख बनकर धरती पर बिखर गया। राक्षस के मरते ही आसमान साफ़ हो गया। मंदिर की घंटियाँ अपने आप बजने लगीं और पूरे गाँव में फूलों की वर्षा होने लगी। गाँव वाले खुशी से झूम उठे। हर तरफ़ “जय मां भवानी!” के जयकारे गूँजने लगे। हरिराम और सीता की आँखों से खुशी के आँसू बह रहे थे। उन्होंने अपनी बेटी को सीने से लगा लिया और मां भवानी का धन्यवाद किया। उस दिन के बाद शिवपुर में कभी किसी बच्चे पर कोई संकट नहीं आया। गाँव फिर से हँसी, खुशियों और बच्चों की किलकारियों से गूँज उठा। आज भी लोग उस मंदिर में जाकर यही कहते हैं “जहाँ सच्ची श्रद्धा और मां भवानी का आशीर्वाद हो, वहाँ अधर्म और बुराई का अंत निश्चित होता है।”