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  • 🌸 वृंदावन का वो आखिरी दिन

    🌸 वृंदावन का वो आखिरी दिन

    पढ़ने का समय : 10 मिनट

     

    भाग 2 — कंस का संदेश 🦚

     

    वृंदावन की उस सुबह के बाद दिन तो बीत गया था…

    लेकिन यशोदा मैया के मन की बेचैनी नहीं बीती।

     

    सूरज ढलने लगा था।

     

    आकाश पर लालिमा फैल चुकी थी। यमुना का जल सूर्य की अंतिम किरणों को अपने भीतर समेटे धीरे-धीरे शांत हो रहा था। गौएँ चरागाह से लौट रही थीं और उनके गलों में बंधी घंटियों की आवाज पूरे वृंदावन में एक मधुर संगीत की तरह फैल रही थी।

     

    गोपियाँ अपने-अपने घरों के बाहर खड़ी होकर गायों का स्वागत कर रही थीं।

    ग्वालबाल दिनभर की शरारतों के किस्से सुनाते हुए अपने घरों की ओर जा रहे थे।

     

    और नंद भवन के आँगन में… श्री कृष्ण अपनी बाँसुरी लेकर बैठे थे, उनके पास ही बैठे थे उनके बड़े भाई बलराम 

     

    कभी कृष्ण कुछ कहते और बलराम हँस पड़ते।

    कभी दोनों बिना कुछ बोले ही यमुना की ओर देखते रहते। सब कुछ सामान्य था। फिर भी…

     

    मैया यशोदा को कुछ सामान्य नहीं लग रहा था।

    वह रसोई में खड़ी थीं, लेकिन बार-बार उनकी नजर कृष्ण पर जा रही थी।

     

    सुबह कृष्ण ने जो बात कही थी, वह उनके मन से निकल ही नहीं रही थी।

     

    “अगर कभी आपका कान्हा आपसे दूर चला जाए तो?”

     

    मैया ने सिर झटक दिया।

     

    “नहीं…” उन्होंने खुद से कहा। “मेरा कान्हा ऐसा कुछ नहीं कह सकता।”

     

    लेकिन मन था कि मान ही नहीं रहा था। तभी बाहर से नंद बाबा की आवाज आई, “यशोदा!”

     

    मैया ने वहीं से आवाज लगाई, “जी?”

     

    “जरा बाहर आना।”

     

    वो हाथ पोंछते हुए बाहर आईं, नंद बाबा मुख्य द्वार के पास खड़े थे। उनके चेहरे पर गंभीरता थी।

     

    “क्या हुआ?” यशोदा ने पूछा।

     

    नंद बाबा ने कुछ कहने के लिए होंठ खोले ही थे कि तभी बाहर से घोड़ों के दौड़ने की आवाज सुनाई दी , टापों की आवाज धीरे-धीरे तेज होती गई।

     

    नंद भवन के द्वार पर खड़े सेवक ने बाहर झाँककर देखा।

    “महाराज…”

     

    नंद बाबा उसकी ओर मुड़े। “क्या हुआ?”

     

    “एक रथ आ रहा है।”

     

    “किसका?”

     

    सेवक ने दूर देखते हुए कहा, “पहचान में नहीं आ रहा।”

     

    नंद बाबा कुछ क्षण शांत रहे। फिर बोले, “द्वार खोल दो।”

     

    कुछ ही पल बाद एक सुंदर रथ नंद भवन के सामने आकर रुका। रथ से एक गंभीर, तेजस्वी पुरुष नीचे उतरे।

    चेहरे पर थकान थी… लेकिन आँखों में गहरी भक्ति।

     

    उन्होंने जैसे ही नंद बाबा को देखा, हाथ जोड़ दिए। “नंद महाराज।”

     

    नंद बाबा आगे बढ़े। “आप?”

     

    उन्होंने ध्यान से देखा। फिर पहचानते ही बोले, “अक्रूर जी!”

    यशोदा भी उनके पास आ गईं।

     

    अक्रूर ने दोनों को प्रणाम किया। “महाराज, मैया…”

     

    नंद बाबा ने उनका स्वागत करते हुए कहा, “आइए। इतनी संध्या के समय आपका आगमन… सब कुशल तो है?”

     

    अक्रूर ने एक क्षण नंद बाबा की ओर देखा। उनके चेहरे पर कुछ ऐसा था कि नंद बाबा का मन और भी बेचैन हो गया।

     

    “सब कुशल है ना?” इस बार नंद बाबा की आवाज में चिंता स्पष्ट थी।

     

    अक्रूर ने धीरे से सिर झुकाया। “मैं एक संदेश लेकर आया हूँ।”

     

    यशोदा के हृदय में जैसे अचानक कोई अनजाना भय जाग उठा। उन्होंने बिना जाने ही कृष्ण की ओर देखा।

    कृष्ण अब भी आँगन में बैठे थे। लेकिन उनकी आँखें…

    सीधे अक्रूर पर थीं।

     

    जैसे वह पहले से जानते हों कि अक्रूर क्यों आए हैं।

     

    —

     

    नंद बाबा अक्रूर को भीतर ले गए।

     

    कृष्ण और बलराम भी कुछ दूरी पर खड़े हो गए।

     

    मैया ने कृष्ण का हाथ पकड़ लिया। “तुम यहीं रहना।”

     

    कृष्ण ने उनकी ओर देखा। “क्यों मैया?”

     

    “बस…” यशोदा के पास कोई कारण नहीं था।

     

    उन्हें स्वयं समझ नहीं आ रहा था कि वह ऐसा क्यों कह रही हैं। अंदर सभा-कक्ष में नंद बाबा ने अक्रूर को आसन दिया।

    “बताइए।”

     

    अक्रूर कुछ क्षण मौन रहे। फिर उन्होंने कहा, “महाराज… मैं मथुरा से आया हूँ।”

     

    “मथुरा से?”

     

    “हाँ।”

     

    नंद बाबा का चेहरा गंभीर हो गया, “किसलिए?”

     

    अक्रूर ने गहरी साँस ली। “महाराज कंस ने एक धनुष यज्ञ का आयोजन किया है।”

     

    नंद बाबा ने सिर हिलाया। “यह तो सुना है।”

     

    “उसने वृंदावन से भी लोगों को आमंत्रित किया है।”

     

    “ठीक है।”

    नंद बाबा कुछ सहज हुए।

     

    लेकिन अगले ही शब्दों ने उनके चेहरे का रंग बदल दिया।

     

    “विशेष रूप से कृष्ण और बलराम को।”

     

    कमरे में अचानक सन्नाटा छा गया। यशोदा के हाथ से पानी का पात्र लगभग छूट गया।

    “कृष्ण… और बलराम?”

     

    अक्रूर ने धीरे से सिर झुका दिया। “हाँ, मैया।”

     

    यशोदा ने तुरंत कहा, “लेकिन क्यों?”

     

    अक्रूर ने उनकी ओर देखा। उनकी आँखों में करुणा थी।

     

    “राजा कंस ने उन्हें मथुरा बुलाया है।”

     

    यशोदा आगे बढ़ीं। “कितने दिनों के लिए?”

     

    अक्रूर चुप रहे, यशोदा की आँखें फैल गईं।

    “मैंने पूछा… कितने दिनों के लिए?”

     

    अक्रूर ने कोई उत्तर नहीं दिया, नंद बाबा समझ गए।

     

    उन्होंने धीमी आवाज में पूछा, “क्या यह केवल धनुष यज्ञ के लिए बुलावा है?”

     

    अक्रूर ने उनकी आँखों में देखा। “नहीं।”

     

    बस एक शब्द और नंद भवन की सारी शांति जैसे टूट गई।

     

    —

     

    यशोदा ने तुरंत कृष्ण को अपनी ओर खींच लिया। “मेरा बेटा कहीं नहीं जाएगा।”

     

    कृष्ण शांत खड़े रहे। “मैया…”

     

    “नहीं!” यशोदा की आँखों में आँसू आ गए।

     

    “मुझे नहीं पता राजा कंस ने क्यों बुलाया है। मुझे यह भी नहीं जानना कि वहाँ क्या उत्सव है, क्या यज्ञ है… मेरा कान्हा कहीं नहीं जाएगा।”

     

    नंद बाबा ने उन्हें समझाने की कोशिश की। “यशोदा…”

     

    “नहीं जी!” यशोदा ने उनकी ओर देखा।

    “आप कुछ मत कहिए।”

     

    फिर वह अक्रूर की ओर मुड़ीं। “आप वापस चले जाइए।”

     

    अक्रूर स्तब्ध रह गए। “मैया…”

     

    “कह दीजिए कंस से कि कृष्ण नहीं आएगा।”

     

    अक्रूर ने सिर झुका लिया। “काश मैं ऐसा कर पाता।”

     

    “तो कीजिए।” यशोदा की आवाज टूट गई। “आप नहीं जानते… वह मेरे लिए क्या है।”

     

    अक्रूर की आँखें नम हो गईं। “मैं जानता हूँ, मैया।”

     

    “नहीं!” यशोदा ने कृष्ण का चेहरा अपने हाथों में थाम लिया। “कोई नहीं जानता।”

     

    उन्होंने कृष्ण को अपने सीने से लगा लिया। “मेरे लिए यह भगवान नहीं है…”

    उनकी आवाज काँप रही थी। “यह मेरा पुत्र है।”

     

    कृष्ण ने धीरे से उनकी पीठ पर हाथ रखा। “मैया…”

     

    “तुम कहीं नहीं जाओगे।”

    कृष्ण चुप रहे। उनकी आँखें कुछ पल के लिए नंद बाबा पर गईं।

     

    नंद बाबा की आँखों में भी चिंता थी। लेकिन उस चिंता के पीछे कुछ और था।

     

    जैसे उन्हें भीतर से पता हो कि यह बुलावा केवल एक उत्सव का निमंत्रण नहीं है।

     

    —

     

    अक्रूर ने धीरे से कहा, “नंद महाराज, मुझे एक बात कहनी है।”

     

    नंद बाबा ने उनकी ओर देखा। “कहिए।”

     

    “मैं स्वयं भी इस यात्रा को लेकर प्रसन्न नहीं हूँ।”

     

    यशोदा ने उनकी ओर देखा।

     

    अक्रूर बोले, “लेकिन मुझे विश्वास है कि कृष्ण और बलराम का मथुरा जाना किसी बड़े उद्देश्य का भाग है।”

     

    नंद बाबा ने तुरंत पूछा, “आप ऐसा क्यों कह रहे हैं?”

     

    अक्रूर कुछ क्षण मौन रहे। फिर बोले, “क्योंकि कंस कृष्ण से भयभीत है।”

     

    कमरे में सन्नाटा छा गया। “भयभीत?” नंद बाबा ने दोहराया।

     

    अक्रूर ने सिर हिलाया। “हाँ।”

     

    “लेकिन कृष्ण ने उसका क्या बिगाड़ा है?”

     

    “यही तो बात है।”

     

    अक्रूर की आवाज धीमी थी। “कंस कृष्ण से इसलिए नहीं डरता कि कृष्ण ने उसका कुछ बिगाड़ा है… वह इसलिए डरता है क्योंकि उसे अपने अंत का भय है।”

     

    यशोदा का हृदय धक से रह गया। “कैसा अंत?”

     

    अक्रूर ने उत्तर नहीं दिया।

    नंद बाबा ने गंभीर होकर पूछा, “क्या भविष्यवाणी वाली बात…”

     

    अक्रूर ने धीरे से सिर झुका दिया, यशोदा ने कृष्ण को और कसकर पकड़ लिया। उनके मन में वर्षों पुरानी बातें कौंधने लगीं।

    कृष्ण का जन्म… उस रात की रहस्यमयी घटनाएँ…

    गोकुल में उनका आना… कंस के भेजे असुर…

    पूतना… शकटासुर… त्रिणावर्त… कालिया…

    गोवर्धन…

     

    एक-एक घटना जैसे अचानक उनके सामने जीवित हो उठी।

    क्या यह सब उसी दिन की ओर बढ़ रहा था? क्या कृष्ण का वृंदावन में रहना अब संभव नहीं था?

    यशोदा ने कृष्ण की ओर देखा, वह शांत थे।

     

    असामान्य रूप से शांत। “कान्हा…”

     

    कृष्ण ने उनकी आँखों में देखा। “हाँ, मैया।”

     

    “तुम्हें डर नहीं लग रहा?”

     

    कृष्ण मुस्कुराए। “किस बात का?”

     

    “मथुरा जाने का।”

     

    कृष्ण ने धीरे से कहा, “जहाँ आपका आशीर्वाद हो, वहाँ डर कैसा?”

     

    यशोदा की आँखों से आँसू बह निकले। उन्होंने तुरंत अपना चेहरा दूसरी ओर कर लिया।

     

    वह नहीं चाहती थीं कि कृष्ण उन्हें रोते हुए देखें, लेकिन कृष्ण सब समझ रहे थे।

     

    —

     

    उस रात नंद भवन में किसी ने ठीक से भोजन नहीं किया।

     

    गोपियों तक यह समाचार पहुँच चुका था, धीरे-धीरे पूरा वृंदावन जान गया, कृष्ण और बलराम को मथुरा बुलाया गया है।

     

    गलियों में फुसफुसाहट होने लगी।

    किसी ने कहा, “कृष्ण को नहीं जाना चाहिए।”

     

    किसी ने कहा, “कंस पर विश्वास कैसे किया जा सकता है?”

    किसी ने कहा, “यह जरूर कोई चाल है।”

     

    और किसी ने बस इतना कहा, “अगर कृष्ण चले गए तो वृंदावन का क्या होगा?”

     

    यमुना किनारे राधा खड़ी थीं, उन्हें भी समाचार मिल चुका था। हवा में वही बाँसुरी की धुन जैसे अब भी तैर रही थी।

     

    लेकिन आज… वह धुन उन्हें खुश नहीं कर रही थी।

    उनकी आँखों के सामने कृष्ण का चेहरा था। सुबह का वही प्रश्न याद आ रहा था, “अगर कभी आपका कान्हा आपसे दूर चला जाए तो?”

     

    राधा की आँखों से एक आँसू गिरा, उन्होंने यमुना की ओर देखा।

    “तो क्या सच में…” उनकी आवाज हवा में खो गई।

    “कान्हा हमसे दूर जाने वाले हैं?”

     

    —

     

    नंद भवन में उस रात कृष्ण अपने कक्ष में बैठे थे, बलराम उनके सामने थे।

    कुछ देर दोनों भाई मौन रहे। फिर बलराम ने पूछा, “तुम्हें पहले से पता था?”

     

    कृष्ण ने मुस्कुराकर उनकी ओर देखा। “क्या?”

     

    “अक्रूर के आने के बारे में।”

     

    कृष्ण ने उत्तर नहीं दिया। बलराम समझ गए। “तुम जानते थे।”

     

    कृष्ण ने धीरे से बाँसुरी उठाई। “दाऊ…”

     

    “हूँ?”

     

    “कभी-कभी जीवन हमें वहाँ ले जाता है जहाँ जाने की हमने इच्छा नहीं की होती।”

     

    बलराम ने उनकी आँखों में देखा। “और अगर कोई तुम्हें रोकना चाहे?”

     

    कृष्ण ने कुछ क्षण सोचा, फिर मुस्कुराए।

    “तो उसे प्रेम से समझाना होगा।”

     

    “और अगर प्रेम ही तुम्हें रोक ले?”

     

    इस बार कृष्ण की मुस्कान थोड़ी फीकी पड़ गई, उन्होंने बाहर देखा। आँगन में यशोदा मैया बैठी थीं, उनकी आँखें कृष्ण के कक्ष की ओर थीं।

     

    कृष्ण कुछ पल उन्हें देखते रहे। फिर धीरे से बोले, “तब सबसे कठिन होता है… जाना।”

     

    उनकी उँगलियाँ बाँसुरी पर ठहर गईं, बाहर रात गहरी होती जा रही थी।

    वृंदावन सो रहा था, लेकिन उस रात… नंद भवन में कोई नहीं सोया।

    एक माँ अपने पुत्र को खोने के भय में जाग रही थी।

     

    एक पिता अपने कर्तव्य और पुत्र के बीच खड़ा था।

    एक भाई आने वाले संघर्ष को महसूस कर रहा था।

     

    एक युवती यमुना किनारे अपने प्रिय के जाने की आहट सुन रही थी।

     

    और कृष्ण… वह सबसे शांत बैठे थे।

    जैसे उन्हें पता हो कि अगली सुबह से वृंदावन की हर साँस बदलने वाली है।

     

    क्योंकि अक्रूर केवल कंस का संदेश लेकर नहीं आए थे।

     

    वह अपने साथ…

    वृंदावन के विरह की पहली सुबह भी लेकर आए थे। 🦚❤️

     

    हम दिन में जाने कितने बुरे विचार लाते हैं या कहते हैं इसलिए एक बार साफ मन से 

    🌺 राधे राधे 🌺 कहते जाइए।

    और अगर आपको कहानी अच्छी लगी हो तो लाइक और कमेंट भी कर देना

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    Neha Goyal

    मेरा नाम नेहा गोयल है। और पिछले दो वर्ष से मैं प्रतिलिपि पर कहानियां लिखती आ रही हूँ। मुझे लेखन करते हुए बहुत ही अच्छा लगता है। वैसे मुझे लिखने से पढ़ना ज्यादा पसंद है।

  • 🌸 वृंदावन का वो आखिरी दिन

    🌸 वृंदावन का वो आखिरी दिन

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

     

    भाग 1 — वृंदावन की वो सुबह 🦚

     

    वृंदावन में सुबह कभी केवल सुबह नहीं होती थी।

     

    वहाँ सूरज की पहली किरण के साथ जैसे कोई बाँसुरी जन्म लेती थी…

    यमुना की लहरें उसे सुनती थीं, कदंब के वृक्ष झूमकर उसका स्वागत करते थे और गलियों में बिखरी धूल भी जैसे उस धुन पर नाचने लगती थी।

     

    उस दिन भी वृंदावन वैसा ही जागा था।

     

    आकाश अभी पूरी तरह लालिमा से नहीं भरा था। पूर्व दिशा में हल्की सुनहरी आभा फैल रही थी। यमुना का जल शांत था और उसके ऊपर तैरती धुंध की पतली चादर धीरे-धीरे सूरज की किरणों में घुल रही थी।

     

    कहीं गौशाला से गायों के रंभाने की आवाज आ रही थी, तो कहीं घरों के आँगन में गोपियाँ मटके लिए निकल चुकी थीं।

     

    लेकिन उस सुबह वृंदावन की हवा में कुछ अलग था।

    बहुत हल्का-सा…

     

    इतना हल्का कि कोई उसे महसूस तो कर सकता था, पर उसका नाम नहीं रख सकता था।

    नंद भवन में यशोदा मैया रोज की तरह सुबह-सुबह उठ चुकी थीं।

     

    उन्होंने आँगन में गोबर से सुंदर-सी रंगोली बनाई, तुलसी माता को जल चढ़ाया और फिर माखन मथने बैठ गईं।

     

    मथानी की आवाज पूरे आँगन में गूँज रही थी।

     

    छन्न… छन्न… छन्न…

     

    यशोदा मैया के होंठों पर मुस्कान थी।

    लेकिन उनकी आँखें बार-बार उस कमरे की ओर उठ जातीं जहाँ उनका कान्हा सो रहा था।

    “पता नहीं कब बड़ा हो गया मेरा लल्ला…”

    उन्होंने धीरे से खुद से कहा।

     

    फिर मुस्कुराकर सिर हिलाया।

    “बड़ा कहाँ हुआ है? अभी भी तो सुबह उठते ही माखन के पीछे भागता है।”

     

    उसी क्षण कमरे के भीतर से कुछ गिरने की आवाज आई।

    धड़ाम!

     

    मैया यशोदा की मथानी रुक गई। उन्होंने आँखें बंद कर लीं।

    “लो… उठ गया मेरा नटखट।” उनके चेहरे पर हल्की मुस्कान उभर आई। 

     

    अगले ही पल उनकी आवाज पूरे भवन में गूँज उठी, “कान्हा!”

     

    अंदर से कोई उत्तर नहीं आया। “कान्हा!”

     

    फिर भी शांति। मैया यशोदा ने हाथ कमर पर रखे और कमरे की ओर बढ़ गईं।

    दरवाजा खोलते ही उनकी नजर बिखरे हुए बिस्तर पर पड़ी।

     

    सबकुछ अस्त व्यस्त था लेकिन कृष्णा… कमरे में थे ही नहीं।

     

    मैया यशोदा कुछ क्षण उन्हें ढूँढती रहीं। फिर उनकी नजर खिड़की से बाहर गई।

    कदंब के पेड़ के पास वो खड़े थे।

     

    हाथ में बाँसुरी लिए। 

    नीली आभा से घिरा उनका मुख सुबह की पहली किरणों में ऐसा चमक रहा था जैसे स्वयं आकाश ने उन्हें अपने रंग में रंग दिया हो।

     

    कृष्ण की आँखें यमुना की ओर थीं और उनके होंठों पर एक हल्की मुस्कान।

     

    यशोदा खिड़की से ही पुकार उठीं, 

    “कान्हा! इतनी सुबह-सुबह वहाँ क्या कर रहे हो?”

     

    कृष्ण ने पीछे मुड़कर देखा। “मैया…”

     

    उनकी आवाज में वही मासूमियत थी। “आप जाग गईं?”

     

    यशोदा ने भौंहें चढ़ाईं। “हाँ, क्योंकि मेरा लाल कमरे में सोने के बजाय पता नहीं कहाँ-कहाँ घूम रहा है।”

     

    कृष्ण मुस्कुराए। “मैं तो बस जल्दी भोर में ही यमुना मैया से मिलने आया था।”

     

    “यमुना मैया से मिलने?” यशोदा बाहर आईं और उनके पास पहुँचकर कान पकड़ लिया। “और मुझे बिना बताए?”

     

    कृष्ण हँस पड़े। “मैया, आप तो सो रही थीं।”

     

    “तो क्या मुझे जगाते?”

     

    “जगाता तो आप मुझे जाने देतीं?”

     

    मैया यशोदा कुछ पल उन्हें देखती रहीं। फिर उनके चेहरे पर अनायास मुस्कान आ गई। “नहीं।”

     

    कृष्ण ने धीरे से कहा, “इसीलिए तो नहीं जगाया।”

     

    यशोदा ने उनके गाल पर हल्की-सी चपत लगाई।

    “बहुत चालाक हो गए हो, रे।”

     

    कृष्ण हँसने लगे। उनकी हँसी सुनकर पास से गुजरती एक गोपी भी मुस्कुरा उठी।

     

    “मैया, आपका कान्हा तो आज फिर माखन चुराने की तैयारी में है।”

     

    कृष्ण तुरंत बोले, “मैंने आज माखन नहीं चुराया।”

     

    यशोदा ने आँखें तरेरीं। “आज?”

     

    कृष्ण चुप हो गए, गोपी हँस पड़ी।

     

    “मैया, कल की मटकी याद है?”

     

    यशोदा ने कृष्ण की ओर देखा। “तो कल किसने माखन चुराया था?”

     

    कृष्ण ने तुरंत आकाश की ओर देखा। “मैया, मुझे लगता है आज मौसम बहुत सुंदर है।”

     

    और इतना कहकर भागने लगे। “कान्हा!”

     

    मैया यशोदा उनके पीछे दौड़ पड़ीं।

     

    पूरा आँगन कृष्ण की हँसी से भर गया। कुछ ही देर में नंद भवन की वही पुरानी चहल-पहल लौट आई।

     

    कहीं ग्वाल-बाल कृष्ण को ढूँढते हुए आ रहे थे। कहीं गोपियाँ उनकी शिकायत लेकर यशोदा के पास पहुँच रही थीं।

     

    कहीं गायों के बीच जाकर कृष्ण उन्हें पुकार रहे थे।

     

    वृंदावन के लिए कृष्ण केवल नंद बाबा के पुत्र नहीं थे, वह वृंदावन की धड़कन थे।

     

    उनके बिना जैसे हर चीज अधूरी लगती थी।

     

    —

     

    सुबह कुछ और चढ़ी तो कृष्ण अपने सखाओं के साथ यमुना किनारे जा पहुँचे।

     

    बलराम भी उनके साथ थे। मित्र ने कृष्ण के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा, “कान्हा, आज कहाँ चलें?”

     

    कृष्ण ने मुस्कुराकर सामने देखा। “जहाँ मन करे।”

     

    “तो फिर कदंब वन!” एक ग्वालबाल चिल्लाया।

     

    सब दौड़ पड़े, कृष्ण पीछे रह गए।

    उनकी नजर यमुना पर टिक गई। बलराम ने यह देखा तो उनके कदम भी रुक गए। “कृष्ण?”

     

    कृष्ण ने उनकी ओर देखा। “हाँ, दाऊ?”

     

    “क्या हुआ?”

     

    “कुछ नहीं।”

     

    बलराम कुछ क्षण उन्हें देखते रहे। “तुम आज कुछ बदले-बदले लग रहे हो।”

     

    कृष्ण मुस्कुराए। “मैं तो वही हूँ।”

     

    बलराम ने सिर हिलाया। “नहीं। आज तुम्हारी आँखें कुछ और कह रही हैं।”

     

    कृष्ण ने कोई उत्तर नहीं दिया। उन्होंने अपनी बाँसुरी निकाली।

     

    और अगले ही क्षण यमुना के किनारे वह धुन गूँज उठी।

     

    मधुर… शांत… और ऐसी कि जैसे किसी ने हवा में प्रेम घोल दिया हो।

     

    बांसुरी की वो धुन सुनकर, गायें चरना भूल गईं। पक्षियों का कलरव थम गया।

     

    यमुना की लहरें जैसे धीमी हो गईं। दूर खड़ी कुछ गोपियाँ भी उस धुन को सुनकर ठिठक गईं।

     

    उनमें राधा भी थीं। राधा ने आँखें बंद कर लीं। लेकिन आज…

    उस बाँसुरी में कुछ अलग था। वही धुन थी, वही कृष्ण थे, वही वृंदावन था।

    फिर भी दिल के भीतर एक अनजाना डर उतर आया था।

     

    राधा ने धीरे से आँखें खोलीं। “कान्हा…”

     

    उनके होंठों से बस इतना ही निकला।

     

    —

     

    उधर नंद भवन में यशोदा कृष्ण के लिए भोजन तैयार कर रही थीं।

     

    उन्होंने थाली में माखन रखा, मिश्री रखी।

     

    गरम-गरम रोटियाँ रखीं फिर अचानक उनके हाथ रुक गए। उनकी नजर थाली पर टिक गई।

    उन्हें जाने क्यों आज मन में एक अजीब-सी बेचैनी महसूस हो रही थी।

     

    उन्होंने खुद को समझाया, “शायद थक गई हूँ।”

     

    लेकिन मन नहीं माना। उन्होंने आँगन में बैठे नंद बाबा को देखा। “सुनते हो?”

     

    नंद बाबा ने उनकी ओर देखा। “क्या हुआ?”

     

    मैया यशोदा कुछ पल चुप रहीं। “आज न जाने क्यों मन घबरा रहा है।”

     

    नंद बाबा ने मुस्कुराकर कहा, “लल्ला को लेकर?”

     

    मैया यशोदा ने सिर हिला दिया। “पता नहीं… बस ऐसा लगता है जैसे…” वह रुक गईं।

     

    “जैसे क्या?”

     

    मैया यशोदा के पास कोई उत्तर नहीं था। उन्होंने धीरे से कहा, “जैसे कुछ बदलने वाला है।”

     

    नंद बाबा का चेहरा भी कुछ क्षण गंभीर हो गया। उन्होंने आकाश की ओर देखा। “सब कुछ तो भगवान की इच्छा से होता है, यशोदा।”

     

    मैया ने तुरंत उनकी बात काट दी। “भगवान की इच्छा अपनी जगह है। लेकिन मेरा लल्ला…”

     

    उनकी आवाज भर्रा गई। “मेरा कान्हा मेरी आँखों के सामने रहे… बस इतनी-सी इच्छा है।”

     

    नंद बाबा ने उनकी ओर देखा। लेकिन इस बार उनके पास भी कोई उत्तर नहीं था।

     

    —

     

    दोपहर होने लगी थी। कृष्ण वापस लौटे। मैया यशोदा ने उन्हें देखते ही थाली आगे कर दी। “आओ, लल्ला। खाना खा लो।”

     

    कृष्ण उनके पास बैठ गए, यशोदा अपने हाथों से उन्हें खिलाने लगीं।

    एक निवाला… फिर दूसरा… कृष्ण उन्हें देखते रहे।

    “क्या हुआ?” मैया ने पूछा।

     

    कृष्ण ने सिर हिलाया। “कुछ नहीं।”

     

    “तो ऐसे क्यों देख रहे हो?”

     

    कृष्ण ने उनकी उँगलियों को अपने हाथ में ले लिया। “मैया…”

     

    “हम्म?”

     

    “अगर कभी आपका कान्हा आपसे दूर चला जाए तो?”

     

    यशोदा के हाथ अचानक रुक गए, अनायास ही उनके चेहरे की मुस्कान गायब हो गई। “ऐसी बातें क्यों कर रहे हो?” उनकी आँखें गमगीन हो चुकी थी। 

     

    कृष्ण चुप रहे, यशोदा ने उनका चेहरा अपने हाथों में थाम लिया। 

     

    “कहीं नहीं जाओगे तुम।”

     

    कृष्ण ने धीरे से मुस्कुराकर कहा, “और अगर जाना पड़ा तो?”

     

    “नहीं।” यशोदा की आवाज इस बार दृढ़ थी।

    “तुम्हें कहीं नहीं जाना।”

     

    कृष्ण उनकी आँखों में देखते रहे, उन आँखों में माँ का प्रेम था।

    ऐसा प्रेम जिसे संसार की कोई शक्ति बाँट नहीं सकती थी।

    कृष्ण ने धीरे से अपना सिर अपनी मैया की गोद में रख दिया।

    “ठीक है मैया।”

     

    उन्होंने उनके बाल सहलाने शुरू कर दिए। उन्हें क्या पता था… कि कभी-कभी कृष्ण अपने सबसे प्रिय लोगों को भी आने वाले समय का पूरा सत्य नहीं बताते।

     

    क्योंकि कुछ यात्राएँ ऐसी होती हैं… जिन्हें रोकने का अधिकार प्रेम के पास भी नहीं होता।

     

    और वृंदावन की उस शांत सुबह में… किसी को नहीं पता था कि समय की धारा धीरे-धीरे उस क्षण की ओर बढ़ रही है…

     

    जब कृष्ण को अपना सबसे प्रिय स्थान छोड़ना होगा।

    लेकिन अभी… वृंदावन अनजान था। यमुना अनजान थी।

    गोपियाँ अनजान थीं। राधा अनजान थीं।

     

    और सबसे ज्यादा… यशोदा मैया अनजान थीं।

    कि उनके कान्हा के साथ बिताई जा रही यह साधारण-सी सुबह…

    वास्तव में वृंदावन की सबसे अनमोल सुबहों में से एक थी।

     

    क्योंकि आने वाला समय… वृं

    दावन से उसका कृष्ण माँगने वाला था।

     

    और उस दिन… पूरे वृंदावन को पहली बार समझ आएगा—

     

    कृष्ण सा प्रेम करना कितना आसान है…

    लेकिन कृष्ण से विरह सहना कितना कठिन। 🦚❤️

     

    अगर आपको कहानी पसंद आए तो कमेंट में राधे राधे जरूर लिखें।

    🌺 राधे राधे 🌺 

     

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    Neha Goyal

    मेरा नाम नेहा गोयल है। और पिछले दो वर्ष से मैं प्रतिलिपि पर कहानियां लिखती आ रही हूँ। मुझे लेखन करते हुए बहुत ही अच्छा लगता है। वैसे मुझे लिखने से पढ़ना ज्यादा पसंद है।

  • भक्ति में शक्ति

    भक्ति में शक्ति

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    शीर्षक: सावन का महीना 🌿🕉️❤️

     

    सावन की पहली फुहार जैसे ही धरती पर गिरी, पूरे गाँव का रंग ही बदल गया। सूखी पगडंडियाँ भीगकर महक उठीं, आम और नीम के पेड़ों की पत्तियाँ धुलकर चमकने लगीं और दूर शिव मंदिर की घंटियों की आवाज़ वातावरण को भक्ति से भर रही थी।

     

    सुबह का समय था।

     

    हल्की-हल्की बारिश हो रही थी। गाँव की औरतें सिर पर पल्ला किए और हाथ में पूजा की थाली लिए मंदिर की ओर जा रही थीं। कोई “ॐ नमः शिवाय” का जाप कर रहा था तो कोई भोलेनाथ के भजन गुनगुना रहा था।

     

    उसी गाँव में रहती थी गौरी।

     

    बाईस साल की गौरी… बड़ी-बड़ी काली आँखें, चेहरे पर सादगी और दिल में भगवान शिव के लिए अटूट श्रद्धा।

    गौरी बचपन से ही हर सावन सोमवार का व्रत रखती थी। लेकिन इस बार उसका व्रत किसी इच्छा के लिए नहीं था।

     

    इस बार उसने सिर्फ एक प्रार्थना की थी, 

     

    “हे महादेव… मेरे हिस्से की सारी खुशियाँ किसी और को दे देना… बस मेरे बाबा को ठीक कर देना।”

     

    उसके पिता पिछले छह महीनों से बीमार थे। इलाज में उनके खेत बिक चुके थे, घर गिरवी रखा जा चुका था और दवाइयों के लिए भी पैसे नहीं बचे थे।

     

    फिर भी हर सोमवार गौरी बिना कुछ खाए-पिए शिव मंदिर जाती, गंगाजल चढ़ाती और मुस्कुराकर लौट आती। उसके मासूम मन में जरा भी छल कपट नहीं था।

     

    गाँव वाले अक्सर कहते,  

    “इतनी पूजा से क्या होगा? इलाज के लिए पैसे चाहिए, भगवान नहीं।”

     

    गौरी बस मुस्कुरा देती और कहती, “भगवान कभी किसी को खाली हाथ नहीं लौटाते।”

     

    दूसरा सावन सोमवार… इस बार बारिश पहले से ज़्यादा तेज़ थी, जैसे भोलेनाथ उसके सब्र की परीक्षा ले रहे हों।

     

    गौरी मंदिर जा रही थी कि रास्ते में उसे लगभग सत्तर साल का एक बूढ़ा आदमी दिखाई दिया।

     

    वह पूरी तरह भीग चुका था। हाथ काँप रहे थे। लाठी भी कीचड़ में फँस गई थी।

    लोग उसके पास से निकल रहे थे लेकिन किसी ने भी रूककर मदद करने की हिम्मत नहीं की।

     

    लेकिन उन्हें देखते ही गौरी तुरंत दौड़ी। “बाबा… आइए, मैं सहारा देती हूँ।”

     

    उसने उन्हें उठाया, अपनी ओढ़नी से उनका चेहरा पोंछा और मंदिर की सीढ़ियों तक पहुँचाया।

     

    बूढ़े ने मुस्कुराकर पूछा,  “अरे बेटी… तुम खुद भी भीग रही हो।”

     

    गौरी हँस पड़ी। “सावन की बारिश में भीगने से तो भोलेनाथ भी खुश होते हैं, बाबा। आप मेरी चिंता मत कीजिए”

     

    बूढ़े ने उसकी तरफ गहरी नज़र से देखा। “अगर भगवान आज तुम्हारे सामने आ जाएँ तो क्या माँगोगी?”

     

    गौरी कुछ पल चुप रही।

    फिर बोली,  “अपने लिए कुछ नहीं चाहिए मुझे।

    बस मेरे बाबा ठीक हो जाएँ। और कोई भी बेटी कभी भी अपने पिता को इस हालत में न देखे।”

     

    गौरी की बातें सुनकर उस बूढ़े की आँखें भर आईं।

    उन्होंने आशीर्वाद दिया, “तुम्हारी हर मनोकामना पूरी होगी।”

     

    गौरी मुस्कुराकर मंदिर के अंदर चली गई। जब पूजा करके बाहर आई… तो वह बूढ़ा कहीं दिखाई नहीं दिया।

     

    उसने आसपास बहुत खोजा… लेकिन जैसे वह कभी था ही नहीं।

     

    तीसरा सोमवार…

     

    गौरी ने देखा कि मंदिर के बाहर एक छोटा बच्चा रो रहा था। उसकी माँ बेहोश पड़ी थी। लोग तमाशा देख रहे थे।

     

    गौरी तुरंत दौड़ी। अपने पूजा के लिए रखे पैसे निकालकर उसने ऑटो बुलाया और माँ-बेटे को अस्पताल पहुँचा दिया।

     

    उस दिन वह शिवलिंग पर दूध भी नहीं चढ़ा सकी।

    घर लौटी तो माँ ने देखा कि आज उसके हाथ में कुछ भी नहीं है इसलिए उन्होंने पूछ लिया,”पूजा नहीं की?”

     

    गौरी मुस्कुराई। “आज शायद महादेव मंदिर में नहीं…

    अस्पताल में मिल गए थे।”

    समय धीरे-धीरे बीतता गया। गौरी का भोलेनाथ पर विश्वास अटूट बना रहा।

     

    सावन का आखिरी सोमवार आ गया। उस दिन मंदिर में बहुत भीड़ थी। हर कोई बड़ी-बड़ी थालियाँ लेकर आया था। किसी के पास पाँच लीटर दूध था। किसी के पास चाँदी का नाग। किसी ने सोने का मुकुट चढ़ाया।

     

    गौरी के पास… सिर्फ एक लोटा पानी और बेलपत्र थे।

    वह धीरे-धीरे लाइन में लगी रही।

     

    तभी मंदिर के पुजारी ने घोषणा की,  “आज मंदिर के जीर्णोद्धार के लिए जो सबसे बड़ा दान देगा, उसका विशेष अभिषेक होगा।”

     

    लोगों ने हजारों रुपए चढ़ाने शुरू कर दिए। गौरी चुपचाप पीछे हट गई।

     

    उसे लगा… उसके पास देने के लिए कुछ भी नहीं।

    तभी मंदिर के बाहर वही बूढ़ा फिर दिखाई दिया। इस बार उनके पैरों में चोट लगी थी। गौरी बिना सोचे दौड़ी।

    अपनी पूजा की थाली नीचे रख दी।

     

    अपने दुपट्टे का किनारा फाड़कर उनके पैर पर पट्टी बाँध दी। बूढ़े ने मुस्कुराकर पूछा,  “बेटा, तुम्हारी पूजा?”

     

    गौरी ने हाथ जोड़ लिए। “बाबा… जहाँ इंसान की सेवा हो…

    वहीं भगवान की पूजा होती है।”

     

    इतना सुनते ही अचानक मंदिर की घंटियाँ अपने आप बजने लगीं। तेज़ हवा चलने लगी। बारिश की बूँदें जैसे रुक गईं।

     

    गौरी ने पलटकर देखा… वहाँ कोई बूढ़ा नहीं था। सिर्फ एक सफेद बेलपत्र पड़ा था… जिस पर तीन धारियाँ बनी थीं।

     

    उसका दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा। उसी शाम गाँव में एक बड़ी गाड़ी आकर रुकी। उसमें से एक उद्योगपति उतरे।

     

    उन्होंने पूरे गाँव को इकट्ठा किया। और कहने लगे, “बीस साल पहले… मैं इसी गाँव का रहने वाला था।

    जब मेरा सब कुछ खत्म हो गया था… तब एक किसान ने मेरी मदद की थी।

    आज मैं उसी किसान का कर्ज़ चुकाने आया हूँ।”

     

    उन्होंने नाम लिया, “रामस्वरूप।”

     

    वह गौरी के पिता थे। गौरी भी भीड़ में खड़ी थी जैसे ही उसने नाम सुना वो हैरान रह गई।

     

    उद्योगपति बोले, “उनकी ईमानदारी की वजह से आज मैं इस मुकाम पर हूँ। आज मैं उनको कर्ज चुकाने आया हूँ। मुझे पता चला है कि वो बहुत समय से बीमार है, इसलिए अब उनके इलाज का पूरा खर्च मैं उठाऊँगा।

    साथ ही उनका खेत भी वापस दिलाऊँगा।”

     

    इतना सुनते ही पूरा गाँव तालियाँ बजाने लगा।

     

    गौरी की आँखों से आँसू बहने लगे। उसने मन ही मन कहा, “महादेव… आपने मेरी सुन ली।”

     

    कुछ महीनों बाद… गौरी के पिता पूरी तरह स्वस्थ हो चुके थे। खेत फिर से हरे-भरे हो गए थे। घर की खुशियाँ लौट आई थीं।

     

    एक शाम गौरी मंदिर में दीपक जलाने गई। वहीं मंदिर के पुजारी मुस्कुराकर बोले,  “बेटी…

    क्या तुम्हें पता है? जिस बूढ़े की तुमने दो बार मदद की… उसे इस गाँव में किसी और ने कभी नहीं देखा।”

     

    गौरी चौंक गई। “क्या मतलब?”

     

    पुजारी धीरे से बोले, “उस दिन मैं भी पूरे समय मंदिर में था। तुम अकेली ही किसी से बातें कर रही थीं।”

     

    गौरी के हाथ काँपने लगे। उसने शिवलिंग की ओर देखा। उसे ऐसा लगा जैसे शिवलिंग पर जल की धार के बीच एक क्षण के लिए मुस्कुराता हुआ चेहरा दिखाई दिया।

     

    उसकी आँखों से आँसू बह निकले। वह वहीं बैठ गई।

    उसने समझ लिया, 

     

    महादेव कभी चमत्कार दिखाकर नहीं आते।

    वे किसी भूखे की भूख बनकर आते हैं…

    किसी घायल का दर्द बनकर आते हैं…

    किसी बूढ़े की लाठी बनकर आते हैं…

     

    और किसी बेटी की उम्मीद बनकर उसके आँसू पोंछ जाते हैं।

     

    उस दिन गौरी ने पहली बार अपने लिए कुछ माँगा।

    उसने हाथ जोड़कर कहा,  “भोलेनाथ…

    मुझे इतना समर्थ बना देना कि मैं हर सावन किसी ज़रूरतमंद की मदद कर सकूँ।

    यही मेरी सबसे बड़ी पूजा होगी।”

     

    मंदिर की घंटी एक बार फिर गूँज उठी।

     

    बारिश की ठंडी बूँदें उसके चेहरे पर आकर ठहर गईं।

    गौरी मुस्कुरा दी। अब उसे किसी चमत्कार की प्रतीक्षा नहीं थी।

     

    क्योंकि वह समझ चुकी थी कि सच्ची भक्ति केवल मंदिर में जल चढ़ाने से नहीं, बल्कि किसी के जीवन में आशा का दीप जलाने से पूरी होती है।

     

    उसके बाद हर सावन में गाँव की एक नई परंपरा शुरू हुई। लोग पहले किसी गरीब, बीमार या असहाय व्यक्ति की मदद करते, फिर शिव मंदिर में जल चढ़ाने जाते। 

     

    धीरे-धीरे यह परंपरा आसपास के गाँवों तक फैल गई। लोग कहते थे कि इस गाँव में सावन सिर्फ़ बरसात नहीं लाता, बल्कि इंसानियत की खुशबू भी साथ लाता है।

     

    और जब भी सावन की पहली बारिश होती, गौरी मंदिर की सीढ़ियों पर खड़ी होकर मुस्कुरा देती। उसे ऐसा महसूस होता जैसे हवा के साथ कोई धीमी-सी आवाज़ उसके कानों में फुसफुसा रही हो, 

    “जहाँ करुणा है, वहीं मैं हूँ। जहाँ प्रेम है, वहीं मेरा वास है।”

     

    उसने आसमान की ओर देखा। बादलों के पीछे छिपा चाँद दिखाई नहीं दे रहा था, लेकिन उसे विश्वास था कि जैसे बादलों के पीछे चाँद हमेशा मौजूद रहता है, वैसे ही हर सच्चे मन के पीछे महादेव की कृपा भी हमेशा रहती है।

    समाप्त। 🕉️🌿

     

    अगरआपकोमेरी कहानीपसंद आईतो एक लाइककरना ना भूलिएगा।

    धन्यवाद 🙏🏻

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    Neha Goyal

    मेरा नाम नेहा गोयल है। और पिछले दो वर्ष से मैं प्रतिलिपि पर कहानियां लिखती आ रही हूँ। मुझे लेखन करते हुए बहुत ही अच्छा लगता है। वैसे मुझे लिखने से पढ़ना ज्यादा पसंद है।

  • एक गांव का राक्षस

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    बहुत समय पहले घने जंगलों और ऊँचे पहाड़ों के बीच शिवपुर नाम का एक छोटा-सा गाँव बसा हुआ था। गाँव के लोग बहुत ही सीधे-सादे, मेहनती और भगवान पर अटूट विश्वास रखने वाले थे। गाँव के ठीक बीचोंबीच मां भवानी का एक प्राचीन मंदिर था। हर सुबह और हर शाम पूरा गाँव वहीं इकट्ठा होकर आरती करता और अपनी खुशियों की प्रार्थना करता था। लेकिन कई वर्षों से उस गाँव पर एक भयानक संकट मंडरा रहा था। जंगल की सबसे ऊँची पहाड़ी पर कालमुख नाम का एक राक्षस रहता था। उसका शरीर पहाड़ जैसा विशाल, आँखें जलते अंगारों जैसी लाल और उसकी दहाड़ सुनकर पेड़ों के पत्ते तक काँप उठते थे। जब भी उसे तेज भूख लगती, वह गाँव में आ धमकता और किसी एक छोटे बच्चे को उठाकर ले जाता। उसके जाने के बाद पूरे गाँव में सिर्फ मातम और चीख-पुकार रह जाती। हर माँ अपने बच्चे को सीने से लगाए रहती। कोई भी बच्चा अकेले घर से बाहर नहीं निकलता था। शाम ढलते ही पूरा गाँव अपने घरों के दरवाजे बंद कर लेता। एक दिन फिर वही मनहूस घड़ी आ गई। जंगल की ओर से कालमुख की भयानक दहाड़ गूँजी। “वो आ गया… राक्षस आ गया…!” किसी ने घबराकर चिल्लाया। लोग अपने बच्चों को लेकर इधर-उधर भागने लगे। लेकिन कालमुख ने एक सात साल के मासूम बच्चे को पकड़ लिया। उसकी माँ रोते हुए उसके पैरों में गिर पड़ी। “मेरे बच्चे को छोड़ दे… मैं तेरे हाथ जोड़ती हूँ… उसे मत ले जा…” कालमुख ज़ोर-ज़ोर से हँसने लगा। “हा… हा… हा… तुम्हारे आँसू देखकर ही मेरी भूख और बढ़ जाती है।” इतना कहकर वह बच्चे को लेकर जंगल की ओर चला गया। पूरा गाँव सन्न रह गया। किसी घर में उस दिन चूल्हा नहीं जला। अगली सुबह गाँव के सभी लोग मां भवानी के मंदिर पहुँचे। सबकी आँखों में आँसू थे। गाँव के बुज़ुर्ग ने हाथ जोड़कर कहा, “हे मां… अब हमसे अपने बच्चों का दुख नहीं देखा जाता। हमारी रक्षा करो।” पूरा मंदिर “जय मां भवानी” के जयकारों से गूँज उठा। तभी मंदिर के बाहर जोरदार ठहाका सुनाई दिया। सबने बाहर देखा। कालमुख मंदिर की सीढ़ियों पर खड़ा था। वह हँसते हुए बोला, “हर बार इसी मूर्ति से मदद माँगते हो? अगर तुम्हारी देवी में शक्ति है तो मुझे रोककर दिखाए।” उसने मंदिर की ओर देखकर उपहास किया और बोला, “अगली पूर्णिमा को मैं फिर आऊँगा… और इस बारपहले से भी छोटे बच्चे को लेकर जाऊँगा।” इतना कहकर वह हँसता हुआ जंगल की ओर लौट गया। पूरा गाँव डर से काँप उठा। उसी गाँव में हरिराम और सीता नाम का एक गरीब दंपति रहता था। दोनों की शादी को कई साल हो चुके थे, लेकिन उनकी कोई संतान नहीं थी। फिर भी उन्होंने कभी भगवान से शिकायत नहीं की। वे रोज़ मंदिर की सफाई करते, दीपक जलाते और मां भवानी की सेवा करते। एक रात सीता मंदिर में बैठी रो रही थी। “हे मां… अगर मेरी गोद भरनी है, तो ऐसी संतान देना जो सिर्फ मेरी नहीं, पूरे गाँव की रक्षा करे।” उसकी आँखों से लगातार आँसू बह रहे थे। अचानक मंदिर में रखा दीपक अपने आप तेज़ जलने लगा। बिना हवा के मंदिर की घंटियाँ बजने लगीं। पूरा मंदिर दिव्य प्रकाश से भर गया। सीता ने काँपते हुए सिर उठाया। उसे लगा जैसे मां भवानी की मूर्ति मुस्कुरा रही हो। तभी एक मधुर आवाज़ गूँजी— “डर मत पुत्री। तुम्हारी भक्ति व्यर्थ नहीं जाएगी। समय आने पर मेरी शक्ति तुम्हारे घर जन्म लेगी। वह दिव्य कन्या इस गाँव को राक्षस के आतंक से मुक्त करेगी।” इतना कहकर प्रकाश धीरे-धीरे गायब हो गया। सीता ने यह बात हरिराम को बताई, लेकिन दोनों ने इसे किसी और से नहीं कहा। कुछ दिनों बाद एक चमत्कार हुआ। सालों से निसंतान रही सीता गर्भवती हो गई। जब यह खबर पूरे गाँव में फैली तो लोगों की आँखों में बरसों बाद उम्मीद की चमक दिखाई दी। सबने इसे मां भवानी का आशीर्वाद माना। लेकिन जब यह बात कालमुख तक पहुँची तो वह ज़ोर से हँस पड़ा। “एक बच्ची मेरा अंत करेगी? हा… हा… हा… इंसानों की उम्मीद भी कितनी मज़ेदार होती है।” उसने गुस्से में पहाड़ की एक विशाल चट्टान पर मुक्का मारा और वह चट्टान टुकड़े-टुकड़े होकर बिखर गई। “जिस दिन वह बच्ची पैदा होगी, उसी दिन मैं उसे खा जाऊँगा। फिर देखूँगा तुम्हारी मां भवानी क्या कर लेती हैं।” यह सुनकर गाँव वाले और भी डर गए, लेकिन उन्होंने मां भवानी पर विश्वास नहीं छोड़ा। हर दिन पूरा गाँव मंदिर में दीप जलाकर सीता और उसके होने वाले बच्चे की सलामती की प्रार्थना करने लगा। आखिर वह रात आ ही गई। नौ महीने पूरे हो चुके थे।आसमान में काले बादल छा गए। बिजलियाँ चमकने लगीं।तेज़ हवाएँ चलने लगीं। मां भवानी के मंदिर की घंटियाँ बिना किसी के छुए अपने आप बजने लगीं। पूरा गाँव उस दिव्य प्रकाश से नहा उठा जो मंदिर से निकल रहा था। उसी समय सीता ने एक सुंदर कन्या को जन्म दिया। जैसे ही उस बच्ची ने पहली बार अपनी आँखें खोलीं, उसके माथे पर लाल रंग का एक छोटा-सा त्रिशूल चमक उठा। उसी क्षण मंदिर की अखंड ज्योति पहले से कई गुना अधिक तेज़ हो गई। गाँव के बुज़ुर्ग भावुक होकर बोले, “यह कोई साधारण कन्या नहीं… यह मां भवानी के आशीर्वाद से जन्मी दिव्य शक्ति है।” लेकिन तभी दूर पहाड़ी से कालमुख की भयानक दहाड़ सुनाई दी। “मैं आ रहा हूँ… आज कोई देवी मुझे नहीं रोक पाएगी। सबसे पहले मैं इसी बच्ची को अपना शिकार बनाऊँगा!” उसकी दहाड़ सुनकर पूरे गाँव में सन्नाटा छा गया। लेकिन उसी समय मां भवानी के मंदिर से तेज़ दिव्य प्रकाश निकला। ऐसा लगा जैसे स्वयं मां भवानी मुस्कुराकर कह रही हों “अब अधर्म का अंत निश्चित है… मेरी पुत्री इस धरती पर अपना पहला कदम रख चुकी है।” और इसी के साथ उस राक्षस के अंत की शुरुआत हो गई… राक्षस कालमुख को जैसे ही दिव्य कन्या के जन्म की खबर मिली, वह गुस्से से पागल हो उठा। उसकी भयानक दहाड़ से पूरा जंगल काँपने लगा। हाथ में विशाल गदा लिए वह तेज़ी से शिवपुर की ओर बढ़ा। गाँव वालों ने उसे आते देखा तो सभी अपने घरों से निकलकर मां भवानी के मंदिर में पहुँच गए। हरिराम और सीता अपनी नवजात बेटी को गोद में लिए मां भवानी के चरणों में बैठ गए। सभी लोग हाथ जोड़कर एक ही प्रार्थना कर रहे थे, “हे मां, हमारी रक्षा कीजिए।” कुछ ही देर में कालमुख मंदिर के सामने आ खड़ा हुआ। वह ज़ोर-ज़ोर से हँसते हुए बोला, “यही है वह बच्ची जो मेरा अंत करेगी? आज सबसे पहले मैं इसी को खाऊँगा, फिर पूरे गाँव को खत्म कर दूँगा।” इतना कहकर वह मंदिर की ओर बढ़ा। लेकिन जैसे ही उसने मंदिर की पहली सीढ़ी पर कदम रखा, उसके पैर वहीं रुक गए। उसे लगा जैसे कोई अदृश्य शक्ति उसे आगे बढ़ने नहीं दे रही हो। गुस्से में उसने अपनी पूरी ताकत से गदा मंदिर पर फेंकी, लेकिन गदा मंदिर से टकराने से पहले ही राख बनकर हवा में उड़ गई। उसी क्षण मंदिर के गर्भगृह से तेज़ प्रकाश निकला। वह प्रकाश सीधा उस नवजात कन्या पर पड़ा। बच्ची मुस्कुराई और उसके माथे पर बना त्रिशूल चमकने लगा। देखते ही देखते वह दिव्य आभा से घिर गई। आसमान में बिजली चमकी और मां भवानी का दिव्य स्वर गूँजा, “कालमुख! तेरे पापों का अंत आज निश्चित है।” यह सुनते ही कन्या के सामने एक दिव्य त्रिशूल प्रकट हुआ। बिना किसी के छुए वह त्रिशूल तेज़ी से उड़ता हुआ कालमुख की ओर बढ़ा। राक्षस ने उसे रोकने की बहुत कोशिश की। उसने बड़े-बड़े पत्थर उठाकर फेंके, ज़ोरदार दहाड़ लगाई, लेकिन दिव्य त्रिशूल को कोई नहीं रोक सका। अगले ही पल त्रिशूल कालमुख के सीने में जा धँसा। “नहीं… यह नहीं हो सकता!” राक्षस दर्द से चीख उठा। उसका विशाल शरीर काँपने लगा। धीरे-धीरे वह धुएँ में बदलने लगा और कुछ ही क्षणों में राख बनकर धरती पर बिखर गया। राक्षस के मरते ही आसमान साफ़ हो गया। मंदिर की घंटियाँ अपने आप बजने लगीं और पूरे गाँव में फूलों की वर्षा होने लगी। गाँव वाले खुशी से झूम उठे। हर तरफ़ “जय मां भवानी!” के जयकारे गूँजने लगे। हरिराम और सीता की आँखों से खुशी के आँसू बह रहे थे। उन्होंने अपनी बेटी को सीने से लगा लिया और मां भवानी का धन्यवाद किया। उस दिन के बाद शिवपुर में कभी किसी बच्चे पर कोई संकट नहीं आया। गाँव फिर से हँसी, खुशियों और बच्चों की किलकारियों से गूँज उठा। आज भी लोग उस मंदिर में जाकर यही कहते हैं “जहाँ सच्ची श्रद्धा और मां भवानी का आशीर्वाद हो, वहाँ अधर्म और बुराई का अंत निश्चित होता है।”

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    Auther preeti Sharma

    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं