शीर्षक: सावन का महीना 🌿🕉️❤️
सावन की पहली फुहार जैसे ही धरती पर गिरी, पूरे गाँव का रंग ही बदल गया। सूखी पगडंडियाँ भीगकर महक उठीं, आम और नीम के पेड़ों की पत्तियाँ धुलकर चमकने लगीं और दूर शिव मंदिर की घंटियों की आवाज़ वातावरण को भक्ति से भर रही थी।
सुबह का समय था।
हल्की-हल्की बारिश हो रही थी। गाँव की औरतें सिर पर पल्ला किए और हाथ में पूजा की थाली लिए मंदिर की ओर जा रही थीं। कोई “ॐ नमः शिवाय” का जाप कर रहा था तो कोई भोलेनाथ के भजन गुनगुना रहा था।
उसी गाँव में रहती थी गौरी।
बाईस साल की गौरी… बड़ी-बड़ी काली आँखें, चेहरे पर सादगी और दिल में भगवान शिव के लिए अटूट श्रद्धा।
गौरी बचपन से ही हर सावन सोमवार का व्रत रखती थी। लेकिन इस बार उसका व्रत किसी इच्छा के लिए नहीं था।
इस बार उसने सिर्फ एक प्रार्थना की थी,
“हे महादेव… मेरे हिस्से की सारी खुशियाँ किसी और को दे देना… बस मेरे बाबा को ठीक कर देना।”
उसके पिता पिछले छह महीनों से बीमार थे। इलाज में उनके खेत बिक चुके थे, घर गिरवी रखा जा चुका था और दवाइयों के लिए भी पैसे नहीं बचे थे।
फिर भी हर सोमवार गौरी बिना कुछ खाए-पिए शिव मंदिर जाती, गंगाजल चढ़ाती और मुस्कुराकर लौट आती। उसके मासूम मन में जरा भी छल कपट नहीं था।
गाँव वाले अक्सर कहते,
“इतनी पूजा से क्या होगा? इलाज के लिए पैसे चाहिए, भगवान नहीं।”
गौरी बस मुस्कुरा देती और कहती, “भगवान कभी किसी को खाली हाथ नहीं लौटाते।”
दूसरा सावन सोमवार… इस बार बारिश पहले से ज़्यादा तेज़ थी, जैसे भोलेनाथ उसके सब्र की परीक्षा ले रहे हों।
गौरी मंदिर जा रही थी कि रास्ते में उसे लगभग सत्तर साल का एक बूढ़ा आदमी दिखाई दिया।
वह पूरी तरह भीग चुका था। हाथ काँप रहे थे। लाठी भी कीचड़ में फँस गई थी।
लोग उसके पास से निकल रहे थे लेकिन किसी ने भी रूककर मदद करने की हिम्मत नहीं की।
लेकिन उन्हें देखते ही गौरी तुरंत दौड़ी। “बाबा… आइए, मैं सहारा देती हूँ।”
उसने उन्हें उठाया, अपनी ओढ़नी से उनका चेहरा पोंछा और मंदिर की सीढ़ियों तक पहुँचाया।
बूढ़े ने मुस्कुराकर पूछा, “अरे बेटी… तुम खुद भी भीग रही हो।”
गौरी हँस पड़ी। “सावन की बारिश में भीगने से तो भोलेनाथ भी खुश होते हैं, बाबा। आप मेरी चिंता मत कीजिए”
बूढ़े ने उसकी तरफ गहरी नज़र से देखा। “अगर भगवान आज तुम्हारे सामने आ जाएँ तो क्या माँगोगी?”
गौरी कुछ पल चुप रही।
फिर बोली, “अपने लिए कुछ नहीं चाहिए मुझे।
बस मेरे बाबा ठीक हो जाएँ। और कोई भी बेटी कभी भी अपने पिता को इस हालत में न देखे।”
गौरी की बातें सुनकर उस बूढ़े की आँखें भर आईं।
उन्होंने आशीर्वाद दिया, “तुम्हारी हर मनोकामना पूरी होगी।”
गौरी मुस्कुराकर मंदिर के अंदर चली गई। जब पूजा करके बाहर आई… तो वह बूढ़ा कहीं दिखाई नहीं दिया।
उसने आसपास बहुत खोजा… लेकिन जैसे वह कभी था ही नहीं।
तीसरा सोमवार…
गौरी ने देखा कि मंदिर के बाहर एक छोटा बच्चा रो रहा था। उसकी माँ बेहोश पड़ी थी। लोग तमाशा देख रहे थे।
गौरी तुरंत दौड़ी। अपने पूजा के लिए रखे पैसे निकालकर उसने ऑटो बुलाया और माँ-बेटे को अस्पताल पहुँचा दिया।
उस दिन वह शिवलिंग पर दूध भी नहीं चढ़ा सकी।
घर लौटी तो माँ ने देखा कि आज उसके हाथ में कुछ भी नहीं है इसलिए उन्होंने पूछ लिया,”पूजा नहीं की?”
गौरी मुस्कुराई। “आज शायद महादेव मंदिर में नहीं…
अस्पताल में मिल गए थे।”
समय धीरे-धीरे बीतता गया। गौरी का भोलेनाथ पर विश्वास अटूट बना रहा।
सावन का आखिरी सोमवार आ गया। उस दिन मंदिर में बहुत भीड़ थी। हर कोई बड़ी-बड़ी थालियाँ लेकर आया था। किसी के पास पाँच लीटर दूध था। किसी के पास चाँदी का नाग। किसी ने सोने का मुकुट चढ़ाया।
गौरी के पास… सिर्फ एक लोटा पानी और बेलपत्र थे।
वह धीरे-धीरे लाइन में लगी रही।
तभी मंदिर के पुजारी ने घोषणा की, “आज मंदिर के जीर्णोद्धार के लिए जो सबसे बड़ा दान देगा, उसका विशेष अभिषेक होगा।”
लोगों ने हजारों रुपए चढ़ाने शुरू कर दिए। गौरी चुपचाप पीछे हट गई।
उसे लगा… उसके पास देने के लिए कुछ भी नहीं।
तभी मंदिर के बाहर वही बूढ़ा फिर दिखाई दिया। इस बार उनके पैरों में चोट लगी थी। गौरी बिना सोचे दौड़ी।
अपनी पूजा की थाली नीचे रख दी।
अपने दुपट्टे का किनारा फाड़कर उनके पैर पर पट्टी बाँध दी। बूढ़े ने मुस्कुराकर पूछा, “बेटा, तुम्हारी पूजा?”
गौरी ने हाथ जोड़ लिए। “बाबा… जहाँ इंसान की सेवा हो…
वहीं भगवान की पूजा होती है।”
इतना सुनते ही अचानक मंदिर की घंटियाँ अपने आप बजने लगीं। तेज़ हवा चलने लगी। बारिश की बूँदें जैसे रुक गईं।
गौरी ने पलटकर देखा… वहाँ कोई बूढ़ा नहीं था। सिर्फ एक सफेद बेलपत्र पड़ा था… जिस पर तीन धारियाँ बनी थीं।
उसका दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा। उसी शाम गाँव में एक बड़ी गाड़ी आकर रुकी। उसमें से एक उद्योगपति उतरे।
उन्होंने पूरे गाँव को इकट्ठा किया। और कहने लगे, “बीस साल पहले… मैं इसी गाँव का रहने वाला था।
जब मेरा सब कुछ खत्म हो गया था… तब एक किसान ने मेरी मदद की थी।
आज मैं उसी किसान का कर्ज़ चुकाने आया हूँ।”
उन्होंने नाम लिया, “रामस्वरूप।”
वह गौरी के पिता थे। गौरी भी भीड़ में खड़ी थी जैसे ही उसने नाम सुना वो हैरान रह गई।
उद्योगपति बोले, “उनकी ईमानदारी की वजह से आज मैं इस मुकाम पर हूँ। आज मैं उनको कर्ज चुकाने आया हूँ। मुझे पता चला है कि वो बहुत समय से बीमार है, इसलिए अब उनके इलाज का पूरा खर्च मैं उठाऊँगा।
साथ ही उनका खेत भी वापस दिलाऊँगा।”
इतना सुनते ही पूरा गाँव तालियाँ बजाने लगा।
गौरी की आँखों से आँसू बहने लगे। उसने मन ही मन कहा, “महादेव… आपने मेरी सुन ली।”
कुछ महीनों बाद… गौरी के पिता पूरी तरह स्वस्थ हो चुके थे। खेत फिर से हरे-भरे हो गए थे। घर की खुशियाँ लौट आई थीं।
एक शाम गौरी मंदिर में दीपक जलाने गई। वहीं मंदिर के पुजारी मुस्कुराकर बोले, “बेटी…
क्या तुम्हें पता है? जिस बूढ़े की तुमने दो बार मदद की… उसे इस गाँव में किसी और ने कभी नहीं देखा।”
गौरी चौंक गई। “क्या मतलब?”
पुजारी धीरे से बोले, “उस दिन मैं भी पूरे समय मंदिर में था। तुम अकेली ही किसी से बातें कर रही थीं।”
गौरी के हाथ काँपने लगे। उसने शिवलिंग की ओर देखा। उसे ऐसा लगा जैसे शिवलिंग पर जल की धार के बीच एक क्षण के लिए मुस्कुराता हुआ चेहरा दिखाई दिया।
उसकी आँखों से आँसू बह निकले। वह वहीं बैठ गई।
उसने समझ लिया,
महादेव कभी चमत्कार दिखाकर नहीं आते।
वे किसी भूखे की भूख बनकर आते हैं…
किसी घायल का दर्द बनकर आते हैं…
किसी बूढ़े की लाठी बनकर आते हैं…
और किसी बेटी की उम्मीद बनकर उसके आँसू पोंछ जाते हैं।
उस दिन गौरी ने पहली बार अपने लिए कुछ माँगा।
उसने हाथ जोड़कर कहा, “भोलेनाथ…
मुझे इतना समर्थ बना देना कि मैं हर सावन किसी ज़रूरतमंद की मदद कर सकूँ।
यही मेरी सबसे बड़ी पूजा होगी।”
मंदिर की घंटी एक बार फिर गूँज उठी।
बारिश की ठंडी बूँदें उसके चेहरे पर आकर ठहर गईं।
गौरी मुस्कुरा दी। अब उसे किसी चमत्कार की प्रतीक्षा नहीं थी।
क्योंकि वह समझ चुकी थी कि सच्ची भक्ति केवल मंदिर में जल चढ़ाने से नहीं, बल्कि किसी के जीवन में आशा का दीप जलाने से पूरी होती है।
उसके बाद हर सावन में गाँव की एक नई परंपरा शुरू हुई। लोग पहले किसी गरीब, बीमार या असहाय व्यक्ति की मदद करते, फिर शिव मंदिर में जल चढ़ाने जाते।
धीरे-धीरे यह परंपरा आसपास के गाँवों तक फैल गई। लोग कहते थे कि इस गाँव में सावन सिर्फ़ बरसात नहीं लाता, बल्कि इंसानियत की खुशबू भी साथ लाता है।
और जब भी सावन की पहली बारिश होती, गौरी मंदिर की सीढ़ियों पर खड़ी होकर मुस्कुरा देती। उसे ऐसा महसूस होता जैसे हवा के साथ कोई धीमी-सी आवाज़ उसके कानों में फुसफुसा रही हो,
“जहाँ करुणा है, वहीं मैं हूँ। जहाँ प्रेम है, वहीं मेरा वास है।”
उसने आसमान की ओर देखा। बादलों के पीछे छिपा चाँद दिखाई नहीं दे रहा था, लेकिन उसे विश्वास था कि जैसे बादलों के पीछे चाँद हमेशा मौजूद रहता है, वैसे ही हर सच्चे मन के पीछे महादेव की कृपा भी हमेशा रहती है।
समाप्त। 🕉️🌿
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मेरा नाम नेहा गोयल है।
और पिछले दो वर्ष से मैं प्रतिलिपि पर कहानियां लिखती आ रही हूँ।
मुझे लेखन करते हुए बहुत ही अच्छा लगता है।
वैसे मुझे लिखने से पढ़ना ज्यादा पसंद है।


