भाग = 1 “जिस दिन नंदलाल ने गोकुल में कदम रखा”
🌸 एक ऐसी शुरुआत, जहाँ जन्म लेता है सिर्फ़ एक बालक नहीं… बल्कि पूरी दुनिया का विश्वास! 🌸
गोकुल की उस सुबह में कुछ अलग ही बात थी। सूरज रोज़ की तरह ही निकला था, यमुना की लहरें भी रोज़ की तरह ही बह रही थीं, गायों की घंटियाँ भी वही मधुर संगीत सुना रही थीं, लेकिन फिर भी वातावरण में एक अनजानी-सी खुशी तैर रही थी। ऐसा लग रहा था जैसे प्रकृति स्वयं किसी बहुत बड़े उत्सव की तैयारी कर रही हो। पेड़ों पर बैठे पक्षी बिना किसी कारण चहचहा रहे थे, फूल अपनी खुशबू पहले से कहीं अधिक बिखेर रहे थे और यमुना का जल भी जैसे आज कुछ ज्यादा ही शांत था। किसी को पता नहीं था कि आज से संसार की एक ऐसी कथा शुरू होने वाली है। जिसे युगों-युगों तक प्रेम, भक्ति और धर्म के नाम से याद किया जाएगा। मथुरा की जेल में देवकी और वसुदेव के जीवन की सबसे कठिन रात चल रही थी। कंस का अत्याचार अपनी सीमा पार कर चुका था। देवकी की आँखों में आँसू थे।
लेकिन उन आँसुओं के पीछे एक अद्भुत विश्वास भी था। उन्हें पता था कि उनके गर्भ में पल रहा बालक साधारण नहीं है। वही बालक कंस के अत्याचार का अंत करने वाला था। आधी रात का समय हुआ। चारों ओर घना अंधकार था। अचानक जेल की कोठरी दिव्य प्रकाश से भर उठी। देवकी और वसुदेव ने देखा कि उनके सामने स्वयं भगवान श्रीहरि का दिव्य रूप प्रकट हुआ है। उनके चेहरे पर ऐसी शांति थी, जिसे देखकर भय भी जैसे अपना रास्ता भूल जाए। भगवान ने वसुदेव से कहा कि वे उन्हें लेकर गोकुल जाएँ और वहाँ नंद बाबा के घर जन्मी कन्या को लेकर वापस लौट आएँ। वसुदेव ने अपने नवजात पुत्र को टोकरी में रखा और जैसे ही जेल से बाहर निकलने का प्रयास किया, चमत्कार होने लगे। जिन दरवाजों पर भारी पहरे थे, वे अपने आप खुलते चले गए। पहरेदार गहरी नींद में सो गए। ऐसा लग रहा था मानो स्वयं समय भी उस बालक के मार्ग में झुक गया हो। वसुदेव अपने सिर पर नन्हे कृष्ण को लेकर यमुना की ओर बढ़े। उस रात बारिश बहुत तेज़ थी। बादल गरज रहे थे और बिजली आकाश को चीर रही थी। वसुदेव के कदम डगमगा रहे थे, लेकिन उनके मन में केवल एक ही बात थी।
“मुझे अपने लाल को सुरक्षित गोकुल पहुँचाना है।” जैसे ही वे यमुना के पास पहुँचे, नदी उफान पर थी। वसुदेव ने कृष्ण को और मजबूती से थाम लिया और धीरे-धीरे पानी में उतर गए। तभी एक अद्भुत दृश्य हुआ। शेषनाग ने अपना विशाल फन फैलाकर बाल कृष्ण के ऊपर छत्र बना दिया। बारिश की बूंदें कृष्ण तक पहुँचने से पहले ही उस दिव्य छत्र पर गिरने लगीं। यमुना भी जैसे अपने आराध्य को पहचान गई। उसका जल धीरे-धीरे शांत होने लगा। वसुदेव आगे बढ़ते गए और अंततः गोकुल पहुँच गए। वहाँ नंद बाबा के घर सब लोग गहरी नींद में थे। वसुदेव ने चुपचाप कृष्ण को यशोदा माता के पास सुलाया और वहाँ जन्मी कन्या को अपने साथ लेकर वापस मथुरा लौट गए। किसी को पता तक नहीं चला कि उसी रात गोकुल की धरती पर स्वयं प्रेम ने जन्म लिया है। सुबह होते ही गोकुल में अचानक शंख, नगाड़े और ढोल बजने लगे। नंद बाबा के घर पुत्र जन्म की खबर फैल चुकी थी। “नंद के घर आनंद भयो!” की आवाज़ हर गली में गूँज उठी। गोपियाँ अपने घरों से दौड़ती हुई नंद भवन की ओर आने लगीं। किसी के हाथ में दही था।
किसी के हाथ में मक्खन, कोई फूल लेकर आई थी तो कोई बालक के लिए नए वस्त्र। यशोदा मैया अपने लाल को गोद में लेकर बस निहारती ही रह गईं। उनके लिए संसार में उस समय सबसे सुंदर कोई था तो वह उनका नन्हा कान्हा था। बाल कृष्ण की आँखें बंद थीं और उनके चेहरे पर हल्की-सी मुस्कान थी। यशोदा ने प्यार से उनके माथे को चूमा और कहा, “मेरे लाल, तू हमेशा ऐसे ही मुस्कुराता रहना।” उन्हें क्या पता था कि जिस बालक को वे अपना बेटा समझकर गोद में झुला रही हैं, वही आने वाले समय में लाखों दिलों का सहारा बनने वाला है। गोकुल में उत्सव शुरू हो गया। नंद बाबा ने पूरे गाँव में मिठाइयाँ बँटवाईं। गोप-ग्वाल बालक नाचने लगे। गोपियाँ गीत गाने लगीं। हर तरफ़ रंग, फूल और खुशियाँ थीं। लेकिन इसी खुशी के बीच मथुरा में कंस को जैसे किसी अनहोनी का एहसास हो गया। उसे खबर मिली कि देवकी के घर आठवीं संतान का जन्म हो चुका है। कंस तुरंत जेल की ओर दौड़ा। उसके चेहरे पर क्रोध था। उसने नवजात कन्या को देखा और उसे समाप्त करने के लिए उसे ऊपर उठाया। लेकिन तभी वह कन्या उसके हाथों से छूटकर आकाश में दिव्य रूप में प्रकट हो गई। उसने कंस को चेतावनी दी कि “जिससे तू डरता है, वह जन्म ले चुका है और वह तेरे अंत का कारण बनेगा।” कंस के चेहरे का रंग उड़ गया। अब उसका डर और भी बढ़ गया। उसने अपने सैनिकों को आदेश दिया कि वे गोकुल और आसपास के सभी गाँवों में जन्मे नवजात बालकों पर नज़र रखें। उधर गोकुल में कृष्ण की बाल लीलाएँ शुरू हो चुकी थीं। कोई उन्हें नंदलाल कहता।
कोई कान्हा, कोई माखनचोर, तो कोई लड्डू गोपाल। यशोदा मैया का पूरा संसार ही अपने कान्हा के इर्द-गिर्द घूमने लगा। कृष्ण धीरे-धीरे बड़े होने लगे। उनकी शरारतें पूरे गोकुल में प्रसिद्ध होने लगीं। कभी वे किसी के घर से माखन चुरा लेते, कभी गोपियों की मटकी छिपा देते, कभी ग्वाल-बालों के साथ मिलकर ऐसी शरारत करते कि पूरा गाँव हँसने लगता। एक दिन कई गोपियाँ शिकायत लेकर यशोदा मैया के पास पहुँचीं। “मैया! आपका कान्हा हमारे घर से माखन चुरा ले जाता है।” यशोदा ने कृष्ण को देखा और पूछा, “कान्हा, तूने माखन चुराया?” कृष्ण ने मासूमियत से सिर हिलाया, “नहीं मैया!” एक गोपी तुरंत बोली, “मैया, इसके मुँह पर माखन लगा है!” कृष्ण ने तुरंत अपना मुँह पोंछा और बोले, “मैया, ये तो बिल्ली ने लगाया होगा!” यह सुनते ही सब गोपियाँ हँस पड़ीं। यशोदा भी अपनी हँसी रोक नहीं पाईं। लेकिन कान्हा की शरारत यहीं नहीं रुकी। अगले दिन उन्होंने अपने मित्रों के साथ मिलकर एक योजना बनाई। माखन की मटकी बहुत ऊँचाई पर टंगी थी। ग्वाल-बाल एक-दूसरे के ऊपर चढ़ते गए और सबसे ऊपर कृष्ण जा पहुँचे। उन्होंने मटकी उतारी और सबको माखन बाँट दिया। कुछ माखन बंदरों को भी खिला दिया। तभी पीछे से एक आवाज़ आई।
“कान्हा!” कृष्ण ने पलटकर देखा। सामने यशोदा मैया खड़ी थीं। सब ग्वाल-बाल भाग गए, लेकिन कृष्ण वहीं खड़े रहे। यशोदा ने उनका हाथ पकड़ लिया और बोलीं, “आज तो तुझे पकड़ ही लिया।” कृष्ण ने मासूम बनकर कहा, “मैया, मैंने क्या किया?” यशोदा बोलीं, “माखन चोरी!” कृष्ण मुस्कुराकर बोले, “मैया, माखन तो आपका है, मैं भी तो आपका हूँ… फिर चोरी कैसी?” यशोदा के चेहरे पर मुस्कान आ गई, लेकिन उन्होंने दिखावे के लिए डाँटते हुए कहा, “बहुत बातें बनाने लगे हो!” कृष्ण की आँखों में शरारत चमकी। वह भागने लगे और यशोदा उनके पीछे दौड़ पड़ीं। पूरा गोकुल इस दृश्य को देखकर मुस्कुराने लगा। लेकिन कृष्ण की हर लीला के पीछे कोई न कोई गहरा रहस्य छिपा था। वे सिर्फ़ माखन नहीं चुराते थे, वे तो अपने भक्तों के हृदय चुरा लेते थे। उनका बचपन जितना मासूम था, उतना ही अद्भुत भी। गोकुल के लोगों को अभी अंदाज़ा भी नहीं था कि उनके बीच पल रहा यह नन्हा बालक आगे चलकर कितनी बड़ी-बड़ी लीलाएँ करने वाला है। एक दिन गोकुल के बच्चों ने कृष्ण से शिकायत की कि उन्होंने मिट्टी खाई है। वे दौड़कर यशोदा मैया के पास गए और बोले, “मैया! कान्हा ने मिट्टी खाई है।” यशोदा ने कृष्ण से पूछा, “क्या तूने मिट्टी खाई?” कृष्ण ने तुरंत कहा, “नहीं मैया, मैंने कुछ नहीं खाया।” लेकिन बच्चों ने ज़ोर देकर कहा, “हमने अपनी आँखों से देखा है!” यशोदा ने कहा, “कान्हा, मुँह खोल!” कृष्ण ने धीरे से अपना मुँह खोला। और तभी यशोदा मैया स्तब्ध रह गईं। उन्हें कृष्ण के मुँह में मिट्टी नहीं, बल्कि पूरा ब्रह्मांड दिखाई दिया। आकाश, चंद्रमा, सूर्य, पर्वत, नदियाँ, धरती—सब कुछ उसी छोटे-से मुँह में दिखाई दे रहा था। यशोदा की आँखें आश्चर्य से भर गईं। एक पल के लिए उन्हें लगा कि उनका कान्हा कोई साधारण बालक नहीं है। लेकिन अगले ही क्षण ममता ने उनके सारे विचारों पर पर्दा डाल दिया। उन्होंने कृष्ण को अपने सीने से लगा लिया। कृष्ण ने अपनी नन्ही बाहों से माँ को पकड़ लिया। उस क्षण भगवान और भक्त के बीच का सबसे सुंदर रिश्ता दिखाई दे रहा था। जहाँ भगवान स्वयं माँ के प्रेम के आगे बालक बन जाते हैं। उधर कंस को लगातार कृष्ण के जीवित होने की चिंता सताने लगी थी। उसने कई असुरों को गोकुल भेजना शुरू किया। उसका उद्देश्य केवल एक था। कृष्ण को किसी भी तरह समाप्त करना। लेकिन हर बार कृष्ण अपनी बाल लीला से उस संकट को टाल देते। गोकुल वालों को धीरे-धीरे एहसास होने लगा कि उनके कान्हा में कोई दिव्य शक्ति है। फिर भी उनके लिए वह भगवान से पहले उनका अपना था। नंद का लाल, यशोदा का कान्हा, ग्वाल-बालों का मित्र और गोपियों की आँखों का तारा। शाम होते ही जब कृष्ण गायों के साथ लौटते, तो पूरा गोकुल उनकी बाँसुरी की धुन सुनने के लिए जैसे ठहर जाता। उनकी बाँसुरी की आवाज़ में ऐसा आकर्षण था कि पशु-पक्षी तक शांत हो जाते। यमुना की लहरें धीरे-धीरे बहने लगतीं और पेड़ भी जैसे उस संगीत को सुनने के लिए झुक जाते। लेकिन यह तो बस शुरुआत थी। गोकुल की गलियों में अभी बहुत-सी लीलाएँ बाकी थीं। कंस की साजिशें बढ़ने वाली थीं। कृष्ण के सामने नए-नए संकट आने वाले थे।
पूतना का आगमन होने वाला था, शकटासुर और तृणावर्त जैसे असुरों का सामना होने वाला था, और फिर एक दिन पूरा गोकुल उस लीला का साक्षी बनने वाला था जिसने कृष्ण को केवल नंदलाल नहीं, बल्कि गोकुल का रक्षक बना दिया। उस रात यशोदा मैया ने कान्हा को अपने पास सुलाया। कृष्ण गहरी नींद में मुस्कुरा रहे थे। यशोदा ने उनके बालों पर हाथ फेरते हुए धीरे से कहा, “मेरे लाल, तुझे किसी की नज़र न लगे।” कृष्ण ने आँखें बंद किए हुए ही जैसे मुस्कुराकर माँ को जवाब दिया। बाहर चाँदनी गोकुल पर बिखरी थी और दूर कहीं बाँसुरी की बहुत हल्की धुन सुनाई दे रही थी। किसी को पता नहीं था कि आने वाली सुबह गोकुल के लिए एक नई परीक्षा लेकर आने वाली है। क्योंकि अब कंस का पहला बड़ा दूत गोकुल की ओर बढ़ चुका था… और उसका निशाना था—नन्हा कान्हा। 🦚💙✨
- श्वेता अग्रवाल ✍️💐
