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भाग 3 मैया का कान्हा 🦚❤️
वो रात जैसे बीती ही नहीं थी।
नंद भवन के आँगन में रखे दीपक की लौ पूरी रात काँपती रही और उसके साथ यशोदा मैया का मन भी। कभी वह कृष्ण लल्ला के कक्ष के बाहर खड़ी हो जाती, कभी भीगती आंखों से अन्दर झांककर सोए हुए कान्हा जो देखती।
फिर अगले ही क्षण वापिस लौट आती। लेकिन कुछ ही देर बाद मन उन्हें दोबारा वहाँ ले जाता।
माँ का हृदय शायद आने वाले तूफान को सबसे पहले पहचान लेता है।
उस रात भी यशोदा का हृदय बार-बार कह रहा था, “कुछ होने वाला है।”
भोर की पहली किरण अभी आकाश पर उभरी भी नहीं थी कि वो उठकर रसोई में चली गईं, उन्होंने चूल्हा जलाया, माखन निकाला, मिश्री रखी।
कृष्ण को जो-जो पसंद था, वह सब बनाने लगीं।
आज वह सामान्य से कहीं अधिक भोजन बना रही थीं।
जैसे उन्हें डर हो कि अगर आज कान्हा को भरपेट खिला दिया, तो शायद वह कहीं नहीं जाएगा।
थोड़ी देर बाद पीछे से एक मधुर आवाज आई, “मैया…”
मैया का हाथ वहीं रुक गया, उन्होंने धीरे से पलटकर देखा, श्री कृष्ण द्वार पर खड़े थे, बाल थोड़े बिखरे हुए, आँखों में नींद की हल्की-सी चमक और चेहरे पर वही मासूम मुस्कान।
बिल्कुल वही कान्हा… जिसे देखकर यशोदा की दुनिया पूरी हो जाती थी। लेकिन आज उस चेहरे को देखकर उनकी आँखें भर आईं।
कृष्ण ने तुरंत पूछ लिया, “क्या हुआ मैया?”
यशोदा ने अपना चेहरा दूसरी ओर कर लिया। “कुछ नहीं।”
कृष्ण धीरे-धीरे उनके पास आए। “आप रो रही हैं?”
“नहीं।”
“तो आँखों में पानी क्यों है?”
मैया ने झुँझलाकर कहा, “धुएँ की वजह से।”
कृष्ण ने चूल्हे की ओर देखा। “लेकिन धुआँ तो उधर है।”
यशोदा के पास कोई उत्तर नहीं था, कृष्ण मुस्कुरा दिए।
फिर उन्होंने अपना सिर यशोदा के कंधे पर रख दिया।
“मैया…”
यशोदा की आँखों से आँसू निकल पड़े, उन्होंने तुरंत कृष्ण को अपनी बाँहों में भर लिया। “तू कहीं नहीं जाएगा।”
कृष्ण शांत रहे, यशोदा ने उन्हें और कसकर पकड़ लिया।
“सुना तुमने?”
“हाँ, मैया।”
“तुम मथुरा नहीं जाओगे।”
कुछ पल तक केवल चूल्हे में जलती लकड़ियों की आवाज आती रही।
फिर कृष्ण ने बहुत धीमे स्वर में कहा, “मैया…”
“नहीं!” यशोदा ने तुरंत उनकी बात रोक दी। “मुझे कुछ नहीं सुनना।”
“लेकिन…”
“कोई लेकिन नहीं।” उन्होंने कृष्ण का चेहरा अपने हाथों में थाम लिया।
“तुम्हें पता भी है मथुरा कैसी जगह है? वहाँ का राजा कंस है। जिसने न जाने कितनी बार तुम्हें नुकसान पहुँचाने की कोशिश की। जिसने…”
यशोदा की आवाज काँप गई। “मैं तुम्हें उसके पास कैसे भेज दूँ?”
लला ने उनकी आँखों में देखा। “मैं अकेला नहीं जाऊँगा।”
“तो?”
“दाऊ मेरे साथ होंगे।”
“मुझे बलराम पर भी भरोसा है।” मैया ने तुरंत कहा, “लेकिन मुझे उस कंस पर भरोसा नहीं है!”
कृष्ण कुछ नहीं बोले। यशोदा ने थाली उठाई और उनके सामने रख दी।
“पहले खाना खाओ।” कृष्ण बैठ गए।
मैया ने उन्हें अपने हाथ से खिलाना शुरू किया।
हर निवाला देते समय उनकी उँगलियाँ काँप रही थीं, कृष्ण ने देखा। “मैया, इतना सारा खाना?”
“हाँ।”
“क्यों?”
“मथुरा में पता नहीं तुम्हें ऐसा खाना मिले या नहीं।”
कृष्ण हल्का-सा मुस्कुराए। “वहाँ भी कोई मैया होगी क्या?”
यशोदा का हाथ वहीं रुक गया, उन्होंने कृष्ण को देखा।
“मेरे कान्हा को मुझ जैसी मैया कहाँ मिलेगी?”
कृष्ण ने उनकी उँगली पकड़ ली, “मुझे दूसरी मैया चाहिए भी नहीं।”
यशोदा का हृदय भर आया उन्होंने कृष्ण के सिर पर हाथ रख दिया।
“तो मत जाओ।”
इस बार उनकी आवाज में आदेश नहीं था, एक माँ की विनती थी। “मत जाओ, कान्हा।”
कृष्ण की आँखों में भी क्षणभर के लिए नमी उतर आई।
—
कुछ देर बाद नंद बाबा भी वहाँ आ गए, उन्होंने यशोदा को देखा। “अब भी समझा रही हो?”
यशोदा ने उनकी ओर देखा, “मैं अपने पुत्र को बचाने की कोशिश कर रही हूँ।”
नंद बाबा चुप हो गए। मैया ने कहा, “आप भी कह दीजिए कि कृष्ण नहीं जाएगा।”
नंद बाबा ने गहरी साँस ली। “यशोदा…”
“कहिए।”
“अगर बात केवल मेरे हाथ में होती…” वह रुक गए।
यशोदा समझ गईं। “आप भी उसे जाने देंगे?”
“मैं उसे भेजना नहीं चाहता।”
“फिर?”
नंद बाबा ने कृष्ण की ओर देखा। “लेकिन शायद यह केवल हमारे चाहने या न चाहने की बात नहीं है।”
मैया की आँखें भर आईं। “हर कोई यही क्यों कह रहा है कि यह आवश्यक है?”
कृष्ण उठे। उन्होंने दोनों के पास जाकर कहा, “क्योंकि कुछ रास्ते हमें चुनने नहीं पड़ते, मैया। वे हमें चुनते हैं।”
मैया ने तुरंत उनकी ओर देखा। “तुम्हें किसने सिखाई इतनी बड़ी-बड़ी बातें?”
कृष्ण मुस्कुराए। “आपने।”
“मैंने?”
“हाँ। आपने ही तो सिखाया था कि जब कोई गलत काम सामने हो, तो उससे डरकर पीछे नहीं हटना चाहिए।”
यशोदा चुप हो गईं। कृष्ण उनके सामने बैठ गए।
“मैया, अगर किसी पर संकट हो और हम उसे बचा सकते हों, तो क्या हमें घर में छिप जाना चाहिए?”
यशोदा ने धीरे से सिर हिलाया। “नहीं।”
“अगर कोई अन्याय कर रहा हो और उसे रोकने की शक्ति हमारे पास हो, तो क्या हमें आँखें बंद कर लेनी चाहिए?”
“नहीं।”
“तो फिर…”
कृष्ण ने उनका हाथ अपने हाथों में ले लिया। “अगर मुझे मथुरा जाना पड़े, तो क्या मुझे केवल इसलिए पीछे हट जाना चाहिए कि मुझे आपसे दूर होना पड़ेगा?”
मैया ने कोई उत्तर नहीं दिया, उनकी आँखों में आँसू भर आए। “लेकिन तुम मेरे पुत्र हो।”
कृष्ण मुस्कुराए। “हाँ।”
“मेरे लल्ला।”
“हाँ।”
“मेरी जान।”
कृष्ण ने उनके हाथ को अपने माथे से लगा लिया। “हाँ, मैया।”
यशोदा ने उन्हें खींचकर अपने सीने से लगा लिया।
“फिर मेरा दिल कैसे मान जाए कि तू जाएगा?”
कृष्ण ने आँखें बंद कर लीं। “दिल को मनाना मत, मैया।”
यशोदा ने उन्हें देखा। “बस मुझे अपने साथ महसूस करना।”
—
उस दिन दोपहर तक मैया ने कृष्ण को अपने पास से हटने ही नहीं दिया, कभी वह उनके बालों में तेल लगातीं।
कभी उनके लिए भोजन बनातीं।
कभी पुराने कपड़े निकालकर उन्हें दिखातीं। “याद है यह?”
कृष्ण हँस पड़े। “मैया, यह तो बहुत छोटा है।”
“तब तुम इतने-से थे।”
“और आपने तब भी मुझे बाँधने की कोशिश की थी।”
यशोदा भी मुस्कुरा दीं। “हाँ।”
“माखन की चोरी पर।”
“तुमने पूरा घर सिर पर उठा लिया था।”
कृष्ण हँसे, यशोदा उन्हें देखती रहीं, फिर अचानक उनकी मुस्कान गायब हो गई।
उन्होंने कृष्ण के गाल को छुआ। “कान्हा…”
“जी?”
“वहाँ जाकर मुझे भूल तो नहीं जाओगे?”
कृष्ण कुछ क्षण उन्हें देखते रहे।
फिर बोले, “जिसे भूलने के लिए हृदय चाहिए होता है, उसे भूलने के लिए मैं अपना हृदय ही कैसे भूल जाऊँ?”
यशोदा की आँखें नम हो गईं। “तू बातें बहुत अच्छी करने लगा है।”
कृष्ण मुस्कुराए। “आपसे सीखी हैं।”
“झूठे।”
“सच।”
दोनों कुछ देर हँसते रहे , लेकिन उस हँसी के पीछे छिपे आँसू दोनों जानते थे।
—
शाम ढलने लगी, कृष्ण बाहर जाने के लिए उठे।
यशोदा ने उनका हाथ पकड़ लिया। “कहाँ?”
“दाऊ के साथ जाना है।”
“कहाँ?”
“यमुना किनारे।”
“नहीं।”
कृष्ण ने आश्चर्य से देखा। “क्यों?”
“आज नहीं।”
“मैया…”
“आज मेरे पास रहो।”
कृष्ण कुछ नहीं बोले, फिर वापस बैठ गए।
यशोदा ने उनका सिर अपनी गोद में रख लिया।
बाहर हवा चल रही थी, तुलसी के पत्ते हिल रहे थे।
दूर किसी घर से बाँसुरी की धुन सुनाई दे रही थी।
यशोदा कृष्ण के बालों में उँगलियाँ फेरते हुए बोलीं,
“कान्हा, अगर मैं तुमसे कहूँ कि मत जाओ… तो क्या तुम मेरी बात मानोगे?”
कृष्ण ने आँखें बंद रखीं, बहुत देर तक कोई उत्तर नहीं आया।
फिर उन्होंने धीरे से कहा, “अगर केवल मेरा मन होता…”
मैया की उँगलियाँ रुक गईं। “तो?”
कृष्ण ने आँखें खोलीं। “तो मैं कभी वृंदावन से बाहर नहीं जाता।”
मैया का हृदय जैसे टूट गया। “फिर भी जा रहे हो, कान्हा?”
कृष्ण ने उनकी ओर देखा। “मैया, कभी-कभी अपने लोगों की रक्षा करने के लिए उनसे दूर जाना पड़ता है।”
“लेकिन तुम तो सबकी रक्षा करते हो…”
कृष्ण मुस्कुराए। “तो फिर मुझ पर विश्वास रखिए।”
मैया ने उनकी आँखों में देखा, उन्हें पहली बार लगा…
कि वह जिस बालक को अपनी गोद में लिए बैठी हैं, उसके भीतर कुछ ऐसा है जिसे वह पूरी तरह समझ नहीं सकतीं।
लेकिन उनके लिए वह फिर भी वही था, उनका कान्हा।
उनका लल्ला। उनकी साँस।
उन्होंने कृष्ण के माथे को चूमा। “जाओ…”
यह शब्द उनके होंठों से बड़ी कठिनाई से निकला।
कृष्ण ने आश्चर्य से उन्हें देखा। “लेकिन…”
यशोदा ने आँसू पोंछे। “मैं तुम्हें रोकूँगी नहीं।”
कृष्ण ने उनका हाथ पकड़ लिया।
“मैया…”
“हाँ, डर लग रहा है।” उन्होंने सच स्वीकार किया।
“बहुत डर लग रहा है।”
फिर उन्होंने कृष्ण के सिर पर हाथ रखा। “लेकिन अगर तुम्हारा जाना किसी बड़े काम के लिए है…”
उनकी आवाज काँप रही थी। “तो मेरी ममता तुम्हारे रास्ते की दीवार नहीं बनेगी।”
कृष्ण की आँखें नम हो गईं, यशोदा ने उन्हें आशीर्वाद दिया।
“बस एक बात याद रखना।”
“क्या?”
“जहाँ भी रहना…”
उन्होंने कृष्ण के गाल पर हाथ रखा। “खाना समय पर खाना।”
कृष्ण हँस पड़े, यशोदा भी रोते हुए मुस्कुरा दीं।
“और…”
“और?”
“किसी से झगड़ा मत करना।”
कृष्ण ने शरारती अंदाज में कहा, “अगर कोई मुझसे झगड़ा करे तो?”
“तो वहाँ से चले आना।”
“और अगर वह बहुत गलत हो?”
यशोदा चुप हो गईं।
कृष्ण मुस्कुराए। “तब?”
यशोदा ने उनकी आँखों में देखते हुए कहा, “तब वही करना… जो तुम्हें सही लगे।”
कृष्ण ने उनकी गोद से उठकर उनके चरण छुए।
यशोदा घबरा गईं। “ये क्या कर रहे हो?”
कृष्ण ने कहा, “आपका आशीर्वाद लेने आया हूँ।”
यशोदा ने काँपते हाथों से उनके सिर पर हाथ रखा।
“विजयी भव।”
कृष्ण ने सिर उठाया, माँ की आँखों में आँसू थे।
लेकिन उन आँसुओं के पीछे अब भय के साथ विश्वास भी था।
—
रात गहरी हो चुकी थी। नंद भवन के बाहर वृंदावन की गलियाँ शांत थीं। लेकिन यशोदा अभी भी जाग रही थीं।
कृष्ण उनके पास बैठे थे। दोनों के बीच कोई शब्द नहीं था।
फिर कृष्ण ने धीरे से अपनी बाँसुरी उठाई। “मैया?”
“हूँ?”
“एक बात कहूँ?”
“कहो।”
“अगर कभी मेरी याद आए…”
उन्होंने बाँसुरी को होंठों से लगाया। “तो समझ लेना, मैं यहीं हूँ।”
अगले ही क्षण बाँसुरी की धुन पूरे नंद भवन में फैल गई।
यशोदा की आँखें बंद हो गईं, उनके आँसू गालों पर बहते रहे, लेकिन उनके चेहरे पर शांति उतर आई।
क्योंकि उस पल उन्हें लगा, कृष्ण कहीं नहीं जा रहे।
वह तो हमेशा उनके पास रहेंगे। बाँसुरी की उस धुन में…
वृंदावन की उस हवा में… और सबसे बढ़कर… उनके हृदय में।
लेकिन उन्हें क्या पता था… कि अगली सुबह अक्रूर का रथ नंद भवन के द्वार पर खड़ा होगा।
और तब… यशोदा को अपने उस वचन की सबसे कठिन परीक्षा देनी होगी, “मैं तुम्हें रोकूँगी नहीं।”
क्योंकि प्रेम में किसी को अपना बनाना आसान है…
पर प्रेम में किसी अपने को उसके कर्तव्य के लिए विदा करना,
शायद संसार का सबसे कठिन त्याग है। 🦚❤️
कहानी आगे जारी रहेगी

Neha Goyal
मेरा नाम नेहा गोयल है।
और पिछले दो वर्ष से मैं प्रतिलिपि पर कहानियां लिखती आ रही हूँ।
मुझे लेखन करते हुए बहुत ही अच्छा लगता है।
वैसे मुझे लिखने से पढ़ना ज्यादा पसंद है।