करेजा हो करेजा में समा गईलू, तोहरे नयनवा के जादू में, हम त खो गईनी। तूं हो गईलू हमार ,हम तोहके हो गईनी।तोहरे मुस्कान वां से रौशन भइल ई जिनगी, हर साँसन में तोहरे नाम के धुन गुनगुना गईल। दिलवा धड़के ला हर घड़ी तोहरे खातिर।रात‑दिन तोहरे याद में कटेला पल, सपनावां में भी तोहरे से बतियाईले। का बतलाईं कतना तोहके चाहिले।करेजा हो करेजा में समा गईलू, तोहरे प्यार के दरिया में हम त डूब गईनी। गोर गलिया देखते बहुते सुकून पईनी।जग चाहे जेतना दूरी बना दे, दिल‑रूह से तोहरे से जे जुड़ गईल। छूटी ना कवो हांथ उ जुड़ले रही।चाँद‑तारा भी लागे अब फीका, तोहरे रूपवा से जगमगाईल। दिल के बगिया में फूलवा खिलखिला गईल।करेजा हो करेजा में समा गईलू, तोहरे इश्क़ में खुद के भुला गईनी। इ सगरी उमिरिया तोहरे नाम कईनी।साजनी, तोहरे बिना ना मन लागे, हर धड़कन में तोहरे के पुकारी ले।हम का बतलाईं हम कतना तोहके चाहिले।।
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🌸 वृंदावन का वो आखिरी दिन
पढ़ने का समय : 7 मिनट
भाग 4 राधा को मिला संकेत 🦚❤️
बृज की धूल में अब वो पुरानी रौनक़ और वो जादुई महक नहीं रही थी। सुबह की पहली किरण जब शांत यमुना के घाटों को छूती थी, तो ऐसा प्रतीत होता था जैसे सूरज भी किसी गहरे और कभी न मिटने वाले गम में डूबा हो।
कदंब की वो छांव, जो कभी कान्हा की बंसी की सुरीली और मनमोहक धुनों से गूंजा करती थी, अब एक अजीब और डरावने सन्नाटे में लिपटी हुई थी।
इसी गहरी खामोशी के बीच राधा का जीवन जैसे थम सा गया था। उनके पैर भले ही आंगन में चलते थे, लेकिन उनकी सांसें और उनकी चेतना तो उस रास्ते पर अटक गई थी जिस पर चलकर कृष्ण कभी ब्रज से दूर चले गए थे।
कृष्ण के जाने की खबर ब्रज में एक तेज आंधी की तरह आई थी। मथुरा से अचानक बुलावा आया था, और कान्हा बिना एक पल भी गंवाए, बिना किसी को बताए, चुपचाप सब कुछ पीछे छोड़कर चले गए थे।
कंस का वध करना था और अपने माता-पिता को उस कैद से छुड़ाना था, दिमाग से तो गांव का हर एक बच्चा और बुजुर्ग यह जानता था कि यह उनका एक ऐसा कर्तव्य था जिसे टाला नहीं जा सकता था।
लेकिन किसी का दिल इस बात को स्वीकार करने को तैयार नहीं था कि उनका दुलारा कान्हा अब कभी लौटकर ब्रज की उन धूल भरी गलियों में न तो गायें चराएगा और न ही अपनी बांसुरी की तान छेड़ेगा।
राधा उस मनहूस सुबह अपने घर के बाहर आंगन में तुलसी के पवित्र पौधे को जल अर्पित कर रही थीं। तभी हवा का एक ऐसा ठंडा झोंका आया, जिसने उनके भीतर तक सिहरन पैदा कर दी। कान में किसी अनहोनी की फुसफुस सी गूंजी, “कान्हा चले गए।”
राधा के हाथ से पीतल का लोटा छूटकर जमीन पर गिर गया, सारा पानी चारों तरफ बिखर गया, लेकिन राधा वहीं एक पत्थर की मूरत की भांति अचल खड़ी रह गईं।
उनकी आंखों से एक भी आंसू नहीं टपका, क्योंकि दिल पर जो वज्रपात हुआ था, उसने तो आंसुओं के स्त्रोत को भी भीतर ही सुखा दिया था।
कुछ हफ्तों बीत जाने के बाद, जब मथुरा से एक शाही दूत ब्रज की सीमा में दाखिल हुआ, तो हर किसी की सांसे थम गईं।
वह दूत अपने साथ कुछ संदेश और कुछ राजसी उपहार लेकर आया था। लेकिन जब वह दूत नंदबाबा के घर पहुंचा, तो उसके पास राधा के लिए कहने को कोई खास शब्द या संतोषजनक बातें नहीं थीं।
उसने बस रूखे शब्दों में इतना बता दिया कि अब कृष्ण द्वारका के राजा बन चुके हैं। वे बड़े-बड़े महलों और अटारियों में रहते हैं, उनके पास अब सेवकों का पहरा है और वे राज्य के जटिल कामों में पूरी तरह व्यस्त हो चुके हैं।
वह खबर सुनकर राधा का दिल अंदर तक बेचैन हो उठा। उन्हें उस संदेशवाहक की बातों पर बिल्कुल यकीन नहीं हुआ। उन्होंने अपने मन में ही खुद से सवाल किया, “राजा? मेरा कान्हा किसी ईंट-पत्थर के महल का राजा कैसे बन सकता है? वो तो इन भोले-भाले ग्वाल-बालों का, इन भोली गैयाओं का, गोवर्धन पर्वत की छांव का और इस ब्रज की जर्रे-जर्रे मिट्टी का असली कान्हा है!”
बेचैनी जब हद से बढ़ गई, तो राधा से और न रहा गया। उन्होंने तुरंत एक पत्र लिखने का निर्णय किया। उस कागज पर स्याही से कम और उनके भीतर के आंसुओं की नमी से ज्यादा बात कही गई थी। उस पत्र में कोई कड़वी शिकायत नहीं थी, बस एक सीधा और निश्छल सवाल था,
“हे कान्हा, क्या वो सारे पल, वो यमुना तट की रासलीला, वो सायंकाल की बेला में दिए गए तुम्हारे सारे वादे सब झूठ थे? क्या तुम सचमुच मुझे और इस संपूर्ण ब्रज को हमेशा के लिए भूल गए हो? मुझे कोई लंबी सफाई नहीं चाहिए, बस एक छोटा सा जवाब दे दो, कोई ऐसा संकेत भेज दो जो मुझे यह भरोसा दिला सके कि तुम आज भी वहीं हो जहां मेरी हर सांस चलती है।”
वह पत्र एक बेहद विश्वस्त और पुराने चरवाहे के हाथों चुपचाप मथुरा भिजवा दिया गया। उसके बाद के कई हफ्ते राधा ने दिन-रात उसी द्वारका के रास्ते की तरफ देखते हुए बिताए, जहां से किसी भी दिशा में कोई आहट आने की उम्मीद बंधी रहती थी।
आखिरकार, एक शाम जब सूरज अपनी लाली समेटकर क्षितिज में डूब रहा था, मथुरा की तरफ से एक भव्य रथ धूल उड़ाता हुआ ब्रज की सीमा पर आकर रुका। उस रथ से एक शाही संदेशवाहक नीचे उतरा।
उसके दोनों हाथों में एक सुंदर संदूकड़ी थी, जिस पर द्वारका के राजघराने की मोहर लगी हुई थी। यह खबर जंगल की आग की तरह पूरे ब्रज में फैल गई और देखते ही देखते सारा गांव इकट्ठा हो गया। यशोदा मैया की आंखें भी उस संदूकड़ी को देखकर भर आईं, क्योंकि वे जानती थी कि यह उनके लाल का भेजा हुआ कुछ है।
वह संदेशवाहक बिना किसी देरी के सीधे राधा के द्वार पर पहुंचा। उसने आदर के साथ राधा को प्रणाम किया और वो शाही संदूकड़ी उनके कांपते हाथों में सौंप दी। उस वक्त राधा का दिल अपनी सामान्य गति से कई गुना तेज धड़क रहा था। उन्होंने गहरी सांस ली और अपने उन्हीं कांपते हाथों से उस संदूकड़ी के ढक्कन को उठाया।
अंदर झांकने पर कोई लंबा-चौड़ा प्रेम पत्र नहीं मिला। न ही कोई सफाई दी गई थी, और न ही कोई मीठी या मल्हार जैसी बातें लिखी थीं।
उस संदूकड़ी के भीतर सिर्फ दो ही चीजें रखी थीं: एक सुंदर और चमकदार मयूर पंख, जिसे हमेशा कान्हा अपने मुकुट में बड़े चाव से लगाया करते थे, और दूसरी चीज थी एक सूखा हुआ, पूरी तरह मुरझाया हुआ कमल का फूल। वह वही फूल था जो कभी यमुना के निर्मल जल में खिला करता था और जिसे एक दिन राधा ने अपने हाथों से बड़े प्रेम से कान्हा को भेंट किया था।
राधा ने उन दोनों पुरानी चीजों को धीरे से उठाया। उन्होंने उस मयूर पंख को श्रद्धा से अपने माथे से लगा लिया। उस स्पर्श में कोई भाषा नहीं थी, कोई वाक्य नहीं था, लेकिन एक ऐसी गहरी गूंज थी जिसे केवल वही समझ सकती थीं।
उस पंख की दमकती चमक और उस सूखे हुए फूल की अनकही खामोशी ने मिलकर राधा को एक पल में वो सब कुछ समझा दिया, जिसे समझाने के लिए हजारों शब्दों की भी जरूरत नहीं पड़ती।
कृष्ण ने लिखकर एक शब्द भी नहीं भेजा था, क्योंकि वे भली-भांति जानते थे कि शब्दों के छोटे दायरे में राधा के प्रेम को बांधा नहीं जा सकता। उनका यह मौन ही ब्रह्मांड का सबसे बड़ा और सबसे सटीक उत्तर था।
उस मौन का सीधा अर्थ यह था कि भौतिक दूरियां चाहे जितनी भी बढ़ जाएं, राजमहलों की ऊंची दीवारें चाहे इंसानों के बीच कितनी भी दूरी क्यों न पैदा कर दें, लेकिन जो रूहानी बंधन दो दिलों के बीच बन चुका है, उसे किसी सांसारिक पद, प्रतिष्ठा या कोसों लंबी दूरी की कोई आवश्यकता नहीं होती। कृष्ण अब केवल ब्रज की गलियों में घूमने वाला एक ग्वाला नहीं, बल्कि एक ऐसी सर्वव्यापी चेतना बन चुके थे, जो हर कण में, हर हवा के झोंके में मौजूद थे।
यह अहसास होते ही राधा ने एक लंबी और सुकून भरी सांस ली। उनके उदास चेहरे पर अचानक एक बेहद हल्की और संतुष्ट मुस्कान तैर गई, वो मुस्कान जिसमें एक गहरा दर्द भी था और उससे कहीं ज्यादा एक अद्भुत आंतरिक शांति भी थी।
उन्होंने पास खड़े हैरान ग्रामीणों की तरफ देखा और धीमी आवाज में कहा, “मेरे काले ने मुझे मेरा उत्तर दे दिया है। उसने साफ कह दिया है कि वो ब्रज छोड़कर कहीं नहीं गया, वो आज भी यहीं, हम सबके भीतर मौजूद है।”
गांव वाले थोड़े अचंभित थे, वे राधा के चेहरे को टकटकी लगाकर देख रहे थे कि बिना किसी पत्र के आखिर उन्होंने ऐसा क्या पढ़ लिया। लेकिन राधा इस सच्चाई को पूरी तरह जानती थीं।
उस शाम, बहुत लंबे अरसे के बाद, राधा ने अपने आंगन में तुलसी के पास फिर से सुकून भरे कदम रखे। उसी वक्त पास के कदंब के पेड़ की एक हरी पत्ती हवा के झोंके से हिली, और राधा को ऐसा आभास हुआ जैसे दूर किसी अछोर लोक से बंसी की कोई बहुत ही धीमी और मीठी सी धुन उनके कानों में गूंज रही हो।
प्रेम कभी भी शब्दों का मोहताज नहीं होता, वह तो केवल गहराई से महसूस किया जाता है, और आज राधा ने उस संपूर्ण मौन के भीतर कृष्ण को पहले से कहीं ज्यादा अपने करीब पा लिया था।
क्या प्रेम करने वाला व्यक्ति अपने प्रिय को उसके कर्तव्य के लिए विदा कर सकता है?

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🌸 वृंदावन का वो आखिरी दिन
पढ़ने का समय : 10 मिनट
भाग 2 — कंस का संदेश 🦚
वृंदावन की उस सुबह के बाद दिन तो बीत गया था…
लेकिन यशोदा मैया के मन की बेचैनी नहीं बीती।
सूरज ढलने लगा था।
आकाश पर लालिमा फैल चुकी थी। यमुना का जल सूर्य की अंतिम किरणों को अपने भीतर समेटे धीरे-धीरे शांत हो रहा था। गौएँ चरागाह से लौट रही थीं और उनके गलों में बंधी घंटियों की आवाज पूरे वृंदावन में एक मधुर संगीत की तरह फैल रही थी।
गोपियाँ अपने-अपने घरों के बाहर खड़ी होकर गायों का स्वागत कर रही थीं।
ग्वालबाल दिनभर की शरारतों के किस्से सुनाते हुए अपने घरों की ओर जा रहे थे।
और नंद भवन के आँगन में… श्री कृष्ण अपनी बाँसुरी लेकर बैठे थे, उनके पास ही बैठे थे उनके बड़े भाई बलराम
कभी कृष्ण कुछ कहते और बलराम हँस पड़ते।
कभी दोनों बिना कुछ बोले ही यमुना की ओर देखते रहते। सब कुछ सामान्य था। फिर भी…
मैया यशोदा को कुछ सामान्य नहीं लग रहा था।
वह रसोई में खड़ी थीं, लेकिन बार-बार उनकी नजर कृष्ण पर जा रही थी।
सुबह कृष्ण ने जो बात कही थी, वह उनके मन से निकल ही नहीं रही थी।
“अगर कभी आपका कान्हा आपसे दूर चला जाए तो?”
मैया ने सिर झटक दिया।
“नहीं…” उन्होंने खुद से कहा। “मेरा कान्हा ऐसा कुछ नहीं कह सकता।”
लेकिन मन था कि मान ही नहीं रहा था। तभी बाहर से नंद बाबा की आवाज आई, “यशोदा!”
मैया ने वहीं से आवाज लगाई, “जी?”
“जरा बाहर आना।”
वो हाथ पोंछते हुए बाहर आईं, नंद बाबा मुख्य द्वार के पास खड़े थे। उनके चेहरे पर गंभीरता थी।
“क्या हुआ?” यशोदा ने पूछा।
नंद बाबा ने कुछ कहने के लिए होंठ खोले ही थे कि तभी बाहर से घोड़ों के दौड़ने की आवाज सुनाई दी , टापों की आवाज धीरे-धीरे तेज होती गई।
नंद भवन के द्वार पर खड़े सेवक ने बाहर झाँककर देखा।
“महाराज…”
नंद बाबा उसकी ओर मुड़े। “क्या हुआ?”
“एक रथ आ रहा है।”
“किसका?”
सेवक ने दूर देखते हुए कहा, “पहचान में नहीं आ रहा।”
नंद बाबा कुछ क्षण शांत रहे। फिर बोले, “द्वार खोल दो।”
कुछ ही पल बाद एक सुंदर रथ नंद भवन के सामने आकर रुका। रथ से एक गंभीर, तेजस्वी पुरुष नीचे उतरे।
चेहरे पर थकान थी… लेकिन आँखों में गहरी भक्ति।
उन्होंने जैसे ही नंद बाबा को देखा, हाथ जोड़ दिए। “नंद महाराज।”
नंद बाबा आगे बढ़े। “आप?”
उन्होंने ध्यान से देखा। फिर पहचानते ही बोले, “अक्रूर जी!”
यशोदा भी उनके पास आ गईं।
अक्रूर ने दोनों को प्रणाम किया। “महाराज, मैया…”
नंद बाबा ने उनका स्वागत करते हुए कहा, “आइए। इतनी संध्या के समय आपका आगमन… सब कुशल तो है?”
अक्रूर ने एक क्षण नंद बाबा की ओर देखा। उनके चेहरे पर कुछ ऐसा था कि नंद बाबा का मन और भी बेचैन हो गया।
“सब कुशल है ना?” इस बार नंद बाबा की आवाज में चिंता स्पष्ट थी।
अक्रूर ने धीरे से सिर झुकाया। “मैं एक संदेश लेकर आया हूँ।”
यशोदा के हृदय में जैसे अचानक कोई अनजाना भय जाग उठा। उन्होंने बिना जाने ही कृष्ण की ओर देखा।
कृष्ण अब भी आँगन में बैठे थे। लेकिन उनकी आँखें…
सीधे अक्रूर पर थीं।
जैसे वह पहले से जानते हों कि अक्रूर क्यों आए हैं।
—
नंद बाबा अक्रूर को भीतर ले गए।
कृष्ण और बलराम भी कुछ दूरी पर खड़े हो गए।
मैया ने कृष्ण का हाथ पकड़ लिया। “तुम यहीं रहना।”
कृष्ण ने उनकी ओर देखा। “क्यों मैया?”
“बस…” यशोदा के पास कोई कारण नहीं था।
उन्हें स्वयं समझ नहीं आ रहा था कि वह ऐसा क्यों कह रही हैं। अंदर सभा-कक्ष में नंद बाबा ने अक्रूर को आसन दिया।
“बताइए।”
अक्रूर कुछ क्षण मौन रहे। फिर उन्होंने कहा, “महाराज… मैं मथुरा से आया हूँ।”
“मथुरा से?”
“हाँ।”
नंद बाबा का चेहरा गंभीर हो गया, “किसलिए?”
अक्रूर ने गहरी साँस ली। “महाराज कंस ने एक धनुष यज्ञ का आयोजन किया है।”
नंद बाबा ने सिर हिलाया। “यह तो सुना है।”
“उसने वृंदावन से भी लोगों को आमंत्रित किया है।”
“ठीक है।”
नंद बाबा कुछ सहज हुए।
लेकिन अगले ही शब्दों ने उनके चेहरे का रंग बदल दिया।
“विशेष रूप से कृष्ण और बलराम को।”
कमरे में अचानक सन्नाटा छा गया। यशोदा के हाथ से पानी का पात्र लगभग छूट गया।
“कृष्ण… और बलराम?”
अक्रूर ने धीरे से सिर झुका दिया। “हाँ, मैया।”
यशोदा ने तुरंत कहा, “लेकिन क्यों?”
अक्रूर ने उनकी ओर देखा। उनकी आँखों में करुणा थी।
“राजा कंस ने उन्हें मथुरा बुलाया है।”
यशोदा आगे बढ़ीं। “कितने दिनों के लिए?”
अक्रूर चुप रहे, यशोदा की आँखें फैल गईं।
“मैंने पूछा… कितने दिनों के लिए?”
अक्रूर ने कोई उत्तर नहीं दिया, नंद बाबा समझ गए।
उन्होंने धीमी आवाज में पूछा, “क्या यह केवल धनुष यज्ञ के लिए बुलावा है?”
अक्रूर ने उनकी आँखों में देखा। “नहीं।”
बस एक शब्द और नंद भवन की सारी शांति जैसे टूट गई।
—
यशोदा ने तुरंत कृष्ण को अपनी ओर खींच लिया। “मेरा बेटा कहीं नहीं जाएगा।”
कृष्ण शांत खड़े रहे। “मैया…”
“नहीं!” यशोदा की आँखों में आँसू आ गए।
“मुझे नहीं पता राजा कंस ने क्यों बुलाया है। मुझे यह भी नहीं जानना कि वहाँ क्या उत्सव है, क्या यज्ञ है… मेरा कान्हा कहीं नहीं जाएगा।”
नंद बाबा ने उन्हें समझाने की कोशिश की। “यशोदा…”
“नहीं जी!” यशोदा ने उनकी ओर देखा।
“आप कुछ मत कहिए।”
फिर वह अक्रूर की ओर मुड़ीं। “आप वापस चले जाइए।”
अक्रूर स्तब्ध रह गए। “मैया…”
“कह दीजिए कंस से कि कृष्ण नहीं आएगा।”
अक्रूर ने सिर झुका लिया। “काश मैं ऐसा कर पाता।”
“तो कीजिए।” यशोदा की आवाज टूट गई। “आप नहीं जानते… वह मेरे लिए क्या है।”
अक्रूर की आँखें नम हो गईं। “मैं जानता हूँ, मैया।”
“नहीं!” यशोदा ने कृष्ण का चेहरा अपने हाथों में थाम लिया। “कोई नहीं जानता।”
उन्होंने कृष्ण को अपने सीने से लगा लिया। “मेरे लिए यह भगवान नहीं है…”
उनकी आवाज काँप रही थी। “यह मेरा पुत्र है।”
कृष्ण ने धीरे से उनकी पीठ पर हाथ रखा। “मैया…”
“तुम कहीं नहीं जाओगे।”
कृष्ण चुप रहे। उनकी आँखें कुछ पल के लिए नंद बाबा पर गईं।
नंद बाबा की आँखों में भी चिंता थी। लेकिन उस चिंता के पीछे कुछ और था।
जैसे उन्हें भीतर से पता हो कि यह बुलावा केवल एक उत्सव का निमंत्रण नहीं है।
—
अक्रूर ने धीरे से कहा, “नंद महाराज, मुझे एक बात कहनी है।”
नंद बाबा ने उनकी ओर देखा। “कहिए।”
“मैं स्वयं भी इस यात्रा को लेकर प्रसन्न नहीं हूँ।”
यशोदा ने उनकी ओर देखा।
अक्रूर बोले, “लेकिन मुझे विश्वास है कि कृष्ण और बलराम का मथुरा जाना किसी बड़े उद्देश्य का भाग है।”
नंद बाबा ने तुरंत पूछा, “आप ऐसा क्यों कह रहे हैं?”
अक्रूर कुछ क्षण मौन रहे। फिर बोले, “क्योंकि कंस कृष्ण से भयभीत है।”
कमरे में सन्नाटा छा गया। “भयभीत?” नंद बाबा ने दोहराया।
अक्रूर ने सिर हिलाया। “हाँ।”
“लेकिन कृष्ण ने उसका क्या बिगाड़ा है?”
“यही तो बात है।”
अक्रूर की आवाज धीमी थी। “कंस कृष्ण से इसलिए नहीं डरता कि कृष्ण ने उसका कुछ बिगाड़ा है… वह इसलिए डरता है क्योंकि उसे अपने अंत का भय है।”
यशोदा का हृदय धक से रह गया। “कैसा अंत?”
अक्रूर ने उत्तर नहीं दिया।
नंद बाबा ने गंभीर होकर पूछा, “क्या भविष्यवाणी वाली बात…”
अक्रूर ने धीरे से सिर झुका दिया, यशोदा ने कृष्ण को और कसकर पकड़ लिया। उनके मन में वर्षों पुरानी बातें कौंधने लगीं।
कृष्ण का जन्म… उस रात की रहस्यमयी घटनाएँ…
गोकुल में उनका आना… कंस के भेजे असुर…
पूतना… शकटासुर… त्रिणावर्त… कालिया…
गोवर्धन…
एक-एक घटना जैसे अचानक उनके सामने जीवित हो उठी।
क्या यह सब उसी दिन की ओर बढ़ रहा था? क्या कृष्ण का वृंदावन में रहना अब संभव नहीं था?
यशोदा ने कृष्ण की ओर देखा, वह शांत थे।
असामान्य रूप से शांत। “कान्हा…”
कृष्ण ने उनकी आँखों में देखा। “हाँ, मैया।”
“तुम्हें डर नहीं लग रहा?”
कृष्ण मुस्कुराए। “किस बात का?”
“मथुरा जाने का।”
कृष्ण ने धीरे से कहा, “जहाँ आपका आशीर्वाद हो, वहाँ डर कैसा?”
यशोदा की आँखों से आँसू बह निकले। उन्होंने तुरंत अपना चेहरा दूसरी ओर कर लिया।
वह नहीं चाहती थीं कि कृष्ण उन्हें रोते हुए देखें, लेकिन कृष्ण सब समझ रहे थे।
—
उस रात नंद भवन में किसी ने ठीक से भोजन नहीं किया।
गोपियों तक यह समाचार पहुँच चुका था, धीरे-धीरे पूरा वृंदावन जान गया, कृष्ण और बलराम को मथुरा बुलाया गया है।
गलियों में फुसफुसाहट होने लगी।
किसी ने कहा, “कृष्ण को नहीं जाना चाहिए।”
किसी ने कहा, “कंस पर विश्वास कैसे किया जा सकता है?”
किसी ने कहा, “यह जरूर कोई चाल है।”
और किसी ने बस इतना कहा, “अगर कृष्ण चले गए तो वृंदावन का क्या होगा?”
यमुना किनारे राधा खड़ी थीं, उन्हें भी समाचार मिल चुका था। हवा में वही बाँसुरी की धुन जैसे अब भी तैर रही थी।
लेकिन आज… वह धुन उन्हें खुश नहीं कर रही थी।
उनकी आँखों के सामने कृष्ण का चेहरा था। सुबह का वही प्रश्न याद आ रहा था, “अगर कभी आपका कान्हा आपसे दूर चला जाए तो?”
राधा की आँखों से एक आँसू गिरा, उन्होंने यमुना की ओर देखा।
“तो क्या सच में…” उनकी आवाज हवा में खो गई।
“कान्हा हमसे दूर जाने वाले हैं?”
—
नंद भवन में उस रात कृष्ण अपने कक्ष में बैठे थे, बलराम उनके सामने थे।
कुछ देर दोनों भाई मौन रहे। फिर बलराम ने पूछा, “तुम्हें पहले से पता था?”
कृष्ण ने मुस्कुराकर उनकी ओर देखा। “क्या?”
“अक्रूर के आने के बारे में।”
कृष्ण ने उत्तर नहीं दिया। बलराम समझ गए। “तुम जानते थे।”
कृष्ण ने धीरे से बाँसुरी उठाई। “दाऊ…”
“हूँ?”
“कभी-कभी जीवन हमें वहाँ ले जाता है जहाँ जाने की हमने इच्छा नहीं की होती।”
बलराम ने उनकी आँखों में देखा। “और अगर कोई तुम्हें रोकना चाहे?”
कृष्ण ने कुछ क्षण सोचा, फिर मुस्कुराए।
“तो उसे प्रेम से समझाना होगा।”
“और अगर प्रेम ही तुम्हें रोक ले?”
इस बार कृष्ण की मुस्कान थोड़ी फीकी पड़ गई, उन्होंने बाहर देखा। आँगन में यशोदा मैया बैठी थीं, उनकी आँखें कृष्ण के कक्ष की ओर थीं।
कृष्ण कुछ पल उन्हें देखते रहे। फिर धीरे से बोले, “तब सबसे कठिन होता है… जाना।”
उनकी उँगलियाँ बाँसुरी पर ठहर गईं, बाहर रात गहरी होती जा रही थी।
वृंदावन सो रहा था, लेकिन उस रात… नंद भवन में कोई नहीं सोया।
एक माँ अपने पुत्र को खोने के भय में जाग रही थी।
एक पिता अपने कर्तव्य और पुत्र के बीच खड़ा था।
एक भाई आने वाले संघर्ष को महसूस कर रहा था।
एक युवती यमुना किनारे अपने प्रिय के जाने की आहट सुन रही थी।
और कृष्ण… वह सबसे शांत बैठे थे।
जैसे उन्हें पता हो कि अगली सुबह से वृंदावन की हर साँस बदलने वाली है।
क्योंकि अक्रूर केवल कंस का संदेश लेकर नहीं आए थे।
वह अपने साथ…
वृंदावन के विरह की पहली सुबह भी लेकर आए थे। 🦚❤️
हम दिन में जाने कितने बुरे विचार लाते हैं या कहते हैं इसलिए एक बार साफ मन से
🌺 राधे राधे 🌺 कहते जाइए।
और अगर आपको कहानी अच्छी लगी हो तो लाइक और कमेंट भी कर देना


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No love clause
पढ़ने का समय : 5 मिनट
Part 7
शुभम हल्का-सा मुस्कुराया। “ठीक है… फिर देखते हैं छह महीने बाद कौन सही साबित होता है।”
अग्नि ने उसकी बात को नजरअंदाज कर दिया। उसने टेबल पर रखा अपना फोन उठाया। स्क्रीन पर कई नोटिफिकेशन थे। उसने एक-एक करके उन्हें देखा।
फिर अचानक उसकी उंगली एक नाम पर जाकर रुक गई।
Veda Sharma.
अग्नि ने मैसेज पढ़ा और फोन वापिस टेबल पर रख दिया और अपने लिए ड्रिंक बनाने लगा। लेकिन वो शायद कुछ सोच भी रहा था।
शुभम ने उसकी हरकत नोटिस कर ली। “क्या हुआ?”
अग्नि, “कुछ नहीं।”
शुभम ने पूछा, “किसका मैसेज था?”
अग्नि बोला, “ऑफिस का।”
शुभम ने आँखें सिकोड़कर उसकी तरफ देखा। “वेदा का?”
अग्नि ने उसकी तरफ देखा। “तुझे उसका नाम कैसे पता?”
शुभम हँस पड़ा। “भाई, मैं तेरा दोस्त हूँ। तेरी सेक्रेटरी के बारे में इतना तो जानता ही हूँ कि वो पिछले तीन साल से तेरे साथ काम कर रही है।”
अग्नि ने कोई जवाब नहीं दिया। शुभम ने मुस्कुराकर पूछा, “वैसे कैसी है?”
अग्नि ने सामान्य स्वर में कहा, “कौन?”
शुभम कूल अंदाज में, “वेदा।”
अग्नि ने कंधे उचकाए, “मुझे क्या पता?”
“अच्छा?” शुभम ने शरारत से कहा, “अभी दो मिनट पहले तक तू बता रहा था कि तुझे एक समझदार, सादगी पसंद लड़की चाहिए…”
अग्नि ने उसे घूरा। “शुभम।”
शुभम, “हाँ भाई?”
अग्नि बोला, “अपनी बकवास बंद कर।” क्योंकि वो समझ गया था कि शुभम कहना क्या चाह रहा है,लेकिन उसे शुभम की बात बुरी भी नहीं लगी।
शुभम हँस पड़ा। लेकिन अग्नि के मन में पहली बार एक विचार आया।
एक ऐसा विचार जिसे उसने तुरंत अपने दिमाग से निकालने की कोशिश की।
वेदा शर्मा।
अग्नि ने गिलास में ड्रिंक डाली और उसे धीरे-धीरे घुमाने लगा।
शुभम अब भी उसे ही देख रहा था। “क्या सोच रहा है?”
अग्नि ने गिलास होंठों तक ले जाते हुए कहा, “कुछ नहीं।” लेकिन इस बार उसकी आवाज़ में पहले जैसी सहजता नहीं थी।
शुभम ने भौंहें उठाईं। “तू जब ‘कुछ नहीं’ बोलता है ना, तब समझ आता है कि दिमाग में बहुत कुछ चल रहा है।”
अग्नि ने उसे घूरा। “तू मेरा दिमाग पढ़ना कब से सीख गया?”
“जब से तू मेरा दोस्त बना है।” शुभम ने आराम से सोफे की पीठ से सिर टिकाया। “वैसे एक बात बता… तेरी सेक्रेटरी शादीशुदा तो नहीं है?”
अग्नि ने तुरंत उसकी तरफ देखा। “नहीं।” जवाब इतना जल्दी आया कि शुभम के चेहरे पर शरारती मुस्कान और गहरी हो गई।
“ओहो… तो जानकारी पूरी है।”
अग्नि ने गिलास टेबल पर रख दिया। “शुभम।”
शुभम, “अरे मैं तो बस पूछ रहा था।”
अग्नि, “और मैं बस जवाब दे रहा हूँ।”
शुभम, “ चल तू अब ज्यादा मत सोच, मैं कुछ करता हूँ।”
अग्नि में हां में सिर हिलाया और बोला, “ बस इसी जवाब की उम्मीद थी।”
अगली सुबह… राजावत ग्रुप।
सुबह के ठीक नौ बजे।
अग्नि हमेशा की तरह अपने ऑफिस पहुँच चुका था।
उसका केबिन पूरी तरह व्यवस्थित था।
टेबल पर जरूरी फाइलें रखी थीं। कॉफी उसके सामने थी।
लेकिन आज पहली बार… उसकी नजर बार-बार दरवाजे की तरफ जा रही थी।
तभी डोर नॉक हुआ।
अग्नि, “ come in!”
निशांत अंदर आया। “Good morning, sir.”
अग्नि, “Morning.” निशांत ने फाइल आगे बढ़ाई।
“आज दस बजे की बोर्ड मीटिंग है। ग्यारह बजे मल्होत्रा ग्रुप के साथ मीटिंग और दोपहर में…”
अग्नि, “निशांत।”
निशांत, “जी, सर?”
अग्नि ने बिना किसी रिएक्शन के पूछा, “वेदा आई?”
निशांत कुछ पल उसे देखता रहा। फिर बोला, “अभी तक नहीं, सर।”
अग्नि ने अपनी घड़ी देखी। नौ बजकर दस मिनट।
“आते ही उसे मेरे केबिन में भेजना।”
निशांत ने सिर हिलाया, “जी सर।”
निशांत जाने लगा। फिर अग्नि ने उसे रोक लिया। “और निशांत…”
निशांत रूककर पीछे मुड़ा, “जी?”
“अगर वो आज भी ऑफिस नहीं आ पाए तो…” अग्नि कुछ पल रुका। “पहले मुझसे बात करना।”
निशांत ने सिर हिलाया। “जी सर।”
दरवाजा बंद हो गया। अग्नि कुर्सी पर पीछे टिक गया।
उसने खुद से सवाल किया, वो आखिर वेदा का इंतजार क्यों कर रहा था?
उसे अपनी ही बेचैनी अजीब लग रही थी। तभी दरवाजे पर दस्तक हुई।
अग्नि की नजर दरवाजे पर गई। “Come in.”
दरवाजा खुला। और सामने… वेदा खड़ी थी।
आज भी उसकी आँखों के नीचे नींद की कमी साफ दिखाई दे रही थी। बाल जल्दी में बाँधे हुए थे।
चेहरा थका हुआ था।
लेकिन हाथ में हमेशा की तरह ऑफिस की फाइलें थीं।
“Good morning, sir.”
अग्नि कुछ सेकंड उसे देखता रहा। फिर बोला, “Sit.”
वेदा चुपचाप सामने वाली कुर्सी पर बैठ गई।
अग्नि ने अपने सामने रखी फाइल बंद कर दी।
कुछ पल तक वो उसे देखता रहा।
फिर धीमे स्वर में बोला, “वेदा…”
वेदा ने हैरानी से अग्नि की तरफ देखा, क्योंकि ये शायद पहली बार था जब वो उसे इस तरह से पुकार रहा था। “जी, सर?”
“मुझे तुमसे ऑफिस के काम के अलावा…”
वो एक पल के लिए रुका। “…एक बेहद निजी बात करनी है।”
वेदा की भौंहें सिकुड़ गईं। उसे समझ नहीं आया कि अग्नि आखिर उससे क्या पूछने वाला है।
और अग्नि…
वो भी शायद पहली बार अपने जीवन का सबसे असामान्य प्रस्ताव किसी के
सामने रखने जा रहा था।
क्रमशः…
💕 No Love Clause
कभी-कभी जिंदगी सबसे बड़ा सौदा वहीं रखती है, जहाँ इंसान सबसे ज्यादा मजबूर होता है।
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अधूरी इबादत भाग~53
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भाग~53 क्या अब सब ठीक होगा?
रूहानी के हाथ में थमा चम्मच अब भी उस प्लेट में अटका हुआ था, लेकिन उसका ध्यान बिल्कुल भी वहां नहीं था। अद्वैत के पूछे सवाल और उसके जवाब ने जैसे दिल के भीतर किसी पुराने दरवाज़े की चिटकनी फिर से खोल दी हो।
“हाँ… नहीं… मेरा मतलब… अपने छोटे भाई से मिलने का तो मन बहुत है,” उसने नज़रें बचाकर कहा, “लेकिन मेरी वजह से अगर वहाँ कोई सीन create हो गया तो यश का birthday spoil हो जाएगा।”
उसकी आवाज़ धीमी थी, पर साफ़। उसमें डर नहीं था, बस एक गहरी जिम्मेदारी थी….. जैसे वो अब सिर्फ अपनी नहीं, अपने अतीत की भी रखवाली कर रही हो।
अद्वैत ने उसकी आँखों में देख कर सिर्फ ‘ठीक है’ कहा, फिर थोड़ा मुस्कुराते हुए बोला, “तुम ब्रेकफास्ट कर लो, मैं तुम्हें स्टूडियो छोड़ देता हूँ।”
रूहानी ने तुरंत मना किया, “नहीं अद्वैत, मैं cab…..”
लेकिन अद्वैत ने बीच में ही टोकते हुए कहा, “तुम जब तक car चलाना सीख नहीं लेती, तब तक अगर मैं घर पर रहूँ, तो तुम्हें studio पहुँचाता रहूँगा। और तुम अपनी schedule देख लेना… ताकि मैं तुम्हें जल्दी से car drive करना सिखा दूँ।”
इतना कहकर वो पलटा और सीढ़ियाँ चढ़ते हुए ऊपर अपने कमरे की ओर चला गया।
रूहानी कुछ पल तक वहीं बैठी रह गई। इस सोच में की अभी तक किसी ने उसकी इस ज़िन्दगी में self-independent होने के लिए नहीं कहा, जो किया उसने अपनी ज़िद पर।
“कितनी अजीब बात है…” उसने बुदबुदाते हुए खुद से कहा, “…जो इंसान कभी मेरे लिए एक राह जैसा लगा करता था, आज वही एक अस्थायी पड़ाव बन गया है। एक साल बाद… हम फिर से अजनबी हो जाएंगे और मैं नहीं चाहती कि इस एक साल की मुलाक़ात में कोई ऐसा एहसास बन जाए जो फिर से मुझे खुद को खो देना पड़े।”
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शाम होते ही रूहानी ने जैसे ही स्टूडियो का दरवाज़ा बंद किया, बाहर खड़ी गाड़ी की तरफ़ नज़र गई और उसके क़दम ठिठक गए।
अद्वैत ड्राइवर सीट के बजाय कार के दरवाज़े से टिक कर खड़ा था, गहरे नीले कोट और हल्की चमकती शर्ट में, बाल थोड़े बिखरे हुए लेकिन चेहरे पर वही पुराना सधा हुआ सुकून।
कार की पिछली सीट पर खूबसूरत बुके और कई रंग-बिरंगे गिफ्ट्स रखे थे, जैसे किसी फिल्म का सेट रियलिटी में उतर आया हो।
रूहानी के माथे पर हल्की सी सलवट पड़ी और उसने पूछा, “ये सब क्या है अद्वैत?”
अद्वैत ने अपने दोनों हाथों को साइन के पास बांधते हुए गाड़ी के दरवाज़े पर पीठ टिकाई और नाटकीय अंदाज़ में बोला, “मुझे मेरी प्यारी बीवी के और भी प्यारे भाई ने स्पेशली अपने बर्थडे पार्टी में invite किया है, तो मैंने सोचा क्यों न आपसे भी पूछ लूं… क्या आप मेरे साथ चलेंगी, मैडम?”
रूहानी की आँखें बड़ी हो गईं, फिर आँखों में हल्की मुस्कान थी, लेकिन भीतर कहीं कुछ काँप रहा था। अद्वैत के शब्दों ने उसे कुछ ऐसा महसूस कराया जो उसने बहुत वक़्त से नहीं किया था, जैसे कोई सच में उसकी परवाह करता है, बिना किसी शर्त के, बिना किसी स्वार्थ के।
वो बोली, “अगर मैं न आना चाहूं तो…?”
अद्वैत ने पहले एक पल रुककर उसकी आँखों में झाँका, फिर बिना जल्दबाज़ी के कुछ कदम उसकी ओर बढ़ाया अपने दोनों हाथों को पीछे की तरफ बांधे हुए।
“आपकी इच्छा मेरे लिए हुक्म के बराबर है, मिसेज रूहानी चौहान,” अद्वैत ने मुस्कुराते हुए कहा, “ये बंदा आपको अभी घर छोड़ सकता है… लेकिन वो क्या है ना, वहाँ कोई आपकी राह तक रहा होगा….. दस साल छोटा, प्यारा, इकलौता भाई। जिसने आज पहली बार अपनी दीदी को invite किया है, और वो भी इस अद्वैत के ज़रिए…”
रूहानी की आँखों में कुछ चमकने लगा था। अद्वैत का ये अंदाज़…. थोड़ा चुलबुला, थोड़ा नरम, और पूरी तरह दिल से….. उसके लिए एकदम नया था।
वो हल्के से मुस्कुरा कर बोली, “ठीक है, ठीक है… इतनी ड्रामा की ज़रूरत नहीं है, मैं भी चल रही हूँ।”
लेकिन जैसे ही उसने अपने पहनावे पर नज़र डाली…. टी-शर्ट और जींस….. उसकी मुस्कान हल्की सी सिकुड़ गई। “माँ-पापा अगर मुझे इन कपड़ों में देखेंगे तो मार ही डालेंगे।”
अद्वैत ने फौरन जवाब दिया, “क्यों घबरा रही हो, रूहानी? वहाँ तुम मिसेज रूहानी चौहान बनकर जा रही हो और मिस्टर अद्वैत अवस्थी की पत्नी को जो अच्छा लगे वो पहने, उसे किसी के भी छोटी सोच के बारे में नहीं सोचना चाहिए।”
रूहानी की साँस जैसे थोड़ी रुक गई। उसकी नज़र अद्वैत के चेहरे पर टिक गई…. उस आवाज़ पर जिसमें न कोई बनावट थी, न कोई झूठ। “लेकिन…” उसने धीमे से कहा, “मेरे कपड़े पार्टी लुक के नहीं हैं।”
अद्वैत ने उसकी बात बीच में काटते हुए कार का दरवाज़ा खोला, “तो चलो, अभी भी देर नहीं हुई है, खरीद लेते हैं।”
रूहानी ने हल्का सा विरोध किया, “फिजूलखर्ची क्यों करनी? घर चलो, मैं अपने कपड़ों में से कुछ पहन लूंगी।”
लेकिन अद्वैत ने उसकी बात सुनकर सिर हल्के से हिलाया और एक सादगी भरी गंभीरता से बोला, “तुम्हारे भाई का बर्थडे है, रूहानी… प्लीज़, चलो शॉप पर। सिर्फ तुम्हारे लिए नहीं, उसके लिए भी जो शायद आज तुम्हें देखकर बेइंतहा ख़ुशी महसूस करेगा।”
वो एक पल के लिए चुप रही, फिर कुछ सोचते हुए धीरे से कार में बैठ गई। उसकी आँखों में पहली बार कोई बहस नहीं थी…. सिर्फ एक गहरा सन्नाटा और उस सन्नाटे में अद्वैत की बातों की गूंज।
कभी-कभी कोई अजनबी एक दिन में वो भरोसा दे जाता है, जो अपनों ने सालों में नहीं दिया होता…..
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शाम की परछाइयाँ धीरे-धीरे ज़मीन पर उतर रही थीं। आसमान पर फीकी नारंगी रेखाएँ नीले रंग में घुलने लगी थीं और बाज़ार की दुकानों में बत्तियाँ एक-एक कर जल उठी थीं। हल्की हवा में गुलमोहर के पत्ते सरसराते हुए जैसे किसी भूले-बिसरे गीत की धुन छेड़ रहे थे।
रेडीमेड शॉप के बाहर खड़ी अद्वैत की गाड़ी में ड्राइविंग सीट पर बैठे अद्वैत के बगल वाली सीट पर रूहानी बैठी थी, जिसने एक नरम lavender shade का अनारकली सूट खरीद कर पहना था, जिसके look में उसे कोई पुराना अहसास मिल गया था।
“तुम्हें यही पसंद आया?” अद्वैत ने पूछा, तो रूहानी ने ड्रेस पर नज़र गड़ाते हुए सिर हिलाया।
“हाँ… यही ठीक लगेगा आज के लिए,” उसकी आवाज़ में भावनाओं की तहें थीं…. कुछ गहरी, कुछ छुपी हुई।
अद्वैत ने बिना कुछ कहे गाड़ी स्टार्ट की। एक पल को दोनों खामोश रहे, जैसे किसी और की याद के लिए एक छोटा-सा मौन रख रहे हों।
जैसे ही गाड़ी ने बाज़ार की रौशनी को पीछे छोड़ा और सड़क अब रूहानी के पापा के घर की ओर मुड़ चुकी थी, हवा थोड़ी ठंडी और एहसास थोड़ा भारी हो गया।
रूहानी के मम्मी-पापा के घर की चौखट पर जब गाड़ी का इंजन बंद हुआ। सन्नाटा उतर आया, पर दिल की धड़कनें तेज़ थीं।
अद्वैत ने धीरे से कहा, “चलो…?”
रूहानी ने सिर झुकाकर कपड़े की तहें ठीक कीं, दुपट्टे पर उँगलियाँ फिराईं।
यश की कही बात उसका मन दोहराया जा रहा था,“तुम ethnic पहनती हो तो लगती नहीं जैसे इस दौर की हो…”
उन्होंने दरवाज़ा खोला। बाहर की हवा में रात की सीलन और किसी भूले अल्फाज़ की गंध थी।
दरवाज़े तक पहुँचते हुए रूहानी का हाथ काँपा, उसके wristwatch की सूई अब भी 6:57 पर रुकी थी…. वही वक़्त जब सब थम गया था।
अद्वैत ने दरवाज़े की घंटी की तरफ हाथ बढ़ाया।
उसने रूहानी की तरफ देखा, उसकी आँखों में एक सवाल था… “क्या तुम तैयार हो?”
रूहानी की धड़कनों की गति बढ़ चुकी थीं। उसने बिना कुछ कहे सिर हिला दिया।
और फिर… अद्वैत ने घंटी दबाई।
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“क्या वक़्त सच में थम गया है… या आज की रात वो सूई फिर से चलने वाली है?”
“रूहानी तैयार तो है… लेकिन किसके लिए? अपने भाई से मिलने के लिए, या उन सवालों का सामना करने के लिए जो अब तक अनकहे थे?”
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अधूरी इबादत भाग~51
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भाग~51 पहली बार भूली?
पिछली रात…
रूहानी बिस्तर पर लेटी थी, पर नींद उसकी पलकों से कोसों दूर थी। तकिये पर सिर रखते ही आँखें बंद तो हो जातीं, पर भीतर चलती अशांत तस्वीरें उन्हें फिर से खोल देती थीं।
दिन भर का हर एक लम्हा जैसे उलझ कर उसकी साँसों में अटक गया था….. अपने नए स्टूडियो की चमकती शुरुआत, फिर अचानक एकांश राठौड़ और काम्या रैना की मौजूदगी, उन दोनों के शब्दों की वह छुपी हुई नश्तर-सी चुभन, और फिर लौटते वक़्त वो सड़क पर हुआ हल्का-सा एक्सिडेंट… सब कुछ जैसे किसी भारी चादर की तरह उस पर लिपट गया था।
पलंग पर लेटी रूहानी करवट पर करवट बदल रही थी, जैसे उसका जिस्म बिस्तर पर था, पर रूह उसके ही अंदर किसी और समय में लौट गया हो। चादर के नीचे उसकी उंगलियां एक-दूसरे में उलझी हुई थीं, और उसके सीने में बेचैनी किसी अनसुने संगीत की तरह बज रही थी। बाहर रात चुप थी, पर उसके भीतर हज़ार आवाज़ें चल रही थीं।
उसने आँखें बंद कीं, लेकिन उस अंधेरे में एक दृश्य चमकने लगा…. वही शाम, जब पहली बार एकांश ने उसे इस तरह छुआ था कि उसकी साँसें थम गई थीं।
flashback
India Fashion Week के सेमी-फाइनल की रात थी। होटल के उस रूम में बस सिलाई मशीन की टकटक और रूहानी की सांसों की आवाज़ थी।
उसके हाथ लगातार काम में लगे थे….. कभी कपड़ों की तह जांचती, तो कभी स्केच पैड पर कुछ जोड़ती घटाती। आँखों में नींद नहीं थी, बस जूनून था।
उसके चेहरे पर पसीने की हल्की परत थी, पर आंखों में कोई थकान नहीं…. सिर्फ़ जीत की ललक।
उसी कमरे के एक कोने में, एकांश बिस्तर पर लेटा हुआ था। उसका कैमरा हाथ में था, जिसमें वो बार-बार वो तस्वीर देख रहा था जो उसने चुपके से खींची थी…. रूहानी की। उसकी आंखें उस फोटो में कुछ ढूंढ रही थीं… शायद वो मासूमियत जो उसे रूहानी में सबसे पहले दिखी थी।
कुछ पल बाद, वो उठकर उसके पास आया। कैमरा टेबल पर रखा और बिना कुछ कहे, धीरे से उसका हाथ थामा। रूहानी चौंकी, उसके हाथ रुक गए। उसने सिर उठाकर देखा और एक प्रश्न भरी नज़र उसकी आंखों में तैर गई।
“थोड़ा आराम कर लो, रूहानी,” एकांश ने धीमे से कहा और उसके हाथों को पकड़कर बिस्तर तक ले आया। उसके पास बैठकर उसके गाल को अपनी हथेली से सहलाया।
“अब भी काफ़ी समय है,” उसकी आवाज़ में एक अजीब नरमी थी, जो रूहानी को और बेचैन कर गई।
“नहीं, एकांश,” रूहानी ने घबराई सी आवाज़ में कहा, “ज़्यादा समय नहीं है। मुझे किसी भी हालत में ये प्रतियोगिता जीतनी है। ये मेरा सपना है… मेरा सब कुछ।”
“रूहानी… listen… listen… मुझे तुम पर पूरा भरोसा है। तुम जरूर जीतोगी। लेकिन कभी-कभी बस एक पल को जी लेना भी ज़रूरी होता है। कम से कम, इस मोड़ तक पहुँचने का एहसास तो करो।”
वो कुछ कह नहीं पाई, बस मासूमियत से बोली, “क्या कहना चाह रहे हो, एकांश?”
एकांश ने उसके दोनों गालों को अपनी हथेलियों में भर लिया। उसकी आंखें बहुत पास थीं अब।
“हमें मिले कितना वक़्त हो गया, रूहानी?”
रूहानी ने धीमे से कहा, “मुझे ठीक से याद नहीं… शायद बारह या पंद्रह महीने।”
“Do you have any feeling for me?” एकांश की आवाज़ हल्की, पर सीधी थी।
रूहानी ने बिना कुछ कहे, धीरे से हां में सिर हिला दिया और अपनी नज़रें झुका लीं। वो उसकी ज़िंदगी का पहला ऐसा इंसान था, जिसके लिए उसने इतना गहरा महसूस किया था…. दिल से, आत्मा से।
अगले ही पल, एकांश ने उसके चेहरे को अपने और नज़दीक खींच लिया, और उसके होंठों को चूमना शुरू कर दिया।
रूहानी का शरीर अकड़ गया। उसने चादर के दोनों किनारों को कसकर पकड़ लिया। उसकी पलकों में हलचल थी, सांसें उलझी हुई, और मन भीतर से कांप उठा।
ये सब उसके लिए बहुत नया था… बहुत अजीब। वो न तो जवाब दे पा रही थी, न खुद को पूरी तरह उस पल में छोड़ पा रही थी।
पर एकांश को शायद इसका एहसास नहीं था। वो बस उसी लम्हे में डूबा रहा…. बिना यह देखे कि रूहानी के होंठ सिर्फ़ चुप थे, जवाब नहीं दे रहे थे।
वो इस खामोश असहजता को प्रेम का पल समझता रहा… और रूहानी, उस चुप्पी में खुद से कुछ खोती रही।
कुछ देर रूहानी के होंठो को चूसने के बाद एकांश उसके गर्दन पर चला गया और अपने हाथों से रूहानी के टॉप को उसके कमर के पास से उठने लगा।
तभी रूहानी जैसे किसी नींद से जागी, उसने तुरंत एकांश के हाथ को अपनी कमर पर से झटके से हटाया और उठ खड़ी हुई।
तभी एकांश ने उसे बिस्तर पर पटक दिया, उसके ऊपर आकर बोला, “everything is fine ruhani”
रूहानी की आंखे भरने लगी, वो एक ही बात दोहराए जा रही थी, “नहीं एकांश, ये सही नहीं है, मैं हमारी शादी के बाद सब कुछ करूंगी लेकिन अभी नहीं……”
एकांश बोला, “रूहानी! I’m aroused now, what should I do, please”
और इतना बोलकर एकांश रूहानी के कॉलरबोन को चुमना शुरू कर दिया।
रुहानी घबराने लगी थी, उसने अपना पूरा जोर लगाकर एकांश को खुद के ऊपर से हटा दिया और एक जोरदार तमाचा एकांश के गाल पर जड़ दिया।
एकांश की आंखे गुस्से से लाल हो गई थी, वो जैसी ही रूहानी की तरफ बढ़ा, रूहानी बिना एक पल की देरी किए बाथरूम में घुस गई और दरवाज़ा बंद कर दिया।
एकांश कुछ देर गेट खटखटया, लेकिन रूहानी नहीं निकली। वो पूरी रात उसके वॉशरूम में रोते-रोते सो गई थी।
Flashback end
और फिर… पता नहीं कब, रूहानी करवट बदलते-बदलते उठी। आँखें अधखुली थीं, मगर बदन नींद में डूबा हुआ।
वो बिस्तर से उतरी। नंगे पाँव, बिना किसी शोर के, जैसे कोई परछाई चल रही हो। हल्की रोशनी में उसका चेहरा थका हुआ नहीं, खोया हुआ लग रहा था। वो धीरे-धीरे बाहर निकली… और वहीं, किचन के पास, किसी को खड़ा देखा।
उसकी आँखों ने पहचान नहीं की…. उसका दिल ही था जिसने कहा, “यश…..”
वो चली गई उस साये की ओर और गले लग गई। जैसे किसी भुला दिए गए रिश्ते की गर्माहट तलाश रही हो। जैसे कोई बच्ची अपने पुराने तकिये को ढूँढ रही हो, जिसमें उसकी माँ की महक थी।
उसने कसकर पकड़ लिया… और फिर वहीँ, बिना कुछ कहे, कुछ और सोचे, उसकी आँखें बंद हो गईं।
कुछ देर ऐसे ही गुज़रा… फिर जैसे किसी डोर ने उसे वापस खींचा हो, रूहानी ने धीरे से अपनी पकड़ ढीली की, और उसी गति से वापस मुड़ गई। बिना किसी सवाल, बिना किसी आवाज़, जैसे कुछ हुआ ही नहीं और वो चली गई।
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आज सुबह…
जब अद्वैत ने इधर उधर देखते हुए कहा, “हाँ….. वो आज मेरी माँ की बरसी है न…..” तो रूहानी का गला भर आया था।
उसने जल्दी से “मैं फ्रेश हो कर आती हूँ” कहकर अद्वैत के चेहरे पर ही दरवाजा बंद कर लिया था।
उसने तुरंत बेड साइड टेबल पर से अपना मोबाइल उठाया और बिना देरी किए इंस्टाग्राम खोला और पिछले दिन की opening ceremony की कुछ तस्वीरें अपलोड कर दीं……
studio की चमकदार तस्वीरें, cake-cutting की खुशी, gungun के साथ candid moments
और लिखा:
“Chapter 3 – From Ruins to Radiance ✨ #StitchAndSoul #GrandOpening”
जैसे ही उसने पोस्ट किया, स्क्रीन पर एक reminder pop‑up आया:
“मेरे प्यारे भाई यश का जन्मदिन”
उसके होंठों के बीच फुसफुसाहट थी, “मुझे याद क्यों नहीं रहा?”
उसकी आँखों में guilt का कांटा घुसा, और दिल एक अजीब तरह की बेचैनी से भर गया।
वह खुद से बोली, “पहली बार… मैं कैसे… ये भूल गई?”
वह इस सोच में डूब गई की अब वह अपने छोटे भाई से क्या बोलेगी?
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क्या एकांश उस खामोशी को अब भी इश्क़ मानता है… या उसने जानबूझकर अनदेखा किया था रूहानी की कांपती रूह को?
क्या यश सच में वहीं था… या ये सिर्फ़ रूहानी की थकी हुई तन्हाई का एक वहम था?
क्या वाकई गलती से भूली थी रूहानी उसका जन्मदिन… या वो कुछ ऐसा भूल जाना चाहती थी, जिसे याद करना अब सिर्फ दर्द देता है?
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अधूरी इबादत भाग~50
पढ़ने का समय : 7 मिनट
भाग~50 उसने शर्ट क्यों भीगने दी?
सड़क पर अचानक तेज़ रोशनी चमकी और एक तीखी हॉर्न की आवाज़ ने रात के सीने को चीरते हुए सब कुछ झकझोर दिया।
रुहानी ने एक झटके में आँखें बंद कर लीं और दोनों हाथों से डैशबोर्ड को पकड़ लिया। अद्वैत की उंगलियाँ स्टीयरिंग पर कस गईं, जैसे वक़्त को वहीं थाम लेना चाहता हो।
सामने से आती गाड़ी, नशे में चूर किसी ड्राइवर के हाथों से लगभग बेकाबू थी। वो बेतहाशा झूलती हुई सीधे उनकी ओर बढ़ रही थी जैसे किस्मत ने अचानक अपनी चाल बदल ली हो।
रुहानी की सांस जैसे गले में अटक गई, और अद्वैत के चेहरे पर आया पसीना रात की ठंडी हवा में भी सर्द नहीं हो रहा था।
लेकिन… ठीक उस अंतिम सेकंड में, जब दो ज़िंदगियाँ किसी अनजाने मोड़ पर थमने को थीं…. अद्वैत ने ब्रेक पर ज़ोर से पैर मारा और गाड़ी को एक मोड़ पर दाईं ओर घुमा दिया।
टायरों की चीख़ती आवाज़ सड़क की रगों में उतर गई और उस दूसरी कार की हेडलाइट्स उनकी विंडशील्ड पर एक पल के लिए ठहरकर पीछे निकल गईं… बिना टकराए, बिना छुए… सिर्फ़ एक डर बनकर।
अंदर, कुछ सेकंड के लिए समय रुक सा गया।
रुहानी की साँस अब भी अधूरी थी, आँखें फटी की फटी। अद्वैत की उंगलियाँ अब भी स्टीयरिंग पर जमी थीं, पर पकड़ अब धीरे-धीरे ढीली पड़ रही थी।
“रुहानी…” उसकी आवाज़ काँप रही थी, पर थमी नहीं, “तुम ठीक हो?”
रुहानी ने बिना कुछ कहे धीरे-धीरे सिर हिलाया, फिर कांपते होंठों से फुसफुसाई, “बस… एक पल लगा था कि सब खत्म हो जाएगा…”
अद्वैत ने गाड़ी को एक किनारे रोक दिया, इंजन बंद कर दिया… लेकिन उनके बीच जो चुप्पी थी, वो अब डर से नहीं, राहत से भरी थी। दो धड़कनों ने एक ही समय पर महसूस किया कि ज़िंदगी अभी बाकी है।
अद्वैत ने देखा, रूहानी का हाथ अब भी हल्का कांप रहा था।
“सब ठीक हैं, रूहानी” अद्वैत ने धीमे से कहा।
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रात के ढाई बज चुके थे। घर की हर दीवार जैसे नींद में डूबी हुई थी। सिर्फ़ किचन में लगी हल्की पीली रौशनी जग रही थी… उतनी ही चुप, जितना अद्वैत का मन।
वो काउंटर के पास खड़ा अपनी पानी की बोतल भर रहा था, जैसे उस सन्नाटे को किसी छोटे से काम से तोड़ने की कोशिश कर रहा हो।
उसने जैसे ही फ्रिज का दरवाज़ा बंद किया, पीछे से आती किसी धीमी, नंगे पाँव की आहट ने उसे रुकने पर मजबूर कर दिया।
उसने मुड़कर देखा…. रूहानी।
वो थोड़ी झुकी हुई थी, जैसे नींद में चल रही हो, या किसी भारी याद के बोझ से दब गई हो। उसकी आँखें अधखुली थीं, पाँव धीरे-धीरे फर्श पर सरकते हुए बढ़ रहे थे। कोई सजगता नहीं, कोई हड़बड़ाहट नहीं…. बस एक थकी हुई सी मौजूदगी।
“रूहानी?” अद्वैत ने धीरे से पूछा, “क्या हुआ?”
कोई जवाब नहीं।
और फिर अचानक… जैसे किसी टूटे हुए पल ने खुद को समेट लिया हो…. रूहानी उसके सीने से आकर लग गई। उसके हाथ अद्वैत की नाइट शर्ट को कस के पकड़ चुके थे, जैसे वो उसे छोड़ देगी तो गिर जाएगी, टूट जाएगी, फिर कभी उठ नहीं पाएगी।
अद्वैत एकदम जड़ हो गया। उसकी धड़कनों ने रफ्तार पकड़ ली और नसें जैसे सख्त हो गईं हों। उसने खुद को पीछे हटाने की कोशिश की…. हड़बड़ाहट नहीं थी, बस उलझन थी…. पर रूहानी की पकड़ और भी मज़बूत हो गई।
वो काँप रही थी, उसकी साँसों में बिखरी कोई पुरानी बेचैनी थी और आँखों से आंसू लगातार उसके सीने में भीग रहे थे।
“रूहानी… क्या हुआ?” अद्वैत ने फिर कोशिश की, आवाज़ इस बार ज़रा कम सख्त थी।
लेकिन लब अब भी ख़ामोश थे। जैसे कोई आवाज़ थी, जो भीतर से उठ तो रही थी, पर रास्ता नहीं मिल रहा था।
अद्वैत के भीतर जैसे कुछ खामोश सा चटक गया। उसने कभी कल्पना भी नहीं की थी कि वो लड़की, जिससे उसने सिर्फ़ साथ रहने का समझौता किया था, बिना पास आए….. किसी दिन ऐसे, ख़ुद-ब-ख़ुद, उसकी नज़दीकियों में उतर जाएगी।
ये नज़दीकियाँ जिस्म की नहीं थीं… ये उस ख़ामोशी की थीं, जहाँ कोई कुछ कहे बिना सब कह जाता है। रूहानी उस पल उसकी बाहों में नहीं थी…. वो उसके अंतर्मन की चौखट पर बैठी थी, बिना इजाज़त मांगे।
और फिर भी, वो उसे छूने से डर रहा था…. जैसे उसके दुःख को छू लेने से कहीं वो भी चुपचाप उसमें डूब न जाए।
कुछ पलों बाद, रूहानी की उंगलियों ने उसकी शर्ट को धीरे-धीरे छोड़ा और वो उसी नंगे पाँव, उसी धीमी चाल से अपने कमरे की तरफ़ लौट गई। बिना कुछ कहे। जैसे आई थी, वैसे ही।
अद्वैत वहीं खड़ा रहा, अपनी भीगी हुई शर्ट को देखते हुए, जैसे उसमें कोई उत्तर दर्ज हो जिसे वो पढ़ नहीं पा रहा।
उसके ज़हन में सिर्फ़ एक सवाल अटका था….. “उसके कदमों की खामोशी ज़्यादा कह गई…. क्या वो मेरी बाँहों में सुकून ढूंढने आई थी, या अपने ही डर से छुपने?”
और उस सवाल के जवाब में बस सन्नाटा था… लंबा, अनकहा, गहरा।
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कमरे की बत्तियाँ बुझी थीं, सवेरा हो चुका था।
रुहानी बिस्तर पर थी, करवट लेकर सो रही थी, पर उसे लगा जैसे वह सपने में जी रही थी।
अचानक… एक जानी-पहचानी खुशबू ने उसे अपने आगोश में भर लिया।
गर्म चॉकलेट की महक… पिघली हुई मिठास… हल्की-सी vanilla की परत।
उसकी आँखे बंद थी लेकिन उसे लगा कि वो अपने पुराने घर के किचन में खड़ी थी।
वही टाइल्स, वही खिड़की से आती हल्की धूप और सामने उसकी माँ, apron पहने, बाल बांधे, और ओवन खोलते हुए।
माँ का चेहरा धुंधला था, पर आवाज़ साफ़ थी, “लड़कियाँ रोज़-रोज़ मीठा खाएँगी तो मोटी हो जाएगी। चेहरे पर पिम्पल और एक्ने हो जायेंगे…. वो अलग। तुम लड़की हो और लड़कियों को control में रहना चाहिए।”
एक अजीब-सी टीस ने रुहानी की दिल में गहराई तक जगह बना ली।
“मम्मा, बस एक बार taste करना है…”
“नहीं रूहानी! तुम नहीं खाओगी। ये यश के लिए है। आज उसका जन्मदिन है।”
“मेरे जन्मदिन पर तो आप कुछ खास नहीं बनाती हो” रूहानी ने अपनी माँ से शिकायती लहजे में कहा।
“क्योंकि बेटी पराई अमानत होती है और हमारे यहाँ बेटियों का जन्मदिन नहीं बनाया जाता”
माँ की बात से रूहानी की आँखे छलछला गयी थी।
तभी अचानक वो महक और तेज़ हो गई। रुहानी हड़बड़ा कर उठी।
उसकी सांस तेज़ थी, माथे पर पसीना… उसने हाथ से बिस्तर के पास की दीवार को छुआ जैसे यकीन करना चाहती हो — क्या वो अभी भी वहीं है?
कमरे के बाहर से अब भी वही महक आ रही थी…. chocolate lava cake की। इतनी सजीव, इतनी सच्ची… कि अब ये सपना नहीं लग रहा था।
वो दरवाज़े तक पहुँची, दबे पाँव, धीरे-धीरे, जैसे अतीत की दहलीज़ पर कदम रख रही हो। दरवाज़ा हल्का खोलकर उसने hallway की ओर देखा और वहीं से उसकी नज़र किचन में गई, जहाँ मीना cake ओवन से निकाल रही थी।
वो कुछ कहने ही वाली थी कि पीछे से किसी ने हल्के से पुकारा, “रूहानी?”
उसने पलटकर देखा… अद्वैत दरवाज़े की चौखट पर था, उसके चेहरे पर कुछ अनकहा सा था।
“तुम ठीक हो?”
रूहानी कुछ पल चुप रही, फिर उसके होंठ हिले, “हाँ, मुझे क्या हुआ है?”
अद्वैत ने अपने गर्दन पर हाथ फेरते हुए कहा, “वो कल रात…. तुम…. वो….”
रूहानी तुरंत से बोली, “मैं क्या……?”
अद्वैत तुरंत बात बदल कर बोला, “कुछ नहीं……. फ्रेश होकर आ जाओ। मैंने मीना से स्पेशल चॉकलेट लावा केक बनवाया है।”
रूहानी पूछ पड़ी, “कोई खास वजह?”
अद्वैत ने इधर उधर देखते हुए कहा, “हाँ….. वो आज मेरी माँ की बरसी है न…..”
एक पल को सब कुछ रुक गया। रूहानी की आँखें एकाएक नम हो गईं।
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क्या ये सिर्फ़ एक तारीख थी, या उस दिन कुछ ऐसा था जो अब तक दफ़न था? क्या ये महज़ संयोग था कि उस रात भी चॉकलेट लावा केक बना था?
जब रात में वो उसके सीने से लिपट गई थी….. क्या वो सिर्फ़ डर था? या कोई पुरानी याद उसकी आत्मा से लिपटी हुई थी… जिसे अद्वैत छू भी नहीं पाया?
क्या सच में रूहानी सब भूल पाई थी जो रात के सन्नाटे में उसके भीतर उतर चुका था?
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अधूरी इबादत भाग~49
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भाग~49 पहला गिफ्ट
कमरे की हवा थमी हुई थी, दीवारें जैसे साँस रोक कर देख रही थीं कि अब आगे क्या होगा।
रूहानी की पीठ दरवाज़े से लगी थी, और उसकी उंगलियाँ हल्के-हल्के कांप रही थीं। दिल की धड़कनें इतनी तेज़ थीं कि लगता था जैसे कोई दरवाज़े के इस पार खड़ा सुन लेगा।
एकांश ने जब अपने दोनों हाथ उसके कंधों पर रखे, तो वो छुअन किसी भूले हुए मौसम की तरह आई….. जानी-पहचानी, लेकिन अब अजनबी।
“रूहानी…” एकांश की आवाज़ में तल्ख़ी थी, “at least मेरी आंखों में तो देखकर बात करो। शायद तब तुम्हारे झूठ को भी मैं सच मान लूं।”
रूहानी की सांस अटक गई। उसकी आँखों में नमी थी, लेकिन वो नमी किसी प्यार की नहीं, ठुकराए हुए भरोसे की थी। उसने धीरे से, बहुत एहतियात से, एकांश के हाथ अपने कंधों से हटा दिए।
और तभी…
दरवाज़ा एक झटके में खुला — जैसे किसी ने कमरे की हदों पर शक कर लिया हो।
काम्या…. उसकी नज़रों में संदेह नहीं, फैसला था। उसने पहले कमरे को स्कैन किया, फिर एकांश पर एक पल को ठहरकर, अपनी नज़रों की तलवारें रूहानी पर गाड़ दीं।
“ओह… तो बंद कमरे में पुरानी इश्क लड़ाई जा रही है,” काम्या की मुस्कान तेज़ और ज़हर से भी तेज़ थी। “लगता है, अपनी डिज़ाइनिंग से ज़्यादा तुम्हारा ध्यान कुछ और ‘कनेक्शन’ बनाने पर रहता है। है ना?”
कमरा जैसे एकाएक सन्नाटे में डूब गया। रूहानी की साँस एक लहर की तरह रुकी, और फिर एक गहरी गर्मी उसके भीतर उठने लगी…. वो गुस्सा जो खुद को लंबे समय से दबा रहा था।
उसने सीधा खड़ा होकर काम्या की आँखों में आँखें डालीं। “काम्या, कम से कम मैं वो इंसान नहीं जो दूसरों के रिश्तों पर कीचड़ उछालकर अपनी खुद की खाली ज़िंदगी भरने की कोशिश करे।”
उसकी आवाज़ अब कांप नहीं रही थी। “और हाँ, ‘कनेक्शन’ बनाने की बात रही… तो मैं सिर्फ अपने काम से कनेक्शन बनाती हूं, तुम्हारी तरह लोगों की पीठ पीछे छुरा घोंपकर नहीं।”
एक पल को काम्या कुछ कह नहीं पाई…. जैसे शब्द उसकी जुबान तक आए ही नहीं।
“और अगर तुम्हें लगता है कि एक बंद कमरा और एक पुरानी जान-पहचान ‘इश्क लड़ाई’ है, तो ये तुम्हारी छोटी सोच है, मेरी नहीं।”
इतना कहकर रूहानी पलटी नहीं। वो सीधी दरवाज़े से बाहर चली गई, जैसे किसी courtroom से बाइज्ज़त बरी होकर निकली हो…. सिर ऊँचा, आत्मा शांत, और भीतर एक नई आग जलती हुई।
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जैसे ही रुहानी उस कमरे से बाहर आई, उसकी चाल में बेचैनी थी और आँखों में कुछ कह जाने की बेआवाज़ कोशिश। पलकें भारी, पर चेहरे पर एक नकली सामान्यता का मुखौटा।
ठीक उसी वक़्त अद्वैत भी अपनी कार पार्क कर चुका था और स्टूडियो की ओर बढ़ा चला आ रहा था।
रूहानी उसकी तरफ़ बढ़ी, हल्की सांसों में एक स्थिरता लाने की कोशिश करते हुए और बिना किसी भूमिका के बोली, “अब हम भी घर चले? पार्टी वैसे भी लगभग खत्म हो चुकी है।”
अद्वैत ने उसकी आँखों में कुछ पल देखा, जैसे किसी उलझे हुए स्केच को समझने की कोशिश कर रहा हो। फिर शांत स्वर में बोला, “पहले स्टूडियो बंद करके चाबी ले लो, फिर चलते हैं।”
रूहानी कुछ कहने ही वाली थी कि पीछे से एक स्वर उभरा, हँसी और आवाज़ का एक अजीब मेल और एकांश व काम्या स्टूडियो main gate के ओर आते दिखाई दिए।
एकांश ने आते ही अद्वैत के कंधों को पकड़ कर हल्के से गले लगाया। यह एक सामान्य सा इशारा था, मगर उसके ठीक बाद रूहानी का एक क़दम पीछे हट जाना….. नज़रें नीची कर लेना…. अद्वैत की नज़रों से छुपा नहीं था।
उस एक पल में जैसे कुछ अजीब सा फिसल गया हो उसके मन में। पर उसने उस क्षण को वहीं दफ़न कर दिया, कुछ न कहकर।
काम्या को शायद उस ख़ामोशी से चिढ़ हो गई। वो एकांश का हाथ कस कर पकड़ते हुए तिरछी मुस्कान में बोली, “अब मैं अपने पति के साथ अपनी रात enjoy करने जा रही हूँ। Wish you both… अद्वैत और रूहानी…. तुम भी अपनी रात enjoy करो।”
ताने की धार इतनी पैनी थी कि कमरे की हवा कुछ सेकंड को जैसे कट सी गई।
अद्वैत का चेहरा सख़्त हो गया। वो कुछ कहने ही वाला था कि रूहानी ने उसका हाथ पकड़ कर सिर ना में हिलाया…. जैसे कह रही हो, अभी नहीं।
पर अद्वैत ने उसका हाथ थामकर हल्के से थपथपाया…. एक सधी हुई, शांत ताक़त से भरा इशारा। फिर काम्या की ओर देखकर बोला, “Kamya, it’s my bedroom matters… and I don’t like to shamelessly public it.”
एकांश ने धीमे स्वर में कहा, “भाई! काम्या की तरफ से मैं माफ़ी मांगता हूँ, you’re right.”
अद्वैत ने रूहानी की ओर देखा, “सब चले ही गए हैं, स्टाफ्स को पेमेंट कर दो, फिर हम भी निकलते हैं।”
थोड़ी देर बाद काम्या और एकांश निकल गए।
स्टूडियो का सन्नाटा अब एक भारी सी चुप्पी बनकर रह गया था। रूहानी ने काम निपटाया और फिर अद्वैत की कार की ओर चली।
जब वह बैठी, उसकी उंगलियाँ अब भी सिहर रही थीं। पूरा दिन, वो कमरा, वो सारे पुराने लम्हे… सब उसके मन में घूम रहे थे।
जैसे ही अद्वैत ने ड्राइविंग सीट पर आकर दरवाज़ा बंद किया, एक तेज़ आवाज़ के साथ, रूहानी हल्की सी कांप गई।
अद्वैत ने तुरंत उसकी ओर देखा, “Are you okay, Ruhani?”
रूहानी ने अपनी दोनों बाहों को अपनी हथेलियों से रगड़ा और जबरदस्ती मुस्कराते हुए बोली, “हाँ, ठीक हूँ… बस थक गई हूँ।”
कुछ पल की ख़ामोशी के बाद, अद्वैत ने जेब से एक छोटा सा बॉक्स निकाला और उसकी ओर बढ़ाया।
रूहानी ने आश्चर्य से पूछा, “मेरे लिए?”
अद्वैत ने सीधे शब्दों में बोला, “हाँ… तुम्हारे स्टूडियो की ओपनिंग सेरेमनी पर मेरी तरफ़ से छोटा सा gift।”
रूहानी ने धीरे से बॉक्स खोला।
अंदर एक चाबी थी, लेकिन कोई साधारण चाबी नहीं। वो एक कीचेन से जुड़ी थी जो एक छोटे, चमकते हुए गाउन के आकार का था। सुनहरे धागों जैसी डिज़ाइन, बारीक नक्काशी, छोटे-छोटे embedded stones जैसे हर मोड़ कोई कहानी कहता हो और उस कीचेन से जुड़ा टैग “Stitch and Soul” का लोगो।
उसकी आँखों में पानी तैरने लगा। वो खिड़की की तरफ़ चेहरा मोड़कर जल्दी से आँखें पोछने लगी। फिर मुड़कर धीमे से पूछा, “ये किस चीज़ की चाबी है?”
अद्वैत ने उसकी ओर देखकर सहजता से कहा, “तुम्हारी कार की।”
रूहानी ने चौंक कर देखा, “मेरी… कार?”
“हाँ,” अद्वैत ने सिर हिलाया, “रोज़-रोज़ कैब से कितना ट्रैवल करोगी? तुम्हारा बजट और समय दोनों ही ज़्यादा जा रहा है। और फ्यूल की चिंता मत करो, I’ll make sure it’s always full.”
रूहानी ने धीरे से सिर ना में हिलाया, “पर मुझे तो कार चलाना नहीं आता।”
अद्वैत ने अपनी आवाज़ को स्थिर रखते हुए कहा, “अगर तुम comfortable हो, तो मैं सिखा दूँगा।”
वो एक पल था, छोटा, शांत, लेकिन भीतर बहुत कुछ कहता हुआ। दोनों के बीच की अजनबीयत कुछ कम हुई थी, लेकिन उसका वज़न अभी भी मौजूद था।
पर शायद यही एक शुरुआत थी…. जहाँ दो अनजाने लोग, एक contract marriage की ज़िद और ज़रूरत से परे, इंसान की तरह एक-दूसरे को समझने की शुरुआत कर रहे थे।
तभी, सड़क पर अचानक तेज़ रोशनी चमकी, और एक तेज़ हॉर्न की आवाज़ से पूरी रात चीख़ उठी…
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क्या वो तेज़ रोशनी महज़ एक संयोग थी… या किसी आने वाले तूफ़ान की पहली दस्तक?
उस हॉर्न की चीख़ में छुपा था कोई इत्तिफ़ाक या कोई इरादा?
क्या रूहानी और अद्वैत के बीच की ये नज़दीकी किसी तीसरे की नज़र में खटकने लगी थी…?
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अधूरी इबादत भाग~48
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भाग~48 luxury नफ़रत
स्टूडियो की चमकती लाइट्स अब धीमी पड़ने लगी थीं, जैसे उस शाम का जादू अब धीरे-धीरे स्याही में घुल रहा हो। बच्चे थक चुके थे, रंग फीके पड़ने लगे थे और भीड़ अब बिखरने को तैयार थी।
उसी पल, जब मीना के शब्दों ने एक हलचल पैदा की थी, अद्वैत ने एक पल को रूहानी की ओर देखा। उसके चेहरे पर चिंता थी, लेकिन उसकी आवाज़ शांत रही, एकदम स्थिर।
“मैं खुद छोड़कर आता हूँ मीना और बच्चों को। रात हो चुकी है, बस थोड़ी ही देर लगेगी,” अद्वैत ने धीमे मगर दृढ़ स्वर में कहा।
रूहानी ने उसकी आँखों में देखा, कुछ पल को ठहरी रही।
“ठीक है,” बस इतना ही कहा उसने।
अद्वैत बच्चों के साथ बाहर निकल गया और जैसे ही दरवाज़ा बंद हुआ, कमरे की हवा बदल गई।
माहौल में एक अजीब सी बेचैनी तैरने लगी, जो अब तक किसी कोने में दबे चुपचाप सांस ले रही थी।
काम्या ने ज़रा भी देर नहीं की, रूहानी को वो सब कहने की , जो वो कब से अपने अंदर दबायी हुयी थी।
उसका लहजा तेज़ था, आंखों में वही ताना मारने वाली चमक, “वाह रूहानी, वाह। एकांश नहीं मिला तो उसके बड़े भाई को ही फंसा लिया तुमने? अब समझ आया तुम्हारी comeback story का असली twist।”
रूहानी के भीतर काम्या के हर शब्द से एक तीखी जलन उठ रही थी…. जैसे किसी ने जानबूझकर उसके सबसे गहरे ज़ख्म को छू लिया हो। उसे समझ नहीं आ रहा था कि काम्या की दुश्मनी इतनी पुरानी और ज़हरीली क्यों थी, जबकि रूहानी ने कभी उसे कुछ बुरा कहा या किया नहीं था।
रूहानी को जितना याद था, वो कभी काम्या से नहीं उलझी। ऐसा लगता है जैसे कल की ही तो बात हो जब वो काम्या से पहली बार मिली थी……
flashback
रूहानी India Fashion Week के competition के semi-final में पहुँच चुकी थी।
वो hall white noise से भरा था….. हाथों में fabric के टुकड़े, मशीनों की गूंज और vision boards पर टिके सपनों की हलचल। Designers की दुनिया की वो खामोश चीख, जो हर sketch के पीछे होती है।
और उसी भीड़ में, पहली बार…
वो आई।
न कोई grand entry… न drama… लेकिन उसकी मौजूदगी वैसी थी जैसे किसी ने हल्के से नज़र फेरकर भी कमरे की gravity बदल दी हो।
पहले सिर्फ आवाज़ आई…. किसी volunteer से कुछ specific demand करती हुई। आवाज़ में एक किस्म की थकान भी थी और ताक़त भी।
“Excuse me, मैं चाहती हूं कि मेरी mannequin exact 5’8 की हो। Long torso. And please, no cheap satin.”
रूहानी ने अनजाने ही उस दिशा में देखा।
वहाँ एक लड़की खड़ी थी….. sleek black ponytail में हर बाल discipline में, उसके चेहरे पर minimal makeup, लेकिन dark eyeliner जैसे उसकी आँखों की नीयत पर spotlight डाल रहा हो।
उसके चेहरे पर दिख रही परिपक्वता की गहरी रेखाएँ और आँखों में एक अनुभवी चमक साफ़ बता रही थी कि वो रूहानी और एकांश से कहीं ज़्यादा दुनिया देख चुकी थी।
Branded sneakers, high-waisted pants और एक ivory crop blazer…. ऐसा लग रहा था मानो उसने ये साबित करने की कसम खाई हो कि elegance loud नहीं होता।
लेकिन सबसे पहले जो महसूस हुआ….. वो था उसकी परफ्यूम की खुशबू।
हल्का musky, मगर lingering…. जैसे कोई राज़ जो उसकी skin से लिपटा हो। ये किसी आम परफ्यूम की खुशबू नहीं थी, बल्कि किसी एक्सक्लूसिव फ्रेंच परफ्यूमरी से निकली वो खास महक थी जो सिर्फ समझदार और ऊँचे तबके के लोगों की पसंद होती है…. हल्की, लेकिन अपनी मौजूदगी का एहसास कराने वाली और देर तक ठहरने वाली।
एकांश उसी वक़्त, एक angle से shot लेने के लिए camera adjust कर रहा था और काम्या ने, शायद उसी moment में, पलटकर उसे देखा।
दोनों में से किसी ने अपनी नज़र एक दूसरे से नहीं हटाई क्यूंकि उसकी नज़र ने तो जैसे एकांश को ठहरने पर मजबूर कर दिया।
काम्या मुस्कुराई…… वैसी मुस्कान जो सामने वाले की confident back को थामे हुए spine में एक ठंडी लहर छोड़ जाए।
रूहानी ने उसकी नज़र को, उसकी मुस्कान को चुपचाप देखा। फिर एकांश को भी…..
किसी ने कुछ नहीं कहा था उस वक़्त। लेकिन हालात ने बहुत कुछ कह दिया था।
रूहानी के भीतर एक अजीब-सी बेचैनी उठने लगी थी, जैसे एक अनकही चुनौती उसके सामने आकर खड़ी हो गई हो।
flashback end
रूहानी ने एक सांस ली, ठंडी और धीमी, फिर पूरे होश में पलटी। उसकी आँखें अब नर्म नहीं थीं, वो अब किसी artist की नहीं, एक जले हुए मन की लग रही थीं।
“जिसे जो आता है, वो अगले के लिए भी वैसा ही सोचता है। तुम्हें छल करना आता है, तो तुम हर औरत में वही ढूँढ़ती हो। लेकिन अफ़सोस… मैं तुम्हारी दुनिया की नहीं हूँ।”
काम्या ने भी कहा, “रूहानी तुम हो क्या….. only an emotional fool loser”
“Enough, Kamyaa,” एकांश ने कड़वी आवाज़ में कहा, “ये सही वक्त नहीं है, इन सब बातो का”
“तो कब होगा सही वक्त?” काम्या अब सह नहीं पा रही थी। उसकी आँखों में एक ऐसा डर था जिसे वो गुस्से की आग में छिपा रही थी।
“जब तुम फिर से अपनी पुरानी मोहब्बत को दोबारा अपनी ज़िंदगी में वापस ले आओगे?…. तब”
एकांश कुछ कहने ही वाला था कि रूहानी उसकी ओर मुड़ी, आँखों में ज्वाला थी, पर आवाज़ एकदम ठंडी।
“Mr. and Mrs. Rathore… oh sorry, Mrs. Kamya Raina,” उसने हर शब्द को नफासत से काटा, “इस गलतफहमी में मत रहना कि रूहानी अब कभी किसी धोखेबाज़ के पास वापस लौट कर जाएगी।”
इतना कहकर वह मुड़ गई, उसकी चाल तेज़ थी, पर आँखों के किनारे गीले थे।
काम्या चुपचाप एकांश की तरफ मुड़ी। उसकी हँसी अब सच्ची नहीं थी, बस तेज़ थी।
“देख लिया ना तुमने?” वो बोली, “She moved on… and you still…”
वो वाक्य अधूरा रह गया। लेकिन उसकी गूंज देर तक स्टूडियो की दीवारों से टकराती रही… जैसे कोई पुरानी धुन, जो खत्म तो हो गई हो, मगर दिल से उतरने का नाम न ले।
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कमरे की हवा ठहर गई थी। रूहानी अपने नए स्टूडियो के एक रिहर्सल रूम में बैठी, अतीत के पन्ने पलट रही थी। चांदनी रात में अपनी ख़ामोशी में……
तभी, पीछे से एकांश आया, कुछ बात करने के लिए। एकांश की आँखों में कोई साया था…. गुज़रे वक़्त का, अधूरी बातों का और उस खामोश इल्ज़ाम का, जो अब भी रूहानी की नज़रों में झलकता था।
उसने धीरे से कहा, “क्या अब भी मुझसे नफरत करती हो?”
रूहानी ने गहरी साँस ली, पलकों को बंद किया जैसे कोई बहुत पुराना ज़ख्म फिर से धड़क उठा हो।
“नफरत एक luxury होती है” उसकी आवाज़ बिल्कुल सपाट थी, “जिसे वही अफ़ोर्ड कर सकता है जिसे मोहब्बत से फुर्सत हो। मैं उस level से निकल चुकी हूँ।”
एकांश की नज़रें जैसे नीचे गिर गईं…. जैसे वो खुद से ही शर्मिंदा हो। लेकिन उसने अँधेरे में एक तीर मारा, “तुम जानती हो न की तुम झूठ नहीं बोल पाती हो”
रूहानी की नज़रों में न कोई ग़ुस्सा था, न ही दर्द। बस एक अजीब-सी शांति थी, जैसे वो उस तकलीफ़ से ऊपर उठ चुकी हो।
“और तुम मुझे नहीं जानते सही से….. मैं बहुत आगे निकल आई हूँ,” उसने कहा, “अब वापसी का कोई रास्ता भी नहीं बचा।”
एकांश की आवाज़ में अब एक काँपती हुई जिज्ञासा थी, “तो फिर उस दिन… जब मैं भाई के घर आया और तुम मुझे देखकर बेहोश हो गई थी… वो क्या था, रूहानी?”
वो जवाब देने ही वाली थी कि तभी बाहर से एक आवाज़ आई. …. खटाक ….. क्योंकि रूम में हल्का अँधेरा था और गलती से किसी स्टाफ ने बाहर से दरवाज़ा बंद कर दिया था।
अब रूहानी और एकांश उस रूम में आमने-सामने रह गए थे….. एक बंद दरवाज़े के भीतर, जहाँ बाहर की कोई आवाज़ नहीं पहुँच सकती थी।
रूहानी की सांसे उलझने लगी, वो दौड़कर दरवाजे तक पहुंची लेकिन आसपास कोई नहीं था , उसने आवाज़ भी लगायी पर कोई नहीं सुना।
एकांश धीरे धीरे उसके पास आ रहा था …..
तभी बाहर थोड़ी दूर से काम्या की आवाज़ आई, “एकांश! कहाँ हो sweetheart?”
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क्या रूहानी की साँसों की ये उलझन, सिर्फ एक बंद कमरे की घुटन थी… या फिर अतीत की कोई अधूरी दस्तक?
क्या ये महज़ इत्तिफ़ाक था कि दरवाज़ा बंद हो गया… या कोई चाहता था कि ये दो छायाएँ फिर आमने-सामने आएँ… एक आख़िरी बार?
अब जब बाहर काम्या की आवाज़ गूँज रही थी… क्या रूहानी उस आवाज़ से भागेगी, या उस सवाल का सामना करेगी जिसे अब तक वो खुद से भी छुपा रही थी?
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अधूरी इबादत भाग~47
पढ़ने का समय : 7 मिनट
भाग~47 उँगलियाँ जो छू गईं
दरवाज़े की ओर उठती निगाहें, एक क्षण के लिए जैसे ठहर सी गईं।
रूहानी की साँसों में अचानक एक बोझ-सा उतर आया था, जैसे किसी भूले हुए जख्म पर फिर से कोई उंगली रख दी गई हो।
लेकिन अद्वैत की आवाज़, शांत, स्थिर और कहीं न कहीं संभालने वाली, ने उस पल को टूटने नहीं दिया।
“गुनगुन, cake कट करो, सब wait कर रहे हैं।”
रूहानी ने एक गहरी साँस ली और जैसे किसी अदृश्य धागे ने उसकी आँखों को एकांश से हटा दिया। उसकी नज़र अब फिर से गुनगुन के पास लौट आई, जहाँ मासूमियत और रंगों का जश्न था।
अद्वैत दूर से सब देख रहा था। वो नज़रें पढ़ना नहीं जानता था, लेकिन उसके भीतर कुछ था जो महसूस कर सकता था और वो साफ़ महसूस कर रहा था कि रूहानी की मुस्कान अब पहले जैसी नहीं रही।
उसमें हल्की सी थकान थी, एक अधूरी साँस, जो अभी तक पूरी नहीं हुई थी।
वो धीरे से उसके पास आकर खड़ा हो गया, एक भी शब्द बिना कहे, बस एक साथ होने की ख़ामोश मौजूदगी।
मीना ने एकांश और काम्या को भीतर बुलाया, और दोनों बिना किसी झिझक के आकर रूहानी और अद्वैत की दूसरी तरफ खड़े हो गए।
एकांश की नज़रें कहीं गहराई से रूहानी को देखने लगीं…. जैसे कोई पुराना सपना अब किसी और की हकीकत बन गया हो।
गुनगुन ने केक काटा, चीकू ने सबसे पहले उसकी नाक पर क्रीम पोती और सब हँस पड़े…. वो बेपरवाह हँसी, जो थोड़ी देर के लिए हर अजनबीपन को छुपा लेती है।
लेकिन तभी, स्टाफ एक दूसरा केक ले आया…. सफेद और हल्के lavender icing से सजा हुआ। उस पर लिखा था: “To Stitch & Soul — A Dream Reborn.”
रूहानी की आँखों में हल्की हैरानी तैर गई। “ये…?”
अद्वैत झुका, बहुत हल्के से और रूहानी के कान के पास कहा — “यह सिर्फ गुनगुन का दिन नहीं है… आज इस स्टूडियो का भी नया जन्म हुआ है। और ये तो तुम्हारा आइडिया था कि दोनों celebrations एक साथ हों।”
उसके शब्दों में कोई मोहब्बत का प्रदर्शन नहीं था, न ही कोई dramatic gesture… बस एक समझ थी, और acknowledgment।
रूहानी की साँस एक पल को रुक गई। उसकी आँखें हल्की सी भीग गईं… एकदम अनकहे और अनजाने से। उसे खुद समझ नहीं आया कि ये खुशी थी, या relief… या शायद कोई ऐसी soft recognition, जो किसी ने बहुत दिन बाद उसे दी थी…. बिना माँगे, बिना शर्त, जैसे उसकी अधूरी इबादत आज मुकम्मल होने को थी।
और अद्वेत… वो अब भी उसके पास खड़ा था…. जैसे कोई उधार की गर्माहट हो… जो बिना कहे भी बहुत कुछ दे जाता है।
रूहानी अब तक उसी केक को देख रही थी… सफेद, नर्म, और उस पर सजी नाज़ुक सी lavender icing की परत जैसे किसी ख्वाब की सतह हो।
उसकी आँखों में एक अजीब सी शांति थी, लेकिन भीतर कुछ उलझा हुआ भी। तभी अद्वैत की हथेली ने उसके कंधे को छुआ…. वो छुअन न तो बहुत करीबी थी, न ही पूरी तरह अजनबी।
“रूहानी, केक काटो… darling,” अद्वैत ने हलकी आवाज़ में कहा, लेकिन उसके आख़िरी शब्द ने जैसे समय को धीमा कर दिया।
रूहानी की पलकें फड़कीं, उसकी नज़र चौंकते हुए अद्वैत के चेहरे तक पहुँची। वो मुस्कुरा रहा था…. उस तरह की मुस्कान जो भीड़ के बीच दिखाई जाती है, सिर्फ इसलिए कि बाकी सब कुछ ‘सही’ लगे।
रूहानी ने खुद को संभालते हुए केक काटा। अभी उसने उस छोटे से टुकड़े को अपनी उँगलियों के बीच पकड़ा ही था कि अद्वैत ने बहुत सहजता से उसका हाथ थाम लिया और केक का टुकड़ा खुद के मुँह में डाल लिया।
वो क्षण… नाज़ुक, अनजाना, और बहुत ज़्यादा निकटता से भरा… रूहानी को पूरी तरह surprise कर गया। उसके अंदर कुछ अकबका गया, जैसे कोई अलार्म बजने लगा हो जिसे सिर्फ वही सुन सकती थी।
अभी वो कुछ समझती कि अद्वैत ने केक का एक छोटा टुकड़ा फिर से काटा और उसके होठों तक लाकर पूछा, “May I?”
रूहानी ने अनजाने में सिर हिलाया…. उसकी चेतना अब भी उस टोन की तह तक नहीं पहुँच पाई थी।
अद्वैत ने अपनी उंगलियों को बेहद संतुलन के साथ उसके होठों के करीब लाया, शायद इस कोशिश में कि कहीं भी touch न हो….
लेकिन वो corner, वो millisecond…. जब उसकी उंगलियाँ रूहानी के होंठों से हल्का सा छू गईं, सब कुछ बदल गया।
रूहानी का चेहरा एकदम कड़क हो गया। वो तुरंत एक कदम पीछे हटी, और खुद को संभालते हुए स्टाफ से बोली, “Cake सबको distribute कर दो।”
वो बोल रही थी, लेकिन उसकी आवाज़ में एक किस्म की घबराहट थी। जैसे कुछ छू गया था…. कोई भूला हुआ जज़्बा या कोई बंधा हुआ डर।
अद्वैत वही खड़ा रहा, बिना कोई प्रतिक्रिया दिए। लेकिन उसके भीतर कुछ खिंच गया था। वो जानता था, उनका रिश्ता कोई फिल्मी मोहब्बत नहीं था…. ये एक समझौता था, काग़ज़ पर लिखा हुआ।
लेकिन जब उसकी उंगलियाँ रूहानी के होंठों से छू गईं और उसने उसकी पलकों की थरथराहट देखी…. तो उसे पहली बार महसूस हुआ कि कुछ है… कोई अनकहा स्पेस, जो दोनों के बीच मौजूद तो है, पर परखा नहीं गया।
उसके होठों की मुस्कान अब पहले जैसी नहीं थी…. उसमें एक बेचैनी थी। और आँखों में… शायद एक सवाल… क्या मैंने हद पार कर दी?
एकांश की आँखों के कोने में कुछ सिकुड़ गया था, जैसे वहाँ कोई अनकहा धुआँ जमा हो रहा हो, लेकिन चेहरा अब भी उतना ही शांत….. उतना ही सधा हुआ।
वो हर छोटी हरकत देख रहा था… अद्वैत की उँगलियों का रूहानी के हाथों के पास रुकना, रूहानी की हल्की झिझक, फिर वो केक वाला पल…
काम्या उसके पास खड़ी थी, लेकिन एकांश के अंदर कुछ और चल रहा था…. एक सन्नाटा, जो बाहर की रौशनी में भी ठंडा था।
तभी काम्या मुस्कुराती हुई आगे बढ़ी, “Beautiful studio,” उसके लहज़े में शहद था, मगर नीचे छुपा हुआ कोई काँटा भी।
रूहानी ने सिर्फ मुस्कराकर सर हिलाया, लेकिन उसकी पलकों के नीचे हल्की थकान थी। काम्या की आँखों में कुछ था…. शायद एक मीठा जहर।
“मैंने expect नहीं किया था कि तुम फिर से अपना नया studio खोलने का भी सोचोगी,” काम्या ने कहा, आँखें रूहानी की ड्रेस से लेकर उसके चेहरे तक दौड़ती रहीं, “…well, तुमने शादी भी कर ली — ये जानकर ज़्यादा हैरानी हुई मुझे।”
अद्वैत वहीं पास खड़ा था। उसका चेहरा अब थोड़ा सख़्त हुआ, लेकिन आवाज़ अब भी ठंडी और संतुलित रही।
“Congratulate करने का तुम्हारा तरीका थोड़ा casual नहीं है क्या?”
काम्या ने हँसते हुए कहा, “Oh sorry, Adwait, I forget that.”
फिर वो मुड़ी, एकांश अब तक पीछे खड़ा था, उसकी चुप्पी अब तक सबसे ज़्यादा मुखर थी। काम्या ने उसका हाथ पकड़कर उसे आगे लाया, “चलो, Ruhani का gift साथ में देते हैं।”
एकांश ने थोड़ा रुककर gift box आगे बढ़ाया… सुनहरे wrapping में बंधा….।
लेकिन उससे पहले कि वो रूहानी की ओर पहुँच पाता, अद्वैत ने झटके से वो gift अपने हाथों में ले लिया, और ठहरे हुए लहज़े में कहा, “Ruhani के special event पर सबसे पहला gift तो मुझे देना चाहिए, ना?”
एक क्षण के लिए एकांश की उंगलियाँ हवा में ठहर गईं…. जैसे किसी ने उस पर से कोई हक़ खींच लिया हो।
काम्या ने एक नकली हँसी के साथ, अपनी नज़रों को घुमाते हुए कहा, “Yes, of course…”
माहौल में अब रौशनी कम और चुप्पियाँ ज़्यादा थीं। fairy lights की धीमी टिमटिमाहट के बीच, रूहानी की नज़र एक पल को तीन चेहरों पर ठहर गई….
एक वर्तमान में खड़ा अद्वैत, जो अभी भी अजनबी लगता था;
एक अतीत से लौटे हुए एकांश, जिसकी आंखों में अब भी वो अधूरापन था;
और काम्या, जो सबकी नज़रों में बेनक़ाब थी, रूहानी के लिए अब भी एक ऐसा नाम थी जिसमें साज़िशें छुपी थीं; क्योंकि उसने कभी भी रूहानी के लिए दिल से कुछ अच्छा नहीं चाहा था।
रूहानी का गला सूख गया। उसने नज़रें फेर लीं, लेकिन दिल में कुछ भारी सा अटक गया।
तभी मीना तेज़ क़दमों से अद्वैत के पास आई, और घबराई हुई आवाज़ में बोली, “Sir, मुझे अभी घर लौटना होगा… गुनगुन और चीकू के पापा की तबियत अचानक बहुत बिगड़ गई है।”
अद्वैत ने चौंककर उसे देखा।
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मीना की इस अचानक खबर का सच, सिर्फ बीमारी था… या कुछ और भी था जो छुपाया जा रहा था?
एकांश की उंगलियाँ जो हवा में रुक गई थीं…. क्या वो सिर्फ एक gift से दूर हुई थीं, या किसी पुराने हक़ से भी?
रूहानी… क्या वो वाक़ई अद्वैत की ‘darling’ बन चुकी थी, या ये बस एक नाम था, एक मुखौटा… किसी और नाम को छुपाने के लिए?



