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टैग: प्यार#दर्द#इंतजार#मोहब्बत

  • No love clause

    No love clause

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

    Part 7

     

     

    शुभम हल्का-सा मुस्कुराया। “ठीक है… फिर देखते हैं छह महीने बाद कौन सही साबित होता है।”

     

    अग्नि ने उसकी बात को नजरअंदाज कर दिया। उसने टेबल पर रखा अपना फोन उठाया। स्क्रीन पर कई नोटिफिकेशन थे। उसने एक-एक करके उन्हें देखा।

    फिर अचानक उसकी उंगली एक नाम पर जाकर रुक गई।

    Veda Sharma.

     

    अग्नि ने मैसेज पढ़ा और फोन वापिस टेबल पर रख दिया और अपने लिए ड्रिंक बनाने लगा। लेकिन वो शायद कुछ सोच भी रहा था। 

     

    शुभम ने उसकी हरकत नोटिस कर ली। “क्या हुआ?”

     

    अग्नि, “कुछ नहीं।”

     

    शुभम ने पूछा, “किसका मैसेज था?”

     

    अग्नि बोला, “ऑफिस का।”

     

    शुभम ने आँखें सिकोड़कर उसकी तरफ देखा। “वेदा का?”

     

    अग्नि ने उसकी तरफ देखा। “तुझे उसका नाम कैसे पता?”

     

    शुभम हँस पड़ा। “भाई, मैं तेरा दोस्त हूँ। तेरी सेक्रेटरी के बारे में इतना तो जानता ही हूँ कि वो पिछले तीन साल से तेरे साथ काम कर रही है।”

     

    अग्नि ने कोई जवाब नहीं दिया। शुभम ने मुस्कुराकर पूछा, “वैसे कैसी है?”

     

    अग्नि ने सामान्य स्वर में कहा, “कौन?”

     

    शुभम कूल अंदाज में, “वेदा।”

     

    अग्नि ने कंधे उचकाए, “मुझे क्या पता?”

     

    “अच्छा?” शुभम ने शरारत से कहा, “अभी दो मिनट पहले तक तू बता रहा था कि तुझे एक समझदार, सादगी पसंद लड़की चाहिए…”

     

    अग्नि ने उसे घूरा। “शुभम।”

     

    शुभम, “हाँ भाई?”

     

    अग्नि बोला, “अपनी बकवास बंद कर।” क्योंकि वो समझ गया था कि शुभम कहना क्या चाह रहा है,लेकिन उसे शुभम की बात बुरी भी नहीं लगी। 

     

    शुभम हँस पड़ा। लेकिन अग्नि के मन में पहली बार एक विचार आया। 

    एक ऐसा विचार जिसे उसने तुरंत अपने दिमाग से निकालने की कोशिश की।

     

    वेदा शर्मा।

     

    अग्नि ने गिलास में ड्रिंक डाली और उसे धीरे-धीरे घुमाने लगा।

     

    शुभम अब भी उसे ही देख रहा था। “क्या सोच रहा है?”

     

    अग्नि ने गिलास होंठों तक ले जाते हुए कहा, “कुछ नहीं।” लेकिन इस बार उसकी आवाज़ में पहले जैसी सहजता नहीं थी।

     

    शुभम ने भौंहें उठाईं। “तू जब ‘कुछ नहीं’ बोलता है ना, तब समझ आता है कि दिमाग में बहुत कुछ चल रहा है।”

     

    अग्नि ने उसे घूरा। “तू मेरा दिमाग पढ़ना कब से सीख गया?”

     

    “जब से तू मेरा दोस्त बना है।” शुभम ने आराम से सोफे की पीठ से सिर टिकाया। “वैसे एक बात बता… तेरी सेक्रेटरी शादीशुदा तो नहीं है?”

     

    अग्नि ने तुरंत उसकी तरफ देखा। “नहीं।” जवाब इतना जल्दी आया कि शुभम के चेहरे पर शरारती मुस्कान और गहरी हो गई।

    “ओहो… तो जानकारी पूरी है।”

     

    अग्नि ने गिलास टेबल पर रख दिया। “शुभम।”

     

    शुभम, “अरे मैं तो बस पूछ रहा था।”

     

    अग्नि, “और मैं बस जवाब दे रहा हूँ।” 

     

    शुभम, “ चल तू अब ज्यादा मत सोच, मैं कुछ करता हूँ।”

     

    अग्नि में हां में सिर हिलाया और बोला, “ बस इसी जवाब की उम्मीद थी।”

     

     

    अगली सुबह… राजावत ग्रुप।

    सुबह के ठीक नौ बजे।

     

    अग्नि हमेशा की तरह अपने ऑफिस पहुँच चुका था।

    उसका केबिन पूरी तरह व्यवस्थित था।

    टेबल पर जरूरी फाइलें रखी थीं। कॉफी उसके सामने थी।

     

    लेकिन आज पहली बार… उसकी नजर बार-बार दरवाजे की तरफ जा रही थी।

     

    तभी डोर नॉक हुआ।

    अग्नि, “ come in!”

     

    निशांत अंदर आया। “Good morning, sir.”

     

    अग्नि, “Morning.” निशांत ने फाइल आगे बढ़ाई।

    “आज दस बजे की बोर्ड मीटिंग है। ग्यारह बजे मल्होत्रा ग्रुप के साथ मीटिंग और दोपहर में…”

     

    अग्नि, “निशांत।”

     

    निशांत, “जी, सर?”

     

    अग्नि ने बिना किसी रिएक्शन के पूछा, “वेदा आई?”

     

    निशांत कुछ पल उसे देखता रहा। फिर बोला, “अभी तक नहीं, सर।”

     

    अग्नि ने अपनी घड़ी देखी। नौ बजकर दस मिनट।

    “आते ही उसे मेरे केबिन में भेजना।”

     

    निशांत ने सिर हिलाया, “जी सर।”

     

    निशांत जाने लगा। फिर अग्नि ने उसे रोक लिया। “और निशांत…”

     

    निशांत रूककर पीछे मुड़ा, “जी?”

     

    “अगर वो आज भी ऑफिस नहीं आ पाए तो…” अग्नि कुछ पल रुका। “पहले मुझसे बात करना।”

     

    निशांत ने सिर हिलाया। “जी सर।”

     

    दरवाजा बंद हो गया। अग्नि कुर्सी पर पीछे टिक गया।

    उसने खुद से सवाल किया, वो आखिर वेदा का इंतजार क्यों कर रहा था?

     

    उसे अपनी ही बेचैनी अजीब लग रही थी। तभी दरवाजे पर दस्तक हुई।

     

    अग्नि की नजर दरवाजे पर गई। “Come in.”

     

    दरवाजा खुला। और सामने… वेदा खड़ी थी।

    आज भी उसकी आँखों के नीचे नींद की कमी साफ दिखाई दे रही थी। बाल जल्दी में बाँधे हुए थे।

    चेहरा थका हुआ था।

    लेकिन हाथ में हमेशा की तरह ऑफिस की फाइलें थीं।

    “Good morning, sir.”

     

    अग्नि कुछ सेकंड उसे देखता रहा। फिर बोला, “Sit.”

     

    वेदा चुपचाप सामने वाली कुर्सी पर बैठ गई।

    अग्नि ने अपने सामने रखी फाइल बंद कर दी।

    कुछ पल तक वो उसे देखता रहा।

    फिर धीमे स्वर में बोला, “वेदा…”

     

    वेदा ने हैरानी से अग्नि की तरफ देखा, क्योंकि ये शायद पहली बार था जब वो उसे इस तरह से पुकार रहा था। “जी, सर?”

     

    “मुझे तुमसे ऑफिस के काम के अलावा…”

    वो एक पल के लिए रुका। “…एक बेहद निजी बात करनी है।”

     

    वेदा की भौंहें सिकुड़ गईं। उसे समझ नहीं आया कि अग्नि आखिर उससे क्या पूछने वाला है।

     

    और अग्नि…

    वो भी शायद पहली बार अपने जीवन का सबसे असामान्य प्रस्ताव किसी के

    सामने रखने जा रहा था।

     

    क्रमशः…

     

    💕 No Love Clause

    कभी-कभी जिंदगी सबसे बड़ा सौदा वहीं रखती है, जहाँ इंसान सबसे ज्यादा मजबूर होता है।

     

  • अधूरी इबादत भाग~53

    अधूरी इबादत भाग~53

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    भाग~53 क्या अब सब ठीक होगा? 

     

    रूहानी के हाथ में थमा चम्मच अब भी उस प्लेट में अटका हुआ था, लेकिन उसका ध्यान बिल्कुल भी वहां नहीं था। अद्वैत के पूछे सवाल और उसके जवाब ने जैसे दिल के भीतर किसी पुराने दरवाज़े की चिटकनी फिर से खोल दी हो।

    “हाँ… नहीं… मेरा मतलब… अपने छोटे भाई से मिलने का तो मन बहुत है,” उसने नज़रें बचाकर कहा, “लेकिन मेरी वजह से अगर वहाँ कोई सीन create हो गया तो यश का birthday spoil हो जाएगा।”

    उसकी आवाज़ धीमी थी, पर साफ़। उसमें डर नहीं था, बस एक गहरी जिम्मेदारी थी….. जैसे वो अब सिर्फ अपनी नहीं, अपने अतीत की भी रखवाली कर रही हो।

    अद्वैत ने उसकी आँखों में देख कर सिर्फ ‘ठीक है’ कहा, फिर थोड़ा मुस्कुराते हुए बोला, “तुम ब्रेकफास्ट कर लो, मैं तुम्हें स्टूडियो छोड़ देता हूँ।”

    रूहानी ने तुरंत मना किया, “नहीं अद्वैत, मैं cab…..”

    लेकिन अद्वैत ने बीच में ही टोकते हुए कहा, “तुम जब तक car चलाना सीख नहीं लेती, तब तक अगर मैं घर पर रहूँ, तो तुम्हें studio पहुँचाता रहूँगा। और तुम अपनी schedule देख लेना… ताकि मैं तुम्हें जल्दी से car drive करना सिखा दूँ।”

    इतना कहकर वो पलटा और सीढ़ियाँ चढ़ते हुए ऊपर अपने कमरे की ओर चला गया।

    रूहानी कुछ पल तक वहीं बैठी रह गई। इस सोच में की अभी तक किसी ने उसकी इस ज़िन्दगी में self-independent होने के लिए नहीं कहा, जो किया उसने अपनी ज़िद पर। 

    “कितनी अजीब बात है…” उसने बुदबुदाते हुए खुद से कहा, “…जो इंसान कभी मेरे लिए एक राह जैसा लगा करता था, आज वही एक अस्थायी पड़ाव बन गया है। एक साल बाद… हम फिर से अजनबी हो जाएंगे और मैं नहीं चाहती कि इस एक साल की मुलाक़ात में कोई ऐसा एहसास बन जाए जो फिर से मुझे खुद को खो देना पड़े।”

    °°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°

    शाम होते ही रूहानी ने जैसे ही स्टूडियो का दरवाज़ा बंद किया, बाहर खड़ी गाड़ी की तरफ़ नज़र गई और उसके क़दम ठिठक गए। 

    अद्वैत ड्राइवर सीट के बजाय कार के दरवाज़े से टिक कर खड़ा था, गहरे नीले कोट और हल्की चमकती शर्ट में, बाल थोड़े बिखरे हुए लेकिन चेहरे पर वही पुराना सधा हुआ सुकून। 

    कार की पिछली सीट पर खूबसूरत बुके और कई रंग-बिरंगे गिफ्ट्स रखे थे, जैसे किसी फिल्म का सेट रियलिटी में उतर आया हो।

    रूहानी के माथे पर हल्की सी सलवट पड़ी और उसने पूछा, “ये सब क्या है अद्वैत?”

    अद्वैत ने अपने दोनों हाथों को साइन के पास बांधते हुए गाड़ी के दरवाज़े पर पीठ टिकाई और नाटकीय अंदाज़ में बोला, “मुझे मेरी प्यारी बीवी के और भी प्यारे भाई ने स्पेशली अपने बर्थडे पार्टी में invite किया है, तो मैंने सोचा क्यों न आपसे भी पूछ लूं… क्या आप मेरे साथ चलेंगी, मैडम?”

    रूहानी की आँखें बड़ी हो गईं, फिर आँखों में हल्की मुस्कान थी, लेकिन भीतर कहीं कुछ काँप रहा था। अद्वैत के शब्दों ने उसे कुछ ऐसा महसूस कराया जो उसने बहुत वक़्त से नहीं किया था, जैसे कोई सच में उसकी परवाह करता है, बिना किसी शर्त के, बिना किसी स्वार्थ के।

    वो बोली, “अगर मैं न आना चाहूं तो…?”

    अद्वैत ने पहले एक पल रुककर उसकी आँखों में झाँका, फिर बिना जल्दबाज़ी के कुछ कदम उसकी ओर बढ़ाया अपने दोनों हाथों को पीछे की तरफ बांधे हुए। 

    “आपकी इच्छा मेरे लिए हुक्म के बराबर है, मिसेज रूहानी चौहान,” अद्वैत ने मुस्कुराते हुए कहा, “ये बंदा आपको अभी घर छोड़ सकता है… लेकिन वो क्या है ना, वहाँ कोई आपकी राह तक रहा होगा….. दस साल छोटा, प्यारा, इकलौता भाई। जिसने आज पहली बार अपनी दीदी को invite किया है, और वो भी इस अद्वैत के ज़रिए…”

    रूहानी की आँखों में कुछ चमकने लगा था। अद्वैत का ये अंदाज़…. थोड़ा चुलबुला, थोड़ा नरम, और पूरी तरह दिल से….. उसके लिए एकदम नया था। 

    वो हल्के से मुस्कुरा कर बोली, “ठीक है, ठीक है… इतनी ड्रामा की ज़रूरत नहीं है, मैं भी चल रही हूँ।”

    लेकिन जैसे ही उसने अपने पहनावे पर नज़र डाली…. टी-शर्ट और जींस….. उसकी मुस्कान हल्की सी सिकुड़ गई। “माँ-पापा अगर मुझे इन कपड़ों में देखेंगे तो मार ही डालेंगे।”

    अद्वैत ने फौरन जवाब दिया, “क्यों घबरा रही हो, रूहानी? वहाँ तुम मिसेज रूहानी चौहान बनकर जा रही हो और मिस्टर अद्वैत अवस्थी की पत्नी को जो अच्छा लगे वो पहने, उसे किसी के भी छोटी सोच के बारे में नहीं सोचना चाहिए।”

    रूहानी की साँस जैसे थोड़ी रुक गई। उसकी नज़र अद्वैत के चेहरे पर टिक गई…. उस आवाज़ पर जिसमें न कोई बनावट थी, न कोई झूठ। “लेकिन…” उसने धीमे से कहा, “मेरे कपड़े पार्टी लुक के नहीं हैं।”

    अद्वैत ने उसकी बात बीच में काटते हुए कार का दरवाज़ा खोला, “तो चलो, अभी भी देर नहीं हुई है, खरीद लेते हैं।”

    रूहानी ने हल्का सा विरोध किया, “फिजूलखर्ची क्यों करनी? घर चलो, मैं अपने कपड़ों में से कुछ पहन लूंगी।”

    लेकिन अद्वैत ने उसकी बात सुनकर सिर हल्के से हिलाया और एक सादगी भरी गंभीरता से बोला, “तुम्हारे भाई का बर्थडे है, रूहानी… प्लीज़, चलो शॉप पर। सिर्फ तुम्हारे लिए नहीं, उसके लिए भी जो शायद आज तुम्हें देखकर बेइंतहा ख़ुशी महसूस करेगा।”

    वो एक पल के लिए चुप रही, फिर कुछ सोचते हुए धीरे से कार में बैठ गई। उसकी आँखों में पहली बार कोई बहस नहीं थी…. सिर्फ एक गहरा सन्नाटा और उस सन्नाटे में अद्वैत की बातों की गूंज।

    कभी-कभी कोई अजनबी एक दिन में वो भरोसा दे जाता है, जो अपनों ने सालों में नहीं दिया होता…..

    °°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°

    शाम की परछाइयाँ धीरे-धीरे ज़मीन पर उतर रही थीं। आसमान पर फीकी नारंगी रेखाएँ नीले रंग में घुलने लगी थीं और बाज़ार की दुकानों में बत्तियाँ एक-एक कर जल उठी थीं। हल्की हवा में गुलमोहर के पत्ते सरसराते हुए जैसे किसी भूले-बिसरे गीत की धुन छेड़ रहे थे।

    रेडीमेड शॉप के बाहर खड़ी अद्वैत की गाड़ी में ड्राइविंग सीट पर बैठे अद्वैत के बगल वाली सीट पर रूहानी बैठी थी, जिसने एक नरम lavender shade का अनारकली सूट खरीद कर पहना था, जिसके look में उसे कोई पुराना अहसास मिल गया था।

    “तुम्हें यही पसंद आया?” अद्वैत ने पूछा, तो रूहानी ने ड्रेस पर नज़र गड़ाते हुए सिर हिलाया। 

    “हाँ… यही ठीक लगेगा आज के लिए,” उसकी आवाज़ में भावनाओं की तहें थीं…. कुछ गहरी, कुछ छुपी हुई। 

    अद्वैत ने बिना कुछ कहे गाड़ी स्टार्ट की। एक पल को दोनों खामोश रहे, जैसे किसी और की याद के लिए एक छोटा-सा मौन रख रहे हों।

    जैसे ही गाड़ी ने बाज़ार की रौशनी को पीछे छोड़ा और सड़क अब रूहानी के पापा के घर की ओर मुड़ चुकी थी, हवा थोड़ी ठंडी और एहसास थोड़ा भारी हो गया।

    रूहानी के मम्मी-पापा के घर की चौखट पर जब गाड़ी का इंजन बंद हुआ। सन्नाटा उतर आया, पर दिल की धड़कनें तेज़ थीं।

    अद्वैत ने धीरे से कहा, “चलो…?”

    रूहानी ने सिर झुकाकर कपड़े की तहें ठीक कीं, दुपट्टे पर उँगलियाँ फिराईं। 

    यश की कही बात उसका मन दोहराया जा रहा था,“तुम ethnic पहनती हो तो लगती नहीं जैसे इस दौर की हो…”

    उन्होंने दरवाज़ा खोला। बाहर की हवा में रात की सीलन और किसी भूले अल्फाज़ की गंध थी।

    दरवाज़े तक पहुँचते हुए रूहानी का हाथ काँपा, उसके wristwatch की सूई अब भी 6:57 पर रुकी थी…. वही वक़्त जब सब थम गया था।

    अद्वैत ने दरवाज़े की घंटी की तरफ हाथ बढ़ाया।

    उसने रूहानी की तरफ देखा, उसकी आँखों में एक सवाल था… “क्या तुम तैयार हो?”

    रूहानी की धड़कनों की गति बढ़ चुकी थीं। उसने बिना कुछ कहे सिर हिला दिया।

    और फिर… अद्वैत ने घंटी दबाई।

    —————————

    “क्या वक़्त सच में थम गया है… या आज की रात वो सूई फिर से चलने वाली है?”

    “रूहानी तैयार तो है… लेकिन किसके लिए? अपने भाई से मिलने के लिए, या उन सवालों का सामना करने के लिए जो अब तक अनकहे थे?”

  • अधूरी इबादत भाग~51

    अधूरी इबादत भाग~51

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    भाग~51 पहली बार भूली? 

     

    पिछली रात…

    रूहानी बिस्तर पर लेटी थी, पर नींद उसकी पलकों से कोसों दूर थी। तकिये पर सिर रखते ही आँखें बंद तो हो जातीं, पर भीतर चलती अशांत तस्वीरें उन्हें फिर से खोल देती थीं।

    दिन भर का हर एक लम्हा जैसे उलझ कर उसकी साँसों में अटक गया था….. अपने नए स्टूडियो की चमकती शुरुआत, फिर अचानक एकांश राठौड़ और काम्या रैना की मौजूदगी, उन दोनों के शब्दों की वह छुपी हुई नश्तर-सी चुभन, और फिर लौटते वक़्त वो सड़क पर हुआ हल्का-सा एक्सिडेंट… सब कुछ जैसे किसी भारी चादर की तरह उस पर लिपट गया था।

    पलंग पर लेटी रूहानी करवट पर करवट बदल रही थी, जैसे उसका जिस्म बिस्तर पर था, पर रूह उसके ही अंदर किसी और समय में लौट गया हो। चादर के नीचे उसकी उंगलियां एक-दूसरे में उलझी हुई थीं, और उसके सीने में बेचैनी किसी अनसुने संगीत की तरह बज रही थी। बाहर रात चुप थी, पर उसके भीतर हज़ार आवाज़ें चल रही थीं। 

    उसने आँखें बंद कीं, लेकिन उस अंधेरे में एक दृश्य चमकने लगा…. वही शाम, जब पहली बार एकांश ने उसे इस तरह छुआ था कि उसकी साँसें थम गई थीं। 

    flashback 

    India Fashion Week के सेमी-फाइनल की रात थी। होटल के उस रूम में बस सिलाई मशीन की टकटक और रूहानी की सांसों की आवाज़ थी। 

    उसके हाथ लगातार काम में लगे थे….. कभी कपड़ों की तह जांचती, तो कभी स्केच पैड पर कुछ जोड़ती घटाती। आँखों में नींद नहीं थी, बस जूनून था। 

    उसके चेहरे पर पसीने की हल्की परत थी, पर आंखों में कोई थकान नहीं…. सिर्फ़ जीत की ललक।

    उसी कमरे के एक कोने में, एकांश बिस्तर पर लेटा हुआ था। उसका कैमरा हाथ में था, जिसमें वो बार-बार वो तस्वीर देख रहा था जो उसने चुपके से खींची थी…. रूहानी की। उसकी आंखें उस फोटो में कुछ ढूंढ रही थीं… शायद वो मासूमियत जो उसे रूहानी में सबसे पहले दिखी थी।

    कुछ पल बाद, वो उठकर उसके पास आया। कैमरा टेबल पर रखा और बिना कुछ कहे, धीरे से उसका हाथ थामा। रूहानी चौंकी, उसके हाथ रुक गए। उसने सिर उठाकर देखा और एक प्रश्न भरी नज़र उसकी आंखों में तैर गई।

    “थोड़ा आराम कर लो, रूहानी,” एकांश ने धीमे से कहा और उसके हाथों को पकड़कर बिस्तर तक ले आया। उसके पास बैठकर उसके गाल को अपनी हथेली से सहलाया। 

    “अब भी काफ़ी समय है,” उसकी आवाज़ में एक अजीब नरमी थी, जो रूहानी को और बेचैन कर गई।

    “नहीं, एकांश,” रूहानी ने घबराई सी आवाज़ में कहा, “ज़्यादा समय नहीं है। मुझे किसी भी हालत में ये प्रतियोगिता जीतनी है। ये मेरा सपना है… मेरा सब कुछ।”

    “रूहानी… listen… listen… मुझे तुम पर पूरा भरोसा है। तुम जरूर जीतोगी। लेकिन कभी-कभी बस एक पल को जी लेना भी ज़रूरी होता है। कम से कम, इस मोड़ तक पहुँचने का एहसास तो करो।”

    वो कुछ कह नहीं पाई, बस मासूमियत से बोली, “क्या कहना चाह रहे हो, एकांश?”

    एकांश ने उसके दोनों गालों को अपनी हथेलियों में भर लिया। उसकी आंखें बहुत पास थीं अब।

    “हमें मिले कितना वक़्त हो गया, रूहानी?”

    रूहानी ने धीमे से कहा, “मुझे ठीक से याद नहीं… शायद बारह या पंद्रह महीने।”

    “Do you have any feeling for me?” एकांश की आवाज़ हल्की, पर सीधी थी।

    रूहानी ने बिना कुछ कहे, धीरे से हां में सिर हिला दिया और अपनी नज़रें झुका लीं। वो उसकी ज़िंदगी का पहला ऐसा इंसान था, जिसके लिए उसने इतना गहरा महसूस किया था…. दिल से, आत्मा से। 

    अगले ही पल, एकांश ने उसके चेहरे को अपने और नज़दीक खींच लिया, और उसके होंठों को चूमना शुरू कर दिया।

    रूहानी का शरीर अकड़ गया। उसने चादर के दोनों किनारों को कसकर पकड़ लिया। उसकी पलकों में हलचल थी, सांसें उलझी हुई, और मन भीतर से कांप उठा। 

    ये सब उसके लिए बहुत नया था… बहुत अजीब। वो न तो जवाब दे पा रही थी, न खुद को पूरी तरह उस पल में छोड़ पा रही थी।

    पर एकांश को शायद इसका एहसास नहीं था। वो बस उसी लम्हे में डूबा रहा…. बिना यह देखे कि रूहानी के होंठ सिर्फ़ चुप थे, जवाब नहीं दे रहे थे।

    वो इस खामोश असहजता को प्रेम का पल समझता रहा… और रूहानी, उस चुप्पी में खुद से कुछ खोती रही।

    कुछ देर रूहानी के होंठो को चूसने के बाद एकांश उसके गर्दन पर चला गया और अपने हाथों से रूहानी के टॉप को उसके कमर के पास से उठने लगा। 

    तभी रूहानी जैसे किसी नींद से जागी, उसने तुरंत एकांश के हाथ को अपनी कमर पर से झटके से हटाया और उठ खड़ी हुई। 

    तभी एकांश ने उसे बिस्तर पर पटक दिया, उसके ऊपर आकर बोला, “everything is fine ruhani” 

    रूहानी की आंखे भरने लगी, वो एक ही बात दोहराए जा रही थी, “नहीं एकांश, ये सही नहीं है, मैं हमारी शादी के बाद सब कुछ करूंगी लेकिन अभी नहीं……”

    एकांश बोला, “रूहानी! I’m aroused now, what should I do, please”

    और इतना बोलकर एकांश रूहानी के कॉलरबोन को चुमना शुरू कर दिया। 

    रुहानी घबराने लगी थी, उसने अपना पूरा जोर लगाकर एकांश को खुद के ऊपर से हटा दिया और एक जोरदार तमाचा एकांश के गाल पर जड़ दिया। 

    एकांश की आंखे गुस्से से लाल हो गई थी, वो जैसी ही रूहानी की तरफ बढ़ा, रूहानी बिना एक पल की देरी किए बाथरूम में घुस गई और दरवाज़ा बंद कर दिया। 

    एकांश कुछ देर गेट खटखटया, लेकिन रूहानी नहीं निकली। वो पूरी रात उसके वॉशरूम में रोते-रोते सो गई थी। 

    Flashback end

    और फिर… पता नहीं कब, रूहानी करवट बदलते-बदलते उठी। आँखें अधखुली थीं, मगर बदन नींद में डूबा हुआ।

    वो बिस्तर से उतरी। नंगे पाँव, बिना किसी शोर के, जैसे कोई परछाई चल रही हो। हल्की रोशनी में उसका चेहरा थका हुआ नहीं, खोया हुआ लग रहा था। वो धीरे-धीरे बाहर निकली… और वहीं, किचन के पास, किसी को खड़ा देखा।

    उसकी आँखों ने पहचान नहीं की…. उसका दिल ही था जिसने कहा, “यश…..”

    वो चली गई उस साये की ओर और गले लग गई। जैसे किसी भुला दिए गए रिश्ते की गर्माहट तलाश रही हो। जैसे कोई बच्ची अपने पुराने तकिये को ढूँढ रही हो, जिसमें उसकी माँ की महक थी।

    उसने कसकर पकड़ लिया… और फिर वहीँ, बिना कुछ कहे, कुछ और सोचे, उसकी आँखें बंद हो गईं।

    कुछ देर ऐसे ही गुज़रा… फिर जैसे किसी डोर ने उसे वापस खींचा हो, रूहानी ने धीरे से अपनी पकड़ ढीली की, और उसी गति से वापस मुड़ गई। बिना किसी सवाल, बिना किसी आवाज़, जैसे कुछ हुआ ही नहीं और वो चली गई। 

    °°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°

    आज सुबह…

    जब अद्वैत ने इधर उधर देखते हुए कहा, “हाँ….. वो आज मेरी माँ की बरसी है न…..” तो रूहानी का गला भर आया था। 

    उसने जल्दी से “मैं फ्रेश हो कर आती हूँ” कहकर अद्वैत के चेहरे पर ही दरवाजा बंद कर लिया था। 

    उसने तुरंत बेड साइड टेबल पर से अपना मोबाइल उठाया और बिना देरी किए इंस्टाग्राम खोला और पिछले दिन की opening ceremony की कुछ तस्वीरें अपलोड कर दीं……

    studio की चमकदार तस्वीरें, cake-cutting की खुशी, gungun के साथ candid moments

    और लिखा:

    “Chapter 3 – From Ruins to Radiance ✨ #StitchAndSoul #GrandOpening”

    जैसे ही उसने पोस्ट किया, स्क्रीन पर एक reminder pop‑up आया:

    “मेरे प्यारे भाई यश का जन्मदिन”

    उसके होंठों के बीच फुसफुसाहट थी, “मुझे याद क्यों नहीं रहा?”

    उसकी आँखों में guilt का कांटा घुसा, और दिल एक अजीब तरह की बेचैनी से भर गया। 

    वह खुद से बोली, “पहली बार… मैं कैसे… ये भूल गई?”

    वह इस सोच में डूब गई की अब वह अपने छोटे भाई से क्या बोलेगी?

    ——————

    क्या एकांश उस खामोशी को अब भी इश्क़ मानता है… या उसने जानबूझकर अनदेखा किया था रूहानी की कांपती रूह को?

    क्या यश सच में वहीं था… या ये सिर्फ़ रूहानी की थकी हुई तन्हाई का एक वहम था?  

    क्या वाकई गलती से भूली थी रूहानी उसका जन्मदिन… या वो कुछ ऐसा भूल जाना चाहती थी, जिसे याद करना अब सिर्फ दर्द देता है?

     

  • अधूरी इबादत भाग~50

    अधूरी इबादत भाग~50

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    भाग~50 उसने शर्ट क्यों भीगने दी? 

     

    सड़क पर अचानक तेज़ रोशनी चमकी और एक तीखी हॉर्न की आवाज़ ने रात के सीने को चीरते हुए सब कुछ झकझोर दिया। 

    रुहानी ने एक झटके में आँखें बंद कर लीं और दोनों हाथों से डैशबोर्ड को पकड़ लिया। अद्वैत की उंगलियाँ स्टीयरिंग पर कस गईं, जैसे वक़्त को वहीं थाम लेना चाहता हो।

    सामने से आती गाड़ी, नशे में चूर किसी ड्राइवर के हाथों से लगभग बेकाबू थी। वो बेतहाशा झूलती हुई सीधे उनकी ओर बढ़ रही थी जैसे किस्मत ने अचानक अपनी चाल बदल ली हो। 

    रुहानी की सांस जैसे गले में अटक गई, और अद्वैत के चेहरे पर आया पसीना रात की ठंडी हवा में भी सर्द नहीं हो रहा था।

    लेकिन… ठीक उस अंतिम सेकंड में, जब दो ज़िंदगियाँ किसी अनजाने मोड़ पर थमने को थीं…. अद्वैत ने ब्रेक पर ज़ोर से पैर मारा और गाड़ी को एक मोड़ पर दाईं ओर घुमा दिया।

    टायरों की चीख़ती आवाज़ सड़क की रगों में उतर गई और उस दूसरी कार की हेडलाइट्स उनकी विंडशील्ड पर एक पल के लिए ठहरकर पीछे निकल गईं… बिना टकराए, बिना छुए… सिर्फ़ एक डर बनकर।

    अंदर, कुछ सेकंड के लिए समय रुक सा गया।

    रुहानी की साँस अब भी अधूरी थी, आँखें फटी की फटी। अद्वैत की उंगलियाँ अब भी स्टीयरिंग पर जमी थीं, पर पकड़ अब धीरे-धीरे ढीली पड़ रही थी।

    “रुहानी…” उसकी आवाज़ काँप रही थी, पर थमी नहीं, “तुम ठीक हो?”

    रुहानी ने बिना कुछ कहे धीरे-धीरे सिर हिलाया, फिर कांपते होंठों से फुसफुसाई, “बस… एक पल लगा था कि सब खत्म हो जाएगा…”

    अद्वैत ने गाड़ी को एक किनारे रोक दिया, इंजन बंद कर दिया… लेकिन उनके बीच जो चुप्पी थी, वो अब डर से नहीं, राहत से भरी थी। दो धड़कनों ने एक ही समय पर महसूस किया कि ज़िंदगी अभी बाकी है।

    अद्वैत ने देखा, रूहानी का हाथ अब भी हल्का कांप रहा था। 

    “सब ठीक हैं, रूहानी” अद्वैत ने धीमे से कहा। 

    °°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°

    रात के ढाई बज चुके थे। घर की हर दीवार जैसे नींद में डूबी हुई थी। सिर्फ़ किचन में लगी हल्की पीली रौशनी जग रही थी… उतनी ही चुप, जितना अद्वैत का मन। 

    वो काउंटर के पास खड़ा अपनी पानी की बोतल भर रहा था, जैसे उस सन्नाटे को किसी छोटे से काम से तोड़ने की कोशिश कर रहा हो।

    उसने जैसे ही फ्रिज का दरवाज़ा बंद किया, पीछे से आती किसी धीमी, नंगे पाँव की आहट ने उसे रुकने पर मजबूर कर दिया। 

    उसने मुड़कर देखा…. रूहानी।

    वो थोड़ी झुकी हुई थी, जैसे नींद में चल रही हो, या किसी भारी याद के बोझ से दब गई हो। उसकी आँखें अधखुली थीं, पाँव धीरे-धीरे फर्श पर सरकते हुए बढ़ रहे थे। कोई सजगता नहीं, कोई हड़बड़ाहट नहीं…. बस एक थकी हुई सी मौजूदगी।

    “रूहानी?” अद्वैत ने धीरे से पूछा, “क्या हुआ?”

    कोई जवाब नहीं।

    और फिर अचानक… जैसे किसी टूटे हुए पल ने खुद को समेट लिया हो…. रूहानी उसके सीने से आकर लग गई। उसके हाथ अद्वैत की नाइट शर्ट को कस के पकड़ चुके थे, जैसे वो उसे छोड़ देगी तो गिर जाएगी, टूट जाएगी, फिर कभी उठ नहीं पाएगी।

    अद्वैत एकदम जड़ हो गया। उसकी धड़कनों ने रफ्तार पकड़ ली और नसें जैसे सख्त हो गईं हों। उसने खुद को पीछे हटाने की कोशिश की…. हड़बड़ाहट नहीं थी, बस उलझन थी…. पर रूहानी की पकड़ और भी मज़बूत हो गई। 

    वो काँप रही थी, उसकी साँसों में बिखरी कोई पुरानी बेचैनी थी और आँखों से आंसू लगातार उसके सीने में भीग रहे थे।

    “रूहानी… क्या हुआ?” अद्वैत ने फिर कोशिश की, आवाज़ इस बार ज़रा कम सख्त थी।

    लेकिन लब अब भी ख़ामोश थे। जैसे कोई आवाज़ थी, जो भीतर से उठ तो रही थी, पर रास्ता नहीं मिल रहा था।

    अद्वैत के भीतर जैसे कुछ खामोश सा चटक गया। उसने कभी कल्पना भी नहीं की थी कि वो लड़की, जिससे उसने सिर्फ़ साथ रहने का समझौता किया था, बिना पास आए….. किसी दिन ऐसे, ख़ुद-ब-ख़ुद, उसकी नज़दीकियों में उतर जाएगी। 

    ये नज़दीकियाँ जिस्म की नहीं थीं… ये उस ख़ामोशी की थीं, जहाँ कोई कुछ कहे बिना सब कह जाता है। रूहानी उस पल उसकी बाहों में नहीं थी…. वो उसके अंतर्मन की चौखट पर बैठी थी, बिना इजाज़त मांगे।

    और फिर भी, वो उसे छूने से डर रहा था…. जैसे उसके दुःख को छू लेने से कहीं वो भी चुपचाप उसमें डूब न जाए।

    कुछ पलों बाद, रूहानी की उंगलियों ने उसकी शर्ट को धीरे-धीरे छोड़ा और वो उसी नंगे पाँव, उसी धीमी चाल से अपने कमरे की तरफ़ लौट गई। बिना कुछ कहे। जैसे आई थी, वैसे ही।

    अद्वैत वहीं खड़ा रहा, अपनी भीगी हुई शर्ट को देखते हुए, जैसे उसमें कोई उत्तर दर्ज हो जिसे वो पढ़ नहीं पा रहा।

    उसके ज़हन में सिर्फ़ एक सवाल अटका था….. “उसके कदमों की खामोशी ज़्यादा कह गई…. क्या वो मेरी बाँहों में सुकून ढूंढने आई थी, या अपने ही डर से छुपने?”

    और उस सवाल के जवाब में बस सन्नाटा था… लंबा, अनकहा, गहरा।

    °°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°

    कमरे की बत्तियाँ बुझी थीं, सवेरा हो चुका था। 

    रुहानी बिस्तर पर थी, करवट लेकर सो रही थी, पर उसे लगा जैसे वह सपने में जी रही थी।

    अचानक… एक जानी-पहचानी खुशबू ने उसे अपने आगोश में भर लिया।

    गर्म चॉकलेट की महक… पिघली हुई मिठास… हल्की-सी vanilla की परत।

    उसकी आँखे बंद थी लेकिन उसे लगा कि वो अपने पुराने घर के किचन में खड़ी थी। 

    वही टाइल्स, वही खिड़की से आती हल्की धूप और सामने उसकी माँ, apron पहने, बाल बांधे, और ओवन खोलते हुए।

    माँ का चेहरा धुंधला था, पर आवाज़ साफ़ थी, “लड़कियाँ रोज़-रोज़ मीठा खाएँगी तो मोटी हो जाएगी। चेहरे पर पिम्पल और एक्ने हो जायेंगे…. वो अलग। तुम लड़की हो और लड़कियों को control में रहना चाहिए।”

    एक अजीब-सी टीस ने रुहानी की दिल में गहराई तक जगह बना ली।

    “मम्मा, बस एक बार taste करना है…”

    “नहीं रूहानी! तुम नहीं खाओगी। ये यश के लिए है। आज उसका जन्मदिन है।”

    “मेरे जन्मदिन पर तो आप कुछ खास नहीं बनाती हो” रूहानी ने अपनी माँ से शिकायती लहजे में कहा। 

    “क्योंकि बेटी पराई अमानत होती है और हमारे यहाँ बेटियों का जन्मदिन नहीं बनाया जाता”

    माँ की बात से रूहानी की आँखे छलछला गयी थी। 

    तभी अचानक वो महक और तेज़ हो गई। रुहानी हड़बड़ा कर उठी। 

    उसकी सांस तेज़ थी, माथे पर पसीना… उसने हाथ से बिस्तर के पास की दीवार को छुआ जैसे यकीन करना चाहती हो — क्या वो अभी भी वहीं है?

    कमरे के बाहर से अब भी वही महक आ रही थी…. chocolate lava cake की। इतनी सजीव, इतनी सच्ची… कि अब ये सपना नहीं लग रहा था।

    वो दरवाज़े तक पहुँची, दबे पाँव, धीरे-धीरे, जैसे अतीत की दहलीज़ पर कदम रख रही हो। दरवाज़ा हल्का खोलकर उसने hallway की ओर देखा और वहीं से उसकी नज़र किचन में गई, जहाँ मीना cake ओवन से निकाल रही थी।

    वो कुछ कहने ही वाली थी कि पीछे से किसी ने हल्के से पुकारा, “रूहानी?”

    उसने पलटकर देखा… अद्वैत दरवाज़े की चौखट पर था, उसके चेहरे पर कुछ अनकहा सा था।

    “तुम ठीक हो?”

    रूहानी कुछ पल चुप रही, फिर उसके होंठ हिले, “हाँ, मुझे क्या हुआ है?”

    अद्वैत ने अपने गर्दन पर हाथ फेरते हुए कहा, “वो कल रात…. तुम…. वो….”

    रूहानी तुरंत से बोली, “मैं क्या……?”

    अद्वैत तुरंत बात बदल कर बोला, “कुछ नहीं……. फ्रेश होकर आ जाओ। मैंने मीना से स्पेशल चॉकलेट लावा केक बनवाया है।”

    रूहानी पूछ पड़ी, “कोई खास वजह?” 

    अद्वैत ने इधर उधर देखते हुए कहा, “हाँ….. वो आज मेरी माँ की बरसी है न…..”

    एक पल को सब कुछ रुक गया। रूहानी की आँखें एकाएक नम हो गईं। 

    ———————-

    क्या ये सिर्फ़ एक तारीख थी, या उस दिन कुछ ऐसा था जो अब तक दफ़न था? क्या ये महज़ संयोग था कि उस रात भी चॉकलेट लावा केक बना था? 

    जब रात में वो उसके सीने से लिपट गई थी….. क्या वो सिर्फ़ डर था? या कोई पुरानी याद उसकी आत्मा से लिपटी हुई थी… जिसे अद्वैत छू भी नहीं पाया?

    क्या सच में रूहानी सब भूल पाई थी जो रात के सन्नाटे में उसके भीतर उतर चुका था? 

     

  • अधूरी इबादत भाग~49

    अधूरी इबादत भाग~49

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    भाग~49 पहला गिफ्ट

     

    कमरे की हवा थमी हुई थी, दीवारें जैसे साँस रोक कर देख रही थीं कि अब आगे क्या होगा। 

    रूहानी की पीठ दरवाज़े से लगी थी, और उसकी उंगलियाँ हल्के-हल्के कांप रही थीं। दिल की धड़कनें इतनी तेज़ थीं कि लगता था जैसे कोई दरवाज़े के इस पार खड़ा सुन लेगा।

    एकांश ने जब अपने दोनों हाथ उसके कंधों पर रखे, तो वो छुअन किसी भूले हुए मौसम की तरह आई….. जानी-पहचानी, लेकिन अब अजनबी। 

    “रूहानी…” एकांश की आवाज़ में तल्ख़ी थी, “at least मेरी आंखों में तो देखकर बात करो। शायद तब तुम्हारे झूठ को भी मैं सच मान लूं।”

    रूहानी की सांस अटक गई। उसकी आँखों में नमी थी, लेकिन वो नमी किसी प्यार की नहीं, ठुकराए हुए भरोसे की थी। उसने धीरे से, बहुत एहतियात से, एकांश के हाथ अपने कंधों से हटा दिए। 

    और तभी…

    दरवाज़ा एक झटके में खुला — जैसे किसी ने कमरे की हदों पर शक कर लिया हो।

    काम्या…. उसकी नज़रों में संदेह नहीं, फैसला था। उसने पहले कमरे को स्कैन किया, फिर एकांश पर एक पल को ठहरकर, अपनी नज़रों की तलवारें रूहानी पर गाड़ दीं।

    “ओह… तो बंद कमरे में पुरानी इश्क लड़ाई जा रही है,” काम्या की मुस्कान तेज़ और ज़हर से भी तेज़ थी। “लगता है, अपनी डिज़ाइनिंग से ज़्यादा तुम्हारा ध्यान कुछ और ‘कनेक्शन’ बनाने पर रहता है। है ना?”

    कमरा जैसे एकाएक सन्नाटे में डूब गया। रूहानी की साँस एक लहर की तरह रुकी, और फिर एक गहरी गर्मी उसके भीतर उठने लगी…. वो गुस्सा जो खुद को लंबे समय से दबा रहा था।

    उसने सीधा खड़ा होकर काम्या की आँखों में आँखें डालीं। “काम्या, कम से कम मैं वो इंसान नहीं जो दूसरों के रिश्तों पर कीचड़ उछालकर अपनी खुद की खाली ज़िंदगी भरने की कोशिश करे।”

    उसकी आवाज़ अब कांप नहीं रही थी। “और हाँ, ‘कनेक्शन’ बनाने की बात रही… तो मैं सिर्फ अपने काम से कनेक्शन बनाती हूं, तुम्हारी तरह लोगों की पीठ पीछे छुरा घोंपकर नहीं।”

    एक पल को काम्या कुछ कह नहीं पाई…. जैसे शब्द उसकी जुबान तक आए ही नहीं।

    “और अगर तुम्हें लगता है कि एक बंद कमरा और एक पुरानी जान-पहचान ‘इश्क लड़ाई’ है, तो ये तुम्हारी छोटी सोच है, मेरी नहीं।”

    इतना कहकर रूहानी पलटी नहीं। वो सीधी दरवाज़े से बाहर चली गई, जैसे किसी courtroom से बाइज्ज़त बरी होकर निकली हो…. सिर ऊँचा, आत्मा शांत, और भीतर एक नई आग जलती हुई।

    °°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°

    जैसे ही रुहानी उस कमरे से बाहर आई, उसकी चाल में बेचैनी थी और आँखों में कुछ कह जाने की बेआवाज़ कोशिश। पलकें भारी, पर चेहरे पर एक नकली सामान्यता का मुखौटा। 

    ठीक उसी वक़्त अद्वैत भी अपनी कार पार्क कर चुका था और स्टूडियो की ओर बढ़ा चला आ रहा था।

    रूहानी उसकी तरफ़ बढ़ी, हल्की सांसों में एक स्थिरता लाने की कोशिश करते हुए और बिना किसी भूमिका के बोली, “अब हम भी घर चले? पार्टी वैसे भी लगभग खत्म हो चुकी है।”

    अद्वैत ने उसकी आँखों में कुछ पल देखा, जैसे किसी उलझे हुए स्केच को समझने की कोशिश कर रहा हो। फिर शांत स्वर में बोला, “पहले स्टूडियो बंद करके चाबी ले लो, फिर चलते हैं।”

    रूहानी कुछ कहने ही वाली थी कि पीछे से एक स्वर उभरा, हँसी और आवाज़ का एक अजीब मेल और एकांश व काम्या स्टूडियो main gate के ओर आते दिखाई दिए।

    एकांश ने आते ही अद्वैत के कंधों को पकड़ कर हल्के से गले लगाया। यह एक सामान्य सा इशारा था, मगर उसके ठीक बाद रूहानी का एक क़दम पीछे हट जाना….. नज़रें नीची कर लेना…. अद्वैत की नज़रों से छुपा नहीं था। 

    उस एक पल में जैसे कुछ अजीब सा फिसल गया हो उसके मन में। पर उसने उस क्षण को वहीं दफ़न कर दिया, कुछ न कहकर।

    काम्या को शायद उस ख़ामोशी से चिढ़ हो गई। वो एकांश का हाथ कस कर पकड़ते हुए तिरछी मुस्कान में बोली, “अब मैं अपने पति के साथ अपनी रात enjoy करने जा रही हूँ। Wish you both… अद्वैत और रूहानी…. तुम भी अपनी रात enjoy करो।”

    ताने की धार इतनी पैनी थी कि कमरे की हवा कुछ सेकंड को जैसे कट सी गई।

    अद्वैत का चेहरा सख़्त हो गया। वो कुछ कहने ही वाला था कि रूहानी ने उसका हाथ पकड़ कर सिर ना में हिलाया…. जैसे कह रही हो, अभी नहीं।

    पर अद्वैत ने उसका हाथ थामकर हल्के से थपथपाया…. एक सधी हुई, शांत ताक़त से भरा इशारा। फिर काम्या की ओर देखकर बोला, “Kamya, it’s my bedroom matters… and I don’t like to shamelessly public it.”

    एकांश ने धीमे स्वर में कहा, “भाई! काम्या की तरफ से मैं माफ़ी मांगता हूँ, you’re right.”

    अद्वैत ने रूहानी की ओर देखा, “सब चले ही गए हैं, स्टाफ्स को पेमेंट कर दो, फिर हम भी निकलते हैं।”

    थोड़ी देर बाद काम्या और एकांश निकल गए। 

    स्टूडियो का सन्नाटा अब एक भारी सी चुप्पी बनकर रह गया था। रूहानी ने काम निपटाया और फिर अद्वैत की कार की ओर चली। 

    जब वह बैठी, उसकी उंगलियाँ अब भी सिहर रही थीं। पूरा दिन, वो कमरा, वो सारे पुराने लम्हे… सब उसके मन में घूम रहे थे। 

    जैसे ही अद्वैत ने ड्राइविंग सीट पर आकर दरवाज़ा बंद किया, एक तेज़ आवाज़ के साथ, रूहानी हल्की सी कांप गई।

    अद्वैत ने तुरंत उसकी ओर देखा, “Are you okay, Ruhani?”

    रूहानी ने अपनी दोनों बाहों को अपनी हथेलियों से रगड़ा और जबरदस्ती मुस्कराते हुए बोली, “हाँ, ठीक हूँ… बस थक गई हूँ।”

    कुछ पल की ख़ामोशी के बाद, अद्वैत ने जेब से एक छोटा सा बॉक्स निकाला और उसकी ओर बढ़ाया।

    रूहानी ने आश्चर्य से पूछा, “मेरे लिए?”

    अद्वैत ने सीधे शब्दों में बोला, “हाँ… तुम्हारे स्टूडियो की ओपनिंग सेरेमनी पर मेरी तरफ़ से छोटा सा gift।”

    रूहानी ने धीरे से बॉक्स खोला।

    अंदर एक चाबी थी, लेकिन कोई साधारण चाबी नहीं। वो एक कीचेन से जुड़ी थी जो एक छोटे, चमकते हुए गाउन के आकार का था। सुनहरे धागों जैसी डिज़ाइन, बारीक नक्काशी, छोटे-छोटे embedded stones जैसे हर मोड़ कोई कहानी कहता हो और उस कीचेन से जुड़ा टैग “Stitch and Soul” का लोगो।

    उसकी आँखों में पानी तैरने लगा। वो खिड़की की तरफ़ चेहरा मोड़कर जल्दी से आँखें पोछने लगी। फिर मुड़कर धीमे से पूछा, “ये किस चीज़ की चाबी है?”

    अद्वैत ने उसकी ओर देखकर सहजता से कहा, “तुम्हारी कार की।”

    रूहानी ने चौंक कर देखा, “मेरी… कार?”

    “हाँ,” अद्वैत ने सिर हिलाया, “रोज़-रोज़ कैब से कितना ट्रैवल करोगी? तुम्हारा बजट और समय दोनों ही ज़्यादा जा रहा है। और फ्यूल की चिंता मत करो, I’ll make sure it’s always full.”

    रूहानी ने धीरे से सिर ना में हिलाया, “पर मुझे तो कार चलाना नहीं आता।”

    अद्वैत ने अपनी आवाज़ को स्थिर रखते हुए कहा, “अगर तुम comfortable हो, तो मैं सिखा दूँगा।”

    वो एक पल था, छोटा, शांत, लेकिन भीतर बहुत कुछ कहता हुआ। दोनों के बीच की अजनबीयत कुछ कम हुई थी, लेकिन उसका वज़न अभी भी मौजूद था।

    पर शायद यही एक शुरुआत थी…. जहाँ दो अनजाने लोग, एक contract marriage की ज़िद और ज़रूरत से परे, इंसान की तरह एक-दूसरे को समझने की शुरुआत कर रहे थे।

    तभी, सड़क पर अचानक तेज़ रोशनी चमकी, और एक तेज़ हॉर्न की आवाज़ से पूरी रात चीख़ उठी… 

    ——————–

    क्या वो तेज़ रोशनी महज़ एक संयोग थी… या किसी आने वाले तूफ़ान की पहली दस्तक?

    उस हॉर्न की चीख़ में छुपा था कोई इत्तिफ़ाक या कोई इरादा?

    क्या रूहानी और अद्वैत के बीच की ये नज़दीकी किसी तीसरे की नज़र में खटकने लगी थी…? 

  • अधूरी इबादत भाग~48

    अधूरी इबादत भाग~48

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    भाग~48 luxury नफ़रत 

     

    स्टूडियो की चमकती लाइट्स अब धीमी पड़ने लगी थीं, जैसे उस शाम का जादू अब धीरे-धीरे स्याही में घुल रहा हो। बच्चे थक चुके थे, रंग फीके पड़ने लगे थे और भीड़ अब बिखरने को तैयार थी। 

    उसी पल, जब मीना के शब्दों ने एक हलचल पैदा की थी, अद्वैत ने एक पल को रूहानी की ओर देखा। उसके चेहरे पर चिंता थी, लेकिन उसकी आवाज़ शांत रही, एकदम स्थिर।

    “मैं खुद छोड़कर आता हूँ मीना और बच्चों को। रात हो चुकी है, बस थोड़ी ही देर लगेगी,” अद्वैत ने धीमे मगर दृढ़ स्वर में कहा।

    रूहानी ने उसकी आँखों में देखा, कुछ पल को ठहरी रही। 

    “ठीक है,” बस इतना ही कहा उसने। 

    अद्वैत बच्चों के साथ बाहर निकल गया और जैसे ही दरवाज़ा बंद हुआ, कमरे की हवा बदल गई। 

    माहौल में एक अजीब सी बेचैनी तैरने लगी, जो अब तक किसी कोने में दबे चुपचाप सांस ले रही थी।

    काम्या ने ज़रा भी देर नहीं की, रूहानी को वो सब कहने की , जो वो कब से अपने अंदर दबायी हुयी थी। 

    उसका लहजा तेज़ था, आंखों में वही ताना मारने वाली चमक, “वाह रूहानी, वाह। एकांश नहीं मिला तो उसके बड़े भाई को ही फंसा लिया तुमने? अब समझ आया तुम्हारी comeback story का असली twist।”

    रूहानी के भीतर काम्या के हर शब्द से एक तीखी जलन उठ रही थी…. जैसे किसी ने जानबूझकर उसके सबसे गहरे ज़ख्म को छू लिया हो। उसे समझ नहीं आ रहा था कि काम्या की दुश्मनी इतनी पुरानी और ज़हरीली क्यों थी, जबकि रूहानी ने कभी उसे कुछ बुरा कहा या किया नहीं था। 

    रूहानी को जितना याद था, वो कभी काम्या से नहीं उलझी। ऐसा लगता है जैसे कल की ही तो बात हो जब वो काम्या से पहली बार मिली थी……

    flashback 

    रूहानी India Fashion Week के competition के semi-final में पहुँच चुकी थी। 

    वो hall white noise से भरा था….. हाथों में fabric के टुकड़े, मशीनों की गूंज और vision boards पर टिके सपनों की हलचल। Designers की दुनिया की वो खामोश चीख, जो हर sketch के पीछे होती है। 

    और उसी भीड़ में, पहली बार… 

    वो आई।

    न कोई grand entry… न drama… लेकिन उसकी मौजूदगी वैसी थी जैसे किसी ने हल्के से नज़र फेरकर भी कमरे की gravity बदल दी हो।

    पहले सिर्फ आवाज़ आई…. किसी volunteer से कुछ specific demand करती हुई। आवाज़ में एक किस्म की थकान भी थी और ताक़त भी।

    “Excuse me, मैं चाहती हूं कि मेरी mannequin exact 5’8 की हो। Long torso. And please, no cheap satin.”

    रूहानी ने अनजाने ही उस दिशा में देखा।

    वहाँ एक लड़की खड़ी थी….. sleek black ponytail में हर बाल discipline में, उसके चेहरे पर minimal makeup, लेकिन dark eyeliner जैसे उसकी आँखों की नीयत पर spotlight डाल रहा हो। 

    उसके चेहरे पर दिख रही परिपक्वता की गहरी रेखाएँ और आँखों में एक अनुभवी चमक साफ़ बता रही थी कि वो रूहानी और एकांश से कहीं ज़्यादा दुनिया देख चुकी थी।

    Branded sneakers, high-waisted pants और एक ivory crop blazer…. ऐसा लग रहा था मानो उसने ये साबित करने की कसम खाई हो कि elegance loud नहीं होता।

    लेकिन सबसे पहले जो महसूस हुआ….. वो था उसकी परफ्यूम की खुशबू।

    हल्का musky, मगर lingering…. जैसे कोई राज़ जो उसकी skin से लिपटा हो। ये किसी आम परफ्यूम की खुशबू नहीं थी, बल्कि किसी एक्सक्लूसिव फ्रेंच परफ्यूमरी से निकली वो खास महक थी जो सिर्फ समझदार और ऊँचे तबके के लोगों की पसंद होती है…. हल्की, लेकिन अपनी मौजूदगी का एहसास कराने वाली और देर तक ठहरने वाली।

    एकांश उसी वक़्त, एक angle से shot लेने के लिए camera adjust कर रहा था और काम्या ने, शायद उसी moment में, पलटकर उसे देखा।

    दोनों में से किसी ने अपनी नज़र एक दूसरे से नहीं हटाई क्यूंकि उसकी नज़र ने तो जैसे एकांश को ठहरने पर मजबूर कर दिया।

    काम्या मुस्कुराई…… वैसी मुस्कान जो सामने वाले की confident back को थामे हुए spine में एक ठंडी लहर छोड़ जाए।

    रूहानी ने उसकी नज़र को, उसकी मुस्कान को चुपचाप देखा। फिर एकांश को भी….. 

    किसी ने कुछ नहीं कहा था उस वक़्त। लेकिन हालात ने बहुत कुछ कह दिया था।

    रूहानी के भीतर एक अजीब-सी बेचैनी उठने लगी थी, जैसे एक अनकही चुनौती उसके सामने आकर खड़ी हो गई हो। 

    flashback end 

    रूहानी ने एक सांस ली, ठंडी और धीमी, फिर पूरे होश में पलटी। उसकी आँखें अब नर्म नहीं थीं, वो अब किसी artist की नहीं, एक जले हुए मन की लग रही थीं।

    “जिसे जो आता है, वो अगले के लिए भी वैसा ही सोचता है। तुम्हें छल करना आता है, तो तुम हर औरत में वही ढूँढ़ती हो। लेकिन अफ़सोस… मैं तुम्हारी दुनिया की नहीं हूँ।” 

    काम्या ने भी कहा, “रूहानी तुम हो क्या….. only an emotional fool loser” 

    “Enough, Kamyaa,” एकांश ने कड़वी आवाज़ में कहा, “ये सही वक्त नहीं है, इन सब बातो का”

    “तो कब होगा सही वक्त?” काम्या अब सह नहीं पा रही थी। उसकी आँखों में एक ऐसा डर था जिसे वो गुस्से की आग में छिपा रही थी। 

    “जब तुम फिर से अपनी पुरानी मोहब्बत को दोबारा अपनी ज़िंदगी में वापस ले आओगे?…. तब”

    एकांश कुछ कहने ही वाला था कि रूहानी उसकी ओर मुड़ी, आँखों में ज्वाला थी, पर आवाज़ एकदम ठंडी। 

    “Mr. and Mrs. Rathore… oh sorry, Mrs. Kamya Raina,” उसने हर शब्द को नफासत से काटा, “इस गलतफहमी में मत रहना कि रूहानी अब कभी किसी धोखेबाज़ के पास वापस लौट कर जाएगी।”

    इतना कहकर वह मुड़ गई, उसकी चाल तेज़ थी, पर आँखों के किनारे गीले थे।

    काम्या चुपचाप एकांश की तरफ मुड़ी। उसकी हँसी अब सच्ची नहीं थी, बस तेज़ थी।

    “देख लिया ना तुमने?” वो बोली, “She moved on… and you still…” 

    वो वाक्य अधूरा रह गया। लेकिन उसकी गूंज देर तक स्टूडियो की दीवारों से टकराती रही… जैसे कोई पुरानी धुन, जो खत्म तो हो गई हो, मगर दिल से उतरने का नाम न ले।

    °°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°

    कमरे की हवा ठहर गई थी। रूहानी अपने नए स्टूडियो के एक रिहर्सल रूम में बैठी, अतीत के पन्ने पलट रही थी। चांदनी रात में अपनी ख़ामोशी में……

    तभी, पीछे से एकांश आया, कुछ बात करने के लिए। एकांश की आँखों में कोई साया था…. गुज़रे वक़्त का, अधूरी बातों का और उस खामोश इल्ज़ाम का, जो अब भी रूहानी की नज़रों में झलकता था। 

    उसने धीरे से कहा, “क्या अब भी मुझसे नफरत करती हो?”

    रूहानी ने गहरी साँस ली, पलकों को बंद किया जैसे कोई बहुत पुराना ज़ख्म फिर से धड़क उठा हो। 

    “नफरत एक luxury होती है” उसकी आवाज़ बिल्कुल सपाट थी, “जिसे वही अफ़ोर्ड कर सकता है जिसे मोहब्बत से फुर्सत हो। मैं उस level से निकल चुकी हूँ।”

    एकांश की नज़रें जैसे नीचे गिर गईं…. जैसे वो खुद से ही शर्मिंदा हो। लेकिन उसने अँधेरे में एक तीर मारा, “तुम जानती हो न की तुम झूठ नहीं बोल पाती हो”

    रूहानी की नज़रों में न कोई ग़ुस्सा था, न ही दर्द। बस एक अजीब-सी शांति थी, जैसे वो उस तकलीफ़ से ऊपर उठ चुकी हो।

    “और तुम मुझे नहीं जानते सही से….. मैं बहुत आगे निकल आई हूँ,” उसने कहा, “अब वापसी का कोई रास्ता भी नहीं बचा।”

    एकांश की आवाज़ में अब एक काँपती हुई जिज्ञासा थी, “तो फिर उस दिन… जब मैं भाई के घर आया और तुम मुझे देखकर बेहोश हो गई थी… वो क्या था, रूहानी?”

    वो जवाब देने ही वाली थी कि तभी बाहर से एक आवाज़ आई. …. खटाक ….. क्योंकि रूम में हल्का अँधेरा था और गलती से किसी स्टाफ ने बाहर से दरवाज़ा बंद कर दिया था। 

    अब रूहानी और एकांश उस रूम में आमने-सामने रह गए थे….. एक बंद दरवाज़े के भीतर, जहाँ बाहर की कोई आवाज़ नहीं पहुँच सकती थी।

    रूहानी की सांसे उलझने लगी, वो दौड़कर दरवाजे तक पहुंची लेकिन आसपास कोई नहीं था , उसने आवाज़ भी लगायी पर कोई नहीं सुना। 

    एकांश धीरे धीरे उसके पास आ रहा था ….. 

    तभी बाहर थोड़ी दूर से काम्या की आवाज़ आई, “एकांश! कहाँ हो sweetheart?”

    ————-

    क्या रूहानी की साँसों की ये उलझन, सिर्फ एक बंद कमरे की घुटन थी… या फिर अतीत की कोई अधूरी दस्तक?

    क्या ये महज़ इत्तिफ़ाक था कि दरवाज़ा बंद हो गया… या कोई चाहता था कि ये दो छायाएँ फिर आमने-सामने आएँ… एक आख़िरी बार?

    अब जब बाहर काम्या की आवाज़ गूँज रही थी… क्या रूहानी उस आवाज़ से भागेगी, या उस सवाल का सामना करेगी जिसे अब तक वो खुद से भी छुपा रही थी? 

     

  • अधूरी इबादत भाग~47

    अधूरी इबादत भाग~47

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    भाग~47 उँगलियाँ जो छू गईं 

     

    दरवाज़े की ओर उठती निगाहें, एक क्षण के लिए जैसे ठहर सी गईं। 

    रूहानी की साँसों में अचानक एक बोझ-सा उतर आया था, जैसे किसी भूले हुए जख्म पर फिर से कोई उंगली रख दी गई हो। 

    लेकिन अद्वैत की आवाज़, शांत, स्थिर और कहीं न कहीं संभालने वाली, ने उस पल को टूटने नहीं दिया।

    “गुनगुन, cake कट करो, सब wait कर रहे हैं।”

    रूहानी ने एक गहरी साँस ली और जैसे किसी अदृश्य धागे ने उसकी आँखों को एकांश से हटा दिया। उसकी नज़र अब फिर से गुनगुन के पास लौट आई, जहाँ मासूमियत और रंगों का जश्न था।

    अद्वैत दूर से सब देख रहा था। वो नज़रें पढ़ना नहीं जानता था, लेकिन उसके भीतर कुछ था जो महसूस कर सकता था और वो साफ़ महसूस कर रहा था कि रूहानी की मुस्कान अब पहले जैसी नहीं रही। 

    उसमें हल्की सी थकान थी, एक अधूरी साँस, जो अभी तक पूरी नहीं हुई थी।

    वो धीरे से उसके पास आकर खड़ा हो गया, एक भी शब्द बिना कहे, बस एक साथ होने की ख़ामोश मौजूदगी।

    मीना ने एकांश और काम्या को भीतर बुलाया, और दोनों बिना किसी झिझक के आकर रूहानी और अद्वैत की दूसरी तरफ खड़े हो गए। 

    एकांश की नज़रें कहीं गहराई से रूहानी को देखने लगीं…. जैसे कोई पुराना सपना अब किसी और की हकीकत बन गया हो।

    गुनगुन ने केक काटा, चीकू ने सबसे पहले उसकी नाक पर क्रीम पोती और सब हँस पड़े…. वो बेपरवाह हँसी, जो थोड़ी देर के लिए हर अजनबीपन को छुपा लेती है।

    लेकिन तभी, स्टाफ एक दूसरा केक ले आया…. सफेद और हल्के lavender icing से सजा हुआ। उस पर लिखा था: “To Stitch & Soul — A Dream Reborn.”

    रूहानी की आँखों में हल्की हैरानी तैर गई। “ये…?”

    अद्वैत झुका, बहुत हल्के से और रूहानी के कान के पास कहा — “यह सिर्फ गुनगुन का दिन नहीं है… आज इस स्टूडियो का भी नया जन्म हुआ है। और ये तो तुम्हारा आइडिया था कि दोनों celebrations एक साथ हों।”

    उसके शब्दों में कोई मोहब्बत का प्रदर्शन नहीं था, न ही कोई dramatic gesture… बस एक समझ थी, और acknowledgment।

    रूहानी की साँस एक पल को रुक गई। उसकी आँखें हल्की सी भीग गईं… एकदम अनकहे और अनजाने से। उसे खुद समझ नहीं आया कि ये खुशी थी, या relief… या शायद कोई ऐसी soft recognition, जो किसी ने बहुत दिन बाद उसे दी थी…. बिना माँगे, बिना शर्त, जैसे उसकी अधूरी इबादत आज मुकम्मल होने को थी। 

    और अद्वेत… वो अब भी उसके पास खड़ा था…. जैसे कोई उधार की गर्माहट हो… जो बिना कहे भी बहुत कुछ दे जाता है।

    रूहानी अब तक उसी केक को देख रही थी… सफेद, नर्म, और उस पर सजी नाज़ुक सी lavender icing की परत जैसे किसी ख्वाब की सतह हो। 

    उसकी आँखों में एक अजीब सी शांति थी, लेकिन भीतर कुछ उलझा हुआ भी। तभी अद्वैत की हथेली ने उसके कंधे को छुआ…. वो छुअन न तो बहुत करीबी थी, न ही पूरी तरह अजनबी।

    “रूहानी, केक काटो… darling,” अद्वैत ने हलकी आवाज़ में कहा, लेकिन उसके आख़िरी शब्द ने जैसे समय को धीमा कर दिया।

    रूहानी की पलकें फड़कीं, उसकी नज़र चौंकते हुए अद्वैत के चेहरे तक पहुँची। वो मुस्कुरा रहा था…. उस तरह की मुस्कान जो भीड़ के बीच दिखाई जाती है, सिर्फ इसलिए कि बाकी सब कुछ ‘सही’ लगे।

    रूहानी ने खुद को संभालते हुए केक काटा। अभी उसने उस छोटे से टुकड़े को अपनी उँगलियों के बीच पकड़ा ही था कि अद्वैत ने बहुत सहजता से उसका हाथ थाम लिया और केक का टुकड़ा खुद के मुँह में डाल लिया।

    वो क्षण… नाज़ुक, अनजाना, और बहुत ज़्यादा निकटता से भरा… रूहानी को पूरी तरह surprise कर गया। उसके अंदर कुछ अकबका गया, जैसे कोई अलार्म बजने लगा हो जिसे सिर्फ वही सुन सकती थी।

    अभी वो कुछ समझती कि अद्वैत ने केक का एक छोटा टुकड़ा फिर से काटा और उसके होठों तक लाकर पूछा, “May I?”

    रूहानी ने अनजाने में सिर हिलाया…. उसकी चेतना अब भी उस टोन की तह तक नहीं पहुँच पाई थी।

    अद्वैत ने अपनी उंगलियों को बेहद संतुलन के साथ उसके होठों के करीब लाया, शायद इस कोशिश में कि कहीं भी touch न हो….

    लेकिन वो corner, वो millisecond…. जब उसकी उंगलियाँ रूहानी के होंठों से हल्का सा छू गईं, सब कुछ बदल गया।

    रूहानी का चेहरा एकदम कड़क हो गया। वो तुरंत एक कदम पीछे हटी, और खुद को संभालते हुए स्टाफ से बोली, “Cake सबको distribute कर दो।”

    वो बोल रही थी, लेकिन उसकी आवाज़ में एक किस्म की घबराहट थी। जैसे कुछ छू गया था…. कोई भूला हुआ जज़्बा या कोई बंधा हुआ डर।

    अद्वैत वही खड़ा रहा, बिना कोई प्रतिक्रिया दिए। लेकिन उसके भीतर कुछ खिंच गया था। वो जानता था, उनका रिश्ता कोई फिल्मी मोहब्बत नहीं था…. ये एक समझौता था, काग़ज़ पर लिखा हुआ। 

    लेकिन जब उसकी उंगलियाँ रूहानी के होंठों से छू गईं और उसने उसकी पलकों की थरथराहट देखी…. तो उसे पहली बार महसूस हुआ कि कुछ है… कोई अनकहा स्पेस, जो दोनों के बीच मौजूद तो है, पर परखा नहीं गया।

    उसके होठों की मुस्कान अब पहले जैसी नहीं थी…. उसमें एक बेचैनी थी। और आँखों में… शायद एक सवाल… क्या मैंने हद पार कर दी?

    एकांश की आँखों के कोने में कुछ सिकुड़ गया था, जैसे वहाँ कोई अनकहा धुआँ जमा हो रहा हो, लेकिन चेहरा अब भी उतना ही शांत….. उतना ही सधा हुआ। 

    वो हर छोटी हरकत देख रहा था… अद्वैत की उँगलियों का रूहानी के हाथों के पास रुकना, रूहानी की हल्की झिझक, फिर वो केक वाला पल… 

    काम्या उसके पास खड़ी थी, लेकिन एकांश के अंदर कुछ और चल रहा था…. एक सन्नाटा, जो बाहर की रौशनी में भी ठंडा था।

    तभी काम्या मुस्कुराती हुई आगे बढ़ी, “Beautiful studio,” उसके लहज़े में शहद था, मगर नीचे छुपा हुआ कोई काँटा भी।

    रूहानी ने सिर्फ मुस्कराकर सर हिलाया, लेकिन उसकी पलकों के नीचे हल्की थकान थी। काम्या की आँखों में कुछ था…. शायद एक मीठा जहर।

    “मैंने expect नहीं किया था कि तुम फिर से अपना नया studio खोलने का भी सोचोगी,” काम्या ने कहा, आँखें रूहानी की ड्रेस से लेकर उसके चेहरे तक दौड़ती रहीं, “…well, तुमने शादी भी कर ली — ये जानकर ज़्यादा हैरानी हुई मुझे।”

    अद्वैत वहीं पास खड़ा था। उसका चेहरा अब थोड़ा सख़्त हुआ, लेकिन आवाज़ अब भी ठंडी और संतुलित रही।

    “Congratulate करने का तुम्हारा तरीका थोड़ा casual नहीं है क्या?”

    काम्या ने हँसते हुए कहा, “Oh sorry, Adwait, I forget that.”

    फिर वो मुड़ी, एकांश अब तक पीछे खड़ा था, उसकी चुप्पी अब तक सबसे ज़्यादा मुखर थी। काम्या ने उसका हाथ पकड़कर उसे आगे लाया, “चलो, Ruhani का gift साथ में देते हैं।”

    एकांश ने थोड़ा रुककर gift box आगे बढ़ाया… सुनहरे wrapping में बंधा….।

    लेकिन उससे पहले कि वो रूहानी की ओर पहुँच पाता, अद्वैत ने झटके से वो gift अपने हाथों में ले लिया, और ठहरे हुए लहज़े में कहा, “Ruhani के special event पर सबसे पहला gift तो मुझे देना चाहिए, ना?”

    एक क्षण के लिए एकांश की उंगलियाँ हवा में ठहर गईं…. जैसे किसी ने उस पर से कोई हक़ खींच लिया हो।

    काम्या ने एक नकली हँसी के साथ, अपनी नज़रों को घुमाते हुए कहा, “Yes, of course…”

    माहौल में अब रौशनी कम और चुप्पियाँ ज़्यादा थीं। fairy lights की धीमी टिमटिमाहट के बीच, रूहानी की नज़र एक पल को तीन चेहरों पर ठहर गई…. 

    एक वर्तमान में खड़ा अद्वैत, जो अभी भी अजनबी लगता था; 

    एक अतीत से लौटे हुए एकांश, जिसकी आंखों में अब भी वो अधूरापन था; 

    और काम्या, जो सबकी नज़रों में बेनक़ाब थी, रूहानी के लिए अब भी एक ऐसा नाम थी जिसमें साज़िशें छुपी थीं; क्योंकि उसने कभी भी रूहानी के लिए दिल से कुछ अच्छा नहीं चाहा था। 

    रूहानी का गला सूख गया। उसने नज़रें फेर लीं, लेकिन दिल में कुछ भारी सा अटक गया।

    तभी मीना तेज़ क़दमों से अद्वैत के पास आई, और घबराई हुई आवाज़ में बोली, “Sir, मुझे अभी घर लौटना होगा… गुनगुन और चीकू के पापा की तबियत अचानक बहुत बिगड़ गई है।”

    अद्वैत ने चौंककर उसे देखा।

    ———————-

    मीना की इस अचानक खबर का सच, सिर्फ बीमारी था… या कुछ और भी था जो छुपाया जा रहा था?

    एकांश की उंगलियाँ जो हवा में रुक गई थीं…. क्या वो सिर्फ एक gift से दूर हुई थीं, या किसी पुराने हक़ से भी?

    रूहानी… क्या वो वाक़ई अद्वैत की ‘darling’ बन चुकी थी, या ये बस एक नाम था, एक मुखौटा… किसी और नाम को छुपाने के लिए?

     

  • अधूरी इबादत भाग~46

    अधूरी इबादत भाग~46

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    भाग~46 वो थी… वो है… 

     

    काम्या रैना अपने कमरे में आई तो दरवाज़ा बंद करते ही जैसे उसके अंदर की तमाम आवाज़ें गूँजने लगीं। उसका दिल तेज़ धड़क रहा था, पर चेहरा अब भी ठंडा, सख्त और संजीदा था…. जैसे कोई मलबे के नीचे दबे सच को पहचान गया हो।

    उसने मोबाइल उठाया, तेज़ी से Instagram खोला, वो लगभग भूल ही चुकी थी कि रूहानी कब से गायब थी सोशल मीडिया से। 

    लेकिन आज, उसने रूहानी के तीन-तीन नए पोस्ट देखे। पहली पोस्ट, जो कुछ एक हफ्ते पहले ली गई थी, किसी जमे हुए वक़्त का दरवाज़ा खोल रही थी…..

    Chapter 1 – Rebuilding Ruins #RuhaniReturns

    तस्वीरें थीं, रूहानी के पुराने स्टूडियो की….. धूल से भरी खिड़कियाँ, टूटे मनीक्विन्स, बिखरे स्केच, और एक शांत-सी रूहानी, खड़ी हुई अपने खंडहरों के बीच। 

    काम्या ने उस तस्वीर को ज़ूम करके देखा। रूहानी की आँखों में डर नहीं था, दर्द था, मगर उस दर्द में भी एक तरह की शांति थी…. जैसे किसी ने खुद को माफ़ कर दिया हो।

    दूसरी पोस्ट ने जैसे काम्या की साँसें रोक दीं। 

    Chapter 2 – Her Comeback is Her Voice. #RuhaniReturns 

    रूहानी के नए स्टूडियो की झलक, minimalist décor, dreamy pastels, mood boards से भरी दीवारें और बीच में खड़ी थी रूहानी, एक मजबूत औरत के रूप में, जो अपने हाथों से खुद को फिर से गढ़ चुकी थी। 

    रूहानी की आँखें अब पहले जैसी नहीं लग रही थीं, उनमें कोई डर या दुःख नहीं था, बल्कि चुनौती थी, खुद से भी और दुनिया से भी।

    तीसरी पोस्ट, जैसे एक तीर की तरह सीधा काम्या के दिल को चीर गया। 

    एक डिजिटल इनविटेशन, Grand Opening of Ruhani Studio – This Friday, 6 PM। 

    उसी फॉन्ट में, उसी लाल और सुनहरे रंग के कॉम्बिनेशन में, जैसा रूहानी अपने पुराने दिनों में डिज़ाइन किया करती थी।

    काम्या ने फोन को एकटक घूरा। फिर उसे लगा जैसे उसकी साँस रुक गई हो। 

    एक गुस्से की लहर उसके अंदर दौड़ी, पर वो गुस्सा सिर्फ रूहानी पर नहीं था। वो अपने आप पर भी थी… 

    उसने कैसे समझ लिया था कि रूहानी अगर उस दिन टूटी थी तो फिर कभी जुड़ेगी नहीं….. 

    कैसे मान लिया था कि एक औरत जिसे उसकी ज़िन्दगी का सबसे बड़ा धोखा मिला था, वो फिर कभी नहीं उठ पाएगी।

    “Unbelievable…” काम्या के होंठों से निकला, पर वो शब्द सिर्फ तंज नहीं था, वो एक डर था… एक ऐसा डर जो किसी अतीत से उठी राख से फिर जलने वाले शोले को देखकर पैदा होता है।

    उसने खुद को आईने में देखा। 

    “She’s back… and this time, it’s not just about designs. It’s war.”

    उसके चेहरे की रंगत अब तेज़ थी। गालों पर हल्की सी जलन, माथे की नसें तन गईं थीं। 

    उसने फोन उठाया, किसी को कॉल करने के लिए…. शायद अपनी टीम को, शायद अपने PR को…. मगर उंगलियाँ ठिठक गईं।

    क्योंकि कहीं ना कहीं, काम्या जानती थी, कि जो जंग वो अब देख रही थी… उसमें रूहानी सिर्फ एक फाइटर नहीं थी। वो खुद को फिर से लिख रही थी, एक ऐसी किताब की तरह जिसे काम्या ने अधूरा समझकर बंद कर दिया था।

    और काम्या… उसे ये कतई मंजूर नहीं था। रूहानी को वापसी करते हुए देखना, फिर से….. उसकी आंखों के सामने, उसी शहर में… और शायद, उसी एकांश के दिल में एक बार फिर से जगह बनाते हुए।

    काम्या की आँखों में उस वक़्त एक अजीब सी दहशत थी…. जैसे किसी ने उसकी आत्मा के भीतर उतरकर वहाँ कुछ ऐसा बो दिया हो जो वो चाहकर भी उखाड़ नहीं सकती। 

    एकांश की जुबां से रूहानी का नाम सुनकर और उस एक नाम के पीछे की सारी भावनाएँ देखकर, काम्या के भीतर की सारी दीवारें ढह चुकी थीं। उसका आत्मविश्वास, जो सालों की मेहनत से गढ़ा गया था, पहली बार चटक गया था।

    रूहानी का अस्तित्व अब उसके लिए सिर्फ एक बीती कहानी नहीं, एक ज़िंदा चुनौती बन चुका था। वह डर गई थी…. नहीं, डर से भी कहीं गहरी कोई अनुभूति थी ये, जैसे किसी को खोने से पहले ही उसकी छाया से जलन होना।

    और उस डर में डूबी काम्या ने बिना एक पल गंवाए रूहानी को मैसेज कर दिया — “तुम मुझसे एकांश को कभी नहीं छीन सकती। वो मेरा था… और हमेशा रहेगा।”

    उसके अंदर एक बेचैनी थी, एक अंधा आवेग जो उसे चैन से बैठने नहीं दे रहा था। 

    वह तेज़ी से हॉल की ओर गई, जहाँ एकांश को देखने की बेचैनी ने उसे घेर लिया था। पर जो देखा, वो अप्रत्याशित था।

    एकांश ज़मीन पर था, सोफे से गिरा हुआ, पीठ सीधी फर्श से लगी और आँखें छत की तरफ स्थिर…. बिना पलक झपकाए। जैसे वक़्त थम गया हो उसके लिए, या जैसे कोई अदृश्य भार हो, जो उसे उठने नहीं दे रहा।

    काम्या का दिल काँप उठा। उसके होंठों से कोई आवाज़ नहीं निकली, बस कदम तेज़ी से भागे और वो एकांश के पास जा पहुँची।

    घुटनों के बल बैठकर उसने एकांश को अपनी गोद में उठाया और उसके चेहरे को दोनों हथेलियों में थामकर काँपती आवाज़ में कहा— “मेरे प्यार में ऐसी कौन सी कमी रह गई है, एकांश? मैं क्या भर नहीं पाई? मैं हर उस रूप में खुद को ढालती रही हूँ जैसी तुम्हें चाहिए थी। रूहानी… रूहानी मेरे सामने कुछ भी नहीं है। ना नाम में, ना चेहरे में, ना शोहरत में।”

    एकांश ने उसकी आँखों में देखा। उसमें आँसू नहीं थे, मगर कुछ था….. एक थकावट, एक शिकस्त, और एक गूंगी चीख़ जो शायद सालों से अंदर दब रही थी।

    काम्या ने उसे सीने से लगा लिया, जैसे किसी टूटी हुई चीज़ को समेटना चाहती हो। एकांश की साँसें थोड़ी देर में स्थिर हो गईं, और तभी काम्या ने उसके चेहरे पर हल्के-हल्के चुम्बनों की बौछार शुरू कर दी…. कपोलों पर, माथे पर, पलकों के पास। उसका हर स्पर्श इस बात का गवाह था कि वो किसी और को वहाँ जगह नहीं लेने देगी।

    और फिर, वहीं हॉल में, उनके बीच की दूरी सिमटने लगी। वो एक दुस्स्वप्न से जागे प्रेमियों की तरह एक-दूसरे में शरण लेने लगे….. बिना कहे, बिना समझाए, बस उस क्षण को थामे हुए, जिसे शब्दों में बाँधा नहीं जा सकता।

    रात के सन्नाटे में जब दोनों अपने कमरे के बिस्तर पर थे, तब एकांश गहरी नींद में खो गया था। लेकिन काम्या… अब भी जाग रही थी।

    वो एकांश के बालों में अपनी उंगलियाँ फेर रही थी, बड़े सलीके से, जैसे किसी टूटे हुए विश्वास को सहेज रही हो। उसकी आँखों में कोई आँसू नहीं था, बस एक निश्चय था….. एक ठंडी आग जो धीमे-धीमे उसकी आत्मा में जल रही थी।

    उसने मन ही मन खुद से वादा किया, “अब चाहे जो करना पड़े… मैं करूँगी। लेकिन एकांश के लबों पर दोबारा ‘रूहानी’ का नाम नहीं आने दूँगी।”

    कमरे में गहरी नींद की एक परत थी, पर काम्या के भीतर अब एक नई रात जाग चुकी थी… एक ऐसी रात, जो शायद अब कभी सुबह होने नहीं देगी।

    °°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°

    एकांश की आंखें जैसे किसी पुराने ख्वाब के जमे हुए कांच को तोड़ रही थीं। 

    “Stitch & Soul” का बोर्ड देखते ही उसके सीने में एक अजीब सी कसक उठी थी, मगर उसने खुद को संभाल लिया था। 

    पर अब, जैसे ही दरवाज़े की दहलीज़ पार की, हवा में तैरती वही जानी-पहचानी खुशबू…. वो हल्की सी सैंडलवुड की परफ्यूम, जो रूहानी हमेशा लगाती थी…. उसकी सांसों में समा गई।

    उसके कदम थम गए। सामने, रंग-बिरंगी fairy lights के बीच, pastel shades में सजे हॉल के बीचोंबीच रूहानी खड़ी थी। उसके चेहरे पर सुकून और एक artist जैसी शांति थी।

    एकांश की आँखें फटी की फटी रह गईं। उसकी उंगलियां अनायास सिहर उठीं।

    “रूहानी?” उसने लगभग फुसफुसाते हुए खुद से कहा, जैसे किसी भूली हुई धुन को फिर से सुन लिया हो।

    उसी क्षण, उसके बाजू में खड़ी काम्या ने अपना हाथ कसकर उसकी बांह में डाल दिया और तीखी मुस्कान के साथ कहा, “हमें नहीं बुलाया गया इस खास इवेंट में?”

    उसकी आवाज़ में मिठास कम और चुनौती ज़्यादा थी।

    ———————–

    क्या एकांश की साँसें वाकई थम गई थीं… या बस वक़्त ने कुछ कहने से पहले उसे रोक लिया था?

    क्या रूहानी की वापसी सिर्फ़ एक स्टूडियो की शुरुआत थी… या किसी अधूरे हिसाब का इशारा?

    काम्या की मुस्कान के पीछे जो चुप्पी थी, क्या वो किसी तूफ़ान का इंतज़ार था?

  • अधूरी इबादत भाग~45

    अधूरी इबादत भाग~45

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    भाग ~45 रूहानी, सब ठीक है?

     

    कमरे की नीली रौशनी में, मोबाइल अब भी कान से सटा था। रूहानी की आँखें उस जली हुई स्केच की राख पर टिकी थीं, जैसे उस राख में से एक आवाज़ उठ रही हो… एकांश की। 

    कॉल अब भी चालू था, पर दोनों तरफ़ खामोशी पसरी हुई थी। एक बेचैन, धड़कनों से भरी खामोशी।

    फिर… एक गहरी साँस की आवाज़ आई दूसरी ओर से।

    “रूहानी…” आवाज़ टूटी हुई थी, जैसे किसी ने बरसों से दबे ज़ख्म को फिर से छुआ हो।

    रूहानी की आँखें भीगने लगीं, पर आवाज़ में कोई कंपन नहीं आया। वो जानती थी, वो एक शब्द… सिर्फ एक … उसे फिर उसी दलदल में घसीट सकता था, जहाँ से उसने खुद को बड़ी मुश्किल से खींचा था।

    और तभी…&

    रूहानी के बंद दरवाज़े के उस पार से एक और आवाज़ आई। भारी, स्थिर, लेकिन एकदम साफ़। 

    ‘रूहानी, सब ठीक है?’ अद्वैत की ज़ोर से, जिसे एकांश ने भी साफ़-साफ़ सुना।`

    उसकी आवाज़ सुनते ही रूहानी जैसे एकदम यथार्थ में लौट आई। दिल में अचानक एक अजीब सी सरसराहट उठी। 

    फोन के उस छोर पर एकांश का दिल ज़ोर से धड़क उठा।_

    उसने अपने गले को साफ़ किया, जैसे कुछ कहने वाला हो…. कुछ पूछने….. पर रूहानी की आवाज़ उससे पहले आई।

    थोड़ी धीमी, पर पत्थर सी सख्त।

    “अब कभी मत कॉल करना, एकांश। “मैं तुम्हें कभी माफ़ नहीं करने वाली।”

    और बिना किसी और शब्द, बिना किसी झिझक के, उसने कॉल काट दिया।

    दूसरी ओर, एकांश का हाथ अब भी हवा में था। स्क्रीन पर “Call Ended” लिखा चमक रहा था…. जैसे किसी फैसले की मुहर लग गई हो।

    वो धीमे से सोफे पर से गिर पड़ा। पीठ फर्श से टकराई और उसकी आँखें टकटकी लगाए छत को देखने लगीं।

    उसके अंदर कुछ सचमुच टूट गया था….. पहली बार।

    °°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°

    रूहानी ने दरवाज़ा खोला। उसके चेहरे पर एक थकी हुई उदासी की परत साफ़ दिख रही थी, फिर भी उसने होठों पर एक भिनी, बनावटी मुस्कान थमी हुई थी…. मानो उस कभी न भूले गए दर्द को अब भी सज़ा के रखा हो, जैसे वो टीस अब उसकी पहचान बन गई हो। 

    उसकी नज़र सीधी जाकर अद्वैत की आँखों से टकराई, जो दरवाज़े पर खड़ा था। उसकी आँखों में चिंता थी, पर आवाज़ बेहद नर्म थी।

    “क्या हुआ रूहानी… मैं बस पानी लेने आया था… लेकिन तुम्हारे कमरे से कुछ जलने की गंध आ रही है। तुम ठीक तो हो ना? कुछ हुआ तो नहीं?”

    रूहानी ने एक लंबी साँस ली, जैसे अंदर कुछ भारी था जिसे वो शब्दों में हल्का करना चाहती थी। उसका लहजा थका हुआ, मगर बेहद शालीन था। “तुम्हें अपने ही घर में मेरी वजह से परेशानी हुई… इसके लिए I’m really sorry…”

    वो पल भर को रुकी, फिर निगाहें झुकाकर बोली, “कुछ ख़ास नहीं था… कुछ बेकार, पुराने sketches थे। जिनकी अब कोई ज़रूरत नहीं रही… वही जल रहे थे… जिसकी smell तुम्हें आ गई होगी।”

    अद्वैत वहीं दरवाज़े पर खड़ा था, पर उसकी आँखें बार-बार कमरे के भीतर झाँक रही थीं। वहाँ एक हल्की रोशनी थी, जलते कागज़ की लपटें धीमी लय में हिल रही थीं, जैसे हर चित्र अपने अंदर कोई चीख़ लिए जा रहा हो। तभी उसकी नज़र उस अधजले sketch पर पड़ी… जिसमें रूहानी ने एकांश का चेहरा बनाया था।

    वो पल अचानक खिंच गया। हवा भारी हो गई। अद्वैत की साँसें धीमी पड़ गईं, और उसकी निगाह उस चेहरे से हट नहीं रही थी…. वो चेहरा जो अब रूहानी के अतीत की राख बन चुका था।

    रूहानी ने उसकी चुप्पी भांप ली। उसकी आवाज़ में कोई उलाहना नहीं था, सिर्फ एक शांत सवाल: 

    “कोई और बात भी है क्या, अद्वैत?”

    अद्वैत जैसे किसी गहरे ख्याल से बाहर निकला, हल्का मुस्कुराया, “नहीं… नहीं, और कुछ नहीं। Good night.

    और जैसे ही वो आगे बढ़ा, रूहानी ने दरवाज़ा बिना एक पल गंवाए बंद कर लिया, जैसे अब किसी और सवाल 

    लिए कोई जगह न हो।

    उधर, अद्वैत सीढ़ियाँ चढ़ते-चढ़ते बार-बार उसी जलते हुए sketch के बारे में सोच रहा था। वो चेहरा, वो आग की लपटों में लिपटा एकांश… उसका सौतेला छोटा भाई।

    रूहानी एकांश को कैसे जानती है? और अगर जानती है, तो अब उसके चेहरे को आग के हवाले क्यों कर रही है?

    उसका हर क़दम अब किसी पुराने रहस्य के बोझ तले दबता जा रहा था… और दिल के किसी कोने में, एक अनजानी बेचैनी करवटें लेने लगी थी।

    °°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°

    दोपहर से ही रूहानी, अद्वैत, मीना और इवेंट प्लानर की टीम “Stitch & Soul” के स्टूडियो में जैसे अपनी सांसें बुन रही थी… हर टांका, हर मोड़, एक नए सफ़र का हिस्सा बनता जा रहा था। 

    ये सिर्फ एक स्टूडियो की ओपनिंग नहीं थी, ये एक दिल का दोबारा धड़कना था… और साथ ही मीना की 11-12 साल की बेटी गुनगुन का जन्मदिन भी।

    थीम थी…. Canvas of Dreams।

    स्टूडियो की हर दीवार पर नए सपनों की ख़ामोश दस्तक थी। फेयरी लाइट्स दीवारों से लिपटी थीं, जैसे किसी जादुई जंगल में चमकते जुगनू। छत से लटकते छोटे-छोटे origami stars और butterflies हवा में डोल रहे थे, मानो बच्चों के ख्वाबों ने कोई आकार ले लिया हो।

    हर बच्चे को जैसे ही रंग-ब्रश और छोटा सा कैनवस थमाया गया, उनकी आँखें चमक उठीं।

     रूहानी ने कहा, “जो भी ख्वाब देखो… उसे यहाँ उतार दो। कोई नियम नहीं है…. सिर्फ इमेजिनेशन।”

    गुनगुन ने pastel-colored gown पहना हुआ था, जो रूहानी ने खुद डिजाइन किया था…. वो फ्रॉक जैसे मीना की याद में गूंथा हुआ हो। उसमें लाल और सुनहरे रंग की कलियाँ थीं, चुनरी एकदम हल्की और मोतियों की बारिश जैसी। उसके बालों में छोटे-छोटे सफेद फूल सजे थे, और माथे पर एक नन्हीं सी रंगीन बिंदी — बिल्कुल कहानी की परी की तरह। वो जैसे हल्के पाँव ज़मीन पर उड़ती आ रही हो, और हँसी उसकी सबसे प्यारी जादू की छड़ी हो।

    मीना के चेहरे पर एक अलग ही सुकून था। उसे शायद यकीन नहीं हो रहा था कि उसकी बेटी आज इस महफिल की centerpiece है।

    किचन के कोने में सजे थे cupcakes — हर एक पर एक अलग रंग का दिल। छोटे से rainbow cake पर बड़े प्यार से लिखा था: “To Gungun, with all the colors of the world.”

    रूहानी ने गुनगुन को एक sketchbook दी थी, उसके पहले पन्ने पर लिखा, “हर रंग तुम्हारा अपना है… दुनिया से छिपाना मत।”

    अद्वैत एक कोने में खड़ा था, लेकिन उसके भीतर कुछ बह रहा था। उसकी नज़रें बार-बार रूहानी की तरफ लौट जातीं। वो वहाँ मेहमान की तरह खड़ा था, पर महसूस कुछ और कर रहा था…. जैसे किसी पुराने संगीत के टुकड़े को फिर से सुनना, जिसे कभी दिल ने बारीकी से सीखा था।

    रूहानी की आँखों में अब softness थी, पर वो softness कमज़ोरी नहीं थी वो वो ताक़त थी जो सिर्फ टूटकर संभलने वालों को मिलती है।

    cake-cutting की तैयारी हो चुकी थी। मैं cake के पास आई, वो बीच में खड़ी थी, बाईं ओर मीना, दाईं ओर उसका भाई चीकू। पास में अद्वैत और रूहानी, दोनों के चेहरों पर हल्की सी मुस्कान। *

    रूहानी ने हाथ में lighter लिया, मोमबत्तियाँ  कि…..

    दरवाज़े के पास से एक जानी-पहचानी आई,  नहीं बुलाया गया इस खास इवेंट में?”

    रूहानी का हाथ रुक गया। मोमबत्तियों की लौ काँपी। Adwait ने पीछे मुड़कर देखा, और उसकी भौंहें सिकुड़ गईं।

    दरवाज़े पर कोई था, जिसे सबने कहीं न कहीं दफ़न कर दिया था… लेकिन वो आज लौट आया था… जैसे7 अधूरी स्केच की परछाई अचानक कैनवस के बीच उतर आए।

    ——————

    क्या वाक़ई रूहानी ने अतीत को जलाकर ख़त्म कर दिया था… या वो राख किसी नई आग की शुरुआत थी?

    जिसे सबने दफ़न कर दिया था, वो दरवाज़े पर क्यों लौट आया था? क्या वो बस एक परछाई था… या कोई ऐसा सच जो अब सामने आना ही था?

    क्या गुनगुन के जन्मदिन की ये रंगीन शाम किसी और की काली रात में बदलने वाली थी?

     

  • अधूरी इबादत भाग~44

    अधूरी इबादत भाग~44

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    भाग~44 सुलगते स्केच

     

    रूहानी ने रात के खाने के बाद मीना को फ़ोन किया। मीना से उसने अपनी बात बड़ी ही आत्मीयता से साझा की कि वह चाहती है कि मीना की बेटी का जन्मदिन उसके नए स्टूडियो की उद्घाटन समारोह के साथ मनाया जाए। 

    मीना को इस प्रस्ताव पर कोई आपत्ति नहीं थी, उसकी आवाज़ में सहमति और थोड़ी प्रसन्नता झलक रही थी। रूहानी ने मुस्कराते हुए उसे जल्दी आने के लिए कहा और फ़ोन रख दिया।

    लेकिन बात यहीं खत्म नहीं हुई। फ़ोन रखने के बाद भी रूहानी की आंखों में नींद नहीं उतरी। बिस्तर पर करवटें बदलती रही…. एक बेचैनी, एक उलझन सी मन में थी, जैसे किसी पुरानी याद ने धीरे से दस्तक दी हो।

    अंततः, जब नींद ने उसका हाथ थामने से इनकार कर दिया, तो वह चुपचाप, बहुत धीरे-धीरे बिस्तर से उठ खड़ी हुई। मन बोझिल था, और दिल किसी अनकहे सन्नाटे से भरा हुआ। 

    उसकी चाल में थकान थी, जैसे हर कदम बीते हुए वक़्त के किसी बोझ को ढो रहा हो। बिना आवाज़ किए वह अद्वैत के स्टडी रूम की ओर बढ़ी, जहाँ अब भी उसकी ख़ुशबू, उसकी आदतें और उसका सहेजा हुआ सन्नाटा बाकी था।

    दरवाज़ा बंद कर उसने नज़रें कमरे के कोनों में दौड़ाईं, मेज़, किताबें, कागज़… और वो ख़त, जो इस बार ईशिता का नहीं, अद्वैत का था। शायद वो उसे छुपाकर रखना भूल गया था।

    उसने धीरे से ख़त उठा लिया…. लग रहा था, ये कुछ ही देर पहले लिखा गया है।

    उसने खिड़की खोली। ठंडी हवा का झोंका भीतर आया, जैसे बीते पलों की वो ख़ामोश चाँदनी साथ ले आया हो, जो कभी दो लोगों के बीच का मौन चुपचाप तोड़ जाया करती थी।

    रूहानी फर्श पर बैठ गई। चाँद की रोशनी उसके चेहरे पर गिरी और वो पल फिर से आँखों में उतर आया… जब अदालत की ठंडी मेज़ पर उसने अद्वैत के साथ दस्तख़त किए थे। न सात फेरे थे, न मंगलसूत्र, बस काग़ज़ों की चुप्पी और एक अधूरा वादा…. जो कभी “हमेशा” नहीं था, फिर भी दिल ने मान लिया था। 

    उसने गहरी साँस ली… और पढ़ना शुरू किया।

    💌 प्रिय ईशिता,

    जब तुमने कहा था—“हमेशा,” मैंने उस एक लफ़्ज़ को अपनी रूह की सबसे भीतरी दीवार पर लिख लिया था। 

    मुझे लगा था, उस दिन से लेकर आख़िरी साँस तक, मेरी दुनिया में सिर्फ़ तुम होगी…. तुम्हारे साथ जीने का सपना, तुम्हारे साथ बूढ़ा होने की ख्वाहिश।

    पर अब….. जब तुम नहीं हो मुझे शादी करनी पड़ी। 

    नहीं…. नहीं…… मात्र क़ानूनी तौर पर एक रिश्ता दर्ज है, मगर उसमें वो धड़कन नहीं है, वो तुम नहीं हो।

    इस बंधन में न तुम्हारी हँसी है, न तुम्हारी बाँहों की वो पनाह, जहाँ मैं हर बार टूटकर समेटा जाता था।

    आज भी तुम्हारी तस्वीर मेरे कमरे में है, जहाँ तुमने उसे पहली बार रखा था….. एक मुस्कान के साथ। 

    हर बार जब मेरी नज़र उस पर टिकती है, तो यूँ लगता है जैसे वो आँखें मुझसे पूछ रही हों…. 

    “क्या अब भी वही हो, अद्वैत?” 

    और सच कहूँ, हाँ… मैं अब भी वहीं हूँ। जहाँ तुमने मुझे छोड़ा था।

    रूहानी… हम्म्म… वह अब मेरी ज़िंदगी का हिस्सा है…… एक साल के लिए, एक समझौते की तरह। 

    कभी-कभी मुझे लगता है कि यह समय का एक अजीब सा खेल है। तुम तो जानती हो, मैं समझौतों में यकीन नहीं रखता था। लेकिन ज़िंदगी कभी-कभी तुम्हें ऐसे मोड़ पर ले आती है जहाँ सबसे अनचाहे रास्ते ही सबसे ज़रूरी लगने लगते हैं।

    आज उसने मुझे अपने नए स्टूडियो की ओपनिंग में बुलाया। उसकी आँखों में चमक थी, लेकिन उसकी आवाज़ में वो थकान थी जिसे शब्द छिपा नहीं पाए। 

    उसने मुस्कराकर कहा, “अगर फीस लोगे तो अपनी बचत से दूँगी।” जैसे कोई कुछ साबित करना चाहता हो, शायद मुझे नहीं… खुद को।

    तुम होती तो हँसकर कहती, “अद्वैत, तुम कभी नहीं बदलोगे।” 

    और मैं जवाब देता, “हाँ ईशिता, तुम्हारे बिना क्या बदलूँ?”

    रूहानी की आँखों में कभी-कभी तुम्हारी सी ज़िद नज़र आती है….. वही जो तुमने देखी थी जब मैंने अपनी पहली किताब लिखी थी। पर उसमें तुम्हारे जैसा सुकून नहीं है। 

    लेकिन उसकी दुनिया अलग है, उलझनों से भरी… उसके संघर्ष अलग हैं। मैं उसे देखता हूँ, वो अपने सपनों को पूरा करने की कोशिश कर रही है। कभी उसकी हँसी में एक हल्की सी उदासी झलकती है…. एक ऐसी खामोशी, जो बहुत कुछ कहती है। 

    आज रात कमरे में बस पीली रौशनी थी। वो चाहती थी कि मैं कुछ कहूँ… और मैंने चाहा कि कह पाऊँ। 

    लेकिन मेरे होंठों पर सिर्फ़ तुम थी। मेरे शब्द हमेशा तुम्हारे लिए थे, ईशिता… सिर्फ़ तुम्हारे लिए।

    लोग कहते हैं… “आगे बढ़ो।” 

    पर वो नहीं जानते कि आगे बढ़ने के लिए पीछे छूटना पड़ता है। 

    और तुम कभी पीछे नहीं छूटी… तुम तो मेरी हर साँस में बसी रही। हर सन्नाटे में, हर अधूरे वाक्य में।

    मैं नहीं जानता ये समझौता क्या रंग लाएगा, रूहानी क्या खोज रही है, और मैं कहाँ जाऊँगा… पर एक बात जानता हूँ….

    मेरी सबसे ख़ूबसूरत कहानी, 

    जो आज भी अधूरी है… 

    वो सिर्फ़ तुम्हारी है।

    तुम्हारी याद में, 

    अद्वैत

    उस ख़त की आख़िरी पंक्ति पर आते-आते, रूहानी की उंगलियाँ काँपने लगीं। उसकी आँखें ख़ामोश थीं लेकिन भीतर एक सुनामी फूट रही थी। खिड़की के पार रात अब और भी स्याह हो चुकी थी, लेकिन अंदर का अँधेरा… उससे कहीं ज़्यादा गहरा था।

    °°°°°°°°°°°°°

    अपने कमरे में लौटने के बाद रूहानी धीमे-धीमे चलती हुई अपनी अलमारी के पास पहुंची। अलमारी खोलते हुए उसकी उंगलियों में कंपन था। 

    उसने नीचे की दराज से वो पुरानी फाइल निकाली, जिसे वो छूने से भी डरती थी….. वही फाइल जिसमें वो स्केच थे, जो उसने एकांश के लिए बनाए थे।

    कुछ स्केच अधूरे थे, जैसे उनकी कहानी। कुछ के कोनों पर जले हुए निशान थे…. जैसे दिल के किसी हिस्से को समय ने धीरे-धीरे राख में बदला हो। उसने एक-एक करके उन्हें फर्श पर फैलाया, हर स्केच से जैसे कोई चीख़ बाहर आ रही थी। 

    वो मुस्कुराता चेहरा, वो आँखें जो रूहानी की आँखों में डूब जाया करती थीं, और वो अधूरा स्केच जिसमें रूहानी ने एकांश का चेहरा खत्म करने से पहले ही पेंसिल छोड़ दी थी।

    अचानक वो पल कौंध गया….. वो विश्वासघात, वो ठंडापन, जो अब भी उसकी रगों में काँपती थी। उसकी साँसें तेज़ हो गईं, चेहरा पसीने से भीग गया। 

    वो सारे स्केच को समेटी , जैसे ज़हर को एक जगह इकट्ठा कर रही हो, और फिर कमरे के कोने में उन्हें पहाड़ कर दिया। 

    “अब तुमसे जुड़ा कुछ भी मेरे पास नहीं रहेगा…” वह बुदबुदाई, और माचिस जलाकर स्केच को आग लगा दी।

    लपटें धीरे-धीरे फैलने लगीं। रूहानी की आँखें उस आग में डूब गईं, मानो वहीं अपना हर अधूरा जवाब खोज रही हो। उसके चेहरे पर आँसू नहीं थे, पर जो सूनापन था, वो किसी चीख से कम नहीं था। 

    वो उठी, और मोबाइल से उस जलते हुए पल की एक तस्वीर लेने लगी…. जैसे वो राख होते पलों को आख़िरी बार बंद करना चाहती हो।

    लेकिन तभी…

    उसका फोन कंपन करने लगा। 

    स्क्रीन पर नाम चमका…. एकांश कॉलिंग।

    रूहानी का हाथ बीच हवा में रुक गया।

    ————–

    एकांश को अभी क्यों याद आई रूहानी?

    क्या रूहानी फोन उठाएगी… या इस बार वो जवाबों को सुलगा देगी, हमेशा के लिए? 

    क्या ये रिश्ता महज़ एक समझौता है… या किसी अनजाने मोड़ पर दिल फिर से धड़कने लगेगा?