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  • अधूरी इबादत भाग~32

    अधूरी इबादत भाग~32

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

    भाग~32 दिल के ताले 

     

    पीछे से अद्वैत के अचानक आने पर रूहानी एकदम से चौंक गई। उसका चेहरा सफेद पड़ गया था, आंखें पलभर को फैल गईं और हाथ में पकड़ी किताब लगभग छूट ही गई। उसकी साँसें तेज हो गई थीं, जैसे कोई चोरी पकड़ी गई हो। 

    अद्वैत ने भौंहें चढ़ाते हुए पूछा, “क्या हुआ? यूं सहम क्यों गई?” 

    रूहानी ने फौरन खुद को सँभालते हुए सिर झुकाकर कहा, “नहीं, ऐसा कुछ भी नहीं है… वो दरअसल… यहाँ चारों तरफ इतनी शांति है न, तभी जब तुम्हारी आवाज़ अचानक आई तो थोड़ा चौंक गई… शायद इसलिए।” 

    उसकी आवाज़ में झिझक थी, लेकिन आँखें कुछ और कह रही थी… एक घबराहट, जो खुद से भी छुपी नहीं थी। 

    अद्वैत उसकी बातों को मान तो गया, लेकिन उसकी नज़रें रूहानी के चेहरे पर अटकी रह गईं, जैसे वो कुछ और पढ़ने की कोशिश कर रहा हो। 

    फिर वह हल्के से मुस्कराया और बोला, “ठीक है, चलो नीचे।” 

    दोनों साथ-साथ सीढ़ियों की ओर बढ़े, लेकिन जैसे ही कदम उठे, वे दोनों एक-दूसरे के विपरीत किनारों पर चलने लगे, जैसे दूरी बनाए रखना अब भी एक अनकहा अनुबंध था। पर सीढ़ियों के हर पड़ाव पर, उनके दिलों के भीतर कुछ था… जो धीरे-धीरे पास आने की कोशिश कर रहा था।

    मीना और उसके दोनों बच्चे जब खाना खाकर जाने की तैयारी करने लगे तो अद्वैत और रूहानी जैसे एक ही सोच में डूबे हुए थे, एक साथ बोल पड़े, “यही रह जाओ।” 

    उनकी आवाज़ में एक अनकहा अपनापन था, जिसे वो खुद भी शायद अभी ठीक से नहीं समझ पाए थे। दोनों की नज़रें एक पल को आपस में टकराईं और फिर एक हल्की-सी फीकी मुस्कान उनके चेहरों पर तैर गई।

    अद्वैत ने बात संभालते हुए कहा, “रात हो गई है मीना, यहीं रुक जाओ बच्चों के साथ, क्या ज़रूरत है इतनी देर में लौटने की।” 

    मीना थोड़ी हड़बड़ाई, उसकी आँखों में कुछ छुपा हुआ डर था। उसने जल्दी से जवाब दिया, “न-नहीं सर… मेरे पति आएंगे… और अगर मैं घर पर नहीं रही तो…”

    रूहानी ने उसकी बातों में कुछ अजीब सा महसूस किया। उसकी निगाहों में संदेह उभरा, “क्या मतलब?”

    मीना ने तुरंत मुस्कुराने की कोशिश की, वो मुस्कान जिसमें सच्चाई कम और बनावट ज़्यादा थी, “अरे नहीं मैडम, मेरा मतलब ये कि अगर मैं नहीं रही तो इनके पापा भूखे रह जाएंगे… उन्हें तो चाय बनाना भी नहीं आता।”

    अद्वैत ने एक गहरी सांस लेकर कहा, “ठीक है, मैं कैब बुक कर देता हूँ।”

    मीना ने हाथ जोड़ते हुए मना किया, “नहीं, नहीं, सर, मैं चली जाऊंगी।” 

    लेकिन तब तक रूहानी भी अद्वैत की बात दोहराई, “नहीं मीना, इतनी रात को अकेले मत जाओ, कैब सही रहेगा।”

    मीना ने उन दोनों की बात मान लिया। 

    फिर रूहानी ने मीना के बच्चों की ओर मुड़कर कहा, “जब भी मन करे, यहीं आ जाना…”

    गुनगुन और चीकू ने ख़ुशी में एक-दूसरे से हाई-फाइव किया, और उस मासूमियत में जैसे एक नया रिश्ता  लेने लगा था…. जिसमें न खून का रिश्ता था, न नाम का, फिर भी कोई डोर थी… जो सबको जोड़ रही थी।

    घर में एक बार फिर से वही पुराना, गूंजता हुआ सन्नाटा पसर गया, जैसे सब कुछ अपनी जगह पर लौट आया हो, लेकिन फिर भी कुछ बदल चुका था। 

    मीना और उसके बच्चों के जाने के बाद अद्वैत और रूहानी के बीच एक अजीब-सी चुप्पी छा गई थी, जो न तो पूरी तरह असहज थी और न ही पूरी तरह सुकून भरी। दोनों एक-दूसरे से नज़रें चुराने लगे….. जैसे उन आंखों में कुछ था जो अभी कहा नहीं जा सकता था।

    इस अनकहे बोझ को हल्का करने के लिए अद्वैत ने आखिरकार खुद से कहा, “मुझे नींद आ रही है, मैं जा रहा हूं सोने।”

    रूहानी ने भी उसकी तरफ बिना देखे ही धीमे स्वर में जवाब दिया, “गुड नाइट।” और फिर नीचे वाले कमरे में जाकर दरवाज़ा हल्के से बंद कर लिया।

    पर उसकी आंखों में नींद नहीं थी, सिर्फ सवाल थे। वो सवाल जो उसके दिल में अब गहराई से उतरते जा रहे थे।

    उसे कमरे में टहलते हुए उसी किताब की याद  से ताज़ा हो गई….. वो किताब जिसे उसने अद्वैत के स्टडी रूम में देखा था, जिसके पहले पन्ने पर सुंदर लिखावट में लिखा था “यह किताब मेरे दिल के बहुत करीब है… — इशिता”।

    इशिता… कौन थी वो? क्या वो अद्वैत की पहली पत्नी थी? या कोई और…?

    मन का भूचाल उसे थकने नहीं दे रहा था। उसी में, उसने चुपचाप अपने पायल की आवाज़ दबाते हुए सीढ़ियों की ओर कदम बढ़ाए। हर सीढ़ी पर उसका दिल और भी तेज़ धड़कने लगा…

    उसे नहीं पता था कि वो ऊपर जाकर क्या ढूंढ़ेगी….. जवाब, या और सवाल…

    रूहानी दरवाज़े के सामने खड़ी कुछ पलों तक वहीं जमी रही। उसका हाथ धीरे-धीरे डोर नॉब की ओर बढ़ा, जैसे कोई राज़ खोलने जा रही हो। पर तभी उसकी उंगलियाँ एक ठंडी सी सच्चाई से टकराईं — दरवाज़ा बंद था, लॉक लगा हुआ था। 

    एक गहरी साँस लेकर वो चुपचाप नीचे लौटी, उसके मन में एक हल्का-सा अफ़सोस और एक अधूरी उत्सुकता थी जो उसके सीने में धड़क रही थी।

    अपने कमरे में आकर वो पेट के बल लेट गई, तकिये में चेहरा छुपाते हुए, जैसे किसी खोई हुई सोच को पकड़ना चाहती हो। उसका मन अद्वैत की प्रकृति पर टिक गया…. इतना शांत, लेकिन कहीं न कहीं कुछ छुपा हुआ सा। वो कब अपनी दुनिया खोलता है? और कब खुद को उस ताले में बंद कर लेता है — कुछ समझ नहीं आता।

    इन्हीं उलझनों में उसकी आँखें कब मुंदी, उसे खुद भी नहीं पता चला।

    सुबह की धीमी रोशनी कमरे में फैल रही थी जब उसकी नींद खुली। बाहर से कॉफ़ी की खुशबू आ रही थी, और जब वो बाहर आई तो देखा…. अद्वैत किचन में कॉफ़ी बना रहा था।

    रूहानी किचन के पास पहुँची ही थी कि अद्वैत ने एक मग उसकी ओर बढ़ाया, “मैंने दो कप कॉफ़ी बनाई है… पीना चाहोगी?”

    रूहानी ने हल्के से सिर हिलाया और मग लेकर डाइनिंग टेबल की कुर्सी पर बैठ गई।

    रूहानी ने मग की सतह पर उठती भाप को देखते हुए हल्की मुस्कान के साथ कहा, “तुम्हें तो कुछ बनाना आता ही नहीं था… तो फिर ये कॉफ़ी किस जादू से बना ली?”

    अद्वैत ने किचन काउंटर से टेक लगाते हुए मुस्कराया, उसकी आवाज़ में एक सादगी और थोड़ा-सा संकोच भी था, “हाँ, बहुत कुछ तो नहीं आता… लेकिन एक-दो चीजें बना लेता हूँ। बस, घर पर ज़रूरी सामान हो और… मन भी हो।”

    उसके ‘मन भी हो’ कहने में जो ठहराव था, वो रूहानी की रूह को छू गया। उसने अनजाने ही नज़रें झुका लीं, जैसे उस मामूली-सी कॉफ़ी के पीछे की भावनाओं को पढ़ने लगी हो। उस मग में केवल कॉफ़ी नहीं थी, उसमें शायद कोशिश थी… एक अनकही भावना… या फिर किसी आदत को दोबारा अपनाने की शुरुआत।

    कुछ क्षणों बाद, अद्वैत सोफे पर बैठ गया और उसने एक छोटा फोल्डर और लिफ़ाफ़ा उसकी ओर बढ़ाया, “ये लो…पूरे 25 लाख हैं, और ये एग्रीमेंट। साइन कर दो।”

    रूहानी ने कॉफ़ी साइड में रखकर काग़ज़ों पर दस्तख़त कर दिए। फिर मुस्कुराकर बोली, “थैंक यू अद्वैत… तुम्हें अंदाज़ा भी नहीं है कि तुमने मेरी ज़िंदगी की कितनी बड़ी मदद की है। मैं अब अपने सपनों को पूरा करके रहूँगी। मीना आएगी तो मुझे उसके साथ जाना होगा।”

    अद्वैत ने हल्की हैरानी से पूछा, “आज फिर से क्यों?”

    रूहानी ने कुछ पल चुप रहकर सोचा — कितनी बार तो चाहा था कि ये इन्सान एक बार पूछे कि वो उसके पैसे कहाँ लगा रही है… अब जब पूछ ही लिया है, तो बता ही देती हूँ

    उसने कहा, “मैं एक स्ट्रगलिंग ड्रेस डिज़ाइनर हूँ, तो नया स्टूडियो ले रही हूँ… उसी के लिए ये सब।”

    अद्वैत की आँखों में चमक आ गई। मुस्कराकर बोला, “अरे वाह! लेखक की पत्नी ड्रेस डिज़ाइनर…. ये तो कुछ ज़्यादा ही यूनिक कॉम्बिनेशन हो गया, है ना?”

    रूहानी उसके शब्दों से जैसे भीतर तक सिहर उठी। वो अचानक कुछ पल को चुप हो गई, उसके हाथ में पकड़ा कॉफ़ी मग ठंडा होने लगा लेकिन उसकी पकड़ अब भी वैसी ही टिकी रही। 

    उसकी आँखें अद्वैत की ओर थीं, पर नजरें जैसे किसी और ही सवाल में उलझी थीं….. क्या उसने सच में ‘पत्नी’ कहा? वो शब्द जो अब तक सिर्फ दस्तावेज़ों में था, आज अद्वैत की ज़ुबान पर था… यूँ सहज, यूँ स्वाभाविक।

    अद्वैत को जैसे महसूस हुआ कि उसने कुछ ज़्यादा कह दिया है, उसकी नज़रें फौरन झुक गईं। वो भी खुद को संयत कर घूंट भरते हुए अपनी कॉफी खत्म की और नज़रे चुराते हुए बोला, “मुझे तुमसे एक ज़रूरी बात करनी है… या यूँ कह लो कि कुछ पूछना है।”

    रूहानी, जो अब तक अपने मन के उलझे धागों को सुलझाने में लगी थी, थोड़ी झेंपते हुए बोली, “क्या?”

    अद्वैत ने हल्की सी साँस लेकर कहा, “अगले संडे यहीं पास में एक साहित्यिक समारोह हो रहा है… वहाँ मुझे आमंत्रित किया गया है। लेकिन… बात ये है कि उन्होंने मुझसे कहा है कि मुझे अपनी पत्नी के साथ आना होगा।”

    उसने रूहानी की ओर देखा, आँखों में एक सवाल था, जो शब्दों से ज़्यादा गहरा था।

    “तो… क्या तुम चलोगी?”

    रूहानी की सांस थम सी गई। उसके होंठ हिले, लेकिन कोई आवाज़ नहीं निकली। 

    अद्वैत की निगाहें उसके चेहरे पर टिकी थीं, हर छोटी सी झलक पढ़ने की कोशिश में। कमरे की चुप्पी में सिर्फ उनके दिल की धड़कनों की गूंज़ सुनाई देती थी। 

    क्या वह हां कहेगी? या खामोशी ही उसका जवाब होगी? 

    —————–

    क्या मीना की उस अचानक डर भरी बात के पीछे कोई छुपा हुआ सच था?

    क्या ‘इशिता’ का नाम सिर्फ एक नाम था, या उसके पीछे छुपा था कोई अधूरा किस्सा? 

    क्या रूहानी उस साहित्यिक समारोह में अद्वैत के साथ जाने को तैयार होगी, या उसकी खामोशी में छुपा होगा कोई अनसुलझा दर्द?

  • अधूरी इबादत भाग~31

    अधूरी इबादत भाग~31

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    भाग~31 फटा हुआ पन्ना 

     

    अद्वैत किचन में था, apron पहने, चेहरे पर हल्की झुंझलाहट और पसीने की बूंदें। गैस पर रखे तवे से धुआँ उठ रहा था और कड़ाही में कुछ जलने की गंध हवा में तैर रही थी। 

    अद्वैत का हाथ थरथरा रहा था, जैसे हर टमाटर का टुकड़ा उसके हाथों से फिसलता जा रहा हो। उसकी सांसें गहरी थीं, पर दिल की धड़कनें असामान्य रूप से तेज़। हर झोंके में जो धुआँ उठता, वह उसकी उम्मीदों को बुझाता जा रहा था और एक आवाज़ उसके मन में बार-बार गूंज रही थी, “क्या मेरी कोशिशें इन मासूमों के लिए कभी मायने रखेंगी?”

    तवे पर जलती हुई आवाज़ ने उसे झकझोर दिया, जैसे असफलताओं का बोझ उसके कंधों पर उतर आया हो मानो वह खुद से ही हारता जा रहा था।

    मीना और रूहानी के घर में घुसते ही बच्चों की खामोशी ने माहौल में एक भारीपन घोल दिया था। गुनगुन की आँखें भरी हुई थीं और चीकू का हाथ उसकी बहन के हाथ में कसकर जकड़ा हुआ था, जैसे उसने अभी-अभी किसी डरावने दृश्य से खुद को खींच निकाला हो।

    मीना ने दौड़कर अपने बच्चों को गले लगाया, “क्या हुआ बच्चो? तुम रो क्यों रहे हो?” गुनगुन ने धीरे से फुसफुसाया, “अद्वैत अंकल ने कुछ जलाया… बहुत तेज़ आवाज़ आई… हमने सोचा कुछ बुरा हो गया।”

    रूहानी तेजी से किचन की ओर बढ़ी…. जहाँ अद्वैत झुका हुआ था, हाथ में तवा और चेहरे पर मायूसी। उसे देख रूहानी की आँखों में एक पल के लिए चिंता और फिर एक हल्की सी मुस्कान उभरी।

    “तुम ठीक हो?” उसने धीरे से पूछा।

    अद्वैत ने चौंककर उसकी ओर देखा, फिर सामान्य सी आवाज़ में बोला, “बच्चो ने कहा कि उन्हें भूख लगी है, इसलिए मैंने सोचा बच्चों के लिए कुछ बना लूँ…. पर शायद मेरा लेखक होना ही ठीक है, रसोइया नहीं।”

    “तुम ठीक तो हो ना? मैं… बस डर गई थी उस आवाज़ से… ये बच्चे इतने नाज़ुक होते हैं… तुम भी…” रूहानी की आवाज़ में एक नर्माहट थी, जैसे अपने भीतर की बेचैनी छुपाने की कोशिश कर रही हो।  

    उसकी आँखों में न केवल चिंता थी, बल्कि एक छुपा हुआ सवाल भी, जो शायद वो खुद भी समझ नहीं पा रही थी। उसकी सांसें थोड़ी तेज़ हुईं, मानो किसी अनजानी बेचैनी को रोकने की कोशिश हो रही हो।

    जब चीकू की मासूम उंगली अद्वैत की ओर उठी और उसने नन्हीं सी आवाज़ में कहा, “अंकल, आपको खाना बनाना नहीं आता ना?” तो कमरे की हवा में एक पल को जैसे नमी भर गई। वो सवाल नहीं था, वो एक सच्चाई थी जो अद्वैत के चेहरे पर शर्म और हल्की मुस्कान बनकर उभरी। 

    रूहानी की हँसी जैसे फूट पड़ी, वो खुलकर मुस्कुराई। 

    अद्वैत ने भी अपनी गर्दन झुका ली, जैसे उस सवाल ने उसके हाथों की बेबसी और उसके अंदर की गहराई दोनों उजागर कर दी हो।

    मीना ने भी मुस्कराते हुए तुरंत कहा, “आप निकलिए, सर… मैं बना देती हूँ,” और वह बिना देर किए पूरे किचन की सफ़ाई में जुट गई, जैसे किचन को सहेजना उसके मन को भी सहेजने जैसा था। 

    अद्वैत ने झेंप मिटाने के अंदाज़ में एप्रन उतारा और चुपचाप सोफे की तरफ़ चला गया, जहां उसके कुछ कागज़, पेन और लैपटॉप रखे हुए थे। वह अपने में ही खोया-सा उन्हें समेटने लगा।

    तभी रूहानी भी मीना की मदद के लिए आगे बढ़ी, शायद सिर्फ़ सामान समेटने नहीं, बल्कि उस पल की उलझन समेटने भी।

    लेकिन मीना ने बीच में आकर उसका हाथ थाम लिया, मुस्कुरा कर बोली, “आप रहने दीजिए मैडम, सर को ऊपर कुछ ज़रूरत पड़ी तो…” और धीरे से उसका हाथ सामान से अलग कर दिया। 

    उस क्षण रूहानी का चेहरे का रंग उड़ गया, जैसे कोई अनकही सीमा फिर से उसकी आँखों के सामने आ खड़ी हुई हो। अभी तक वह अद्वैत के कमरे के अंदर नहीं गई थी…. न उसे कभी ज़रूरत पड़ी, न इजाज़त मिली। 

    एग्रीमेंट की एक-एक पंक्ति उसके मन में ताज़ा हो उठी, जिसमें साफ़ कहा गया था — ‘न कोई एक-दूसरे के कमरे में आएगा, न निजी सीमाओं को लांघेगा।’

    रूहानी ने हल्के से बात मोड़ दी, “अद्वैत कोई छोटा बच्चा थोड़ी है, वो मैनेज कर लेगा…..” लेकिन उसकी आवाज़ में खुद को समझाने की थकावट थी। 

    लेकिन मीना पीछे नहीं हटी। वह मुस्कुराई और बोली, “पति को अपनी पत्नी की ज़रूरत पड़ ही जाती है… देखिए न, सर सीढ़ियाँ चढ़ने लगे हैं…” और जैसे ही अद्वैत की छाया ऊपर जाती दिखी, मीना ने एक धीमा-सा धक्का दिया, “जाइए न मैडम, अब तो मान जाइए…”

    रूहानी कुछ नहीं बोली। उसकी पलकें झुकी रहीं, जैसे दिल में कोई गूंगी उलझन पल रही हो। फिर वो चुपचाप, धीमे क़दमों से, अनजाने डर और कहीं भीतर की कोमल उत्सुकता को समेटे, अद्वैत के पीछे-पीछे सीढ़ियाँ चढ़ने लगी।

    हर क़दम एक नई दहलीज़ थी और शायद, एक नया मोड़ भी।

    अद्वैत अपने कमरे में कदम रखने ही वाला था कि उसकी नज़र दो कदम दूर खड़ी हुई रूहानी पर पड़ी, जो इस अजीब सी स्थिति से बचने के लिए अपनी निगाहें इधर-उधर फेर रही थी। उसकी आंखें झुकी हुई थीं, पर भीतर एक बेचैनी साफ़ झलक रही थी। 

    अद्वैत का चेहरा थोड़ा गंभीर हो गया, उसकी आवाज़ में एक गहरी गंभीरता समा गई। “तुम यहां? रुहानी…”

    रूहानी जल्दी से अपना हाथ हिलाते हुए बोली, “मैं जानबूझकर यहां नहीं आई, वो मीना ने… मुझे… यहां… तुम्हारी मदद… नहीं, नहीं, मैं कॉन्ट्रैक्ट के नियमों के खिलाफ नहीं जा रही हूँ। प्लीज, मैं मजबूर हो गई थी।”

    उसकी आवाज़ में घबराहट थी, शब्द जैसे घुल-मिल गए थे और हाथों की हल्की थरथराहट उसके भीतर की बेचैनी बयां कर रही थी। वह खुद को न्यायसंगत साबित करने की कोशिश में थी, लेकिन अंदर से वह झूठी भी लग रही थी।

    अद्वैत ने उसकी इस बेचैन आवाज़ और थरथराते हुए शरीर को देखकर हल्की सी मुस्कान दी, लेकिन फिर खुद ही छिपाने की कोशिश में जल्दी ही कहा, “ठीक है, ठीक है, मैं समझ गया। मैं थोड़ा फ्रेश होकर आता हूँ। तुम जो चाहो तो पढ़ सकती हो।” उसकी आवाज़ में एक नरमी थी, जो रूहानी के भीतर की उलझनों को कुछ कम कर रही थी।

    रूहानी को पूरी बात समझ नहीं आ रही थी, तभी अद्वैत ने अपने कमरे के बगल वाले कमरे की ओर इशारा किया और कहा, “यह मेरा लाइब्रेरी या कह लो स्टडी रूम है। तब तक यहीं रहो, मैं आता हूँ, फिर साथ में नीचे चलते हैं ताकि मीना को शक न हो।”

    उस पल रूहानी के चेहरे पर हल्का सा सुकून आया, मानो किसी ने उसकी बेचैनी को थोडा सा कम कर दिया हो।

    रूहानी ने धीरे से सिर हिलाया और अद्वैत के स्टडी रूम में प्रवेश कर गई। अद्वैत भी अपने कमरे में वापस चला गया। 

    रूहानी ने धीरे-धीरे कमरे में कदम रखा, उसके होंठ अपने आप में कतर रहे थे, जैसे किसी अनजानी बेचैनी को छुपाने की कोशिश कर रही हो। उसका मन इस जगह को लेकर थोड़ा असहज था…. यह अद्वैत की निजी दुनिया थी, एक ऐसी दुनिया जिसमें वह खुद को अनजान पा रही थी। 

    उसने चारों ओर देखा तो किताबों की कतारें थीं, लेकिन वे सब कुछ ऐसी किताबें थीं जिन्हें पढ़कर शायद ही कोई दिल बहलाए…. क्योंकि यहाँ सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि ज्ञान, शोध और शिल्प का संगम था। 

    हर शेल्फ पर इतिहास, दर्शन, विज्ञान और विभिन्न संस्कृतियों पर गंभीर ग्रंथ सजे थे, जिनके साथ लेखन कला की बारीकियों को सिखाने वाली मार्गदर्शिकाएँ और व्याकरण की किताबें भी थीं। 

    यह लाइब्रेरी किसी कथाकार के लिए विचारों का स्रोत और रचनात्मकता की प्रयोगशाला थी, जहाँ से अनगिनत कहानियों को जन्म मिलना था।

    वैसे तो रूहानी की रुचि कभी पढ़ाई में नहीं रही थी; वह हमेशा से जीवन के रंगीन, संवेदनशील पक्ष की ओर अधिक आकर्षित रही, न कि सूखे शब्दों की दुनिया की ओर।

    फिर उसकी नज़र एक किताब पर पड़ी…. पुरानी, धूल झड़ी हुई, जिसकी कवर झुर्रीदार थी। वह किताब कुछ अलग सी लग रही थी, शायद अद्वैत की वह ज़िन्दगी जिसे वह आम तौर पर छुपाता था। 

    उसने झिझकते हुए किताब निकाली और पन्ने पलटने लगी। ये कोई गंभीर या भारी किताब नहीं थी, बल्कि एक खूबसूरत कविता संग्रह था, जिसमें भावनाओं की गहराई और जीवन की नाजुकता के अनकहे रंग समाए थे। 

    रूहानी को एहसास हुआ कि अद्वैत के भीतर भी कोई छुपा हुआ कोमल पक्ष है, जो शायद उसने कभी सामने आने नहीं दिया।

    उसने पन्ने पलटते हुए एक फटा हुआ पन्ना देखा, जिस पर खूबसूरती से लिखा था — “यह किताब मेरे दिल के बहुत करीब है। उम्मीद है, तुम इसे संभालकर रखोगे – इशिता।” 

    “इशिता…” नाम रूहानी के होठों पर धीरे से बया हुआ, उसके भीतर अचानक से एक हलचल मच गई, उसके दिल की धड़कनें तेज हो गईं, जैसे किसी पुराने राज की परतें अब धीरे-धीरे खुल रही हों। उसने झट से किताब बंद कर दी, लेकिन वह छोटा सा संदेश उसके मन में सवालों के तूफान छोड़ गया।

    तभी पीछे से अद्वैत की आवाज़ आई। 

    ——

    क्या इशिता कौन है, और क्यों इस किताब में उसके दिल की बातें छुपी हैं? 

    क्या अद्वैत के भीतर छिपा वह कोमल पक्ष कहीं उनके रिश्ते की नींव बदलने वाला था? 

    जब रूहानी ने वो पन्ना छू लिया है… क्या वो सिर्फ एक पाठक रहेगी? या किसी पुराने सच की गवाह बनेगी?

  • बेवफाई भाग 2

    बेवफाई भाग 2

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    बेवफाई

     

    Part 2

     

    छह महीने बाद, 

     

    अगले छह महीने रिया ने खुद को पूरी तरह काम में डुबो दिया। वह एक छोटे से डिजाइन स्टूडियो में काम करती थी। आरव से अलग होने के बाद उसने खुद को संभालना सीखा।

     

    पहले वह हर रात रोती थी। फिर रोना बंद हो गया। पहले उसे आरव की याद आती थी। फिर उसने खुद को याद करना शुरू किया। उसने अपने स्टूडियो को बड़ा किया।

     

    नई टीम बनाई। और छह महीने बाद… रिया का नाम मुंबई के युवा फैशन डिजाइनरों में गिना जाने लगा।

    वो रिया जिसे कुछ महीनों पहले तक कोई नहीं जानता था आज उसने अपना एक मुकाम हासिल कर लिया था। 

     

    एक दिन उसे एक बड़ा प्रोजेक्ट मिला। क्लाइंट का नाम देखकर वह कुछ सेकंड के लिए चुप रह गई।

     

    आरव मल्होत्रा। उसकी कंपनी। रिया ने फाइल बंद कर दी। “मैं ये प्रोजेक्ट नहीं करूंगी।”

     

    लेकिन कुछ ही देर बाद उसे क्लाइंट की शर्तों के बारे में पता चला।

     

    प्रोजेक्ट किसी और डिजाइनर को नहीं दिया जा सकता था। उसे ही करना था।

     

    रिया ने गहरी सांस ली। “ठीक है।”

     

    उसे क्या पता था कि यह मुलाकात उसकी जिंदगी का सबसे बड़ा सच सामने लाने वाली थी।

     

     

    अगले दिन वह आरव के ऑफिस पहुंची। दरवाजा खोलते ही उसकी नजर आरव पर पड़ी।

     

    छह महीने में वह बदल चुका था।

     

    चेहरे पर पहले से ज्यादा थकान थी। आंखों के नीचे हल्के काले घेरे। लेकिन सबसे ज्यादा अजीब था…

    उसकी आंखों में दर्द। रिया ने फाइल टेबल पर रखी।

     

    “प्रोजेक्ट की सारी डिटेल्स मैंने देख ली हैं।”

     

    आरव उसे देखता रहा। “तुम ठीक हो?”

     

    रिया ने ठंडी आवाज में कहा, “ये सवाल अब तुम्हें पूछने का अधिकार नहीं है।”

     

    आरव चुप हो गया। दोनों के बीच कुछ सेकंड की खामोशी रही।

     

    फिर रिया ने कहा, “काम की बात करें?”

     

    आरव ने सिर हिलाया, “हां।”

     

    दोनों प्रोफेशनल हो गए, कम से कम बाहर से।

     

    लेकिन हर मुलाकात में कुछ अनकहा रह जाता।

     

    एक दिन अचानक आरव ने पूछा, “तुमने दोबारा शादी क्यों नहीं की?”

     

    रिया ने उसकी तरफ देखा। “तुमने की?”

     

    आरव चुप हो गया। रिया मुस्कुरा दी। “मुझे भी जवाब नहीं चाहिए।”

     

    वह वहां से जाने लगी। तभी आरव ने कहा, “रिया…”

     

    वह रुक गई। “मैंने तुम्हारे साथ बेवफाई नहीं की थी।”

     

    रिया के चेहरे पर कठोरता आ गई। “फिर मीरा कौन थी?”

     

    आरव ने आंखें बंद कर लीं। “वो मेरी बहन है।”

     

    रिया जैसे पत्थर की बन गई। “क्या?”

     

    आरव बोला, “मेरी छोटी बहन।”

     

    रिया कुछ बोल नहीं पाई। आरव ने टेबल की दराज खोली और एक पुराना लिफाफा निकाला।

     

    उसमें मेडिकल रिपोर्ट्स थीं। “मीरा को कैंसर था।”

     

    रिया के हाथ कांपने लगे। “क्या?”

     

    आरव, “डॉक्टर ने कहा था कि उसके पास ज्यादा वक्त नहीं है।” आरव की आवाज टूटने लगी।

     

    “मीरा मेरी वजह से नहीं… मेरी वजह से नहीं, बल्कि इसलिए मेरी जिंदगी में वापस आई थी क्योंकि उसकी आखिरी इच्छा थी कि मैं उसे अपनी जिंदगी में खुश देखूं।”

     

    रिया की आंखों से आंसू बह निकले।“तो तलाक?”

     

    आरव, “वो भी झूठ था।”

     

    “क्यों?”

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा। “क्योंकि मुझे लगा… अगर मैं तुम्हें अपने से दूर कर दूंगा, तो तुम सुरक्षित रहोगी।”

     

    रिया ने हैरानी से उसे देखा। “किससे?”

     

    आरव ने धीरे से कहा, “मेरे पिता से।”

     

    रिया कुछ समझ नहीं पाई।

     

    आरव ने बताया कि उसके पिता एक बड़े घोटाले में फंस चुके थे और उनके दुश्मन आरव के परिवार को नुकसान पहुंचाना चाहते थे।

     

    कुछ लोगों ने रिया को धमकी देना शुरू कर दिया था।

     

    आरव ने पुलिस को सब बताया था, लेकिन जब तक सबूत नहीं मिलते, वह उसे सुरक्षित रखना चाहता था।

     

    इसलिए उसने दुनिया के सामने मीरा के साथ रिश्ता होने का नाटक किया, क्योंकि किसी को नहीं पता था आरव की कोई छोटी बहन है। 

     

    और जिससे लोग समझें कि उसका और रिया का रिश्ता खत्म हो चुका है। “लेकिन तुमने मुझे सच क्यों नहीं बताया?”

     

    आरव की आंखों से आंसू निकल आए। “क्योंकि मुझे डर था कि अगर तुम्हें पता चल गया तो तुम मुझे छोड़कर नहीं जाओगी।”

     

    रिया ने धीमे से कहा, “और तुमने सोचा कि झूठ बोलकर मुझे बचा लोगे?”

     

    आरव ने सिर झुका लिया। “मैं गलत था।”

     

    रिया की आंखों में दर्द था। “हां… तुम गलत थे।”

     

    वह उसके करीब आई। और उसका कॉलर पकड़ते हुए टूटी आवाज में बोली, “तुमने मेरी जान तो बचा ली, आरव…”

     

    उसकी आवाज कांप गई। “लेकिन मेरे अंदर का भरोसा मार दिया।”

     

    आरव की आंखों से आंसू बहते रहे। “मैं जानता हूं।”

     

    “मैंने छह महीने तुम्हें नफरत किया।”

     

    “मैंने भी।”

     

    “मैं हर रात सोचती थी कि तुमने मुझे धोखा दिया।”

     

    “मैं हर रात तुम्हारी तस्वीर देखकर खुद को कोसता था।” आरव ने दर्द भरी आवाज में कहा। 

     

    दोनों चुप हो गए। कुछ रिश्तों में प्यार खत्म नहीं होता।

    बस दर्द इतना बढ़ जाता है कि प्यार दिखाई देना बंद हो जाता है।

     

     

    कुछ दिनों बाद मीरा खुद रिया से मिलने आई। वह बहुत कमजोर थी। उसने रिया का हाथ पकड़ लिया। “भाभी…”

    रिया की आंखें भर आईं। “मुझे माफ कर दीजिए।”

     

    रिया ने सिर हिलाया। “तुम्हारी कोई गलती नहीं थी।”

     

    मीरा मुस्कुराई। “लेकिन एक गलती मेरी थी।”

     

    रिया, “क्या?”

     

    मीरा, “मैंने भाई से कहा था कि अगर वो आपसे सच बताएगा तो आप उसे कभी माफ नहीं करेंगी।”

     

    रिया हल्का-सा मुस्कुरा दी। “और अब?”

     

    मीरा ने कहा, “अब लगता है कि प्यार में सबसे बड़ी बेवफाई झूठ बोलना नहीं…”

     

    वह कुछ पल रुकी। “बल्कि सामने वाले को सच जानने का अधिकार न देना है।”

     

    रिया की आंखों से आंसू बह निकले। मीरा चली गई। रिया बहुत देर तक वहीं बैठी रही।

     

     

    एक साल बाद। समुद्र के किनारे वही जगह जहां कभी आरव ने उसे प्रपोज किया था।

     

    आरव वहां खड़ा था। रिया धीरे-धीरे उसके पास आई।

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा। “तुम यहाँ आई।”

     

    रिया मुस्कुरा दी। “हां।”

     

    आरव, “क्या तुम मुझे माफ कर सकती हो?”

     

    रिया ने कुछ पल उसे देखा। “माफ कर दिया।”

     

    आरव की आंखों में उम्मीद जगी।

     

    “लेकिन…” रिया ने उसकी बात रोक दी। “भरोसा वापस आने में वक्त लगेगा।”

     

    आरव ने सिर हिलाया। “मैं इंतजार करूंगा।”

     

    रिया उसके पास आई। “और अगर फिर कभी मुझे बचाने के लिए मुझसे झूठ बोला…”

     

    आरव मुस्कुरा दिया। “तो?”

     

    “तो इस बार सच में तलाक ले लूंगी।”

     

    दोनों हंस पड़े। आरव ने धीरे से उसका हाथ पकड़ लिया। इस बार रिया ने अपना हाथ नहीं खींचा।

     

    समुद्र की लहरें उनके पैरों को छूकर लौट रही थीं।

     

    रिया ने आरव के कंधे पर सिर रख दिया। कभी-कभी रिश्तों में सबसे बड़ा सवाल यह नहीं होता कि किसने बेवफाई की।

     

    सवाल यह होता है कि, क्या उस बेवफाई के बाद भरोसा दोबारा जन्म ले सकता है? रिया और आरव के रिश्ते ने एक बात सीखी थी,

     

    प्यार हमेशा रिश्ते को नहीं बचाता।

    लेकिन सच्चाई, पछतावा और दोबारा भरोसा बनाने की कोशिश… कभी-कभी टूटे हुए रिश्ते को पहले से भी

    ज्यादा मजबूत बना देती है।

     

    और शायद…

     

    उनकी कहानी में बेवफाई किसी तीसरे इंसान की नहीं थी। बेवफाई उस झूठ की थी, जिसने दो सच्चे दिलों को छह महीनों तक एक-दूसरे से दूर रखा।

     

    समाप्त….

    आपका एक लाइक मेरे लिए बहुत कीमती है।

     

  • बेवफाई

    बेवफाई

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    बेवफाई

    Part 1

     

    “कुछ रिश्ते टूटते नहीं हैं… बस उनमें से भरोसा मर जाता है।

    और जब भरोसा मर जाए, तो प्यार कितना भी जिंदा हो… रिश्ता सांस नहीं ले पाता।”

     

    शाम के करीब सात बज रहे थे।

     

    मुंबई की सड़कों पर बारिश अपना पूरा जोर दिखा रही थी। आसमान काले बादलों से घिरा था और सड़क पर दौड़ती गाड़ियों की रोशनी पानी की बूंदों में घुलकर किसी धुंधली तस्वीर जैसी लग रही थी।

     

    रिया माथुर खिड़की के पास खड़ी लगातार घड़ी देख रही थी। उसने हल्के आसमानी रंग की बहुत सी सुंदर साड़ी पहनी हुई थी, चेहरे पर हल्का सा मेकअप, मांग में सिंदूर, गले में मंगलसूत्र। 

     

    आज उसके चेहरे पर महीनों बाद थोड़ी सी खुशी दिखाई दे रही थी।

     

    उसने कमरे को खुद सजाया था। टेबल पर मोमबत्तियां थीं। बीच में आरव का पसंदीदा चॉकलेट केक रखा था, जो उसने खुद अपने हाथों से बनाया था और उसके पास रखा था… एक छोटा-सा गिफ्ट बॉक्स।

     

    रिया ने अपने हाथ में पकड़े फोन की स्क्रीन देखी।

     

    “आरव ❤️” उसने फिर मैसेज किया।

     

    “कितनी देर और? आज जल्दी आना… तुम्हारे लिए एक सरप्राइज है।”

     

    मैसेज भेजने के बाद उसके चेहरे पर हल्की मुस्कान आ गई। आज उनकी शादी की तीसरी सालगिरह थी।

     

    तीन साल पहले इसी दिन आरव ने उसका हाथ पकड़कर सात फेरे लिए थे और कहा था, “रिया, जिंदगी चाहे जितनी मुश्किल हो जाए, मैं तुम्हारा हाथ कभी नहीं छोड़ूंगा।”

     

    रिया ने उस दिन उस एक वादे पर अपनी पूरी जिंदगी रख दी थी। और आज…

    वह उसी वादे का जश्न मनाने के लिए उसका इंतजार कर रही थी।

     

    रात के करीब आठ बजे दरवाजे की घंटी बजी।

     

    रिया की आंखें चमक उठीं। “आरव!” उसने धीरे से नाम लिया, और आंखों में चमक लिए, वह दौड़कर दरवाजे तक पहुंची।

     

    लेकिन दरवाजे के बाहर आरव नहीं था। कूरियर वाला खड़ा था। उसे देखकर रिया के चेहरे की चमक पलभर में गायब हो गई। 

     

    “मैडम, आपके नाम का पार्सल।” कुरियर वाले ने एक पैकेट रिया की तरफ बढ़ाते हुए कहा।

    पहले तो रिया को थोड़ी हैरानी हुई, लेकिन फिर उसने पैकेट ले लिया। 

     

    “थैंक यू।” कहकर उसने एक पर्चे में साइन किया और फिर दरवाजा बंद करके अंदर आ गई। 

    वो पैकेट अभी भी उसके हाथ में था।

     

    पहले उसने सोचा आरव को फोन करने के बाद वो पैकेट खोलेगी, लेकिन फिर जाने क्या सोचकर उसने फोन टेबल पर रखना और पैकेट खोलने लगी। 

     

    अंदर एक फाइल थी। रिया ने हैरानी से फाइल खोली।

     

    पहले पन्ने पर लिखा था, “तलाक का समझौता।”

     

    जैसे ही उसने वो शब्द पढ़े, उसकी सांस जैसे वहीं रुक गई। “नहीं…” उसके हाथ कांपने लगे। “ये… ये क्या है?”

     

    फाइल के अंदर आरव के हस्ताक्षर किए हुए कागजात रखे थे। तलाक के कागजात।

     

    रिया ने तुरंत आरव को फोन किया।

     

    एक बार… दो बार… पांच बार… लेकिन सामने से कोई जवाब नहीं।

     

    फिर फोन बंद हो गया। रिया फर्श पर बैठ गई, उसकी दुनिया मानो पलभर में पूरी तरह से उजड़ गई। आंखों के सामने तीन साल की पूरी जिंदगी घूम गई।

     

    पहली मुलाकात। पहली लड़ाई। पहली बारिश।

     

    पहली सालगिरह। आरव का उसे देखकर मुस्कुराना।

     

    और वह रात… जब आरव ने उसके माथे को चूमकर कहा था, “तुम मेरी जिंदगी की सबसे खूबसूरत गलती नहीं, सबसे सही पसंद हो।”

     

    रिया की आंखों से आंसू बह निकले। तभी उसके फोन पर एक नोटिफिकेशन आया।

     

    एक फोटो। रिया की उंगलियां ठिठक गईं। फोटो में आरव था। और उसके साथ एक लड़की। दोनों एक-दूसरे के बेहद करीब खड़े थे। लड़की के चेहरे पर मुस्कान थी। और आरव… उसे उसी तरह देख रहा था, जैसे कभी वह रिया को देखा करता था।

     

    फोटो के नीचे लिखा था, 

    “Finally… together. ❤️”

     

    रिया की आंखें फैल गईं। उसने फोटो को बार-बार देखा। फिर लड़की का चेहरा पहचानते ही उसके पैरों तले जमीन खिसक गई।

     

    मीरा। आरव की ऑफिस पार्टनर।

     

    वही मीरा जिसे लेकर रिया ने कई बार मजाक में कहा था, “तुम दोनों साथ में बहुत अच्छे लगते हो।”

     

    और आरव हर बार हंसकर कहता था, “रिया तुम पागल हो क्या? मेरे लिए सिर्फ तुम हो, मुझे किसी और की जरूरत नहीं है।”

     

    रिया ने उस वक्त उस पर भरोसा किया था। जब कभी आरव उसके साथ बिजनेस ट्रिप पर जाता, लेकिन रिया ने कभी उसपर रत्ती भर शक नहीं किया। 

    लेकिन, आज वही भरोसा उसके सामने टूटकर बिखर चुका था।

     

     

    अगली सुबह रिया सीधे आरव के ऑफिस पहुंची।

     

    रिसेप्शन पर पहुंचते ही उसने पूछा, “आरव कहां है?”

     

    रिसेप्शनिस्ट ने उसे देखकर नजरें झुका लीं। “मैम… सर मीटिंग में हैं।”

     

    “मीटिंग?” रिया हंस पड़ी। वह हंसी जिसमें दर्द था। “उन्हें बुलाइए, कहिए कि मैं मिलना चाहती हूँ।”

     

     

    कुछ मिनट बाद आरव बाहर आया। काली शर्ट, चेहरे पर वही गंभीरता और आंखों में ऐसी ठंडक जैसे रिया उसके लिए कोई अजनबी हो।

     

    रिया उसे देखकर कुछ पल तक बस खड़ी रही। फिर बोली, “तुमने मुझे तलाक के पेपर भेजे?”

     

    आरव चुप रहा। 

     

    “मुझसे एक बार पूछना भी जरूरी नहीं समझा?” रिया ने उसकी आंखों में देखते हुए पूछा। 

     

    आरव ने कठोर शब्दों में कहा, “अब पूछने को बचा ही क्या है?”

     

    रिया का दिल टूट गया। “मतलब?”

     

    आरव ने नजरें फेर लीं। “मैं इस रिश्ते में नहीं रहना चाहता।”

     

    रिया टूटी आवाज में, “क्यों?”

     

    आरव, “बस नहीं रहना चाहता।”

     

    “झूठ!” रिया चीख पड़ी। “तुम मुझसे प्यार करते थे!”

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा। “था।”

     

    बस एक शब्द। था। रिया को लगा जैसे किसी ने उसके सीने के बीचोंबीच वार कर दिया हो।

     

    “तो मीरा की वजह से?” आरव ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    रिया की आंखों में आंसू भर आए। “तीन साल का रिश्ता… और तुमने इसे इतनी आसानी से खत्म कर दिया?”

     

    “आसानी से?” आरव की आवाज पहली बार थोड़ी भारी हुई। “तुम्हें लगता है मेरे लिए आसान था?”

     

    “तो फिर मुझे छोड़ क्यों रहे हो?” आरव कुछ कहने ही वाला था कि पीछे से मीरा की आवाज आई, “आरव…”

     

    रिया ने मुड़कर देखा। मीरा वहां खड़ी थी। उसके चेहरे पर हल्की मुस्कान थी। वह सीधे आरव के पास आकर खड़ी हो गई। रिया ने दोनों को देखा।

     

    फिर अपनी आंखों से आंसू पोंछते हुए बोली, “शायद मेरी जगह अब यहां नहीं है।”

     

    वह मुड़ी। लेकिन जाते-जाते उसने आरव की तरफ देखा। “एक बात याद रखना…”

     

    आरव की

    आंखें उससे मिलीं। “जिस इंसान ने तुम्हें सबसे ज्यादा प्यार किया था, उसे तुमने आज खुद से दूर कर दिया है।”

     

    और वह चली गई।

     

    To be continued..

    क्या सच में बिखर कर रह जाएगा आरव और रिया का रिश्ता। या कहानी आगे कुछ नया मोड लेगी जानने के लिए अगला भाग जरूर पढ़े। 

    और कहानी को आपका एक कीमती लाइक जरूर दें

     

  • अधूरी इबादत भाग~30

    अधूरी इबादत भाग~30

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    भाग~30 अद्वैत गया कहाँ? 

     

    अद्वैत की ज़िंदगी में एक नया अध्याय शुरू होने को था, जैसे किसी शांत सागर की सतह पर अचानक हल्की सी लहरें उठने लगें। 

    उसी शाम, जब घर में एक अजीब सी बेचैनी थी और मन कई सवालों के बीच उलझा हुआ था, उसी वक्त उसके मोबाइल की घंटी ने कमरे की सन्नाटे को तोड़ दिया। 

    अद्वैत ने फोन उठाया तो एक अनजानी लेकिन आत्मविश्वास से भरी आवाज़ ने उसे चौका दिया… “नमस्ते, मैं नेहा बोल रही हूँ, शब्दांजलि पब्लिकेशन की मैनेजर। उम्मीद है आप मेरी बात से अचानक परेशान नहीं होंगे?” 

    अद्वैत ने हौले से मुस्कुरा कर जवाब दिया, “नहीं, बिल्कुल नहीं… कहिए।” 

    मन ही मन उसका दिल धड़कने लगा था, जैसे किसी भूले-बिसरे ख़्वाब की दस्तक मिल रही हो।

    नेहा की आवाज़ में उत्साह था, “हमने आपकी किताब ‘यादों से परे’ पढ़ी है… और यकीन मानिए, जितनी बार पढ़ी, उतनी बार महसूस किया कि हम किसी कहानी को नहीं, किसी की अधूरी साँसों को पढ़ रहे हैं। इसी गहराई के चलते हम आपको और आपकी पत्नी को हमारे सालाना साहित्यिक समारोह में आमंत्रित करना चाहते हैं, जहाँ आपकी मौजूदगी से यह आयोजन और भी खास बन जाएगा।”

    पत्नी शब्द सुनते ही अद्वैत के भीतर कुछ धीमे से दरक गया, जैसे कोई पुराना ज़ख्म फिर से सांस लेने लगा हो। लेकिन उसने खुद को संभालते हुए पूछा, “कब और कहाँ?”

    “अगले रविवार, दोपहर तीन बजे। जगह – साहित्य भवन ऑडिटोरियम, कोरेगांव पार्क, पुणे। हमें उम्मीद है कि आप दोनों ज़रूर आएँगे।”

    अद्वैत ने सिर झुकाकर कहा, “हम कोशिश करेंगे, मेल कर दीजिएगा।”

    थोड़ी देर ठहराव के बाद उसने सवाल किया, “वैसे, आपको मेरे मैनेजर से बात करनी चाहिए थी, जो मेरे सारे काम देखते हैं।”

    नेहा ने हँसते हुए जवाब दिया, “हमने ही तो आपके मैनेजर से आपका नंबर लिया है, पर हमें लगा कि आपको खुद ही व्यक्तिगत रूप से आमंत्रित करना बेहतर रहेगा। इसीलिए मैंने सीधे आपसे ही बात की।”

    फोन रखते ही वो कुछ पलों तक सन्न खड़ा रहा। कमरे की हल्की रोशनी में अद्वैत का चेहरा आधे उजाले और आधी छाया में ढला हुआ था, जैसे उसके भीतर उठते भाव भी दो ध्रुवों पर झूल रहे हों… स्पष्टता और संशय के। 

    खिड़की से आती हवा परदों को हौले से हिलाती, जैसे वे भी उसकी उलझनों की फुसफुसाहट दोहरा रहे हों। बाहर का शांत आसमान उसके भीतर के शोर से बिल्कुल विपरीत था।

    टेबल पर फैले दस्तावेज़ अब भी वहीं थे, लैपटॉप की नीली रौशनी उसके चेहरे को टुकड़ों में रोशन कर रही थी, और कोने में पड़ी चाय की कप… जो अब ठंडी हो चुकी थी… जैसे उसके भीतर की उलझनों की प्रतीक बन गई हो।

    उसके अंदर एक खामोश उथल-पुथल चल रही थी — “कैसे कहूँ रूहानी से? क्या वो तैयार होगी? क्या उसे बुरा तो नहीं लगेगा?” 

    वह जानता था कि यह शादी सिर्फ एक समझौता थी, एक काग़ज़ी डोर जिसने दोनों को किसी ज़रूरत की वजह से बाँध रखा था। लेकिन अब हालात कुछ और माँग रहे थे।

    वो जानता था, यह न्योता किसी आम किताब के लेखक को नहीं मिला था… ये एक लेखक को मिला था जो अपने पाठकों की आत्मा को छू चुका था और उसी लेखक के साथ उसकी “पत्नी” को भी आमंत्रित किया गया था… जो असल में उसकी जिंदगी का एक किरदार थी, एक सहयात्री, लेकिन अभी भी एक अनकहा सवाल।

    अद्वैत के मन में विचारों की परतें खुलने लगीं “कहीं ये सब उसे बोझ तो नहीं लगेगा? पर अगर मैं उसे नहीं ले गया तो… ये मौका ही अधूरा रह जाएगा और इस समझौते की पहली शर्त ही तो यही थी कि बाहर की दुनिया के सामने हम एक साथ दिखेंगे… एक पति-पत्नी की तरह।”

    पर अब सवाल काग़ज़ों का नहीं था… सवाल उस मौन का था, जो उनके बीच धीरे-धीरे बोलने लगा था।

    और उस एक क्षण में, जब हवा ने परदे को हौले से छुआ… अद्वैत को लगा, शायद उसे रूहानी से ये बात कहनी ही होगी… चाहे जैसे भी।

    °°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°

    धूप धीमे-धीमे ढल रही थी और आसमान हल्के नारंगी रंग में रंग चुका था, जैसे कोई उम्मीद फिर से उग आई हो। रूहानी, मीना के साथ, वेस्‍ट धनोरी की ओर जा रही थी…. एक ऐसा इलाका जो उसके लिए अब तक सिर्फ नक्शे की रेखा भर था, लेकिन आज वह वहाँ अपने सपनों की नींव रखने चली थी। 

    कैब की खिड़की से बाहर झाँकते हुए उसके चेहरे पर हल्की चिंता थी, लेकिन आँखों में चमक थी…. वो चमक जो तब आती है जब किसी टूटी चीज़ को फिर से जोड़ने की जिद भीतर सांस ले रही हो।

    रास्ते भर वो खामोश नहीं रही। उसने मीना की तरफ देख कर कहा, “मीना, तुम्हें याद है तुमने आज सुबह मुझसे पूछा था कि मैं आसपास में कुछ ढूँढ रही हूँ क्या? तब मैं नहीं बता पाई… अब बताती हूँ… मैं अपना खुद का ड्रेस डिज़ाइनिंग स्टूडियो खोलना चाहती हूँ। वही सपना जिसे मैंने किसी वजह से कहीं गुम कर दिया था, शायद अब वक्त आ गया है कि उसे फिर से जिया जाए।”

    मीना चौंक गई, “सच में, मैडम? आप… खुद का बुटीक?”

    रूहानी की आँखों में एक हल्की सी मुस्कान उभर आई, जो उम्मीद और जज़्बातों के बीच झलक रही थी। उसने धीमे से कहा, “हाँ मीना, मैंने बहुत सोच-समझ कर ये फैसला लिया है। अब वक्त आ गया है कि मैं अपनी पहचान खुद बनाऊं, अपनी कला को अपनी मर्जी से उड़ान दूं। ये सिर्फ एक दुकान नहीं, मेरे सपनों का घर होगा, जहाँ मैं अपने दिल की हर कहानी कपड़ों में बुन सकूँ।” 

    वो सोच रही थी—कितनी बार खुद को नज़रअंदाज़ किया, दूसरों के लिए। पहले पिता की उम्मीदें, फिर समाज के ताने और फिर एक ऐसा रिश्ता, जो नाम तो पाता रहा लेकिन रंग कभी न चढ़ा। 

    जैसे ही वो धनोरी पहुँची, मीना ने उसे एक दुकान दिखाई। पुराने ज़माने की मिठाई की दुकान, जो अब लगभग बंद सी पड़ी थी। लेकिन उसकी जगह में वो ताजगी और खुलापन था, जिसे देखकर रूहानी की आँखें चमक उठीं।

    “यही है जगह,” मीना ने कहा।

    रूहानी उतरी, चारों ओर देखा…. दायीं ओर सब्ज़ी मंडी थी, बायीं तरफ़ एक पार्क। दुकान की छत पर पुराना सा बोर्ड अब भी झूल रहा था। पर उसकी कल्पना में, वहाँ रैक थे, फैब्रिक्स थे, स्केचिंग टेबल थी, दीवारों पर डिजाइन के फ्रेम थे और खिड़कियों से झांकती धूप थी।

    वो बोली, “मुझे यही चाहिए।”

    मीना ने तुरंत ज़मीन मालिक को कॉल किया। थोड़ी देर में ही एक बुजुर्ग आदमी सामने आया। बातों का सिलसिला चला…. किराया, शर्तें, दस्तावेज़ और तभी रूहानी ने कहा, “नहीं, मैं इसे खरीदना चाहती हूँ, किराए पर नहीं।”

    बुजुर्ग मालिक चौंक गए। उन्होंने सोचा कि एक युवा महिला, वो भी अकेली, इतनी जल्दी फैसला कैसे ले सकती है। लेकिन रूहानी की आँखों में जो संकल्प था, उसने किसी भी तर्क को पीछे छोड़ दिया। थोड़ी बहस के बाद, अगली सुबह के लिए मीटिंग तय हो गई।

    मीना ने कहा, “मैडम, आप तो बिलकुल जैसे फिल्म की हीरोइन लग रही हो….. एकदम ठान लेती हो, और फिर कर दिखाती हो।”

    रूहानी मुस्कुराई, लेकिन अंदर ही अंदर उसकी आत्मा कांप रही थी। कितनी हिम्मत जुटाई थी इस एक कदम के लिए। 

    लौटते वक़्त, वो मीना को सब्ज़ी मंडी ले गई। हल्के भाव से बोली, “चलो कुछ ऐसा खरीदते हैं, जो शाम को पकाकर लगे कि सच में ज़िंदगी में कुछ नया हुआ है।”

    घर लौटते वक़्त, गाड़ी की खिड़की से बाहर दिख रहा शाम का झुटपुटा…. ठीक वैसा ही था जैसा उसके दिल में था। अंधेरे और रौशनी के बीच झूलता हुआ, जैसे कोई नया अध्याय शुरू होने को हो… लेकिन पन्ने अभी खुले नहीं थे।

    उसने खामोशी से अपने हाथ की मुट्ठी कस ली, जैसे खुद को यकीन दिला रही हो—“अब पीछे नहीं हटूंगी।”

    अगली सुबह उसे तय करनी थी ज़मीन की डील… और शायद अपनी तक़दीर की भी।

    °°°°°°°°°°°°°°°°°

    जब मीना और रूहानी घर पहुँचीं, तो सामने एक नजारा था जिसने दोनों के दिल की धड़कनें रोक दीं। मीना की मासूम बेटी, गुनगुन, और छोटा भाई चीकू, जो अक्सर शरारती तो थे लेकिन कभी बुरी नियत के नहीं। 

    वे दोनों डरे हुए, खामोश और एक अजीब सी बेचैनी लिए खड़े थे। रूहानी की नज़रें सीधे उस कोने की ओर गईं जहाँ अद्वैत बैठा हुआ था, लेकिन वहाँ कोई था ही नहीं।

    दरवाज़ा खुलते ही मीना के चेहरे पर चिंता के बादल घिर आए। “ये क्या हुआ? तुम दोनों ऐसे क्यों खड़े हो?”

    —————

    अद्वैत के कमरे में उठी बेचैनी के बीच, क्या वह सच में रूहानी को इस न्योते की खबर देगा? 

    क्या उनकी अधूरी ज़िंदगी की डोर इस बार मजबूत होगी, या फिर टूट जाएगी? 

    उस खाली कोने में अद्वैत के न होने का रहस्य क्या छुपा था?

  • अधूरी इबादत भाग~29

    अधूरी इबादत भाग~29

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    भाग~29 मुस्कुराते जख्म

     

    मीना का अचानक अपने दोनों बच्चों के साथ घर आ जाना अद्वैत और रूहानी के लिए किसी अनचाही दस्तक की तरह था। दोनों ही उस क्षण के लिए तैयार नहीं थे और उससे भी ज़्यादा चौंकाने वाला था उसका बेझिझक सवाल, “सर, आप अपनी ही पत्नी को उधार पर पैसे दे रहे हो?” 

    उस एक वाक्य ने जैसे रूहानी की रगों में ठंडा लावा भर दिया। उसकी साँस अटक गई, दिल धड़कने के बजाय थम सा गया और पल भर के लिए उसकी सोचने-समझने की ताकत जैसे वहीं कहीं गुम हो गई।

    वो पल, जब उसका दिल और दिमाग एक-दूसरे से सवाल करने लगे….. अगर अब सच सामने आ गया तो? अगर मीना ने बात आगे बढ़ा दी तो? क्या उसका करियर जो अभी दोबारा सांस लेना शुरू ही कर रहा है, फिर से खत्म हो जाएगा? क्या वो फिर वहीं लौट जाएगी जहां से वो आई थी… अकेलेपन, असुरक्षा और असफलता के अंधेरे में?

    रूहानी की आँखें अद्वैत की तरफ उठीं, जिसमें डर, उलझन और एक खामोश मदद की गुहार थी। अद्वैत ने उसकी ओर देखा और जैसे ही मीना के सवाल की गंभीरता को उसने समझा, उसके होंठों पर एक हल्की मुस्कान उभरी। वो मुस्कान जिसमें नाटक था, समझदारी थी और समय की नजाकत को पकड़ लेने की कला भी।

    “अरे मीना,” अद्वैत ने एकदम सहजता से कहा, “ये तो मेरी नई कहानी की स्क्रिप्ट थी। रूहानी को बस वही पढ़ने दी थी, उसका फीडबैक लेना था।”

    उसके कहते ही जैसे रूहानी को भी अपनी आवाज़ वापस मिल गई। वो तुरंत बात को पकड़ते हुए मुस्कुरा कर बोली, “हाँ, अद्वैत ने इतना अच्छा लिखा है कि तुम भी कन्फ्यूज़ हो गई।”

    उन दोनों के बीच एक नजरों की मुस्कराहट का आदान-प्रदान हुआ, मानो उस छोटे से झूठ ने एक बड़ा तूफान टाल दिया हो। अद्वैत ने बिना कुछ कहे ही सारे दस्तावेज़ समेट लिए…. पर उस कमरे में कुछ था जो अब भी अधूरा था… एक अनकहा सच, जो बस एक और सवाल की दूरी पर था।

    मीना ने जैसे ही ‘हाँ’ में सिर हिलाया, माहौल में एक हल्की सी सहजता लौटती दिखाई दी। वो मुस्कुराते हुए सोफे के पास आई और रूहानी के पास बैठते हुए बोली, “यही मेरी बेटी है, इसी का जन्मदिन आने वाला है, जिसके लिए मुझे कपड़े बनवाने थे।”

    रूहानी ने अपनी आंखें धीरे से उस बच्ची की ओर घुमाईं। लगभग दस-ग्यारह साल की मासूम सी बच्ची, जिसकी बड़ी-बड़ी आँखों में जिज्ञासा और सादगी का उजाला था। उसके पास खड़ा उसका छोटा भाई, करीब छह-सात साल का, अपनी बहन की उंगलियों में उंगलियाँ फंसाए, थोड़ा सकुचाया हुआ लेकिन उतना ही प्यारा।

    रूहानी को अपनी ओर यूँ देखते पाकर दोनों बच्चों ने एक साथ हाथ जोड़कर कहा, “नमस्ते।” उनके भोलेपन से उसका दिल भी एक पल को हल्का हो गया। उसने उन्हें अपने पास बुलाया और बड़े प्यार से पूछा, “क्या नाम है तुम दोनों का?”

    बच्ची ने मुस्कुरा कर कहा, “मेरा नाम गुनगुन है।” लड़के ने झेंपते हुए जवाब दिया, “मेरा नाम चीकू है।”

    रूहानी ने हल्के अंदाज़ में ताली बजाते हुए कहा, “अरे, कितने प्यारे नाम हैं तुम दोनों के! बिलकुल तुम लोगों जैसे ही खुशबूदार और मीठे।”

    तभी रूहानी से थोड़ी दूरी पर बैठा अद्वैत, जो यह दृश्य चुपचाप देख रहा था, मीना की ओर देखते हुए मुस्कुरा कर बोला, “पहले बच्चों के लिए कुछ स्नैक्स तो ले आओ, मीना।”

    अद्वैत की आवाज़ में अपनापन और ज़िम्मेदारी का मेल था, जिसने मीना को जैसे नींद से जगाया। वो तुरंत हड़बड़ाते हुए बोली, “जी सर, अभी लाती हूँ।” और जल्दी से किचन की ओर बढ़ गई।

    उस एक नज़र में रूहानी की आंखों में जो नूर था, वो किसी अनकहे एहसास का आईना था… शायद अधूरी ममता की वो आवाज़, जो दिल के किसी कोने में गूँज रही थी, या फिर कोई ऐसा जज़्बा जो अभी लबों तक आना चाहता था, मगर शब्दों की ज़ंजीरों में जकड़ा हुआ था।

    जब दोनों बच्चे खुशी-खुशी स्नैक्स में मगन हो गए, तो मीना ने थोड़ी झिझक के साथ रूहानी की ओर देखा और बोली, “मेरे पास उस ड्रेस का कोई फोटो तो नहीं है, मैडम… लेकिन मैं आपको बता सकती हूं कि वो कैसी दिखती थी।”

    रूहानी ने मुस्कुराकर कहा, “ठीक है, तुम बताओ, मैं उसका स्केच बना लेती हूं।”

    मीना की आंखें चमक उठीं और वो अपने शब्दों से एक तस्वीर गढ़ने लगी, “मैडम, वो एक लाल रंग का बड़ा सा फ्रॉक था… छम-छम करता हुआ, जैसे शाम के वक्त ढलते सूरज की रोशनी में आसमान रंगीन हो जाता है। उस पर छोटी-छोटी सुनहरी कलियाँ थीं, जो बिल्कुल अमावस की रात में टिमटिमाते तारों जैसे लगती थीं। और उसकी चुनरी… वो अलग से नहीं थी, कंधे से जड़ी थी, बहुत हल्की… जैसे कोई धुंधली बदली हो, लेकिन मोतियों के तारों से सजी हुई।”

    मीना के शब्दों से जैसे रंग झरने लगे और रूहानी का हाथ खुद-ब-खुद चलने लगा। वह बड़ी तल्लीनता से स्केच बना रही थी। उसकी उंगलियाँ कागज़ पर नर्म लकीरें खींच रही थीं और उसकी आंखें उस कल्पना को सच में ढाल रही थीं।

    उस पल अद्वैत चुपचाप बैठा, सिर्फ रूहानी को ही देख रहा था। उसके चेहरे की एक-एक रेखा, उसके हिलते होंठ, उसके पलकें झपकाने का अंदाज़… सब कुछ उसे असामान्य रूप से आकर्षित कर रहा था। वो उस पल की मासूमियत और रूहानी की गंभीरता में कहीं गुम होता जा रहा था। लेकिन रूहानी को इस टकटकी का कोई आभास नहीं था।

    जब स्केच पूरा हुआ, तो रूहानी ने गुनगुन को पास बुलाया और उसका नाप भी बड़े प्यार से लिया। अद्वैत बस बैठा रहा, जैसे वो उस दृश्य का हिस्सा नहीं, बल्कि कोई दर्शक हो… मगर उसके भीतर कुछ था, जो धीरे-धीरे खिंचता चला जा रहा था…. अदृश्य डोर सा।

    इस सबके बाद रूहानी ने मीना के साथ किचन में जाकर धीरे से पूछा, “मैंने तुमसे सुबह पूछा था, यहाँ आसपास कहीं कोई जगह या दुकान मिलेगी खाली? तुम्हें पता चला क्या?” उसकी आवाज़ में एक उम्मीद थी, जो कहीं दबे हुए बोझ से निकल रही थी।

    मीना ने सिर हिलाते हुए कहा, “हाँ, एक जगह तो है, लेकिन यहाँ से 10-15 मिनट की दूरी पर।” रूहानी की आंखों में एक हल्की सी चमक आई, मानो एक दरवाजा खुलने वाला हो। 

    उसने तुरंत कहा, “क्या तुम अभी चल सकती हो? तुम्हारे बच्चे यहाँ रहेंगे, अद्वैत के पास।”

    मीना ने थोड़ा हिचकते हुए हामी भरी और कुछ कहने लगी, तभी रूहानी बिना किसी देरी के अद्वैत के पास गई और बोली, “हमें थोड़ी देर के लिए बाहर जाना है, तुम जब तक बच्चों को देख लेना।” 

    अद्वैत पहले तो अचानक चौंक गया, उसकी सांसों में अचानक रुकावट सी आई, फिर उसने धीरे से सिर हिलाया, जैसे उसने मान लिया हो कि ये जरूरी है।

    मीना बार-बार पूछती रही, “सच में आपको कोई दिक्कत नहीं होगी, सर?” और रूहानी ने उसका हाथ पकड़ते हुए हल्का सा खींचा, दोनों बच्चों की ओर देखते हुए कहा, “हम दोनों बस आधे घंटे में आ जाएंगे, तब तक अद्वैत अंकल के साथ मस्ती करना।” मीना ने राहत भरी सांस ली और दोनों बहार निकल गईं।

    दरवाजा बंद होते ही, अद्वैत की आँखों में एक अनकही बेचैनी और सवालों की गूंज थी, जो हवा में तैर रही थी। उसके दिल की धड़कन तेज़ हो गई थी, जैसे कोई अनजाना तूफ़ान उसके अंदर उठ रहा हो। वह उन क्षणों को समझने की कोशिश था। 

    “क्या ये सच में इतना कठिन है?” अद्वैत खुद से कहता हुआ, अपने दिल की गहराई में कहीं एक तूफान उठने लगा था। बाहर की ठंडी हवा की तरह, जो आंधी में बदलने को हो, जैसे किसी बड़े बदलाव की आहट हो।

    और तभी, अद्वैत के मोबाइल की घंटी ने कमरे की चुप्पी को तोड़ा…. एक अनजान नंबर से कॉल आ रही थी, जिससे उनकी ज़िंदगियाँ एक नई मुड़ाव लेने वाली थीं…

    ————

    क्या रूहानी और अद्वैत के बीच जो मुस्कुराहट थी, वह सच में एक झूठ छुपा रही थी? 

    वह अनजान नंबर… क्या वह कॉल उनके अब तक छुपे हुए अतीत की कोई भूली हुई कहानी वापस लेकर आने वाली थी?

    किस्मत के इस नए मोड़ पर, क्या वे तैयार थे सच का सामना करने के लिए?

     

  • अधूरी इबादत भाग~28

    अधूरी इबादत भाग~28

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    भाग~28 तुम-मैं… और बीच की दीवार 

     

    रूहानी ने जैसे ही अद्वैत की आवाज़ सुनी, वैसे ही उसका बेकाबू रोना एकदम से थम गया, मानो उस आवाज़ ने उसके भीतर चल रही हर गूंज को पलभर में बाँध दिया हो।

    उसने पलकों के पीछे ठहरे आँसुओं को सँभालते हुए, धीरे-धीरे अपनी हथेलियाँ चेहरे से हटा ली। आँखें अब भी लाल थीं, लेकिन उन आँखों में कुछ पल पहले की बेबसी की जगह अब एक चुप्पी थी…. भारी, गूढ़ और बेहद निजी।

    सामने अद्वैत खड़ा था, उसके बिखरे बालों में, चेहरे पर बेचैनी थी और तेज़ साँसों में चिंता की महक। रूहानी को उम्मीद नहीं थी कि वह इस वक़्त घर पर होगा। 

    उसका मन पहले ही हज़ार उलझनों से भरा था, और अद्वैत का इस तरह अचानक सामने होना जैसे उसके भीतर एक और तह खोल गया।

    रूहानी ने अपने आँसू जल्दबाज़ी में पोंछे, और कुछ कहने की कोशिश में खुद को संयत किया। वो जानती थी कि उसके चेहरे पर जो गुज़रा है, उसे शब्दों में नहीं बाँधा जा सकता और न ही वो बाँधना चाहती थी। 

    उसने बस हवा में कुछ हलकापन घोलने की कोशिश की। अद्वैत की आँखों में अब भी सवाल थे, लेकिन वो सवाल रूहानी ने जैसे हवा में भंग कर दिए।

    “आज तुम घर पर?” उसके स्वर में हैरानी थी, मगर आवाज़ में झूठी सादगी की परत भी थी।

    फिर थोड़ी कोशिश से मुस्कराते हुए बोली, “अरे वाह… Mr. Writer के पास फुर्सत का भी कोई कोना होता है क्या?”

    उसने जान-बूझकर अपनी थकी हुई आत्मा को एक मुस्कान ओढ़ा दी थी… एक ऐसी मुस्कान जो अद्वैत की बेचैनी को ढकने के लिए नहीं, बल्कि अपनी खुद की बिखरी हुई चुप्पियों को बचाने के लिए थी।

    अद्वैत रूहानी के अजीब बर्ताव पर अपनी भौंहें तिरछी करता है, उसका चेहरा उलझन में डूबा हुआ था। 

    हल्के स्वर में मगर साफ चिंता के साथ वह बोला, “तुम ठीक तो हो ना?”

    रूहानी ने बिना उसकी आंखों में देखे, जल्दबाज़ी में खुद को संभालते हुए जवाब दिया, “हां, बिल्कुल ठीक हूं मैं।”

    फिर, एक अलग ही दिशा में बातचीत मोड़ते हुए उसने पूछा, “तुमने खाना खाया?”

    अद्वैत ने बिना शब्दों के केवल सिर हिला दिया, ‘ना’ में।

    “मैं चेंज करके आती हूं,” रूहानी ने कहा, उसकी आवाज़ में अब थोड़ी कृत्रिम चंचलता थी। “दोपहर हो गई है… तब खाना खा लेते हैं, मुझे ज़ोरों की भूख लग रही है।”

    इतना कहते हुए वो तेजी से अपने कमरे की ओर बढ़ गई। उसके पाँव भारी थे, मगर चाल में हल्की जल्दी थी—जैसे वो उस क्षण से दूर भागना चाहती हो।

    जब रूहानी कमरे में चली गई, अद्वैत वहीं दरवाज़े के पास खड़ा रह गया। उसका दिल अब भी धड़क रहा था, लेकिन धड़कनों के पीछे कुछ और भी था… एक बेचैन सोच, एक अनकही पीड़ा।

    उसके मन में सवालों की बारिश होने लगी थी… “वो क्यों रो रही थी?” 

    “क्या हुआ उसे बाहर?” 

    “उसने बात क्यों बदल दी इतनी जल्दी?”

    उसकी मुट्ठियाँ अपने आप भींच गई थीं, और होंठ एक रेखा में सिमट गए थे।

    वो चाहता था कि उसके पीछे जाए, उसका हाथ थामे और पूछे—”क्या हुआ है, रूहानी?” लेकिन उसका दिल रुक गया… पाँव ज़मीन में जड़ हो गए।

    वो बस एक गहरी सांस लेकर खुद से बुदबुदाया—”क्यों हर बार जब वो रोती है, मेरा सीना इतना भारी हो जाता है… जैसे उसके आँसू मेरी रूह तक पहुंचते हों?”

    उस एक क्षण में, दोनों कमरों के बीच खड़ी दीवार से एक और दीवार बन चुकी थी…. खामोशी की, और अधूरी बातों की।

    जब रूहानी अपने कमरे से निकली तो उसकी आँखों में अब भी हल्की सी नमी थी, लेकिन चेहरे पर एक बनावटी मुस्कान टिकी हुई थी।

    उसने खुद को साधारण से सफेद कुर्ती और हल्के नीले प्लाज़ो में ढाल लिया था… कुछ ऐसा पहनावा जो उसकी सादगी और थकान दोनों को बख़ूबी बयां कर रहा था। 

    वह धीमे कदमों से किचन की ओर बढ़ी और सीधे फ्रिज का दरवाज़ा खोला। ठंडी हवा का हल्का झोंका उसके चेहरे से टकराया, पर अंदर कुछ नहीं था…. ना कोई टिफिन, ना कोई कटोरी, बस खालीपन।

    उसने इधर-उधर नज़रें घुमाईं और पाया कि सारा खाना डाइनिंग टेबल पर बाहर ही रखा हुआ है। किचन ओपन था, इसलिए उसकी नज़रें फौरन सामने बैठे अद्वैत से टकराईं जो टेबल पर बैठा, फोन में कुछ पढ़ रहा था।

    “आज मीना ने खाना बनाकर बाहर ही क्यों छोड़ दिया, फ्रिज में क्यों नहीं रखा?” उसने हल्के उलझे स्वर में पूछा।

    अद्वैत ने नजरें उठाईं और बिना किसी खास भाव के जवाब दिया, “उसने मुझसे पूछा था कि मैं घर पर ही हूँ। खाना बहुत गरम था, इसलिए उसने फ्रिज में नहीं रखा।”

    रूहानी ने बिना कुछ कहे सिर हिलाया और प्लेट पर खाना परोसने लगी। फिर दोनों टेबल पर आमने-सामने बैठकर खाना खाने लगे। चम्मच की हल्की खनक और कभी-कभी अद्वैत की कुर्सी की सरसराहट के अलावा कोई और आवाज़ नहीं थी।

    कुछ मिनटों बाद, जैसे ही एक निवाला मुँह में डाला, रूहानी को अचानक कुछ याद आया। उसने चुप्पी तोड़ते हुए पूछा, “डॉक्युमेंट तो बन गए होंगे ना?”

    अद्वैत ने एक पल के लिए उसकी ओर देखा, उसकी आँखों में हल्की हैरानी थी, शायद इसलिए भी कि अचानक रूहानी ने वही बात छेड़ दी थी जिसे वह खुद टालना चाहता था। 

    उसके होंठ खुलने ही वाले थे कि रूहानी ने झट से बात काट दी, “ओह! सॉरी, मैं भूल गई थी कि तुम्हें खाते समय बोलना पसंद नहीं है। खाना खाने के बाद बात करूंगी।”

    अद्वैत ने धीरे से साँस ली, लेकिन रूहानी की बात उसे भीतर तक चुभ गई। वो कोई बड़ी बात नहीं थी, पर उसमें छुपी वो अनदेखी, वो दूरी उसे बेचैन कर गई। 

    और तभी उसे याद आया… जब रूहानी दरवाज़े से घुसते ही टूटी थी, और वो जवाब देने के बजाय चुप रह गया था, जैसे उसका दर्द उसके मौन में दम तोड़ गया हो।

    शायद उसे भी उसी तरह बुरा लगा था… जैसे अभी उसे लग रहा था। उस एहसास ने अद्वैत को खामोशी में डुबो दिया….. क्योंकि अब बात सिर्फ खाने या बात करने की नहीं थी, ये उन अनकहे जज़्बातों की लकीरें थीं जो दोनों के बीच धीरे-धीरे खिंचती जा रही थीं।

    रूहानी ने जैसे ही अपनी प्लेट धोकर रखी और पलटी, ठीक उसी पल अद्वैत भी अपनी प्लेट लेकर सिंक की ओर बढ़ रहा था। दोनों के कंधे अचानक से एक-दूसरे से टकरा गए।

    टकराने की वो हल्की सी टक्कर, किसी साधारण टकराव से कहीं ज़्यादा असर छोड़ गई थी। जैसे किसी ठहरे हुए तालाब में कोई नन्हा कंकड़ गिर जाए और उसकी लहरें दो किनारों तक जा पहुँचें। 

    एक पल के लिए दोनों के शरीर में सिहरन सी दौड़ गई—वो सिहरन जो अजनबियों के बीच नहीं, सिर्फ दो ऐसे लोगों के बीच होती है जिनके बीच कुछ अनकहा बाकी हो।

    दोनो की ज़ुबान से एक ही साथ “सॉरी” निकला और फिर अनायास ही दोनों मुस्कुरा दिए। वो मुस्कान जानी-पहचानी थी…. हल्की सी, लेकिन बहुत कुछ कहने वाली।

    रूहानी जाकर सोफ़े पर बैठ गई और अद्वैत ने भी प्लेट धोकर थोड़ी दूरी बनाकर उसके बगल में जगह ले ली। अद्वैत ने चुपचाप अपने लैपटॉप के नीचे से कुछ दस्तावेज़ निकाले और रूहानी की ओर बढ़ा दिए।

    रूहानी ने ध्यान से उन कागज़ों को पढ़ना शुरू किया। उसकी उंगलियाँ पन्नों को सावधानी से पलट रही थीं, मानो हर शब्द को अपनी उँगलियों से महसूस कर रही हो। 

    तभी अचानक एक जगह उसकी नज़र ठहर गई। कुछ ऐसा था जिसने उसके चेहरे पर हैरानी और उलझन दोनों को साथ ला दिया।

    उसने पन्ना थामे हुए ही अपना चेहरा अद्वैत की ओर घुमाया और धीमे स्वर में पूछा, “तुम इतनी बड़ी अमाउंट दे रहे हो और फिर भी एक प्रतिशत ब्याज तक नहीं ले रहे? क्यों?”

    अद्वैत ने कुछ कहने के लिए होंठ खोले ही थे कि तभी पीछे से मीना की आवाज़ आई। वो अपने दोनों बच्चों के साथ खड़ी थी और मुस्कराते हुए बोली, “सर, आप अपनी ही पत्नी को उधार पर पैसे दे रहे हो?”

    मीना की बात ने एक पल में कमरे की हवा बदल दी। रूहानी का चेहरा एकदम से स्थिर हो गया, उसकी आँखें अद्वैत की ओर टिक गईं और अद्वैत… वो जैसे इस सवाल के लिए तैयार ही नहीं था। 

    —————–

    रूहानी की आँखों में जो सवाल ठहरा था, क्या उसका जवाब सिर्फ अद्वैत के शब्दों में था… या उसके उन खामोश इरादों में, जिन्हें उसने कभी कहा ही नहीं?

    मीना की उस मासूम सी बात ने… क्या सचमुच अनजाने में उनके कागजी रिश्ते की परतें उघाड़ दी थीं?

  • अधूरी इबादत भाग~27

    अधूरी इबादत भाग~27

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

    भाग~27 अतीत फिर लौटा 

     

    रूहानी के सामने जब उसके अतीत का वो पन्ना अचानक आकर खुल गया, तो उसकी आंखों को यक़ीन ही नहीं हुआ।

    कुछ क्षण के लिए वो वहीं सन्न सी खड़ी रह गई, मानो शहर की आवाज़ें, लोग, गाड़ियाँ सब धीमे पड़ गए हों… और वक़्त की सुइयाँ एकदम थम गई हों।

    उसके होंठ जो “सॉरी” कहने को खुले थे, धीरे-धीरे बंद हो गए, और गले में कुछ भारी सा अटक गया। वो टकराहट केवल जिस्मों की नहीं थी, वो तो जैसे एक भूले हुए दर्द की दस्तक थी।

    “नहीं… ये सपना है,” रूहानी ने मन ही मन कहा, और अपनी पलकों को ज़ोर से भींच लिया, जैसे यूँ आंखें बंद करने से ये चेहरा ओझल हो जाएगा।

    क्योंकि जिस शख़्स ने उसके विश्वास को अपने स्वार्थ की मिट्टी में रौंदा था, वो इतनी आसानी से इस तरह राह चलते मिल जाए… ये मुमकिन नहीं था।

    उसका दिल तेज़ी से धड़क रहा था, जैसे भीतर कोई पुराना जख्म फिर से खुल गया हो। उस इंसान की मौजूदगी, उसकी वो जानी-पहचानी खामोशी, सबकुछ उसे वहीं खींच लाया जहाँ से वो सालों पहले निकल चुकी थी।

    पर आज… वही साया फिर सामने था।

    और रूहानी की आंखों में एक साथ कई भाव उमड़ आए…. हैरानी, ग़ुस्सा, तकलीफ़, और कहीं बहुत गहराई में… एक छुपा हुआ डर।

    उसने अपने कदम पीछे खींचने चाहे, मगर शरीर जैसे जड़ हो गया था।

    रूहानी अब भी अपनी सोच में डूबी हुई थी। सामने खड़ा अतीत उसकी आंखों में उतर चुका था, और भीतर कहीं एक पुराना दर्द फिर से करवटें ले रहा था। वो कुछ कहती, उससे पहले सामने वाला शख़्स, जिसे उसने सालों पहले खुद से दूर कर दिया था, धीमे से मुस्कराते हुए बोला, “अरे, शादी भी कर ली तुमने? कौन है वो बदनसीब?”

    वो शब्द, जैसे किसी नश्तर की तरह रूहानी के सीने में चुभ गए। 

    “बदनसीब?” बस यही एक लफ्ज़ काफी था उसे हिला देने के लिए।

    उसने एक गहरी सांस ली, उसकी आंखों में पल भर को झिझक की जगह अब स्पष्ट आग थी। भले ही अद्वैत से उसकी शादी एक ‘कॉन्ट्रैक्ट’ थी, पर जब उसे सबसे ज़्यादा किसी की ज़रूरत थी, तो वही शख़्स उसकी ढाल बनकर खड़ा था।

    और आज… रूहानी जानती थी, ये वक्त है उसका कर्ज़ चुकाने का, उसका साथ देने का, उसका सम्मान करने का।

    उसने अपनी आंखों में गुस्से की चमक लिए हुए, उस शख़्स की आंखों में सीधा झांकते हुए कहा, “वो बदनसीब हो या ना हो… तुम्हारी तरह धोखेबाज़ तो बिलकुल नहीं है, Mr. Ekansh Rathore।”

    उसकी आवाज़ में कोई कंपन नहीं था। हर शब्द जैसे आत्मा से निकलकर सीधे सामने वाले के दिल को चीरते हुए जा रहे थे।

    रूहानी की आंखें अब भी उसी पर टिकी थीं, पर उसके भीतर अब कोई डर नहीं बचा था… सिर्फ़ एक सच्चाई, जिसे वो बिना झुके आज कह चुकी थी।

    एकांश को रूहानी का पलटवार बिल्कुल भी पसंद नहीं आया।

    उसके चेहरे की मुस्कान एक झटके में फीकी पड़ गई। होंठ तन गए, आंखों की कोर में तिरस्कार उतर आया, और आवाज़ में एक जानी-पहचानी तल्ख़ी घुल गई… वही अहंकार, वही खुद को सर्वश्रेष्ठ समझने वाली हवा।

    वो एक कदम आगे बढ़ा, जैसे रूहानी को फिर से वही पुराना एहसास दिलाना चाहता हो जिसमें वो खुद को हमेशा ऊँचा और दूसरों को कमतर मानता था।

    वो रूहानी की आंखों में झांकते हुए धीमे मगर तीखे स्वर में बोला, “तुम अब भी वैसी ही हो रूहानी… जितनी ज़िद्दी थीं, उतनी ही तल्ख़ भी। बस फ़र्क ये है कि तब तुम्हारे पास कुछ सपने थे, और आज… बस एक रिश्ता है, जिसके पीछे तुम अपनी कमज़ोरियां छुपा रही हो।”

    उसने एक हल्की हँसी में ज़हर घोलते हुए कहा, “किसी से शादी कर लेना उस दर्द से भागने का तरीका नहीं होता, जिसे तुमने खुद चुना था।”

    फिर उसने कुछ पल ठहरकर, और भी गहरे वार के लिए अतीत को उघाड़ते हुए कहा, “याद है वो रात, जब तुमने कहा था कि तुम्हें सिर्फ़ आज़ादी चाहिए… किसी का सहारा नहीं? फिर क्या हुआ उस आज़ादी का? या फिर… किसी की बाहों में गिरकर तुमने उसे नाम दे दिया ‘हमसफ़र’ का?”

    उसकी आवाज़ अब नर्म नहीं रही थी, उसमें एक कटाक्ष था, एक ताना, और एक अधूरा हिसाब।

    “तुम्हारी आंखों में जो गुस्सा है, वो खुद पर है रूहानी… मुझ पर नहीं। क्योंकि तुम्हें पता है कि तुमने अपना सच छुपाकर, सिर्फ़ किसी से बचने के लिए किसी और को ढाल बना लिया।”

    रूहानी की रग-रग में उस वक़्त जैसे कोई ज़हर उतर गया था। एकांश के शब्दों ने उसके भीतर की सारी चुप्पियों को तोड़ने की कोशिश की थी, मगर वो अब टूटने के लिए नहीं बनी थी। 

    उसके हर शब्द, हर ताना, हर ज़हरीली मुस्कान… रूहानी के दिल को छलनी कर रही थी, लेकिन वो अपनी पीड़ा को आँखों की नमी से बहने नहीं देना चाहती थी। 

    वो स्तब्ध थी। उसे यकीन नहीं हो रहा था कि ये वही इंसान है, जिसे उसने कभी टूटकर चाहा था, जिसके लिए उसने अपनी दुनिया की सीमाओं को लांघ दिया था। 

    “यही है वो?” उसके मन ने पूछा। “यही है वो एकांश, जिसके लिए तूने सारी हदें पार कर दी थीं? जिसके इंतज़ार में तूने ख़ुद को भुला दिया था?”

    वह एकांश, जो कभी उसकी हँसी का कारण था, आज उसी की आँखों में उसे असहाय, कमज़ोर और झूठा दिखाने की कोशिश कर रहा था।

    उसकी रगों में उबाल था, लेकिन चेहरा शांत था। वो चुप थी, मगर उसकी आँखों में आग साफ़ झलक रही थी।

    एकांश की आंखों में भरी वो कड़वाहट, और उसकी बातों में छुपा ताना… ये सब कुछ रूहानी को ऐसा महसूस करवा रहा था जैसे उसकी हर कमजोरी, हर अधूरी कोशिश, उसे खुद की नज़रों में गिरा रही हो। और सबसे ज़्यादा चुभन उसे इस बात की थी कि जिसे उसने अपनी मोहब्बत कहा था, वही आज उसे नीचा दिखाने पर उतारू था। 

    पर रूहानी जानती थी… ये वही पल है जब उसे पीछे नहीं हटना है। उसे खुद के लिए, अपनी ज़िन्दगी के लिए, और अद्वैत के लिए खड़ा होना है।

    उसने गहरी साँस ली। आसपास की आवाज़ें अब भीड़ के शोर में खो चुकी थीं, पर उसके भीतर एक स्पष्टता जन्म ले रही थी… अब और नहीं। अब किसी के शब्द उसे तोड़ नहीं सकते। 

    वो एक कदम पीछे हटी, फिर अपनी नमी भरी, मगर दृढ़ आवाज़ में कहा, “तुम्हें भी तुम्हारी शादी की बहुत-बहुत बधाई हो, मिस्टर एकांश। जब तुमसे मुझे धोखा मिला था, तब मेरे मन में सैकड़ों सवाल थे। मैं रात-रात भर जागकर ये सोचती रही कि आख़िर तुमने मुझसे ऐसा क्यों किया? किस बात की नाराज़गी थी तुम्हें, जो बिना कुछ कहे इस तरह चले गए?” 

    वो एक क्षण के लिए रुकी, उसकी आंखें अब एकांश की आंखों से सीधे भिड़ रही थीं…. जैसी नज़रें जवाब नहीं चाहतीं, बस सच्चाई थमा देती हैं।

    “अपने सवालों के जवाब मैं तुमसे नहीं पा सकी, इसलिए जब मैं तुम्हारे दिए उस पते पर पहुँची और तुम्हें किसी और से शादी करते देखा, तो सारे सवाल ख़ुद-ब-ख़ुद ख़ामोश हो गए।”

    रूहानी की सांसें अब गहरी थीं, उसके चेहरे पर अब न कोई मासूमियत थी, न ही कोई बेबसी…. बस एक संपूर्ण स्त्री का साहस था, जो अपने अतीत से आंखें मिलाकर आगे बढ़ने को तैयार थी।

    “उसी वक़्त समझ आ गया कि मैं कभी थी ही नहीं तुम्हारे लिए ज़रूरी। शायद एक विकल्प थी, या सिर्फ़ एक वक़्त की पसंद। लेकिन एक चीज़ जो तुम आज तक नहीं समझ सके, वो ये कि मैं तुम्हारी तरह नहीं हूँ, एकांश। मैं रिश्तों को खेल नहीं मानती।”

    उसने एक क्षण को आँखें बंद की, मानो खुद को समेट रही हो, फिर बोली, “और इसीलिए… अब मुझे किसी ऐसे इंसान से बात करना ज़रूरी नहीं लगता जो मेरी ज़िंदगी में अब कोई महत्व नहीं रखता।” 

    एकांश के चेहरे की मुस्कान धीरे-धीरे फीकी पड़ने लगी थी। शायद उसे उम्मीद नहीं थी कि रूहानी यूँ जवाब देगी या शायद वो अब तक उसे उसी कमजोर, प्रेम में डूबी लड़की समझ रहा था, जो उसकी यादों में छूट गई थी। मगर रूहानी अब वो नहीं थी। 

    रूहानी बिना एक भी पल रुके, बिना एकांश के किसी जवाब या प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा किए, पीछे मुड़ी और सीधी कदम बढ़ा दिए….. अपने रास्ते की ओर।

    उसकी चाल में अब कोई लड़खड़ाहट नहीं थी। उसके कदमों में सन्नाटा नहीं, बल्कि एक स्पष्ट ध्वनि थी…… जैसे वो हर कदम पर अपने आत्मसम्मान को वापस समेट रही हो।

    आसमान पर बादल थे, हल्के-हल्के हवा चल रही थी, और शहर की भीड़ में गुम होती रूहानी की परछाई, उस दिन के साथ उसका अतीत भी धीरे-धीरे पीछे छोड़ रही थी।

    और एकांश… वो वहीं खड़ा रह गया, उन शब्दों की गूंज में जो उसे शायद ज़िंदगी भर याद रहेंगे।

    रूहानी ने जैसे ही अद्वैत के घर का दरवाज़ा खोला, उसकी सांसें उखड़ी हुई थीं, आँखों में बवंडर थमे हुए थे। उसने दरवाज़ा बंद किया और बिना एक पल की देरी किए, अपनी पीठ दरवाज़े से टिका दी और बिना किसी सोच-विचार के धम्म से ज़मीन पर बैठ गई। 

    धम्म से बैठते ही, उसकी छाती से एक टूटा हुआ, बेकाबू रुदन फूट पड़ा। 

    “आहह्ह्हह्हह्ह्ह्ह !” एक दर्द भरी चीख, एक ऐसी चीख जिसमें न केवल दुख था, बल्कि बरसों की चुप्पी, टूटी उम्मीदें और एक अजीब सी हार थी। फिर वो ज़ोर-ज़ोर से रोने लगी। जैसे कोई बाँध टूटा हो… आँसुओं का नहीं, बल्कि आत्मा का। 

    उसका शरीर कांपने लगा, चेहरा दोनों हथेलियों में छुपा लिया पर सिसकियाँ दीवारों से टकराकर पूरे घर में गूंज रही थीं। 

    तभी सामने से दौड़ते कदमों की आहट हुई। अद्वैत रूहानी के सामने आ खड़ा हुआ। उसके बाल बिखरे हुए थे, सांसें तेज़, और चेहरे पर बेचैनी साफ़ थी। 

    “रूहानी?” उसकी आवाज़ काँपी, जैसे उसने पहली बार उसके भीतर की दरारों को साफ देखा हो।

    “क्या हुआ, रूहानी? ऐसे क्यों रो रही हो?”

    ————–

    क्या रूहानी अद्वैत को उस रात का सच बता पाएगी… या उसकी चुप्पी ही एक और तूफ़ान को जन्म देगी? 

    उसके आँसू सिर्फ़ अतीत की राख थे… या किसी नई आग का इशारा?  

    जब अद्वैत उसकी आंखों में उस दर्द को पढ़ेगा….. क्या वो समझ पाएगा कि ये कहानी अब सिर्फ़ उसकी नहीं रही?

     

  • अधूरी इबादत भाग~26

    अधूरी इबादत भाग~26

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    भाग~26 सिर्फ़ एक “Okay” 

     

    मीना के सवाल पर रूहानी एक क्षण को रुकी, जैसे किसी अंदरूनी द्वंद्व में फँस गई हो। आँखों में हल्की झुँझलाहट तैर गई, पर चेहरा अब भी संयमित रहा। वो जानती थी कि सवाल साधारण था, पर जवाब में जो कुछ भी छिपा था, वो साधारण नहीं था। 

    मन तो किया कि मीना को सब कुछ बता दे….. अपने नए स्टूडियो का सपना, अपनी हिम्मत से भरी जद्दोजहद, वो अकेलेपन की घुटन जिसे कला के ज़रिए साँस देना चाहती थी। पर वक्त नहीं था। घड़ी की सुइयों की तरह उसके भीतर भी एक दौड़ चल रही थी।

    उसने जल्दी से कॉफी का आखिरी घूँट पिया, जैसे उस गर्माहट में कुछ पल की राहत ढूंढ रही हो। फिर कप टेबल पर रखा और बोल पड़ी, “मीना, मुझे अपना कॉन्टैक्ट नंबर दे दो… सारी बातें बाद में बताऊँगी, नहीं तो बहुत लेट हो जाऊँगी।”

    मीना ने थोड़ा हैरानी से देखा, पर चुपचाप सिर हिलाया। फिर अपने छोटे से पर्स से एक पुराना, घिसा हुआ कीपैड फ़ोन निकाला। रूहानी ने नंबर डायल किया और मिस्ड कॉल दी। 

    स्क्रीन पर नंबर चमका…. अनजान पर तयशुदा।

    “ये रहा मेरा नंबर,” रूहानी ने धीमे से कहा। 

    मीना ने जैसे ही “रूहानी मैडम” नाम दर्ज किया, रूहानी ने एक हल्की सी मुस्कान दी। पर उस मुस्कान के पीछे एक बेचैनी थी, एक जल्दी में छुपा सपना। उसकी आँखों में साफ़ दिख रहा था….. वो कुछ नया शुरू करने की दहलीज़ पर खड़ी है, पर रास्ता अभी बना नहीं है।

    दरवाज़ा खोलते हुए उसके पाँव तेज़ थे, लेकिन दिल भारी। जैसे हर कदम के साथ वो अपने अंदर किसी पुराने डर को पीछे छोड़ रही हो।

    रूहानी के घर से निकलते ही अद्वैत धीमे क़दमों से बाथरूम की ओर गया। नहा-धोकर आया तो उसने कोई फैंसी कपड़े नहीं पहने…. सिर्फ़ एक सादा कुर्ता और पायजामा। बाल भीगी हुई हालत में बेतरतीब से थे। चेहरे पर कोई भाव नहीं, पर आंखों में थकी हुई सोचों की परतें थीं। जैसे हर बूंद पानी के साथ उसके भीतर कुछ और बह गया हो।

    वो धीरे-धीरे सीढ़ियाँ उतरकर नीचे आया और आकर सीधे सोफे पर बैठ गया। फ़ोन पास में था, लेकिन उसने उसे छुआ तक नहीं… जैसे अब किसी बात की गूंज से भी खुद को दूर रखना चाहता हो। सिर्फ़ एक शांत, ठहरी हुई उपस्थिति। उसके बैठते ही जैसे पूरे घर की हवा पलभर को थम गई। 

    तब तक मीना पूरे घर की सफाई कर चुकी थी, रसोई में हल्दी और जीरे की महक भरने लगी थी। मगर अद्वैत को यूं अचानक बैठे देख वह थोड़ी हिचकिचाई। ये रोज़ का दृश्य नहीं था। उसकी आदत थी सुबह जल्दी घर छोड़ देने की, एक अजीब सी दूरी बनाए रखने की। पहली पत्नी के जाने के बाद, वो खुद से भी दूर हो गया था।

    मीना, जो अब तक उसे बस एक परछाई की तरह देखती थी, चुपचाप उसके पास आई और बोली, “आपकी तबीयत तो ठीक है ना, सर? कुछ बना दूँ जल्दी से?”

    अद्वैत ने उसकी बात पर हल्की सी मुस्कान दी…. वो मुस्कान जिसमें न तो कोई मज़ाक था, न गर्मजोशी, बस एक स्वीकार थी। “अरे मीना, ठीक हूँ मैं। बस आज कहीं जाना नहीं है, इसलिए बैठा हूँ। और हाँ… कुछ भारी नाश्ता बना दो।” 

    मीना ने सिर हिलाया, “ठीक है, सर,” कहकर चुपचाप रसोई की ओर लौट गई।

    अद्वैत वहीं बैठा रहा, अब अपनी गोद में लैपटॉप लिए, पर उसकी उंगलियाँ कीबोर्ड से दूर थीं। जैसे कुछ लिखना चाहता हो, पर शब्द अब भी उसकी आत्मा में कहीं अटके हों। घर में सब कुछ था….. साफ़ फर्श, ताज़ा हवा, पकती हुई रोटी की खुशबू…..पर उसके भीतर एक खाली कमरा अब भी बंद पड़ा था।

    अद्वैत सोफे पर ही बैठा था, सामने लैपटॉप की नीली रौशनी उसके चेहरे पर अजीब सी परछाई डाल रही थी। उंगलियाँ की-बोर्ड पर थीं, मगर दिमाग कहीं और। अपनी नई किताब की शुरुआत के कुछ पन्ने उसने टाइप कर लिए थे, लेकिन उस रचना में वो गहराई नहीं थी जिसे वो महसूस कर रहा था। 

    अचानक उसके मन में एक अजीब सी बेचैनी उठी…… रूहानी आज सुबह से दिखी क्यों नहीं?

    उसने आंखों को स्क्रीन से हटाकर कमरे में एक नजर डाली, जैसे किसी आभासी उपस्थिति को ढूंढ़ रहा हो, जो वहां होनी चाहिए थी। फिर आवाज़ लगाई, “मीना, तुम्हारी रूहानी मैडम कहाँ हैं? दिख नहीं रही आज।”

    मीना रसोई से बाहर आई, उसके चेहरे पर हल्का सा विस्मय था। “आपकी पत्नी हैं मैडम, आपके साथ तो कल से ही होंगी। रात में भी नहीं बताया क्या? सुबह तो बहुत जल्दी निकल गईं।”

    अद्वैत के भीतर कुछ सिहर उठा। उस एक वाक्य में कितना कुछ छुपा था….. एक सवाल, एक शक, और एक अनकहा सच। पर चेहरा उसने शांत रखा, शब्दों को सजाया ताकि कोई दरार न दिखे।

    “वो कल थक कर जल्दी सो गई थीं, तो मैंने जगाना सही नहीं समझा। और सुबह मैं गहरी नींद में था, शायद उसने मुझे परेशान करना ठीक नहीं समझा।”

    मीना ने उसकी बात पर सिर हिलाया और रसोई में लौटते हुए बोली, “सही कहा आपने, सर। बहुत जल्दी में थी मैडम, मुझसे पूछ रही थीं कि आसपास कोई जगह या दुकान खाली है क्या।”

    अद्वैत एक पल को वहीं थम गया। शब्द खत्म हो गए थे, पर भीतर कोई शोर उठ रहा था। उसके सीने में एक सवाल रह गया था, जो उसने किसी से नहीं पूछा…. रूहानी क्या खोज रही थी, और क्यूँ? क्या इसलिए रूहानी ने उससे पच्चीस लाख रूपए मांगे थे? 

    अद्वैत की निगाहें जैसे हवा में किसी अनकही बात को टटोल रही थीं। वो मीना से कुछ पूछने ही वाला था, आवाज़ उसके गले में ही अटक गई थी कि तभी मोबाइल की स्क्रीन चमकी। 

    उसने अनमने मन से फोन उठाया, जैसे किसी पुराने ज़ख्म पर उंगली रखी जा रही हो। स्क्रीन पर एक मैसेज था…… 

    “उम्मीद है डॉक्युमेंट्स बन गए होंगे, मैं आते ही साइन कर दूंगी। प्लीज़ कल तक मुझे सारे पैसे कैश में चाहिए और मैं सच कह रही हूँ, 6 महीने के बाद से इंस्टॉलमेंट में सारे पैसे दे दूंगी, जो इंटरेस्ट लगाना हो लगा लेना।”

    वो चुप रहा। उसका गला थोड़ा सूख गया। कुछ पल तक उसने फोन हाथ में थामे रखा, जैसे शब्दों का वजन महसूस कर रहा हो। फिर अचानक होठों पर एक हल्की, लगभग मायूस मुस्कान आई। 

    उसकी उंगलियों ने बड़ी नर्मी से स्क्रीन पर “okay” टाइप किया और भेज दिया।

    कभी-कभी किसी के कहे आखिरी वाक्य में पूरा अतीत लिपटा होता है। और वो “मैं सच कह रही हूँ” उस एक वाक्य में जैसे रूहानी की सारी थकान, सारी सच्चाई, सारी उम्मीद समा गई हो। 

    उसी वक्त मीना चुपचाप उसके सामने आकर पोहे की प्लेट रखी। “बाकी खाना गर्म है, इसलिए मैंने बाहर ही ढककर छोड़ दिया है, अब मैं घर चलती हूँ” कहकर मीना अद्वैत के घर से निकल गई। 

    अद्वैत ने उस थाली को देखा, फिर अपनी हथेलियों को। जैसे सोच रहा हो…. जिन हाथों में किसी का भरोसा हो, क्या वो वाकई खाली रह सकते हैं? कमरा शांत था, पर भीतर एक तूफान अब भी धीमे-धीमे बह रहा था।

    उधर,

    रूहानी ने सुबह-सुबह अपने पुराने स्टूडियो के मालिक से मुलाक़ात की। सारे कागज़ात तैयार थे… बकाया पेमेंट का अंतिम बिल, एक पुरानी जगह को अलविदा कहने की औपचारिकता और उस दरवाज़े की चाभी जो कभी उसके ख्वाबों का पहला दरवाज़ा हुआ करती थी। 

    उसने धीमे से चाभी उनके हाथों में रख दी, जैसे कोई बीता हुआ हिस्सा खुद से अलग कर रही हो। उसकी आंखों में न नम थी, न मुस्कान…… बस एक सूनापन, जो कुछ खत्म हो जाने पर आता है।

    कागज़ उसके बैग में रखकर वह अद्वैत के घर के लिए निकल पड़ी। कैब से उतरते ही शहर की भीड़ और धूप में घुला हुआ दिन उसे छूने लगा। वह तेज़ी से मुख्य चौराहे से गुजर रही थी, तभी अचानक उसकी जूती में कुछ अटक गया। 

    एक हल्की-सी झुंझलाहट के साथ वह झुकी, जूती ठीक की, और उठते ही जैसे ही कदम आगे बढ़ाया, अचानक किसी से ज़ोरदार टक्कर हो गई।

    “सॉरी…” शब्द उसके होंठों पर ही थे कि जैसे ही उसने चेहरा घुमाया, उसकी सांस अटक गई।

    सामने जो खड़ा था, उसकी आंखों में कोई अजनबीपन नहीं था… बल्कि वो नज़रों की पहचान इतनी तेज़ थी कि रूहानी एक पल के लिए जैसे ठिठक गई।

    उसका “सॉरी” वहीं गले में अटक गया, क्योंकि जिसे देखकर वो पलटी थी… उसे वो बहुत अच्छी तरह जानती थी।

    इतनी अच्छी तरह… कि अब उसका यूँ अचानक सामने आ जाना, एक अजीब सी सिहरन बनकर उसकी रीढ़ में उतर गया।

    ————-

    क्या रूहानी को वाकई मालूम था कि वो किससे टकराई है… या किस अतीत ने उसे फिर से घेर लिया?

    अद्वैत की आंखें किस सच को तलाश रही थीं… रूहानी के ख्वाब, या खुद के खोए हुए हिस्से?

    क्या ये महज़ इत्तेफ़ाक़ था… या कोई पुराना सिरा फिर से खुलने वाला था?

  • अधूरी इबादत भाग~25

    अधूरी इबादत भाग~25

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    भाग~25 उधार जज़्बातों का 

     

    रात का सन्नाटा एक गूंगी चीख की तरह पूरे घर में पसरा हुआ था। कमरे की दीवारों पर टंगी घड़ी की सुइयाँ जैसे समय को खींचती हुई चल रही थीं…. हर टिक-टिक के साथ अद्वैत के भीतर एक नया सवाल जन्म ले रहा था, एक नया संशय, एक नया द्वंद्व। 

    उसके ठीक सामने खड़ी रूहानी का चेहरा जैसे किसी धुँधली तस्वीर की तरह था—आधी साफ़, आधी धुँधलायी हुई। उसकी आँखों में एक ऐसी बेचैनी थी, जिसे सिर्फ महसूस किया जा सकता था, शब्दों में बाँध पाना मुश्किल था। जैसे वह कुछ कहना चाह रही हो, लेकिन ज़ुबान साथ न दे रही हो। जैसे कोई टूटन हो उसके भीतर, जो हर मुस्कान के पीछे छिपी बैठी हो।

    अद्वैत ने उसकी आँखों में झाँकने की कोशिश की, जैसे कोई ताला खोलना चाहता हो जिसकी चाबी गुम हो गई हो। मगर वहाँ कुछ था… एक दीवार, एक नमी, एक कहानी जो वह कह नहीं पा रही थी। 

    फिर, अचानक, उस चुप्पी को तोड़ते हुए रूहानी की आवाज़ आई…. थोड़ी घबरायी हुई, थोड़ी ठहरी हुई, “उधार माँग रही हूँ तुमसे, छह महीने के बाद से तुम्हें इंस्टॉलमेंट पर वापस भी कर दूँगी।”

    अद्वैत को यह सुनते ही जैसे किसी अदृश्य करंट ने छू लिया हो। यह सवाल नहीं था, न ही विनती। यह एक निश्चय था जो रूहानी ने बहुत सोच-समझकर किया था। उसकी आवाज़ में एक डर छुपा था…. कहीं इनकार न हो जाए, कहीं अद्वैत उस पर शक न करे। 

    अद्वैत बस उसे देखता रहा… न आँखों में ग़ुस्सा, न सवाल। सिर्फ एक गहरी नज़र, जो अंदर तक झाँकने की कोशिश कर रही थी।

    रूहानी ने उसकी चुप्पी को अपनी बात की नाकामी समझा और जल्दी से बोली, “तुम तो इतने फेमस और बेस्टसेलिंग राइटर हो, तो इतने पैसे तो तुम दे ही सकते हो मुझे अभी। मैं सच्ची कह रही हूँ, मैं सारे पैसे लौटा दूँगी। अगर तुम्हें ठीक नहीं लग रहा तो बता दो, कितना इंटरेस्ट रेट लोगे, मैं वो भी चुका दूँगी।”

    यह शब्द सिर्फ शब्द नहीं थे—ये उसके आत्मसम्मान की अंतिम कोशिशें थीं। जैसे वह खुद को गिरने से बचाना चाह रही हो, और जानती हो कि अद्वैत ही वह आख़िरी डोर है जिसे वह थाम सकती है। मगर अद्वैत अब भी स्थिर था….. जैसे सोच रहा हो, समझ रहा हो, तौल रहा हो कि यह माँग सिर्फ पैसों की है या उससे कहीं ज़्यादा की।

    धीरे से उसने कहा, “लेकिन रुपये माँगना या इंटरेस्ट रेट के साथ वापस करना, ये सब कुछ तो कॉन्ट्रैक्ट में कहीं नहीं लिखा है और न ही तुमने एग्रीमेंट बनवाते समय इन सब बातों का ज़िक्र भी किया।”

    रूहानी को जैसे किसी ने उसकी हड्डियों तक सुन्न कर दिया हो। उसने कुछ पल सोचा, फिर अपनी आवाज़ को यथासंभव सामान्य बनाए रखते हुए कहा, “तो क्या नया एग्रीमेंट बनवाना पड़ेगा या पुराने वाले में ही मॉडिफाई करोगे?”

    अद्वैत उसकी इस मासूमियत पर अनायास मुस्कुरा दिया। एक कोना उसके भीतर था जो शायद यह चाहता था कि रूहानी उससे कुछ माँगे, उससे जुड़े, उससे कुछ उम्मीद रखे। फिर भी, चेहरा न्यूट्रल बनाए रखते हुए बोला, “ऑफकोर्स, इसके लिए न्यू डॉक्युमेंट बनवाने पड़ेंगे, पूरे 25 लाख की बात है।”

    रूहानी ने सिर हिलाया, फिर एक पल चुप रही और आखिर में पूछ ही लिया, “पूछोगे नहीं कि क्यों चाहिए?”

    अद्वैत की आवाज़ अब थोड़ी ठंडी हो चली थी, “शायद तुम भूल चुकी हो कि, हम दोनों में से किसी को भी एक-दूसरे के पर्सनल मैटर्स में दखल देने का कोई हक़ नहीं।”

    ये शब्द जैसे रूहानी के सीने में कहीं चुभ गए। उसके चेहरे पर उभर आई नमी… नहीं, ये आँसू नहीं थे, मगर आँसुओं से कम भी नहीं। वह कुछ नहीं बोली, लेकिन उसकी आँखों में जो कहानियाँ तैर रही थीं, वे अद्वैत से छिपी नहीं थीं।

    शायद यही वजह थी कि अद्वैत ने तुरंत ही हल्के अंदाज़ में बात मोड़ दी, “आई होप कहीं कोई गैम्बलिंग नहीं कर रही होगी या किसी को मारने की सुपारी तो नहीं दे रही होगी, है ना?” और मुस्कुरा दिया…. एक जानबूझ कर फैलाई गई गर्माहट, ताकि उस ठंडी चुप्पी को पिघलाया जा सके।

    रूहानी भी मुस्कुरा दी, मजबूर होकर नहीं… बल्कि उस पल के सौजन्य में, जो दोनों के बीच थोड़ी देर के लिए सहज हो गया था। 

    अद्वैत ने कहा, “रात बहुत हो गई है, अब मैं सोने जा रहा हूँ।” और बस इतना कहकर वह सीढ़ियों की ओर बढ़ गया, बिना पलटे, बिना उसके जवाब का इंतज़ार किए।

    रूहानी वहीं खड़ी रही… कमरे की दीवारों के बीच, उस अधूरे संवाद की गूंज के साथ। उसकी आँखें अब स्थिर नहीं थीं, उनमें तूफान था, एक ऐसा तूफान जो बहुत देर से दबा रखा गया था। वह जानती थी कि क्यों चाहिए उसे वो पैसे… उसका सपना, उसका स्टूडियो, उसका सम्मान… सब कुछ दाँव पर था। 

    वह यह भी जानती थी कि अद्वैत को बताना आसान नहीं होगा कि कैसे उसका पूर्व प्रेमी उसके डिज़ाइन्स चुरा कर अपनी मंगेतर को दे गया और कैसे एक झूठी बदनामी ने उसकी मेहनत को मिट्टी में मिला दिया।

    लेकिन अब नहीं। अब उसे लड़ना था। उठना था। और इस बार वह किसी पर भरोसा करके नहीं, बल्कि खुद के दम पर जीतना चाहती थी।

    उसने एक गहरी साँस ली। फिर खुद से कहा, “मैं इसे टूटने नहीं दूँगी। मुझे फिर से अपने नाम का एक सच बनाना होगा… बिना किसी की परछाई के, बिना किसी की रहमत के।”

    और उस रात, जब पूरा घर नींद में डूबा था, रूहानी की आँखों में नींद नहीं, आग थी।

    ————-

    अद्वैत आज पूरी तरह ख़ामोश था, जैसे किसी अनसुने सन्नाटे में घुल जाना चाहता हो। कमरे की हवा भारी थी, धूप फीकी लग रही थी और उसकी आँखें बंद… मगर मन पूरी तरह जागा हुआ। 

    पिछले कुछ दिनों से जितनी तेज़ी से चीज़ें बदली थीं, उतनी ही चुपचाप आज सब कुछ ठहर गया था। न उसने किसी से बात की, न ही कमरे से बाहर निकला। उसकी डायरी भी आज ख़ाली थी। शब्द नहीं थे… सिर्फ़ भारीपन था।

    उधर रूहानी की सुबह बिल्कुल उलटी दिशा में चल रही थी। उसका हर कदम किसी अदृश्य घड़ी की टिक-टिक से बंधा हुआ था। जैसे भीतर कुछ था जो अब और रुकने नहीं देना चाहता था। 

    उसने हल्का गुलाबी कुर्ता पहना, बालों को कसकर गूंथा और आईने में खुद को बिना मुस्कराए देखा…. एक शांत चेहरा, जिसमें अब हारने की कोई जगह नहीं थी।

    मीना जैसे ही घर पहुँची, रूहानी सीधे किचन की ओर बढ़ी, “मेरे लिए जल्दी से एक कॉफी बना दो मीना, मुझे निकलना है फ़ौरन। उसके बाद ही सफ़ाई शुरू करना।”

    मीना ने बिना कुछ पूछे सिर हिलाया और कॉफी बनाने लगी। भाप ने रसोई में एक गर्मी फैलाई, और उस गर्मी में रूहानी की आँखों में एक नई रोशनी आ गई थी।

    तभी रूहानी ने धीमे से पूछा, “यहाँ आसपास कहीं कोई जगह या दुकान मिलेगी खाली?”

    मीना अचानक रुकी, चौंकी, फिर धीरे से बोली, “क्यों? कुछ काम है क्या, मैडम?”

    ———-

    क्या मीना को अंदाज़ा था कि रूहानी के इस सवाल के पीछे कोई मामूली वजह नहीं, बल्कि एक नई शुरुआत की जिद छुपी है?

    क्या अद्वैत की चुप्पी महज़ थकावट थी, या फिर कोई ऐसा फैसला जो सब कुछ बदल सकता है?

    क्या रूहानी सच में सिर्फ एक दुकान ढूँढ रही थी, या फिर अपनी खोई हुई पहचान की ज़मीन तलाश रही थी…?