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  • अधूरी इबादत भाग~36

    अधूरी इबादत भाग~36

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    भाग~36  तुम… यहाँ क्यों? 

     

    रूहानी की नज़रें उस अलमारी से हटकर अब पूरे कमरे को टटोल रही थीं, जैसे हर चीज़ से एक जवाब माँग रही हो। उसकी उंगलियाँ धीरे-धीरे मेज़, दराज़, और किताबों की कतारों पर फिसलती चली गईं, हर पल उम्मीद और बेचैनी की लहरों से भीगती। 

    तभी उसकी नज़र कमरे के सबसे पिछले कोने में पड़ी—जहाँ एक पुरानी किताबों की गठरी पड़ी थी, धूल की चादर ओढ़े हुए। वह झुकी, और जैसे ही उसने गठरी हटाई, एक फाइलनुमा डायरी उसके हाथों में आ गई… वही हल्का नीला कवर, और किनारे से झांकता हुआ इशिता का नाम। 

    उस पल रूहानी के भीतर जैसे कोई सील टूट गई। सांसें तेज़ हो गईं, और उंगलियाँ काँपने लगीं।

    “यही है…” उसने बुदबुदाकर खुद से कहा, जैसे किसी अपराध की स्वीकारोक्ति कर रही हो।

    कमरे की नीरवता अब और भारी हो गई थी, मानो अद्वैत की मौजूदगी कहीं दीवारों में गूंज रही हो। और वहीं दूसरी ओर, कहीं दूर, एक अनकही सच्चाई उसके इंतज़ार में थी, किसी अधूरे पन्ने की तरह जो खुला तो बहुत कुछ बदल सकता था… शायद सब कुछ।

    रूहानी ने जैसे ही पुरानी किताब का पन्ना खोला, उसमें से एक मोड़ा हुआ ख़त निकल आया। कमरे में हल्की-सी पीली रौशनी थी, चांदनी खिड़की से फर्श पर उतर रही थी और पूरा कमरा एक सन्नाटे की चादर ओढ़े था। दीवार घड़ी की टिक-टिक और बाहर किसी कुत्ते की दूर जाती आवाज़ के सिवा कुछ भी न था।

    उसने गहरी साँस ली, ख़त को खोला और धीमे-धीमे पढ़ने लगी।

    “मुझे आज भी वो दिन साफ़ याद है जब तुमने कहा था कि तुम मुझसे प्यार करोगे। उस दिन, अनजाने में तुमने मेरी कलाई थाम ली थी जब समुद्र की लहरें किनारे से टकरा रही थीं लेकिन उनका शोर भी मेरे दिल की धड़कनों के आगे फीका पड़ गया था।

    मैंने कोशिश की थी, सच में, हज़ारों बार उस दिन को भूल जाने की। लेकिन यह दिल… यह नहीं चाहता कि उस पल को जाने दे। वो पल जब मुझे लगा कि मैं ताउम्र तुमसे मोहब्बत करने वाली हूँ। और मैं चाहती हूँ कि तुम जानो… मैं आज भी तुमसे मोहब्बत करती हूँ, और करती रहूँगी।”

    पढ़ते-पढ़ते रूहानी की उंगलियाँ कांपने लगीं। उसने किताब को बंद किया, ख़त को सावधानी से वापस मोड़ा, और फिर कमरे की खिड़की बंद कर दी। हवा अब भी बाहर बह रही थी, पर कमरे के अंदर जैसे कोई सूनापन घुस आया हो। 

    उसने ख़त को उसी किताब के भीतर वापस रखा, लेकिन वो बेचैनी अब उसकी सांसों से उतरकर उसके दिल में टिक चुकी थी।

    वो उठी और वापिस दबे पाँव सीढ़ियों से नीचे उतरकर कमरे में पहुँची, फिर धीरे-धीरे बिस्तर की ओर बढ़ी। बिस्तर पर गिरते ही वह एकटक छत को घूरने लगी, जैसे वहाँ कोई जवाब छिपा हो। 

    दिल की धड़कनें इतनी तेज़ थीं मानो कोई अंदर से छटपटा रहा हो। गले में अटकी हुई सिसकियाँ अब आँखों से बहकर गालों तक पहुँच गईं।

    रूहानी को खुद नहीं पता था कि वो रो क्यों रही है। पर ये खालीपन, ये टूटापन… किसी तरह सुकून दे रहा था। जैसे एक घाव जो अब खुलकर बह रहा हो। 

    उसे लगा, शायद ये उस एहसास की चुभन है कि वो किसी के लिए भी कभी “काफ़ी” नहीं रही।

    न अपने घर के लिए। 

    न उसके लिए जिन्हें उसने अपना सब कुछ मान लिया था।

    “उसने ही तो मुझे धोखा दिया था… मेरा करियर, मेरा विश्वास…. सबकुछ तोड़ दिया,” रूहानी ने धीमे से खुद से कहा।

    उसकी आँखों में अब आँसू नहीं, बस एक थकी हुई चमक थी… जैसे रो लेने के बाद भी सुकून नहीं, सिर्फ़ थकावट मिली हो।

    रात के उस पहर में, कमरे की दीवारें भी जैसे उसके भीतर की चीखें चुपचाप सुन रही थीं…

    °°°°°°°°°°°°°°°°°°

    रात भर अद्वैत करवटें बदलता रहा, जैसे हर अंग अपने किए पर शर्मिंदा हो। कमरे की दीवारें भी उसके साथ जाग रही थीं, और हर साँस एक बोझ की तरह उसके सीने में उतर रही थी। 

    उसके भीतर एक बेचैनी थी — नहीं, सिर्फ़ इस बात की नहीं कि उसने दरवाज़ा बिना इजाज़त खोला… बल्कि इस डर की कि रूहानी ने उसे वैसा देखा जैसा वो कभी होना नहीं चाहता था। 

    उसके ख्यालों में बार-बार रूहानी की वो नज़रें तैरतीं, जो चोट खाई थीं…. न चिल्लाईं, न तोड़ीं, बस चुपचाप उतर गईं उसकी आत्मा तक।

    सुबह जब हल्की धूप खिड़की के कोनों से सरकती हुई फर्श पर फैल रही थी, अद्वैत बिस्तर छोड़ चुका था। रसोई में जाकर उसने पहला काम किया — इंटरनेट पर सर्च किया: “How to make sandwich and coffee for someone you’ve hurt.” 

    उसकी उँगलियाँ काँप रही थीं, पर दिल में एक अजीब सी ठान थी। उसे खाना बनाना नहीं आता था, पर उसे एहसास आता था। उसने ब्रेड निकाली, टमाटर धीरे-धीरे काटे, चीज़ को बहुत एहतियात से रखा… जैसे हर परत में वह अपनी गलती का इकरार रख रहा हो।

    कॉफी बनाते वक्त उसकी आँखों में नमी थी। भाप से ढँके उसके चश्मे के शीशों में रूहानी की परछाईं थी, वो जो अब दूर लगती थी, पर जिस तक पहुँचने की कोशिश अब भी जारी थी।

    टेबल पर उसने सब कुछ अच्छे से सजाया, कप के पास एक छोटा सा नोट भी रखा, “अगर मेरी खामोशी ने ज़ख़्म दिए, तो ये सुबह मेरी पहली कोशिश है उन्हें भरने की।”

    और ठीक तभी, जैसे वक़्त ने उसकी पुकार सुन ली हो, रूहानी आ गई।

    उसकी चाल में अब भी वही चुप्पी थी, और आँखों में एक अजनबीपन — जैसे रात की नमी अब तक उसकी पलकों पर टिक गई हो। 

    उसने टेबल पर नज़र डाली, फिर अद्वैत की ओर, और कुछ पल तक कुछ नहीं बोली। मगर उन नज़रों में एक सवाल अब नहीं था, सिर्फ एक थकी हुई स्वीकृति थी — कि शायद कुछ रिश्ते माफ़ी से नहीं, कोशिशों से जुड़ते हैं।

    अद्वैत की नज़र जैसे ही रूहानी के चेहरे पर पड़ी, उसका दिल एक पल को थम-सा गया। उसकी आँखों के नीचे हलकी सूजन थी, जैसे कोई चुपचाप पूरी रात अपने आँसुओं से भीगता रहा हो। 

    वो दर्द जो ज़ुबान नहीं कहती, मगर चेहरा छुपा भी नहीं पाता….. अद्वैत ने वो सब कुछ उसकी आँखों में पढ़ लिया था। उसके दिल में एक हूक-सी उठी, जैसे किसी ने उसकी साँसों पर बोझ रख दिया हो। 

    एक बेचैनी, एक आत्मग्लानि, कि वो भी कहीं न कहीं इस उदासी का हिस्सा बन गया है। वो कुछ कह नहीं पाया, बस एक निगाह डाली — नम और शर्मिंदा।

    रूहानी ने धीरे से पूछा, “मीना नहीं आई आज काम पे?”

    अद्वैत थोड़ा झिझका, फिर बोला, “उसके काम करने का टाइमिंग बदल दिया है मैंने…”

    रूहानी ने उसे थोड़ा संदेह से देखा, जैसे दिल में कोई अनकहा सवाल उठ रहा हो।

    अद्वैत ने तुरंत बात सँभाली, उसकी आँखों में डूबते हुए बोला — ‘अगर तुम रोज़ नीचे वाले कमरे में सोओगी, वहीं से तैयार होकर निकलोगी… तो उसे शक हो जाएगा न। और फिर, उसके दोनों बच्चे तो सुबह-सुबह ही स्कूल निकल जाते हैं…’

    उसके लहजे में कोई चालाकी नहीं थी, सिर्फ एक मासूम-सी फ़िक्र थी कि वो इस रिश्ते की परतों को सबके लिए उतना ही अनदेखा रखना चाहता है, जितना कि रूहानी खुद चाहती थी।

    मगर रूहानी की आँखें उस पल कुछ और ढूँढ रही थीं… शायद कोई जवाब, या शायद ये जानना कि क्या अद्वैत की ये परवाह सिर्फ दिखावे की है… या कहीं उसमें कोई और परत भी छुपी है, जो धीरे-धीरे उजागर हो रही है।

    दोनों नाश्ते की मेज पर अभी बैठे ही थे। टेबल पर अद्वैत के हाथों से बनाए गए सैंडविच की खुशबू और कॉफी की भाप धीरे-धीरे कमरे में फैल रही थी। एक अजीब-सी चुप्पी थी दोनों के बीच बोझिल, मगर टूटी नहीं हुई।

    रूहानी ने कॉफी का प्याला उठाया ही था कि अचानक दरवाज़े की घंटी बजी।

    “मैं देखता हूँ,” अद्वैत कुर्सी से उठने लगा, मगर रूहानी ने उसे हल्के से रोक दिया।

    “मैं देखती हूँ,” उसने धीरे से कहा, उसकी आँखों में अब भी पिछली रात की थकान और आज की उलझनें तैर रही थीं।

    वो दरवाज़े की ओर बढ़ी, कदम थोड़े संकोच भरे थे जैसे दिल कुछ अनहोनी का संकेत दे रहा हो। उसने कुंडी खोली, और जैसे ही दरवाज़ा पूरा खुला… उसके सामने खड़ा था – एकांश राठौर 

    वही चेहरा, वही तीखी नज़रें… जो एक समय उसकी रगों में लावा बनकर दौड़ती थीं… अब दरवाज़े पर यूँ खड़ी थीं जैसे वक़्त को चीरकर लौट आई हों।

    “त-तुम…. यहाँ?” रूहानी की आवाज़ उसकी साँसों में ही घुल गई।

    उसका दिमाग एक पल के लिए शून्य हो गया… शब्द गायब, सोचें धुंध में डूबीं और दिल की धड़कन जैसे किसी दूसरे युग में पहुँच गई हो।

    अंदर से अद्वैत ने आवाज़ लगाई, “रूहानी, कौन है?”

    ————-

    क्या रूहानी के अतीत की परछाई, उसके आज की चौखट पर दस्तक देने आई है? 

    अद्वैत… क्या वो जान पाएगा कि ये दस्तक सिर्फ अतीत की नहीं, एक नए तूफ़ान की शुरुआत है? 

    अब जब तीन धड़कनों का वक़्त एक ही कमरे में समा गया है, तो क्या कोई रिश्ता बचेगा… या सब बिखर जाएगा?

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    लिखकर रूह छूने की कोशिश….. 🥹🥹

  • अधूरी इबादत भाग~35

    अधूरी इबादत भाग~35

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    भाग~35 आँखें जो शर्मिंदा हैं 

     

    अद्वैत वहीं दरवाज़े पर जड़ हो गया था, जैसे वक़्त उसकी साँसों के साथ थम गया हो। कमरे की हल्की पीली रौशनी रूहानी के नम बालों पर पड़कर उसे किसी बारिश में भीगी, अनकही कविता की तरह बना रही थी। 

    उसकी गर्दन से बहकर पायजामे के कपड़े तक पहुँचती पानी की बूंदें, हर उस भावना की गवाही दे रही थीं जो उसने आज तक दबा रखी थीं। 

    मगर अद्वैत के लिए यह दृश्य कोई आम क्षण नहीं था….. यह ऐसा था जैसे किसी पुराने, भरे हुए घाव पर अचानक धूप पड़ जाए। आँखों ने देखा जो दिल कहने से कतराता रहा।

    रूहानी का चेहरा जब आइने में उसकी अपनी परछाई से टकराया और उसने अद्वैत की मौजूदगी को महसूस किया, तो एक सिहरन सी दौड़ गई उसकी रूह तक। 

    वह चौंकी नहीं, मगर उसकी आंखों में एक ऐसी परत चढ़ गई जो शर्म और उलझन दोनों की थी। उसने तुरंत तौलिया उठाकर खुद को ढक लिया, जैसे कोई लहर जो तट से टकराकर लौटती है। 

    उसकी नज़रों में सवाल था, पर ज़ुबान पर सिर्फ वही एक वाक्य निकला, “ऐसे क्या देख रहे हो?”

    उसके स्वर में वो अजनबीपन था, जो दो अजनबियों के बीच बने रिश्ते की दीवार बन जाता है, चाहे वो एक ही छत के नीचे क्यों न रहते हों। 

    अद्वैत को समझ नहीं आया कि वो क्या कहे। उसकी पलकें झपकना भूल गई थीं और दिल एक लय में धड़कना बंद कर चुका था।

    “मैं… माफ़ करना, मैं बस… बस ये पूछने आया था कि… डिनर करोगी क्या?” उसकी आवाज़ जैसे किसी थके हुए दिल से निकली हो, टूटी, हकलाती हुई…. मानो हर शब्द अपने ही अपराध की गवाही दे रहा हो। 

    आँखें ज़मीन पर थीं, जैसे वहाँ खुद को दफना देना चाहता हो, और साँसें बोझिल, जैसे हर पल अपने किए पर शर्म की परतें चढ़ा रहा हो। 

    रूहानी ने उसकी तरफ देखा, आँखों में कहीं हल्का सा कांपता गुस्सा और कहीं एक मौन सी मायूसी तैरती थी। 

    “अद्वैत, हम दोनों जानते हैं कि इस शादी में हमारी अपनी-अपनी सीमाएँ हैं। इस तरह बिना नॉक किए…” वह रुकी, जैसे शब्द गले में अटक गए हों।

    अद्वैत ने कुछ कहने के लिए कदम बढ़ाया, मगर फिर रुक गया। “मैंने दरवाज़ा खटखटाया था… शायद तुमने सुना नहीं।”

    उसके स्वर में कोई सफाई नहीं थी, बस एक बेकसी थी। जैसे कोई खुद से भी नज़रें नहीं मिला पा रहा हो।

    “चाहे कुछ भी हो, हमारी ये… इस कॉन्ट्रैक्ट मैरिज में, निजता सबसे ज़रूरी है,” रूहानी की आवाज़ अब संयत थी, लेकिन उसमें एक थरथराहट थी जो अद्वैत को चीरती चली गई।

    और फिर एक लंबा मौन पसरा, जैसे वक्त खुद भी इस तनाव में घुटने लगा हो।

    अद्वैत ने उसकी आँखों में देखा, उन आँखों में कोई औरत नहीं थी, जो उससे नज़दीकियाँ चाहती हो। वहाँ सिर्फ एक इंसान था, जो खुद को सम्हालने में जुटा था। 

    उसे वह सब याद आ गया…. इशिता की मुस्कान, उसकी आखिरी साँसें और वो वादा कि वो कभी किसी और को अपनी दुनिया में इतनी जगह नहीं देगा।

    फिर भी आज, उस हल्की गीली खुशबू में, रूहानी की मौजूदगी ने उसकी दीवारों में एक दरार डाल दी थी।

    “माफ़ कर देना,” उसने धीरे से कहा और मुड़कर चला गया।

    रूहानी वहीं खड़ी रही, आइने में खुद को देखते हुए, जैसे पहली बार अपने ही चेहरे को समझने की कोशिश कर रही हो।

    अंदर कुछ टूटने जैसा था, मगर उससे भी ज़्यादा कुछ जुड़ने जैसा भी। मगर ये जुड़ाव कोई प्रेम नहीं था… ये सिर्फ दो जिंदगियों के बीच के मौन का पहला शब्द था।

    और बाहर, अद्वैत की चाल में एक ऐसा बोझ था जो उसने खुद अपने लिए चुना था… प्यार की कब्र पर खड़ा होकर किसी और की साँसें महसूस करना।

    °°°°°°°°°°°°°°°°°

    डिनर टेबल पर दोनों आमने-सामने बैठे थे, लेकिन उनके बीच की खामोशी किसी अथाह गहराई जैसी थी….. ठंडी, स्थिर और बोझिल। कमरे की रौशनी हल्की थी, और हर चम्मच की आवाज़ दीवारों से टकराकर लौटती थी जैसे कोई सूनी पुकार। 

    अद्वैत की निगाहें थाली में थीं, पर वो कुछ देख नहीं रहा था। हर निवाला जैसे एक गवाही था उसके अंदर के अपराधबोध की, उस एक पल की जब उसने रूहानी की निजता के आँगन में बिना अनुमति कदम रख दिया था।

    रूहानी चुपचाप खा रही थी, मगर उसके चेहरे पर कहीं कोई जीवन नहीं था। उसकी पलकों की झपक भी जैसे भारी हो गई थी, जैसे वह अपने ही भीतर की बेचैनी को छिपाने की कोशिश कर रही हो। 

    उसके जेहन में अभी भी अद्वैत की वो नज़रें थी…. गहराई तक जाती, पर न समझती, सिर्फ देखती हुई। वह नज़र जो इंसान को समझने नहीं, बस छूने आई थी, और वह छुअन… किसी आँधी जैसी थी…. तेज, असहज, और बिना चेतावनी।

    अद्वैत ने भीतर ही भीतर कई बार कोशिश की कि कुछ कह सके। कोई माफ़ी, कोई स्पष्टीकरण, कोई ऐसा शब्द जो इन तनों हुई नसों को थोड़ा ढीला कर दे। मगर हर बार कुछ अजीब-सा डर उसके शब्दों को गला देता। जैसे किसी पुराने वादे की लाश उसके गले में फँसी हो। 

    वह जानता था, उसके अतीत की परछाइयाँ आज भी उसके वर्तमान में साँस ले रही थीं…. उसकी पहली पत्नी की छवि, उसकी यादें, और उसका वादा कि वह किसी और को उस जगह तक नहीं पहुँचने देगा।

    रूहानी ने बिना कुछ कहे धीरे से अपनी प्लेट सरकाई और उठ खड़ी हुई। कुर्सी की आवाज़ जैसे उस सन्नाटे को तोड़ने की एक बेकार कोशिश थी। 

    अद्वैत ने सिर उठाया और उनकी नज़रों की टकराहट ने एक पल को वक्त रोक दिया। उसमें कोई शब्द नहीं थे, बस भाव थे… टूटी उम्मीदें, अनकही शिकायतें, और कोई अजनबी सी आत्मीयता जिसे दोनों ने पहचानने से इनकार कर दिया।

    “मैं थक गई हूँ,” रूहानी ने बहुत धीमे, बहुत संयत स्वर में कहा। मगर इस थकान में नींद नहीं थी, इस थकान में टूटन थी — उस बोझ की, जिसे वो रोज़ ढो रही थी, उस रिश्ते की जो काग़ज़ पर था, मगर दिलों में कभी नहीं बसा।

    अद्वैत कुछ कहना चाहता था, बहुत कुछ। मगर शब्द उसकी ज़ुबान तक आते-आते जल जाते। वह सिर्फ उसे जाते हुए देखता रहा, जैसे कोई धुंध में लिपटा साया पीछे छूट रहा हो।

    टेबल पर रखी दो अधूरी थालियाँ अब भी वहीं थीं…. ठंडी, चुप, और गवाह उस रात की, जब दो लोग साथ थे, मगर फिर भी एक-दूसरे से बहुत दूर।

    °°°°°°°°°°°°°°°

    रूहानी बिस्तर पर थी, मगर मन किसी और समय में उलझा था — करवटें नहीं, अब तो जैसे आत्मा ही बेचैन थी… तकिए पर सिर रखते ही उसे अपने अंदर कोई धीमा तूफान सुनाई देता….. एक बेचैनी, जो थमती नहीं थी। नींद आँखों के किनारों तक आकर लौट जाती थी, जैसे उसे भी इस मौन की भाषा समझ न आ रही हो… बिल्कुल किसी अपने की तरह जो पास होकर भी अजनबी लगने लगे। 

    हर बार जब वो आंखें मूंदती, अद्वैत की वो नज़रें सामने आ खड़ी होतीं…. नरम, संकोच भरी, लेकिन कहीं भीतर कुछ कहती हुई। वो नज़रें जिनमें कोई पुराना दुख छिपा था, कोई अधूरा वादा, और वो खामोशी जो चीखने जैसी थी।

    उसने करवट ली और एकाएक उसे ख्याल आया…. सुबह जब वो पहली मंज़िल में गई थी, तो अद्वैत का स्टडी रूम लॉक नहीं था। ये बात उसे अभी याद आई, और अजीब बात ये थी कि वो कमरा हमेशा बंद रहता था। 

    उसके भीतर कुछ खिंचा, कोई पुरानी डोर जैसे खुद-ब-खुद खिंचने लगी। वह उठी, बिना चप्पलों के, नंगे पाँव, और दबे क़दमों से सीढ़ियाँ चढ़ने लगी। घर की दीवारें साँसें रोककर जैसे उसका पीछा कर रही थीं।

    स्टडी रूम के बाहर आकर वो रुकी। साँसें धीमी थीं, लेकिन दिल की धड़कनें जैसे कानों में गूंज रही थीं। दरवाज़ा सच में खुला था। उसका हाथ थोड़ा कांपा, उसने हँथेली दरवाज़े पर रखा, पर खोलने से पहले एक और सवाल भीतर से उठा….. 

    क्या ये सही होगा? 

    क्या ये भी वही गलती नहीं होगी जो आज अद्वैत ने की थी? 

    क्या मैं भी उसकी निजता में झाँकने जा रही हूँ?

    लेकिन वो एक पन्ना… वो किताब… और उसमें लिखा इशिता का नाम… रूहानी का मन अब पीछे हटने को तैयार नहीं था। 

    उसने धीरे से दरवाज़ा खोला….. कमरे में हल्की-सी लकड़ी की महक थी, और खिड़की से आती चांदनी सीधे उस खाली खुली अलमारी पर पड़ रही थी, जहाँ वो किताब रखी जाती थी।

    मगर वो खाली थी।

    वहाँ कुछ नहीं था…. न किताब, न वो टुकड़ा 

    जो उसके भीतर के सारे सवालों को जिंदा कर गया था। 

    ————

    तो क्या अद्वैत जानता था कि वो वहाँ आएगी?

    क्या ये सिर्फ एक इत्तेफ़ाक था… या कोई अधूरी कहानी, जो खुद को छुपा रही थी?

    अगर किताब वहाँ नहीं थी….. तो फिर… इशिता की यादों का बोझ अब किसके पास था? 

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  • अधूरी इबादत भाग~34

    अधूरी इबादत भाग~34

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    भाग~34 नज़रें जब मिलें 

     

    धनौरी की उस धूलभरी सड़क पर, जहाँ हर मोड़ जैसे किसी अधूरे किस्से की तरह चुप खड़ा था, रूहानी की सांसें एक अनकहे डर और उम्मीद के दो सिरों के बीच झूल रही थीं। 

    उस पुरानी दुकान के सामने खड़े होकर उसने पल भर को आँखें बंद कीं…. मन ही मन अपनी माँ की वो बात याद आई, “हर सपना एक कीमत मांगता है, बेटा… सिर्फ पैसों की नहीं, हिम्मत की भी।” लेकिन उस वृद्ध दुकानदार की जिद और चालाकी ने जैसे उसकी उम्मीदों पर पानी फेर दिया था।

    पर तभी मीना, जो अब तक शांत खड़ी थी, एकदम से बोल पड़ी, “बाबूजी, आप तो कह रहे थे कि आपको शाम की फ्लाइट है विदेश जाने की, और बेटा कह रहा था कि सारी प्रॉपर्टी बेचकर ही आना। अब अगर आप यही दुकान नहीं बेचेंगे, तो क्या बाकी टाइम बचा है जाने का?”

    उसके शब्दों में कुछ ऐसा था जो दुकानदार को भीतर तक छू गया। वह चुप हुआ, फिर गहरी साँस लेकर बोला, “ठीक है… तुम लोग बार-बार पूछ रहे हो, और मुझे भी अब देर नहीं करनी। लो, बीस लाख में तय रहा, पर आज ही कागज़ात पूरे होंगे।”

    रूहानी की साँस जैसे एक झटके में लौट आई। एक पल के लिए उसे सब कुछ थमता सा महसूस हुआ, जैसे आसमान पर छाए बादल अचानक हट गए हों। उसने अपने बैग से दस्तावेज़ और पैसे निकाले, और कांपते हाथों से कागज़ात उसके सामने रख दिए। 

    दुकानदार ने भी एक पुराना फाइल खोला और दोनों ने कागज़ों पर दस्तखत किए। रूहानी ने ध्यान से पढ़ा, हर लाइन को जाँचा, और जब आखिरी हस्ताक्षर किए, तो ऐसा लगा मानो उसने सिर्फ एक दुकान नहीं खरीदी, बल्कि अपने सपनों को एक ठिकाना दे दिया हो।

    कागज़ साइन करने के बाद, वो कुर्सी से उठी, जैसे किसी जीत का बोझ उसके कंधों से उतर गया हो।

    उस पल रूहानी को कोई परवाह नहीं थी कि किसने उस दुकान को खरीदने की कोशिश की थी। अब वो जगह उसकी थी….. उसकी पहचान, उसकी मेहनत, उसका सपना। 

    “अब कोई भी मुझे इस राह से पीछे नहीं कर सकता,” उसने मन ही मन कहा।

    जैसे ही रूहानी को दुकान की चाबी मिली, उसकी मुट्ठी कस गई… वो सिर्फ धातु का एक टुकड़ा नहीं थी, बल्कि उसकी मेहनत, संघर्ष और उम्मीदों की चाबी थी। उसने उसे हथेली में भरकर कुछ पल के लिए अपनी आँखें मूँद लीं, मानो उस धड़कते हुए पल को आत्मा में समेट लेना चाहती हो। 

    फिर वह हल्के क़दमों से मीना की ओर मुड़ी और धीमे स्वर में बोली, “मीना, अब तुम विमान नगर वापस चली जाओ। मुझे हडपसर जाना है… वहाँ पुराने स्टूडियो का जो किराया बकाया है, वो चुकता करना है।”

    मीना ने थोड़ा चौंकते हुए कहा, “मैडम, चलिए मैं भी साथ चलती हूँ…”

    रूहानी ने उसकी तरफ देख मुस्कुराते हुए सिर हिलाया, “नहीं मीना, आज अकेले जाने का मन है… ये सफर मेरा है। और तुम्हारे बच्चे भी घर पर अकेले होंगे, उनके बारे में भी तो सोचो। कल वापस आ जाना, बहुत सारा काम भी रहेगा।”

    मीना थोड़ी मायूस होकर चुप हो गई, लेकिन रूहानी के चेहरे पर जो विश्वास की चमक थी, उसने उसे और कुछ कहने नहीं दिया। वो चुपचाप विदा लेकर चली गई।

    हडपसर पहुँचते-पहुँचते दिन हल्का सा ढलने लगा था। स्टूडियो के बाहर खड़ी रूहानी ने एक बार फिर उस पुरानी इमारत को देखा…. धूल में लिपटा वो सपना, जिसे आज वो साफ करने आई थी। 

    पुराने मकान मालिक से मिलकर उसने बाकी का किराया अदा किया, और पक्की रसीद ली। बुजुर्ग ने उसे दुआ देते हुए कहा, “बिटिया, इस बार अपना सपना अधूरा मत छोड़ना।”

    लौटते वक़्त, रूहानी खुद से बुदबुदाई, “अब भी मेरे पास चार लाख हैं… उसी से मैं रिनोवेशन करवा लूंगी। और जो भी ज़रूरत का सामान होगा, मशीन, कपड़ा, डिजाइनिंग टेबल — सब कुछ ले आऊंगी।”

    उसके चेहरे पर अब थकावट नहीं थी… थी तो सिर्फ़ उम्मीद की चमक और एक नर्म-सी मुस्कान — जैसे ज़िंदगी पहली बार उसकी ओर बढ़ी हो, बिना किसी शर्त के।

    रूहानी जैसे ही सड़क किनारे कैब रोकने लगी, उसकी नज़र सामने से आ रहे एक दुबले-पतले, स्कूल यूनिफॉर्म में सजे लड़के पर पड़ी।

    सड़क पार करता वह लड़का पलभर में उसे पहचान गया। उसकी आँखों में चमक उभरी, “दीदी!” 

    वह दौड़कर रूहानी की ओर लपका। रूहानी की साँस जैसे रुक गई हो, वर्षों से भुलाया कोई एहसास दिल में दस्तक देने लगा।

    दोनों बहन-भाई गले लगे, कसकर, जैसे वक्त के हर बीते पल को समेट लेना चाहते हों। रूहानी ने उसकी पीठ पर हाथ फेरते हुए पूछा, “कैसा है मेरा छोटा यश? और मम्मी-पापा कैसे हैं?”

    यश ने चुपचाप खुद को अलग किया और थोड़ा रूठे हुए स्वर में कहा, “आपकी वजह से ही अब मैं आपको फोन नहीं करता, दीदी। आप ही ने तो कहा था ना, मुझसे कोई संपर्क मत करना… वरना मम्मी-पापा मेरा फ़ोन भी छीन लेंगे।”

    रूहानी की आँखें भीग आईं, लेकिन उसने मुस्कुराने की कोशिश की। कुछ पल चुप रहकर वो बोली, “मैंने ऐसा इसलिए कहा था यश… क्योंकि मैं नहीं चाहती कि मेरी वजह से तुम्हें डाँट पड़े। तू उनके लाडले बेटे है, वो तुझे बहुत चाहते हैं।”

    यश ने गर्दन झुकाई और धीमे से कहा, “हाँ… लेकिन फिर भी, मैं बहुत अकेला हो गया हूँ दीदी। दोस्तों के बीच तो रहता हूँ… पर वो जो बात जीजाजी में है… वो किसी में नहीं। आप जानती हो, मैं रोज़ उनके बारे में सबको बताता हूँ… जीजू ऐसे, जीजू वैसे…”

    रूहानी बस उसकी हाँ में हाँ मिलाती रही, हल्की मुस्कान के पीछे बहुत कुछ छुपाते हुए। 

    फिर उसने उसकी कंधे पर हाथ रखकर कहा, “मुझे अब निकलना होगा यश… नहीं तो विमान नगर पहुँचते-पहुँचते रात बहुत हो जाएगी।”

    यश ने चुपचाप सिर हिलाया, लेकिन उसकी आँखों में जो कसक थी, वो दूर तक रूहानी का पीछा करती रही।

    °°°°°°°°°°°°°°°°°

    जब रूहानी विमान नगर अद्वैत के घर पहुँची, तो उसकी रूहानी की सारी थकान जैसे एक पल में झलकने लगी। सीधे अपने कमरे में जाकर नहाने चली गई, बिना यह सोचे कि अद्वैत घर में है या नहीं।

    सुबह से बाहर भाग-दौड़, मानसिक उलझनों और सपनों की जद्दोजहद ने उसे थका दिया था। बाथरूम से निकली तो उसने ढीले पायजामा सेट को पहना था, जो हल्का रंग का था और भीगते बालों से गीला हो चुका था। 

    वह तौलिये से अपने गीले बालों को धीरे-धीरे थपकाते हुए सूखाने की कोशिश में लगी थी, जैसे हर बूंद उसके भीतर की सारी बेचैनी को बहा ले जा रही हो।

    उसने बिल्कुल भी महसूस नहीं किया कि अद्वैत उसके कमरे के बाहर खड़ा है, डिनर के लिए पूछने आया था, लेकिन अद्वैत का दिल जैसे रुक-रुक कर धड़क रहा था। 

    उसकी आँखें रूहानी के हर छोटे-छोटे हाव-भाव को बड़े ही बारीकी से देख रही थीं…. उसके भीगे बाल, जो उसकी नाजुक गर्दन पर गिर रहे थे, तौलिये की कोमल छुअन, और वो हल्का सा कंपकपाना जो उसके चेहरे पर था। 

    अंदर एक अजीब सी गर्माहट उठ रही थी, जिसे वह खुद भी समझ नहीं पा रहा था। 

    उसकी सांसें धीरे-धीरे तेज हो रही थीं, और दिल की गहराइयों में कोई अनकहा सवाल उठ रहा था। 

    क्या ये सही है, क्या उसने अपने मन को इस तरह खो दिया? 

    रूहानी ने जैसे ही आइने में अपनी परछाई देखी, उसे महसूस हुआ कि कोई दरवाजे के पास खड़ा है। वह तुरन्त तौलिये को अपने गर्दन और साइन के उस हिस्से पर ले आई, जहाँ पानी की बूंदें गिरी थीं।

    अद्वैत को खड़ा पाकर उसने सकपकाते हुए कहा, “ऐसे क्या देख रहे हो?” उसकी आवाज़ में नश्तर की तरह कड़कपन और एक छुपी हुई शर्मिंदगी दोनों झलक रही थी।

    —————–

    क्या रूहानी के सपनों की ये दुकान सचमुच उसकी आज़ादी की चाबी बनेगी, या उसके अतीत के साये फिर से उस पर मंडराएंगे?

    क्या अद्वैत के उस खामोश नज़र में छुपा वो अनकहा सवाल, रूहानी के दिल की सबसे नाज़ुक जगह को छू पाएगा, या दोनों के बीच की दीवारें और गहरी होंगी? 

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  • अधूरी इबादत भाग~32

    अधूरी इबादत भाग~32

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

    भाग~32 दिल के ताले 

     

    पीछे से अद्वैत के अचानक आने पर रूहानी एकदम से चौंक गई। उसका चेहरा सफेद पड़ गया था, आंखें पलभर को फैल गईं और हाथ में पकड़ी किताब लगभग छूट ही गई। उसकी साँसें तेज हो गई थीं, जैसे कोई चोरी पकड़ी गई हो। 

    अद्वैत ने भौंहें चढ़ाते हुए पूछा, “क्या हुआ? यूं सहम क्यों गई?” 

    रूहानी ने फौरन खुद को सँभालते हुए सिर झुकाकर कहा, “नहीं, ऐसा कुछ भी नहीं है… वो दरअसल… यहाँ चारों तरफ इतनी शांति है न, तभी जब तुम्हारी आवाज़ अचानक आई तो थोड़ा चौंक गई… शायद इसलिए।” 

    उसकी आवाज़ में झिझक थी, लेकिन आँखें कुछ और कह रही थी… एक घबराहट, जो खुद से भी छुपी नहीं थी। 

    अद्वैत उसकी बातों को मान तो गया, लेकिन उसकी नज़रें रूहानी के चेहरे पर अटकी रह गईं, जैसे वो कुछ और पढ़ने की कोशिश कर रहा हो। 

    फिर वह हल्के से मुस्कराया और बोला, “ठीक है, चलो नीचे।” 

    दोनों साथ-साथ सीढ़ियों की ओर बढ़े, लेकिन जैसे ही कदम उठे, वे दोनों एक-दूसरे के विपरीत किनारों पर चलने लगे, जैसे दूरी बनाए रखना अब भी एक अनकहा अनुबंध था। पर सीढ़ियों के हर पड़ाव पर, उनके दिलों के भीतर कुछ था… जो धीरे-धीरे पास आने की कोशिश कर रहा था।

    मीना और उसके दोनों बच्चे जब खाना खाकर जाने की तैयारी करने लगे तो अद्वैत और रूहानी जैसे एक ही सोच में डूबे हुए थे, एक साथ बोल पड़े, “यही रह जाओ।” 

    उनकी आवाज़ में एक अनकहा अपनापन था, जिसे वो खुद भी शायद अभी ठीक से नहीं समझ पाए थे। दोनों की नज़रें एक पल को आपस में टकराईं और फिर एक हल्की-सी फीकी मुस्कान उनके चेहरों पर तैर गई।

    अद्वैत ने बात संभालते हुए कहा, “रात हो गई है मीना, यहीं रुक जाओ बच्चों के साथ, क्या ज़रूरत है इतनी देर में लौटने की।” 

    मीना थोड़ी हड़बड़ाई, उसकी आँखों में कुछ छुपा हुआ डर था। उसने जल्दी से जवाब दिया, “न-नहीं सर… मेरे पति आएंगे… और अगर मैं घर पर नहीं रही तो…”

    रूहानी ने उसकी बातों में कुछ अजीब सा महसूस किया। उसकी निगाहों में संदेह उभरा, “क्या मतलब?”

    मीना ने तुरंत मुस्कुराने की कोशिश की, वो मुस्कान जिसमें सच्चाई कम और बनावट ज़्यादा थी, “अरे नहीं मैडम, मेरा मतलब ये कि अगर मैं नहीं रही तो इनके पापा भूखे रह जाएंगे… उन्हें तो चाय बनाना भी नहीं आता।”

    अद्वैत ने एक गहरी सांस लेकर कहा, “ठीक है, मैं कैब बुक कर देता हूँ।”

    मीना ने हाथ जोड़ते हुए मना किया, “नहीं, नहीं, सर, मैं चली जाऊंगी।” 

    लेकिन तब तक रूहानी भी अद्वैत की बात दोहराई, “नहीं मीना, इतनी रात को अकेले मत जाओ, कैब सही रहेगा।”

    मीना ने उन दोनों की बात मान लिया। 

    फिर रूहानी ने मीना के बच्चों की ओर मुड़कर कहा, “जब भी मन करे, यहीं आ जाना…”

    गुनगुन और चीकू ने ख़ुशी में एक-दूसरे से हाई-फाइव किया, और उस मासूमियत में जैसे एक नया रिश्ता  लेने लगा था…. जिसमें न खून का रिश्ता था, न नाम का, फिर भी कोई डोर थी… जो सबको जोड़ रही थी।

    घर में एक बार फिर से वही पुराना, गूंजता हुआ सन्नाटा पसर गया, जैसे सब कुछ अपनी जगह पर लौट आया हो, लेकिन फिर भी कुछ बदल चुका था। 

    मीना और उसके बच्चों के जाने के बाद अद्वैत और रूहानी के बीच एक अजीब-सी चुप्पी छा गई थी, जो न तो पूरी तरह असहज थी और न ही पूरी तरह सुकून भरी। दोनों एक-दूसरे से नज़रें चुराने लगे….. जैसे उन आंखों में कुछ था जो अभी कहा नहीं जा सकता था।

    इस अनकहे बोझ को हल्का करने के लिए अद्वैत ने आखिरकार खुद से कहा, “मुझे नींद आ रही है, मैं जा रहा हूं सोने।”

    रूहानी ने भी उसकी तरफ बिना देखे ही धीमे स्वर में जवाब दिया, “गुड नाइट।” और फिर नीचे वाले कमरे में जाकर दरवाज़ा हल्के से बंद कर लिया।

    पर उसकी आंखों में नींद नहीं थी, सिर्फ सवाल थे। वो सवाल जो उसके दिल में अब गहराई से उतरते जा रहे थे।

    उसे कमरे में टहलते हुए उसी किताब की याद  से ताज़ा हो गई….. वो किताब जिसे उसने अद्वैत के स्टडी रूम में देखा था, जिसके पहले पन्ने पर सुंदर लिखावट में लिखा था “यह किताब मेरे दिल के बहुत करीब है… — इशिता”।

    इशिता… कौन थी वो? क्या वो अद्वैत की पहली पत्नी थी? या कोई और…?

    मन का भूचाल उसे थकने नहीं दे रहा था। उसी में, उसने चुपचाप अपने पायल की आवाज़ दबाते हुए सीढ़ियों की ओर कदम बढ़ाए। हर सीढ़ी पर उसका दिल और भी तेज़ धड़कने लगा…

    उसे नहीं पता था कि वो ऊपर जाकर क्या ढूंढ़ेगी….. जवाब, या और सवाल…

    रूहानी दरवाज़े के सामने खड़ी कुछ पलों तक वहीं जमी रही। उसका हाथ धीरे-धीरे डोर नॉब की ओर बढ़ा, जैसे कोई राज़ खोलने जा रही हो। पर तभी उसकी उंगलियाँ एक ठंडी सी सच्चाई से टकराईं — दरवाज़ा बंद था, लॉक लगा हुआ था। 

    एक गहरी साँस लेकर वो चुपचाप नीचे लौटी, उसके मन में एक हल्का-सा अफ़सोस और एक अधूरी उत्सुकता थी जो उसके सीने में धड़क रही थी।

    अपने कमरे में आकर वो पेट के बल लेट गई, तकिये में चेहरा छुपाते हुए, जैसे किसी खोई हुई सोच को पकड़ना चाहती हो। उसका मन अद्वैत की प्रकृति पर टिक गया…. इतना शांत, लेकिन कहीं न कहीं कुछ छुपा हुआ सा। वो कब अपनी दुनिया खोलता है? और कब खुद को उस ताले में बंद कर लेता है — कुछ समझ नहीं आता।

    इन्हीं उलझनों में उसकी आँखें कब मुंदी, उसे खुद भी नहीं पता चला।

    सुबह की धीमी रोशनी कमरे में फैल रही थी जब उसकी नींद खुली। बाहर से कॉफ़ी की खुशबू आ रही थी, और जब वो बाहर आई तो देखा…. अद्वैत किचन में कॉफ़ी बना रहा था।

    रूहानी किचन के पास पहुँची ही थी कि अद्वैत ने एक मग उसकी ओर बढ़ाया, “मैंने दो कप कॉफ़ी बनाई है… पीना चाहोगी?”

    रूहानी ने हल्के से सिर हिलाया और मग लेकर डाइनिंग टेबल की कुर्सी पर बैठ गई।

    रूहानी ने मग की सतह पर उठती भाप को देखते हुए हल्की मुस्कान के साथ कहा, “तुम्हें तो कुछ बनाना आता ही नहीं था… तो फिर ये कॉफ़ी किस जादू से बना ली?”

    अद्वैत ने किचन काउंटर से टेक लगाते हुए मुस्कराया, उसकी आवाज़ में एक सादगी और थोड़ा-सा संकोच भी था, “हाँ, बहुत कुछ तो नहीं आता… लेकिन एक-दो चीजें बना लेता हूँ। बस, घर पर ज़रूरी सामान हो और… मन भी हो।”

    उसके ‘मन भी हो’ कहने में जो ठहराव था, वो रूहानी की रूह को छू गया। उसने अनजाने ही नज़रें झुका लीं, जैसे उस मामूली-सी कॉफ़ी के पीछे की भावनाओं को पढ़ने लगी हो। उस मग में केवल कॉफ़ी नहीं थी, उसमें शायद कोशिश थी… एक अनकही भावना… या फिर किसी आदत को दोबारा अपनाने की शुरुआत।

    कुछ क्षणों बाद, अद्वैत सोफे पर बैठ गया और उसने एक छोटा फोल्डर और लिफ़ाफ़ा उसकी ओर बढ़ाया, “ये लो…पूरे 25 लाख हैं, और ये एग्रीमेंट। साइन कर दो।”

    रूहानी ने कॉफ़ी साइड में रखकर काग़ज़ों पर दस्तख़त कर दिए। फिर मुस्कुराकर बोली, “थैंक यू अद्वैत… तुम्हें अंदाज़ा भी नहीं है कि तुमने मेरी ज़िंदगी की कितनी बड़ी मदद की है। मैं अब अपने सपनों को पूरा करके रहूँगी। मीना आएगी तो मुझे उसके साथ जाना होगा।”

    अद्वैत ने हल्की हैरानी से पूछा, “आज फिर से क्यों?”

    रूहानी ने कुछ पल चुप रहकर सोचा — कितनी बार तो चाहा था कि ये इन्सान एक बार पूछे कि वो उसके पैसे कहाँ लगा रही है… अब जब पूछ ही लिया है, तो बता ही देती हूँ

    उसने कहा, “मैं एक स्ट्रगलिंग ड्रेस डिज़ाइनर हूँ, तो नया स्टूडियो ले रही हूँ… उसी के लिए ये सब।”

    अद्वैत की आँखों में चमक आ गई। मुस्कराकर बोला, “अरे वाह! लेखक की पत्नी ड्रेस डिज़ाइनर…. ये तो कुछ ज़्यादा ही यूनिक कॉम्बिनेशन हो गया, है ना?”

    रूहानी उसके शब्दों से जैसे भीतर तक सिहर उठी। वो अचानक कुछ पल को चुप हो गई, उसके हाथ में पकड़ा कॉफ़ी मग ठंडा होने लगा लेकिन उसकी पकड़ अब भी वैसी ही टिकी रही। 

    उसकी आँखें अद्वैत की ओर थीं, पर नजरें जैसे किसी और ही सवाल में उलझी थीं….. क्या उसने सच में ‘पत्नी’ कहा? वो शब्द जो अब तक सिर्फ दस्तावेज़ों में था, आज अद्वैत की ज़ुबान पर था… यूँ सहज, यूँ स्वाभाविक।

    अद्वैत को जैसे महसूस हुआ कि उसने कुछ ज़्यादा कह दिया है, उसकी नज़रें फौरन झुक गईं। वो भी खुद को संयत कर घूंट भरते हुए अपनी कॉफी खत्म की और नज़रे चुराते हुए बोला, “मुझे तुमसे एक ज़रूरी बात करनी है… या यूँ कह लो कि कुछ पूछना है।”

    रूहानी, जो अब तक अपने मन के उलझे धागों को सुलझाने में लगी थी, थोड़ी झेंपते हुए बोली, “क्या?”

    अद्वैत ने हल्की सी साँस लेकर कहा, “अगले संडे यहीं पास में एक साहित्यिक समारोह हो रहा है… वहाँ मुझे आमंत्रित किया गया है। लेकिन… बात ये है कि उन्होंने मुझसे कहा है कि मुझे अपनी पत्नी के साथ आना होगा।”

    उसने रूहानी की ओर देखा, आँखों में एक सवाल था, जो शब्दों से ज़्यादा गहरा था।

    “तो… क्या तुम चलोगी?”

    रूहानी की सांस थम सी गई। उसके होंठ हिले, लेकिन कोई आवाज़ नहीं निकली। 

    अद्वैत की निगाहें उसके चेहरे पर टिकी थीं, हर छोटी सी झलक पढ़ने की कोशिश में। कमरे की चुप्पी में सिर्फ उनके दिल की धड़कनों की गूंज़ सुनाई देती थी। 

    क्या वह हां कहेगी? या खामोशी ही उसका जवाब होगी? 

    —————–

    क्या मीना की उस अचानक डर भरी बात के पीछे कोई छुपा हुआ सच था?

    क्या ‘इशिता’ का नाम सिर्फ एक नाम था, या उसके पीछे छुपा था कोई अधूरा किस्सा? 

    क्या रूहानी उस साहित्यिक समारोह में अद्वैत के साथ जाने को तैयार होगी, या उसकी खामोशी में छुपा होगा कोई अनसुलझा दर्द?

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  • अधूरी इबादत भाग~31

    अधूरी इबादत भाग~31

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    भाग~31 फटा हुआ पन्ना 

     

    अद्वैत किचन में था, apron पहने, चेहरे पर हल्की झुंझलाहट और पसीने की बूंदें। गैस पर रखे तवे से धुआँ उठ रहा था और कड़ाही में कुछ जलने की गंध हवा में तैर रही थी। 

    अद्वैत का हाथ थरथरा रहा था, जैसे हर टमाटर का टुकड़ा उसके हाथों से फिसलता जा रहा हो। उसकी सांसें गहरी थीं, पर दिल की धड़कनें असामान्य रूप से तेज़। हर झोंके में जो धुआँ उठता, वह उसकी उम्मीदों को बुझाता जा रहा था और एक आवाज़ उसके मन में बार-बार गूंज रही थी, “क्या मेरी कोशिशें इन मासूमों के लिए कभी मायने रखेंगी?”

    तवे पर जलती हुई आवाज़ ने उसे झकझोर दिया, जैसे असफलताओं का बोझ उसके कंधों पर उतर आया हो मानो वह खुद से ही हारता जा रहा था।

    मीना और रूहानी के घर में घुसते ही बच्चों की खामोशी ने माहौल में एक भारीपन घोल दिया था। गुनगुन की आँखें भरी हुई थीं और चीकू का हाथ उसकी बहन के हाथ में कसकर जकड़ा हुआ था, जैसे उसने अभी-अभी किसी डरावने दृश्य से खुद को खींच निकाला हो।

    मीना ने दौड़कर अपने बच्चों को गले लगाया, “क्या हुआ बच्चो? तुम रो क्यों रहे हो?” गुनगुन ने धीरे से फुसफुसाया, “अद्वैत अंकल ने कुछ जलाया… बहुत तेज़ आवाज़ आई… हमने सोचा कुछ बुरा हो गया।”

    रूहानी तेजी से किचन की ओर बढ़ी…. जहाँ अद्वैत झुका हुआ था, हाथ में तवा और चेहरे पर मायूसी। उसे देख रूहानी की आँखों में एक पल के लिए चिंता और फिर एक हल्की सी मुस्कान उभरी।

    “तुम ठीक हो?” उसने धीरे से पूछा।

    अद्वैत ने चौंककर उसकी ओर देखा, फिर सामान्य सी आवाज़ में बोला, “बच्चो ने कहा कि उन्हें भूख लगी है, इसलिए मैंने सोचा बच्चों के लिए कुछ बना लूँ…. पर शायद मेरा लेखक होना ही ठीक है, रसोइया नहीं।”

    “तुम ठीक तो हो ना? मैं… बस डर गई थी उस आवाज़ से… ये बच्चे इतने नाज़ुक होते हैं… तुम भी…” रूहानी की आवाज़ में एक नर्माहट थी, जैसे अपने भीतर की बेचैनी छुपाने की कोशिश कर रही हो।  

    उसकी आँखों में न केवल चिंता थी, बल्कि एक छुपा हुआ सवाल भी, जो शायद वो खुद भी समझ नहीं पा रही थी। उसकी सांसें थोड़ी तेज़ हुईं, मानो किसी अनजानी बेचैनी को रोकने की कोशिश हो रही हो।

    जब चीकू की मासूम उंगली अद्वैत की ओर उठी और उसने नन्हीं सी आवाज़ में कहा, “अंकल, आपको खाना बनाना नहीं आता ना?” तो कमरे की हवा में एक पल को जैसे नमी भर गई। वो सवाल नहीं था, वो एक सच्चाई थी जो अद्वैत के चेहरे पर शर्म और हल्की मुस्कान बनकर उभरी। 

    रूहानी की हँसी जैसे फूट पड़ी, वो खुलकर मुस्कुराई। 

    अद्वैत ने भी अपनी गर्दन झुका ली, जैसे उस सवाल ने उसके हाथों की बेबसी और उसके अंदर की गहराई दोनों उजागर कर दी हो।

    मीना ने भी मुस्कराते हुए तुरंत कहा, “आप निकलिए, सर… मैं बना देती हूँ,” और वह बिना देर किए पूरे किचन की सफ़ाई में जुट गई, जैसे किचन को सहेजना उसके मन को भी सहेजने जैसा था। 

    अद्वैत ने झेंप मिटाने के अंदाज़ में एप्रन उतारा और चुपचाप सोफे की तरफ़ चला गया, जहां उसके कुछ कागज़, पेन और लैपटॉप रखे हुए थे। वह अपने में ही खोया-सा उन्हें समेटने लगा।

    तभी रूहानी भी मीना की मदद के लिए आगे बढ़ी, शायद सिर्फ़ सामान समेटने नहीं, बल्कि उस पल की उलझन समेटने भी।

    लेकिन मीना ने बीच में आकर उसका हाथ थाम लिया, मुस्कुरा कर बोली, “आप रहने दीजिए मैडम, सर को ऊपर कुछ ज़रूरत पड़ी तो…” और धीरे से उसका हाथ सामान से अलग कर दिया। 

    उस क्षण रूहानी का चेहरे का रंग उड़ गया, जैसे कोई अनकही सीमा फिर से उसकी आँखों के सामने आ खड़ी हुई हो। अभी तक वह अद्वैत के कमरे के अंदर नहीं गई थी…. न उसे कभी ज़रूरत पड़ी, न इजाज़त मिली। 

    एग्रीमेंट की एक-एक पंक्ति उसके मन में ताज़ा हो उठी, जिसमें साफ़ कहा गया था — ‘न कोई एक-दूसरे के कमरे में आएगा, न निजी सीमाओं को लांघेगा।’

    रूहानी ने हल्के से बात मोड़ दी, “अद्वैत कोई छोटा बच्चा थोड़ी है, वो मैनेज कर लेगा…..” लेकिन उसकी आवाज़ में खुद को समझाने की थकावट थी। 

    लेकिन मीना पीछे नहीं हटी। वह मुस्कुराई और बोली, “पति को अपनी पत्नी की ज़रूरत पड़ ही जाती है… देखिए न, सर सीढ़ियाँ चढ़ने लगे हैं…” और जैसे ही अद्वैत की छाया ऊपर जाती दिखी, मीना ने एक धीमा-सा धक्का दिया, “जाइए न मैडम, अब तो मान जाइए…”

    रूहानी कुछ नहीं बोली। उसकी पलकें झुकी रहीं, जैसे दिल में कोई गूंगी उलझन पल रही हो। फिर वो चुपचाप, धीमे क़दमों से, अनजाने डर और कहीं भीतर की कोमल उत्सुकता को समेटे, अद्वैत के पीछे-पीछे सीढ़ियाँ चढ़ने लगी।

    हर क़दम एक नई दहलीज़ थी और शायद, एक नया मोड़ भी।

    अद्वैत अपने कमरे में कदम रखने ही वाला था कि उसकी नज़र दो कदम दूर खड़ी हुई रूहानी पर पड़ी, जो इस अजीब सी स्थिति से बचने के लिए अपनी निगाहें इधर-उधर फेर रही थी। उसकी आंखें झुकी हुई थीं, पर भीतर एक बेचैनी साफ़ झलक रही थी। 

    अद्वैत का चेहरा थोड़ा गंभीर हो गया, उसकी आवाज़ में एक गहरी गंभीरता समा गई। “तुम यहां? रुहानी…”

    रूहानी जल्दी से अपना हाथ हिलाते हुए बोली, “मैं जानबूझकर यहां नहीं आई, वो मीना ने… मुझे… यहां… तुम्हारी मदद… नहीं, नहीं, मैं कॉन्ट्रैक्ट के नियमों के खिलाफ नहीं जा रही हूँ। प्लीज, मैं मजबूर हो गई थी।”

    उसकी आवाज़ में घबराहट थी, शब्द जैसे घुल-मिल गए थे और हाथों की हल्की थरथराहट उसके भीतर की बेचैनी बयां कर रही थी। वह खुद को न्यायसंगत साबित करने की कोशिश में थी, लेकिन अंदर से वह झूठी भी लग रही थी।

    अद्वैत ने उसकी इस बेचैन आवाज़ और थरथराते हुए शरीर को देखकर हल्की सी मुस्कान दी, लेकिन फिर खुद ही छिपाने की कोशिश में जल्दी ही कहा, “ठीक है, ठीक है, मैं समझ गया। मैं थोड़ा फ्रेश होकर आता हूँ। तुम जो चाहो तो पढ़ सकती हो।” उसकी आवाज़ में एक नरमी थी, जो रूहानी के भीतर की उलझनों को कुछ कम कर रही थी।

    रूहानी को पूरी बात समझ नहीं आ रही थी, तभी अद्वैत ने अपने कमरे के बगल वाले कमरे की ओर इशारा किया और कहा, “यह मेरा लाइब्रेरी या कह लो स्टडी रूम है। तब तक यहीं रहो, मैं आता हूँ, फिर साथ में नीचे चलते हैं ताकि मीना को शक न हो।”

    उस पल रूहानी के चेहरे पर हल्का सा सुकून आया, मानो किसी ने उसकी बेचैनी को थोडा सा कम कर दिया हो।

    रूहानी ने धीरे से सिर हिलाया और अद्वैत के स्टडी रूम में प्रवेश कर गई। अद्वैत भी अपने कमरे में वापस चला गया। 

    रूहानी ने धीरे-धीरे कमरे में कदम रखा, उसके होंठ अपने आप में कतर रहे थे, जैसे किसी अनजानी बेचैनी को छुपाने की कोशिश कर रही हो। उसका मन इस जगह को लेकर थोड़ा असहज था…. यह अद्वैत की निजी दुनिया थी, एक ऐसी दुनिया जिसमें वह खुद को अनजान पा रही थी। 

    उसने चारों ओर देखा तो किताबों की कतारें थीं, लेकिन वे सब कुछ ऐसी किताबें थीं जिन्हें पढ़कर शायद ही कोई दिल बहलाए…. क्योंकि यहाँ सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि ज्ञान, शोध और शिल्प का संगम था। 

    हर शेल्फ पर इतिहास, दर्शन, विज्ञान और विभिन्न संस्कृतियों पर गंभीर ग्रंथ सजे थे, जिनके साथ लेखन कला की बारीकियों को सिखाने वाली मार्गदर्शिकाएँ और व्याकरण की किताबें भी थीं। 

    यह लाइब्रेरी किसी कथाकार के लिए विचारों का स्रोत और रचनात्मकता की प्रयोगशाला थी, जहाँ से अनगिनत कहानियों को जन्म मिलना था।

    वैसे तो रूहानी की रुचि कभी पढ़ाई में नहीं रही थी; वह हमेशा से जीवन के रंगीन, संवेदनशील पक्ष की ओर अधिक आकर्षित रही, न कि सूखे शब्दों की दुनिया की ओर।

    फिर उसकी नज़र एक किताब पर पड़ी…. पुरानी, धूल झड़ी हुई, जिसकी कवर झुर्रीदार थी। वह किताब कुछ अलग सी लग रही थी, शायद अद्वैत की वह ज़िन्दगी जिसे वह आम तौर पर छुपाता था। 

    उसने झिझकते हुए किताब निकाली और पन्ने पलटने लगी। ये कोई गंभीर या भारी किताब नहीं थी, बल्कि एक खूबसूरत कविता संग्रह था, जिसमें भावनाओं की गहराई और जीवन की नाजुकता के अनकहे रंग समाए थे। 

    रूहानी को एहसास हुआ कि अद्वैत के भीतर भी कोई छुपा हुआ कोमल पक्ष है, जो शायद उसने कभी सामने आने नहीं दिया।

    उसने पन्ने पलटते हुए एक फटा हुआ पन्ना देखा, जिस पर खूबसूरती से लिखा था — “यह किताब मेरे दिल के बहुत करीब है। उम्मीद है, तुम इसे संभालकर रखोगे – इशिता।” 

    “इशिता…” नाम रूहानी के होठों पर धीरे से बया हुआ, उसके भीतर अचानक से एक हलचल मच गई, उसके दिल की धड़कनें तेज हो गईं, जैसे किसी पुराने राज की परतें अब धीरे-धीरे खुल रही हों। उसने झट से किताब बंद कर दी, लेकिन वह छोटा सा संदेश उसके मन में सवालों के तूफान छोड़ गया।

    तभी पीछे से अद्वैत की आवाज़ आई। 

    ——

    क्या इशिता कौन है, और क्यों इस किताब में उसके दिल की बातें छुपी हैं? 

    क्या अद्वैत के भीतर छिपा वह कोमल पक्ष कहीं उनके रिश्ते की नींव बदलने वाला था? 

    जब रूहानी ने वो पन्ना छू लिया है… क्या वो सिर्फ एक पाठक रहेगी? या किसी पुराने सच की गवाह बनेगी?

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  • बेवफाई भाग 2

    बेवफाई भाग 2

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    बेवफाई

     

    Part 2

     

    छह महीने बाद, 

     

    अगले छह महीने रिया ने खुद को पूरी तरह काम में डुबो दिया। वह एक छोटे से डिजाइन स्टूडियो में काम करती थी। आरव से अलग होने के बाद उसने खुद को संभालना सीखा।

     

    पहले वह हर रात रोती थी। फिर रोना बंद हो गया। पहले उसे आरव की याद आती थी। फिर उसने खुद को याद करना शुरू किया। उसने अपने स्टूडियो को बड़ा किया।

     

    नई टीम बनाई। और छह महीने बाद… रिया का नाम मुंबई के युवा फैशन डिजाइनरों में गिना जाने लगा।

    वो रिया जिसे कुछ महीनों पहले तक कोई नहीं जानता था आज उसने अपना एक मुकाम हासिल कर लिया था। 

     

    एक दिन उसे एक बड़ा प्रोजेक्ट मिला। क्लाइंट का नाम देखकर वह कुछ सेकंड के लिए चुप रह गई।

     

    आरव मल्होत्रा। उसकी कंपनी। रिया ने फाइल बंद कर दी। “मैं ये प्रोजेक्ट नहीं करूंगी।”

     

    लेकिन कुछ ही देर बाद उसे क्लाइंट की शर्तों के बारे में पता चला।

     

    प्रोजेक्ट किसी और डिजाइनर को नहीं दिया जा सकता था। उसे ही करना था।

     

    रिया ने गहरी सांस ली। “ठीक है।”

     

    उसे क्या पता था कि यह मुलाकात उसकी जिंदगी का सबसे बड़ा सच सामने लाने वाली थी।

     

    —

     

    अगले दिन वह आरव के ऑफिस पहुंची। दरवाजा खोलते ही उसकी नजर आरव पर पड़ी।

     

    छह महीने में वह बदल चुका था।

     

    चेहरे पर पहले से ज्यादा थकान थी। आंखों के नीचे हल्के काले घेरे। लेकिन सबसे ज्यादा अजीब था…

    उसकी आंखों में दर्द। रिया ने फाइल टेबल पर रखी।

     

    “प्रोजेक्ट की सारी डिटेल्स मैंने देख ली हैं।”

     

    आरव उसे देखता रहा। “तुम ठीक हो?”

     

    रिया ने ठंडी आवाज में कहा, “ये सवाल अब तुम्हें पूछने का अधिकार नहीं है।”

     

    आरव चुप हो गया। दोनों के बीच कुछ सेकंड की खामोशी रही।

     

    फिर रिया ने कहा, “काम की बात करें?”

     

    आरव ने सिर हिलाया, “हां।”

     

    दोनों प्रोफेशनल हो गए, कम से कम बाहर से।

     

    लेकिन हर मुलाकात में कुछ अनकहा रह जाता।

     

    एक दिन अचानक आरव ने पूछा, “तुमने दोबारा शादी क्यों नहीं की?”

     

    रिया ने उसकी तरफ देखा। “तुमने की?”

     

    आरव चुप हो गया। रिया मुस्कुरा दी। “मुझे भी जवाब नहीं चाहिए।”

     

    वह वहां से जाने लगी। तभी आरव ने कहा, “रिया…”

     

    वह रुक गई। “मैंने तुम्हारे साथ बेवफाई नहीं की थी।”

     

    रिया के चेहरे पर कठोरता आ गई। “फिर मीरा कौन थी?”

     

    आरव ने आंखें बंद कर लीं। “वो मेरी बहन है।”

     

    रिया जैसे पत्थर की बन गई। “क्या?”

     

    आरव बोला, “मेरी छोटी बहन।”

     

    रिया कुछ बोल नहीं पाई। आरव ने टेबल की दराज खोली और एक पुराना लिफाफा निकाला।

     

    उसमें मेडिकल रिपोर्ट्स थीं। “मीरा को कैंसर था।”

     

    रिया के हाथ कांपने लगे। “क्या?”

     

    आरव, “डॉक्टर ने कहा था कि उसके पास ज्यादा वक्त नहीं है।” आरव की आवाज टूटने लगी।

     

    “मीरा मेरी वजह से नहीं… मेरी वजह से नहीं, बल्कि इसलिए मेरी जिंदगी में वापस आई थी क्योंकि उसकी आखिरी इच्छा थी कि मैं उसे अपनी जिंदगी में खुश देखूं।”

     

    रिया की आंखों से आंसू बह निकले।“तो तलाक?”

     

    आरव, “वो भी झूठ था।”

     

    “क्यों?”

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा। “क्योंकि मुझे लगा… अगर मैं तुम्हें अपने से दूर कर दूंगा, तो तुम सुरक्षित रहोगी।”

     

    रिया ने हैरानी से उसे देखा। “किससे?”

     

    आरव ने धीरे से कहा, “मेरे पिता से।”

     

    रिया कुछ समझ नहीं पाई।

     

    आरव ने बताया कि उसके पिता एक बड़े घोटाले में फंस चुके थे और उनके दुश्मन आरव के परिवार को नुकसान पहुंचाना चाहते थे।

     

    कुछ लोगों ने रिया को धमकी देना शुरू कर दिया था।

     

    आरव ने पुलिस को सब बताया था, लेकिन जब तक सबूत नहीं मिलते, वह उसे सुरक्षित रखना चाहता था।

     

    इसलिए उसने दुनिया के सामने मीरा के साथ रिश्ता होने का नाटक किया, क्योंकि किसी को नहीं पता था आरव की कोई छोटी बहन है। 

     

    और जिससे लोग समझें कि उसका और रिया का रिश्ता खत्म हो चुका है। “लेकिन तुमने मुझे सच क्यों नहीं बताया?”

     

    आरव की आंखों से आंसू निकल आए। “क्योंकि मुझे डर था कि अगर तुम्हें पता चल गया तो तुम मुझे छोड़कर नहीं जाओगी।”

     

    रिया ने धीमे से कहा, “और तुमने सोचा कि झूठ बोलकर मुझे बचा लोगे?”

     

    आरव ने सिर झुका लिया। “मैं गलत था।”

     

    रिया की आंखों में दर्द था। “हां… तुम गलत थे।”

     

    वह उसके करीब आई। और उसका कॉलर पकड़ते हुए टूटी आवाज में बोली, “तुमने मेरी जान तो बचा ली, आरव…”

     

    उसकी आवाज कांप गई। “लेकिन मेरे अंदर का भरोसा मार दिया।”

     

    आरव की आंखों से आंसू बहते रहे। “मैं जानता हूं।”

     

    “मैंने छह महीने तुम्हें नफरत किया।”

     

    “मैंने भी।”

     

    “मैं हर रात सोचती थी कि तुमने मुझे धोखा दिया।”

     

    “मैं हर रात तुम्हारी तस्वीर देखकर खुद को कोसता था।” आरव ने दर्द भरी आवाज में कहा। 

     

    दोनों चुप हो गए। कुछ रिश्तों में प्यार खत्म नहीं होता।

    बस दर्द इतना बढ़ जाता है कि प्यार दिखाई देना बंद हो जाता है।

     

    —

     

    कुछ दिनों बाद मीरा खुद रिया से मिलने आई। वह बहुत कमजोर थी। उसने रिया का हाथ पकड़ लिया। “भाभी…”

    रिया की आंखें भर आईं। “मुझे माफ कर दीजिए।”

     

    रिया ने सिर हिलाया। “तुम्हारी कोई गलती नहीं थी।”

     

    मीरा मुस्कुराई। “लेकिन एक गलती मेरी थी।”

     

    रिया, “क्या?”

     

    मीरा, “मैंने भाई से कहा था कि अगर वो आपसे सच बताएगा तो आप उसे कभी माफ नहीं करेंगी।”

     

    रिया हल्का-सा मुस्कुरा दी। “और अब?”

     

    मीरा ने कहा, “अब लगता है कि प्यार में सबसे बड़ी बेवफाई झूठ बोलना नहीं…”

     

    वह कुछ पल रुकी। “बल्कि सामने वाले को सच जानने का अधिकार न देना है।”

     

    रिया की आंखों से आंसू बह निकले। मीरा चली गई। रिया बहुत देर तक वहीं बैठी रही।

     

    —

     

    एक साल बाद। समुद्र के किनारे वही जगह जहां कभी आरव ने उसे प्रपोज किया था।

     

    आरव वहां खड़ा था। रिया धीरे-धीरे उसके पास आई।

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा। “तुम यहाँ आई।”

     

    रिया मुस्कुरा दी। “हां।”

     

    आरव, “क्या तुम मुझे माफ कर सकती हो?”

     

    रिया ने कुछ पल उसे देखा। “माफ कर दिया।”

     

    आरव की आंखों में उम्मीद जगी।

     

    “लेकिन…” रिया ने उसकी बात रोक दी। “भरोसा वापस आने में वक्त लगेगा।”

     

    आरव ने सिर हिलाया। “मैं इंतजार करूंगा।”

     

    रिया उसके पास आई। “और अगर फिर कभी मुझे बचाने के लिए मुझसे झूठ बोला…”

     

    आरव मुस्कुरा दिया। “तो?”

     

    “तो इस बार सच में तलाक ले लूंगी।”

     

    दोनों हंस पड़े। आरव ने धीरे से उसका हाथ पकड़ लिया। इस बार रिया ने अपना हाथ नहीं खींचा।

     

    समुद्र की लहरें उनके पैरों को छूकर लौट रही थीं।

     

    रिया ने आरव के कंधे पर सिर रख दिया। कभी-कभी रिश्तों में सबसे बड़ा सवाल यह नहीं होता कि किसने बेवफाई की।

     

    सवाल यह होता है कि, क्या उस बेवफाई के बाद भरोसा दोबारा जन्म ले सकता है? रिया और आरव के रिश्ते ने एक बात सीखी थी,

     

    प्यार हमेशा रिश्ते को नहीं बचाता।

    लेकिन सच्चाई, पछतावा और दोबारा भरोसा बनाने की कोशिश… कभी-कभी टूटे हुए रिश्ते को पहले से भी

    ज्यादा मजबूत बना देती है।

     

    और शायद…

     

    उनकी कहानी में बेवफाई किसी तीसरे इंसान की नहीं थी। बेवफाई उस झूठ की थी, जिसने दो सच्चे दिलों को छह महीनों तक एक-दूसरे से दूर रखा।

     

    समाप्त….

    आपका एक लाइक मेरे लिए बहुत कीमती है।

     

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    Neha Goyal

    मेरा नाम नेहा गोयल है। और पिछले दो वर्ष से मैं प्रतिलिपि पर कहानियां लिखती आ रही हूँ। मुझे लेखन करते हुए बहुत ही अच्छा लगता है। वैसे मुझे लिखने से पढ़ना ज्यादा पसंद है।

  • बेवफाई

    बेवफाई

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    बेवफाई

    Part 1

     

    “कुछ रिश्ते टूटते नहीं हैं… बस उनमें से भरोसा मर जाता है।

    और जब भरोसा मर जाए, तो प्यार कितना भी जिंदा हो… रिश्ता सांस नहीं ले पाता।”

     

    शाम के करीब सात बज रहे थे।

     

    मुंबई की सड़कों पर बारिश अपना पूरा जोर दिखा रही थी। आसमान काले बादलों से घिरा था और सड़क पर दौड़ती गाड़ियों की रोशनी पानी की बूंदों में घुलकर किसी धुंधली तस्वीर जैसी लग रही थी।

     

    रिया माथुर खिड़की के पास खड़ी लगातार घड़ी देख रही थी। उसने हल्के आसमानी रंग की बहुत सी सुंदर साड़ी पहनी हुई थी, चेहरे पर हल्का सा मेकअप, मांग में सिंदूर, गले में मंगलसूत्र। 

     

    आज उसके चेहरे पर महीनों बाद थोड़ी सी खुशी दिखाई दे रही थी।

     

    उसने कमरे को खुद सजाया था। टेबल पर मोमबत्तियां थीं। बीच में आरव का पसंदीदा चॉकलेट केक रखा था, जो उसने खुद अपने हाथों से बनाया था और उसके पास रखा था… एक छोटा-सा गिफ्ट बॉक्स।

     

    रिया ने अपने हाथ में पकड़े फोन की स्क्रीन देखी।

     

    “आरव ❤️” उसने फिर मैसेज किया।

     

    “कितनी देर और? आज जल्दी आना… तुम्हारे लिए एक सरप्राइज है।”

     

    मैसेज भेजने के बाद उसके चेहरे पर हल्की मुस्कान आ गई। आज उनकी शादी की तीसरी सालगिरह थी।

     

    तीन साल पहले इसी दिन आरव ने उसका हाथ पकड़कर सात फेरे लिए थे और कहा था, “रिया, जिंदगी चाहे जितनी मुश्किल हो जाए, मैं तुम्हारा हाथ कभी नहीं छोड़ूंगा।”

     

    रिया ने उस दिन उस एक वादे पर अपनी पूरी जिंदगी रख दी थी। और आज…

    वह उसी वादे का जश्न मनाने के लिए उसका इंतजार कर रही थी।

     

    रात के करीब आठ बजे दरवाजे की घंटी बजी।

     

    रिया की आंखें चमक उठीं। “आरव!” उसने धीरे से नाम लिया, और आंखों में चमक लिए, वह दौड़कर दरवाजे तक पहुंची।

     

    लेकिन दरवाजे के बाहर आरव नहीं था। कूरियर वाला खड़ा था। उसे देखकर रिया के चेहरे की चमक पलभर में गायब हो गई। 

     

    “मैडम, आपके नाम का पार्सल।” कुरियर वाले ने एक पैकेट रिया की तरफ बढ़ाते हुए कहा।

    पहले तो रिया को थोड़ी हैरानी हुई, लेकिन फिर उसने पैकेट ले लिया। 

     

    “थैंक यू।” कहकर उसने एक पर्चे में साइन किया और फिर दरवाजा बंद करके अंदर आ गई। 

    वो पैकेट अभी भी उसके हाथ में था।

     

    पहले उसने सोचा आरव को फोन करने के बाद वो पैकेट खोलेगी, लेकिन फिर जाने क्या सोचकर उसने फोन टेबल पर रखना और पैकेट खोलने लगी। 

     

    अंदर एक फाइल थी। रिया ने हैरानी से फाइल खोली।

     

    पहले पन्ने पर लिखा था, “तलाक का समझौता।”

     

    जैसे ही उसने वो शब्द पढ़े, उसकी सांस जैसे वहीं रुक गई। “नहीं…” उसके हाथ कांपने लगे। “ये… ये क्या है?”

     

    फाइल के अंदर आरव के हस्ताक्षर किए हुए कागजात रखे थे। तलाक के कागजात।

     

    रिया ने तुरंत आरव को फोन किया।

     

    एक बार… दो बार… पांच बार… लेकिन सामने से कोई जवाब नहीं।

     

    फिर फोन बंद हो गया। रिया फर्श पर बैठ गई, उसकी दुनिया मानो पलभर में पूरी तरह से उजड़ गई। आंखों के सामने तीन साल की पूरी जिंदगी घूम गई।

     

    पहली मुलाकात। पहली लड़ाई। पहली बारिश।

     

    पहली सालगिरह। आरव का उसे देखकर मुस्कुराना।

     

    और वह रात… जब आरव ने उसके माथे को चूमकर कहा था, “तुम मेरी जिंदगी की सबसे खूबसूरत गलती नहीं, सबसे सही पसंद हो।”

     

    रिया की आंखों से आंसू बह निकले। तभी उसके फोन पर एक नोटिफिकेशन आया।

     

    एक फोटो। रिया की उंगलियां ठिठक गईं। फोटो में आरव था। और उसके साथ एक लड़की। दोनों एक-दूसरे के बेहद करीब खड़े थे। लड़की के चेहरे पर मुस्कान थी। और आरव… उसे उसी तरह देख रहा था, जैसे कभी वह रिया को देखा करता था।

     

    फोटो के नीचे लिखा था, 

    “Finally… together. ❤️”

     

    रिया की आंखें फैल गईं। उसने फोटो को बार-बार देखा। फिर लड़की का चेहरा पहचानते ही उसके पैरों तले जमीन खिसक गई।

     

    मीरा। आरव की ऑफिस पार्टनर।

     

    वही मीरा जिसे लेकर रिया ने कई बार मजाक में कहा था, “तुम दोनों साथ में बहुत अच्छे लगते हो।”

     

    और आरव हर बार हंसकर कहता था, “रिया तुम पागल हो क्या? मेरे लिए सिर्फ तुम हो, मुझे किसी और की जरूरत नहीं है।”

     

    रिया ने उस वक्त उस पर भरोसा किया था। जब कभी आरव उसके साथ बिजनेस ट्रिप पर जाता, लेकिन रिया ने कभी उसपर रत्ती भर शक नहीं किया। 

    लेकिन, आज वही भरोसा उसके सामने टूटकर बिखर चुका था।

     

    —

     

    अगली सुबह रिया सीधे आरव के ऑफिस पहुंची।

     

    रिसेप्शन पर पहुंचते ही उसने पूछा, “आरव कहां है?”

     

    रिसेप्शनिस्ट ने उसे देखकर नजरें झुका लीं। “मैम… सर मीटिंग में हैं।”

     

    “मीटिंग?” रिया हंस पड़ी। वह हंसी जिसमें दर्द था। “उन्हें बुलाइए, कहिए कि मैं मिलना चाहती हूँ।”

     

     

    कुछ मिनट बाद आरव बाहर आया। काली शर्ट, चेहरे पर वही गंभीरता और आंखों में ऐसी ठंडक जैसे रिया उसके लिए कोई अजनबी हो।

     

    रिया उसे देखकर कुछ पल तक बस खड़ी रही। फिर बोली, “तुमने मुझे तलाक के पेपर भेजे?”

     

    आरव चुप रहा। 

     

    “मुझसे एक बार पूछना भी जरूरी नहीं समझा?” रिया ने उसकी आंखों में देखते हुए पूछा। 

     

    आरव ने कठोर शब्दों में कहा, “अब पूछने को बचा ही क्या है?”

     

    रिया का दिल टूट गया। “मतलब?”

     

    आरव ने नजरें फेर लीं। “मैं इस रिश्ते में नहीं रहना चाहता।”

     

    रिया टूटी आवाज में, “क्यों?”

     

    आरव, “बस नहीं रहना चाहता।”

     

    “झूठ!” रिया चीख पड़ी। “तुम मुझसे प्यार करते थे!”

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा। “था।”

     

    बस एक शब्द। था। रिया को लगा जैसे किसी ने उसके सीने के बीचोंबीच वार कर दिया हो।

     

    “तो मीरा की वजह से?” आरव ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    रिया की आंखों में आंसू भर आए। “तीन साल का रिश्ता… और तुमने इसे इतनी आसानी से खत्म कर दिया?”

     

    “आसानी से?” आरव की आवाज पहली बार थोड़ी भारी हुई। “तुम्हें लगता है मेरे लिए आसान था?”

     

    “तो फिर मुझे छोड़ क्यों रहे हो?” आरव कुछ कहने ही वाला था कि पीछे से मीरा की आवाज आई, “आरव…”

     

    रिया ने मुड़कर देखा। मीरा वहां खड़ी थी। उसके चेहरे पर हल्की मुस्कान थी। वह सीधे आरव के पास आकर खड़ी हो गई। रिया ने दोनों को देखा।

     

    फिर अपनी आंखों से आंसू पोंछते हुए बोली, “शायद मेरी जगह अब यहां नहीं है।”

     

    वह मुड़ी। लेकिन जाते-जाते उसने आरव की तरफ देखा। “एक बात याद रखना…”

     

    आरव की

    आंखें उससे मिलीं। “जिस इंसान ने तुम्हें सबसे ज्यादा प्यार किया था, उसे तुमने आज खुद से दूर कर दिया है।”

     

    और वह चली गई।

     

    —

    To be continued..

    क्या सच में बिखर कर रह जाएगा आरव और रिया का रिश्ता। या कहानी आगे कुछ नया मोड लेगी जानने के लिए अगला भाग जरूर पढ़े। 

    और कहानी को आपका एक कीमती लाइक जरूर दें

     

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    Neha Goyal

    मेरा नाम नेहा गोयल है। और पिछले दो वर्ष से मैं प्रतिलिपि पर कहानियां लिखती आ रही हूँ। मुझे लेखन करते हुए बहुत ही अच्छा लगता है। वैसे मुझे लिखने से पढ़ना ज्यादा पसंद है।

  • अधूरी इबादत भाग~30

    अधूरी इबादत भाग~30

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    भाग~30 अद्वैत गया कहाँ? 

     

    अद्वैत की ज़िंदगी में एक नया अध्याय शुरू होने को था, जैसे किसी शांत सागर की सतह पर अचानक हल्की सी लहरें उठने लगें। 

    उसी शाम, जब घर में एक अजीब सी बेचैनी थी और मन कई सवालों के बीच उलझा हुआ था, उसी वक्त उसके मोबाइल की घंटी ने कमरे की सन्नाटे को तोड़ दिया। 

    अद्वैत ने फोन उठाया तो एक अनजानी लेकिन आत्मविश्वास से भरी आवाज़ ने उसे चौका दिया… “नमस्ते, मैं नेहा बोल रही हूँ, शब्दांजलि पब्लिकेशन की मैनेजर। उम्मीद है आप मेरी बात से अचानक परेशान नहीं होंगे?” 

    अद्वैत ने हौले से मुस्कुरा कर जवाब दिया, “नहीं, बिल्कुल नहीं… कहिए।” 

    मन ही मन उसका दिल धड़कने लगा था, जैसे किसी भूले-बिसरे ख़्वाब की दस्तक मिल रही हो।

    नेहा की आवाज़ में उत्साह था, “हमने आपकी किताब ‘यादों से परे’ पढ़ी है… और यकीन मानिए, जितनी बार पढ़ी, उतनी बार महसूस किया कि हम किसी कहानी को नहीं, किसी की अधूरी साँसों को पढ़ रहे हैं। इसी गहराई के चलते हम आपको और आपकी पत्नी को हमारे सालाना साहित्यिक समारोह में आमंत्रित करना चाहते हैं, जहाँ आपकी मौजूदगी से यह आयोजन और भी खास बन जाएगा।”

    पत्नी शब्द सुनते ही अद्वैत के भीतर कुछ धीमे से दरक गया, जैसे कोई पुराना ज़ख्म फिर से सांस लेने लगा हो। लेकिन उसने खुद को संभालते हुए पूछा, “कब और कहाँ?”

    “अगले रविवार, दोपहर तीन बजे। जगह – साहित्य भवन ऑडिटोरियम, कोरेगांव पार्क, पुणे। हमें उम्मीद है कि आप दोनों ज़रूर आएँगे।”

    अद्वैत ने सिर झुकाकर कहा, “हम कोशिश करेंगे, मेल कर दीजिएगा।”

    थोड़ी देर ठहराव के बाद उसने सवाल किया, “वैसे, आपको मेरे मैनेजर से बात करनी चाहिए थी, जो मेरे सारे काम देखते हैं।”

    नेहा ने हँसते हुए जवाब दिया, “हमने ही तो आपके मैनेजर से आपका नंबर लिया है, पर हमें लगा कि आपको खुद ही व्यक्तिगत रूप से आमंत्रित करना बेहतर रहेगा। इसीलिए मैंने सीधे आपसे ही बात की।”

    फोन रखते ही वो कुछ पलों तक सन्न खड़ा रहा। कमरे की हल्की रोशनी में अद्वैत का चेहरा आधे उजाले और आधी छाया में ढला हुआ था, जैसे उसके भीतर उठते भाव भी दो ध्रुवों पर झूल रहे हों… स्पष्टता और संशय के। 

    खिड़की से आती हवा परदों को हौले से हिलाती, जैसे वे भी उसकी उलझनों की फुसफुसाहट दोहरा रहे हों। बाहर का शांत आसमान उसके भीतर के शोर से बिल्कुल विपरीत था।

    टेबल पर फैले दस्तावेज़ अब भी वहीं थे, लैपटॉप की नीली रौशनी उसके चेहरे को टुकड़ों में रोशन कर रही थी, और कोने में पड़ी चाय की कप… जो अब ठंडी हो चुकी थी… जैसे उसके भीतर की उलझनों की प्रतीक बन गई हो।

    उसके अंदर एक खामोश उथल-पुथल चल रही थी — “कैसे कहूँ रूहानी से? क्या वो तैयार होगी? क्या उसे बुरा तो नहीं लगेगा?” 

    वह जानता था कि यह शादी सिर्फ एक समझौता थी, एक काग़ज़ी डोर जिसने दोनों को किसी ज़रूरत की वजह से बाँध रखा था। लेकिन अब हालात कुछ और माँग रहे थे।

    वो जानता था, यह न्योता किसी आम किताब के लेखक को नहीं मिला था… ये एक लेखक को मिला था जो अपने पाठकों की आत्मा को छू चुका था और उसी लेखक के साथ उसकी “पत्नी” को भी आमंत्रित किया गया था… जो असल में उसकी जिंदगी का एक किरदार थी, एक सहयात्री, लेकिन अभी भी एक अनकहा सवाल।

    अद्वैत के मन में विचारों की परतें खुलने लगीं “कहीं ये सब उसे बोझ तो नहीं लगेगा? पर अगर मैं उसे नहीं ले गया तो… ये मौका ही अधूरा रह जाएगा और इस समझौते की पहली शर्त ही तो यही थी कि बाहर की दुनिया के सामने हम एक साथ दिखेंगे… एक पति-पत्नी की तरह।”

    पर अब सवाल काग़ज़ों का नहीं था… सवाल उस मौन का था, जो उनके बीच धीरे-धीरे बोलने लगा था।

    और उस एक क्षण में, जब हवा ने परदे को हौले से छुआ… अद्वैत को लगा, शायद उसे रूहानी से ये बात कहनी ही होगी… चाहे जैसे भी।

    °°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°

    धूप धीमे-धीमे ढल रही थी और आसमान हल्के नारंगी रंग में रंग चुका था, जैसे कोई उम्मीद फिर से उग आई हो। रूहानी, मीना के साथ, वेस्‍ट धनोरी की ओर जा रही थी…. एक ऐसा इलाका जो उसके लिए अब तक सिर्फ नक्शे की रेखा भर था, लेकिन आज वह वहाँ अपने सपनों की नींव रखने चली थी। 

    कैब की खिड़की से बाहर झाँकते हुए उसके चेहरे पर हल्की चिंता थी, लेकिन आँखों में चमक थी…. वो चमक जो तब आती है जब किसी टूटी चीज़ को फिर से जोड़ने की जिद भीतर सांस ले रही हो।

    रास्ते भर वो खामोश नहीं रही। उसने मीना की तरफ देख कर कहा, “मीना, तुम्हें याद है तुमने आज सुबह मुझसे पूछा था कि मैं आसपास में कुछ ढूँढ रही हूँ क्या? तब मैं नहीं बता पाई… अब बताती हूँ… मैं अपना खुद का ड्रेस डिज़ाइनिंग स्टूडियो खोलना चाहती हूँ। वही सपना जिसे मैंने किसी वजह से कहीं गुम कर दिया था, शायद अब वक्त आ गया है कि उसे फिर से जिया जाए।”

    मीना चौंक गई, “सच में, मैडम? आप… खुद का बुटीक?”

    रूहानी की आँखों में एक हल्की सी मुस्कान उभर आई, जो उम्मीद और जज़्बातों के बीच झलक रही थी। उसने धीमे से कहा, “हाँ मीना, मैंने बहुत सोच-समझ कर ये फैसला लिया है। अब वक्त आ गया है कि मैं अपनी पहचान खुद बनाऊं, अपनी कला को अपनी मर्जी से उड़ान दूं। ये सिर्फ एक दुकान नहीं, मेरे सपनों का घर होगा, जहाँ मैं अपने दिल की हर कहानी कपड़ों में बुन सकूँ।” 

    वो सोच रही थी—कितनी बार खुद को नज़रअंदाज़ किया, दूसरों के लिए। पहले पिता की उम्मीदें, फिर समाज के ताने और फिर एक ऐसा रिश्ता, जो नाम तो पाता रहा लेकिन रंग कभी न चढ़ा। 

    जैसे ही वो धनोरी पहुँची, मीना ने उसे एक दुकान दिखाई। पुराने ज़माने की मिठाई की दुकान, जो अब लगभग बंद सी पड़ी थी। लेकिन उसकी जगह में वो ताजगी और खुलापन था, जिसे देखकर रूहानी की आँखें चमक उठीं।

    “यही है जगह,” मीना ने कहा।

    रूहानी उतरी, चारों ओर देखा…. दायीं ओर सब्ज़ी मंडी थी, बायीं तरफ़ एक पार्क। दुकान की छत पर पुराना सा बोर्ड अब भी झूल रहा था। पर उसकी कल्पना में, वहाँ रैक थे, फैब्रिक्स थे, स्केचिंग टेबल थी, दीवारों पर डिजाइन के फ्रेम थे और खिड़कियों से झांकती धूप थी।

    वो बोली, “मुझे यही चाहिए।”

    मीना ने तुरंत ज़मीन मालिक को कॉल किया। थोड़ी देर में ही एक बुजुर्ग आदमी सामने आया। बातों का सिलसिला चला…. किराया, शर्तें, दस्तावेज़ और तभी रूहानी ने कहा, “नहीं, मैं इसे खरीदना चाहती हूँ, किराए पर नहीं।”

    बुजुर्ग मालिक चौंक गए। उन्होंने सोचा कि एक युवा महिला, वो भी अकेली, इतनी जल्दी फैसला कैसे ले सकती है। लेकिन रूहानी की आँखों में जो संकल्प था, उसने किसी भी तर्क को पीछे छोड़ दिया। थोड़ी बहस के बाद, अगली सुबह के लिए मीटिंग तय हो गई।

    मीना ने कहा, “मैडम, आप तो बिलकुल जैसे फिल्म की हीरोइन लग रही हो….. एकदम ठान लेती हो, और फिर कर दिखाती हो।”

    रूहानी मुस्कुराई, लेकिन अंदर ही अंदर उसकी आत्मा कांप रही थी। कितनी हिम्मत जुटाई थी इस एक कदम के लिए। 

    लौटते वक़्त, वो मीना को सब्ज़ी मंडी ले गई। हल्के भाव से बोली, “चलो कुछ ऐसा खरीदते हैं, जो शाम को पकाकर लगे कि सच में ज़िंदगी में कुछ नया हुआ है।”

    घर लौटते वक़्त, गाड़ी की खिड़की से बाहर दिख रहा शाम का झुटपुटा…. ठीक वैसा ही था जैसा उसके दिल में था। अंधेरे और रौशनी के बीच झूलता हुआ, जैसे कोई नया अध्याय शुरू होने को हो… लेकिन पन्ने अभी खुले नहीं थे।

    उसने खामोशी से अपने हाथ की मुट्ठी कस ली, जैसे खुद को यकीन दिला रही हो—“अब पीछे नहीं हटूंगी।”

    अगली सुबह उसे तय करनी थी ज़मीन की डील… और शायद अपनी तक़दीर की भी।

    °°°°°°°°°°°°°°°°°

    जब मीना और रूहानी घर पहुँचीं, तो सामने एक नजारा था जिसने दोनों के दिल की धड़कनें रोक दीं। मीना की मासूम बेटी, गुनगुन, और छोटा भाई चीकू, जो अक्सर शरारती तो थे लेकिन कभी बुरी नियत के नहीं। 

    वे दोनों डरे हुए, खामोश और एक अजीब सी बेचैनी लिए खड़े थे। रूहानी की नज़रें सीधे उस कोने की ओर गईं जहाँ अद्वैत बैठा हुआ था, लेकिन वहाँ कोई था ही नहीं।

    दरवाज़ा खुलते ही मीना के चेहरे पर चिंता के बादल घिर आए। “ये क्या हुआ? तुम दोनों ऐसे क्यों खड़े हो?”

    —————

    अद्वैत के कमरे में उठी बेचैनी के बीच, क्या वह सच में रूहानी को इस न्योते की खबर देगा? 

    क्या उनकी अधूरी ज़िंदगी की डोर इस बार मजबूत होगी, या फिर टूट जाएगी? 

    उस खाली कोने में अद्वैत के न होने का रहस्य क्या छुपा था?

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  • अधूरी इबादत भाग~29

    अधूरी इबादत भाग~29

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    भाग~29 मुस्कुराते जख्म

     

    मीना का अचानक अपने दोनों बच्चों के साथ घर आ जाना अद्वैत और रूहानी के लिए किसी अनचाही दस्तक की तरह था। दोनों ही उस क्षण के लिए तैयार नहीं थे और उससे भी ज़्यादा चौंकाने वाला था उसका बेझिझक सवाल, “सर, आप अपनी ही पत्नी को उधार पर पैसे दे रहे हो?” 

    उस एक वाक्य ने जैसे रूहानी की रगों में ठंडा लावा भर दिया। उसकी साँस अटक गई, दिल धड़कने के बजाय थम सा गया और पल भर के लिए उसकी सोचने-समझने की ताकत जैसे वहीं कहीं गुम हो गई।

    वो पल, जब उसका दिल और दिमाग एक-दूसरे से सवाल करने लगे….. अगर अब सच सामने आ गया तो? अगर मीना ने बात आगे बढ़ा दी तो? क्या उसका करियर जो अभी दोबारा सांस लेना शुरू ही कर रहा है, फिर से खत्म हो जाएगा? क्या वो फिर वहीं लौट जाएगी जहां से वो आई थी… अकेलेपन, असुरक्षा और असफलता के अंधेरे में?

    रूहानी की आँखें अद्वैत की तरफ उठीं, जिसमें डर, उलझन और एक खामोश मदद की गुहार थी। अद्वैत ने उसकी ओर देखा और जैसे ही मीना के सवाल की गंभीरता को उसने समझा, उसके होंठों पर एक हल्की मुस्कान उभरी। वो मुस्कान जिसमें नाटक था, समझदारी थी और समय की नजाकत को पकड़ लेने की कला भी।

    “अरे मीना,” अद्वैत ने एकदम सहजता से कहा, “ये तो मेरी नई कहानी की स्क्रिप्ट थी। रूहानी को बस वही पढ़ने दी थी, उसका फीडबैक लेना था।”

    उसके कहते ही जैसे रूहानी को भी अपनी आवाज़ वापस मिल गई। वो तुरंत बात को पकड़ते हुए मुस्कुरा कर बोली, “हाँ, अद्वैत ने इतना अच्छा लिखा है कि तुम भी कन्फ्यूज़ हो गई।”

    उन दोनों के बीच एक नजरों की मुस्कराहट का आदान-प्रदान हुआ, मानो उस छोटे से झूठ ने एक बड़ा तूफान टाल दिया हो। अद्वैत ने बिना कुछ कहे ही सारे दस्तावेज़ समेट लिए…. पर उस कमरे में कुछ था जो अब भी अधूरा था… एक अनकहा सच, जो बस एक और सवाल की दूरी पर था।

    मीना ने जैसे ही ‘हाँ’ में सिर हिलाया, माहौल में एक हल्की सी सहजता लौटती दिखाई दी। वो मुस्कुराते हुए सोफे के पास आई और रूहानी के पास बैठते हुए बोली, “यही मेरी बेटी है, इसी का जन्मदिन आने वाला है, जिसके लिए मुझे कपड़े बनवाने थे।”

    रूहानी ने अपनी आंखें धीरे से उस बच्ची की ओर घुमाईं। लगभग दस-ग्यारह साल की मासूम सी बच्ची, जिसकी बड़ी-बड़ी आँखों में जिज्ञासा और सादगी का उजाला था। उसके पास खड़ा उसका छोटा भाई, करीब छह-सात साल का, अपनी बहन की उंगलियों में उंगलियाँ फंसाए, थोड़ा सकुचाया हुआ लेकिन उतना ही प्यारा।

    रूहानी को अपनी ओर यूँ देखते पाकर दोनों बच्चों ने एक साथ हाथ जोड़कर कहा, “नमस्ते।” उनके भोलेपन से उसका दिल भी एक पल को हल्का हो गया। उसने उन्हें अपने पास बुलाया और बड़े प्यार से पूछा, “क्या नाम है तुम दोनों का?”

    बच्ची ने मुस्कुरा कर कहा, “मेरा नाम गुनगुन है।” लड़के ने झेंपते हुए जवाब दिया, “मेरा नाम चीकू है।”

    रूहानी ने हल्के अंदाज़ में ताली बजाते हुए कहा, “अरे, कितने प्यारे नाम हैं तुम दोनों के! बिलकुल तुम लोगों जैसे ही खुशबूदार और मीठे।”

    तभी रूहानी से थोड़ी दूरी पर बैठा अद्वैत, जो यह दृश्य चुपचाप देख रहा था, मीना की ओर देखते हुए मुस्कुरा कर बोला, “पहले बच्चों के लिए कुछ स्नैक्स तो ले आओ, मीना।”

    अद्वैत की आवाज़ में अपनापन और ज़िम्मेदारी का मेल था, जिसने मीना को जैसे नींद से जगाया। वो तुरंत हड़बड़ाते हुए बोली, “जी सर, अभी लाती हूँ।” और जल्दी से किचन की ओर बढ़ गई।

    उस एक नज़र में रूहानी की आंखों में जो नूर था, वो किसी अनकहे एहसास का आईना था… शायद अधूरी ममता की वो आवाज़, जो दिल के किसी कोने में गूँज रही थी, या फिर कोई ऐसा जज़्बा जो अभी लबों तक आना चाहता था, मगर शब्दों की ज़ंजीरों में जकड़ा हुआ था।

    जब दोनों बच्चे खुशी-खुशी स्नैक्स में मगन हो गए, तो मीना ने थोड़ी झिझक के साथ रूहानी की ओर देखा और बोली, “मेरे पास उस ड्रेस का कोई फोटो तो नहीं है, मैडम… लेकिन मैं आपको बता सकती हूं कि वो कैसी दिखती थी।”

    रूहानी ने मुस्कुराकर कहा, “ठीक है, तुम बताओ, मैं उसका स्केच बना लेती हूं।”

    मीना की आंखें चमक उठीं और वो अपने शब्दों से एक तस्वीर गढ़ने लगी, “मैडम, वो एक लाल रंग का बड़ा सा फ्रॉक था… छम-छम करता हुआ, जैसे शाम के वक्त ढलते सूरज की रोशनी में आसमान रंगीन हो जाता है। उस पर छोटी-छोटी सुनहरी कलियाँ थीं, जो बिल्कुल अमावस की रात में टिमटिमाते तारों जैसे लगती थीं। और उसकी चुनरी… वो अलग से नहीं थी, कंधे से जड़ी थी, बहुत हल्की… जैसे कोई धुंधली बदली हो, लेकिन मोतियों के तारों से सजी हुई।”

    मीना के शब्दों से जैसे रंग झरने लगे और रूहानी का हाथ खुद-ब-खुद चलने लगा। वह बड़ी तल्लीनता से स्केच बना रही थी। उसकी उंगलियाँ कागज़ पर नर्म लकीरें खींच रही थीं और उसकी आंखें उस कल्पना को सच में ढाल रही थीं।

    उस पल अद्वैत चुपचाप बैठा, सिर्फ रूहानी को ही देख रहा था। उसके चेहरे की एक-एक रेखा, उसके हिलते होंठ, उसके पलकें झपकाने का अंदाज़… सब कुछ उसे असामान्य रूप से आकर्षित कर रहा था। वो उस पल की मासूमियत और रूहानी की गंभीरता में कहीं गुम होता जा रहा था। लेकिन रूहानी को इस टकटकी का कोई आभास नहीं था।

    जब स्केच पूरा हुआ, तो रूहानी ने गुनगुन को पास बुलाया और उसका नाप भी बड़े प्यार से लिया। अद्वैत बस बैठा रहा, जैसे वो उस दृश्य का हिस्सा नहीं, बल्कि कोई दर्शक हो… मगर उसके भीतर कुछ था, जो धीरे-धीरे खिंचता चला जा रहा था…. अदृश्य डोर सा।

    इस सबके बाद रूहानी ने मीना के साथ किचन में जाकर धीरे से पूछा, “मैंने तुमसे सुबह पूछा था, यहाँ आसपास कहीं कोई जगह या दुकान मिलेगी खाली? तुम्हें पता चला क्या?” उसकी आवाज़ में एक उम्मीद थी, जो कहीं दबे हुए बोझ से निकल रही थी।

    मीना ने सिर हिलाते हुए कहा, “हाँ, एक जगह तो है, लेकिन यहाँ से 10-15 मिनट की दूरी पर।” रूहानी की आंखों में एक हल्की सी चमक आई, मानो एक दरवाजा खुलने वाला हो। 

    उसने तुरंत कहा, “क्या तुम अभी चल सकती हो? तुम्हारे बच्चे यहाँ रहेंगे, अद्वैत के पास।”

    मीना ने थोड़ा हिचकते हुए हामी भरी और कुछ कहने लगी, तभी रूहानी बिना किसी देरी के अद्वैत के पास गई और बोली, “हमें थोड़ी देर के लिए बाहर जाना है, तुम जब तक बच्चों को देख लेना।” 

    अद्वैत पहले तो अचानक चौंक गया, उसकी सांसों में अचानक रुकावट सी आई, फिर उसने धीरे से सिर हिलाया, जैसे उसने मान लिया हो कि ये जरूरी है।

    मीना बार-बार पूछती रही, “सच में आपको कोई दिक्कत नहीं होगी, सर?” और रूहानी ने उसका हाथ पकड़ते हुए हल्का सा खींचा, दोनों बच्चों की ओर देखते हुए कहा, “हम दोनों बस आधे घंटे में आ जाएंगे, तब तक अद्वैत अंकल के साथ मस्ती करना।” मीना ने राहत भरी सांस ली और दोनों बहार निकल गईं।

    दरवाजा बंद होते ही, अद्वैत की आँखों में एक अनकही बेचैनी और सवालों की गूंज थी, जो हवा में तैर रही थी। उसके दिल की धड़कन तेज़ हो गई थी, जैसे कोई अनजाना तूफ़ान उसके अंदर उठ रहा हो। वह उन क्षणों को समझने की कोशिश था। 

    “क्या ये सच में इतना कठिन है?” अद्वैत खुद से कहता हुआ, अपने दिल की गहराई में कहीं एक तूफान उठने लगा था। बाहर की ठंडी हवा की तरह, जो आंधी में बदलने को हो, जैसे किसी बड़े बदलाव की आहट हो।

    और तभी, अद्वैत के मोबाइल की घंटी ने कमरे की चुप्पी को तोड़ा…. एक अनजान नंबर से कॉल आ रही थी, जिससे उनकी ज़िंदगियाँ एक नई मुड़ाव लेने वाली थीं…

    ————

    क्या रूहानी और अद्वैत के बीच जो मुस्कुराहट थी, वह सच में एक झूठ छुपा रही थी? 

    वह अनजान नंबर… क्या वह कॉल उनके अब तक छुपे हुए अतीत की कोई भूली हुई कहानी वापस लेकर आने वाली थी?

    किस्मत के इस नए मोड़ पर, क्या वे तैयार थे सच का सामना करने के लिए?

     

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  • अधूरी इबादत भाग~28

    अधूरी इबादत भाग~28

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    भाग~28 तुम-मैं… और बीच की दीवार 

     

    रूहानी ने जैसे ही अद्वैत की आवाज़ सुनी, वैसे ही उसका बेकाबू रोना एकदम से थम गया, मानो उस आवाज़ ने उसके भीतर चल रही हर गूंज को पलभर में बाँध दिया हो।

    उसने पलकों के पीछे ठहरे आँसुओं को सँभालते हुए, धीरे-धीरे अपनी हथेलियाँ चेहरे से हटा ली। आँखें अब भी लाल थीं, लेकिन उन आँखों में कुछ पल पहले की बेबसी की जगह अब एक चुप्पी थी…. भारी, गूढ़ और बेहद निजी।

    सामने अद्वैत खड़ा था, उसके बिखरे बालों में, चेहरे पर बेचैनी थी और तेज़ साँसों में चिंता की महक। रूहानी को उम्मीद नहीं थी कि वह इस वक़्त घर पर होगा। 

    उसका मन पहले ही हज़ार उलझनों से भरा था, और अद्वैत का इस तरह अचानक सामने होना जैसे उसके भीतर एक और तह खोल गया।

    रूहानी ने अपने आँसू जल्दबाज़ी में पोंछे, और कुछ कहने की कोशिश में खुद को संयत किया। वो जानती थी कि उसके चेहरे पर जो गुज़रा है, उसे शब्दों में नहीं बाँधा जा सकता और न ही वो बाँधना चाहती थी। 

    उसने बस हवा में कुछ हलकापन घोलने की कोशिश की। अद्वैत की आँखों में अब भी सवाल थे, लेकिन वो सवाल रूहानी ने जैसे हवा में भंग कर दिए।

    “आज तुम घर पर?” उसके स्वर में हैरानी थी, मगर आवाज़ में झूठी सादगी की परत भी थी।

    फिर थोड़ी कोशिश से मुस्कराते हुए बोली, “अरे वाह… Mr. Writer के पास फुर्सत का भी कोई कोना होता है क्या?”

    उसने जान-बूझकर अपनी थकी हुई आत्मा को एक मुस्कान ओढ़ा दी थी… एक ऐसी मुस्कान जो अद्वैत की बेचैनी को ढकने के लिए नहीं, बल्कि अपनी खुद की बिखरी हुई चुप्पियों को बचाने के लिए थी।

    अद्वैत रूहानी के अजीब बर्ताव पर अपनी भौंहें तिरछी करता है, उसका चेहरा उलझन में डूबा हुआ था। 

    हल्के स्वर में मगर साफ चिंता के साथ वह बोला, “तुम ठीक तो हो ना?”

    रूहानी ने बिना उसकी आंखों में देखे, जल्दबाज़ी में खुद को संभालते हुए जवाब दिया, “हां, बिल्कुल ठीक हूं मैं।”

    फिर, एक अलग ही दिशा में बातचीत मोड़ते हुए उसने पूछा, “तुमने खाना खाया?”

    अद्वैत ने बिना शब्दों के केवल सिर हिला दिया, ‘ना’ में।

    “मैं चेंज करके आती हूं,” रूहानी ने कहा, उसकी आवाज़ में अब थोड़ी कृत्रिम चंचलता थी। “दोपहर हो गई है… तब खाना खा लेते हैं, मुझे ज़ोरों की भूख लग रही है।”

    इतना कहते हुए वो तेजी से अपने कमरे की ओर बढ़ गई। उसके पाँव भारी थे, मगर चाल में हल्की जल्दी थी—जैसे वो उस क्षण से दूर भागना चाहती हो।

    जब रूहानी कमरे में चली गई, अद्वैत वहीं दरवाज़े के पास खड़ा रह गया। उसका दिल अब भी धड़क रहा था, लेकिन धड़कनों के पीछे कुछ और भी था… एक बेचैन सोच, एक अनकही पीड़ा।

    उसके मन में सवालों की बारिश होने लगी थी… “वो क्यों रो रही थी?” 

    “क्या हुआ उसे बाहर?” 

    “उसने बात क्यों बदल दी इतनी जल्दी?”

    उसकी मुट्ठियाँ अपने आप भींच गई थीं, और होंठ एक रेखा में सिमट गए थे।

    वो चाहता था कि उसके पीछे जाए, उसका हाथ थामे और पूछे—”क्या हुआ है, रूहानी?” लेकिन उसका दिल रुक गया… पाँव ज़मीन में जड़ हो गए।

    वो बस एक गहरी सांस लेकर खुद से बुदबुदाया—”क्यों हर बार जब वो रोती है, मेरा सीना इतना भारी हो जाता है… जैसे उसके आँसू मेरी रूह तक पहुंचते हों?”

    उस एक क्षण में, दोनों कमरों के बीच खड़ी दीवार से एक और दीवार बन चुकी थी…. खामोशी की, और अधूरी बातों की।

    जब रूहानी अपने कमरे से निकली तो उसकी आँखों में अब भी हल्की सी नमी थी, लेकिन चेहरे पर एक बनावटी मुस्कान टिकी हुई थी।

    उसने खुद को साधारण से सफेद कुर्ती और हल्के नीले प्लाज़ो में ढाल लिया था… कुछ ऐसा पहनावा जो उसकी सादगी और थकान दोनों को बख़ूबी बयां कर रहा था। 

    वह धीमे कदमों से किचन की ओर बढ़ी और सीधे फ्रिज का दरवाज़ा खोला। ठंडी हवा का हल्का झोंका उसके चेहरे से टकराया, पर अंदर कुछ नहीं था…. ना कोई टिफिन, ना कोई कटोरी, बस खालीपन।

    उसने इधर-उधर नज़रें घुमाईं और पाया कि सारा खाना डाइनिंग टेबल पर बाहर ही रखा हुआ है। किचन ओपन था, इसलिए उसकी नज़रें फौरन सामने बैठे अद्वैत से टकराईं जो टेबल पर बैठा, फोन में कुछ पढ़ रहा था।

    “आज मीना ने खाना बनाकर बाहर ही क्यों छोड़ दिया, फ्रिज में क्यों नहीं रखा?” उसने हल्के उलझे स्वर में पूछा।

    अद्वैत ने नजरें उठाईं और बिना किसी खास भाव के जवाब दिया, “उसने मुझसे पूछा था कि मैं घर पर ही हूँ। खाना बहुत गरम था, इसलिए उसने फ्रिज में नहीं रखा।”

    रूहानी ने बिना कुछ कहे सिर हिलाया और प्लेट पर खाना परोसने लगी। फिर दोनों टेबल पर आमने-सामने बैठकर खाना खाने लगे। चम्मच की हल्की खनक और कभी-कभी अद्वैत की कुर्सी की सरसराहट के अलावा कोई और आवाज़ नहीं थी।

    कुछ मिनटों बाद, जैसे ही एक निवाला मुँह में डाला, रूहानी को अचानक कुछ याद आया। उसने चुप्पी तोड़ते हुए पूछा, “डॉक्युमेंट तो बन गए होंगे ना?”

    अद्वैत ने एक पल के लिए उसकी ओर देखा, उसकी आँखों में हल्की हैरानी थी, शायद इसलिए भी कि अचानक रूहानी ने वही बात छेड़ दी थी जिसे वह खुद टालना चाहता था। 

    उसके होंठ खुलने ही वाले थे कि रूहानी ने झट से बात काट दी, “ओह! सॉरी, मैं भूल गई थी कि तुम्हें खाते समय बोलना पसंद नहीं है। खाना खाने के बाद बात करूंगी।”

    अद्वैत ने धीरे से साँस ली, लेकिन रूहानी की बात उसे भीतर तक चुभ गई। वो कोई बड़ी बात नहीं थी, पर उसमें छुपी वो अनदेखी, वो दूरी उसे बेचैन कर गई। 

    और तभी उसे याद आया… जब रूहानी दरवाज़े से घुसते ही टूटी थी, और वो जवाब देने के बजाय चुप रह गया था, जैसे उसका दर्द उसके मौन में दम तोड़ गया हो।

    शायद उसे भी उसी तरह बुरा लगा था… जैसे अभी उसे लग रहा था। उस एहसास ने अद्वैत को खामोशी में डुबो दिया….. क्योंकि अब बात सिर्फ खाने या बात करने की नहीं थी, ये उन अनकहे जज़्बातों की लकीरें थीं जो दोनों के बीच धीरे-धीरे खिंचती जा रही थीं।

    रूहानी ने जैसे ही अपनी प्लेट धोकर रखी और पलटी, ठीक उसी पल अद्वैत भी अपनी प्लेट लेकर सिंक की ओर बढ़ रहा था। दोनों के कंधे अचानक से एक-दूसरे से टकरा गए।

    टकराने की वो हल्की सी टक्कर, किसी साधारण टकराव से कहीं ज़्यादा असर छोड़ गई थी। जैसे किसी ठहरे हुए तालाब में कोई नन्हा कंकड़ गिर जाए और उसकी लहरें दो किनारों तक जा पहुँचें। 

    एक पल के लिए दोनों के शरीर में सिहरन सी दौड़ गई—वो सिहरन जो अजनबियों के बीच नहीं, सिर्फ दो ऐसे लोगों के बीच होती है जिनके बीच कुछ अनकहा बाकी हो।

    दोनो की ज़ुबान से एक ही साथ “सॉरी” निकला और फिर अनायास ही दोनों मुस्कुरा दिए। वो मुस्कान जानी-पहचानी थी…. हल्की सी, लेकिन बहुत कुछ कहने वाली।

    रूहानी जाकर सोफ़े पर बैठ गई और अद्वैत ने भी प्लेट धोकर थोड़ी दूरी बनाकर उसके बगल में जगह ले ली। अद्वैत ने चुपचाप अपने लैपटॉप के नीचे से कुछ दस्तावेज़ निकाले और रूहानी की ओर बढ़ा दिए।

    रूहानी ने ध्यान से उन कागज़ों को पढ़ना शुरू किया। उसकी उंगलियाँ पन्नों को सावधानी से पलट रही थीं, मानो हर शब्द को अपनी उँगलियों से महसूस कर रही हो। 

    तभी अचानक एक जगह उसकी नज़र ठहर गई। कुछ ऐसा था जिसने उसके चेहरे पर हैरानी और उलझन दोनों को साथ ला दिया।

    उसने पन्ना थामे हुए ही अपना चेहरा अद्वैत की ओर घुमाया और धीमे स्वर में पूछा, “तुम इतनी बड़ी अमाउंट दे रहे हो और फिर भी एक प्रतिशत ब्याज तक नहीं ले रहे? क्यों?”

    अद्वैत ने कुछ कहने के लिए होंठ खोले ही थे कि तभी पीछे से मीना की आवाज़ आई। वो अपने दोनों बच्चों के साथ खड़ी थी और मुस्कराते हुए बोली, “सर, आप अपनी ही पत्नी को उधार पर पैसे दे रहे हो?”

    मीना की बात ने एक पल में कमरे की हवा बदल दी। रूहानी का चेहरा एकदम से स्थिर हो गया, उसकी आँखें अद्वैत की ओर टिक गईं और अद्वैत… वो जैसे इस सवाल के लिए तैयार ही नहीं था। 

    —————–

    रूहानी की आँखों में जो सवाल ठहरा था, क्या उसका जवाब सिर्फ अद्वैत के शब्दों में था… या उसके उन खामोश इरादों में, जिन्हें उसने कभी कहा ही नहीं?

    मीना की उस मासूम सी बात ने… क्या सचमुच अनजाने में उनके कागजी रिश्ते की परतें उघाड़ दी थीं?

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