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  • अधूरी इबादत भाग~27

    अधूरी इबादत भाग~27

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

    भाग~27 अतीत फिर लौटा 

     

    रूहानी के सामने जब उसके अतीत का वो पन्ना अचानक आकर खुल गया, तो उसकी आंखों को यक़ीन ही नहीं हुआ।

    कुछ क्षण के लिए वो वहीं सन्न सी खड़ी रह गई, मानो शहर की आवाज़ें, लोग, गाड़ियाँ सब धीमे पड़ गए हों… और वक़्त की सुइयाँ एकदम थम गई हों।

    उसके होंठ जो “सॉरी” कहने को खुले थे, धीरे-धीरे बंद हो गए, और गले में कुछ भारी सा अटक गया। वो टकराहट केवल जिस्मों की नहीं थी, वो तो जैसे एक भूले हुए दर्द की दस्तक थी।

    “नहीं… ये सपना है,” रूहानी ने मन ही मन कहा, और अपनी पलकों को ज़ोर से भींच लिया, जैसे यूँ आंखें बंद करने से ये चेहरा ओझल हो जाएगा।

    क्योंकि जिस शख़्स ने उसके विश्वास को अपने स्वार्थ की मिट्टी में रौंदा था, वो इतनी आसानी से इस तरह राह चलते मिल जाए… ये मुमकिन नहीं था।

    उसका दिल तेज़ी से धड़क रहा था, जैसे भीतर कोई पुराना जख्म फिर से खुल गया हो। उस इंसान की मौजूदगी, उसकी वो जानी-पहचानी खामोशी, सबकुछ उसे वहीं खींच लाया जहाँ से वो सालों पहले निकल चुकी थी।

    पर आज… वही साया फिर सामने था।

    और रूहानी की आंखों में एक साथ कई भाव उमड़ आए…. हैरानी, ग़ुस्सा, तकलीफ़, और कहीं बहुत गहराई में… एक छुपा हुआ डर।

    उसने अपने कदम पीछे खींचने चाहे, मगर शरीर जैसे जड़ हो गया था।

    रूहानी अब भी अपनी सोच में डूबी हुई थी। सामने खड़ा अतीत उसकी आंखों में उतर चुका था, और भीतर कहीं एक पुराना दर्द फिर से करवटें ले रहा था। वो कुछ कहती, उससे पहले सामने वाला शख़्स, जिसे उसने सालों पहले खुद से दूर कर दिया था, धीमे से मुस्कराते हुए बोला, “अरे, शादी भी कर ली तुमने? कौन है वो बदनसीब?”

    वो शब्द, जैसे किसी नश्तर की तरह रूहानी के सीने में चुभ गए। 

    “बदनसीब?” बस यही एक लफ्ज़ काफी था उसे हिला देने के लिए।

    उसने एक गहरी सांस ली, उसकी आंखों में पल भर को झिझक की जगह अब स्पष्ट आग थी। भले ही अद्वैत से उसकी शादी एक ‘कॉन्ट्रैक्ट’ थी, पर जब उसे सबसे ज़्यादा किसी की ज़रूरत थी, तो वही शख़्स उसकी ढाल बनकर खड़ा था।

    और आज… रूहानी जानती थी, ये वक्त है उसका कर्ज़ चुकाने का, उसका साथ देने का, उसका सम्मान करने का।

    उसने अपनी आंखों में गुस्से की चमक लिए हुए, उस शख़्स की आंखों में सीधा झांकते हुए कहा, “वो बदनसीब हो या ना हो… तुम्हारी तरह धोखेबाज़ तो बिलकुल नहीं है, Mr. Ekansh Rathore।”

    उसकी आवाज़ में कोई कंपन नहीं था। हर शब्द जैसे आत्मा से निकलकर सीधे सामने वाले के दिल को चीरते हुए जा रहे थे।

    रूहानी की आंखें अब भी उसी पर टिकी थीं, पर उसके भीतर अब कोई डर नहीं बचा था… सिर्फ़ एक सच्चाई, जिसे वो बिना झुके आज कह चुकी थी।

    एकांश को रूहानी का पलटवार बिल्कुल भी पसंद नहीं आया।

    उसके चेहरे की मुस्कान एक झटके में फीकी पड़ गई। होंठ तन गए, आंखों की कोर में तिरस्कार उतर आया, और आवाज़ में एक जानी-पहचानी तल्ख़ी घुल गई… वही अहंकार, वही खुद को सर्वश्रेष्ठ समझने वाली हवा।

    वो एक कदम आगे बढ़ा, जैसे रूहानी को फिर से वही पुराना एहसास दिलाना चाहता हो जिसमें वो खुद को हमेशा ऊँचा और दूसरों को कमतर मानता था।

    वो रूहानी की आंखों में झांकते हुए धीमे मगर तीखे स्वर में बोला, “तुम अब भी वैसी ही हो रूहानी… जितनी ज़िद्दी थीं, उतनी ही तल्ख़ भी। बस फ़र्क ये है कि तब तुम्हारे पास कुछ सपने थे, और आज… बस एक रिश्ता है, जिसके पीछे तुम अपनी कमज़ोरियां छुपा रही हो।”

    उसने एक हल्की हँसी में ज़हर घोलते हुए कहा, “किसी से शादी कर लेना उस दर्द से भागने का तरीका नहीं होता, जिसे तुमने खुद चुना था।”

    फिर उसने कुछ पल ठहरकर, और भी गहरे वार के लिए अतीत को उघाड़ते हुए कहा, “याद है वो रात, जब तुमने कहा था कि तुम्हें सिर्फ़ आज़ादी चाहिए… किसी का सहारा नहीं? फिर क्या हुआ उस आज़ादी का? या फिर… किसी की बाहों में गिरकर तुमने उसे नाम दे दिया ‘हमसफ़र’ का?”

    उसकी आवाज़ अब नर्म नहीं रही थी, उसमें एक कटाक्ष था, एक ताना, और एक अधूरा हिसाब।

    “तुम्हारी आंखों में जो गुस्सा है, वो खुद पर है रूहानी… मुझ पर नहीं। क्योंकि तुम्हें पता है कि तुमने अपना सच छुपाकर, सिर्फ़ किसी से बचने के लिए किसी और को ढाल बना लिया।”

    रूहानी की रग-रग में उस वक़्त जैसे कोई ज़हर उतर गया था। एकांश के शब्दों ने उसके भीतर की सारी चुप्पियों को तोड़ने की कोशिश की थी, मगर वो अब टूटने के लिए नहीं बनी थी। 

    उसके हर शब्द, हर ताना, हर ज़हरीली मुस्कान… रूहानी के दिल को छलनी कर रही थी, लेकिन वो अपनी पीड़ा को आँखों की नमी से बहने नहीं देना चाहती थी। 

    वो स्तब्ध थी। उसे यकीन नहीं हो रहा था कि ये वही इंसान है, जिसे उसने कभी टूटकर चाहा था, जिसके लिए उसने अपनी दुनिया की सीमाओं को लांघ दिया था। 

    “यही है वो?” उसके मन ने पूछा। “यही है वो एकांश, जिसके लिए तूने सारी हदें पार कर दी थीं? जिसके इंतज़ार में तूने ख़ुद को भुला दिया था?”

    वह एकांश, जो कभी उसकी हँसी का कारण था, आज उसी की आँखों में उसे असहाय, कमज़ोर और झूठा दिखाने की कोशिश कर रहा था।

    उसकी रगों में उबाल था, लेकिन चेहरा शांत था। वो चुप थी, मगर उसकी आँखों में आग साफ़ झलक रही थी।

    एकांश की आंखों में भरी वो कड़वाहट, और उसकी बातों में छुपा ताना… ये सब कुछ रूहानी को ऐसा महसूस करवा रहा था जैसे उसकी हर कमजोरी, हर अधूरी कोशिश, उसे खुद की नज़रों में गिरा रही हो। और सबसे ज़्यादा चुभन उसे इस बात की थी कि जिसे उसने अपनी मोहब्बत कहा था, वही आज उसे नीचा दिखाने पर उतारू था। 

    पर रूहानी जानती थी… ये वही पल है जब उसे पीछे नहीं हटना है। उसे खुद के लिए, अपनी ज़िन्दगी के लिए, और अद्वैत के लिए खड़ा होना है।

    उसने गहरी साँस ली। आसपास की आवाज़ें अब भीड़ के शोर में खो चुकी थीं, पर उसके भीतर एक स्पष्टता जन्म ले रही थी… अब और नहीं। अब किसी के शब्द उसे तोड़ नहीं सकते। 

    वो एक कदम पीछे हटी, फिर अपनी नमी भरी, मगर दृढ़ आवाज़ में कहा, “तुम्हें भी तुम्हारी शादी की बहुत-बहुत बधाई हो, मिस्टर एकांश। जब तुमसे मुझे धोखा मिला था, तब मेरे मन में सैकड़ों सवाल थे। मैं रात-रात भर जागकर ये सोचती रही कि आख़िर तुमने मुझसे ऐसा क्यों किया? किस बात की नाराज़गी थी तुम्हें, जो बिना कुछ कहे इस तरह चले गए?” 

    वो एक क्षण के लिए रुकी, उसकी आंखें अब एकांश की आंखों से सीधे भिड़ रही थीं…. जैसी नज़रें जवाब नहीं चाहतीं, बस सच्चाई थमा देती हैं।

    “अपने सवालों के जवाब मैं तुमसे नहीं पा सकी, इसलिए जब मैं तुम्हारे दिए उस पते पर पहुँची और तुम्हें किसी और से शादी करते देखा, तो सारे सवाल ख़ुद-ब-ख़ुद ख़ामोश हो गए।”

    रूहानी की सांसें अब गहरी थीं, उसके चेहरे पर अब न कोई मासूमियत थी, न ही कोई बेबसी…. बस एक संपूर्ण स्त्री का साहस था, जो अपने अतीत से आंखें मिलाकर आगे बढ़ने को तैयार थी।

    “उसी वक़्त समझ आ गया कि मैं कभी थी ही नहीं तुम्हारे लिए ज़रूरी। शायद एक विकल्प थी, या सिर्फ़ एक वक़्त की पसंद। लेकिन एक चीज़ जो तुम आज तक नहीं समझ सके, वो ये कि मैं तुम्हारी तरह नहीं हूँ, एकांश। मैं रिश्तों को खेल नहीं मानती।”

    उसने एक क्षण को आँखें बंद की, मानो खुद को समेट रही हो, फिर बोली, “और इसीलिए… अब मुझे किसी ऐसे इंसान से बात करना ज़रूरी नहीं लगता जो मेरी ज़िंदगी में अब कोई महत्व नहीं रखता।” 

    एकांश के चेहरे की मुस्कान धीरे-धीरे फीकी पड़ने लगी थी। शायद उसे उम्मीद नहीं थी कि रूहानी यूँ जवाब देगी या शायद वो अब तक उसे उसी कमजोर, प्रेम में डूबी लड़की समझ रहा था, जो उसकी यादों में छूट गई थी। मगर रूहानी अब वो नहीं थी। 

    रूहानी बिना एक भी पल रुके, बिना एकांश के किसी जवाब या प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा किए, पीछे मुड़ी और सीधी कदम बढ़ा दिए….. अपने रास्ते की ओर।

    उसकी चाल में अब कोई लड़खड़ाहट नहीं थी। उसके कदमों में सन्नाटा नहीं, बल्कि एक स्पष्ट ध्वनि थी…… जैसे वो हर कदम पर अपने आत्मसम्मान को वापस समेट रही हो।

    आसमान पर बादल थे, हल्के-हल्के हवा चल रही थी, और शहर की भीड़ में गुम होती रूहानी की परछाई, उस दिन के साथ उसका अतीत भी धीरे-धीरे पीछे छोड़ रही थी।

    और एकांश… वो वहीं खड़ा रह गया, उन शब्दों की गूंज में जो उसे शायद ज़िंदगी भर याद रहेंगे।

    रूहानी ने जैसे ही अद्वैत के घर का दरवाज़ा खोला, उसकी सांसें उखड़ी हुई थीं, आँखों में बवंडर थमे हुए थे। उसने दरवाज़ा बंद किया और बिना एक पल की देरी किए, अपनी पीठ दरवाज़े से टिका दी और बिना किसी सोच-विचार के धम्म से ज़मीन पर बैठ गई। 

    धम्म से बैठते ही, उसकी छाती से एक टूटा हुआ, बेकाबू रुदन फूट पड़ा। 

    “आहह्ह्हह्हह्ह्ह्ह !” एक दर्द भरी चीख, एक ऐसी चीख जिसमें न केवल दुख था, बल्कि बरसों की चुप्पी, टूटी उम्मीदें और एक अजीब सी हार थी। फिर वो ज़ोर-ज़ोर से रोने लगी। जैसे कोई बाँध टूटा हो… आँसुओं का नहीं, बल्कि आत्मा का। 

    उसका शरीर कांपने लगा, चेहरा दोनों हथेलियों में छुपा लिया पर सिसकियाँ दीवारों से टकराकर पूरे घर में गूंज रही थीं। 

    तभी सामने से दौड़ते कदमों की आहट हुई। अद्वैत रूहानी के सामने आ खड़ा हुआ। उसके बाल बिखरे हुए थे, सांसें तेज़, और चेहरे पर बेचैनी साफ़ थी। 

    “रूहानी?” उसकी आवाज़ काँपी, जैसे उसने पहली बार उसके भीतर की दरारों को साफ देखा हो।

    “क्या हुआ, रूहानी? ऐसे क्यों रो रही हो?”

    ————–

    क्या रूहानी अद्वैत को उस रात का सच बता पाएगी… या उसकी चुप्पी ही एक और तूफ़ान को जन्म देगी? 

    उसके आँसू सिर्फ़ अतीत की राख थे… या किसी नई आग का इशारा?  

    जब अद्वैत उसकी आंखों में उस दर्द को पढ़ेगा….. क्या वो समझ पाएगा कि ये कहानी अब सिर्फ़ उसकी नहीं रही?

     

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  • अधूरी इबादत भाग~26

    अधूरी इबादत भाग~26

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    भाग~26 सिर्फ़ एक “Okay” 

     

    मीना के सवाल पर रूहानी एक क्षण को रुकी, जैसे किसी अंदरूनी द्वंद्व में फँस गई हो। आँखों में हल्की झुँझलाहट तैर गई, पर चेहरा अब भी संयमित रहा। वो जानती थी कि सवाल साधारण था, पर जवाब में जो कुछ भी छिपा था, वो साधारण नहीं था। 

    मन तो किया कि मीना को सब कुछ बता दे….. अपने नए स्टूडियो का सपना, अपनी हिम्मत से भरी जद्दोजहद, वो अकेलेपन की घुटन जिसे कला के ज़रिए साँस देना चाहती थी। पर वक्त नहीं था। घड़ी की सुइयों की तरह उसके भीतर भी एक दौड़ चल रही थी।

    उसने जल्दी से कॉफी का आखिरी घूँट पिया, जैसे उस गर्माहट में कुछ पल की राहत ढूंढ रही हो। फिर कप टेबल पर रखा और बोल पड़ी, “मीना, मुझे अपना कॉन्टैक्ट नंबर दे दो… सारी बातें बाद में बताऊँगी, नहीं तो बहुत लेट हो जाऊँगी।”

    मीना ने थोड़ा हैरानी से देखा, पर चुपचाप सिर हिलाया। फिर अपने छोटे से पर्स से एक पुराना, घिसा हुआ कीपैड फ़ोन निकाला। रूहानी ने नंबर डायल किया और मिस्ड कॉल दी। 

    स्क्रीन पर नंबर चमका…. अनजान पर तयशुदा।

    “ये रहा मेरा नंबर,” रूहानी ने धीमे से कहा। 

    मीना ने जैसे ही “रूहानी मैडम” नाम दर्ज किया, रूहानी ने एक हल्की सी मुस्कान दी। पर उस मुस्कान के पीछे एक बेचैनी थी, एक जल्दी में छुपा सपना। उसकी आँखों में साफ़ दिख रहा था….. वो कुछ नया शुरू करने की दहलीज़ पर खड़ी है, पर रास्ता अभी बना नहीं है।

    दरवाज़ा खोलते हुए उसके पाँव तेज़ थे, लेकिन दिल भारी। जैसे हर कदम के साथ वो अपने अंदर किसी पुराने डर को पीछे छोड़ रही हो।

    रूहानी के घर से निकलते ही अद्वैत धीमे क़दमों से बाथरूम की ओर गया। नहा-धोकर आया तो उसने कोई फैंसी कपड़े नहीं पहने…. सिर्फ़ एक सादा कुर्ता और पायजामा। बाल भीगी हुई हालत में बेतरतीब से थे। चेहरे पर कोई भाव नहीं, पर आंखों में थकी हुई सोचों की परतें थीं। जैसे हर बूंद पानी के साथ उसके भीतर कुछ और बह गया हो।

    वो धीरे-धीरे सीढ़ियाँ उतरकर नीचे आया और आकर सीधे सोफे पर बैठ गया। फ़ोन पास में था, लेकिन उसने उसे छुआ तक नहीं… जैसे अब किसी बात की गूंज से भी खुद को दूर रखना चाहता हो। सिर्फ़ एक शांत, ठहरी हुई उपस्थिति। उसके बैठते ही जैसे पूरे घर की हवा पलभर को थम गई। 

    तब तक मीना पूरे घर की सफाई कर चुकी थी, रसोई में हल्दी और जीरे की महक भरने लगी थी। मगर अद्वैत को यूं अचानक बैठे देख वह थोड़ी हिचकिचाई। ये रोज़ का दृश्य नहीं था। उसकी आदत थी सुबह जल्दी घर छोड़ देने की, एक अजीब सी दूरी बनाए रखने की। पहली पत्नी के जाने के बाद, वो खुद से भी दूर हो गया था।

    मीना, जो अब तक उसे बस एक परछाई की तरह देखती थी, चुपचाप उसके पास आई और बोली, “आपकी तबीयत तो ठीक है ना, सर? कुछ बना दूँ जल्दी से?”

    अद्वैत ने उसकी बात पर हल्की सी मुस्कान दी…. वो मुस्कान जिसमें न तो कोई मज़ाक था, न गर्मजोशी, बस एक स्वीकार थी। “अरे मीना, ठीक हूँ मैं। बस आज कहीं जाना नहीं है, इसलिए बैठा हूँ। और हाँ… कुछ भारी नाश्ता बना दो।” 

    मीना ने सिर हिलाया, “ठीक है, सर,” कहकर चुपचाप रसोई की ओर लौट गई।

    अद्वैत वहीं बैठा रहा, अब अपनी गोद में लैपटॉप लिए, पर उसकी उंगलियाँ कीबोर्ड से दूर थीं। जैसे कुछ लिखना चाहता हो, पर शब्द अब भी उसकी आत्मा में कहीं अटके हों। घर में सब कुछ था….. साफ़ फर्श, ताज़ा हवा, पकती हुई रोटी की खुशबू…..पर उसके भीतर एक खाली कमरा अब भी बंद पड़ा था।

    अद्वैत सोफे पर ही बैठा था, सामने लैपटॉप की नीली रौशनी उसके चेहरे पर अजीब सी परछाई डाल रही थी। उंगलियाँ की-बोर्ड पर थीं, मगर दिमाग कहीं और। अपनी नई किताब की शुरुआत के कुछ पन्ने उसने टाइप कर लिए थे, लेकिन उस रचना में वो गहराई नहीं थी जिसे वो महसूस कर रहा था। 

    अचानक उसके मन में एक अजीब सी बेचैनी उठी…… रूहानी आज सुबह से दिखी क्यों नहीं?

    उसने आंखों को स्क्रीन से हटाकर कमरे में एक नजर डाली, जैसे किसी आभासी उपस्थिति को ढूंढ़ रहा हो, जो वहां होनी चाहिए थी। फिर आवाज़ लगाई, “मीना, तुम्हारी रूहानी मैडम कहाँ हैं? दिख नहीं रही आज।”

    मीना रसोई से बाहर आई, उसके चेहरे पर हल्का सा विस्मय था। “आपकी पत्नी हैं मैडम, आपके साथ तो कल से ही होंगी। रात में भी नहीं बताया क्या? सुबह तो बहुत जल्दी निकल गईं।”

    अद्वैत के भीतर कुछ सिहर उठा। उस एक वाक्य में कितना कुछ छुपा था….. एक सवाल, एक शक, और एक अनकहा सच। पर चेहरा उसने शांत रखा, शब्दों को सजाया ताकि कोई दरार न दिखे।

    “वो कल थक कर जल्दी सो गई थीं, तो मैंने जगाना सही नहीं समझा। और सुबह मैं गहरी नींद में था, शायद उसने मुझे परेशान करना ठीक नहीं समझा।”

    मीना ने उसकी बात पर सिर हिलाया और रसोई में लौटते हुए बोली, “सही कहा आपने, सर। बहुत जल्दी में थी मैडम, मुझसे पूछ रही थीं कि आसपास कोई जगह या दुकान खाली है क्या।”

    अद्वैत एक पल को वहीं थम गया। शब्द खत्म हो गए थे, पर भीतर कोई शोर उठ रहा था। उसके सीने में एक सवाल रह गया था, जो उसने किसी से नहीं पूछा…. रूहानी क्या खोज रही थी, और क्यूँ? क्या इसलिए रूहानी ने उससे पच्चीस लाख रूपए मांगे थे? 

    अद्वैत की निगाहें जैसे हवा में किसी अनकही बात को टटोल रही थीं। वो मीना से कुछ पूछने ही वाला था, आवाज़ उसके गले में ही अटक गई थी कि तभी मोबाइल की स्क्रीन चमकी। 

    उसने अनमने मन से फोन उठाया, जैसे किसी पुराने ज़ख्म पर उंगली रखी जा रही हो। स्क्रीन पर एक मैसेज था…… 

    “उम्मीद है डॉक्युमेंट्स बन गए होंगे, मैं आते ही साइन कर दूंगी। प्लीज़ कल तक मुझे सारे पैसे कैश में चाहिए और मैं सच कह रही हूँ, 6 महीने के बाद से इंस्टॉलमेंट में सारे पैसे दे दूंगी, जो इंटरेस्ट लगाना हो लगा लेना।”

    वो चुप रहा। उसका गला थोड़ा सूख गया। कुछ पल तक उसने फोन हाथ में थामे रखा, जैसे शब्दों का वजन महसूस कर रहा हो। फिर अचानक होठों पर एक हल्की, लगभग मायूस मुस्कान आई। 

    उसकी उंगलियों ने बड़ी नर्मी से स्क्रीन पर “okay” टाइप किया और भेज दिया।

    कभी-कभी किसी के कहे आखिरी वाक्य में पूरा अतीत लिपटा होता है। और वो “मैं सच कह रही हूँ” उस एक वाक्य में जैसे रूहानी की सारी थकान, सारी सच्चाई, सारी उम्मीद समा गई हो। 

    उसी वक्त मीना चुपचाप उसके सामने आकर पोहे की प्लेट रखी। “बाकी खाना गर्म है, इसलिए मैंने बाहर ही ढककर छोड़ दिया है, अब मैं घर चलती हूँ” कहकर मीना अद्वैत के घर से निकल गई। 

    अद्वैत ने उस थाली को देखा, फिर अपनी हथेलियों को। जैसे सोच रहा हो…. जिन हाथों में किसी का भरोसा हो, क्या वो वाकई खाली रह सकते हैं? कमरा शांत था, पर भीतर एक तूफान अब भी धीमे-धीमे बह रहा था।

    उधर,

    रूहानी ने सुबह-सुबह अपने पुराने स्टूडियो के मालिक से मुलाक़ात की। सारे कागज़ात तैयार थे… बकाया पेमेंट का अंतिम बिल, एक पुरानी जगह को अलविदा कहने की औपचारिकता और उस दरवाज़े की चाभी जो कभी उसके ख्वाबों का पहला दरवाज़ा हुआ करती थी। 

    उसने धीमे से चाभी उनके हाथों में रख दी, जैसे कोई बीता हुआ हिस्सा खुद से अलग कर रही हो। उसकी आंखों में न नम थी, न मुस्कान…… बस एक सूनापन, जो कुछ खत्म हो जाने पर आता है।

    कागज़ उसके बैग में रखकर वह अद्वैत के घर के लिए निकल पड़ी। कैब से उतरते ही शहर की भीड़ और धूप में घुला हुआ दिन उसे छूने लगा। वह तेज़ी से मुख्य चौराहे से गुजर रही थी, तभी अचानक उसकी जूती में कुछ अटक गया। 

    एक हल्की-सी झुंझलाहट के साथ वह झुकी, जूती ठीक की, और उठते ही जैसे ही कदम आगे बढ़ाया, अचानक किसी से ज़ोरदार टक्कर हो गई।

    “सॉरी…” शब्द उसके होंठों पर ही थे कि जैसे ही उसने चेहरा घुमाया, उसकी सांस अटक गई।

    सामने जो खड़ा था, उसकी आंखों में कोई अजनबीपन नहीं था… बल्कि वो नज़रों की पहचान इतनी तेज़ थी कि रूहानी एक पल के लिए जैसे ठिठक गई।

    उसका “सॉरी” वहीं गले में अटक गया, क्योंकि जिसे देखकर वो पलटी थी… उसे वो बहुत अच्छी तरह जानती थी।

    इतनी अच्छी तरह… कि अब उसका यूँ अचानक सामने आ जाना, एक अजीब सी सिहरन बनकर उसकी रीढ़ में उतर गया।

    ————-

    क्या रूहानी को वाकई मालूम था कि वो किससे टकराई है… या किस अतीत ने उसे फिर से घेर लिया?

    अद्वैत की आंखें किस सच को तलाश रही थीं… रूहानी के ख्वाब, या खुद के खोए हुए हिस्से?

    क्या ये महज़ इत्तेफ़ाक़ था… या कोई पुराना सिरा फिर से खुलने वाला था?

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  • अधूरी इबादत भाग~25

    अधूरी इबादत भाग~25

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    भाग~25 उधार जज़्बातों का 

     

    रात का सन्नाटा एक गूंगी चीख की तरह पूरे घर में पसरा हुआ था। कमरे की दीवारों पर टंगी घड़ी की सुइयाँ जैसे समय को खींचती हुई चल रही थीं…. हर टिक-टिक के साथ अद्वैत के भीतर एक नया सवाल जन्म ले रहा था, एक नया संशय, एक नया द्वंद्व। 

    उसके ठीक सामने खड़ी रूहानी का चेहरा जैसे किसी धुँधली तस्वीर की तरह था—आधी साफ़, आधी धुँधलायी हुई। उसकी आँखों में एक ऐसी बेचैनी थी, जिसे सिर्फ महसूस किया जा सकता था, शब्दों में बाँध पाना मुश्किल था। जैसे वह कुछ कहना चाह रही हो, लेकिन ज़ुबान साथ न दे रही हो। जैसे कोई टूटन हो उसके भीतर, जो हर मुस्कान के पीछे छिपी बैठी हो।

    अद्वैत ने उसकी आँखों में झाँकने की कोशिश की, जैसे कोई ताला खोलना चाहता हो जिसकी चाबी गुम हो गई हो। मगर वहाँ कुछ था… एक दीवार, एक नमी, एक कहानी जो वह कह नहीं पा रही थी। 

    फिर, अचानक, उस चुप्पी को तोड़ते हुए रूहानी की आवाज़ आई…. थोड़ी घबरायी हुई, थोड़ी ठहरी हुई, “उधार माँग रही हूँ तुमसे, छह महीने के बाद से तुम्हें इंस्टॉलमेंट पर वापस भी कर दूँगी।”

    अद्वैत को यह सुनते ही जैसे किसी अदृश्य करंट ने छू लिया हो। यह सवाल नहीं था, न ही विनती। यह एक निश्चय था जो रूहानी ने बहुत सोच-समझकर किया था। उसकी आवाज़ में एक डर छुपा था…. कहीं इनकार न हो जाए, कहीं अद्वैत उस पर शक न करे। 

    अद्वैत बस उसे देखता रहा… न आँखों में ग़ुस्सा, न सवाल। सिर्फ एक गहरी नज़र, जो अंदर तक झाँकने की कोशिश कर रही थी।

    रूहानी ने उसकी चुप्पी को अपनी बात की नाकामी समझा और जल्दी से बोली, “तुम तो इतने फेमस और बेस्टसेलिंग राइटर हो, तो इतने पैसे तो तुम दे ही सकते हो मुझे अभी। मैं सच्ची कह रही हूँ, मैं सारे पैसे लौटा दूँगी। अगर तुम्हें ठीक नहीं लग रहा तो बता दो, कितना इंटरेस्ट रेट लोगे, मैं वो भी चुका दूँगी।”

    यह शब्द सिर्फ शब्द नहीं थे—ये उसके आत्मसम्मान की अंतिम कोशिशें थीं। जैसे वह खुद को गिरने से बचाना चाह रही हो, और जानती हो कि अद्वैत ही वह आख़िरी डोर है जिसे वह थाम सकती है। मगर अद्वैत अब भी स्थिर था….. जैसे सोच रहा हो, समझ रहा हो, तौल रहा हो कि यह माँग सिर्फ पैसों की है या उससे कहीं ज़्यादा की।

    धीरे से उसने कहा, “लेकिन रुपये माँगना या इंटरेस्ट रेट के साथ वापस करना, ये सब कुछ तो कॉन्ट्रैक्ट में कहीं नहीं लिखा है और न ही तुमने एग्रीमेंट बनवाते समय इन सब बातों का ज़िक्र भी किया।”

    रूहानी को जैसे किसी ने उसकी हड्डियों तक सुन्न कर दिया हो। उसने कुछ पल सोचा, फिर अपनी आवाज़ को यथासंभव सामान्य बनाए रखते हुए कहा, “तो क्या नया एग्रीमेंट बनवाना पड़ेगा या पुराने वाले में ही मॉडिफाई करोगे?”

    अद्वैत उसकी इस मासूमियत पर अनायास मुस्कुरा दिया। एक कोना उसके भीतर था जो शायद यह चाहता था कि रूहानी उससे कुछ माँगे, उससे जुड़े, उससे कुछ उम्मीद रखे। फिर भी, चेहरा न्यूट्रल बनाए रखते हुए बोला, “ऑफकोर्स, इसके लिए न्यू डॉक्युमेंट बनवाने पड़ेंगे, पूरे 25 लाख की बात है।”

    रूहानी ने सिर हिलाया, फिर एक पल चुप रही और आखिर में पूछ ही लिया, “पूछोगे नहीं कि क्यों चाहिए?”

    अद्वैत की आवाज़ अब थोड़ी ठंडी हो चली थी, “शायद तुम भूल चुकी हो कि, हम दोनों में से किसी को भी एक-दूसरे के पर्सनल मैटर्स में दखल देने का कोई हक़ नहीं।”

    ये शब्द जैसे रूहानी के सीने में कहीं चुभ गए। उसके चेहरे पर उभर आई नमी… नहीं, ये आँसू नहीं थे, मगर आँसुओं से कम भी नहीं। वह कुछ नहीं बोली, लेकिन उसकी आँखों में जो कहानियाँ तैर रही थीं, वे अद्वैत से छिपी नहीं थीं।

    शायद यही वजह थी कि अद्वैत ने तुरंत ही हल्के अंदाज़ में बात मोड़ दी, “आई होप कहीं कोई गैम्बलिंग नहीं कर रही होगी या किसी को मारने की सुपारी तो नहीं दे रही होगी, है ना?” और मुस्कुरा दिया…. एक जानबूझ कर फैलाई गई गर्माहट, ताकि उस ठंडी चुप्पी को पिघलाया जा सके।

    रूहानी भी मुस्कुरा दी, मजबूर होकर नहीं… बल्कि उस पल के सौजन्य में, जो दोनों के बीच थोड़ी देर के लिए सहज हो गया था। 

    अद्वैत ने कहा, “रात बहुत हो गई है, अब मैं सोने जा रहा हूँ।” और बस इतना कहकर वह सीढ़ियों की ओर बढ़ गया, बिना पलटे, बिना उसके जवाब का इंतज़ार किए।

    रूहानी वहीं खड़ी रही… कमरे की दीवारों के बीच, उस अधूरे संवाद की गूंज के साथ। उसकी आँखें अब स्थिर नहीं थीं, उनमें तूफान था, एक ऐसा तूफान जो बहुत देर से दबा रखा गया था। वह जानती थी कि क्यों चाहिए उसे वो पैसे… उसका सपना, उसका स्टूडियो, उसका सम्मान… सब कुछ दाँव पर था। 

    वह यह भी जानती थी कि अद्वैत को बताना आसान नहीं होगा कि कैसे उसका पूर्व प्रेमी उसके डिज़ाइन्स चुरा कर अपनी मंगेतर को दे गया और कैसे एक झूठी बदनामी ने उसकी मेहनत को मिट्टी में मिला दिया।

    लेकिन अब नहीं। अब उसे लड़ना था। उठना था। और इस बार वह किसी पर भरोसा करके नहीं, बल्कि खुद के दम पर जीतना चाहती थी।

    उसने एक गहरी साँस ली। फिर खुद से कहा, “मैं इसे टूटने नहीं दूँगी। मुझे फिर से अपने नाम का एक सच बनाना होगा… बिना किसी की परछाई के, बिना किसी की रहमत के।”

    और उस रात, जब पूरा घर नींद में डूबा था, रूहानी की आँखों में नींद नहीं, आग थी।

    ————-

    अद्वैत आज पूरी तरह ख़ामोश था, जैसे किसी अनसुने सन्नाटे में घुल जाना चाहता हो। कमरे की हवा भारी थी, धूप फीकी लग रही थी और उसकी आँखें बंद… मगर मन पूरी तरह जागा हुआ। 

    पिछले कुछ दिनों से जितनी तेज़ी से चीज़ें बदली थीं, उतनी ही चुपचाप आज सब कुछ ठहर गया था। न उसने किसी से बात की, न ही कमरे से बाहर निकला। उसकी डायरी भी आज ख़ाली थी। शब्द नहीं थे… सिर्फ़ भारीपन था।

    उधर रूहानी की सुबह बिल्कुल उलटी दिशा में चल रही थी। उसका हर कदम किसी अदृश्य घड़ी की टिक-टिक से बंधा हुआ था। जैसे भीतर कुछ था जो अब और रुकने नहीं देना चाहता था। 

    उसने हल्का गुलाबी कुर्ता पहना, बालों को कसकर गूंथा और आईने में खुद को बिना मुस्कराए देखा…. एक शांत चेहरा, जिसमें अब हारने की कोई जगह नहीं थी।

    मीना जैसे ही घर पहुँची, रूहानी सीधे किचन की ओर बढ़ी, “मेरे लिए जल्दी से एक कॉफी बना दो मीना, मुझे निकलना है फ़ौरन। उसके बाद ही सफ़ाई शुरू करना।”

    मीना ने बिना कुछ पूछे सिर हिलाया और कॉफी बनाने लगी। भाप ने रसोई में एक गर्मी फैलाई, और उस गर्मी में रूहानी की आँखों में एक नई रोशनी आ गई थी।

    तभी रूहानी ने धीमे से पूछा, “यहाँ आसपास कहीं कोई जगह या दुकान मिलेगी खाली?”

    मीना अचानक रुकी, चौंकी, फिर धीरे से बोली, “क्यों? कुछ काम है क्या, मैडम?”

    ———-

    क्या मीना को अंदाज़ा था कि रूहानी के इस सवाल के पीछे कोई मामूली वजह नहीं, बल्कि एक नई शुरुआत की जिद छुपी है?

    क्या अद्वैत की चुप्पी महज़ थकावट थी, या फिर कोई ऐसा फैसला जो सब कुछ बदल सकता है?

    क्या रूहानी सच में सिर्फ एक दुकान ढूँढ रही थी, या फिर अपनी खोई हुई पहचान की ज़मीन तलाश रही थी…? 

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  • अधूरी इबादत भाग~24

    अधूरी इबादत भाग~24

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    भाग~24 सपनों का मलबा

     

    रूहानी की उंगलियाँ अभी भी कॉफी के गर्म मग के चारों ओर जकड़ी हुई थीं। उसके चेहरे पर एक पल को सिहरन दौड़ी, जैसे किसी ने उसका नाम नहीं, उसके भीतर का कोई राज़ पुकार लिया हो। मीना की सीधी, मासूम लेकिन भीतर तक घुसती हुई बात ने जैसे कमरे की हवा में एक अजीब सी बेचैनी घोल दी थी।

    एक हल्की साँस लेते हुए, खुद को संयत करते हुए रूहानी ने नज़रें मीना से हटाकर मेज़ की ओर फेर लीं, लेकिन शब्द उसके होंठों तक आ ही गए।

    “अद्वैत भी कल नीचे ही सोए थे… हम दोनों थक गए थे… ऊपर वाला कमरा बंद था, चाबी भी नहीं मिल रही थी। इसलिए सोचा नीचे आराम कर लें।”

    मीना ने कुछ पल तक उसे यूँ देखा, जैसे वह उसके शब्दों से कहीं ज़्यादा उसके चेहरे की रेखाएँ पढ़ने की कोशिश कर रही हो। 

    मीना हँसते हुए बोली, “अरे, मैं तो सोच रही थी अब ऊपर वाला कमरा खुल जाएगा… वैसे भी सर उसमें बस सोने ही तो जाते हैं। वैसे ठीक किया आपने नीचे सोकर, थक गए होंगे।” 

    रूहानी ने जवाब में सिर्फ सिर हिला दिया। मगर उसके भीतर अभी भी हलचल जारी थी। वो जानती थी, उसका जवाब सतही था। सच भी था, झूठ भी। जो कुछ बीत चुका था, वो बहुत कुछ कहता था….. मगर समझाने लायक नहीं।

    मीना अपना काम ख़त्म करके चली गई, मगर रूहानी की नज़र अब खिड़की के पार जा अटकी थी। बाहर हल्की धूप थी, वही पीली-सी जो सर्दियों में बिन बोले चुपचाप खिड़की पर बैठ जाती है। लेकिन रूहानी का मन कहीं और भटक रहा था।

    उसकी उंगलियाँ मग के गिर्द घूमती रहीं, मगर कॉफी अब ठंडी पड़ चुकी थी…… ठीक उसकी उम्मीदों की तरह, जो धीरे-धीरे ठंडी होती जा रही थीं… लेकिन बुझी नहीं थीं। एक बेचैनी सी उसके भीतर हिलोरें मार रही थी, जैसे कोई पुरानी चिंगारी फिर से जागने लगी हो। 

    उसने एक लंबी साँस ली और अपनी नज़रें खिड़की के पार से खींचते हुए खुद से बुदबुदाई, “बहुत दिन हो गए… अब और नहीं। आज मुझे स्टूडियो जाना ही होगा।”

    वो खुद को याद दिला रही थी…. स्टूडियो ही तो उसका असली ठिकाना था, उसका सपना, उसकी पहचान। वह जगह जिसने उसकी सोच को पंख दिए थे, जहां हर कोना उसकी मेहनत की खुशबू से महकता था। वहाँ लौटना, जैसे खुद के पास लौटना था। रूहानी ने धीरे से मग टेबल पर रखा, जैसे किसी पुराने वादे को फिर से थाम लिया हो।

    उसने खुद को आईने में देखा….. बाल बिखरे थे, चेहरा थका हुआ, पर आँखों में आज कुछ अलग था।

    एक ठहराव, एक संकल्प, एक जिद।

    “अब और देर नहीं,” उसने अपने आपसे कहा। अभी अद्वैत घर पर नहीं था, शायद किसी कवि सम्मलेन या लेखक मिलन समारोह में गया होगा। यही सही वक्त है। 

    वह अपने कमरे में गई। उसने वह बैग निकाला…. वही बैग जो यश ने उसे दिया था। वो धीरे से ज़िप खोली। अंदर पुराने स्केचबुक, कुछ फैब्रिक के टुकड़े, अधूरी डिज़ाइनिंग शीट्स… और फिर अचानक एक कोने में उसे कुछ चमकता हुआ दिखा…… एक छोटा सा मेटल का टुकड़ा।

    उसने उसे निकाला… उसकी आँखें भर आईं। उसमे स्टूडियो की चाबी थी। रूहानी के चेहरे पर एक धीमी-सी मुस्कान आई। एक उदास सी, लेकिन सच्ची।

    “तो तूने ये भी बचा लिया, यश…” उसके होंठों से निकला, जैसे कोई दबी हुई दुआ अनजाने में लौट आई हो।

    वो मुस्कुरा पड़ी। उसने चाबी को मुट्ठी में कस लिया। “वो सपना चुराया गया था, खत्म नहीं हुआ था।”

    फिर उसने बाहर का दरवाज़ा खोला….. बिलकुल वैसे ही जैसे किसी कमरे का नहीं, बल्कि अपने अंदर के डर का दरवाज़ा खोल रही हो। अब रूहानी फिर से अपने आप से मिलने जा रही थी….. उसी जगह जहाँ कभी उसकी आत्मा रंगों में घुलकर सांस लेती थी।

    ——————-

    रूहानी ने स्टूडियो के दरवाज़े पर खड़े होकर एक गहरी साँस ली। उसके भीतर एक तूफ़ान चल रहा था, लेकिन चेहरा शांत था….. जैसे कोई सैनिक जंग के मैदान में उतरने से पहले खुद को तैयार कर रहा हो। दरवाज़ा खोलते ही एक सड़ी-सी गंध ने उसका स्वागत किया, जैसे किसी ने जानबूझकर उसके सपनों को सड़ने के लिए छोड़ दिया हो।

    अंदर कदम रखते ही उसकी नज़र सबसे पहले उस मनीक्विन (Mannequin) एक प्रकार की मानव-आकार की मॉडल, पर पड़ी, जिस पर उसका पहला डिज़ाइन लटका था….. अब धूल और जाले से ढका हुआ। उसने धीरे से उस पर हाथ फेरा, जैसे किसी पुराने दोस्त को छू रही हो। पर कपड़ा अब भीगा हुआ था, शायद छत से पानी टपकता रहा होगा।

    रूहानी की उंगलियाँ उस जंग लगे सिलाई मशीन के हैंडल पर गई…… ठंडी, धूल सनी, और जैसे बरसों से किसी स्पर्श की प्रतीक्षा में जमी हुई। उस घिसी हुई सतह पर उसकी हथेलियों की नरमी धीरे-धीरे थरथराने लगी।

    वो वहीं ज़मीन पर बैठी, घुटनों को मोड़कर, कुहनी टिकाए, आँखें नीची किए। कभी इस स्टूडियो में उसकी हँसी गूंजती थी, मॉडल्स की चहक होती थी, और स्केचिंग के वक्त पेंसिल की खुरखुराहट किसी गीत जैसी लगती थी। लेकिन अब… अब बस टूटे शीशों की किरकिर और उस दीवार पर पड़ा कॉफी का दाग उसकी नाकामी का इश्तहार बना खड़ा था।

    “Copycat Studio — Talent Stolen Here!”

    उस एक वाक्य ने जैसे उसकी रगों में बर्फ घोल दी हो।

    “Steal?” वो बुदबुदाई।

    “किसी ने चुराया नहीं था… छीना था… जान-बूझकर। और मैंने… बस देखती रह गई।”

    उसने अपने घुटनों को सीने से लगाया और सिर टेक दिया। आँखों में आँसू तो अब भी नहीं थे। शायद इसलिए नहीं कि दुख कम हो गया था, बल्कि इसलिए कि दर्द अब खून की तरह बहना छोड़ चुका था। 

    टेबल से उड़कर ज़मीन पर बिखरे हुए बिजली और किराये के बिल उसके चारों ओर मौत के फरमान जैसे बिछे थे। हरेक कागज़ मानो चीख रहा था “तेरा सपना मर चुका है, अब बस उसकी लाश यहाँ सड़ रही है।”

    लेकिन रूहानी उस चीख को अनसुना कर चुकी थी। धीरे-धीरे वो उठी। उसकी चाल में थकावट थी, लेकिन वो थकावट शरीर की नहीं, आत्मा की थी। फिर भी उसने खुद को खींचा।

    दीवार की ओर बढ़ी, जहां अब भी कुछ फटे हुए स्केच टंगे थे। उसने एक को हाथ में लिया…. उसी डिज़ाइन का हिस्सा जो उसने अपनी पहली फैशन प्रतियोगिता के लिए बनाया था।

    फिर उसे याद आया… वो रात…. वो रात जब उसने घंटों बैठकर उस ड्रेस को रंगा था, हर सिलाई में अपने सपनों की महीन नब्ज़ सी टांकी थी। 

    पूरी रात उसने जागकर एक-एक टांका उस उम्मीद के साथ जोड़ा था, कि जब सुबह होगी तो उसका सपना रैंप पर चलेगा… उसके नाम के साथ, उसकी पहचान बनकर।

    और फिर… वो सुबह…… वो सुबह जब उस रैंप पर वही ड्रेस उतरी थी…. लेकिन किसी और के नाम से। किसी और के जिस्म पर। 

    जब उसने आँखों में आँसू और होंठों पर सन्नाटा लिए सवाल किया था, तो जवाब में बस एक बेमानी मुस्कान मिली थी।

    उसने अपने चारों ओर देखा… टूटा हुआ स्टूडियो था, पर नींव अभी थी। दीवारें भले ही धूल से सनी हों, लेकिन उन्होंने उसकी पसीने और जुनून से गढ़ी मेहनत को देखा था।

    तभी उसने एक स्टूल घसीटा, और उस पर बैठ गई। धीरे से अपने फोन का कैमरा ऑन किया और स्टूडियो की कुछ तस्वीरें लीं। हर टूटन, हर दरार, हर धब्बा।

    फिर इंस्टाग्राम पर पोस्ट किया –

    Chapter 1 – Rebuilding Ruins #RuhaniReturns

    वो जानती थी कि इसे देखकर कुछ लोग हँसेंगे, कुछ उंगली उठाएंगे। लेकिन इस बार वो डर नहीं रही थी क्योंकि सबसे बुरा गुजर चुका था।

    ————

    रात के तक़रीबन साढ़े ग्यारह बज चुके थे। अद्वैत थका-हारा लौटा, लेकिन जैसे ही घर में दाख़िल हुआ…. ड्रॉइंग रूम की हल्की-सी रौशनी और रूहानी की परछाईं उसकी नज़रों में आई। 

    वो अब भी जाग रही थी, सोफ़े पर बैठी, हाथों में एक पुराना स्केचबुक थामे… जैसे कोई खुद से बहस कर रहा हो।

    अद्वैत ने जूते उतारे, बैग रखा और धीरे से पूछा, “सोई नहीं अब तक?”

    रूहानी ने सिर उठाया। उसकी आंखों में नींद नहीं थी, बस एक दबी हुई उलझन थी। “नींद आ नहीं रही,” उसने हल्की सी मुस्कान के साथ कहा, “थोड़ा सोच रही थी।”

    अद्वैत ने पानी का गिलास लिया और वहीं पास बैठ गया। एक पल की चुप्पी रही।

    फिर रूहानी ने धीरे से कहा, “एक बात कहनी थी… मुझे तुमसे कुछ पैसे चाहिए।”

    अद्वैत ने चौंककर उसकी ओर देखा, “कितने?”

    रूहानी की आवाज़ थमी नहीं, “पच्चीस लाख रुपये… अभी।”

    कमरे में एक पल को ऐसा सन्नाटा छा गया जैसे दीवारें भी साँस रोककर वजह पूछना चाहती हो।

    ——- 

    क्या अद्वैत सच में मदद करेगा… या उसके सवालों में छिपा है कोई पुराना हिसाब?

    रूहानी ने जो माँगा… क्या वो सिर्फ पैसे थे? या कोई बीते रिश्ते की कीमत भी उसमें छुपी थी?

    और जब रूहानी ने कहा “अभी चाहिए”, तो क्या वो सिर्फ एक माँग थी… या किसी खतरे की आहट?

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  • अधूरी इबादत भाग~23

    अधूरी इबादत भाग~23

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    भाग~23 अधूरे फासले 

     

    अद्वैत हर सुबह की तरह ठीक समय पर उठा। बाथरूम से बाहर निकलकर उसने घड़ी की ओर देखा… 6:45। रोज़ की तरह सिलसिलेवार ढंग से उसने अपनी शर्ट प्रेस की, बालों में हल्का सा जेल लगाया, फिर अपने स्टडी टेबल पर फाइल्स को अच्छे से समेटकर बैग में रख लिया। वो एक ऐसा आदमी था जिसे अपने जीवन में हर चीज़ को अनुशासन में रखना पसंद था….. हर भाव, हर फैसला, हर दिनचर्या।

    लेकिन आज उसकी सुबह में एक अजीब-सी बेचैनी थी, जिसे वह खुद भी ठीक से समझ नहीं पा रहा था। शायद इसलिए क्योंकि घर में अब वो अकेला नहीं था… फिर भी संवाद की कोई उम्मीद नहीं थी।

    बाहर निकलने से पहले स्टडी रूम के ताले की चाबी घुमाकर लॉक किया और फिर अपने कमरे का।

    वह सीढ़ियों से उतर कर मुख्य दरवाजे की तरफ जा ही रहा था तभी उसकी नज़र रूहानी के कमरे की ओर गई। दरवाज़ा हल्का सटा हुआ था। न कोई हलचल, न कोई आहट।

    कुछ पल के लिए वह वहीं ठिठक गया। उसका हाथ उठे लेकिन दरवाजे तक पहुंच नहीं पाए।

    वह चाहता था कि वो दरवाज़ा खटखटाए। 

    शायद पूछे, “ठीक हो?”

    शायद कहे, “मैं जा रहा हूँ, ज़रूरत हो तो कॉल कर लेना।”

    लेकिन फिर तो कुछ उसे रोक लेता है….. एक दीवार जो दोनों के बीच अब तक खड़ी है।

    ये रिश्ता, जो सिर्फ कागज़ी है, कहीं वो ये न समझ बैठे कि वह उसके जीवन में कुछ अधिक दखल देने लगा है।

    या फिर ये डर भी था कि अगर उसने दरवाज़ा खटखटाया, और जवाब में खामोशी मिली, तो दिनभर वो खामोशी उसकी सांसों से चिपकी रहेगी।

    उसने खुद को रोका, गहरी सांस ली और दरवाज़े की ओर से मुड़कर सीधे बाहर की ओर बढ़ गया। जूतों की धीमी आवाज़ फर्श पर गूंजती रही और जैसे ही दरवाज़ा बंद हुआ, घर फिर से उसी सन्नाटे में डूब गया…. जहाँ अब दो लोग थे, लेकिन दो अलग-अलग दुनिया में।

    अद्वैत के मन में एक हल्की-सी खटास रह गई…. शायद उस अनकहे संवाद की जो कभी हो नहीं पाया। पर उसने उसे भी अपनी दिनचर्या की तरह तह करके जेब में रख लिया, और चल पड़ा एक और व्यस्त दिन की ओर।

    अद्वैत के जाने के बाद मीना जब अपने नियत समय पर रोज़ की तरह घर का दरवाज़ा खोलकर अंदर दाख़िल हुई, तो उसे सब कुछ सामान्य लगा…. हॉल में वही हल्की सी धूल, किचन की खिड़की से आती धूप की पतली लकीर और अद्वैत सर की अनुपस्थिति का शांत एहसास। 

    वो धीरे-धीरे झाड़ू लगाते हुए कमरे दर कमरे बढ़ती चली गई, और आखिर में वह उस कमरे के दरवाज़े तक पहुँची, जो कल तक खाली रहा करता था…. अब जहाँ रूहानी थी।

    दरवाज़ा आंशिक रूप से खुला था और मीना जैसे ही अंदर गई, उसकी नज़र सीधे बिस्तर पर लेटी रूहानी पर पड़ी। पहले तो वो ठिठक गई।

    रूहानी गहरी नींद में थी, पर उसकी करवटें बेचैनी बयां कर रही थीं। उसके माथे पर हलकी लटें चिपकी थीं, जैसे कोई सपना उसे भीतर से उलझाए हुए हो। 

    मीना की नज़र उसके गले के चारों ओर घूमे मंगलसूत्र पर गई, और फिर मांग में भरे सिंदूर पर टिक गई। उसके चेहरे पर अचानक एक धीमा-सा विस्मय था, फिर उसने खुद को संयत किया और रूहानी के पास आकर धीरे से बोली,

    “मैडम… दिन चढ़ने वाला है… क्या अब उठेंगी आप?”

    रूहानी उस आवाज़ से चौंकी, जो नींद के घने कोहरे में किसी हल्की दस्तक जैसी थी। कुछ पल तो उसे समझ ही नहीं आया कि कौन बोल रहा है। 

    आंखें पूरी तरह खुलीं तो सामने मीना को खड़ा पाया, हल्की मुस्कराहट के साथ, जैसे उसने नींद से किसी सपने को जगा दिया हो।

    “मैडम, दिन चढ़ गया है… उठ जाइए?”

    रूहानी झेंप गई, हड़बड़ा कर उठकर बैठ गई, बाल बिखरे हुए थे, चेहरा अभी तक नींद और उलझन से भरा था। कुछ देर को वो बस देखती रही मीना की ओर, फिर खुद को संभालते हुए धीमे स्वर में बोली, “तुम साफ-सफाई कर लो… और मेरे लिए एक कॉफी बना देना। मैं अभी आती हूँ।”

    मीना ने सिर हिलाया, “जी मैडम” और काम में लग गई।

    रूहानी कमरे से बाहर आई तो अब वो पहले जैसी नहीं थी। कल जो तूफान आया था उसकी लहरें अब भी उसकी आंखों में थीं, पर उनमें अब एक संकल्प की परत भी थी। 

    उसने सफेद कुर्ता पहना था, सिंपल, लेकिन उसके चेहरे की गंभीरता और आंखों की थकान उसे और गहराई देती जा रही थी। जब वो किचन में पहुँची तो मीना वहां झाड़ू लगा रही थी।

    “तुम्हारी बेटी का बर्थडे कब है?” रूहानी ने अचानक पूछा, सोफे पर बैठते हुए।

    मीना ने चौंक कर उसकी ओर देखा, उसे याद आया कि उसने ही रूहानी को बोला था अपनी बेटी के लिए डिज़ाइनर कपड़े बनाने के लिए।

    इसके साथ ही मीना फिर से आंखों में चमक लिए मुस्कुराई, “बस एक हफ्ते में, मैडम।”

    “ठीक है, आज शाम को उसे लेते आना… उसका नाप लेना है।” रूहानी का लहजा स्थिर था, लेकिन उस स्थिरता में अपनापन था।

    मीना अब कॉफी बनाने लगी, लेकिन उसके चेहरे पर अब सवालों की परछाइयाँ उतर आई थीं। वो अब तक खुद को रोक रही थी, पर अब उससे रहा नहीं गया। 

    पहले उसने कॉफी का मग रूहानी को दिया, फिर अपने लिए भी एक पुराना मग निकाल कर उसमें कॉफी डाली और फर्श पर बैठ गई। 

    इस वक्त वो मेड नहीं, एक औरत थी… जो एक दूसरी औरत की उलझनों को समझना चाहती थी।

    “मैडम…” उसने धीरे से पूछा, “आपकी शादी कब हुई? और कहीं हमारे अद्वैत सर से तो नहीं हुई?”

    रूहानी के हाथ ठिठक गए। उसने नजर झुका लिया, जैसे इस सवाल का जवाब किसी भारी अलमारी के पीछे छिपा हो। उसके गले में लटकता मंगलसूत्र हल्की थरथराहट के साथ उसकी सांसों की लय में हिल रहा था।

    “बहुत जल्दी में हो गई… बताने का समय नहीं मिला,” रूहानी ने आखिरकार धीमे स्वर में कहा।

    मीना के चेहरे पर अब संदेह नहीं, पुष्टि थी। “आपके पति अद्वैत सर ही हैं न?”

    रूहानी ने कुछ नहीं कहा, बस धीमे से ‘हाँ’ में सिर हिला दिया। लेकिन उसने महसूस किया कि उसके भीतर जैसे कोई सिहरन दौड़ गई थी। 

    ‘पति’ शब्द उसके लिए अब भी अजनबी-सा था। वो अब भी इस रिश्ते को पूरी तरह महसूस नहीं कर पाई थी…. कागज़ पर नाम जुड़ने से आत्मा का बंधन नहीं बनता, ये बात उसके अंदर गूंज रही थी।

    मीना की आंखों में हल्की चमक उभरी, जैसे कोई पहेली सुलझ गई हो।

    वह एक हल्की मुस्कान के साथ बोली, “मैडम… माफ कीजिएगा, पर एक बात कहूँ?”

    रूहानी जो अब तक खिड़की की तरफ देखती हुई खोई हुई थी, चौंककर उसकी ओर मुड़ी, “हां, बोलो मीना।”

    मीना ने आंखें नीचे किए हुए धीरे से कहा, “अद्वैत सर को ज़रूर आपसे पहली नज़र में प्यार हो गया होगा… वरना वो तो आज तक किसी औरत को आंख उठाकर भी नहीं देखते थे। उनकी पहली पत्नी के जाने के बाद तो जैसे उनका दिल पत्थर हो गया था।”

    मीना की आवाज़ में एक भोली सच्चाई थी, जो सीधे रूहानी के भीतर कहीं गहराई तक उतर गई। उसकी आँखें पलभर को भी झपकी नहीं और न ही वह उसकी बातों पर मुस्कुरा नहीं सकी। 

    वो केवल कॉफी के कप में अपनी उंगलियों को लपेटे बैठी रही। उसकी आंखें थोड़ी दूर, किसी अदृश्य दीवार को घूर रही थीं।

    तभी मीना पूछ बैठी, “लेकिन आप नीचे के कमरे में क्यों सो रही थीं, सर का कमरा तो ऊपर है।”

    रूहानी की उंगलियाँ अचानक कॉफी के मग पर जकड़ गई और उसकी आंखें मीना की तरफ उठी…. चुप, लेकिन कुछ छिपाती हुईं।

    एक पल को कमरे की हवा जैसे ठहर सी गई……..

    ——-

    अब रूहानी मीना को क्या जवाब देगी?

    क्या अद्वैत के दिल में कोई अनकहा दर्द छुपा है, जो रूहानी को नहीं दिखता?

    उस दरवाज़े के पीछे छिपा क्या कोई राज़ है, जिसे खोलने की हिम्मत कोई नहीं कर पा रहा?

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    लिखकर रूह छूने की कोशिश….. 🥹🥹

  • अधूरी इबादत भाग~22

    अधूरी इबादत भाग~22

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

    भाग~22 रिश्तों की खामोश लौ

     

    अद्वैत अब भी रूहानी का हाथ थामे हुए था, उसकी पकड़ में एक अजीब सी दृढ़ता थी… जैसे वो दुनिया से कह देना चाहता हो कि अब ये साथ अधूरा नहीं रहेगा, चाहे रिश्ता कागज़ों पर लिखा हो या बस हालातों से बंधा हो। वो दोनों जैसे ही कार के पास पहुँचे, पीछे से यश की आवाज़ आई—हांफती, लेकिन साफ़ और भावनाओं से भरी हुई।

    “दीदी!” यश ने पुकारा। उसके हाथ में एक बड़ा सा नीला बैग था।

    रूहानी और अद्वैत दोनों एक साथ मुड़े। रूहानी ने देखा…. यश धीरे-धीरे उनकी ओर आ रहा था, उसकी आंखों में चमक थी, लेकिन चेहरे पर अजीब-सी गंभीरता भी थी, जो उसके उम्र से बड़ी लग रही थी। 

    यश ने नीले बैग को रूहानी की ओर बढ़ाया। “ये लो दीदी,” उसने नरम आवाज़ में कहा, “आपके ड्रेस डिज़ाइनिंग का सारा सामान है इसमें।”

    रूहानी ने हैरानी से बैग को देखा। उसकी आंखें यश के चेहरे को पढ़ने लगीं, लेकिन कुछ कह नहीं पाईं। उसकी उंगलियाँ हौले से उस पुराने बैग के किनारे पर चली गईं, जैसे वो उसकी आत्मा की कोई भूली-बिसरी परत हो।

    यश ने रुककर साँस ली, फिर कहा, “जब पिछली बार आप घर से चली गई थीं, उस दिन… जब माँ-पापा आप पर गुस्सा हुए थे, तो आपके जाने के बाद उन्होंने आपके सारे कपड़े और आपसे जुड़े सारा सामान सबकुछ एक बैग में भरकर बाहर फेंक दिया था।”

    “मैं… आपके कपड़े और बाकी सामान तो नहीं बचा पाया,” यश की आवाज़ टूटने लगी, “लेकिन जब पापा आपकी चीजें फेंक रहे थे, तो मैंने आपकी स्केचबुक, कुछ फैब्रिक सैंपल्स, आपकी डिज़ाइन की हुई कुछ ड्रेसेस के नमूने… सब कुछ चुपचाप इस बैग में भर लिया था। तबसे ये मेरे पास ही था। आज लगा, आपको देना चाहिए। ये आपका सपना है ना दीदी, इससे जुड़ी हर चीज़…”

    वो चुप हो गया।

    रूहानी का कंठ भर आया। उसने हौले से बैग को अपने हाथों में लिया, जैसे कोई माँ अपनी खोई हुई संतान को गले लगाती है। उसकी उंगलियाँ बैग की ज़िप पर फिसलीं, जैसे उसे यकीन नहीं हो रहा हो कि जो वो पकड़े हुए है, वो उसका है… उसका सपना, उसका जुनून, उसका अस्तित्व।

    अद्वैत ने एक पल के लिए रूहानी की ओर देखा…. उसकी आंखें अब भीगी हुई थीं, लेकिन उनमें एक अजीब सी चमक थी। जैसे उस बैग ने उसे फिर से याद दिलाया हो कि वो सिर्फ एक “किसी की पत्नी” नहीं, बल्कि अपने आप में भी कुछ है। उसका एक नाम है, एक पहचान है, जो इस रिश्ते से पहले की भी थी।

    रूहानी ने वह बैग जमीन पर रख दिया और बिना कुछ कहे यश को गले लगा लिया। ये सिर्फ़ एक भाई-बहन का आलिंगन नहीं था, ये उन सपनों की रक्षा का शुक्रिया था, जिनकी कीमत किसी ने नहीं समझी… सिवाय यश के।

    अद्वैत एक कोने में खड़ा ये सब देख रहा था। उसके चेहरे पर कोई प्रतिक्रिया नहीं थी, लेकिन उसके सीने में कुछ दरक रहा था। वो जानता था, रूहानी की ये मुस्कान, उसका ये कांपता गला… ये सब यूँ ही नहीं था। किसी ने उसके सबसे गहरे हिस्से को छुआ था…. उस हिस्से को जिसे समाज ने कुचलने की कोशिश की थी।

    रूहानी ने एक लंबी, भारी साँस ली, जैसे उसकी आत्मा खुद को भीतर से संवार रही हो। फिर उसने यश के दोनों गालों को अपने हाथों में भर लिया। उसकी आँखें अब भी भीगी थीं, लेकिन उनमें एक स्पष्टता थी, एक दृढ़ता जिसे कोई माँ भी पहचान जाती।

    “यश,” उसकी आवाज़ धीरे लेकिन बेहद साफ़ थी, “अपनी दीदी की बात मानोगे न?”

    यश ने बिना झिझक के जवाब दिया, “हाँ… ज़रूर।”

    रूहानी मुस्कुराई नहीं, पर उसकी आँखों में एक संतोष झलक पड़ा। फिर वो झुक कर धीरे से बोली, “तुमसे माँ-पापा बहुत प्यार करते हैं। उन्होंने तुझे पाने के लिए कितनी मिन्नतें की थीं… तेरा जन्म उनके लिए किसी चमत्कार से कम नहीं था। तू उनके दुलारे बेटे है। इसलिए अब… मुझसे कोई संपर्क मत करना। नहीं तो… वो तेरा फ़ोन भी छीन लेंगे, और मैं नहीं चाहती कि मेरी वजह से तुझे डाँट पड़े।”

    यश की आँखों में आँसू और भी तेजी से उतर आए। उसकी ठुड्डी काँप रही थी। 

    रूहानी ने अपनी बात आगे बढ़ाई, “तुम्हें अभी बहुत कुछ करना है, बहुत आगे जाना है। अगले साल तुम्हारे दसवीं के एग्ज़ाम हैं न? अच्छे से पढ़ाई करना। जब तुम मेडल जीतोगे न, तो मैं खुद तुमसे मिलने आऊंगी। लेकिन अभी के लिए… किसी और चीज़ में ध्यान मत भटकाना और जो तुम्हारा शौक है, उसे जरूर आगे बढ़ाना।” 

    “द…दीदी…” यश के गालों पर आँसू ढुलक पड़े, उसने रूहानी की कलाई थाम ली, “ऐसा मत बोलो… मुझे अपने से दूर मत करो… मैं बहुत अकेला हो जाऊंगा…”

    रूहानी ने खुद को संयमित किया। उसके कंधे भारी हो चुके थे लेकिन आंखें अब भी बहने से इनकार कर रही थीं।

    रूहानी ने उसे धीरे से थपथपाया, “मैं भी तुम्हें बहुत प्यार करती हूँ, यश। इसलिए तुम्हें ये सब कहना पड़ रहा है।”

    उसी वक्त, अद्वैत ने कार का ड्राइविंग सीट वाला दरवाजा खोला और उसमें बैठ गया। उसकी मौजूदगी दोनों के लिए एक मजबूत सहारा बन गई थी। 

    रूहानी ने अद्वैत को बैठते हुए देखा, फिर यश की ओर देखते हुए बोली, “जा, भाई। माँ-पापा गुस्सा हो जाएंगे।”

    यश ने वो नीला बैग उठाया और कार के बैक सीट पर रख दिया। उसने एक बार फिर रूहानी को देखा, फिर बोला, “अलविदा, दीदी। जल्दी मिलेंगे।”

    रूहानी ने बस सिर हिलाकर जवाब दिया और उसने अपने छोटे भाई को एक बार फिर गले लगा लिया, अपने दिल में ये दुआ करते हुए कि ये अलविदा एक दिन फिर से मिलने का रास्ता बनाए।

    जब यश दूर जाने लगा, तो रूहानी और अद्वैत कार में बैठे। अद्वैत ने इंजन स्टार्ट किया और कार धीरे-धीरे गाड़ी को मोड़ती हुई निकल पड़ी उस सफर पर जहां कोई मंजिल नहीं थी…. या शायद मंज़िल अब उसी यात्रा में ही छुपी थी। 

    सफर के दौरान कार के भीतर एक बोझिल-सी खामोशी पसरी हुई थी। जैसे कोई पुराना गीत धीरे-धीरे बंद हो गया हो, लेकिन उसकी गूंज अभी भी दिल के किसी कोने में बाकी हो। दोनों की सांसें चल रही थीं, मगर जैसे शब्दों की कोई ज़रूरत नहीं बची थी।

    अद्वैत कार ड्राइव कर रहा था, उसकी निगाहें सड़क पर थीं, लेकिन उसका मन अंदर ही अंदर भटक रहा था….. उलझनों, सवालों और किसी अनकहे बोझ से भरा हुआ।

    रूहानी अपनी सीट पर खिड़की से सिर टिकाए बैठी थी, उसकी आंखें बंद थीं, लेकिन नींद उनसे कोसों दूर थी। वो कुछ देखना नहीं चाहती थी, शायद इस दुनिया से कुछ देर के लिए खुद को काट देना चाहती थी। हवा उसके चेहरे से टकरा रही थी, पर कोई ठंडक नहीं पहुंचा पा रही थी…. उसके भीतर की तपन अब और किसी छांव से बुझ नहीं सकती थी।

    अद्वैत ने एक बार नजरें उठाकर उसकी ओर देखा। वो कुछ कहना चाहता था शायद, कुछ ऐसा जो उसके मन में काफी देर से अटका था, पर फिर खुद को रोक लिया। इस वक़्त, कोई भी शब्द जैसे ज़ख्मों को कुरेदने जैसा होता। दोनों ही उस खामोशी को तोड़ना नहीं चाहते थे जो इस वक्त उनके बीच एक नाज़ुक पुल बन गई थी।

    जब कार अद्वैत के अपार्टमेंट के नीचे आकर रुकी, तब तक शाम ढल चुकी थी। सड़क किनारे पीली रोशनी में पत्तों की परछाइयाँ झूल रही थीं। शहर की भीड़-भाड़ से दूर, ये इलाका थोड़ा शांत था….. शायद उतना ही जितना इस वक़्त रूहानी के मन को चाहिए था।

    अद्वैत पहले बाहर निकला, फिर पीछे की सीट से चुपचाप रूहानी का बैग उठाया। वह कुछ नहीं बोला, सिर्फ उसके निकलने का इंतज़ार करता रहा। रूहानी धीरे-धीरे दरवाज़ा खोलकर उतरी, मानो किसी अनजाने देश की ज़मीन पर कदम रख रही हो….. एक नई शुरुआत, एक अनजाना ठिकाना, एक अनकहा रिश्ता।

    अद्वैत अपार्टमेंट की ओर बढ़ा, और बिना किसी औपचारिकता के दरवाज़ा खोलकर सीधा बैग किचन से सटे एक कमरे में रख दिया। सारा सामान रखने के बाद वह हाल में लौट आया, जहाँ रूहानी अब भी दरवाज़े के पास खड़ी थी, थोड़ी हिचकिचाहट, थोड़ी थकावट और थोड़ी सी उलझन के साथ।

    “फ्रेश हो जाओ,” अद्वैत ने कहा, उसकी आवाज़ में न कोई अधिकार था, न कोई औपचारिकता….. बस एक सादा-सा ख्याल, “और खाने के बाद ही सोना, ठीक है?”

    रूहानी थोड़ी चौंकी। उसने नजर उठाकर उसकी तरफ देखा।

    अब जबकि वो दोनों अकेले थे,जब कोई तमाशबीन नज़र नहीं थी, जब कोई समाज का डर भी सिर पर नहीं था, तब भी अद्वैत उसकी फिक्र क्यों कर रहा था?

    सिर्फ एक कानूनी करार का साथी होने के बावजूद, वह इतनी संजीदगी से पेश क्यों आ रहा था?

    उसके चेहरे की उलझन अद्वैत की नजर से छुप नहीं सकी। वह समझ गया कि रूहानी के मन में क्या चल रहा है। इसलिए बिना कोई सवाल उठने दिए, उसने खुद ही कहा, “मीना ने खाना बनाकर रख दिया था। और वैसे भी, दोपहर से अभी तक हमने कुछ खाया नहीं है। मैं भी फ्रेश होकर आता हूँ।”

    इतना कहकर वह सीढ़ियाँ चढ़कर अपने कमरे की ओर चला गया, जैसे उसे रूहानी को किसी उत्तर का बोझ नहीं देना था, बस उसकी थकान समझनी थी।

    रूहानी धीरे से कमरे की ओर बढ़ी, जो अद्वैत ने उसके लिए तय किया था। कमरे में रखी चीज़ें बिलकुल करीने से थीं, एक छोटी-सी अलमारी, एक साफ़-सुथरा बिस्तर, और एक कोने में रखा छोटा-सा नाइट लैम्प।

    उसने बैग की चेन खोली और हल्के हाथों से अपना सामान देखने लगी… वही कतरनें, वही डिजाइनिंग के स्केच, कुछ अधूरी नोटबुक्स और यादों से भरी हुई सिलवटें।

    कमरे की खिड़की से बाहर झांकते हुए वो बस बैठ गई—चुपचाप। उसकी पलकों पर आज कोई सपना नहीं था, बस एक एहसास था, कि शायद उसे पहली बार किसी ने बिना कुछ कहे, पूरी तरह समझ लिया था।

    उसका दिल तेज़ी से धड़क रहा था। न वो किसी प्रेम में थी, न कोई लगाव जागा था अभी तक। ये रिश्ता तो अब भी बस कागज़ पर दर्ज था, एक समझौता, एक अनुबंध। मगर इस समझौते में अद्वैत ने जो शालीनता, जो आदर और जो स्नेह बिना बोले दे दिया था, वह रूहानी के भीतर एक हल्की सी लौ जला गया था।

    एक ऐसी लौ, जो शायद आने वाले समय में उम्मीद बन सकती थी… या फिर सिर्फ एक याद। मगर इस वक़्त, वह लौ ही उसके लिए काफी थी।

    ——-

    क्या अद्वैत वाकई सिर्फ एक समझौते का हिस्सा है… या उसके खामोशी में कोई अनकहा इकरार छुपा है?

    क्या रूहानी उस लौ को पहचान पाएगी, जो उसके भीतर धीमे-धीमे जलने लगी है?

    और जब अतीत की परछाइयाँ फिर लौटेंगी, तब क्या ये नाज़ुक सा सुकून टिक पाएगा… या बिखर जाएगा एक और बार?

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    लिखकर रूह छूने की कोशिश….. 🥹🥹

  • अधूरी इबादत भाग~20

    अधूरी इबादत भाग~20

    पढ़ने का समय : 9 मिनट

     

    भाग~20 तोड़ डाली परंपराएं

     

    जानकी चौहान, भानु प्रताप और उनके साथ बैठे मेहमान…. सभी की नज़रें एक साथ मेन गेट पर टिक गईं। सबने एक ही पल में देखा…. रूहानी, एक अनजान आदमी के साथ, वरमाला पहने, सिंदूर लगाए, गले में मंगलसूत्र डाले।

    कुछ क्षणों तक बस एक सन्नाटा था। फिर वो सन्नाटा जैसे किसी ने चीख से तोड़ दिया हो। जानकी की आँखों में विश्वास टूटने की दहशत थी, भानु प्रताप की मुट्ठियाँ सख्त हो गई थीं, और मेहमानों की फुसफुसाहटें एक भरी सभा में ज्वालामुखी जैसी गूंज रही थीं।

    रूहानी और अद्वैत अब गेट के भीतर कदम रख चुके थे। दोनों का चेहरा बाहर से शांत और भावहीन दिख रहा था, लेकिन भीतर एक तूफान उमड़ रहा था। रूहानी की हथेलियाँ ठंडी थीं, उसकी साँसें तेज़ चल रही थीं, हर पल उसे लग रहा था जैसे उसका दिल सीने से बाहर आ जाएगा। 

    उसने हिम्मत करके अपने पापा की आँखों में देखना चाहा, पर उसका कलेजा कांप उठा। बस इसी क्षण से वो हमेशा से डरती आई थी और अभी यह पल किसी डरावने सपने की तरह उसके सामने था। उसने हमेशा से अपने पिता की स्वीकृति, उनका स्नेह और उनका गर्व चाहा था, लेकिन आज वो भीतर ही भीतर जानती थी कि शायद ये कभी नहीं मिलेगा, खासकर इस फैसले के बाद। 

    अद्वैत, रूहानी के ठीक बगल में खड़ा था, शांत, संयमित लेकिन बेहद सतर्क। उसकी आँखें चारों ओर के माहौल को स्कैन कर रही थीं, लोगों के चेहरों पर आते-जाते भावों को पढ़ रही थीं। वो जानता था कि ये उसके जीवन का सबसे महत्वपूर्ण क्षण है, शायद रूहानी के लिए उससे भी ज़्यादा।

    ये सिर्फ दो लोगों के स्वतंत्र विवाह की बात नहीं थी, ये दो अलग-अलग दुनियाओं, दो परिवारों के मूल्यों, परंपराओं, उम्मीदों और सपनों का एक ज़ोरदार टकराव था।

    उसने रूहानी की तरफ देखा, उसकी आँखों में डर और दर्द की एक झलक थी, लेकिन साथ ही होंठों के कसे होने और कंधों की दृढ़ता में एक अटूट संकल्प भी था।

    वो जानता था कि उसे इस समय उसके साथ खड़ा रहना है, न केवल शारीरिक रूप से, बल्कि उसकी हिम्मत बनकर, एक चट्टान की तरह।

    “ये क्या है?” भानु प्रताप की भारी और रौबदार आवाज़ ने सबकी बातचीत पर ब्रेक लगाया। उनकी आवाज़ में सिर्फ सवाल नहीं था, उसमें एक अधिकार था, एक चेतावनी थी। उनकी नज़रें सीधी अद्वैत पर टिकी थीं।

    “कौन है ये?” भानु प्रताप की ऊँगली अद्वैत की ओर उठी। उनकी आवाज़ में गुस्सा और अविश्वास साफ झलक रहा था। जैसे कोई अजनबी, कोई अनचाहा व्यक्ति उनकी दुनिया में घुस आया हो।

    यश, रूहानी का छोटा भाई, जो अब तक किनारे खड़ा इस अप्रत्याशित दृश्य को हतप्रभ देख रहा था, धीरे से आगे आया। उसकी आवाज़ में झिझक थी, लेकिन शब्दों में सच्चाई थी। बोला, “पापा, ये अद्वैत अवस्थी हैं… दीदी के पति।” 

    यश हमेशा से रूहानी का समर्थक रहा था, उसकी बातों को सुनता था, लेकिन आज वो भी अपने पिता के गुस्से से डरा हुआ था। वो जानता था कि उनके पिता का गुस्सा कितना भयानक और अनियंत्रित हो जाता है।

    “पति…?” जानकी की आवाज़ मानो थम गई थी, जैसे शब्दों ने गले में ही दम तोड़ दिया हो। उनकी आँखों में सिर्फ सवाल नहीं थे…. वहाँ एक टूटा हुआ भरोसा था, एक परंपरा की अनसुनी पुकार, और एक ऐसी टीस जो सदियों से हर माँ की आँखों में पलती रही है।

    उन्होंने रूहानी के लिए हमेशा वही देखा था जो हर रूढ़िवादी परिवार देखता है…. एक ऐसा जीवनसाथी जिसे उसके माँ – बाप चुनें, जो जात-पात, कुल-परंपरा, और खानदान की इज़्ज़त को सबसे ऊपर रखे। 

    रूहानी से कभी पूछा नहीं जाना था कि वो क्या चाहती है, क्योंकि उस घर में बेटियों से सवाल नहीं पूछे जाते….. उन्हें बस मौन स्वीकृति देना सिखाया जाता है।

    उनके लिए ‘शादी’ कोई प्रेम कथा नहीं, बल्कि एक सामाजिक अनुबंध थी…. जहाँ भावनाओं से ज़्यादा महत्व घर की मर्यादा का था। जानकी को यकीन था कि रूहानी भी वही करेगी जो उसकी माँ, उसकी नानी, और उन तमाम औरतों ने किया…. चुपचाप सर झुका कर उनकी पसंद को अपना भाग्य मान लेगी।

    और ये अद्वैत… कौन था ये? कहाँ से आया था? वो उनके बुने हुए सपनों से बिल्कुल अलग था, एक अनदेखी राह का पथिक था।

    कमल, वो लड़का जिसे रूहानी के पति के रूप में उसके माँ – बाप के द्वारा चुना गया था, पीछे खड़ा था। उसके चेहरे पर एक व्यंग्यात्मक और कुटिल मुस्कान थी। वो रूहानी को हमेशा से अपनी संपत्ति समझता था, एक ऐसी लड़की जो उसके रुतबे, उसकी सामाजिक स्थिति को और बढ़ाती। 

    आज, उसे लग रहा था जैसे वो संपत्ति, वो मान-सम्मान सब कुछ उससे छीन लिया गया हो, किसी ने उसे भरी महफ़िल में नीचा दिखा दिया हो। उसके अंदर अपमान और गुस्से का लावा उबल रहा था।

    “हमने शादी कर ली है,” रूहानी ने धीरे से कहा, उसकी आवाज़ में एक हल्की सी थरथराहट थी, “क़ानूनी तौर पर…” उसकी आवाज़ में थोड़ी सी हिम्मत थी, जो उसने अपने अंदर बची आखिरी ताक़त से बटोरी थी, लेकिन वो जानती थी कि ये काफ़ी नहीं है। उसके शब्द हवा में तैरते हुए से लगे और फिर सन्नाटे में खो गए।

    “क़ानूनी?” भानु प्रताप की हँसी बेहद कड़वी और तीखी थी, जैसे किसी घाव पर नमक छिड़क दिया गया हो। 

    “बिना बताये? बिना हमारी सहमति के? और आज अचानक तुम यहाँ ये तमाशा दिखाने आ गई?” उनकी आँखों से जैसे आग बरस रही थी, माथे पर नसें तन गई थीं। उन्हें लगा था जैसे उनकी बेटी ने उनके अधिकार को, उनके निर्णय को, उनके अस्तित्व को ही चुनौती दे दी हो।

    कमल ने इस मौके का फायदा उठाते हुए ताना मारा, “तमाशा नहीं तो और क्या है? सबके सामने नाक कटवा दी। अपने खानदान की इज़्ज़त मिट्टी में मिला दी।” उसकी आवाज़ में ज़हर घुला हुआ था, जैसे वो इस अपमान का बदला शब्दों से ले रहा हो।

    कमल के पिता ने भी अपनी आवाज़ मिलाई, उनके चेहरे पर भी घोर निराशा और गुस्सा था। “हमने तो समझा था, हमें एक संस्कारी बहू मिलेगी, जो घर की लक्ष्मण रेखा समझे। पर ये क्या निकला? अपने फ़ैसले खुद लेने वाली… हमारे घर की लड़कियों में ऐसा कभी नहीं हुआ।” उनके शब्द केवल रूहानी पर नहीं, बल्कि जानकी और भानु प्रताप पर भी एक कटाक्ष थे, जैसे उनकी परवरिश पर सवाल उठा रहे हों।

    रूहानी के कानों में ये बातें तीर की तरह चुभ रही थीं। उसे लग रहा था जैसे हर कोई उसे अपराधी ठहरा रहा हो। वो हमेशा से अपने परिवार का सम्मान करती थी, उनकी बातों को मानती थी, लेकिन आज उसे लग रहा था जैसे उसने सबसे बड़ा गुनाह कर दिया हो, ऐसा गुनाह जिसकी कोई माफ़ी नहीं थी। 

    उसकी आँखों में आँसुओं का सागर उमड़ रहा था, पर उसने उन्हें किसी तरह रोक रखा था। वो जानती थी, अगर आज रोई, अगर आज कमज़ोर पड़ी, तो ये लोग उसे हमेशा के लिए कमज़ोर मान लेंगे और उसे पूरी ज़िंदगी सिर्फ अपनी सफाई ही देनी पड़ेगी।

    अद्वैत ने जैसे ही कमल और उसके पिता की बातें सुनी तो उसका खून खौल उठा। वो अब और चुप नहीं रह सका। उसने उनलोगों की तरफ मुड़कर पहली बार कुछ कहा। उसकी आवाज़ में ठहराव था, शांति थी, लेकिन एक ऐसी दृढ़ता थी जिसने माहौल की सारी फुसफुसाहटों को दबा दिया। 

    “ये तमाशा नहीं है,” अद्वैत ने कहा, “ये ज़िम्मेदारी है। रूहानी ने कोई गुनाह नहीं किया है। उसने अपनी ज़िंदगी का सबसे बड़ा फ़ैसला लिया है, अपनी ख़ुशी का फ़ैसला और मैं उसके साथ हूँ। हम दोनों ने अपनी मर्ज़ी से, एक-दूसरे से शादी की है और हम अपने फ़ैसले के लिए किसी से माफ़ी नहीं मांगेंगे।”

    उसने फिर भानु प्रताप की तरफ देखा, उसकी आँखों में कोई डर नहीं था, सिर्फ़ एक सीधी, अडिग चुनौती थी। “और जहाँ तक बात इज़्ज़त की है, इज़्ज़त किसी इंसान के पहनावे से नहीं, किसी के गोत्र या खानदान से नहीं, इज़्ज़त किसी इंसान के फ़ैसले से नहीं घटती, उसकी इज़्ज़त उसके कर्मों से होती है। 

    रूहानी ने आज जो हिम्मत दिखाई है, जो साहस दिखाया है, वो काबिले-तारीफ़ है। आप लोगों को उस पर शर्मिंदा नहीं, उस पर गर्व होना चाहिए।” अद्वैत के शब्द तीखे और सच्चे थे, उन्होंने माहौल में एक नई लहर पैदा कर दी।

    रूहानी ने अद्वैत की तरफ देखा, उसकी आँखों में अविश्वास झलक रहा था। क्या उसने सच में ये कहा? वो, जो अब तक बस एक औपचारिक रिश्ते का हिस्सा था, आज कुछ ऐसा कह गया था जो रूहानी ने कभी उम्मीद नहीं की थी….. इस कॉन्ट्रैक्ट मर्रिज के भीतर भी कोई उसके दर्द को समझ सकता है। ये बात उसके लिए अजीब भी थी और अप्रत्याशित भी। उसे समझ नहीं आ रहा था कि अद्वैत सचमुच उसकी फिक्र करता है, या ये भी किसी शर्त का हिस्सा है।

    भानु प्रताप ने पलटकर अपने दोस्तों की तरफ देखा, जो अब भी फुसफुसा रहे थे, सर हिला रहे थे, जैसे कोई घटिया नाटक देख लिया हो। उनके चेहरे पर तिरस्कार, हैरानी और मज़ाक का मिश्रण था।

    “इतनी भी बेहयाई कोई कैसे कर सकता है, अब तो रीत-रिवाज़ भी इनसे डरने लगे होंगे,” कमल की माँ ने खून खौलाते लहजे में कहा, जैसे उसके संस्कारों पर किसी ने सीधा वार किया हो।

    रूहानी की माँ जानकी चौहान के लिए ये सब बर्दाश्त कर पाना, ये दृश्य देखना आसान नहीं था। सालों से जिस बेटी को अपनी आंखों के सामने पाला था, जिसे हर रिश्ते के लिए, हर मर्यादा के लिए तराशा था, जिसे कुल की प्रतिष्ठा का प्रतीक माना था, वो आज एक अजनबी के साथ वरमाला और सिंदूर में लिपटी खड़ी थी…. बिना बताये, बिना पूछे, बिना समझाए। 

    समाज की बातें, मेहमानों की फुसफुसाहटें जो अब ज़ोर पकड़ने लगी थीं, और पति भानु प्रताप की तनी हुई भौंहें और अपमानित चेहरा…. इन सबके बीच जानकी का दिल तड़प उठा। उसकी आँखों के सामने उसके सारे सपने बिखरते नज़र आ रहे थे।

    वो धीरे-धीरे रूहानी के पास आई, उसका चेहरा देखा… उस चेहरे पर न कोई ग्लानि थी, न कोई शर्म, बस एक गहरा सन्नाटा था, एक थका हुआ भाव था जैसे वो बहुत लंबी लड़ाई लड़कर आई हो और वही सन्नाटा उसकी माँ की सहनशक्ति तोड़ गया। जिस बेटी से उसे उम्मीद थी कि वो आँखों में आँसू लेकर माफ़ी मांगेगी, वो बेटी शांत खड़ी थी, जैसे उसने कोई गलती की ही न हो।

    “शर्म नहीं आई तुझे?” जानकी ने धीमे, पर कड़वे शब्दों में कहा। उसकी आवाज़ में माँ का प्यार नहीं, अपमानित स्त्री का गुस्सा था। “हमारे जीते जी तूने सब खत्म कर दिया। हमारी इज़्ज़त, हमारा नाम… सब मिट्टी में मिला दिया।”

    रूहानी एक पल को स्तब्ध खड़ी रही। उसकी आँखें भर आई थीं, लेकिन चेहरा कठोर था। वह कुछ कहना चाहती थी। होंठों तक आते हुए शब्द काँप रहे थे।

    “माँ… मैं बस—”

    जानकी ने बात पूरी होने से पहले ही रूहानी के गाल पर एक ज़ोरदार तमाचा जड़ दिया। उस एक थप्पड़ की गूंज पूरे आँगन में फैल गई, हवा में गूंजती रही, जैसे समय ठहर गया हो। हर कोई सन्न रह गया।

    —————

    क्या वाकई ये थप्पड़ सिर्फ एक गाल पर पड़ा था… या फिर एक पीढ़ी के सपनों, भरोसे और इज्ज़त पर भी?

    अब क्या रूहानी फिर खड़ी हो पाएगी… या ये थप्पड़ उसकी हिम्मत की आखिरी दरार बन जाएगा?

    अद्वैत… क्या वो अब भी उसका हाथ वैसे ही थामे रखेगा, या इस तमाचे की गूंज उसके वादों को भी डगमगा देगी?

     

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  • अधूरी इबादत भाग~17

    अधूरी इबादत भाग~17

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    भाग~17 शादी… मगर नकली

     

    रात के खाने के बाद जब सब अपने-अपने कमरों में चले गए थे, तब रुहानी चुपचाप छत पर आकर बैठ गई थी। ऊपर आसमान बिलकुल शांत था, लेकिन उसके भीतर हलचल थी… ऐसी जैसे ठहरे पानी में अचानक कोई कंकर गिरा हो। 

    हवा में हल्की ठंडक थी, और चाँद की रोशनी उसकी पलकों पर पड़ी तो उसकी सोच और भी गहराने लगी। वो अपने पैरों को सिकोड़े, घुटनों को बाँहों में भरे, बस छत के कोने में बैठी थी, जैसे किसी सवाल की तलाश में हो, जो खुद उसी के भीतर छुपा हो। 

    रात की नमी, नीले आसमान का सूनापन, और शहर की दूर होती हलचलें…. सब जैसे मिलकर कोई अनकहा गीत गा रही थीं, जिसमें हर सुर रुहानी की बेचैनी को छू रहा था।

    यश की कही सारी बातें अब भी उसके कानों में गूंज रही थीं… एक-एक लफ़्ज़ जैसे मन के अंदर गहराई तक उतर गया था। अद्वैत ने जो कहा था, यश ने सब कुछ ज्यों का त्यों सुना दिया था, लेकिन उस सच्चाई में भी कहीं न कहीं कोई परतें छुपी थीं, जो रुहानी को भीतर से बेचैन कर रही थीं।l

    “आख़िर वो मुझसे शादी क्यूँ करना चाहता है?” – ये सवाल उसकी सोच में बार-बार एक टकराते हुए समुंदर की तरह उठ रहा था, जिसका कोई किनारा नजर नहीं आ रहा था। उसकी ज़िंदगी के सबसे कठिन लम्हे में उसने उसे बचाया था, ये बात सच थी…. लेकिन क्या किसी की जान बचाने भर से कोई रिश्ता इतना गहरा हो सकता है कि वो शादी तक पहुंच जाए? नहीं… रुहानी का दिल मानने को तैयार नहीं था।

    उसने जितना अद्वैत को जाना था… उसके घर में रहते हुए, उसकी मेड से बात करके…. वो इंसान तो बेहद आत्मनिर्भर था, एकदम अपने ही खोल में बंद, जैसे दुनिया से कोई सरोकार ही न हो। उसके चेहरे पर हमेशा एक उदास ठहराव रहता था, जैसे हर मुस्कान पर एक साया हो। वो न तो फालतू बातचीत करता, न ही किसी से खास घुलता-मिलता। 

    और फिर, सबसे बड़ी बात जो रुहानी को भीतर तक कचोट रही थी…. वो ये कि अद्वैत अपनी मरी हुई पत्नी से बेहद मोहब्बत करता था। इतना कि उसके गुजर जाने के बाद किसी और औरत को उसने अपने घर में आने तक नहीं दिया। ना कोई दोस्त, ना कोई हमराज़, ना कोई छांव।)

    तो फिर… ऐसी कौन सी बात है जो उसे, एक अजनबी लड़की को, अपनी पत्नी बनाने के लिए मजबूर कर रही है? रुहानी की उंगलियाँ धीरे-धीरे उसकी मोबाइल की किनारी से खेल रही थीं, और मन सवालों के भंवर में डूबा जा रहा था। 

    तभी उसके हाथ में रखा मोबाइल एकाएक बज उठा।  पर बस एक नाम चमक रहा था — Adwait. जैसे किसी खामोश तलाब में पत्थर गिरा हो, वैसे ही उसकी तंद्रा टूटी। उस एक नाम से उसके भीतर की सारी उलझनें जाग उठीं। हाथ थोड़े काँपे, पर उसने कॉल उठा लिया।

    फोन उठते ही दोनों तरफ कुछ क्षण की चुप्पी रही। जैसे दोनों अपनी साँसें थामे हुए हों, जैसे शब्दों से ज़्यादा भारी हो गई हों खामोशियाँ। और फिर जैसे कोई धागा एक साथ खिंच जाए….. दोनों एक साथ बोल पड़े:

    “मुझे तुम्हें कुछ बताना है,” अद्वैत की आवाज़ थी, भारी और धीमी।

    “मुझे तुमसे कुछ पूछना है,” रुहानी की आवाज़ में भी हल्की थरथराहट थी।

    फिर दोनों एक साथ रुक गए। एक और खामोशी, लेकिन इस बार वह बोझिल नहीं थी…. यह एक इंतज़ार की खामोशी थी।

    रुहानी ने आखिरकार धीमे स्वर में कहा, “यश ने बताया तुम्हारे प्रपोज़ल के बारे में… उसी सिलसिले में कुछ पूछना था मुझे।”

    फोन के दूसरी तरफ अद्वैत ने एक लंबी, गहरी साँस ली, जैसे शब्दों को आकार देने के लिए भीतर से कुछ खींच रहा हो, और फिर बोला, “इससे पहले कि तुम कुछ पूछो, मैं तुम्हें कुछ बताना चाहता हूँ… जिससे शायद तुम्हारे सारे सवालों के जवाब खुद-ब-खुद मिल जाएँ।”

    रुहानी थोड़ी चौंकी। यह शायद पहली बार था जब अद्वैत ने उससे इतने लंबे वाक्य में कुछ कहा था। कुछ तो था उस आवाज़ में…. कोई थकान, कोई सच्चाई, कोई बोझ। 

    वह बस “हम्म… ठीक है, कहो जो कहना है,” कहकर सुनने लगी।

    अद्वैत की आवाज़ फिर आई, बहुत साफ और सीधे लहजे में, “ये शादी असली शादी नहीं होगी।”

    रुहानी के माथे पर लकीरें उभर आईं, और उसकी भौहें एक-दूसरे के पास सिमट गईं। “क्या मतलब?” उसने पूछा, जैसे किसी पहेली को हल करने की कोशिश कर रही हो।

    “तुम्हें थोड़ा अजीब लग रहा होगा,” अद्वैत ने कहा, “लेकिन हमारी शादी एक शो होगी दुनिया के लिए… मतलब, ‘contract marriage’। मुझे इसी सिलसिले में तुमसे बात करनी थी।”

    अब उसकी आवाज़ में कोई झिझक नहीं थी….. जैसे जो बोझ वो दिल में लिए फिर रहा था, अब वो उतरने वाला हो। और उधर रुहानी की आँखें आसमान को नहीं, अब अपने भीतर के किसी सच को देख रही थीं….. वो सच, जिसे वो अब तक अनदेखा कर रही थी।

    रुहानी के कानों में जब ये सब बातें पड़ीं, तो पहले-पहल उसे विश्वास नहीं हुआ। शब्द तो मानो हवा में तैरते हुए आए थे, मगर जब उन्होंने उसके दिल की सतह को छुआ, तो वहां से भी कुछ वैसी ही सच्चाई फूट पड़ी। 

    भीतर से एक आवाज आई….. थकी हुई, टूटी हुई, मगर बेहद सच्ची…..”मैं भी तो किसी से रियल में शादी नहीं करना चाहती, ये भी ठीक ही है।” उसकी आंखों में थोड़ी नमी थी, लेकिन होंठों पर एक हल्की सी राहत की परछाईं भी। जैसे किसी भारी बोझ को अस्थायी ही सही, मगर कुछ देर के लिए नीचे रख दिया गया हो।

    अद्वैत की आवाज फिर कानों में पड़ी, गहरी और संयमित, “ऐसे तो मुझे एक साल का कॉन्ट्रैक्ट चाहिए तुमसे, लेकिन अगर तुम्हें कम या ज़्यादा करवाना हो तो तुम बता देना।”

    उसकी आवाज़ में एक पेशेवर ठंडक थी, पर उसके शब्दों की परतों में कहीं एक आत्म-रक्षा की दीवार भी थी… जैसे वो कुछ छुपा रहा हो, खुद से भी।

    रुहानी हल्की मुस्कराहट के साथ, पर दिल में उठते सवालों को थामे, धीरे से पूछ बैठी, “और क्या-क्या टर्म्स एंड कंडीशन्स रहेंगी इस कॉन्ट्रैक्ट में?”

    अद्वैत ने तुरंत कहा, “उतना सारा अभी कॉल पर बताना तो इम्पॉसिबल है। मैं तुम्हें सब मैसेज कर दूँगा। तुम्हें जो भी मॉडिफिकेशन करवाना हो, तो जल्द से जल्द मुझे रिप्लाई कर देना। मैं कल अपने मैनेजर से कहकर सारे डॉक्युमेंट्स बनवा लूंगा।”

    फोन की स्क्रीन से चिपकी रुहानी की उंगलियाँ कांप गईं। कोई रिश्ता यूँ कागज़ों में बंध जाए, ये सोचना भी भारी लग रहा था। लेकिन अब कुछ पूछे बिना रहा न गया। उसकी आवाज़ में एक थरथराहट थी, जैसे भीतर की सच्चाई बाहर आने को तैयार हो—“अचानक से तुम्हें कॉन्ट्रैक्ट मैरिज करने की क्या ज़रूरत आन पड़ी?”

    अद्वैत ने अपनी आंखें कुछ पल के लिए बंद कीं, जैसे हर जवाब को भीतर से टटोल रहा हो। फिर धीरे-धीरे कहने लगा, “ये सब मेरी राइटिंग करियर के लिए है। नाम है मेरा, एक इमेज है… उस पर दाग नहीं लगने दे सकता। कुछ चीजें दुनिया के लिए परफेक्ट दिखानी पड़ती हैं।”

    उसकी आवाज में कोई घमंड नहीं था, बस एक थकी हुई सच्चाई थी….जैसे कोई लेखक अपने किरदार को नहीं, खुद को पर्दे के पीछे छिपा रहा हो। कुछ कहने से पहले ही अद्वैत फिर बोल पड़ा, मानो उसे डर था कि कहीं रुहानी कोई वाजिब सवाल ना पूछ ले जिससे उसका यह ताश का महल हिल जाए, “याद रहे, contract marriage की बात केवल मैं, तुम, मेरे मैनेजर और वकील को ही पता रहेगी। इसके अलावा और कोई नहीं जान पाए।”

    रुहानी के होंठों पर एक उदासी भरी हँसी खिली, जो मुस्कान से ज़्यादा एक खामोश स्वीकार था। “तुम बेफिकर रहो,” उसने कहा, और वो शब्द किसी वादे की तरह गूंजे, जैसे उसने ना सिर्फ अद्वैत की बात मानी, बल्कि खुद को भी एक दायरे में कैद कर दिया हो। 

    उस हँसी में कोई नयापन नहीं था, बस एक पुरानी थकान थी…. एक लड़की की जो रिश्तों से ज़्यादा उम्मीदें करना भूल चुकी थी, और अब हर सौदे में बस थोड़ी सी इज़्ज़त ढूंढ रही थी।

    ——–

    रुहानी ने जो ‘हाँ’ कहा, क्या वो किसी मजबूरी का फैसला था… या दिल के किसी छुपे कोने से आई सहमति?

    जब इस कॉन्ट्रैक्ट की शर्तें कागज़ पर उतरेंगी… तो क्या कोई एक लाइन उनकी किस्मत की लकीर बदल देगी?

    क्या एक समझौते के तहत बंधे इस रिश्ते में सचमुच कोई प्यार, कोई इमोशन हो सकता था?

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  • अधूरी इबादत भाग~16

    अधूरी इबादत भाग~16

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    भाग~16 खुद से बड़ा सवाल

     

    अद्वैत उस पुराने, हल्की रोशनी वाले कैफ़े के एक कोने की टेबल पर बैठा था, जहाँ लकड़ी की मेज़ें और दीवारों पर लगे पुराने पोस्टर अब भी बीते ज़माने की खुशबू सँजोए हुए थे।

    वो बच्चा, जो पहली बार उससे मिला था, अब उसकी ज़िंदगी की सबसे गंभीर बात कह चुका था…. शादी की, रिश्तों की, भरोसे की। यश के शब्द अब भी उसके ज़ेहन में गूंज रहे थे, और उसकी आँखें उस बालक की मासूम गंभीरता में उलझी हुई थीं, जैसे वो किसी गहरे सवाल के जवाब ढूँढ रही हों।

    “तुम तो आज पहली बार मुझसे मिल रहे हो, यश,” अद्वैत की आवाज़ में एक अजीब सी नरमी थी, मानो वह किसी नाजुक काँच को थाम रहा हो, “तो तुम मुझे अपनी दीदी से शादी करने के लिए कैसे कह सकते हो?”

    यश ने चौंकने की बजाय बहुत सधे हुए स्वर में जवाब दिया, उसकी आँखों में कोई हिचक नहीं थी, “दीदी ने आपके बारे में जितना बताया है, उससे मुझे तो आप बहुत भले इंसान लगते हो।”

    अद्वैत ने एक पल को उसकी ओर देखा, उसकी आँखों में सच में कोई छल नहीं था। मगर वो यह सुनकर और जानना चाहता था। उसकी आवाज़ में थोड़ी जिज्ञासा उभरी, “भला इंसान कैसे?”

    यश का चेहरा खिल उठा। “सबसे पहली बात,” उसने कहा, “आपने मेरी दीदी की जान बचाई है। और दूसरी, सबसे बड़ी बात – आपने कभी भी उनका फायदा नहीं उठाया, न उनके साथ कुछ ग़लत किया। आजकल तो लोग बस मौके ढूंढते हैं, लेकिन आपने… आपने उन्हें स्पेस दिया, इज़्ज़त दी… वो चीज़ जो शायद उन्हें सबसे ज़्यादा चाहिए थी।”

    अद्वैत के भीतर कुछ खामोशी से हिलने लगा। यश के मासूम शब्दों ने उसे अंदर तक छू लिया था। उसे लगा जैसे कोई उसके अंधेरे कमरे में एक छोटा सा दीया जला गया हो, बिना कोई शोर किए। उस पल में अद्वैत को एहसास हुआ कि भले ही उसने कुछ बड़ा नहीं किया हो, पर शायद… शायद उसका होना ही किसी के लिए काफी हो गया था।

    अद्वैत को अपने बारे में यश के मुँह से ये बातें सुनना कुछ अजीब सा लग रहा था। भीतर कहीं कुछ काँप गया था। जैसे कोई पुरानी धूल में ढकी हुई तस्वीर अचानक आँखों के सामने आ गई हो—अपनी माँ की वो आँखें, जिनमें उसने आखिरी बार देखा था खुद पर भरोसा। वो आँखें जो कहती थीं, “दूसरे जैसे मत बनना, अद्वैत… अपनी अच्छाई को मत छोड़ना।” आज यश के मासूम शब्दों ने उस अधूरी बात को पूरा कर दिया था।

    जिस अद्वैत अवस्थी को दुनिया अक्सर “नजायज़” कहकर किनारे कर देती थी, जिसके नाम के आगे कभी पिता का नाम नहीं जुड़ा, जिसकी परवरिश सवालों की छांव में हुई—क्या वही अद्वैत आज किसी के लिए “भला इंसान” कहलाने लायक बन गया है? क्या उसने सचमुच अपनी माँ के आदर्शों को जी लिया है, जो एक किशोर लड़के की आँखों में इतनी साफ इज्ज़त उतर आई?

    लेकिन जैसे ही उसका मन उन ख्यालों में बहने लगा, उसने खुद को एक झटका दिया। नहीं, अभी भावनाओं में बहने का समय नहीं है। उसने गहराई से यश की आँखों में देखा, फिर धीमी, मगर साफ आवाज़ में बोला, “यश, तुम्हें किसी भी तरह अपनी दीदी को कल कोर्ट लेकर आना होगा। तभी हम दोनों की शादी हो पाएगी।”

    यश कुछ कहने ही वाला था कि अद्वैत ने जल्दी से जोड़ा, “लेकिन इस बारे में सिर्फ़ तुम्हें और रूहानी को ही पता होना चाहिए। कोई तीसरा नहीं। कोई भी नहीं।”

    उसके शब्दों में कोई डर नहीं था, मगर एक जिम्मेदारी की थकान ज़रूर थी। मानो वो उस अकेले पुल पर खड़ा हो जहाँ से नीचे छलांग लगाना भी जरूरी था और टिके रहना भी। उसकी आवाज़ में स्थिरता थी, लेकिन भीतर कहीं बहुत गहराई में एक बवंडर चल रहा था…. डर, उम्मीद और एक अजीब-सी राहत का। जैसे वो किसी ऐसी डोर को थामे खड़ा था जो अगर टूटी, तो सब कुछ बिखर जाएगा, लेकिन अगर बची रही… तो शायद एक नई ज़िंदगी शुरू हो सकती थी।

    यश की बातों को सुनते हुए अद्वैत का मन कुछ झिझकता है, लेकिन उसने अपने भीतर के असमंजस को दबा दिया। “आप फिक्र मत कीजिए सर, कल मैं उन्हें शादी की शॉपिंग के नाम से ले आऊँगा,” यश का विश्वासपूर्ण स्वर सुनकर अद्वैत ने एक गहरी सांस ली। 

    फिर, जैसे किसी कांटे को उखाड़ने की कोशिश करते हुए उसने अपनी चिंता को एक बार फिर से व्यक्त किया, “लेकिन साथ में कोई और नहीं होना चाहिए, ना ही तुम्हारी माँ या तुम्हारे पापा।” अद्वैत के शब्दों में गहरी चिंता थी, जैसे उसके मन में एक अंधी सी गलती का डर पल रहा हो, जो इस फैसले को और भी कठिन बना रहा था।

    यश ने एक हल्की मुस्कान के साथ कहा, “आप निश्चिंत रहिए, दीदी को लेकर मैं अकेले ही आऊँगा, माँ-पापा मुझे कुछ नहीं बोलेंगे।” यश के शब्दों में एक तरह का आत्मविश्वास था, लेकिन अद्वैत के भीतर एक हल्की सी खटक महसूस हुई। यह विश्वास था या फिर एक और भ्रम, वह नहीं जानता था।

    उसके मन में एक असमंजस था, जैसे एक तट पर खड़ा कोई इंसान जो जानता है कि समुद्र की लहरें कभी भी उसे अपनी चपेट में ले सकती हैं, फिर भी वह कदम बढ़ाने के लिए तैयार नहीं है। उसने अपने भीतर की घबराहट को शांत किया, और फिर से अपने ध्यान को एक ही बिंदु पर केंद्रित किया। “बस, अब यहीं तक,” उसने खुद से कहा, और फिर वहां से जाने का निर्णय लिया।

    अद्वैत जैसे ही उठने वाला था, तभी उसकी नजरें रुहानी के फोन पर पड़ीं, जो अभी भी उसके हाथों में था। कुछ पल के लिए वह जैसे ठहर गया। उसकी उंगलियाँ फोन के आसपास हल्की सी घूमने लगीं, जैसे उसे इसे वापस करना न हो, बल्कि उसमें छुपे हुए किसी गहरे रिश्ते को थामे रखने की इच्छा हो।

    दिल में उथल-पुथल सी महसूस हो रही थी। वह रुहानी से जुड़ी हर बात, हर याद, उसकी आँखों के सामने जैसे सजीव हो उठी। पर फिर उसने खुद को सँभाला और यथार्थ में लौटते हुए यश को फोन वापस करते हुए कहा, “अपनी दीदी को उसका फोन दे देना।”

    यश ने उस फोन को सावधानी से अद्वैत से लिया और उसे अपने हाथों में थाम लिया, जैसे कोई बहुमूल्य चीज हो। वह खड़ा होने लगा, जाने के लिए तैयार था, तभी अद्वैत ने उसे रोकते हुए कहा, “और हाँ, रुहानी को बोल देना कि मैंने अपना नंबर इस में सेव कर लिया है और मैं उससे बात कर लूंगा।”

    यश ने सिर झुकाकर कहा, “जी जरूर, धन्यवाद,” और धीरे-धीरे कदम बढ़ाए। अद्वैत ने उसे जाते हुए देखा, लेकिन उसका मन अभी भी कहीं और था। उसके भीतर जैसे एक अजीब सी लहर दौड़ रही थी। उसका ध्यान अब भी उसी फोन पर था, जिसमें रुहानी की यादें और उसकी खुशबू बसी हुई थी। यश के जाते ही अद्वैत वहीं बैठा रहा, जैसे किसी उलझी हुई सोच में खो गया हो। उसके दिल में एक अजीब सी गहरी खामोशी थी, जिसे वह खुद भी समझ नहीं पा रहा था।

    ———–

    क्या अद्वैत की ज़िंदगी में अब भी कोई और आ सकता था, या फिर वह खुद ही किसी अजनबी भविष्य की ओर बढ़ रहा था?

    क्या रुहानी इस समझौते को स्वीकार करेगी, जो अद्वैत ने बिना उससे पूछे तय कर दिया है? 

    अद्वैत की उम्मीदों और रुहानी के दिल के बीच जो अनकही बातें हैं, क्या वे दोनों के सामने आने वाली राह को बदल देंगी?

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  • अधूरी इबादत भाग~15

    अधूरी इबादत भाग~15

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    भाग~15 अद्वैत की सबसे बड़ी चुनौती

     

    अद्वैत सुबह की पहली रोशनी के साथ ही घर से निकल पड़ा। उसके कदम धीमे थे लेकिन मन तेज़ी से दौड़ रहा था…. जैसे हर मोड़ पर कोई अधूरी बात उसका इंतज़ार कर रही हो। 

    यश द्वारा भेजे गए पते को उसने रात भर निहारते हुए कितनी बार देखा था, अब वही पता उसे एक अजनबी सच्चाई की ओर ले जा रहा था। 

    कार चलाते हुए भी उसकी नज़रें अक्सर सड़कों से हटकर शहर की धड़कनों को पढ़ने की कोशिश करती… कोरे आसमान के नीचे फैले चाय के ठेले, जागती हुई दुकानों की नीम रोशनी और कॉलेज के बाहर खड़े युवाओं की हल्की सी चहक…. ये सब उस शहर के अपनेपन को बिखेर रहे थे, फिर भी अद्वैत के मन में कुछ अनकहा, कुछ अधूरा सा महसूस हो रहा था।

    उसने कार एक शांत गली में मोड़ी और कुछ देर बाद एक छोटे लेकिन सलीके से सजे कैफ़े के सामने आकर रुक गई। कैफ़े की बाहरी दीवारों पर बेलें चढ़ी थीं, जिन पर सुबह की धूप छिटकी हुई थी। भीतर से हल्की सी जैज़ म्यूज़िक की आवाज़ आ रही थी और एक पुरानी लकड़ी की खिड़की के पार कुछ रंगीन कुर्सियाँ करीने से रखी थीं। 

    अद्वैत कुछ देर बाहर ही खड़ा रहा। उसकी आँखें हर आहट पर टिक जाती और दिल हर दरवाज़े की ओर उम्मीद से देखता। कुछ देर बाद वह वह कैफ़े में प्रवेश किया। 

    अंदर की हवा में कॉफी और वैनिला की खुशबू थी और कोनों में रखी किताबों से उठती खामोशी…. सब कुछ बेहद सुकून देने वाला था, लेकिन अद्वैत की बेचैनी उस शांति को भी चीर रही थी। उसने अपनी निगाहें चारों ओर दौड़ाईं, किसी अपरिचित लेकिन परिचित चेहरे की तलाश में।

    अद्वैत कैफ़े के कोने वाली टेबल पर बैठा था, जहाँ एक बड़ी सी खिड़की बाहर सड़क की हलचल दिखा रही थी। उसने सामने टेबल पर रूहानी का फोन रखा। उसकी उंगलियाँ बार-बार फोन के पास जाती, जैसे हर स्पर्श में कोई संकेत टटोल रही हो। 

    वह लगातार बाहर झाँकता रहा…. उसकी आँखों में किसी अजनबी की प्रतीक्षा का तनाव था। हर बार जब कोई लड़का कैफ़े के पास आता, उसका मन थोड़ी देर के लिए ठहर जाता और फिर उसी अनिश्चितता में लौट जाता। 

    कुछ ही देर में एक दुबला-पतला किशोर, स्कूल यूनिफॉर्म में, बैग लटकाए, तेज़-तेज़ कदमों से आता दिखा। उसने वही बाहर से रूहानी के फोन पर कॉल किया। अद्वैत ने फोन को देखा, और फिर खिड़की से बाहर….. दोनों की नज़रें मिली और एक सहज मुस्कान के साथ उन्होंने अपने-अपने हाथ हिलाए, जैसे किसी अनकहे बंधन को पहचान लिया हो।

    यश दरवाजा खोलते ही अद्वैत की ओर ऐसे लपका, मानो कोई छोटा भाई किसी बड़े को बहुत दिनों बाद देख रहा हो। उसकी साँसें तेज़ थीं, लेकिन आँखों में गहरी कृतज्ञता की चमक थी। उसने बैग उतारकर एक ओर रखा और बिना देर किए अद्वैत के सामने बैठ गया। 

    वह कुछ पल तक उसे देखता रहा, फिर भर्राए गले से बोला — “सर… मैं आपको सिर्फ एक बार शुक्रिया कहना चाहता था… आपने मेरी दीदी को बचाया… वरना आज शायद हम…” उसकी आवाज़ टूटने लगी, लेकिन उसने खुद को सम्भाला, “मैं नहीं जानता आपने क्यों और कैसे किया… लेकिन मेरे लिए आप भगवान से कम नहीं।” 

    अद्वैत की आँखों में उस क्षण एक अजीब सा सन्नाटा उतर आया…. तारीफ सुनना उसे कभी सहज नहीं लगता था, खासकर तब जब वो खुद अपने किए पर संशय में हो। उसने धीमे स्वर में कहा, “मैंने कुछ ख़ास नहीं किया… बस जो सही लगा, वही किया।” 

    यश की आँखों में आँसू तैर रहे थे, मगर उन्हीं अश्रुओं की गहराई में कहीं एक विश्वास भी चमक रहा था… जैसे उसे यक़ीन हो चला हो कि उसकी दीदी की टूटी-बिखरी कहानी शायद फिर से एक मुकम्मल रूप ले सके।

    अद्वैत कुछ क्षणों तक यश को एकटक देखता रहा, जैसे उसके भीतर चल रही भावनाओं को समझना चाहता हो। कैफ़े की हल्की रोशनी में यश का चेहरा थका हुआ था, लेकिन आँखों में जो सच्चाई थी, वो अद्वैत को भीतर तक छू रही थी। 

    उसने अपनी हथेलियाँ मेज़ पर रख दीं, और थोड़ी देर की चुप्पी के बाद धीमे स्वर में पूछा, “यश… क्या तुम मुझे बता सकते हो कि रूहानी ने ऐसा कदम क्यों उठाया था?” 

    उसकी आवाज़ में जिज्ञासा से ज़्यादा दर्द था, जैसे वह उस अधूरे रहस्य के धागे को पकड़कर कुछ समझने की कोशिश कर रहा हो। 

    यश ने एक गहरी साँस ली, उसके होंठ थोड़े काँपे, लेकिन उसने बोलना शुरू किया, “सर, दीदी हमेशा से थोड़ी अलग थी… कुछ साल पहले से ही वह कपड़े डिज़ाइन करने का सपना देखा करती थी, लेकिन मम्मी-पापा को यह मंज़ूर नहीं था। माँ हमेशा उसे शादी और घरेलू जिम्मेदारियाँ निभाने की सलाह देती रहती थी जैसे उसकी अपनी इच्छाएँ कोई मायने नहीं रखती थीं।”

    अद्वैत ने चुपचाप यश की बातों को सुन रहा। यश ने बात आगे बढ़ाई, “फिर एक दिन कुछ हुआ। घर में एक बड़ा झगड़ा और दीदी बहुत टूट गई थी। माँ -पापा ने जब उन्हें कहा की वो उनके मर गई तब शायद उन्होंने सोचा होगा कि सब कुछ खत्म कर दे।”

    अद्वैत की आँखें धीरे-धीरे नम होने लगीं। हर एक शब्द उसे रूहानी के उस चेहरे की याद दिला रहा था जो चुप तो रहता था, पर बहुत कुछ कहता था। 

    यश ने फिर कुछ ऐसा कहा जिससे अद्वैत पर मानो बिजली गिर पड़ी हो। उसके शब्दों ने उसकी पूरी दुनिया को हिला दिया।

    यश ने गहरी चिंता में डूबकर कहा, ‘आपके यहाँ से जाने के बाद पापा ने यह ऐलान कर दिया कि वह जल्द से जल्द दीदी की शादी कर देंगे… एक ऐसे आदमी से, जो पुरानी सोच और सख्त धारणाओं में बंधा हो, और जो दीदी की स्वतंत्रता को समझ न सके। दीदी ने उन्हें मना किया, लेकिन पापा को सिर्फ नाम और इज़्ज़त की परवाह है।’ यश की आँखों से एक आँसू टपककर टेबल पर गिरा।

    यश की बातों को सुनते ही अद्वैत के मन में कई विचारों की लहरें उठने लगीं। वह सोचने लगा, अगर रूहानी की शादी सच में हो गई तो उसकी व्यक्तिगत उलझनें उसकी पेशेवर छवि को गहरा नुकसान पहुँचा सकती हैं। 

    लेखक के रूप में उसकी प्रतिष्ठा और सफलता पर इसका प्रतिकूल असर पड़ेगा। मीडिया पहले ही उसकी निजी ज़िंदगी को घेर चुका था और वह जानता था कि यदि यशस्वी से इस अनुबंधित शादी के बारे में बात नहीं की, तो उसका करियर खतरे में पड़ सकता है। उसका आत्म-सम्मान अब दबावों के नीचे दबा हुआ था और उसे सिर्फ अपनी छवि की चिंता सता रही थी।

    लेकिन अगले ही पल, यश की बातों से अद्वैत को राहत मिली। उसने महसूस किया कि यश की मासूमियत और उसके विश्वास में एक गहरी पीड़ा छिपी थी, जो उसकी दीदी को बचाने की आखिरी उम्मीद थी। 

    थोड़ी देर रुककर उसने सीधा अद्वैत की आँखों में देखा और बोला, “सर… इसीलिए मैं आपसे मिलना चाहता था। मैं जानता हूँ कि आप दीदी के लिए अजनबी हैं, लेकिन फिर भी… आपने उन्हें ज़िंदगी दी है। और अगर… अगर आप उनसे शादी कर लें… तो शायद दीदी की शादी के लिए पापा जबरदस्ती नहीं कर पाएंगे।” 

    यश के शब्दों में एक मासूम सी ज़िद थी, एक छोटे भाई की उम्मीद, जिसने अपनी बहन को खोते-खोते बचाया था… और अब उसे फिर से टूटने नहीं देना चाहता था। अद्वैत बस चुप था, जैसे शब्द कहीं खो गए हों और दिल एक अनकहे बोझ से भर गया हो।

    अद्वैत ने हल्के से मुस्कुराने की कोशिश की, लेकिन वो मुस्कान पूरी नहीं हो सकी और उसने बहुत संयम से यश की ओर देखा। 

    “तुम तो आज पहली बार मुझसे मिल रहे हो, यश,” अद्वैत की आवाज़ में एक अजीब सी नरमी थी, मानो वह किसी नाजुक काँच को थाम रहा हो, “तो तुम मुझे अपनी दीदी से शादी करने के लिए कैसे कह सकते हो?”

    ————

    क्या अद्वैत इस घने उलझन के बीच अपनी पहचान और करियर को खतरे में डालने को तैयार था?

    अद्वैत के दिल में एक सवाल गूंजा… क्या यह सच में सिर्फ एक रास्ता था, या फिर यह एक ऐसा चक्र था जिससे निकलने का कोई रास्ता नहीं था?

    उसकी ज़िंदगी की सबसे बड़ी चुनौती अब इस ए:क सवाल पर टिकी थी – क्या वह खुद को उस रिश्ते में बँधने दे सकता था?

     

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