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  • अधूरी इबादत भाग~24

    अधूरी इबादत भाग~24

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    भाग~24 सपनों का मलबा

     

    रूहानी की उंगलियाँ अभी भी कॉफी के गर्म मग के चारों ओर जकड़ी हुई थीं। उसके चेहरे पर एक पल को सिहरन दौड़ी, जैसे किसी ने उसका नाम नहीं, उसके भीतर का कोई राज़ पुकार लिया हो। मीना की सीधी, मासूम लेकिन भीतर तक घुसती हुई बात ने जैसे कमरे की हवा में एक अजीब सी बेचैनी घोल दी थी।

    एक हल्की साँस लेते हुए, खुद को संयत करते हुए रूहानी ने नज़रें मीना से हटाकर मेज़ की ओर फेर लीं, लेकिन शब्द उसके होंठों तक आ ही गए।

    “अद्वैत भी कल नीचे ही सोए थे… हम दोनों थक गए थे… ऊपर वाला कमरा बंद था, चाबी भी नहीं मिल रही थी। इसलिए सोचा नीचे आराम कर लें।”

    मीना ने कुछ पल तक उसे यूँ देखा, जैसे वह उसके शब्दों से कहीं ज़्यादा उसके चेहरे की रेखाएँ पढ़ने की कोशिश कर रही हो। 

    मीना हँसते हुए बोली, “अरे, मैं तो सोच रही थी अब ऊपर वाला कमरा खुल जाएगा… वैसे भी सर उसमें बस सोने ही तो जाते हैं। वैसे ठीक किया आपने नीचे सोकर, थक गए होंगे।” 

    रूहानी ने जवाब में सिर्फ सिर हिला दिया। मगर उसके भीतर अभी भी हलचल जारी थी। वो जानती थी, उसका जवाब सतही था। सच भी था, झूठ भी। जो कुछ बीत चुका था, वो बहुत कुछ कहता था….. मगर समझाने लायक नहीं।

    मीना अपना काम ख़त्म करके चली गई, मगर रूहानी की नज़र अब खिड़की के पार जा अटकी थी। बाहर हल्की धूप थी, वही पीली-सी जो सर्दियों में बिन बोले चुपचाप खिड़की पर बैठ जाती है। लेकिन रूहानी का मन कहीं और भटक रहा था।

    उसकी उंगलियाँ मग के गिर्द घूमती रहीं, मगर कॉफी अब ठंडी पड़ चुकी थी…… ठीक उसकी उम्मीदों की तरह, जो धीरे-धीरे ठंडी होती जा रही थीं… लेकिन बुझी नहीं थीं। एक बेचैनी सी उसके भीतर हिलोरें मार रही थी, जैसे कोई पुरानी चिंगारी फिर से जागने लगी हो। 

    उसने एक लंबी साँस ली और अपनी नज़रें खिड़की के पार से खींचते हुए खुद से बुदबुदाई, “बहुत दिन हो गए… अब और नहीं। आज मुझे स्टूडियो जाना ही होगा।”

    वो खुद को याद दिला रही थी…. स्टूडियो ही तो उसका असली ठिकाना था, उसका सपना, उसकी पहचान। वह जगह जिसने उसकी सोच को पंख दिए थे, जहां हर कोना उसकी मेहनत की खुशबू से महकता था। वहाँ लौटना, जैसे खुद के पास लौटना था। रूहानी ने धीरे से मग टेबल पर रखा, जैसे किसी पुराने वादे को फिर से थाम लिया हो।

    उसने खुद को आईने में देखा….. बाल बिखरे थे, चेहरा थका हुआ, पर आँखों में आज कुछ अलग था।

    एक ठहराव, एक संकल्प, एक जिद।

    “अब और देर नहीं,” उसने अपने आपसे कहा। अभी अद्वैत घर पर नहीं था, शायद किसी कवि सम्मलेन या लेखक मिलन समारोह में गया होगा। यही सही वक्त है। 

    वह अपने कमरे में गई। उसने वह बैग निकाला…. वही बैग जो यश ने उसे दिया था। वो धीरे से ज़िप खोली। अंदर पुराने स्केचबुक, कुछ फैब्रिक के टुकड़े, अधूरी डिज़ाइनिंग शीट्स… और फिर अचानक एक कोने में उसे कुछ चमकता हुआ दिखा…… एक छोटा सा मेटल का टुकड़ा।

    उसने उसे निकाला… उसकी आँखें भर आईं। उसमे स्टूडियो की चाबी थी। रूहानी के चेहरे पर एक धीमी-सी मुस्कान आई। एक उदास सी, लेकिन सच्ची।

    “तो तूने ये भी बचा लिया, यश…” उसके होंठों से निकला, जैसे कोई दबी हुई दुआ अनजाने में लौट आई हो।

    वो मुस्कुरा पड़ी। उसने चाबी को मुट्ठी में कस लिया। “वो सपना चुराया गया था, खत्म नहीं हुआ था।”

    फिर उसने बाहर का दरवाज़ा खोला….. बिलकुल वैसे ही जैसे किसी कमरे का नहीं, बल्कि अपने अंदर के डर का दरवाज़ा खोल रही हो। अब रूहानी फिर से अपने आप से मिलने जा रही थी….. उसी जगह जहाँ कभी उसकी आत्मा रंगों में घुलकर सांस लेती थी।

    ——————-

    रूहानी ने स्टूडियो के दरवाज़े पर खड़े होकर एक गहरी साँस ली। उसके भीतर एक तूफ़ान चल रहा था, लेकिन चेहरा शांत था….. जैसे कोई सैनिक जंग के मैदान में उतरने से पहले खुद को तैयार कर रहा हो। दरवाज़ा खोलते ही एक सड़ी-सी गंध ने उसका स्वागत किया, जैसे किसी ने जानबूझकर उसके सपनों को सड़ने के लिए छोड़ दिया हो।

    अंदर कदम रखते ही उसकी नज़र सबसे पहले उस मनीक्विन (Mannequin) एक प्रकार की मानव-आकार की मॉडल, पर पड़ी, जिस पर उसका पहला डिज़ाइन लटका था….. अब धूल और जाले से ढका हुआ। उसने धीरे से उस पर हाथ फेरा, जैसे किसी पुराने दोस्त को छू रही हो। पर कपड़ा अब भीगा हुआ था, शायद छत से पानी टपकता रहा होगा।

    रूहानी की उंगलियाँ उस जंग लगे सिलाई मशीन के हैंडल पर गई…… ठंडी, धूल सनी, और जैसे बरसों से किसी स्पर्श की प्रतीक्षा में जमी हुई। उस घिसी हुई सतह पर उसकी हथेलियों की नरमी धीरे-धीरे थरथराने लगी।

    वो वहीं ज़मीन पर बैठी, घुटनों को मोड़कर, कुहनी टिकाए, आँखें नीची किए। कभी इस स्टूडियो में उसकी हँसी गूंजती थी, मॉडल्स की चहक होती थी, और स्केचिंग के वक्त पेंसिल की खुरखुराहट किसी गीत जैसी लगती थी। लेकिन अब… अब बस टूटे शीशों की किरकिर और उस दीवार पर पड़ा कॉफी का दाग उसकी नाकामी का इश्तहार बना खड़ा था।

    “Copycat Studio — Talent Stolen Here!”

    उस एक वाक्य ने जैसे उसकी रगों में बर्फ घोल दी हो।

    “Steal?” वो बुदबुदाई।

    “किसी ने चुराया नहीं था… छीना था… जान-बूझकर। और मैंने… बस देखती रह गई।”

    उसने अपने घुटनों को सीने से लगाया और सिर टेक दिया। आँखों में आँसू तो अब भी नहीं थे। शायद इसलिए नहीं कि दुख कम हो गया था, बल्कि इसलिए कि दर्द अब खून की तरह बहना छोड़ चुका था। 

    टेबल से उड़कर ज़मीन पर बिखरे हुए बिजली और किराये के बिल उसके चारों ओर मौत के फरमान जैसे बिछे थे। हरेक कागज़ मानो चीख रहा था “तेरा सपना मर चुका है, अब बस उसकी लाश यहाँ सड़ रही है।”

    लेकिन रूहानी उस चीख को अनसुना कर चुकी थी। धीरे-धीरे वो उठी। उसकी चाल में थकावट थी, लेकिन वो थकावट शरीर की नहीं, आत्मा की थी। फिर भी उसने खुद को खींचा।

    दीवार की ओर बढ़ी, जहां अब भी कुछ फटे हुए स्केच टंगे थे। उसने एक को हाथ में लिया…. उसी डिज़ाइन का हिस्सा जो उसने अपनी पहली फैशन प्रतियोगिता के लिए बनाया था।

    फिर उसे याद आया… वो रात…. वो रात जब उसने घंटों बैठकर उस ड्रेस को रंगा था, हर सिलाई में अपने सपनों की महीन नब्ज़ सी टांकी थी। 

    पूरी रात उसने जागकर एक-एक टांका उस उम्मीद के साथ जोड़ा था, कि जब सुबह होगी तो उसका सपना रैंप पर चलेगा… उसके नाम के साथ, उसकी पहचान बनकर।

    और फिर… वो सुबह…… वो सुबह जब उस रैंप पर वही ड्रेस उतरी थी…. लेकिन किसी और के नाम से। किसी और के जिस्म पर। 

    जब उसने आँखों में आँसू और होंठों पर सन्नाटा लिए सवाल किया था, तो जवाब में बस एक बेमानी मुस्कान मिली थी।

    उसने अपने चारों ओर देखा… टूटा हुआ स्टूडियो था, पर नींव अभी थी। दीवारें भले ही धूल से सनी हों, लेकिन उन्होंने उसकी पसीने और जुनून से गढ़ी मेहनत को देखा था।

    तभी उसने एक स्टूल घसीटा, और उस पर बैठ गई। धीरे से अपने फोन का कैमरा ऑन किया और स्टूडियो की कुछ तस्वीरें लीं। हर टूटन, हर दरार, हर धब्बा।

    फिर इंस्टाग्राम पर पोस्ट किया –

    Chapter 1 – Rebuilding Ruins #RuhaniReturns

    वो जानती थी कि इसे देखकर कुछ लोग हँसेंगे, कुछ उंगली उठाएंगे। लेकिन इस बार वो डर नहीं रही थी क्योंकि सबसे बुरा गुजर चुका था।

    ————

    रात के तक़रीबन साढ़े ग्यारह बज चुके थे। अद्वैत थका-हारा लौटा, लेकिन जैसे ही घर में दाख़िल हुआ…. ड्रॉइंग रूम की हल्की-सी रौशनी और रूहानी की परछाईं उसकी नज़रों में आई। 

    वो अब भी जाग रही थी, सोफ़े पर बैठी, हाथों में एक पुराना स्केचबुक थामे… जैसे कोई खुद से बहस कर रहा हो।

    अद्वैत ने जूते उतारे, बैग रखा और धीरे से पूछा, “सोई नहीं अब तक?”

    रूहानी ने सिर उठाया। उसकी आंखों में नींद नहीं थी, बस एक दबी हुई उलझन थी। “नींद आ नहीं रही,” उसने हल्की सी मुस्कान के साथ कहा, “थोड़ा सोच रही थी।”

    अद्वैत ने पानी का गिलास लिया और वहीं पास बैठ गया। एक पल की चुप्पी रही।

    फिर रूहानी ने धीरे से कहा, “एक बात कहनी थी… मुझे तुमसे कुछ पैसे चाहिए।”

    अद्वैत ने चौंककर उसकी ओर देखा, “कितने?”

    रूहानी की आवाज़ थमी नहीं, “पच्चीस लाख रुपये… अभी।”

    कमरे में एक पल को ऐसा सन्नाटा छा गया जैसे दीवारें भी साँस रोककर वजह पूछना चाहती हो।

    ——- 

    क्या अद्वैत सच में मदद करेगा… या उसके सवालों में छिपा है कोई पुराना हिसाब?

    रूहानी ने जो माँगा… क्या वो सिर्फ पैसे थे? या कोई बीते रिश्ते की कीमत भी उसमें छुपी थी?

    और जब रूहानी ने कहा “अभी चाहिए”, तो क्या वो सिर्फ एक माँग थी… या किसी खतरे की आहट?

  • अधूरी इबादत भाग~23

    अधूरी इबादत भाग~23

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    भाग~23 अधूरे फासले 

     

    अद्वैत हर सुबह की तरह ठीक समय पर उठा। बाथरूम से बाहर निकलकर उसने घड़ी की ओर देखा… 6:45। रोज़ की तरह सिलसिलेवार ढंग से उसने अपनी शर्ट प्रेस की, बालों में हल्का सा जेल लगाया, फिर अपने स्टडी टेबल पर फाइल्स को अच्छे से समेटकर बैग में रख लिया। वो एक ऐसा आदमी था जिसे अपने जीवन में हर चीज़ को अनुशासन में रखना पसंद था….. हर भाव, हर फैसला, हर दिनचर्या।

    लेकिन आज उसकी सुबह में एक अजीब-सी बेचैनी थी, जिसे वह खुद भी ठीक से समझ नहीं पा रहा था। शायद इसलिए क्योंकि घर में अब वो अकेला नहीं था… फिर भी संवाद की कोई उम्मीद नहीं थी।

    बाहर निकलने से पहले स्टडी रूम के ताले की चाबी घुमाकर लॉक किया और फिर अपने कमरे का।

    वह सीढ़ियों से उतर कर मुख्य दरवाजे की तरफ जा ही रहा था तभी उसकी नज़र रूहानी के कमरे की ओर गई। दरवाज़ा हल्का सटा हुआ था। न कोई हलचल, न कोई आहट।

    कुछ पल के लिए वह वहीं ठिठक गया। उसका हाथ उठे लेकिन दरवाजे तक पहुंच नहीं पाए।

    वह चाहता था कि वो दरवाज़ा खटखटाए। 

    शायद पूछे, “ठीक हो?”

    शायद कहे, “मैं जा रहा हूँ, ज़रूरत हो तो कॉल कर लेना।”

    लेकिन फिर तो कुछ उसे रोक लेता है….. एक दीवार जो दोनों के बीच अब तक खड़ी है।

    ये रिश्ता, जो सिर्फ कागज़ी है, कहीं वो ये न समझ बैठे कि वह उसके जीवन में कुछ अधिक दखल देने लगा है।

    या फिर ये डर भी था कि अगर उसने दरवाज़ा खटखटाया, और जवाब में खामोशी मिली, तो दिनभर वो खामोशी उसकी सांसों से चिपकी रहेगी।

    उसने खुद को रोका, गहरी सांस ली और दरवाज़े की ओर से मुड़कर सीधे बाहर की ओर बढ़ गया। जूतों की धीमी आवाज़ फर्श पर गूंजती रही और जैसे ही दरवाज़ा बंद हुआ, घर फिर से उसी सन्नाटे में डूब गया…. जहाँ अब दो लोग थे, लेकिन दो अलग-अलग दुनिया में।

    अद्वैत के मन में एक हल्की-सी खटास रह गई…. शायद उस अनकहे संवाद की जो कभी हो नहीं पाया। पर उसने उसे भी अपनी दिनचर्या की तरह तह करके जेब में रख लिया, और चल पड़ा एक और व्यस्त दिन की ओर।

    अद्वैत के जाने के बाद मीना जब अपने नियत समय पर रोज़ की तरह घर का दरवाज़ा खोलकर अंदर दाख़िल हुई, तो उसे सब कुछ सामान्य लगा…. हॉल में वही हल्की सी धूल, किचन की खिड़की से आती धूप की पतली लकीर और अद्वैत सर की अनुपस्थिति का शांत एहसास। 

    वो धीरे-धीरे झाड़ू लगाते हुए कमरे दर कमरे बढ़ती चली गई, और आखिर में वह उस कमरे के दरवाज़े तक पहुँची, जो कल तक खाली रहा करता था…. अब जहाँ रूहानी थी।

    दरवाज़ा आंशिक रूप से खुला था और मीना जैसे ही अंदर गई, उसकी नज़र सीधे बिस्तर पर लेटी रूहानी पर पड़ी। पहले तो वो ठिठक गई।

    रूहानी गहरी नींद में थी, पर उसकी करवटें बेचैनी बयां कर रही थीं। उसके माथे पर हलकी लटें चिपकी थीं, जैसे कोई सपना उसे भीतर से उलझाए हुए हो। 

    मीना की नज़र उसके गले के चारों ओर घूमे मंगलसूत्र पर गई, और फिर मांग में भरे सिंदूर पर टिक गई। उसके चेहरे पर अचानक एक धीमा-सा विस्मय था, फिर उसने खुद को संयत किया और रूहानी के पास आकर धीरे से बोली,

    “मैडम… दिन चढ़ने वाला है… क्या अब उठेंगी आप?”

    रूहानी उस आवाज़ से चौंकी, जो नींद के घने कोहरे में किसी हल्की दस्तक जैसी थी। कुछ पल तो उसे समझ ही नहीं आया कि कौन बोल रहा है। 

    आंखें पूरी तरह खुलीं तो सामने मीना को खड़ा पाया, हल्की मुस्कराहट के साथ, जैसे उसने नींद से किसी सपने को जगा दिया हो।

    “मैडम, दिन चढ़ गया है… उठ जाइए?”

    रूहानी झेंप गई, हड़बड़ा कर उठकर बैठ गई, बाल बिखरे हुए थे, चेहरा अभी तक नींद और उलझन से भरा था। कुछ देर को वो बस देखती रही मीना की ओर, फिर खुद को संभालते हुए धीमे स्वर में बोली, “तुम साफ-सफाई कर लो… और मेरे लिए एक कॉफी बना देना। मैं अभी आती हूँ।”

    मीना ने सिर हिलाया, “जी मैडम” और काम में लग गई।

    रूहानी कमरे से बाहर आई तो अब वो पहले जैसी नहीं थी। कल जो तूफान आया था उसकी लहरें अब भी उसकी आंखों में थीं, पर उनमें अब एक संकल्प की परत भी थी। 

    उसने सफेद कुर्ता पहना था, सिंपल, लेकिन उसके चेहरे की गंभीरता और आंखों की थकान उसे और गहराई देती जा रही थी। जब वो किचन में पहुँची तो मीना वहां झाड़ू लगा रही थी।

    “तुम्हारी बेटी का बर्थडे कब है?” रूहानी ने अचानक पूछा, सोफे पर बैठते हुए।

    मीना ने चौंक कर उसकी ओर देखा, उसे याद आया कि उसने ही रूहानी को बोला था अपनी बेटी के लिए डिज़ाइनर कपड़े बनाने के लिए।

    इसके साथ ही मीना फिर से आंखों में चमक लिए मुस्कुराई, “बस एक हफ्ते में, मैडम।”

    “ठीक है, आज शाम को उसे लेते आना… उसका नाप लेना है।” रूहानी का लहजा स्थिर था, लेकिन उस स्थिरता में अपनापन था।

    मीना अब कॉफी बनाने लगी, लेकिन उसके चेहरे पर अब सवालों की परछाइयाँ उतर आई थीं। वो अब तक खुद को रोक रही थी, पर अब उससे रहा नहीं गया। 

    पहले उसने कॉफी का मग रूहानी को दिया, फिर अपने लिए भी एक पुराना मग निकाल कर उसमें कॉफी डाली और फर्श पर बैठ गई। 

    इस वक्त वो मेड नहीं, एक औरत थी… जो एक दूसरी औरत की उलझनों को समझना चाहती थी।

    “मैडम…” उसने धीरे से पूछा, “आपकी शादी कब हुई? और कहीं हमारे अद्वैत सर से तो नहीं हुई?”

    रूहानी के हाथ ठिठक गए। उसने नजर झुका लिया, जैसे इस सवाल का जवाब किसी भारी अलमारी के पीछे छिपा हो। उसके गले में लटकता मंगलसूत्र हल्की थरथराहट के साथ उसकी सांसों की लय में हिल रहा था।

    “बहुत जल्दी में हो गई… बताने का समय नहीं मिला,” रूहानी ने आखिरकार धीमे स्वर में कहा।

    मीना के चेहरे पर अब संदेह नहीं, पुष्टि थी। “आपके पति अद्वैत सर ही हैं न?”

    रूहानी ने कुछ नहीं कहा, बस धीमे से ‘हाँ’ में सिर हिला दिया। लेकिन उसने महसूस किया कि उसके भीतर जैसे कोई सिहरन दौड़ गई थी। 

    ‘पति’ शब्द उसके लिए अब भी अजनबी-सा था। वो अब भी इस रिश्ते को पूरी तरह महसूस नहीं कर पाई थी…. कागज़ पर नाम जुड़ने से आत्मा का बंधन नहीं बनता, ये बात उसके अंदर गूंज रही थी।

    मीना की आंखों में हल्की चमक उभरी, जैसे कोई पहेली सुलझ गई हो।

    वह एक हल्की मुस्कान के साथ बोली, “मैडम… माफ कीजिएगा, पर एक बात कहूँ?”

    रूहानी जो अब तक खिड़की की तरफ देखती हुई खोई हुई थी, चौंककर उसकी ओर मुड़ी, “हां, बोलो मीना।”

    मीना ने आंखें नीचे किए हुए धीरे से कहा, “अद्वैत सर को ज़रूर आपसे पहली नज़र में प्यार हो गया होगा… वरना वो तो आज तक किसी औरत को आंख उठाकर भी नहीं देखते थे। उनकी पहली पत्नी के जाने के बाद तो जैसे उनका दिल पत्थर हो गया था।”

    मीना की आवाज़ में एक भोली सच्चाई थी, जो सीधे रूहानी के भीतर कहीं गहराई तक उतर गई। उसकी आँखें पलभर को भी झपकी नहीं और न ही वह उसकी बातों पर मुस्कुरा नहीं सकी। 

    वो केवल कॉफी के कप में अपनी उंगलियों को लपेटे बैठी रही। उसकी आंखें थोड़ी दूर, किसी अदृश्य दीवार को घूर रही थीं।

    तभी मीना पूछ बैठी, “लेकिन आप नीचे के कमरे में क्यों सो रही थीं, सर का कमरा तो ऊपर है।”

    रूहानी की उंगलियाँ अचानक कॉफी के मग पर जकड़ गई और उसकी आंखें मीना की तरफ उठी…. चुप, लेकिन कुछ छिपाती हुईं।

    एक पल को कमरे की हवा जैसे ठहर सी गई……..

    ——-

    अब रूहानी मीना को क्या जवाब देगी?

    क्या अद्वैत के दिल में कोई अनकहा दर्द छुपा है, जो रूहानी को नहीं दिखता?

    उस दरवाज़े के पीछे छिपा क्या कोई राज़ है, जिसे खोलने की हिम्मत कोई नहीं कर पा रहा?

  • अधूरी इबादत भाग~22

    अधूरी इबादत भाग~22

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

    भाग~22 रिश्तों की खामोश लौ

     

    अद्वैत अब भी रूहानी का हाथ थामे हुए था, उसकी पकड़ में एक अजीब सी दृढ़ता थी… जैसे वो दुनिया से कह देना चाहता हो कि अब ये साथ अधूरा नहीं रहेगा, चाहे रिश्ता कागज़ों पर लिखा हो या बस हालातों से बंधा हो। वो दोनों जैसे ही कार के पास पहुँचे, पीछे से यश की आवाज़ आई—हांफती, लेकिन साफ़ और भावनाओं से भरी हुई।

    “दीदी!” यश ने पुकारा। उसके हाथ में एक बड़ा सा नीला बैग था।

    रूहानी और अद्वैत दोनों एक साथ मुड़े। रूहानी ने देखा…. यश धीरे-धीरे उनकी ओर आ रहा था, उसकी आंखों में चमक थी, लेकिन चेहरे पर अजीब-सी गंभीरता भी थी, जो उसके उम्र से बड़ी लग रही थी। 

    यश ने नीले बैग को रूहानी की ओर बढ़ाया। “ये लो दीदी,” उसने नरम आवाज़ में कहा, “आपके ड्रेस डिज़ाइनिंग का सारा सामान है इसमें।”

    रूहानी ने हैरानी से बैग को देखा। उसकी आंखें यश के चेहरे को पढ़ने लगीं, लेकिन कुछ कह नहीं पाईं। उसकी उंगलियाँ हौले से उस पुराने बैग के किनारे पर चली गईं, जैसे वो उसकी आत्मा की कोई भूली-बिसरी परत हो।

    यश ने रुककर साँस ली, फिर कहा, “जब पिछली बार आप घर से चली गई थीं, उस दिन… जब माँ-पापा आप पर गुस्सा हुए थे, तो आपके जाने के बाद उन्होंने आपके सारे कपड़े और आपसे जुड़े सारा सामान सबकुछ एक बैग में भरकर बाहर फेंक दिया था।”

    “मैं… आपके कपड़े और बाकी सामान तो नहीं बचा पाया,” यश की आवाज़ टूटने लगी, “लेकिन जब पापा आपकी चीजें फेंक रहे थे, तो मैंने आपकी स्केचबुक, कुछ फैब्रिक सैंपल्स, आपकी डिज़ाइन की हुई कुछ ड्रेसेस के नमूने… सब कुछ चुपचाप इस बैग में भर लिया था। तबसे ये मेरे पास ही था। आज लगा, आपको देना चाहिए। ये आपका सपना है ना दीदी, इससे जुड़ी हर चीज़…”

    वो चुप हो गया।

    रूहानी का कंठ भर आया। उसने हौले से बैग को अपने हाथों में लिया, जैसे कोई माँ अपनी खोई हुई संतान को गले लगाती है। उसकी उंगलियाँ बैग की ज़िप पर फिसलीं, जैसे उसे यकीन नहीं हो रहा हो कि जो वो पकड़े हुए है, वो उसका है… उसका सपना, उसका जुनून, उसका अस्तित्व।

    अद्वैत ने एक पल के लिए रूहानी की ओर देखा…. उसकी आंखें अब भीगी हुई थीं, लेकिन उनमें एक अजीब सी चमक थी। जैसे उस बैग ने उसे फिर से याद दिलाया हो कि वो सिर्फ एक “किसी की पत्नी” नहीं, बल्कि अपने आप में भी कुछ है। उसका एक नाम है, एक पहचान है, जो इस रिश्ते से पहले की भी थी।

    रूहानी ने वह बैग जमीन पर रख दिया और बिना कुछ कहे यश को गले लगा लिया। ये सिर्फ़ एक भाई-बहन का आलिंगन नहीं था, ये उन सपनों की रक्षा का शुक्रिया था, जिनकी कीमत किसी ने नहीं समझी… सिवाय यश के।

    अद्वैत एक कोने में खड़ा ये सब देख रहा था। उसके चेहरे पर कोई प्रतिक्रिया नहीं थी, लेकिन उसके सीने में कुछ दरक रहा था। वो जानता था, रूहानी की ये मुस्कान, उसका ये कांपता गला… ये सब यूँ ही नहीं था। किसी ने उसके सबसे गहरे हिस्से को छुआ था…. उस हिस्से को जिसे समाज ने कुचलने की कोशिश की थी।

    रूहानी ने एक लंबी, भारी साँस ली, जैसे उसकी आत्मा खुद को भीतर से संवार रही हो। फिर उसने यश के दोनों गालों को अपने हाथों में भर लिया। उसकी आँखें अब भी भीगी थीं, लेकिन उनमें एक स्पष्टता थी, एक दृढ़ता जिसे कोई माँ भी पहचान जाती।

    “यश,” उसकी आवाज़ धीरे लेकिन बेहद साफ़ थी, “अपनी दीदी की बात मानोगे न?”

    यश ने बिना झिझक के जवाब दिया, “हाँ… ज़रूर।”

    रूहानी मुस्कुराई नहीं, पर उसकी आँखों में एक संतोष झलक पड़ा। फिर वो झुक कर धीरे से बोली, “तुमसे माँ-पापा बहुत प्यार करते हैं। उन्होंने तुझे पाने के लिए कितनी मिन्नतें की थीं… तेरा जन्म उनके लिए किसी चमत्कार से कम नहीं था। तू उनके दुलारे बेटे है। इसलिए अब… मुझसे कोई संपर्क मत करना। नहीं तो… वो तेरा फ़ोन भी छीन लेंगे, और मैं नहीं चाहती कि मेरी वजह से तुझे डाँट पड़े।”

    यश की आँखों में आँसू और भी तेजी से उतर आए। उसकी ठुड्डी काँप रही थी। 

    रूहानी ने अपनी बात आगे बढ़ाई, “तुम्हें अभी बहुत कुछ करना है, बहुत आगे जाना है। अगले साल तुम्हारे दसवीं के एग्ज़ाम हैं न? अच्छे से पढ़ाई करना। जब तुम मेडल जीतोगे न, तो मैं खुद तुमसे मिलने आऊंगी। लेकिन अभी के लिए… किसी और चीज़ में ध्यान मत भटकाना और जो तुम्हारा शौक है, उसे जरूर आगे बढ़ाना।” 

    “द…दीदी…” यश के गालों पर आँसू ढुलक पड़े, उसने रूहानी की कलाई थाम ली, “ऐसा मत बोलो… मुझे अपने से दूर मत करो… मैं बहुत अकेला हो जाऊंगा…”

    रूहानी ने खुद को संयमित किया। उसके कंधे भारी हो चुके थे लेकिन आंखें अब भी बहने से इनकार कर रही थीं।

    रूहानी ने उसे धीरे से थपथपाया, “मैं भी तुम्हें बहुत प्यार करती हूँ, यश। इसलिए तुम्हें ये सब कहना पड़ रहा है।”

    उसी वक्त, अद्वैत ने कार का ड्राइविंग सीट वाला दरवाजा खोला और उसमें बैठ गया। उसकी मौजूदगी दोनों के लिए एक मजबूत सहारा बन गई थी। 

    रूहानी ने अद्वैत को बैठते हुए देखा, फिर यश की ओर देखते हुए बोली, “जा, भाई। माँ-पापा गुस्सा हो जाएंगे।”

    यश ने वो नीला बैग उठाया और कार के बैक सीट पर रख दिया। उसने एक बार फिर रूहानी को देखा, फिर बोला, “अलविदा, दीदी। जल्दी मिलेंगे।”

    रूहानी ने बस सिर हिलाकर जवाब दिया और उसने अपने छोटे भाई को एक बार फिर गले लगा लिया, अपने दिल में ये दुआ करते हुए कि ये अलविदा एक दिन फिर से मिलने का रास्ता बनाए।

    जब यश दूर जाने लगा, तो रूहानी और अद्वैत कार में बैठे। अद्वैत ने इंजन स्टार्ट किया और कार धीरे-धीरे गाड़ी को मोड़ती हुई निकल पड़ी उस सफर पर जहां कोई मंजिल नहीं थी…. या शायद मंज़िल अब उसी यात्रा में ही छुपी थी। 

    सफर के दौरान कार के भीतर एक बोझिल-सी खामोशी पसरी हुई थी। जैसे कोई पुराना गीत धीरे-धीरे बंद हो गया हो, लेकिन उसकी गूंज अभी भी दिल के किसी कोने में बाकी हो। दोनों की सांसें चल रही थीं, मगर जैसे शब्दों की कोई ज़रूरत नहीं बची थी।

    अद्वैत कार ड्राइव कर रहा था, उसकी निगाहें सड़क पर थीं, लेकिन उसका मन अंदर ही अंदर भटक रहा था….. उलझनों, सवालों और किसी अनकहे बोझ से भरा हुआ।

    रूहानी अपनी सीट पर खिड़की से सिर टिकाए बैठी थी, उसकी आंखें बंद थीं, लेकिन नींद उनसे कोसों दूर थी। वो कुछ देखना नहीं चाहती थी, शायद इस दुनिया से कुछ देर के लिए खुद को काट देना चाहती थी। हवा उसके चेहरे से टकरा रही थी, पर कोई ठंडक नहीं पहुंचा पा रही थी…. उसके भीतर की तपन अब और किसी छांव से बुझ नहीं सकती थी।

    अद्वैत ने एक बार नजरें उठाकर उसकी ओर देखा। वो कुछ कहना चाहता था शायद, कुछ ऐसा जो उसके मन में काफी देर से अटका था, पर फिर खुद को रोक लिया। इस वक़्त, कोई भी शब्द जैसे ज़ख्मों को कुरेदने जैसा होता। दोनों ही उस खामोशी को तोड़ना नहीं चाहते थे जो इस वक्त उनके बीच एक नाज़ुक पुल बन गई थी।

    जब कार अद्वैत के अपार्टमेंट के नीचे आकर रुकी, तब तक शाम ढल चुकी थी। सड़क किनारे पीली रोशनी में पत्तों की परछाइयाँ झूल रही थीं। शहर की भीड़-भाड़ से दूर, ये इलाका थोड़ा शांत था….. शायद उतना ही जितना इस वक़्त रूहानी के मन को चाहिए था।

    अद्वैत पहले बाहर निकला, फिर पीछे की सीट से चुपचाप रूहानी का बैग उठाया। वह कुछ नहीं बोला, सिर्फ उसके निकलने का इंतज़ार करता रहा। रूहानी धीरे-धीरे दरवाज़ा खोलकर उतरी, मानो किसी अनजाने देश की ज़मीन पर कदम रख रही हो….. एक नई शुरुआत, एक अनजाना ठिकाना, एक अनकहा रिश्ता।

    अद्वैत अपार्टमेंट की ओर बढ़ा, और बिना किसी औपचारिकता के दरवाज़ा खोलकर सीधा बैग किचन से सटे एक कमरे में रख दिया। सारा सामान रखने के बाद वह हाल में लौट आया, जहाँ रूहानी अब भी दरवाज़े के पास खड़ी थी, थोड़ी हिचकिचाहट, थोड़ी थकावट और थोड़ी सी उलझन के साथ।

    “फ्रेश हो जाओ,” अद्वैत ने कहा, उसकी आवाज़ में न कोई अधिकार था, न कोई औपचारिकता….. बस एक सादा-सा ख्याल, “और खाने के बाद ही सोना, ठीक है?”

    रूहानी थोड़ी चौंकी। उसने नजर उठाकर उसकी तरफ देखा।

    अब जबकि वो दोनों अकेले थे,जब कोई तमाशबीन नज़र नहीं थी, जब कोई समाज का डर भी सिर पर नहीं था, तब भी अद्वैत उसकी फिक्र क्यों कर रहा था?

    सिर्फ एक कानूनी करार का साथी होने के बावजूद, वह इतनी संजीदगी से पेश क्यों आ रहा था?

    उसके चेहरे की उलझन अद्वैत की नजर से छुप नहीं सकी। वह समझ गया कि रूहानी के मन में क्या चल रहा है। इसलिए बिना कोई सवाल उठने दिए, उसने खुद ही कहा, “मीना ने खाना बनाकर रख दिया था। और वैसे भी, दोपहर से अभी तक हमने कुछ खाया नहीं है। मैं भी फ्रेश होकर आता हूँ।”

    इतना कहकर वह सीढ़ियाँ चढ़कर अपने कमरे की ओर चला गया, जैसे उसे रूहानी को किसी उत्तर का बोझ नहीं देना था, बस उसकी थकान समझनी थी।

    रूहानी धीरे से कमरे की ओर बढ़ी, जो अद्वैत ने उसके लिए तय किया था। कमरे में रखी चीज़ें बिलकुल करीने से थीं, एक छोटी-सी अलमारी, एक साफ़-सुथरा बिस्तर, और एक कोने में रखा छोटा-सा नाइट लैम्प।

    उसने बैग की चेन खोली और हल्के हाथों से अपना सामान देखने लगी… वही कतरनें, वही डिजाइनिंग के स्केच, कुछ अधूरी नोटबुक्स और यादों से भरी हुई सिलवटें।

    कमरे की खिड़की से बाहर झांकते हुए वो बस बैठ गई—चुपचाप। उसकी पलकों पर आज कोई सपना नहीं था, बस एक एहसास था, कि शायद उसे पहली बार किसी ने बिना कुछ कहे, पूरी तरह समझ लिया था।

    उसका दिल तेज़ी से धड़क रहा था। न वो किसी प्रेम में थी, न कोई लगाव जागा था अभी तक। ये रिश्ता तो अब भी बस कागज़ पर दर्ज था, एक समझौता, एक अनुबंध। मगर इस समझौते में अद्वैत ने जो शालीनता, जो आदर और जो स्नेह बिना बोले दे दिया था, वह रूहानी के भीतर एक हल्की सी लौ जला गया था।

    एक ऐसी लौ, जो शायद आने वाले समय में उम्मीद बन सकती थी… या फिर सिर्फ एक याद। मगर इस वक़्त, वह लौ ही उसके लिए काफी थी।

    ——-

    क्या अद्वैत वाकई सिर्फ एक समझौते का हिस्सा है… या उसके खामोशी में कोई अनकहा इकरार छुपा है?

    क्या रूहानी उस लौ को पहचान पाएगी, जो उसके भीतर धीमे-धीमे जलने लगी है?

    और जब अतीत की परछाइयाँ फिर लौटेंगी, तब क्या ये नाज़ुक सा सुकून टिक पाएगा… या बिखर जाएगा एक और बार?

  • अधूरी इबादत भाग~20

    अधूरी इबादत भाग~20

    पढ़ने का समय : 9 मिनट

     

    भाग~20 तोड़ डाली परंपराएं

     

    जानकी चौहान, भानु प्रताप और उनके साथ बैठे मेहमान…. सभी की नज़रें एक साथ मेन गेट पर टिक गईं। सबने एक ही पल में देखा…. रूहानी, एक अनजान आदमी के साथ, वरमाला पहने, सिंदूर लगाए, गले में मंगलसूत्र डाले।

    कुछ क्षणों तक बस एक सन्नाटा था। फिर वो सन्नाटा जैसे किसी ने चीख से तोड़ दिया हो। जानकी की आँखों में विश्वास टूटने की दहशत थी, भानु प्रताप की मुट्ठियाँ सख्त हो गई थीं, और मेहमानों की फुसफुसाहटें एक भरी सभा में ज्वालामुखी जैसी गूंज रही थीं।

    रूहानी और अद्वैत अब गेट के भीतर कदम रख चुके थे। दोनों का चेहरा बाहर से शांत और भावहीन दिख रहा था, लेकिन भीतर एक तूफान उमड़ रहा था। रूहानी की हथेलियाँ ठंडी थीं, उसकी साँसें तेज़ चल रही थीं, हर पल उसे लग रहा था जैसे उसका दिल सीने से बाहर आ जाएगा। 

    उसने हिम्मत करके अपने पापा की आँखों में देखना चाहा, पर उसका कलेजा कांप उठा। बस इसी क्षण से वो हमेशा से डरती आई थी और अभी यह पल किसी डरावने सपने की तरह उसके सामने था। उसने हमेशा से अपने पिता की स्वीकृति, उनका स्नेह और उनका गर्व चाहा था, लेकिन आज वो भीतर ही भीतर जानती थी कि शायद ये कभी नहीं मिलेगा, खासकर इस फैसले के बाद। 

    अद्वैत, रूहानी के ठीक बगल में खड़ा था, शांत, संयमित लेकिन बेहद सतर्क। उसकी आँखें चारों ओर के माहौल को स्कैन कर रही थीं, लोगों के चेहरों पर आते-जाते भावों को पढ़ रही थीं। वो जानता था कि ये उसके जीवन का सबसे महत्वपूर्ण क्षण है, शायद रूहानी के लिए उससे भी ज़्यादा।

    ये सिर्फ दो लोगों के स्वतंत्र विवाह की बात नहीं थी, ये दो अलग-अलग दुनियाओं, दो परिवारों के मूल्यों, परंपराओं, उम्मीदों और सपनों का एक ज़ोरदार टकराव था।

    उसने रूहानी की तरफ देखा, उसकी आँखों में डर और दर्द की एक झलक थी, लेकिन साथ ही होंठों के कसे होने और कंधों की दृढ़ता में एक अटूट संकल्प भी था।

    वो जानता था कि उसे इस समय उसके साथ खड़ा रहना है, न केवल शारीरिक रूप से, बल्कि उसकी हिम्मत बनकर, एक चट्टान की तरह।

    “ये क्या है?” भानु प्रताप की भारी और रौबदार आवाज़ ने सबकी बातचीत पर ब्रेक लगाया। उनकी आवाज़ में सिर्फ सवाल नहीं था, उसमें एक अधिकार था, एक चेतावनी थी। उनकी नज़रें सीधी अद्वैत पर टिकी थीं।

    “कौन है ये?” भानु प्रताप की ऊँगली अद्वैत की ओर उठी। उनकी आवाज़ में गुस्सा और अविश्वास साफ झलक रहा था। जैसे कोई अजनबी, कोई अनचाहा व्यक्ति उनकी दुनिया में घुस आया हो।

    यश, रूहानी का छोटा भाई, जो अब तक किनारे खड़ा इस अप्रत्याशित दृश्य को हतप्रभ देख रहा था, धीरे से आगे आया। उसकी आवाज़ में झिझक थी, लेकिन शब्दों में सच्चाई थी। बोला, “पापा, ये अद्वैत अवस्थी हैं… दीदी के पति।” 

    यश हमेशा से रूहानी का समर्थक रहा था, उसकी बातों को सुनता था, लेकिन आज वो भी अपने पिता के गुस्से से डरा हुआ था। वो जानता था कि उनके पिता का गुस्सा कितना भयानक और अनियंत्रित हो जाता है।

    “पति…?” जानकी की आवाज़ मानो थम गई थी, जैसे शब्दों ने गले में ही दम तोड़ दिया हो। उनकी आँखों में सिर्फ सवाल नहीं थे…. वहाँ एक टूटा हुआ भरोसा था, एक परंपरा की अनसुनी पुकार, और एक ऐसी टीस जो सदियों से हर माँ की आँखों में पलती रही है।

    उन्होंने रूहानी के लिए हमेशा वही देखा था जो हर रूढ़िवादी परिवार देखता है…. एक ऐसा जीवनसाथी जिसे उसके माँ – बाप चुनें, जो जात-पात, कुल-परंपरा, और खानदान की इज़्ज़त को सबसे ऊपर रखे। 

    रूहानी से कभी पूछा नहीं जाना था कि वो क्या चाहती है, क्योंकि उस घर में बेटियों से सवाल नहीं पूछे जाते….. उन्हें बस मौन स्वीकृति देना सिखाया जाता है।

    उनके लिए ‘शादी’ कोई प्रेम कथा नहीं, बल्कि एक सामाजिक अनुबंध थी…. जहाँ भावनाओं से ज़्यादा महत्व घर की मर्यादा का था। जानकी को यकीन था कि रूहानी भी वही करेगी जो उसकी माँ, उसकी नानी, और उन तमाम औरतों ने किया…. चुपचाप सर झुका कर उनकी पसंद को अपना भाग्य मान लेगी।

    और ये अद्वैत… कौन था ये? कहाँ से आया था? वो उनके बुने हुए सपनों से बिल्कुल अलग था, एक अनदेखी राह का पथिक था।

    कमल, वो लड़का जिसे रूहानी के पति के रूप में उसके माँ – बाप के द्वारा चुना गया था, पीछे खड़ा था। उसके चेहरे पर एक व्यंग्यात्मक और कुटिल मुस्कान थी। वो रूहानी को हमेशा से अपनी संपत्ति समझता था, एक ऐसी लड़की जो उसके रुतबे, उसकी सामाजिक स्थिति को और बढ़ाती। 

    आज, उसे लग रहा था जैसे वो संपत्ति, वो मान-सम्मान सब कुछ उससे छीन लिया गया हो, किसी ने उसे भरी महफ़िल में नीचा दिखा दिया हो। उसके अंदर अपमान और गुस्से का लावा उबल रहा था।

    “हमने शादी कर ली है,” रूहानी ने धीरे से कहा, उसकी आवाज़ में एक हल्की सी थरथराहट थी, “क़ानूनी तौर पर…” उसकी आवाज़ में थोड़ी सी हिम्मत थी, जो उसने अपने अंदर बची आखिरी ताक़त से बटोरी थी, लेकिन वो जानती थी कि ये काफ़ी नहीं है। उसके शब्द हवा में तैरते हुए से लगे और फिर सन्नाटे में खो गए।

    “क़ानूनी?” भानु प्रताप की हँसी बेहद कड़वी और तीखी थी, जैसे किसी घाव पर नमक छिड़क दिया गया हो। 

    “बिना बताये? बिना हमारी सहमति के? और आज अचानक तुम यहाँ ये तमाशा दिखाने आ गई?” उनकी आँखों से जैसे आग बरस रही थी, माथे पर नसें तन गई थीं। उन्हें लगा था जैसे उनकी बेटी ने उनके अधिकार को, उनके निर्णय को, उनके अस्तित्व को ही चुनौती दे दी हो।

    कमल ने इस मौके का फायदा उठाते हुए ताना मारा, “तमाशा नहीं तो और क्या है? सबके सामने नाक कटवा दी। अपने खानदान की इज़्ज़त मिट्टी में मिला दी।” उसकी आवाज़ में ज़हर घुला हुआ था, जैसे वो इस अपमान का बदला शब्दों से ले रहा हो।

    कमल के पिता ने भी अपनी आवाज़ मिलाई, उनके चेहरे पर भी घोर निराशा और गुस्सा था। “हमने तो समझा था, हमें एक संस्कारी बहू मिलेगी, जो घर की लक्ष्मण रेखा समझे। पर ये क्या निकला? अपने फ़ैसले खुद लेने वाली… हमारे घर की लड़कियों में ऐसा कभी नहीं हुआ।” उनके शब्द केवल रूहानी पर नहीं, बल्कि जानकी और भानु प्रताप पर भी एक कटाक्ष थे, जैसे उनकी परवरिश पर सवाल उठा रहे हों।

    रूहानी के कानों में ये बातें तीर की तरह चुभ रही थीं। उसे लग रहा था जैसे हर कोई उसे अपराधी ठहरा रहा हो। वो हमेशा से अपने परिवार का सम्मान करती थी, उनकी बातों को मानती थी, लेकिन आज उसे लग रहा था जैसे उसने सबसे बड़ा गुनाह कर दिया हो, ऐसा गुनाह जिसकी कोई माफ़ी नहीं थी। 

    उसकी आँखों में आँसुओं का सागर उमड़ रहा था, पर उसने उन्हें किसी तरह रोक रखा था। वो जानती थी, अगर आज रोई, अगर आज कमज़ोर पड़ी, तो ये लोग उसे हमेशा के लिए कमज़ोर मान लेंगे और उसे पूरी ज़िंदगी सिर्फ अपनी सफाई ही देनी पड़ेगी।

    अद्वैत ने जैसे ही कमल और उसके पिता की बातें सुनी तो उसका खून खौल उठा। वो अब और चुप नहीं रह सका। उसने उनलोगों की तरफ मुड़कर पहली बार कुछ कहा। उसकी आवाज़ में ठहराव था, शांति थी, लेकिन एक ऐसी दृढ़ता थी जिसने माहौल की सारी फुसफुसाहटों को दबा दिया। 

    “ये तमाशा नहीं है,” अद्वैत ने कहा, “ये ज़िम्मेदारी है। रूहानी ने कोई गुनाह नहीं किया है। उसने अपनी ज़िंदगी का सबसे बड़ा फ़ैसला लिया है, अपनी ख़ुशी का फ़ैसला और मैं उसके साथ हूँ। हम दोनों ने अपनी मर्ज़ी से, एक-दूसरे से शादी की है और हम अपने फ़ैसले के लिए किसी से माफ़ी नहीं मांगेंगे।”

    उसने फिर भानु प्रताप की तरफ देखा, उसकी आँखों में कोई डर नहीं था, सिर्फ़ एक सीधी, अडिग चुनौती थी। “और जहाँ तक बात इज़्ज़त की है, इज़्ज़त किसी इंसान के पहनावे से नहीं, किसी के गोत्र या खानदान से नहीं, इज़्ज़त किसी इंसान के फ़ैसले से नहीं घटती, उसकी इज़्ज़त उसके कर्मों से होती है। 

    रूहानी ने आज जो हिम्मत दिखाई है, जो साहस दिखाया है, वो काबिले-तारीफ़ है। आप लोगों को उस पर शर्मिंदा नहीं, उस पर गर्व होना चाहिए।” अद्वैत के शब्द तीखे और सच्चे थे, उन्होंने माहौल में एक नई लहर पैदा कर दी।

    रूहानी ने अद्वैत की तरफ देखा, उसकी आँखों में अविश्वास झलक रहा था। क्या उसने सच में ये कहा? वो, जो अब तक बस एक औपचारिक रिश्ते का हिस्सा था, आज कुछ ऐसा कह गया था जो रूहानी ने कभी उम्मीद नहीं की थी….. इस कॉन्ट्रैक्ट मर्रिज के भीतर भी कोई उसके दर्द को समझ सकता है। ये बात उसके लिए अजीब भी थी और अप्रत्याशित भी। उसे समझ नहीं आ रहा था कि अद्वैत सचमुच उसकी फिक्र करता है, या ये भी किसी शर्त का हिस्सा है।

    भानु प्रताप ने पलटकर अपने दोस्तों की तरफ देखा, जो अब भी फुसफुसा रहे थे, सर हिला रहे थे, जैसे कोई घटिया नाटक देख लिया हो। उनके चेहरे पर तिरस्कार, हैरानी और मज़ाक का मिश्रण था।

    “इतनी भी बेहयाई कोई कैसे कर सकता है, अब तो रीत-रिवाज़ भी इनसे डरने लगे होंगे,” कमल की माँ ने खून खौलाते लहजे में कहा, जैसे उसके संस्कारों पर किसी ने सीधा वार किया हो।

    रूहानी की माँ जानकी चौहान के लिए ये सब बर्दाश्त कर पाना, ये दृश्य देखना आसान नहीं था। सालों से जिस बेटी को अपनी आंखों के सामने पाला था, जिसे हर रिश्ते के लिए, हर मर्यादा के लिए तराशा था, जिसे कुल की प्रतिष्ठा का प्रतीक माना था, वो आज एक अजनबी के साथ वरमाला और सिंदूर में लिपटी खड़ी थी…. बिना बताये, बिना पूछे, बिना समझाए। 

    समाज की बातें, मेहमानों की फुसफुसाहटें जो अब ज़ोर पकड़ने लगी थीं, और पति भानु प्रताप की तनी हुई भौंहें और अपमानित चेहरा…. इन सबके बीच जानकी का दिल तड़प उठा। उसकी आँखों के सामने उसके सारे सपने बिखरते नज़र आ रहे थे।

    वो धीरे-धीरे रूहानी के पास आई, उसका चेहरा देखा… उस चेहरे पर न कोई ग्लानि थी, न कोई शर्म, बस एक गहरा सन्नाटा था, एक थका हुआ भाव था जैसे वो बहुत लंबी लड़ाई लड़कर आई हो और वही सन्नाटा उसकी माँ की सहनशक्ति तोड़ गया। जिस बेटी से उसे उम्मीद थी कि वो आँखों में आँसू लेकर माफ़ी मांगेगी, वो बेटी शांत खड़ी थी, जैसे उसने कोई गलती की ही न हो।

    “शर्म नहीं आई तुझे?” जानकी ने धीमे, पर कड़वे शब्दों में कहा। उसकी आवाज़ में माँ का प्यार नहीं, अपमानित स्त्री का गुस्सा था। “हमारे जीते जी तूने सब खत्म कर दिया। हमारी इज़्ज़त, हमारा नाम… सब मिट्टी में मिला दिया।”

    रूहानी एक पल को स्तब्ध खड़ी रही। उसकी आँखें भर आई थीं, लेकिन चेहरा कठोर था। वह कुछ कहना चाहती थी। होंठों तक आते हुए शब्द काँप रहे थे।

    “माँ… मैं बस—”

    जानकी ने बात पूरी होने से पहले ही रूहानी के गाल पर एक ज़ोरदार तमाचा जड़ दिया। उस एक थप्पड़ की गूंज पूरे आँगन में फैल गई, हवा में गूंजती रही, जैसे समय ठहर गया हो। हर कोई सन्न रह गया।

    —————

    क्या वाकई ये थप्पड़ सिर्फ एक गाल पर पड़ा था… या फिर एक पीढ़ी के सपनों, भरोसे और इज्ज़त पर भी?

    अब क्या रूहानी फिर खड़ी हो पाएगी… या ये थप्पड़ उसकी हिम्मत की आखिरी दरार बन जाएगा?

    अद्वैत… क्या वो अब भी उसका हाथ वैसे ही थामे रखेगा, या इस तमाचे की गूंज उसके वादों को भी डगमगा देगी?

     

  • अधूरी इबादत भाग~17

    अधूरी इबादत भाग~17

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    भाग~17 शादी… मगर नकली

     

    रात के खाने के बाद जब सब अपने-अपने कमरों में चले गए थे, तब रुहानी चुपचाप छत पर आकर बैठ गई थी। ऊपर आसमान बिलकुल शांत था, लेकिन उसके भीतर हलचल थी… ऐसी जैसे ठहरे पानी में अचानक कोई कंकर गिरा हो। 

    हवा में हल्की ठंडक थी, और चाँद की रोशनी उसकी पलकों पर पड़ी तो उसकी सोच और भी गहराने लगी। वो अपने पैरों को सिकोड़े, घुटनों को बाँहों में भरे, बस छत के कोने में बैठी थी, जैसे किसी सवाल की तलाश में हो, जो खुद उसी के भीतर छुपा हो। 

    रात की नमी, नीले आसमान का सूनापन, और शहर की दूर होती हलचलें…. सब जैसे मिलकर कोई अनकहा गीत गा रही थीं, जिसमें हर सुर रुहानी की बेचैनी को छू रहा था।

    यश की कही सारी बातें अब भी उसके कानों में गूंज रही थीं… एक-एक लफ़्ज़ जैसे मन के अंदर गहराई तक उतर गया था। अद्वैत ने जो कहा था, यश ने सब कुछ ज्यों का त्यों सुना दिया था, लेकिन उस सच्चाई में भी कहीं न कहीं कोई परतें छुपी थीं, जो रुहानी को भीतर से बेचैन कर रही थीं।l

    “आख़िर वो मुझसे शादी क्यूँ करना चाहता है?” – ये सवाल उसकी सोच में बार-बार एक टकराते हुए समुंदर की तरह उठ रहा था, जिसका कोई किनारा नजर नहीं आ रहा था। उसकी ज़िंदगी के सबसे कठिन लम्हे में उसने उसे बचाया था, ये बात सच थी…. लेकिन क्या किसी की जान बचाने भर से कोई रिश्ता इतना गहरा हो सकता है कि वो शादी तक पहुंच जाए? नहीं… रुहानी का दिल मानने को तैयार नहीं था।

    उसने जितना अद्वैत को जाना था… उसके घर में रहते हुए, उसकी मेड से बात करके…. वो इंसान तो बेहद आत्मनिर्भर था, एकदम अपने ही खोल में बंद, जैसे दुनिया से कोई सरोकार ही न हो। उसके चेहरे पर हमेशा एक उदास ठहराव रहता था, जैसे हर मुस्कान पर एक साया हो। वो न तो फालतू बातचीत करता, न ही किसी से खास घुलता-मिलता। 

    और फिर, सबसे बड़ी बात जो रुहानी को भीतर तक कचोट रही थी…. वो ये कि अद्वैत अपनी मरी हुई पत्नी से बेहद मोहब्बत करता था। इतना कि उसके गुजर जाने के बाद किसी और औरत को उसने अपने घर में आने तक नहीं दिया। ना कोई दोस्त, ना कोई हमराज़, ना कोई छांव।)

    तो फिर… ऐसी कौन सी बात है जो उसे, एक अजनबी लड़की को, अपनी पत्नी बनाने के लिए मजबूर कर रही है? रुहानी की उंगलियाँ धीरे-धीरे उसकी मोबाइल की किनारी से खेल रही थीं, और मन सवालों के भंवर में डूबा जा रहा था। 

    तभी उसके हाथ में रखा मोबाइल एकाएक बज उठा।  पर बस एक नाम चमक रहा था — Adwait. जैसे किसी खामोश तलाब में पत्थर गिरा हो, वैसे ही उसकी तंद्रा टूटी। उस एक नाम से उसके भीतर की सारी उलझनें जाग उठीं। हाथ थोड़े काँपे, पर उसने कॉल उठा लिया।

    फोन उठते ही दोनों तरफ कुछ क्षण की चुप्पी रही। जैसे दोनों अपनी साँसें थामे हुए हों, जैसे शब्दों से ज़्यादा भारी हो गई हों खामोशियाँ। और फिर जैसे कोई धागा एक साथ खिंच जाए….. दोनों एक साथ बोल पड़े:

    “मुझे तुम्हें कुछ बताना है,” अद्वैत की आवाज़ थी, भारी और धीमी।

    “मुझे तुमसे कुछ पूछना है,” रुहानी की आवाज़ में भी हल्की थरथराहट थी।

    फिर दोनों एक साथ रुक गए। एक और खामोशी, लेकिन इस बार वह बोझिल नहीं थी…. यह एक इंतज़ार की खामोशी थी।

    रुहानी ने आखिरकार धीमे स्वर में कहा, “यश ने बताया तुम्हारे प्रपोज़ल के बारे में… उसी सिलसिले में कुछ पूछना था मुझे।”

    फोन के दूसरी तरफ अद्वैत ने एक लंबी, गहरी साँस ली, जैसे शब्दों को आकार देने के लिए भीतर से कुछ खींच रहा हो, और फिर बोला, “इससे पहले कि तुम कुछ पूछो, मैं तुम्हें कुछ बताना चाहता हूँ… जिससे शायद तुम्हारे सारे सवालों के जवाब खुद-ब-खुद मिल जाएँ।”

    रुहानी थोड़ी चौंकी। यह शायद पहली बार था जब अद्वैत ने उससे इतने लंबे वाक्य में कुछ कहा था। कुछ तो था उस आवाज़ में…. कोई थकान, कोई सच्चाई, कोई बोझ। 

    वह बस “हम्म… ठीक है, कहो जो कहना है,” कहकर सुनने लगी।

    अद्वैत की आवाज़ फिर आई, बहुत साफ और सीधे लहजे में, “ये शादी असली शादी नहीं होगी।”

    रुहानी के माथे पर लकीरें उभर आईं, और उसकी भौहें एक-दूसरे के पास सिमट गईं। “क्या मतलब?” उसने पूछा, जैसे किसी पहेली को हल करने की कोशिश कर रही हो।

    “तुम्हें थोड़ा अजीब लग रहा होगा,” अद्वैत ने कहा, “लेकिन हमारी शादी एक शो होगी दुनिया के लिए… मतलब, ‘contract marriage’। मुझे इसी सिलसिले में तुमसे बात करनी थी।”

    अब उसकी आवाज़ में कोई झिझक नहीं थी….. जैसे जो बोझ वो दिल में लिए फिर रहा था, अब वो उतरने वाला हो। और उधर रुहानी की आँखें आसमान को नहीं, अब अपने भीतर के किसी सच को देख रही थीं….. वो सच, जिसे वो अब तक अनदेखा कर रही थी।

    रुहानी के कानों में जब ये सब बातें पड़ीं, तो पहले-पहल उसे विश्वास नहीं हुआ। शब्द तो मानो हवा में तैरते हुए आए थे, मगर जब उन्होंने उसके दिल की सतह को छुआ, तो वहां से भी कुछ वैसी ही सच्चाई फूट पड़ी। 

    भीतर से एक आवाज आई….. थकी हुई, टूटी हुई, मगर बेहद सच्ची…..”मैं भी तो किसी से रियल में शादी नहीं करना चाहती, ये भी ठीक ही है।” उसकी आंखों में थोड़ी नमी थी, लेकिन होंठों पर एक हल्की सी राहत की परछाईं भी। जैसे किसी भारी बोझ को अस्थायी ही सही, मगर कुछ देर के लिए नीचे रख दिया गया हो।

    अद्वैत की आवाज फिर कानों में पड़ी, गहरी और संयमित, “ऐसे तो मुझे एक साल का कॉन्ट्रैक्ट चाहिए तुमसे, लेकिन अगर तुम्हें कम या ज़्यादा करवाना हो तो तुम बता देना।”

    उसकी आवाज़ में एक पेशेवर ठंडक थी, पर उसके शब्दों की परतों में कहीं एक आत्म-रक्षा की दीवार भी थी… जैसे वो कुछ छुपा रहा हो, खुद से भी।

    रुहानी हल्की मुस्कराहट के साथ, पर दिल में उठते सवालों को थामे, धीरे से पूछ बैठी, “और क्या-क्या टर्म्स एंड कंडीशन्स रहेंगी इस कॉन्ट्रैक्ट में?”

    अद्वैत ने तुरंत कहा, “उतना सारा अभी कॉल पर बताना तो इम्पॉसिबल है। मैं तुम्हें सब मैसेज कर दूँगा। तुम्हें जो भी मॉडिफिकेशन करवाना हो, तो जल्द से जल्द मुझे रिप्लाई कर देना। मैं कल अपने मैनेजर से कहकर सारे डॉक्युमेंट्स बनवा लूंगा।”

    फोन की स्क्रीन से चिपकी रुहानी की उंगलियाँ कांप गईं। कोई रिश्ता यूँ कागज़ों में बंध जाए, ये सोचना भी भारी लग रहा था। लेकिन अब कुछ पूछे बिना रहा न गया। उसकी आवाज़ में एक थरथराहट थी, जैसे भीतर की सच्चाई बाहर आने को तैयार हो—“अचानक से तुम्हें कॉन्ट्रैक्ट मैरिज करने की क्या ज़रूरत आन पड़ी?”

    अद्वैत ने अपनी आंखें कुछ पल के लिए बंद कीं, जैसे हर जवाब को भीतर से टटोल रहा हो। फिर धीरे-धीरे कहने लगा, “ये सब मेरी राइटिंग करियर के लिए है। नाम है मेरा, एक इमेज है… उस पर दाग नहीं लगने दे सकता। कुछ चीजें दुनिया के लिए परफेक्ट दिखानी पड़ती हैं।”

    उसकी आवाज में कोई घमंड नहीं था, बस एक थकी हुई सच्चाई थी….जैसे कोई लेखक अपने किरदार को नहीं, खुद को पर्दे के पीछे छिपा रहा हो। कुछ कहने से पहले ही अद्वैत फिर बोल पड़ा, मानो उसे डर था कि कहीं रुहानी कोई वाजिब सवाल ना पूछ ले जिससे उसका यह ताश का महल हिल जाए, “याद रहे, contract marriage की बात केवल मैं, तुम, मेरे मैनेजर और वकील को ही पता रहेगी। इसके अलावा और कोई नहीं जान पाए।”

    रुहानी के होंठों पर एक उदासी भरी हँसी खिली, जो मुस्कान से ज़्यादा एक खामोश स्वीकार था। “तुम बेफिकर रहो,” उसने कहा, और वो शब्द किसी वादे की तरह गूंजे, जैसे उसने ना सिर्फ अद्वैत की बात मानी, बल्कि खुद को भी एक दायरे में कैद कर दिया हो। 

    उस हँसी में कोई नयापन नहीं था, बस एक पुरानी थकान थी…. एक लड़की की जो रिश्तों से ज़्यादा उम्मीदें करना भूल चुकी थी, और अब हर सौदे में बस थोड़ी सी इज़्ज़त ढूंढ रही थी।

    ——–

    रुहानी ने जो ‘हाँ’ कहा, क्या वो किसी मजबूरी का फैसला था… या दिल के किसी छुपे कोने से आई सहमति?

    जब इस कॉन्ट्रैक्ट की शर्तें कागज़ पर उतरेंगी… तो क्या कोई एक लाइन उनकी किस्मत की लकीर बदल देगी?

    क्या एक समझौते के तहत बंधे इस रिश्ते में सचमुच कोई प्यार, कोई इमोशन हो सकता था?

  • अधूरी इबादत भाग~16

    अधूरी इबादत भाग~16

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    भाग~16 खुद से बड़ा सवाल

     

    अद्वैत उस पुराने, हल्की रोशनी वाले कैफ़े के एक कोने की टेबल पर बैठा था, जहाँ लकड़ी की मेज़ें और दीवारों पर लगे पुराने पोस्टर अब भी बीते ज़माने की खुशबू सँजोए हुए थे।

    वो बच्चा, जो पहली बार उससे मिला था, अब उसकी ज़िंदगी की सबसे गंभीर बात कह चुका था…. शादी की, रिश्तों की, भरोसे की। यश के शब्द अब भी उसके ज़ेहन में गूंज रहे थे, और उसकी आँखें उस बालक की मासूम गंभीरता में उलझी हुई थीं, जैसे वो किसी गहरे सवाल के जवाब ढूँढ रही हों।

    “तुम तो आज पहली बार मुझसे मिल रहे हो, यश,” अद्वैत की आवाज़ में एक अजीब सी नरमी थी, मानो वह किसी नाजुक काँच को थाम रहा हो, “तो तुम मुझे अपनी दीदी से शादी करने के लिए कैसे कह सकते हो?”

    यश ने चौंकने की बजाय बहुत सधे हुए स्वर में जवाब दिया, उसकी आँखों में कोई हिचक नहीं थी, “दीदी ने आपके बारे में जितना बताया है, उससे मुझे तो आप बहुत भले इंसान लगते हो।”

    अद्वैत ने एक पल को उसकी ओर देखा, उसकी आँखों में सच में कोई छल नहीं था। मगर वो यह सुनकर और जानना चाहता था। उसकी आवाज़ में थोड़ी जिज्ञासा उभरी, “भला इंसान कैसे?”

    यश का चेहरा खिल उठा। “सबसे पहली बात,” उसने कहा, “आपने मेरी दीदी की जान बचाई है। और दूसरी, सबसे बड़ी बात – आपने कभी भी उनका फायदा नहीं उठाया, न उनके साथ कुछ ग़लत किया। आजकल तो लोग बस मौके ढूंढते हैं, लेकिन आपने… आपने उन्हें स्पेस दिया, इज़्ज़त दी… वो चीज़ जो शायद उन्हें सबसे ज़्यादा चाहिए थी।”

    अद्वैत के भीतर कुछ खामोशी से हिलने लगा। यश के मासूम शब्दों ने उसे अंदर तक छू लिया था। उसे लगा जैसे कोई उसके अंधेरे कमरे में एक छोटा सा दीया जला गया हो, बिना कोई शोर किए। उस पल में अद्वैत को एहसास हुआ कि भले ही उसने कुछ बड़ा नहीं किया हो, पर शायद… शायद उसका होना ही किसी के लिए काफी हो गया था।

    अद्वैत को अपने बारे में यश के मुँह से ये बातें सुनना कुछ अजीब सा लग रहा था। भीतर कहीं कुछ काँप गया था। जैसे कोई पुरानी धूल में ढकी हुई तस्वीर अचानक आँखों के सामने आ गई हो—अपनी माँ की वो आँखें, जिनमें उसने आखिरी बार देखा था खुद पर भरोसा। वो आँखें जो कहती थीं, “दूसरे जैसे मत बनना, अद्वैत… अपनी अच्छाई को मत छोड़ना।” आज यश के मासूम शब्दों ने उस अधूरी बात को पूरा कर दिया था।

    जिस अद्वैत अवस्थी को दुनिया अक्सर “नजायज़” कहकर किनारे कर देती थी, जिसके नाम के आगे कभी पिता का नाम नहीं जुड़ा, जिसकी परवरिश सवालों की छांव में हुई—क्या वही अद्वैत आज किसी के लिए “भला इंसान” कहलाने लायक बन गया है? क्या उसने सचमुच अपनी माँ के आदर्शों को जी लिया है, जो एक किशोर लड़के की आँखों में इतनी साफ इज्ज़त उतर आई?

    लेकिन जैसे ही उसका मन उन ख्यालों में बहने लगा, उसने खुद को एक झटका दिया। नहीं, अभी भावनाओं में बहने का समय नहीं है। उसने गहराई से यश की आँखों में देखा, फिर धीमी, मगर साफ आवाज़ में बोला, “यश, तुम्हें किसी भी तरह अपनी दीदी को कल कोर्ट लेकर आना होगा। तभी हम दोनों की शादी हो पाएगी।”

    यश कुछ कहने ही वाला था कि अद्वैत ने जल्दी से जोड़ा, “लेकिन इस बारे में सिर्फ़ तुम्हें और रूहानी को ही पता होना चाहिए। कोई तीसरा नहीं। कोई भी नहीं।”

    उसके शब्दों में कोई डर नहीं था, मगर एक जिम्मेदारी की थकान ज़रूर थी। मानो वो उस अकेले पुल पर खड़ा हो जहाँ से नीचे छलांग लगाना भी जरूरी था और टिके रहना भी। उसकी आवाज़ में स्थिरता थी, लेकिन भीतर कहीं बहुत गहराई में एक बवंडर चल रहा था…. डर, उम्मीद और एक अजीब-सी राहत का। जैसे वो किसी ऐसी डोर को थामे खड़ा था जो अगर टूटी, तो सब कुछ बिखर जाएगा, लेकिन अगर बची रही… तो शायद एक नई ज़िंदगी शुरू हो सकती थी।

    यश की बातों को सुनते हुए अद्वैत का मन कुछ झिझकता है, लेकिन उसने अपने भीतर के असमंजस को दबा दिया। “आप फिक्र मत कीजिए सर, कल मैं उन्हें शादी की शॉपिंग के नाम से ले आऊँगा,” यश का विश्वासपूर्ण स्वर सुनकर अद्वैत ने एक गहरी सांस ली। 

    फिर, जैसे किसी कांटे को उखाड़ने की कोशिश करते हुए उसने अपनी चिंता को एक बार फिर से व्यक्त किया, “लेकिन साथ में कोई और नहीं होना चाहिए, ना ही तुम्हारी माँ या तुम्हारे पापा।” अद्वैत के शब्दों में गहरी चिंता थी, जैसे उसके मन में एक अंधी सी गलती का डर पल रहा हो, जो इस फैसले को और भी कठिन बना रहा था।

    यश ने एक हल्की मुस्कान के साथ कहा, “आप निश्चिंत रहिए, दीदी को लेकर मैं अकेले ही आऊँगा, माँ-पापा मुझे कुछ नहीं बोलेंगे।” यश के शब्दों में एक तरह का आत्मविश्वास था, लेकिन अद्वैत के भीतर एक हल्की सी खटक महसूस हुई। यह विश्वास था या फिर एक और भ्रम, वह नहीं जानता था।

    उसके मन में एक असमंजस था, जैसे एक तट पर खड़ा कोई इंसान जो जानता है कि समुद्र की लहरें कभी भी उसे अपनी चपेट में ले सकती हैं, फिर भी वह कदम बढ़ाने के लिए तैयार नहीं है। उसने अपने भीतर की घबराहट को शांत किया, और फिर से अपने ध्यान को एक ही बिंदु पर केंद्रित किया। “बस, अब यहीं तक,” उसने खुद से कहा, और फिर वहां से जाने का निर्णय लिया।

    अद्वैत जैसे ही उठने वाला था, तभी उसकी नजरें रुहानी के फोन पर पड़ीं, जो अभी भी उसके हाथों में था। कुछ पल के लिए वह जैसे ठहर गया। उसकी उंगलियाँ फोन के आसपास हल्की सी घूमने लगीं, जैसे उसे इसे वापस करना न हो, बल्कि उसमें छुपे हुए किसी गहरे रिश्ते को थामे रखने की इच्छा हो।

    दिल में उथल-पुथल सी महसूस हो रही थी। वह रुहानी से जुड़ी हर बात, हर याद, उसकी आँखों के सामने जैसे सजीव हो उठी। पर फिर उसने खुद को सँभाला और यथार्थ में लौटते हुए यश को फोन वापस करते हुए कहा, “अपनी दीदी को उसका फोन दे देना।”

    यश ने उस फोन को सावधानी से अद्वैत से लिया और उसे अपने हाथों में थाम लिया, जैसे कोई बहुमूल्य चीज हो। वह खड़ा होने लगा, जाने के लिए तैयार था, तभी अद्वैत ने उसे रोकते हुए कहा, “और हाँ, रुहानी को बोल देना कि मैंने अपना नंबर इस में सेव कर लिया है और मैं उससे बात कर लूंगा।”

    यश ने सिर झुकाकर कहा, “जी जरूर, धन्यवाद,” और धीरे-धीरे कदम बढ़ाए। अद्वैत ने उसे जाते हुए देखा, लेकिन उसका मन अभी भी कहीं और था। उसके भीतर जैसे एक अजीब सी लहर दौड़ रही थी। उसका ध्यान अब भी उसी फोन पर था, जिसमें रुहानी की यादें और उसकी खुशबू बसी हुई थी। यश के जाते ही अद्वैत वहीं बैठा रहा, जैसे किसी उलझी हुई सोच में खो गया हो। उसके दिल में एक अजीब सी गहरी खामोशी थी, जिसे वह खुद भी समझ नहीं पा रहा था।

    ———–

    क्या अद्वैत की ज़िंदगी में अब भी कोई और आ सकता था, या फिर वह खुद ही किसी अजनबी भविष्य की ओर बढ़ रहा था?

    क्या रुहानी इस समझौते को स्वीकार करेगी, जो अद्वैत ने बिना उससे पूछे तय कर दिया है? 

    अद्वैत की उम्मीदों और रुहानी के दिल के बीच जो अनकही बातें हैं, क्या वे दोनों के सामने आने वाली राह को बदल देंगी?

  • अधूरी इबादत भाग~15

    अधूरी इबादत भाग~15

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    भाग~15 अद्वैत की सबसे बड़ी चुनौती

     

    अद्वैत सुबह की पहली रोशनी के साथ ही घर से निकल पड़ा। उसके कदम धीमे थे लेकिन मन तेज़ी से दौड़ रहा था…. जैसे हर मोड़ पर कोई अधूरी बात उसका इंतज़ार कर रही हो। 

    यश द्वारा भेजे गए पते को उसने रात भर निहारते हुए कितनी बार देखा था, अब वही पता उसे एक अजनबी सच्चाई की ओर ले जा रहा था। 

    कार चलाते हुए भी उसकी नज़रें अक्सर सड़कों से हटकर शहर की धड़कनों को पढ़ने की कोशिश करती… कोरे आसमान के नीचे फैले चाय के ठेले, जागती हुई दुकानों की नीम रोशनी और कॉलेज के बाहर खड़े युवाओं की हल्की सी चहक…. ये सब उस शहर के अपनेपन को बिखेर रहे थे, फिर भी अद्वैत के मन में कुछ अनकहा, कुछ अधूरा सा महसूस हो रहा था।

    उसने कार एक शांत गली में मोड़ी और कुछ देर बाद एक छोटे लेकिन सलीके से सजे कैफ़े के सामने आकर रुक गई। कैफ़े की बाहरी दीवारों पर बेलें चढ़ी थीं, जिन पर सुबह की धूप छिटकी हुई थी। भीतर से हल्की सी जैज़ म्यूज़िक की आवाज़ आ रही थी और एक पुरानी लकड़ी की खिड़की के पार कुछ रंगीन कुर्सियाँ करीने से रखी थीं। 

    अद्वैत कुछ देर बाहर ही खड़ा रहा। उसकी आँखें हर आहट पर टिक जाती और दिल हर दरवाज़े की ओर उम्मीद से देखता। कुछ देर बाद वह वह कैफ़े में प्रवेश किया। 

    अंदर की हवा में कॉफी और वैनिला की खुशबू थी और कोनों में रखी किताबों से उठती खामोशी…. सब कुछ बेहद सुकून देने वाला था, लेकिन अद्वैत की बेचैनी उस शांति को भी चीर रही थी। उसने अपनी निगाहें चारों ओर दौड़ाईं, किसी अपरिचित लेकिन परिचित चेहरे की तलाश में।

    अद्वैत कैफ़े के कोने वाली टेबल पर बैठा था, जहाँ एक बड़ी सी खिड़की बाहर सड़क की हलचल दिखा रही थी। उसने सामने टेबल पर रूहानी का फोन रखा। उसकी उंगलियाँ बार-बार फोन के पास जाती, जैसे हर स्पर्श में कोई संकेत टटोल रही हो। 

    वह लगातार बाहर झाँकता रहा…. उसकी आँखों में किसी अजनबी की प्रतीक्षा का तनाव था। हर बार जब कोई लड़का कैफ़े के पास आता, उसका मन थोड़ी देर के लिए ठहर जाता और फिर उसी अनिश्चितता में लौट जाता। 

    कुछ ही देर में एक दुबला-पतला किशोर, स्कूल यूनिफॉर्म में, बैग लटकाए, तेज़-तेज़ कदमों से आता दिखा। उसने वही बाहर से रूहानी के फोन पर कॉल किया। अद्वैत ने फोन को देखा, और फिर खिड़की से बाहर….. दोनों की नज़रें मिली और एक सहज मुस्कान के साथ उन्होंने अपने-अपने हाथ हिलाए, जैसे किसी अनकहे बंधन को पहचान लिया हो।

    यश दरवाजा खोलते ही अद्वैत की ओर ऐसे लपका, मानो कोई छोटा भाई किसी बड़े को बहुत दिनों बाद देख रहा हो। उसकी साँसें तेज़ थीं, लेकिन आँखों में गहरी कृतज्ञता की चमक थी। उसने बैग उतारकर एक ओर रखा और बिना देर किए अद्वैत के सामने बैठ गया। 

    वह कुछ पल तक उसे देखता रहा, फिर भर्राए गले से बोला — “सर… मैं आपको सिर्फ एक बार शुक्रिया कहना चाहता था… आपने मेरी दीदी को बचाया… वरना आज शायद हम…” उसकी आवाज़ टूटने लगी, लेकिन उसने खुद को सम्भाला, “मैं नहीं जानता आपने क्यों और कैसे किया… लेकिन मेरे लिए आप भगवान से कम नहीं।” 

    अद्वैत की आँखों में उस क्षण एक अजीब सा सन्नाटा उतर आया…. तारीफ सुनना उसे कभी सहज नहीं लगता था, खासकर तब जब वो खुद अपने किए पर संशय में हो। उसने धीमे स्वर में कहा, “मैंने कुछ ख़ास नहीं किया… बस जो सही लगा, वही किया।” 

    यश की आँखों में आँसू तैर रहे थे, मगर उन्हीं अश्रुओं की गहराई में कहीं एक विश्वास भी चमक रहा था… जैसे उसे यक़ीन हो चला हो कि उसकी दीदी की टूटी-बिखरी कहानी शायद फिर से एक मुकम्मल रूप ले सके।

    अद्वैत कुछ क्षणों तक यश को एकटक देखता रहा, जैसे उसके भीतर चल रही भावनाओं को समझना चाहता हो। कैफ़े की हल्की रोशनी में यश का चेहरा थका हुआ था, लेकिन आँखों में जो सच्चाई थी, वो अद्वैत को भीतर तक छू रही थी। 

    उसने अपनी हथेलियाँ मेज़ पर रख दीं, और थोड़ी देर की चुप्पी के बाद धीमे स्वर में पूछा, “यश… क्या तुम मुझे बता सकते हो कि रूहानी ने ऐसा कदम क्यों उठाया था?” 

    उसकी आवाज़ में जिज्ञासा से ज़्यादा दर्द था, जैसे वह उस अधूरे रहस्य के धागे को पकड़कर कुछ समझने की कोशिश कर रहा हो। 

    यश ने एक गहरी साँस ली, उसके होंठ थोड़े काँपे, लेकिन उसने बोलना शुरू किया, “सर, दीदी हमेशा से थोड़ी अलग थी… कुछ साल पहले से ही वह कपड़े डिज़ाइन करने का सपना देखा करती थी, लेकिन मम्मी-पापा को यह मंज़ूर नहीं था। माँ हमेशा उसे शादी और घरेलू जिम्मेदारियाँ निभाने की सलाह देती रहती थी जैसे उसकी अपनी इच्छाएँ कोई मायने नहीं रखती थीं।”

    अद्वैत ने चुपचाप यश की बातों को सुन रहा। यश ने बात आगे बढ़ाई, “फिर एक दिन कुछ हुआ। घर में एक बड़ा झगड़ा और दीदी बहुत टूट गई थी। माँ -पापा ने जब उन्हें कहा की वो उनके मर गई तब शायद उन्होंने सोचा होगा कि सब कुछ खत्म कर दे।”

    अद्वैत की आँखें धीरे-धीरे नम होने लगीं। हर एक शब्द उसे रूहानी के उस चेहरे की याद दिला रहा था जो चुप तो रहता था, पर बहुत कुछ कहता था। 

    यश ने फिर कुछ ऐसा कहा जिससे अद्वैत पर मानो बिजली गिर पड़ी हो। उसके शब्दों ने उसकी पूरी दुनिया को हिला दिया।

    यश ने गहरी चिंता में डूबकर कहा, ‘आपके यहाँ से जाने के बाद पापा ने यह ऐलान कर दिया कि वह जल्द से जल्द दीदी की शादी कर देंगे… एक ऐसे आदमी से, जो पुरानी सोच और सख्त धारणाओं में बंधा हो, और जो दीदी की स्वतंत्रता को समझ न सके। दीदी ने उन्हें मना किया, लेकिन पापा को सिर्फ नाम और इज़्ज़त की परवाह है।’ यश की आँखों से एक आँसू टपककर टेबल पर गिरा।

    यश की बातों को सुनते ही अद्वैत के मन में कई विचारों की लहरें उठने लगीं। वह सोचने लगा, अगर रूहानी की शादी सच में हो गई तो उसकी व्यक्तिगत उलझनें उसकी पेशेवर छवि को गहरा नुकसान पहुँचा सकती हैं। 

    लेखक के रूप में उसकी प्रतिष्ठा और सफलता पर इसका प्रतिकूल असर पड़ेगा। मीडिया पहले ही उसकी निजी ज़िंदगी को घेर चुका था और वह जानता था कि यदि यशस्वी से इस अनुबंधित शादी के बारे में बात नहीं की, तो उसका करियर खतरे में पड़ सकता है। उसका आत्म-सम्मान अब दबावों के नीचे दबा हुआ था और उसे सिर्फ अपनी छवि की चिंता सता रही थी।

    लेकिन अगले ही पल, यश की बातों से अद्वैत को राहत मिली। उसने महसूस किया कि यश की मासूमियत और उसके विश्वास में एक गहरी पीड़ा छिपी थी, जो उसकी दीदी को बचाने की आखिरी उम्मीद थी। 

    थोड़ी देर रुककर उसने सीधा अद्वैत की आँखों में देखा और बोला, “सर… इसीलिए मैं आपसे मिलना चाहता था। मैं जानता हूँ कि आप दीदी के लिए अजनबी हैं, लेकिन फिर भी… आपने उन्हें ज़िंदगी दी है। और अगर… अगर आप उनसे शादी कर लें… तो शायद दीदी की शादी के लिए पापा जबरदस्ती नहीं कर पाएंगे।” 

    यश के शब्दों में एक मासूम सी ज़िद थी, एक छोटे भाई की उम्मीद, जिसने अपनी बहन को खोते-खोते बचाया था… और अब उसे फिर से टूटने नहीं देना चाहता था। अद्वैत बस चुप था, जैसे शब्द कहीं खो गए हों और दिल एक अनकहे बोझ से भर गया हो।

    अद्वैत ने हल्के से मुस्कुराने की कोशिश की, लेकिन वो मुस्कान पूरी नहीं हो सकी और उसने बहुत संयम से यश की ओर देखा। 

    “तुम तो आज पहली बार मुझसे मिल रहे हो, यश,” अद्वैत की आवाज़ में एक अजीब सी नरमी थी, मानो वह किसी नाजुक काँच को थाम रहा हो, “तो तुम मुझे अपनी दीदी से शादी करने के लिए कैसे कह सकते हो?”

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    क्या अद्वैत इस घने उलझन के बीच अपनी पहचान और करियर को खतरे में डालने को तैयार था?

    अद्वैत के दिल में एक सवाल गूंजा… क्या यह सच में सिर्फ एक रास्ता था, या फिर यह एक ऐसा चक्र था जिससे निकलने का कोई रास्ता नहीं था?

    उसकी ज़िंदगी की सबसे बड़ी चुनौती अब इस ए:क सवाल पर टिकी थी – क्या वह खुद को उस रिश्ते में बँधने दे सकता था?

     

  • 20 साल का इंतजार

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

    “अरे, शादी को पूरे बीस साल हो गए… लेकिन आज तक इनके घर में बच्चे की किलकारी नहीं गूंजी।”

     

    गांव की चौपाल हो, किसी की शादी हो या कोई त्योहार, रवि और मीरा जहां भी जाते, लोगों की बातें उनका पीछा नहीं छोड़ती थीं।

     

    “इतने साल हो गए, अब तो उम्मीद ही छोड़ देनी चाहिए।”

     

    “पता नहीं पिछले जन्म का कौन-सा पाप है।”

     

    ऐसी बातें सुन-सुनकर मीरा का दिल हर बार टूट जाता था। लेकिन वह किसी से कुछ नहीं कहती। बस चुपचाप अपने आंसू पोंछ लेती।

     

    रवि हमेशा उसका हौसला बनकर खड़ा रहता।

     

    वह मुस्कुराकर कहता,

    “दुनिया का काम बोलना है मीरा… और हमारा काम महादेव पर भरोसा रखना।”

     

    उनका छोटा-सा घर बहुत साधारण था, लेकिन उसमें प्यार की कोई कमी नहीं थी। दोनों एक-दूसरे का इतना ख्याल रखते कि देखने वाले कहते, “भगवान ने इन्हें संतान भले न दी हो, लेकिन इनके रिश्ते में कभी कमी नहीं आने दी।”

     

    हर सोमवार दोनों सुबह-सुबह उठकर महादेव के मंदिर जाते। मीरा अपने हाथों से शिवलिंग पर जल चढ़ाती और आंखें बंद करके बस एक ही प्रार्थना करती,

     

    “महादेव… अगर हमारी किस्मत में संतान है तो जरूर देना, और अगर नहीं है तो इतना धैर्य देना कि कभी आपसे शिकायत न करूं।”

     

    रवि भी हाथ जोड़कर कहता,

     

    “भोलेनाथ, हमें आपकी हर मर्जी मंजूर है।”

     

    समय अपनी रफ्तार से चलता रहा।

     

    एक दिन रवि के छोटे भाई के बेटे का जन्मदिन था। पूरा परिवार खुशियां मना रहा था।

     

    मीरा भी अपने हाथों से बच्चे के लिए केक और मिठाइयां लेकर गई।

     

    तभी एक रिश्तेदार ने ताना मारते हुए कहा,

     

    “दूसरों के बच्चों पर इतना प्यार लुटाने से क्या होगा? अपना बच्चा होता तो बात ही अलग थी।”

     

    दूसरी औरत भी हंसते हुए बोली,

     

    “भगवान हर किसी की झोली नहीं भरता।”

     

    ये सुनते ही मीरा की आंखें भर आईं।

     

    उसके हाथ से मिठाई की प्लेट लगभग गिर ही गई।

     

    रवि ने तुरंत उसका हाथ पकड़ लिया और बिना किसी से कुछ कहे वहां से निकल आया।

     

    घर लौटते समय पूरे रास्ते दोनों चुप रहे।

     

    कुछ देर बाद मीरा रोते हुए बोली,

     

    “क्या सच में मेरी ही कमी है? क्या मैं कभी मां नहीं बन पाऊंगी?”

     

    रवि ने गाड़ी रोक दी।

     

    उसने मीरा का चेहरा अपने हाथों में लिया और कहा,

     

    “मेरी नजर में तुम दुनिया की सबसे अच्छी पत्नी हो। अगर पूरी जिंदगी भी हम दोनों अकेले रहे, तब भी मुझे कोई दुख नहीं होगा। मुझे सिर्फ तुम्हारी मुस्कान चाहिए।”

     

    मीरा और भी ज्यादा रो पड़ी।

     

    उस रात दोनों ने खाना भी नहीं खाया।

     

    वे सीधे घर के मंदिर में जाकर महादेव की मूर्ति के सामने बैठ गए।

     

    न कोई शिकायत…

     

    न कोई सवाल…

     

    बस आंखों में आंसू और दिल में भरोसा था।

     

    दिन महीने बने…

     

    महीने साल बने…

     

    और देखते ही देखते शादी के पूरे बीस साल बीत गए।

     

    अब गांव वालों ने ताने देना भी कम कर दिया था, क्योंकि उन्हें लगने लगा था कि अब इनके घर कभी बच्चा नहीं आएगा।

     

    लेकिन रवि और मीरा का विश्वास आज भी पहले जैसा अटल था।

     

    सावन का महीना शुरू हुआ।

     

    रवि ने कहा,

     

    “मीरा, इस बार हम पैदल चलकर ज्योतिर्लिंग के दर्शन करेंगे।”

     

    मीरा मुस्कुराकर बोली,

     

    “जहां महादेव बुलाएंगे, वहां तक जरूर चलेंगे।”

     

    दोनों ने यात्रा शुरू की।

     

    रास्ता आसान नहीं था।

     

    कभी तेज धूप पड़ती…

     

    कभी मूसलाधार बारिश शुरू हो जाती…

     

    कभी पथरीले रास्तों पर पैर छिल जाते…

     

    लेकिन दोनों के होंठों पर सिर्फ एक ही जयकारा था—

     

    “हर हर महादेव!”

     

    यात्रा के आखिरी दिन जब दोनों मंदिर पहुंचे तो मीरा शिवलिंग के सामने बैठते ही फूट-फूटकर रोने लगी।

     

    उसने हाथ जोड़कर कहा,

     

    “महादेव… आज मैं आपसे कुछ मांगने नहीं आई हूं। बस अपना सारा दुख आपके चरणों में छोड़ने आई हूं। अब जो आपकी इच्छा, वही हमारी किस्मत।”

     

    पास ही बैठे एक वृद्ध साधु काफी देर से दोनों को देख रहे थे।

     

    उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा,

     

    “बेटी, याद रखना… भोलेनाथ के घर देर हो सकती है, लेकिन अंधेर कभी नहीं होता। तुम्हारा विश्वास खाली नहीं जाएगा।”

     

    रवि और मीरा ने उनके चरण छुए और मन में नई उम्मीद लेकर घर लौट आए।

     

    करीब दो महीने बाद मीरा की तबीयत अचानक बिगड़ने लगी। उसे बार-बार चक्कर आने लगे और कमजोरी महसूस होने लगी।

     

    रवि घबरा गया और तुरंत उसे शहर के अस्पताल लेकर पहुंचा।

     

    डॉक्टर ने कुछ जांचें लिखीं और दोनों को बाहर इंतजार करने के लिए कहा।

     

    रिपोर्ट आने तक दोनों की धड़कनें तेज थीं।

     

    मीरा बार-बार महादेव का नाम जप रही थी, जबकि रवि उसकी हथेली थामे चुपचाप बैठा था।

     

    थोड़ी देर बाद डॉक्टर मुस्कुराते हुए बाहर आए…

     

    और बोले,

     

    “बधाई हो… आप दोनों माता-पिता बनने वाले हैं।”

     

    यह सुनते ही दोनों एक-दूसरे को देखते रह गए।

     

    उन्हें विश्वास ही नहीं हो रहा था कि बीस साल का इंतजार आखिरकार खत्म होने वाला है।

     

    डॉक्टर के कमरे से बाहर निकलते ही मीरा ने कांपते हाथों से अपनी रिपोर्ट सीने से लगा ली। उसकी आंखों से खुशी के आंसू लगातार बह रहे थे। वह बार-बार आसमान की ओर देखकर बस एक ही बात कह रही थी,

     

    “महादेव… आपने मेरी सुन ली।”

     

    रवि की आंखें भी नम थीं। वह अस्पताल के छोटे-से मंदिर में गया और घुटनों के बल बैठ गया। उसने दोनों हाथ जोड़कर कहा,

     

    “भोलेनाथ… बीस साल तक आपने हमारी परीक्षा ली, लेकिन आज आपने हमारी झोली खुशियों से भर दी। आपका लाख-लाख धन्यवाद।”

     

    इतने वर्षों तक उसने हर ताना मुस्कुराकर सहा था। उसने कभी अपनी पत्नी को अकेला महसूस नहीं होने दिया। आज उसे लग रहा था कि उसका हर आंसू, हर प्रार्थना और हर सोमवार का व्रत सफल हो गया।

     

    दोनों सबसे पहले घर पहुंचे। उन्होंने महादेव की तस्वीर के सामने घी का दीपक जलाया। पूरे घर में अगरबत्ती की सुगंध फैल गई। दोनों ने मिलकर शिव चालीसा का पाठ किया।

     

    मीरा ने हाथ जोड़कर कहा,

     

    “भोलेनाथ, आपने हमें दुनिया की सबसे बड़ी खुशी दी है। अब बस इतनी कृपा करना कि हम इस बच्चे को अच्छे संस्कार दें और हमेशा आपके बताए रास्ते पर चलना सिखाएं।”

     

    उस दिन के बाद घर का माहौल पूरी तरह बदल गया। जहां कभी सन्नाटा रहता था, वहां अब आने वाले नन्हे मेहमान की बातें होने लगीं। रवि रोज़ छोटे-छोटे कपड़े, खिलौने और झूले देखकर मुस्कुरा देता।

     

    नौ महीने जैसे-तैसे बीत गए।

     

    आखिर वह दिन भी आ गया जिसका दोनों ने बीस साल तक इंतजार किया था।

     

    अस्पताल के बाहर रवि बेचैनी से टहल रहा था। उसके होंठों पर लगातार “ॐ नमः शिवाय” का जाप चल रहा था।

     

    कुछ देर बाद डॉक्टर बाहर आए और मुस्कुराते हुए बोले,

     

    “बधाई हो… लक्ष्मी आई है। आपके घर बेटी ने जन्म लिया है।”

     

    यह सुनते ही रवि की आंखों से आंसू छलक पड़े। उसने तुरंत हाथ जोड़कर आसमान की ओर देखा और कहा,

     

    “महादेव… आपका बहुत-बहुत धन्यवाद।”

     

    जब उसने पहली बार अपनी नन्ही-सी बेटी को गोद में लिया, तो उसकी आंखों से आंसू बच्ची के माथे पर गिर पड़े। उसने प्यार से उसके माथे को चूमते हुए कहा,

     

    “तुम हमारी बीस साल की तपस्या का फल हो।”

     

    मीरा अपनी बेटी को सीने से लगाकर रोए जा रही थी। यह दुख के नहीं, बल्कि बरसों की अधूरी इच्छा पूरी होने की खुशी के आंसू थे।

     

    कुछ दिनों बाद रवि अपनी बेटी को गोद में लेकर सबसे पहले महादेव के मंदिर पहुंचा।

     

    उसने बच्ची को शिवलिंग के सामने झुकाकर कहा,

     

    “भोलेनाथ, यह हमारी नहीं… आपकी अमानत है। आपने इसे हमें संभालने के लिए भेजा है।”

     

    मंदिर में मौजूद सभी लोगों की आंखें नम हो गईं।

     

    धीरे-धीरे पूरे गांव में यह खबर फैल गई।

     

    जो लोग कभी ताने मारते थे, वही आज मिठाई लेकर उनके घर आने लगे।

     

    उन्हीं रिश्तेदारों में से एक महिला, जिसने कभी मीरा का मजाक उड़ाया था, बेटी को गोद में लेकर रो पड़ी।

     

    वह बोली,”बहू… मुझे माफ कर देना। मैंने तुम्हें बहुत दुख पहुंचाया।”

     

    मीरा मुस्कुराई और बोली,

    “जब महादेव ने सब माफ कर दिया, तो मैं कौन होती हूं किसी से नाराज़ रहने वाली?”

     

    उसकी बात सुनकर वहां खड़े सभी लोगों का सिर शर्म से झुक गया।

     

    उस दिन गांव के हर इंसान ने एक बात सीखी—

     

    किसी के दुख का मजाक कभी नहीं उड़ाना चाहिए। क्योंकि इंसान सिर्फ आज देखता है, लेकिन भगवान सही समय देखकर देते हैं।

     

    आज भी हर सोमवार रवि, मीरा और उनकी नन्ही बेटी हाथों में पूजा की थाली लेकर महादेव के मंदिर जाते हैं।

     

    पहले वे दो लोग महादेव से एक संतान मांगने जाते थे…

     

    और आज वही तीनों हर बार सिर्फ धन्यवाद कहने जाते हैं।

     

    मंदिर की घंटियां बजती हैं, उनकी बेटी भोलेनाथ को देखकर मुस्कुरा देती है, और रवि-मीरा की आंखें फिर से नम हो जाती हैं।

     

    वे समझ चुके थे कि सच्ची श्रद्धा कभी व्यर्थ नहीं जाती। भगवान हर प्रार्थना सुनते हैं, बस उसका उत्तर अपने सही समय पर देते हैं।

     

    हर हर महादेव!

  • बुढ़ापे की तन्हाई

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    “बेटा, खाना खा लिया?”

     

    फ़ोन पर हर रोज़ यही पहला सवाल होता था। दूसरी तरफ़ से हमेशा वही छोटा-सा जवाब आता—

     

    “हाँ माँ… अभी मीटिंग में हूँ, बाद में बात करता हूँ।”

     

    और कॉल कट जाती।

     

    शांति देवी कुछ पल तक मोबाइल की बुझी हुई स्क्रीन देखती रहतीं। फिर मुस्कुराने की कोशिश करतीं और धीरे से कहतीं, “चलो… कम से कम आवाज़ तो सुन ली।”

     

    पास ही चारपाई पर बैठे उनके पति रामस्वरूप सब समझ जाते, लेकिन कुछ कहते नहीं।

     

     

    कई साल पहले यही घर हँसी से गूंजा करता था।

     

    शादी के बाद जब शांति इस घर में आई थीं, तब घर में कुछ भी नहीं था। मिट्टी का छोटा-सा मकान, टपकती छत और दो वक्त की रोटी का भी भरोसा नहीं।

     

    रामस्वरूप सुबह सूरज निकलने से पहले खेतों में चले जाते और रात को थके हुए लौटते। शांति पूरे दिन घर संभालतीं, गाय का दूध निकालतीं, चूल्हा जलातीं और हर मुश्किल में अपने पति का साथ देतीं।

     

    धीरे-धीरे दिन बदले।

     

    भगवान ने उन्हें दो बेटे और एक बेटी का सुख दिया।

     

    उनकी दुनिया अब बच्चों में बस गई।

     

    खुद फटे कपड़े पहन लेते, लेकिन बच्चों के लिए नए कपड़े ज़रूर लाते।

     

    खुद भूखे सो जाते, लेकिन बच्चों की थाली कभी खाली नहीं रहने देते।

     

    बरसात की रातों में जब छत टपकती थी, तो दोनों पति-पत्नी पूरी रात जागकर बच्चों के बिस्तर इधर-उधर करते रहते, ताकि उनके ऊपर पानी की एक बूंद भी न गिरे।

     

    उन्हें लगता था…

     

    “हमारी ज़िंदगी चाहे जैसी रही हो, लेकिन हमारे बच्चों की ज़िंदगी हमसे बेहतर होगी।”

     

    बस इसी उम्मीद में दोनों ने पूरी जवानी खपा दी।

     

     

    समय बीतता गया।

     

    बच्चे पढ़-लिखकर बड़े हो गए।

     

    बेटी की शादी बड़े प्यार से कर दी।

     

    दोनों बेटों को शहर में पढ़ाया। इसके लिए शांति ने अपने शादी के समय मिले सारे गहने बेच दिए।

     

    रामस्वरूप ने पुश्तैनी खेत का एक हिस्सा तक बेच दिया।

     

    जब लोगों ने पूछा, “बुढ़ापे का सहारा भी बेच दिया?”

     

    तो रामस्वरूप मुस्कुराकर बोले—

     

    “हमारा असली सहारा खेत नहीं… हमारे बच्चे हैं।”

     

    उन्हें क्या पता था कि यही बात एक दिन उनकी सबसे बड़ी भूल बन जाएगी।

     

    दोनों बेटों को अच्छी नौकरी मिल गई।

    एक दिल्ली चला गया।

     

    दूसरा मुंबई।

     

    शुरुआत में हर हफ्ते फ़ोन आता था।

    फिर महीने में।

    फिर त्योहारों पर।

     

    और धीरे-धीरे… वह भी बंद होने लगा।

    शांति हर सुबह दरवाज़े की ओर देखतीं।

    शायद आज कोई आ जाए…

     

    रामस्वरूप रोज़ शाम को घर के बाहर वाली टूटी कुर्सी पर बैठ जाते।

     

    हर बार सड़क पर आती गाड़ी देखकर उनकी आँखें चमक उठतीं।

    लेकिन गाड़ी किसी और के घर चली जाती।

     

    फिर वे चुपचाप अंदर लौट आते।

     

    एक दिन शांति बोलीं—”सुनिए… इस बार दिवाली पर बच्चे ज़रूर आएँगे ना?”

     

    रामस्वरूप ने मुस्कुराकर कहा—

    “हाँ… क्यों नहीं आएँगे? आखिर अपना घर है।”

     

    दोनों ने पूरे घर की सफाई की।

    बेटों की पसंद की मिठाइयाँ बनाईं।

     

    उनके पुराने कमरे सजाए।

     

    दिवाली आ गई…

    रात हो गई…

    लेकिन दरवाज़ा नहीं खुला।

     

    बस एक संदेश आया “इस बार छुट्टी नहीं मिली… अगली बार ज़रूर आएँगे।”

     

    शांति ने मोबाइल सीने से लगा लिया।

    आँखों से आँसू बह निकले।

     

    लेकिन फिर भी बोलीं—

    “कोई बात नहीं… काम भी तो ज़रूरी है।”

     

    रामस्वरूप ने पहली बार अपना चेहरा दूसरी तरफ़ कर लिया, ताकि पत्नी उनके आँसू न देख सके।

     

    अब दोनों की उम्र ढल चुकी थी।

     

    चलना भी मुश्किल हो गया था।

     

    रामस्वरूप की आँखों से कम दिखाई देता था।

     

    शांति के घुटने जवाब दे चुके थे।

     

    फिर भी दोनों एक-दूसरे का सहारा बने हुए थे।

     

    अगर शांति गिर जातीं, तो रामस्वरूप काँपते हाथों से उन्हें उठाते।

     

    अगर रामस्वरूप की तबीयत खराब होती, तो शांति पूरी रात उनके सिरहाने बैठी रहतीं।

    दोनों जानते थे…

    अब उनके पास एक-दूसरे के अलावा कोई नहीं बचा।

    एक रात बिजली चली गई।

     

    घर में घुप्प अँधेरा था।

    शांति ने धीमे से पूछा—

    “अगर मैं तुमसे पहले चली गई… तो तुम अकेले कैसे रहोगे?”

    रामस्वरूप की आँखें भर आईं।

     

    उन्होंने काँपते हाथों से पत्नी का हाथ पकड़ लिया और बोले—

    “मैं तो आज भी तुम्हारे बिना एक पल नहीं रह सकता… अकेले कैसे जिऊँगा?”

     

    दोनों देर तक चुप रहे।

     

    उस रात दोनों की आँखों से नींद नहीं… आँसू बहते रहे।

    कुछ महीनों बाद रामस्वरूप की तबीयत अचानक बिगड़ गई।

    शांति ने बार-बार बेटों को फ़ोन किया।

     

    एक ने कहा “माँ, अभी ऑफिस में हूँ।”

    दूसरे ने कहा “दो दिन बाद आता हूँ।”

     

    लेकिन उन दो दिनों का इंतज़ार रामस्वरूप नहीं कर सके।

     

    उन्होंने शांति का हाथ कसकर पकड़ा…

     

    एक आख़िरी बार घर की ओर देखा…

     

    और हमेशा के लिए आँखें बंद कर लीं।

     

    शांति फूट-फूटकर रोती रहीं।

     

    जिस इंसान के साथ पूरी ज़िंदगी बिताई, वही उन्हें बीच रास्ते में अकेला छोड़ गया।

    बेटे अगले दिन पहुँचे।

    पिता की चिता जल चुकी थी।

     

    उन्होंने माँ से कहा—

    “चलो माँ, हमारे साथ शहर चलो।”

     

    शांति ने पूरे घर को देखा।

    वही आँगन…

    वही नीम का पेड़…

    वही चारपाई…

     

    जहाँ उन्होंने पूरी ज़िंदगी अपने पति के साथ बिताई थी।

     

    उन्होंने धीमे से कहा—

    “जिस घर में तुम्हारे पिता की यादें साँस लेती हों… उसे छोड़कर मैं कहाँ जाऊँ?”

     

    बेटे दो दिन बाद वापस लौट गए।

     

    माँ फिर अकेली रह गई।

    अब हर सुबह शांति दो कप चाय बनातीं।

    एक खुद पीतीं…

     

    दूसरा कप रामस्वरूप की तस्वीर के सामने रख देतीं।

    हर शाम दरवाज़े की ओर देखतीं।

     

    शायद आज बच्चे आ जाएँ…

    लेकिन दरवाज़ा नहीं खुलता।

    एक दिन पड़ोस की औरत उन्हें बुलाने आई।

    बहुत आवाज़ दी…

    कोई जवाब नहीं मिला।

    जब अंदर गई तो देखा शांति अपने पति की तस्वीर को सीने से लगाए मुस्कुरा रही थीं।

    लेकिन इस बार उनकी साँसें रुक चुकी थीं।

    शायद…

    उन्हें आखिरकार अपने जीवनसाथी का साथ मिल गया था।

    उस दिन दोनों बेटे बहुत रोए।

    लेकिन अब पछताने से क्या होता?

    जिन माँ-बाप ने अपनी पूरी जवानी बच्चों के भविष्य पर लुटा दी…

    उनके बुढ़ापे में बच्चों के पास उनके लिए दो पल भी नहीं थे।

    याद रखिए…

    बचपन में माँ-बाप हमारी उँगली पकड़कर चलना सिखाते हैं।

    बुढ़ापे में उन्हें सिर्फ़ हमारी उँगली का सहारा चाहिए होता है।

    जिस दिन हम यह सहारा छीन लेते हैं, उसी दिन उनका घर नहीं… उनका दिल सूना हो जाता है।

    क्योंकि दुनिया की सबसे बड़ी गरीबी पैसे की नहीं होती…

    सबसे बड़ी गरीबी बुढ़ापे की तन्हाई होती है।

  • अधूरी इबादत भाग~14

    अधूरी इबादत भाग~14

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    भाग~14 उसके जाने के बाद

     

    अद्वैत की कार धीरे-धीरे शहर की जगमगाती सड़कों से गुज़र रही थी, लेकिन उसके भीतर एक अंधेरा लगातार फैलता जा रहा था। बाहर की दुनिया रोशनी से सराबोर थी, रेड लाइट पर रुकती गाड़ियों की कतारें, फुटपाथ पर चलते लोग, ट्रैफिक सिग्नल की टिमटिमाती बत्तियाँ… मगर अद्वैत की आंखों में इन सबका कोई प्रतिबिंब नहीं था। वह कार की खिड़की से बाहर देख ज़रूर रहा था, पर उसकी नज़रें उन दृश्यों को चीरती हुई कहीं बहुत भीतर, बहुत दूर चली जा रही थीं।

    वह बाहर से शांत दिखने की कोशिश कर रहा था, उसकी गर्दन सीधी, आँखें स्थिर, हाथ स्टीयरिंग पर टिके हुए… जैसे सब कुछ सामान्य हो। लेकिन भीतर एक उथल-पुथल चल रही थी, जैसे कोई जलप्रलय उसके भीतर ही फट पड़ा हो। मीडिया में आई तस्वीरें, लोगों की निगाहें, वो फुसफुसाहटें — “वो लड़की कौन है?”, “क्या सच में उसके साथ रह रहा है?”, “अब तक तो उसकी पत्नी मर चुकी थी, तो ये कौन है?” हर एक सवाल अद्वैत के मन में नश्तर की तरह चुभ रहा था।

    उसका मन बार-बार रूहानी की ओर भाग रहा था। लेकिन साथ ही उसे अब उस ‘कॉन्ट्रैक्ट मैरेज’ की बात भी याद आ रही थी जो उसके मैनेजर ने सुझाई थी। यह सोचते ही उसका माथा भिंच गया। 

    “मैं उससे कैसे कहूँगा ये बात? वो कोई चीज़ नहीं है कि एक कागज़ पर साइन करवा लिया और मामला खत्म।” 

    “और फिर, मैंने उसे जाना ही कितना है?”

    उसने खुद से एक सवाल पूछा, “क्या वाकई में मुझे हक है उससे यह प्रस्ताव रखने का?”

    वह जानता था कि यह प्रस्ताव एक शर्त की तरह लगेगा, एक सौदा “मेरी छवि बचाने के लिए, मुझे अपने साथ तुम्हारा नाम चाहिए।” और यह ख्याल ही उसे भीतर से झकझोर गया।  

    “क्या वो लड़की, जो पुल से छलांग लगाने जा रही थी, अब मेरी वजह से किसी और बोझ तले दब जाएगी?”

    कार फिर एक मोड़ पर धीमी हुई। सड़कों पर अब भीड़ कम हो चुकी थी, लेकिन अद्वैत का मन और अधिक भारी होता जा रहा था।  

    “काश मैंने उससे बात की होती, काश उसके भीतर की परतों को समझने की कोशिश की होती… कम से कम इतना तो पूछता कि वो हर रात खिड़की की तरफ चुपचाप क्या देखती है?”

    अब जब उससे एक बेहद निजी प्रस्ताव रखने की नौबत आई थी, तब उसे यह अहसास हो रहा था कि वह तो उस लड़की का नाम भर जानता है, उसकी कहानी नहीं।

    अद्वैत की उंगलियाँ स्टीयरिंग पर कस गईं। उसने आँखें बंद कीं और एक गहरी साँस ली।  

    “ये गलत है… ये सब कुछ गलत है। लेकिन फिर, मैं झूठी अफवाहों से खुद को कैसे बचाऊँ? ये दुनिया सच नहीं पूछती, बस दिखावे पर यकीन करती है। और इस दिखावे से बाहर निकलने के लिए, मुझे रूहानी का नाम चाहिए… कम से कम बाहर की दुनिया के लिए।”

    उसने खुद से धीरे से कहा — “शायद, अब मुझे उससे सच में बात करनी ही होगी… पहली बार।”

    कार अब घर के गेट पर पहुंच चुकी थी। दरवाज़ा खुला और अद्वैत भीतर दाखिल हुआ… कमरा हल्का सा अस्त – व्यवस्त था। सोफे और हॉल के दरवाजे के बीच की जगह में बहुत कुछ बिखरा हुआ पड़ा था। उसकी आँखें उस बिखरे सामान में से एक चीज़ पर टिक गई -“रूहानी के नाम वाली ब्रेसेलेट”।

    वह ब्रेसेलेट गिरकर टूट चुका था। अद्वैत कुछ पल के लिए वहीं खड़ा हो गया मानो कुछ समझने की कोशिश कर रहा हो।

    उसका दिल अचानक तेज़ी से धड़कने लगा। वह धीरे-धीरे ब्रेसेलेट के पास गया, ब्रेसलेट उठाते समय उसके हाथ कांप रहे थे। वह सोचने लगा, “क्या हुआ है आखि़र यहां” उसके मन में एक हलचल सी मची हुई थी। 

    अद्वैत ने पुकारा, “रूहानी… रूहानी…” लेकिन कही से कोई आवाज नहीं आई। कमरे में गहरा सन्नाटा पसरा हुआ था। उसने एक बार फिर से आवाज लगाई, “रूहानी!” लेकिन उसके शब्द हवा में खो गए। 

    अब उसकी चिंता और बढ़ने लगी। वह घर के हर कोने में उसे खोजने लगा। उसकी आँखों में बेचैनी, घबराहट और कुछ समझ न पाने की स्थिति में थी। 

    शाम पहले ही हो चुकी थी और अंधेरा होने को था। अद्वैत को अचानक ख्याल आया, “क्यों न रूहानी को कॉल कर लूँ?” 

    लेकिन उसके चेहरे पर छाई मुस्कान गायब हो गई जब उसे याद आया कि उसने कभी रूहानी का नंबर एक्सचेंज ही नहीं किया था। 

    अद्वैत असमंजस में पड़ गया, “क्या करूँ अब?” उसके भीतर कुछ टूट सा गया। उसने जो उम्मीद की थी, वह अचानक उससे छिन गई। वह थक कर सोफे पर धड़ाम से गिर पड़ा। उसकी आँखें बंद हो गई और वह अपनी स्थिति पर सोचने लगा। 

    अद्वैत को जैसे कुछ अजीब सा अहसास हो रहा था कि रूहानी, उसका टूटा हुआ ब्रेसेलेट और यह पल कुछ गहरे अर्थ छुपाए हुए हैं। उसके मन में एक तूफान सा मचा हुआ था। वो खुद से सवाल की “क्या हुआ होगा रूहानी के साथ? क्या उसे कुछ हो गया?” 

    वह खुद को यह समझाने की कोशिश कर रहा था कि वह तो रूहानी को ठीक से जानता भी नहीं तो ऐसा क्यों महसूस हो रहा है? 

    तभी अचानक, सोफे के निचले साइड टेबल पर रखा हुआ फोन न बजने लगा। अद्वैत चौक कर देखा तो फोन रूहानी का था, और उस पर वही “my life” का कॉल आ रहा था। अद्वैत का मन तेज़ी से दौड़ने लगा। 

    क्या यह रूहानी से जुड़ी कोई अहम बात है? 

    क्या उसे कुछ हुआ है?

    जैसे ही उसने फोन पर कान लगाया, दूसरी तरफ से एक किशोर लड़के की आवाज सुनाई दी, जो हड़बड़ाहट में बोल रहा था, “क्या मेरी बात अद्वैत अवस्थी से हो रही है?”

    अद्वैत ने धीरे से जवाब दिया, “हां, मैं अद्वैत हूं। तुम कौन हो? और रूहानी का फोन यहां क्यों है? वो कहां है? कहीं उसे कुछ तो नहीं हो गया?” 

    उसका मन पूरी तरह से घबराहट से भर चुका था। उसकी आँखों में अजीब सी बेचैनी थी, जैसे कोई बुरी खबर सुनने को मिल सकती हो।

    उधर से यशस्वी के भाई यश ने अपनी बात आगे बढ़ाई, “मेरे पास ज्यादा समय नहीं है। आपकी बातों का जवाब देने के लिए, लेकिन इतना जान लीजिए कि मैं रूहानी दीदी का छोटा भाई हूं और मैं आपको एक पता मैसेज कर रहा हूं। कल सुबह अगर आप वहां पहुंचेंगे, तो आपसे सारी बातें हो पाएंगी।”

    अद्वैत की आँखें अचानक से चौड़ी हो गई। उसके मस्तिष्क में एक साथ कई सवाल उठ पड़े। 

    रूहानी का भाई?….. 

    क्या यह सच है?

    क्या वह सच में रूहानी का भाई है?

    यह नया मोड़ उसे और भी अधिक उलझा रहा था। 

    अद्वैत कुछ कहने ही वाला था कि अचानक कॉल कट गया। फोन के स्क्रीन पर सन्नाटा छा गया, जैसे कोई जरूरी बात अधूरी रह गई हो। वह कुछ क्षण यूं ही थमा रहा, जैसे समय रुक गया हो। फिर धीरे-धीरे उसकी आँखों में विचारों की लहरें उठने लगीं। 

    “अगर रूहानी का परिवार है… तो उसने उस रात यह क्यों कहा कि इस दुनिया में उसका कोई नहीं है?” यह सवाल उसके भीतर लगातार गूंजता रहा। उसकी सांसें भारी हो गईं। उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि रूहानी ने ऐसा झूठ क्यों बोला। आखिर वजह क्या थी?

    अद्वैत की आंखों में उस रात की छवि लौट आई… वो रात जब रूहानी खुद को खत्म करने जा रही थी और उसने उसे बचाया था। लेकिन एक बात उसे अब चुभने लगी… उसने कभी यह जानने की कोशिश ही नहीं की कि रूहानी ऐसा कदम क्यों उठाना चाहती थी। 

    फिर एक हल्की सी अपराधबोध की लहर उसके दिल में दौड़ गई। मगर उसी के साथ एक दूसरा ख्याल भी आया, एक तर्क….”किसी को बचा लेना तो ठीक है… पर क्या किसी की निजी ज़िंदगी में यूं झांकना सही होता है? खासकर तब, जब वो व्यक्ति अजनबी हो?” 

    यह विचार उसके मन को और भी उलझा दिया। वो खुद से लड़ने लगा…. “क्या वाकई में मैंने कुछ गलत किया? या फिर मैंने वही किया जो उस वक्त ज़रूरी था?” 

    उसके दिल के किसी कोने में अब यह जानने की जिद गहराने लगी थी कि रूहानी ने झूठ क्यों बोला।

    उसकी आंखें फोन की स्क्रीन पर रूहानी की तस्वीर पर टिक गई जैसे वो उससे जवाब मांग रहा हो। मगर जवाब तो अब उस पते पर था, जो उसे सुबह मिलना था।

    —————-

    क्या रूहानी ने जानबूझकर अपनी सच्चाई छुपाई थी?  

    क्या “इस दुनिया में मेरा कोई नहीं है” महज़ एक झूठ था या कोई गहरा राज़?  

    अब अद्वैत के सामने सवाल ही सवाल थे… लेकिन जवाब कहाँ थे कि उस पते पर क्या इंतज़ार कर रहा था?