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अधूरी इबादत भाग~24

पढ़ने का समय : 7 मिनट

भाग~24 सपनों का मलबा

 

रूहानी की उंगलियाँ अभी भी कॉफी के गर्म मग के चारों ओर जकड़ी हुई थीं। उसके चेहरे पर एक पल को सिहरन दौड़ी, जैसे किसी ने उसका नाम नहीं, उसके भीतर का कोई राज़ पुकार लिया हो। मीना की सीधी, मासूम लेकिन भीतर तक घुसती हुई बात ने जैसे कमरे की हवा में एक अजीब सी बेचैनी घोल दी थी।

एक हल्की साँस लेते हुए, खुद को संयत करते हुए रूहानी ने नज़रें मीना से हटाकर मेज़ की ओर फेर लीं, लेकिन शब्द उसके होंठों तक आ ही गए।

“अद्वैत भी कल नीचे ही सोए थे… हम दोनों थक गए थे… ऊपर वाला कमरा बंद था, चाबी भी नहीं मिल रही थी। इसलिए सोचा नीचे आराम कर लें।”

मीना ने कुछ पल तक उसे यूँ देखा, जैसे वह उसके शब्दों से कहीं ज़्यादा उसके चेहरे की रेखाएँ पढ़ने की कोशिश कर रही हो। 

मीना हँसते हुए बोली, “अरे, मैं तो सोच रही थी अब ऊपर वाला कमरा खुल जाएगा… वैसे भी सर उसमें बस सोने ही तो जाते हैं। वैसे ठीक किया आपने नीचे सोकर, थक गए होंगे।” 

रूहानी ने जवाब में सिर्फ सिर हिला दिया। मगर उसके भीतर अभी भी हलचल जारी थी। वो जानती थी, उसका जवाब सतही था। सच भी था, झूठ भी। जो कुछ बीत चुका था, वो बहुत कुछ कहता था….. मगर समझाने लायक नहीं।

मीना अपना काम ख़त्म करके चली गई, मगर रूहानी की नज़र अब खिड़की के पार जा अटकी थी। बाहर हल्की धूप थी, वही पीली-सी जो सर्दियों में बिन बोले चुपचाप खिड़की पर बैठ जाती है। लेकिन रूहानी का मन कहीं और भटक रहा था।

उसकी उंगलियाँ मग के गिर्द घूमती रहीं, मगर कॉफी अब ठंडी पड़ चुकी थी…… ठीक उसकी उम्मीदों की तरह, जो धीरे-धीरे ठंडी होती जा रही थीं… लेकिन बुझी नहीं थीं। एक बेचैनी सी उसके भीतर हिलोरें मार रही थी, जैसे कोई पुरानी चिंगारी फिर से जागने लगी हो। 

उसने एक लंबी साँस ली और अपनी नज़रें खिड़की के पार से खींचते हुए खुद से बुदबुदाई, “बहुत दिन हो गए… अब और नहीं। आज मुझे स्टूडियो जाना ही होगा।”

वो खुद को याद दिला रही थी…. स्टूडियो ही तो उसका असली ठिकाना था, उसका सपना, उसकी पहचान। वह जगह जिसने उसकी सोच को पंख दिए थे, जहां हर कोना उसकी मेहनत की खुशबू से महकता था। वहाँ लौटना, जैसे खुद के पास लौटना था। रूहानी ने धीरे से मग टेबल पर रखा, जैसे किसी पुराने वादे को फिर से थाम लिया हो।

उसने खुद को आईने में देखा….. बाल बिखरे थे, चेहरा थका हुआ, पर आँखों में आज कुछ अलग था।

एक ठहराव, एक संकल्प, एक जिद।

“अब और देर नहीं,” उसने अपने आपसे कहा। अभी अद्वैत घर पर नहीं था, शायद किसी कवि सम्मलेन या लेखक मिलन समारोह में गया होगा। यही सही वक्त है। 

वह अपने कमरे में गई। उसने वह बैग निकाला…. वही बैग जो यश ने उसे दिया था। वो धीरे से ज़िप खोली। अंदर पुराने स्केचबुक, कुछ फैब्रिक के टुकड़े, अधूरी डिज़ाइनिंग शीट्स… और फिर अचानक एक कोने में उसे कुछ चमकता हुआ दिखा…… एक छोटा सा मेटल का टुकड़ा।

उसने उसे निकाला… उसकी आँखें भर आईं। उसमे स्टूडियो की चाबी थी। रूहानी के चेहरे पर एक धीमी-सी मुस्कान आई। एक उदास सी, लेकिन सच्ची।

“तो तूने ये भी बचा लिया, यश…” उसके होंठों से निकला, जैसे कोई दबी हुई दुआ अनजाने में लौट आई हो।

वो मुस्कुरा पड़ी। उसने चाबी को मुट्ठी में कस लिया। “वो सपना चुराया गया था, खत्म नहीं हुआ था।”

फिर उसने बाहर का दरवाज़ा खोला….. बिलकुल वैसे ही जैसे किसी कमरे का नहीं, बल्कि अपने अंदर के डर का दरवाज़ा खोल रही हो। अब रूहानी फिर से अपने आप से मिलने जा रही थी….. उसी जगह जहाँ कभी उसकी आत्मा रंगों में घुलकर सांस लेती थी।

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रूहानी ने स्टूडियो के दरवाज़े पर खड़े होकर एक गहरी साँस ली। उसके भीतर एक तूफ़ान चल रहा था, लेकिन चेहरा शांत था….. जैसे कोई सैनिक जंग के मैदान में उतरने से पहले खुद को तैयार कर रहा हो। दरवाज़ा खोलते ही एक सड़ी-सी गंध ने उसका स्वागत किया, जैसे किसी ने जानबूझकर उसके सपनों को सड़ने के लिए छोड़ दिया हो।

अंदर कदम रखते ही उसकी नज़र सबसे पहले उस मनीक्विन (Mannequin) एक प्रकार की मानव-आकार की मॉडल, पर पड़ी, जिस पर उसका पहला डिज़ाइन लटका था….. अब धूल और जाले से ढका हुआ। उसने धीरे से उस पर हाथ फेरा, जैसे किसी पुराने दोस्त को छू रही हो। पर कपड़ा अब भीगा हुआ था, शायद छत से पानी टपकता रहा होगा।

रूहानी की उंगलियाँ उस जंग लगे सिलाई मशीन के हैंडल पर गई…… ठंडी, धूल सनी, और जैसे बरसों से किसी स्पर्श की प्रतीक्षा में जमी हुई। उस घिसी हुई सतह पर उसकी हथेलियों की नरमी धीरे-धीरे थरथराने लगी।

वो वहीं ज़मीन पर बैठी, घुटनों को मोड़कर, कुहनी टिकाए, आँखें नीची किए। कभी इस स्टूडियो में उसकी हँसी गूंजती थी, मॉडल्स की चहक होती थी, और स्केचिंग के वक्त पेंसिल की खुरखुराहट किसी गीत जैसी लगती थी। लेकिन अब… अब बस टूटे शीशों की किरकिर और उस दीवार पर पड़ा कॉफी का दाग उसकी नाकामी का इश्तहार बना खड़ा था।

“Copycat Studio — Talent Stolen Here!”

उस एक वाक्य ने जैसे उसकी रगों में बर्फ घोल दी हो।

“Steal?” वो बुदबुदाई।

“किसी ने चुराया नहीं था… छीना था… जान-बूझकर। और मैंने… बस देखती रह गई।”

उसने अपने घुटनों को सीने से लगाया और सिर टेक दिया। आँखों में आँसू तो अब भी नहीं थे। शायद इसलिए नहीं कि दुख कम हो गया था, बल्कि इसलिए कि दर्द अब खून की तरह बहना छोड़ चुका था। 

टेबल से उड़कर ज़मीन पर बिखरे हुए बिजली और किराये के बिल उसके चारों ओर मौत के फरमान जैसे बिछे थे। हरेक कागज़ मानो चीख रहा था “तेरा सपना मर चुका है, अब बस उसकी लाश यहाँ सड़ रही है।”

लेकिन रूहानी उस चीख को अनसुना कर चुकी थी। धीरे-धीरे वो उठी। उसकी चाल में थकावट थी, लेकिन वो थकावट शरीर की नहीं, आत्मा की थी। फिर भी उसने खुद को खींचा।

दीवार की ओर बढ़ी, जहां अब भी कुछ फटे हुए स्केच टंगे थे। उसने एक को हाथ में लिया…. उसी डिज़ाइन का हिस्सा जो उसने अपनी पहली फैशन प्रतियोगिता के लिए बनाया था।

फिर उसे याद आया… वो रात…. वो रात जब उसने घंटों बैठकर उस ड्रेस को रंगा था, हर सिलाई में अपने सपनों की महीन नब्ज़ सी टांकी थी। 

पूरी रात उसने जागकर एक-एक टांका उस उम्मीद के साथ जोड़ा था, कि जब सुबह होगी तो उसका सपना रैंप पर चलेगा… उसके नाम के साथ, उसकी पहचान बनकर।

और फिर… वो सुबह…… वो सुबह जब उस रैंप पर वही ड्रेस उतरी थी…. लेकिन किसी और के नाम से। किसी और के जिस्म पर। 

जब उसने आँखों में आँसू और होंठों पर सन्नाटा लिए सवाल किया था, तो जवाब में बस एक बेमानी मुस्कान मिली थी।

उसने अपने चारों ओर देखा… टूटा हुआ स्टूडियो था, पर नींव अभी थी। दीवारें भले ही धूल से सनी हों, लेकिन उन्होंने उसकी पसीने और जुनून से गढ़ी मेहनत को देखा था।

तभी उसने एक स्टूल घसीटा, और उस पर बैठ गई। धीरे से अपने फोन का कैमरा ऑन किया और स्टूडियो की कुछ तस्वीरें लीं। हर टूटन, हर दरार, हर धब्बा।

फिर इंस्टाग्राम पर पोस्ट किया –

Chapter 1 – Rebuilding Ruins #RuhaniReturns

वो जानती थी कि इसे देखकर कुछ लोग हँसेंगे, कुछ उंगली उठाएंगे। लेकिन इस बार वो डर नहीं रही थी क्योंकि सबसे बुरा गुजर चुका था।

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रात के तक़रीबन साढ़े ग्यारह बज चुके थे। अद्वैत थका-हारा लौटा, लेकिन जैसे ही घर में दाख़िल हुआ…. ड्रॉइंग रूम की हल्की-सी रौशनी और रूहानी की परछाईं उसकी नज़रों में आई। 

वो अब भी जाग रही थी, सोफ़े पर बैठी, हाथों में एक पुराना स्केचबुक थामे… जैसे कोई खुद से बहस कर रहा हो।

अद्वैत ने जूते उतारे, बैग रखा और धीरे से पूछा, “सोई नहीं अब तक?”

रूहानी ने सिर उठाया। उसकी आंखों में नींद नहीं थी, बस एक दबी हुई उलझन थी। “नींद आ नहीं रही,” उसने हल्की सी मुस्कान के साथ कहा, “थोड़ा सोच रही थी।”

अद्वैत ने पानी का गिलास लिया और वहीं पास बैठ गया। एक पल की चुप्पी रही।

फिर रूहानी ने धीरे से कहा, “एक बात कहनी थी… मुझे तुमसे कुछ पैसे चाहिए।”

अद्वैत ने चौंककर उसकी ओर देखा, “कितने?”

रूहानी की आवाज़ थमी नहीं, “पच्चीस लाख रुपये… अभी।”

कमरे में एक पल को ऐसा सन्नाटा छा गया जैसे दीवारें भी साँस रोककर वजह पूछना चाहती हो।

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क्या अद्वैत सच में मदद करेगा… या उसके सवालों में छिपा है कोई पुराना हिसाब?

रूहानी ने जो माँगा… क्या वो सिर्फ पैसे थे? या कोई बीते रिश्ते की कीमत भी उसमें छुपी थी?

और जब रूहानी ने कहा “अभी चाहिए”, तो क्या वो सिर्फ एक माँग थी… या किसी खतरे की आहट?

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