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अधूरी इबादत भाग~25

पढ़ने का समय : 6 मिनट

भाग~25 उधार जज़्बातों का 

 

रात का सन्नाटा एक गूंगी चीख की तरह पूरे घर में पसरा हुआ था। कमरे की दीवारों पर टंगी घड़ी की सुइयाँ जैसे समय को खींचती हुई चल रही थीं…. हर टिक-टिक के साथ अद्वैत के भीतर एक नया सवाल जन्म ले रहा था, एक नया संशय, एक नया द्वंद्व। 

उसके ठीक सामने खड़ी रूहानी का चेहरा जैसे किसी धुँधली तस्वीर की तरह था—आधी साफ़, आधी धुँधलायी हुई। उसकी आँखों में एक ऐसी बेचैनी थी, जिसे सिर्फ महसूस किया जा सकता था, शब्दों में बाँध पाना मुश्किल था। जैसे वह कुछ कहना चाह रही हो, लेकिन ज़ुबान साथ न दे रही हो। जैसे कोई टूटन हो उसके भीतर, जो हर मुस्कान के पीछे छिपी बैठी हो।

अद्वैत ने उसकी आँखों में झाँकने की कोशिश की, जैसे कोई ताला खोलना चाहता हो जिसकी चाबी गुम हो गई हो। मगर वहाँ कुछ था… एक दीवार, एक नमी, एक कहानी जो वह कह नहीं पा रही थी। 

फिर, अचानक, उस चुप्पी को तोड़ते हुए रूहानी की आवाज़ आई…. थोड़ी घबरायी हुई, थोड़ी ठहरी हुई, “उधार माँग रही हूँ तुमसे, छह महीने के बाद से तुम्हें इंस्टॉलमेंट पर वापस भी कर दूँगी।”

अद्वैत को यह सुनते ही जैसे किसी अदृश्य करंट ने छू लिया हो। यह सवाल नहीं था, न ही विनती। यह एक निश्चय था जो रूहानी ने बहुत सोच-समझकर किया था। उसकी आवाज़ में एक डर छुपा था…. कहीं इनकार न हो जाए, कहीं अद्वैत उस पर शक न करे। 

अद्वैत बस उसे देखता रहा… न आँखों में ग़ुस्सा, न सवाल। सिर्फ एक गहरी नज़र, जो अंदर तक झाँकने की कोशिश कर रही थी।

रूहानी ने उसकी चुप्पी को अपनी बात की नाकामी समझा और जल्दी से बोली, “तुम तो इतने फेमस और बेस्टसेलिंग राइटर हो, तो इतने पैसे तो तुम दे ही सकते हो मुझे अभी। मैं सच्ची कह रही हूँ, मैं सारे पैसे लौटा दूँगी। अगर तुम्हें ठीक नहीं लग रहा तो बता दो, कितना इंटरेस्ट रेट लोगे, मैं वो भी चुका दूँगी।”

यह शब्द सिर्फ शब्द नहीं थे—ये उसके आत्मसम्मान की अंतिम कोशिशें थीं। जैसे वह खुद को गिरने से बचाना चाह रही हो, और जानती हो कि अद्वैत ही वह आख़िरी डोर है जिसे वह थाम सकती है। मगर अद्वैत अब भी स्थिर था….. जैसे सोच रहा हो, समझ रहा हो, तौल रहा हो कि यह माँग सिर्फ पैसों की है या उससे कहीं ज़्यादा की।

धीरे से उसने कहा, “लेकिन रुपये माँगना या इंटरेस्ट रेट के साथ वापस करना, ये सब कुछ तो कॉन्ट्रैक्ट में कहीं नहीं लिखा है और न ही तुमने एग्रीमेंट बनवाते समय इन सब बातों का ज़िक्र भी किया।”

रूहानी को जैसे किसी ने उसकी हड्डियों तक सुन्न कर दिया हो। उसने कुछ पल सोचा, फिर अपनी आवाज़ को यथासंभव सामान्य बनाए रखते हुए कहा, “तो क्या नया एग्रीमेंट बनवाना पड़ेगा या पुराने वाले में ही मॉडिफाई करोगे?”

अद्वैत उसकी इस मासूमियत पर अनायास मुस्कुरा दिया। एक कोना उसके भीतर था जो शायद यह चाहता था कि रूहानी उससे कुछ माँगे, उससे जुड़े, उससे कुछ उम्मीद रखे। फिर भी, चेहरा न्यूट्रल बनाए रखते हुए बोला, “ऑफकोर्स, इसके लिए न्यू डॉक्युमेंट बनवाने पड़ेंगे, पूरे 25 लाख की बात है।”

रूहानी ने सिर हिलाया, फिर एक पल चुप रही और आखिर में पूछ ही लिया, “पूछोगे नहीं कि क्यों चाहिए?”

अद्वैत की आवाज़ अब थोड़ी ठंडी हो चली थी, “शायद तुम भूल चुकी हो कि, हम दोनों में से किसी को भी एक-दूसरे के पर्सनल मैटर्स में दखल देने का कोई हक़ नहीं।”

ये शब्द जैसे रूहानी के सीने में कहीं चुभ गए। उसके चेहरे पर उभर आई नमी… नहीं, ये आँसू नहीं थे, मगर आँसुओं से कम भी नहीं। वह कुछ नहीं बोली, लेकिन उसकी आँखों में जो कहानियाँ तैर रही थीं, वे अद्वैत से छिपी नहीं थीं।

शायद यही वजह थी कि अद्वैत ने तुरंत ही हल्के अंदाज़ में बात मोड़ दी, “आई होप कहीं कोई गैम्बलिंग नहीं कर रही होगी या किसी को मारने की सुपारी तो नहीं दे रही होगी, है ना?” और मुस्कुरा दिया…. एक जानबूझ कर फैलाई गई गर्माहट, ताकि उस ठंडी चुप्पी को पिघलाया जा सके।

रूहानी भी मुस्कुरा दी, मजबूर होकर नहीं… बल्कि उस पल के सौजन्य में, जो दोनों के बीच थोड़ी देर के लिए सहज हो गया था। 

अद्वैत ने कहा, “रात बहुत हो गई है, अब मैं सोने जा रहा हूँ।” और बस इतना कहकर वह सीढ़ियों की ओर बढ़ गया, बिना पलटे, बिना उसके जवाब का इंतज़ार किए।

रूहानी वहीं खड़ी रही… कमरे की दीवारों के बीच, उस अधूरे संवाद की गूंज के साथ। उसकी आँखें अब स्थिर नहीं थीं, उनमें तूफान था, एक ऐसा तूफान जो बहुत देर से दबा रखा गया था। वह जानती थी कि क्यों चाहिए उसे वो पैसे… उसका सपना, उसका स्टूडियो, उसका सम्मान… सब कुछ दाँव पर था। 

वह यह भी जानती थी कि अद्वैत को बताना आसान नहीं होगा कि कैसे उसका पूर्व प्रेमी उसके डिज़ाइन्स चुरा कर अपनी मंगेतर को दे गया और कैसे एक झूठी बदनामी ने उसकी मेहनत को मिट्टी में मिला दिया।

लेकिन अब नहीं। अब उसे लड़ना था। उठना था। और इस बार वह किसी पर भरोसा करके नहीं, बल्कि खुद के दम पर जीतना चाहती थी।

उसने एक गहरी साँस ली। फिर खुद से कहा, “मैं इसे टूटने नहीं दूँगी। मुझे फिर से अपने नाम का एक सच बनाना होगा… बिना किसी की परछाई के, बिना किसी की रहमत के।”

और उस रात, जब पूरा घर नींद में डूबा था, रूहानी की आँखों में नींद नहीं, आग थी।

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अद्वैत आज पूरी तरह ख़ामोश था, जैसे किसी अनसुने सन्नाटे में घुल जाना चाहता हो। कमरे की हवा भारी थी, धूप फीकी लग रही थी और उसकी आँखें बंद… मगर मन पूरी तरह जागा हुआ। 

पिछले कुछ दिनों से जितनी तेज़ी से चीज़ें बदली थीं, उतनी ही चुपचाप आज सब कुछ ठहर गया था। न उसने किसी से बात की, न ही कमरे से बाहर निकला। उसकी डायरी भी आज ख़ाली थी। शब्द नहीं थे… सिर्फ़ भारीपन था।

उधर रूहानी की सुबह बिल्कुल उलटी दिशा में चल रही थी। उसका हर कदम किसी अदृश्य घड़ी की टिक-टिक से बंधा हुआ था। जैसे भीतर कुछ था जो अब और रुकने नहीं देना चाहता था। 

उसने हल्का गुलाबी कुर्ता पहना, बालों को कसकर गूंथा और आईने में खुद को बिना मुस्कराए देखा…. एक शांत चेहरा, जिसमें अब हारने की कोई जगह नहीं थी।

मीना जैसे ही घर पहुँची, रूहानी सीधे किचन की ओर बढ़ी, “मेरे लिए जल्दी से एक कॉफी बना दो मीना, मुझे निकलना है फ़ौरन। उसके बाद ही सफ़ाई शुरू करना।”

मीना ने बिना कुछ पूछे सिर हिलाया और कॉफी बनाने लगी। भाप ने रसोई में एक गर्मी फैलाई, और उस गर्मी में रूहानी की आँखों में एक नई रोशनी आ गई थी।

तभी रूहानी ने धीमे से पूछा, “यहाँ आसपास कहीं कोई जगह या दुकान मिलेगी खाली?”

मीना अचानक रुकी, चौंकी, फिर धीरे से बोली, “क्यों? कुछ काम है क्या, मैडम?”

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क्या मीना को अंदाज़ा था कि रूहानी के इस सवाल के पीछे कोई मामूली वजह नहीं, बल्कि एक नई शुरुआत की जिद छुपी है?

क्या अद्वैत की चुप्पी महज़ थकावट थी, या फिर कोई ऐसा फैसला जो सब कुछ बदल सकता है?

क्या रूहानी सच में सिर्फ एक दुकान ढूँढ रही थी, या फिर अपनी खोई हुई पहचान की ज़मीन तलाश रही थी…? 

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