भाग~26 सिर्फ़ एक “Okay”
मीना के सवाल पर रूहानी एक क्षण को रुकी, जैसे किसी अंदरूनी द्वंद्व में फँस गई हो। आँखों में हल्की झुँझलाहट तैर गई, पर चेहरा अब भी संयमित रहा। वो जानती थी कि सवाल साधारण था, पर जवाब में जो कुछ भी छिपा था, वो साधारण नहीं था।
मन तो किया कि मीना को सब कुछ बता दे….. अपने नए स्टूडियो का सपना, अपनी हिम्मत से भरी जद्दोजहद, वो अकेलेपन की घुटन जिसे कला के ज़रिए साँस देना चाहती थी। पर वक्त नहीं था। घड़ी की सुइयों की तरह उसके भीतर भी एक दौड़ चल रही थी।
उसने जल्दी से कॉफी का आखिरी घूँट पिया, जैसे उस गर्माहट में कुछ पल की राहत ढूंढ रही हो। फिर कप टेबल पर रखा और बोल पड़ी, “मीना, मुझे अपना कॉन्टैक्ट नंबर दे दो… सारी बातें बाद में बताऊँगी, नहीं तो बहुत लेट हो जाऊँगी।”
मीना ने थोड़ा हैरानी से देखा, पर चुपचाप सिर हिलाया। फिर अपने छोटे से पर्स से एक पुराना, घिसा हुआ कीपैड फ़ोन निकाला। रूहानी ने नंबर डायल किया और मिस्ड कॉल दी।
स्क्रीन पर नंबर चमका…. अनजान पर तयशुदा।
“ये रहा मेरा नंबर,” रूहानी ने धीमे से कहा।
मीना ने जैसे ही “रूहानी मैडम” नाम दर्ज किया, रूहानी ने एक हल्की सी मुस्कान दी। पर उस मुस्कान के पीछे एक बेचैनी थी, एक जल्दी में छुपा सपना। उसकी आँखों में साफ़ दिख रहा था….. वो कुछ नया शुरू करने की दहलीज़ पर खड़ी है, पर रास्ता अभी बना नहीं है।
दरवाज़ा खोलते हुए उसके पाँव तेज़ थे, लेकिन दिल भारी। जैसे हर कदम के साथ वो अपने अंदर किसी पुराने डर को पीछे छोड़ रही हो।
रूहानी के घर से निकलते ही अद्वैत धीमे क़दमों से बाथरूम की ओर गया। नहा-धोकर आया तो उसने कोई फैंसी कपड़े नहीं पहने…. सिर्फ़ एक सादा कुर्ता और पायजामा। बाल भीगी हुई हालत में बेतरतीब से थे। चेहरे पर कोई भाव नहीं, पर आंखों में थकी हुई सोचों की परतें थीं। जैसे हर बूंद पानी के साथ उसके भीतर कुछ और बह गया हो।
वो धीरे-धीरे सीढ़ियाँ उतरकर नीचे आया और आकर सीधे सोफे पर बैठ गया। फ़ोन पास में था, लेकिन उसने उसे छुआ तक नहीं… जैसे अब किसी बात की गूंज से भी खुद को दूर रखना चाहता हो। सिर्फ़ एक शांत, ठहरी हुई उपस्थिति। उसके बैठते ही जैसे पूरे घर की हवा पलभर को थम गई।
तब तक मीना पूरे घर की सफाई कर चुकी थी, रसोई में हल्दी और जीरे की महक भरने लगी थी। मगर अद्वैत को यूं अचानक बैठे देख वह थोड़ी हिचकिचाई। ये रोज़ का दृश्य नहीं था। उसकी आदत थी सुबह जल्दी घर छोड़ देने की, एक अजीब सी दूरी बनाए रखने की। पहली पत्नी के जाने के बाद, वो खुद से भी दूर हो गया था।
मीना, जो अब तक उसे बस एक परछाई की तरह देखती थी, चुपचाप उसके पास आई और बोली, “आपकी तबीयत तो ठीक है ना, सर? कुछ बना दूँ जल्दी से?”
अद्वैत ने उसकी बात पर हल्की सी मुस्कान दी…. वो मुस्कान जिसमें न तो कोई मज़ाक था, न गर्मजोशी, बस एक स्वीकार थी। “अरे मीना, ठीक हूँ मैं। बस आज कहीं जाना नहीं है, इसलिए बैठा हूँ। और हाँ… कुछ भारी नाश्ता बना दो।”
मीना ने सिर हिलाया, “ठीक है, सर,” कहकर चुपचाप रसोई की ओर लौट गई।
अद्वैत वहीं बैठा रहा, अब अपनी गोद में लैपटॉप लिए, पर उसकी उंगलियाँ कीबोर्ड से दूर थीं। जैसे कुछ लिखना चाहता हो, पर शब्द अब भी उसकी आत्मा में कहीं अटके हों। घर में सब कुछ था….. साफ़ फर्श, ताज़ा हवा, पकती हुई रोटी की खुशबू…..पर उसके भीतर एक खाली कमरा अब भी बंद पड़ा था।
अद्वैत सोफे पर ही बैठा था, सामने लैपटॉप की नीली रौशनी उसके चेहरे पर अजीब सी परछाई डाल रही थी। उंगलियाँ की-बोर्ड पर थीं, मगर दिमाग कहीं और। अपनी नई किताब की शुरुआत के कुछ पन्ने उसने टाइप कर लिए थे, लेकिन उस रचना में वो गहराई नहीं थी जिसे वो महसूस कर रहा था।
अचानक उसके मन में एक अजीब सी बेचैनी उठी…… रूहानी आज सुबह से दिखी क्यों नहीं?
उसने आंखों को स्क्रीन से हटाकर कमरे में एक नजर डाली, जैसे किसी आभासी उपस्थिति को ढूंढ़ रहा हो, जो वहां होनी चाहिए थी। फिर आवाज़ लगाई, “मीना, तुम्हारी रूहानी मैडम कहाँ हैं? दिख नहीं रही आज।”
मीना रसोई से बाहर आई, उसके चेहरे पर हल्का सा विस्मय था। “आपकी पत्नी हैं मैडम, आपके साथ तो कल से ही होंगी। रात में भी नहीं बताया क्या? सुबह तो बहुत जल्दी निकल गईं।”
अद्वैत के भीतर कुछ सिहर उठा। उस एक वाक्य में कितना कुछ छुपा था….. एक सवाल, एक शक, और एक अनकहा सच। पर चेहरा उसने शांत रखा, शब्दों को सजाया ताकि कोई दरार न दिखे।
“वो कल थक कर जल्दी सो गई थीं, तो मैंने जगाना सही नहीं समझा। और सुबह मैं गहरी नींद में था, शायद उसने मुझे परेशान करना ठीक नहीं समझा।”
मीना ने उसकी बात पर सिर हिलाया और रसोई में लौटते हुए बोली, “सही कहा आपने, सर। बहुत जल्दी में थी मैडम, मुझसे पूछ रही थीं कि आसपास कोई जगह या दुकान खाली है क्या।”
अद्वैत एक पल को वहीं थम गया। शब्द खत्म हो गए थे, पर भीतर कोई शोर उठ रहा था। उसके सीने में एक सवाल रह गया था, जो उसने किसी से नहीं पूछा…. रूहानी क्या खोज रही थी, और क्यूँ? क्या इसलिए रूहानी ने उससे पच्चीस लाख रूपए मांगे थे?
अद्वैत की निगाहें जैसे हवा में किसी अनकही बात को टटोल रही थीं। वो मीना से कुछ पूछने ही वाला था, आवाज़ उसके गले में ही अटक गई थी कि तभी मोबाइल की स्क्रीन चमकी।
उसने अनमने मन से फोन उठाया, जैसे किसी पुराने ज़ख्म पर उंगली रखी जा रही हो। स्क्रीन पर एक मैसेज था……
“उम्मीद है डॉक्युमेंट्स बन गए होंगे, मैं आते ही साइन कर दूंगी। प्लीज़ कल तक मुझे सारे पैसे कैश में चाहिए और मैं सच कह रही हूँ, 6 महीने के बाद से इंस्टॉलमेंट में सारे पैसे दे दूंगी, जो इंटरेस्ट लगाना हो लगा लेना।”
वो चुप रहा। उसका गला थोड़ा सूख गया। कुछ पल तक उसने फोन हाथ में थामे रखा, जैसे शब्दों का वजन महसूस कर रहा हो। फिर अचानक होठों पर एक हल्की, लगभग मायूस मुस्कान आई।
उसकी उंगलियों ने बड़ी नर्मी से स्क्रीन पर “okay” टाइप किया और भेज दिया।
कभी-कभी किसी के कहे आखिरी वाक्य में पूरा अतीत लिपटा होता है। और वो “मैं सच कह रही हूँ” उस एक वाक्य में जैसे रूहानी की सारी थकान, सारी सच्चाई, सारी उम्मीद समा गई हो।
उसी वक्त मीना चुपचाप उसके सामने आकर पोहे की प्लेट रखी। “बाकी खाना गर्म है, इसलिए मैंने बाहर ही ढककर छोड़ दिया है, अब मैं घर चलती हूँ” कहकर मीना अद्वैत के घर से निकल गई।
अद्वैत ने उस थाली को देखा, फिर अपनी हथेलियों को। जैसे सोच रहा हो…. जिन हाथों में किसी का भरोसा हो, क्या वो वाकई खाली रह सकते हैं? कमरा शांत था, पर भीतर एक तूफान अब भी धीमे-धीमे बह रहा था।
उधर,
रूहानी ने सुबह-सुबह अपने पुराने स्टूडियो के मालिक से मुलाक़ात की। सारे कागज़ात तैयार थे… बकाया पेमेंट का अंतिम बिल, एक पुरानी जगह को अलविदा कहने की औपचारिकता और उस दरवाज़े की चाभी जो कभी उसके ख्वाबों का पहला दरवाज़ा हुआ करती थी।
उसने धीमे से चाभी उनके हाथों में रख दी, जैसे कोई बीता हुआ हिस्सा खुद से अलग कर रही हो। उसकी आंखों में न नम थी, न मुस्कान…… बस एक सूनापन, जो कुछ खत्म हो जाने पर आता है।
कागज़ उसके बैग में रखकर वह अद्वैत के घर के लिए निकल पड़ी। कैब से उतरते ही शहर की भीड़ और धूप में घुला हुआ दिन उसे छूने लगा। वह तेज़ी से मुख्य चौराहे से गुजर रही थी, तभी अचानक उसकी जूती में कुछ अटक गया।
एक हल्की-सी झुंझलाहट के साथ वह झुकी, जूती ठीक की, और उठते ही जैसे ही कदम आगे बढ़ाया, अचानक किसी से ज़ोरदार टक्कर हो गई।
“सॉरी…” शब्द उसके होंठों पर ही थे कि जैसे ही उसने चेहरा घुमाया, उसकी सांस अटक गई।
सामने जो खड़ा था, उसकी आंखों में कोई अजनबीपन नहीं था… बल्कि वो नज़रों की पहचान इतनी तेज़ थी कि रूहानी एक पल के लिए जैसे ठिठक गई।
उसका “सॉरी” वहीं गले में अटक गया, क्योंकि जिसे देखकर वो पलटी थी… उसे वो बहुत अच्छी तरह जानती थी।
इतनी अच्छी तरह… कि अब उसका यूँ अचानक सामने आ जाना, एक अजीब सी सिहरन बनकर उसकी रीढ़ में उतर गया।
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क्या रूहानी को वाकई मालूम था कि वो किससे टकराई है… या किस अतीत ने उसे फिर से घेर लिया?
अद्वैत की आंखें किस सच को तलाश रही थीं… रूहानी के ख्वाब, या खुद के खोए हुए हिस्से?
क्या ये महज़ इत्तेफ़ाक़ था… या कोई पुराना सिरा फिर से खुलने वाला था?

लिखकर रूह छूने की कोशिश…..
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