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अधूरी इबादत भाग~27

पढ़ने का समय : 8 मिनट

भाग~27 अतीत फिर लौटा 

 

रूहानी के सामने जब उसके अतीत का वो पन्ना अचानक आकर खुल गया, तो उसकी आंखों को यक़ीन ही नहीं हुआ।

कुछ क्षण के लिए वो वहीं सन्न सी खड़ी रह गई, मानो शहर की आवाज़ें, लोग, गाड़ियाँ सब धीमे पड़ गए हों… और वक़्त की सुइयाँ एकदम थम गई हों।

उसके होंठ जो “सॉरी” कहने को खुले थे, धीरे-धीरे बंद हो गए, और गले में कुछ भारी सा अटक गया। वो टकराहट केवल जिस्मों की नहीं थी, वो तो जैसे एक भूले हुए दर्द की दस्तक थी।

“नहीं… ये सपना है,” रूहानी ने मन ही मन कहा, और अपनी पलकों को ज़ोर से भींच लिया, जैसे यूँ आंखें बंद करने से ये चेहरा ओझल हो जाएगा।

क्योंकि जिस शख़्स ने उसके विश्वास को अपने स्वार्थ की मिट्टी में रौंदा था, वो इतनी आसानी से इस तरह राह चलते मिल जाए… ये मुमकिन नहीं था।

उसका दिल तेज़ी से धड़क रहा था, जैसे भीतर कोई पुराना जख्म फिर से खुल गया हो। उस इंसान की मौजूदगी, उसकी वो जानी-पहचानी खामोशी, सबकुछ उसे वहीं खींच लाया जहाँ से वो सालों पहले निकल चुकी थी।

पर आज… वही साया फिर सामने था।

और रूहानी की आंखों में एक साथ कई भाव उमड़ आए…. हैरानी, ग़ुस्सा, तकलीफ़, और कहीं बहुत गहराई में… एक छुपा हुआ डर।

उसने अपने कदम पीछे खींचने चाहे, मगर शरीर जैसे जड़ हो गया था।

रूहानी अब भी अपनी सोच में डूबी हुई थी। सामने खड़ा अतीत उसकी आंखों में उतर चुका था, और भीतर कहीं एक पुराना दर्द फिर से करवटें ले रहा था। वो कुछ कहती, उससे पहले सामने वाला शख़्स, जिसे उसने सालों पहले खुद से दूर कर दिया था, धीमे से मुस्कराते हुए बोला, “अरे, शादी भी कर ली तुमने? कौन है वो बदनसीब?”

वो शब्द, जैसे किसी नश्तर की तरह रूहानी के सीने में चुभ गए। 

“बदनसीब?” बस यही एक लफ्ज़ काफी था उसे हिला देने के लिए।

उसने एक गहरी सांस ली, उसकी आंखों में पल भर को झिझक की जगह अब स्पष्ट आग थी। भले ही अद्वैत से उसकी शादी एक ‘कॉन्ट्रैक्ट’ थी, पर जब उसे सबसे ज़्यादा किसी की ज़रूरत थी, तो वही शख़्स उसकी ढाल बनकर खड़ा था।

और आज… रूहानी जानती थी, ये वक्त है उसका कर्ज़ चुकाने का, उसका साथ देने का, उसका सम्मान करने का।

उसने अपनी आंखों में गुस्से की चमक लिए हुए, उस शख़्स की आंखों में सीधा झांकते हुए कहा, “वो बदनसीब हो या ना हो… तुम्हारी तरह धोखेबाज़ तो बिलकुल नहीं है, Mr. Ekansh Rathore।”

उसकी आवाज़ में कोई कंपन नहीं था। हर शब्द जैसे आत्मा से निकलकर सीधे सामने वाले के दिल को चीरते हुए जा रहे थे।

रूहानी की आंखें अब भी उसी पर टिकी थीं, पर उसके भीतर अब कोई डर नहीं बचा था… सिर्फ़ एक सच्चाई, जिसे वो बिना झुके आज कह चुकी थी।

एकांश को रूहानी का पलटवार बिल्कुल भी पसंद नहीं आया।

उसके चेहरे की मुस्कान एक झटके में फीकी पड़ गई। होंठ तन गए, आंखों की कोर में तिरस्कार उतर आया, और आवाज़ में एक जानी-पहचानी तल्ख़ी घुल गई… वही अहंकार, वही खुद को सर्वश्रेष्ठ समझने वाली हवा।

वो एक कदम आगे बढ़ा, जैसे रूहानी को फिर से वही पुराना एहसास दिलाना चाहता हो जिसमें वो खुद को हमेशा ऊँचा और दूसरों को कमतर मानता था।

वो रूहानी की आंखों में झांकते हुए धीमे मगर तीखे स्वर में बोला, “तुम अब भी वैसी ही हो रूहानी… जितनी ज़िद्दी थीं, उतनी ही तल्ख़ भी। बस फ़र्क ये है कि तब तुम्हारे पास कुछ सपने थे, और आज… बस एक रिश्ता है, जिसके पीछे तुम अपनी कमज़ोरियां छुपा रही हो।”

उसने एक हल्की हँसी में ज़हर घोलते हुए कहा, “किसी से शादी कर लेना उस दर्द से भागने का तरीका नहीं होता, जिसे तुमने खुद चुना था।”

फिर उसने कुछ पल ठहरकर, और भी गहरे वार के लिए अतीत को उघाड़ते हुए कहा, “याद है वो रात, जब तुमने कहा था कि तुम्हें सिर्फ़ आज़ादी चाहिए… किसी का सहारा नहीं? फिर क्या हुआ उस आज़ादी का? या फिर… किसी की बाहों में गिरकर तुमने उसे नाम दे दिया ‘हमसफ़र’ का?”

उसकी आवाज़ अब नर्म नहीं रही थी, उसमें एक कटाक्ष था, एक ताना, और एक अधूरा हिसाब।

“तुम्हारी आंखों में जो गुस्सा है, वो खुद पर है रूहानी… मुझ पर नहीं। क्योंकि तुम्हें पता है कि तुमने अपना सच छुपाकर, सिर्फ़ किसी से बचने के लिए किसी और को ढाल बना लिया।”

रूहानी की रग-रग में उस वक़्त जैसे कोई ज़हर उतर गया था। एकांश के शब्दों ने उसके भीतर की सारी चुप्पियों को तोड़ने की कोशिश की थी, मगर वो अब टूटने के लिए नहीं बनी थी। 

उसके हर शब्द, हर ताना, हर ज़हरीली मुस्कान… रूहानी के दिल को छलनी कर रही थी, लेकिन वो अपनी पीड़ा को आँखों की नमी से बहने नहीं देना चाहती थी। 

वो स्तब्ध थी। उसे यकीन नहीं हो रहा था कि ये वही इंसान है, जिसे उसने कभी टूटकर चाहा था, जिसके लिए उसने अपनी दुनिया की सीमाओं को लांघ दिया था। 

“यही है वो?” उसके मन ने पूछा। “यही है वो एकांश, जिसके लिए तूने सारी हदें पार कर दी थीं? जिसके इंतज़ार में तूने ख़ुद को भुला दिया था?”

वह एकांश, जो कभी उसकी हँसी का कारण था, आज उसी की आँखों में उसे असहाय, कमज़ोर और झूठा दिखाने की कोशिश कर रहा था।

उसकी रगों में उबाल था, लेकिन चेहरा शांत था। वो चुप थी, मगर उसकी आँखों में आग साफ़ झलक रही थी।

एकांश की आंखों में भरी वो कड़वाहट, और उसकी बातों में छुपा ताना… ये सब कुछ रूहानी को ऐसा महसूस करवा रहा था जैसे उसकी हर कमजोरी, हर अधूरी कोशिश, उसे खुद की नज़रों में गिरा रही हो। और सबसे ज़्यादा चुभन उसे इस बात की थी कि जिसे उसने अपनी मोहब्बत कहा था, वही आज उसे नीचा दिखाने पर उतारू था। 

पर रूहानी जानती थी… ये वही पल है जब उसे पीछे नहीं हटना है। उसे खुद के लिए, अपनी ज़िन्दगी के लिए, और अद्वैत के लिए खड़ा होना है।

उसने गहरी साँस ली। आसपास की आवाज़ें अब भीड़ के शोर में खो चुकी थीं, पर उसके भीतर एक स्पष्टता जन्म ले रही थी… अब और नहीं। अब किसी के शब्द उसे तोड़ नहीं सकते। 

वो एक कदम पीछे हटी, फिर अपनी नमी भरी, मगर दृढ़ आवाज़ में कहा, “तुम्हें भी तुम्हारी शादी की बहुत-बहुत बधाई हो, मिस्टर एकांश। जब तुमसे मुझे धोखा मिला था, तब मेरे मन में सैकड़ों सवाल थे। मैं रात-रात भर जागकर ये सोचती रही कि आख़िर तुमने मुझसे ऐसा क्यों किया? किस बात की नाराज़गी थी तुम्हें, जो बिना कुछ कहे इस तरह चले गए?” 

वो एक क्षण के लिए रुकी, उसकी आंखें अब एकांश की आंखों से सीधे भिड़ रही थीं…. जैसी नज़रें जवाब नहीं चाहतीं, बस सच्चाई थमा देती हैं।

“अपने सवालों के जवाब मैं तुमसे नहीं पा सकी, इसलिए जब मैं तुम्हारे दिए उस पते पर पहुँची और तुम्हें किसी और से शादी करते देखा, तो सारे सवाल ख़ुद-ब-ख़ुद ख़ामोश हो गए।”

रूहानी की सांसें अब गहरी थीं, उसके चेहरे पर अब न कोई मासूमियत थी, न ही कोई बेबसी…. बस एक संपूर्ण स्त्री का साहस था, जो अपने अतीत से आंखें मिलाकर आगे बढ़ने को तैयार थी।

“उसी वक़्त समझ आ गया कि मैं कभी थी ही नहीं तुम्हारे लिए ज़रूरी। शायद एक विकल्प थी, या सिर्फ़ एक वक़्त की पसंद। लेकिन एक चीज़ जो तुम आज तक नहीं समझ सके, वो ये कि मैं तुम्हारी तरह नहीं हूँ, एकांश। मैं रिश्तों को खेल नहीं मानती।”

उसने एक क्षण को आँखें बंद की, मानो खुद को समेट रही हो, फिर बोली, “और इसीलिए… अब मुझे किसी ऐसे इंसान से बात करना ज़रूरी नहीं लगता जो मेरी ज़िंदगी में अब कोई महत्व नहीं रखता।” 

एकांश के चेहरे की मुस्कान धीरे-धीरे फीकी पड़ने लगी थी। शायद उसे उम्मीद नहीं थी कि रूहानी यूँ जवाब देगी या शायद वो अब तक उसे उसी कमजोर, प्रेम में डूबी लड़की समझ रहा था, जो उसकी यादों में छूट गई थी। मगर रूहानी अब वो नहीं थी। 

रूहानी बिना एक भी पल रुके, बिना एकांश के किसी जवाब या प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा किए, पीछे मुड़ी और सीधी कदम बढ़ा दिए….. अपने रास्ते की ओर।

उसकी चाल में अब कोई लड़खड़ाहट नहीं थी। उसके कदमों में सन्नाटा नहीं, बल्कि एक स्पष्ट ध्वनि थी…… जैसे वो हर कदम पर अपने आत्मसम्मान को वापस समेट रही हो।

आसमान पर बादल थे, हल्के-हल्के हवा चल रही थी, और शहर की भीड़ में गुम होती रूहानी की परछाई, उस दिन के साथ उसका अतीत भी धीरे-धीरे पीछे छोड़ रही थी।

और एकांश… वो वहीं खड़ा रह गया, उन शब्दों की गूंज में जो उसे शायद ज़िंदगी भर याद रहेंगे।

रूहानी ने जैसे ही अद्वैत के घर का दरवाज़ा खोला, उसकी सांसें उखड़ी हुई थीं, आँखों में बवंडर थमे हुए थे। उसने दरवाज़ा बंद किया और बिना एक पल की देरी किए, अपनी पीठ दरवाज़े से टिका दी और बिना किसी सोच-विचार के धम्म से ज़मीन पर बैठ गई। 

धम्म से बैठते ही, उसकी छाती से एक टूटा हुआ, बेकाबू रुदन फूट पड़ा। 

“आहह्ह्हह्हह्ह्ह्ह !” एक दर्द भरी चीख, एक ऐसी चीख जिसमें न केवल दुख था, बल्कि बरसों की चुप्पी, टूटी उम्मीदें और एक अजीब सी हार थी। फिर वो ज़ोर-ज़ोर से रोने लगी। जैसे कोई बाँध टूटा हो… आँसुओं का नहीं, बल्कि आत्मा का। 

उसका शरीर कांपने लगा, चेहरा दोनों हथेलियों में छुपा लिया पर सिसकियाँ दीवारों से टकराकर पूरे घर में गूंज रही थीं। 

तभी सामने से दौड़ते कदमों की आहट हुई। अद्वैत रूहानी के सामने आ खड़ा हुआ। उसके बाल बिखरे हुए थे, सांसें तेज़, और चेहरे पर बेचैनी साफ़ थी। 

“रूहानी?” उसकी आवाज़ काँपी, जैसे उसने पहली बार उसके भीतर की दरारों को साफ देखा हो।

“क्या हुआ, रूहानी? ऐसे क्यों रो रही हो?”

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क्या रूहानी अद्वैत को उस रात का सच बता पाएगी… या उसकी चुप्पी ही एक और तूफ़ान को जन्म देगी? 

उसके आँसू सिर्फ़ अतीत की राख थे… या किसी नई आग का इशारा?  

जब अद्वैत उसकी आंखों में उस दर्द को पढ़ेगा….. क्या वो समझ पाएगा कि ये कहानी अब सिर्फ़ उसकी नहीं रही?

 

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