🔐 लॉग-इन या रजिस्टर करें  

अधूरी इबादत भाग~12

पढ़ने का समय : 10 मिनट

भाग~12 ग़लत इल्ज़ाम का बोझ

 

रूहानी ने जब दरवाज़े पर अपने माँ-पापा और अपने भाई को देखा, तो एक पल के लिए उसे अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हुआ। जैसे कोई सपना अचानक हक़ीक़त में बदल गया हो, जैसे वर्षों की सूनी सड़कों पर अचानक कोई परिचित चेहरा मुस्कुरा कर सामने आ गया हो। दरवाज़े की चौखट पर खड़ी रूहानी की आँखें भर आईं….. आंसू न खुशी के थे, न ग़म के, बस एक लंबी प्रतीक्षा के थके हुए, गीले मोती थे।

किसी के कुछ कहने या सोचने से पहले ही, यश दौड़कर अपनी बहन से लिपट गया। उस आलिंगन में अनगिनत शब्द थे… शिकायतें, माफ़ी, डर, अपनापन और ना जाने क्या – क्या….

“मुझे लगा मैंने आपको खो दिया है, दीदी,” यश एक ही साँस में कह गया, उसकी आवाज़ में एक टूटी हुई राहत थी, जो शायद अब तक रोज़ रात उसकी नींदें तोड़ देती थी।

रूहानी ने उसके सिर को थपथपाते हुए कहा, “देख, मैं हूं न यहाँ… सही सलामत।” उसके शब्दों में न कोई दंभ था, न कोई सफाई। बस एक कोमल सच्चाई थी।

पर जैसे ही रूहानी अपने पिता के पास पहुँची, समय जैसे पल भर में ठहर गया। भानु प्रताप चौहान, एक गरिमामय भाव लिए अपने सख्त चेहरे के साथ हाथ उठा कर उसे वहीं रुकने का इशारा करते हैं। उस इशारे में कोई क्रोध नहीं था, पर कोई प्रेम भी नहीं। बस एक गहरी दूरी थी…. आत्मा से आत्मा तक की दूरी।

“यही दिन दिखाने के लिए तू घर छोड़ कर चली गई थी?” उनकी आवाज़ भारी थी, जैसे वर्षों से दबा ज्वालामुखी अब फूट पड़ा हो।

रूहानी एक पल को स्तब्ध रह गई, मानो उसके कानों ने कुछ उल्टा सुन लिया हो।

“मैं कुछ समझी नहीं, पापा,” उसने धीरे से कहा। उसकी आवाज़ में झिझक थी, पर दिल में अभी भी उम्मीद की थोड़ी सी रौशनी थी।

भानु प्रताप गरज कर बोले, “मुझे पापा कहने का हक तुम पहले ही खो चुकी हो। तुम हमारे लिए पहले ही मर चुकी थी, लेकिन ये नहीं सोचा था कि तुम्हारी बेशर्मी इतनी बढ़ जाएगी कि तुम्हारे जाने के बाद भी हमारी समाज में कोई इज़्ज़त नहीं रहेगी।”

ये शब्द नहीं थे, अंगारे थे। रूहानी जैसे एक-एक शब्द से जलती चली गई। उसकी आत्मा पर, जो अब तक अपने लौटने की घड़ी में सहजता ढूंढ रही थी, अचानक ठंडी हवा की जगह तपता सूरज उतर आया।

वो अपने पिता की आँखों में देखती रही… वहाँ न कोई अपनापन था, न कोई सुरक्षा बस परछाईयाँ थी और एक टूटा हुआ विश्वास।

“आप ये क्या सब बोल रहे हैं, पापा?” उसने आँखें भरकर कहा, “किस बारे में बोले जा रहे हैं? अंदर तो आइए, तब बात करते हैं।”

उसका स्वर अब भी शांति लिए हुए था, पर भीतर कुछ टूटता जा रहा था, बिखरता जा रहा था, मगर चेहरे पर वो अब भी एक मुस्कान लिए खड़ी थी…. शायद खुद को समझाने के लिए, शायद यह दिखाने के लिए कि वो अब भी मजबूत है।

लेकिन उसकी माँ जानकी चौहान की आवाज़ में जो तीखापन निकला, वो उसे सहने लायक नहीं रही।

“बस कर रूहानी,” माँ की कड़ी आवाज़ गूँजी, “तेरे चलते हम कहीं मुँह दिखाने के क़ाबिल नहीं रहे। पहले तो तूने ज़िद करके वो फ़ैशन वाला कपड़ा सिलने का काम शुरू किया था, ये जानते हुए भी कि हम दोनों में से कोई भी रज़ामंद नहीं था। और फिर उसके बाद क्या हुआ, भूल गई है क्या? या फिर से याद दिलाऊँ?”

हर एक शब्द जैसे अतीत की धूल उड़ा रहा था, वो धूल जो रूहानी ने बड़ी मुश्किल से जमा दी थी, हर उस बात को ढँक दिया था जिसने उसकी रातों की नींद और दिल की चैन छीन ली थी।

रूहानी की आँखों में अब आँसू नहीं थे, मगर उसकी रगों में दर्द दौड़ रहा था, हर सांस के साथ जलन पैदा करता हुआ। उसे अब अपने माँ-बाप की इन उलझन भरी बातों से चिढ़ होने लगी थी। वो नहीं चाहती थी कि फिर से वो सब याद किया जाए। वो नहीं चाहती थी कि फिर से वो सब जिंदा हो….. वो रातें, वो ताने, वो अकेलापन।

वो काँपते हुए अपने छोटे भाई यश का हाथ पकड़ ली, उसकी आँखों में एक बेचैनी थी, एक डर।

“क्या हुआ है, यश? बता… मम्मी -पापा कैसी-कैसी बातें कर रहे हैं?” उसकी आवाज़ फुसफुसाहट में थी, जैसे डरती हो कि कहीं खुद उसकी आवाज़ से उसकी दुनिया और ज़्यादा टूट न जाए।

यश कुछ क्षण चुप रहा। उसकी नज़रें ज़मीन में गड़ी रही और शब्द जैसे उसके गले में अटक गए हो। फिर वह अपने मम्मी -पापा से थोड़ी नज़रें चुराकर कहा, “वो दीदी… दी… वो पड़ोस वाली आंटी ने कहा है कि आप एक अजनबी आदमी के साथ उसके घर में अकेले रह रही हो और… और…”

उसके शब्द अधूरे रह गए मगर रूहानी थोड़ा-थोड़ा समझ चुकी थी। उसके दिल की धड़कन तेज़ हो गई जैसे कोई भूचाल आया हो उसके भीतर।

“और क्या यश?” उसकी आवाज़ अब भी धीमी थी, मगर उसमें डर नहीं था, बल्कि एक ऐसी सख़्ती थी जो उसके टूटे हुए आत्मसम्मान को थामे हुए थी।

तभी माँ की आवाज़ फिर गूँजी और इस बार उसमें नफ़रत की तपिश थी, आरोपों की आग।

“वो क्या कहेगा, तुमने जब हमारे मुँह काले किए तब याद नहीं था क्या? जब पराए मर्द के साथ उसके घर में, उसके बिस्तर में… छी… मुझसे तो बोलते भी नहीं बनता है।”

एक पल को समय जैसे ठहर गया। रूहानी का चेहरा फक पड़ गया। उसके होंठ काँप उठे, और उसका सारा शरीर जैसे बर्फ बन गया हो। माँ की बातों ने उसके भीतर की उस मासूम बच्ची को झकझोर दिया था, जो अब तक यही सोचती आई थी कि उसकी माँ उसे समझेगी कि कभी तो उसका दर्द एक दिन उनके सीने तक पहुँचेगा।

लेकिन आज तो जैसे उसकी रूह तक को किसी ने चीर दिया था।

उसने एक गहरी साँस ली, फिर उसकी आँखें जल उठीं, लेकिन उसमें आँसू नहीं, एक गुस्सा था…. ग़लत इल्ज़ामों के खिलाफ़ एक मौन विद्रोह।

“ये आप क्या अनाप-शनाप बोले जा रही हैं, मम्मी?” उसकी आवाज़ थरथरा रही थी, मगर वो चुप नहीं रही। “आप किसी तीसरे की बातों में कैसे आ गईं? क्या आपने अपनी आँखों से मुझे कुछ भी ग़लत करते देखा है?”

उसकी आवाज़ की कड़क अब किसी आंधी जैसी थी। वो अब तक उन दोनों की इज्जत करते आयी थी, लेकिन अब चुप रहना उसे गवारा नहीं था।

रूहानी की आँखों में एक हज़ार सवाल थे। क्या उसके सपने देखने की आज़ादी इतनी बड़ी ग़लती थी? 

क्या उसने कोई अपराध कर दिया क्योंकि उसने अपने लिए एक रास्ता चुना, जो उसकी माँ-बाप की सोच से अलग था? 

क्या एक लड़की का अपने पैरों पर खड़े होने का हक़ नहीं?

तभी रूहानी के पापा ने उसके गाल पर एक जोर का तमाचा जड़ दिया जिसकी गूंज से रूहानई की माँ और उसका भाई दोनों एक दूसरे से चिपक से गए। 

रूहानी के गाल पर वो तमाचा सिर्फ़ उसकी त्वचा नहीं, उसकी आत्मा तक को जला गया था। एक पल को समय ठहर गया, जैसे घर की दीवारें भी सहमकर चुप हो गई हों। 

भानु प्रताप की गूंजती आवाज़ ने उस सन्नाटे को चीरते हुए उसकी रगों में तूफान भर दिया, “बेशर्म तो तू पहले से ही थी, लेकिन चरित्रहीन भी हो जाएगी ये हमने कभी उम्मीद नहीं की थी। तेरी वही सब करतूत देखने के लिए ही क्या अब हमारी आंखें बची हैं?”

रूहानी की आंखों के सामने अंधेरा छाने लगा था, पर उससे ज़्यादा काले वो शब्द थे जो उसके पिता के होंठों से निकले थे… तेज, नुकीले, और आत्मा को बींध देने वाले।

रूहानी, वो वहीं आधे झुके हुए, अपने सुजे हुए गाल पर हाथ रखे, अपनी ही उलझनों में डूबी खड़ी थी। सन्नाटा, उसकी साँसों की रुकावट में तब्दील हो गया था। उसकी आंखों में आंसू नहीं थे…. नहीं, अब तो वो भी सूख चुके थे, जैसे आत्मा रोते-रोते थक गई हो।

रूहानी की आंखें कुछ पल के लिए पथरा गईं, गाल पर पड़ा हाथ अब कांपने लगा था, दर्द से नहीं, भीतर उमड़ते तूफान से। उसने कुछ नहीं किया था — ना कोई पाप, ना कोई छल, फिर भी हर बार वो ही क्यों दोषी बनती रही? अंदर से कोई चीख उठी, कोई घुटा हुआ आक्रोश जो बरसों से थमा हुआ था।

“नहीं… बहुत हो गया…” उसने खुद से कहा, जैसे उसके भीतर कोई ज्वालामुखी फूटने की तैयारी में हो।

फिर एक लंबी, टूटी सांस लेकर, उसने एक ही बार में वो सब कह दिया जो उसकी रूह में बरसों से धंसा पड़ा था।

“क्यों, पापा? क्या सिर्फ मेरी जननांग से आपकी इज़्ज़त जुड़ी है? क्या आपने मुझे बेटी बनाकर पाला था या कोई ‘इज़्ज़त का बक्सा’ बनाकर, जिसे जब तक ताला लगा रहे, तब तक आप शरीफ़ कहलाएं?”

उसकी आवाज़ में ना चीख थी, ना सिसकी, बल्कि वो सन्नाटे का वो रूप थी जो कानों को फाड़ सकता था साथ ही दिल को भी चीर सकता था।

“आपको मेरे हक़ से ज़्यादा मेरी देह की फिक्र क्यों है? मैं जीऊँ या मरूँ, आपको फर्क नहीं पड़ता….. बस इतना तय रहे कि मेरी देह किसी अजनबी की देह से ना छुए। क्या आपकी मर्दानगी इतनी सस्ती है कि मेरे ज़िंदा रहने से भी डर जाती है?”

उसके शब्दों में जहर नहीं था, बल्कि वो सालों की पीड़ा थी, जो अब शब्दों के लिबास में बाहर आ रही थी।

“जब मैं पुल से कूद कर मरने जा रही थी, उससे पहले आपको शर्म नहीं आई थी मुझे धिक्कारते हुए कहने में कि ‘तू हमारे लिए मर गई’। पर अब, जब मैं किसी की छत के नीचे साँस ले रही हूँ, तो आपको अपनी इज़्ज़त की चिंता सताने लगी?”

उसका गला सूखने लगा था, पर शब्द नहीं रुके।

“कौन-सी इज़्ज़त है ये, पापा, जो एक लड़की के पैरों के बीच से निकलकर आपके सीने में जाकर बसती है?”

उसके ये शब्द जैसे दीवारों से टकराकर फिर उसके ही कानों में लौट आए। पर उससे पहले, उसकी मां ने जैसे खुद की बेइज़्ज़ती महसूस कर ली हो, तो उन्होंने उसके गाल पर एक और तमाचा मारा, फिर एक और। फिर वो बरसने लगी, न केवल हाथों से, बल्कि शब्दों से भी।

“सही में सारी शरम-हया बेच कर खा गई है ये लड़की! बोलने से पहले लिहाज़ भी नहीं हुआ कि क्या-क्या बके जा रही है!”

रूहानी कुछ कदम पीछे हट गई, पर उसकी आवाज़ अब भी टिकी रही, जैसे हर थप्पड़ के साथ और मजबूत हो रही हो।

“तो आख़िर क्या ग़लत कहा मैंने?” उसने सवाल किया, पर उसमें कोई लड़ाई नहीं थी, बस थकावट थी। जैसे एक टूटे हुए इंसान ने अब लड़ने का बोझ उतार फेंका हो।

तभी उसके पिता, गुस्से से कांपते हुए, लगभग चीखते हुए बोले, “बस! बहुत बोल लिया तूने और बहुत सुन लिया हमने!”

उनकी आंखों में वो लाचारी थी जो हर उस पुरुष की आंखों में होती है जब उसकी ‘इज़्ज़त’ उसके नियंत्रण से बाहर जाने लगती है। उन्होंने उसका हाथ पकड़ा, इतने ज़ोर से जैसे वो उसे अपनी ‘नाक कटने’ से बचाने के लिए किसी गहरी खाई से खींच रहे हों।

“तुझे इसकी सज़ा मिलकर रहेगी।”

और फिर वो उसे लगभग घसीटते हुए उस घर से बाहर निकाल ले गए, जैसे कोई अपराधी पकड़ा गया हो। पीछे-पीछे उसकी मां और छोटा भाई, जिनकी आंखों में सिर्फ़ शर्म और डर था। 

रूहानी को इस पल में अपने पिता की पकड़ इतनी मजबूत महसूस हो रही थी, जैसे वह उसे किसी चट्टान की तरह घसीट रहे हो और वह उन चट्टानों के नीचे दबकर नष्ट हो जाएगी।

उसका मन बेतहाशा उथल-पुथल कर रहा था, लेकिन उसकी आँखें पूरी तरह से खो चुकी थीं। उसकी दुनिया जैसे अंधेरे में डूब चुकी थी, जहां किसी भी उम्मीद का नामो-निशान नहीं था। वह जैसे एक खाली रास्ते पर चल रही थी, जहां न तो कोई मंजिल थी और न कोई वापसी का रास्ता।

तभी रूहानी का मोबाइल उसकी नजरों के सामने गिर गया और उसके स्क्रीन पर लगातार नोटिफिकेशन आ रहे थे। लेकिन वह कुछ नहीं देख सकी। उसका मन वह था ही नहीं। 

———-

रूहानी की आत्मा जैसे उथल-पुथल में थी, और हर शब्द, हर तमाचा, उसे और गहरे में ले जा रहा था। क्या उसके पास अब कोई रास्ता था, या ये उसका आखिरी संघर्ष था?

क्या रूहानी की आत्मा इतनी टूट चुकी थी कि वो कभी खुद को फिर से नहीं पा सकेगी? 

क्या अब भी कोई ऐसी उम्मीद है, जो उसे इस अंधेरे से बाहर निकाल सके?

रूहानी की दुनिया अब सवालों में ढल चुकी थी, मगर क्या वह इन सवालों का जवाब कभी पा सकेगी?

Comments

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *