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  • अधूरी इबादत भाग~13

    अधूरी इबादत भाग~13

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

    भाग~13 अफवाहों के घेरे में

     

    शहर के सबसे बड़े सभागार की रोशनी आज अद्वैत के लिए खास थी। मखमली पर्दे धीमे-धीमे फड़फड़ा रहे थे, जैसे वे भी इस सुबह की थमी हुई बेचैनी को समझ रहे हों। अद्वैत मंच के ठीक बीच, विशिष्ट अतिथियों के लिए रखी गई भव्य, ऊँची पीठ वाली कुर्सी पर बैठा था, जिस पर बैठते ही किसी के भी भीतर एक छलावा सा आत्मगौरव जाग सकता था। 

    चारों तरफ तालियों की गूंज थी, हर मुस्कान में आदर था, हर आँख में चमक। लेखक अद्वैत अवस्थी… शब्दों का जादूगर, दिलों को छूने वाला… आज उस ऊँचाई पर था, जहाँ पहुँचने का सपना हर कलाकार देखता है। 

    लेकिन अद्वैत के भीतर कुछ टूट रहा था। उसके भीतर एक ऐसा शोर था जिसे कोई सुन नहीं सकता था। 

    जब वह तड़के ही अपने घर से निकला था, तभी से उसे कुछ अच्छा नहीं लग रहा था। मन अजीब सा घुटा-घुटा था, जैसे कोई अनकही आशंका दिल में घर बना रही हो। गाड़ी की खिड़की से बाहर बहती हवा भी आज उसे बोझिल सी लगी थी। हरियाली, सड़कें, आसमान…. सब कुछ उसे अपने से दूर-दूर सा लग रहा था। उसके भीतर एक अजीब सी वीरानी थी।

    सभागार के चमचमाते लाइटों के नीचे, वह तन से तो बैठा था, मुस्कुरा भी रहा था, मगर आत्मा कहीं भटक रही थी। भीड़ की तारीफों में डूबती-उतराती उसकी पहचान भी आज उसे बोझ जैसी लग रही थी। 

    एक हिस्सा जैसे लगातार पूछ रहा था… क्या यही था जिसकी तलाश थी? 

    क्या यही संतोष था जिसकी कल्पना की थी?

    किसी ने माइक पर उसका नाम पुकारा, बधाइयों के साथ। वह जैसे किसी नींद से जगा हो, धीरे से मुस्कुराया और आगे बढ़ा। कदम भारी थे, मुस्कान में बनावटी चमक थी।

    स्टेज पर पहुँचकर उसने माइक थामा।

    हॉल में एक गहरी ख़ामोशी छा गई। लोग उसकी अगली कहानी, उसकी अगली सीख, उसके शब्दों की गर्माहट को सुनने के लिए तत्पर थे। मगर अद्वैत के गले में जैसे कांटे उग आए थे। शब्द, जो कभी उसकी आत्मा से बहते थे, आज गले में अटके हुए थे।

    “मैं…,” उसने कहना शुरू किया, फिर पल भर को रुका।

    वह लोगों के चेहरों को देख रहा था। वहाँ केवल प्रशंसा थी, अपेक्षाएँ थीं, और कहीं भी उसे नहीं दिखा वह सुकून, जो शायद उसकी आत्मा मांग रही थी।

    उसे अपनी पत्नी की याद आई — वो जो इतनी जल्दी उससे बिछड़ गई थी। उसकी वो मुस्कुराहटें, उसके अधूरे वादे, उनका अधूरा सपना — सब एक साथ आँखों के सामने छा गया।

    और फिर… अचानक….. घर में एक बेहोश पड़ी लड़की की तस्वीर भी दिमाग के किसी कोने से उभर आई — रूहानी। वो अजनबी लड़की जो अब उसके घर की वीरानी में साँस ले रही थी। जिसे उसने बिना सोचे समझे बचा तो लिया था, पर अब उसके होने से घर में अजीब सी गूँज फैल गई थी।

    शायद रूहानी के टूटे हुए टुकड़े, अद्वैत के अपने बिखरे टुकड़ों से टकरा रहे थे। शायद इसलिए दिल में ये बेचैनी थी, ये घुटन थी। 

    “शब्दों से दुनिया को छूना आसान है,” उसने अचानक बोलना शुरू किया, “लेकिन अपने भीतर के सन्नाटे को छूना सबसे मुश्किल।”

    लोगों ने सोचा यह कोई गहरी भूमिका है, कोई नया विचार। पर अद्वैत जानता था, ये उसकी आत्मा की चीख थी, जो शब्द बनकर बाहर आ रही थी। उसकी आँखें चमक रही थीं, लेकिन वह चमक नम थी। उसने मुस्कुराने की कोशिश की, मगर होठों पर सिर्फ़ एक थकी हुई रेखा खिंच पाई।

    माइक रखते हुए वह जानता था, यह तालियाँ, ये हॉल, ये चमकती बत्तियाँ — सब कुछ उसकी सच्चाई से कोसों दूर हैं। आज भी वह अकेला था….. शायद पहले से भी ज्यादा…….

    शब्दों का सम्राट, दिलों का जादूगर — और फिर भी भीतर एक टूटा हुआ, बिखरा इंसान, जो बस किसी अपने की गर्माहट चाहता था लेकिन उस भीड़ में, उस सभागार में, उसे कोई अपना नहीं दिखा। केवल अजनबियों की गूँजती तालियाँ थीं, और एक थका हुआ दिल जो चुपचाप अपना बोझ ढो रहा था।

    रौशनी से चमकते मंच के पीछे का कोना हलचल से भर गया था। कवि सम्मेलन के समापन के बाद रिपोर्टर और मीडिया वाले अपने अपने कैमरों और रिकॉर्डरों के साथ अद्वैत के चारों ओर इकट्ठा हो गए थे। उनके सवालों की बौछार शुरू हो चुकी थी। शुरू में बात लेखन और रचनाओं के आस-पास घूमती रही। किस कविता में कौन सी भावना, किस कहानी में कौन सा दर्द… अद्वैत संयमित मुस्कान के साथ जवाब देता रहा, जैसे वर्षों से इस तरह के सवालों का सामना करता आया हो।

    लेकिन फिर अचानक सवालों की दिशा बदलने लगी। आवाजें तीखी हो गईं, नजरें चुभती हुई।

    “आपकी लेखनी की प्रेरणा कौन है?” एक युवा रिपोर्टर ने पूछा, उत्सुकता से झुकते हुए।

    अद्वैत ने अनायास ही बिना ज्यादा सोचे कहा, “मेरी पत्नी।”

    उसके शब्दों में एक नर्म, गहरी थकान थी। वह मुस्कुराया भी नहीं, बस नजरें एक पल को झुक गईं, मानो कोई भूला-बिसरा चेहरा फिर से उसकी आँखों के सामने तैर गया हो।

    लेकिन जैसे ही उसके शब्द हवा में घुले, एक और सवाल पीछे से आ गया, तीखा और बेरहम — “आपकी पत्नी तो एक साल पहले गुजर चुकी हैं, ना?”

    अद्वैत का दिल एक पल को थम गया। कमरे की गर्माहट जैसे अचानक बर्फ में बदल गई।  

    वह कुछ कह पाता, उससे पहले ही कोई और बोल पड़ा, “या फिर वो लड़की, जिसके साथ आप इन दिनों अपने घर में रह रहे हैं, वही आपकी नई पत्नी हैं?”

    यह सवाल नहीं था, यह एक वार था — सीधा दिल पर।

    अद्वैत का चेहरा सफेद पड़ गया। पलकों के नीचे छुपी थकान अचानक खुल कर सामने आ गई। आँखों में जो धैर्य था, वह दरकने लगा।  

    भीतर एक बेचैन चुप्पी थी, जो चिल्ला रही थी, चीख रही थी, पर बाहर वह बस खड़ा था — गूंगा और अकेला।

    रिपोर्टरों के कैमरों की फ्लैश लाइट्स उसके चेहरे पर चमकती रहीं। कोई जवाब न पाकर, वे और भी आक्रामक हो गए, उनके सवाल अब तीर बनकर आ रहे थे।

    “कौन है वो लड़की?”  

    “क्या आपने फिर से शादी कर ली है?”  

    “क्या आप अपनी पत्नी की यादों को इतनी जल्दी भूल गए?”  

    अद्वैत ने गहरी साँस ली। गला सूख गया था, जैसे हर शब्द कहीं अंदर ही घुट कर मर गया हो। 

    उसने नजरें उठाई, सामने भीड़ थी…. उत्सुक, जिज्ञासु, और निर्मम। वहाँ कोई अपनापन नहीं था, कोई समझ नहीं थी, सिर्फ़ हड़पने की भूख थी, उसकी जिंदगी का कोई टुकड़ा, कोई सनसनी।

    अद्वैत के चारों तरफ भीड़ का घेरा कसता जा रहा था। मंच के नीचे, चारों दिशाओं से कैमरे, माइक और सवाल उसकी ओर धकेले जा रहे थे। सभागार की भीतरी दीवारों पर फुसफुसाहटें गूंज रही थीं, जो धीरे-धीरे ऊँची आवाज़ों में बदलने लगी थीं। लोग उसे अब किसी और नजर से देखने लगे थे….. वही अद्वैत, जो शब्दों का जादूगर था, अब गंदी अफवाहों के घेरे में घिर गया था। 

    फिर अचानक मीडिया वालों ने दीवार पर प्रोजेक्टर चालू कर दिया। उजली दीवार पर एक तस्वीर उभरने लगी — एक पुल के किनारे की धुंधली शाम, जहाँ अद्वैत ने एक बेहोश लड़की को अपनी बाँहों में उठा रखा था। भीड़ सन्न रह गई। दूसरी तस्वीर में वह लड़की अद्वैत की कार में बैठी थी, और फिर उसके घर में दाखिल होती दिखाई दी। 

    सभागार में एक गहरी सरसराहट फैल गई। चुभती हुई निगाहें अद्वैत पर टिक गईं। सवाल अब और ज्यादा जहरीले हो चले थे।  

    “कौन है ये लड़की?”  

    “क्या ये आपकी नई प्रेमिका है?”  

    “कब से आपके घर में रह रही है?”  

    अद्वैत ने माइक थामा, उसकी आवाज अब भी वही मुलायम थी, लेकिन भीतर का दर्द उसके हर शब्द में रिस रहा था।  

    “मैं स्पष्ट करना चाहता हूँ,” अद्वैत ने नज़रों में गहराई लाकर कहा, “जो कुछ भी आपने देखा, वह एक गलतफहमी है। वह लड़की मुश्किल में थी। अगर इंसानियत को बचाना गुनाह है, तो हाँ, मैंने गुनाह किया है।”

    लेकिन मीडिया को सफाई नहीं चाहिए थी, उन्हें सनसनी चाहिए थी।

    तालियों के बीच से, चुभती हुई फुसफुसाहटें उठती रहीं। भीड़ में अब जिज्ञासा नहीं, एक गहरी नफरत और गंदे मनोरंजन की भूख थी।

    स्थिति बेकाबू होने लगी थी। अद्वैत का मैनेजर, जो पीछे से सब कुछ देख रहा था, तुरंत आगे बढ़ा और उसे भीड़ से बाहर निकालने का रास्ता बना दिया। दोनों बड़ी मुश्किल से भीड़ से बचते हुए कार तक पहुँचे।

    कार के अंदर घुसते ही अद्वैत ने अपना सिर सीट से टिका दिया। उसकी आँखें बंद थीं, चेहरा थका और टूटा हुआ। सांसें भारी हो रही थीं, जैसे हर सांस अब एक बोझ थी।

    मैनेजर ने ड्राइविंग सीट पर बैठते हुए गहरी सांस ली और फिर नरमी से कहा, “सर, इस हालात से एक ही रास्ता है बाहर निकलने का।”

    अद्वैत ने आँखें खोलीं, नजरें सवालों से भरी हुई थीं।

    “आपको और उस लड़की को शादीशुदा दिखाना पड़ेगा,” मैनेजर ने कहा।

    अद्वैत का चेहरा गुस्से से लाल हो गया। “क्या बकवास कर रहे हो तुम? मैं अपनी ज़िंदगी का तमाशा नहीं बनाऊंगा।”

    मैनेजर ने संयम से बात आगे बढ़ाई, “सर, सुनिए। मैं असली शादी की बात नहीं कर रहा। पेपर पर शादी… “एक कॉन्ट्रैक्ट”। बस दिखावे के लिए। ताकि मीडिया शांत हो जाए, आपकी इमेज बर्बाद न हो।”

    अद्वैत ने कार की खिड़की से बाहर देखा। अंधेरे में भागती लाइटों के बीच उसका दिल भी भाग रहा था, कहीं दूर, जहाँ उसे अपनी सच्चाई बचानी थी। 

    थोड़ी देर बाद उसने गहरी सांस लेते हुए कहा, “ठीक है। मैं आज ही घर जाकर उससे बात करूँगा।”

    उसकी आवाज थकी हुई थी, लेकिन उसमें एक अजीब सी दृढ़ता भी थी। एक फैसला… भले ही मजबूरी में लिया गया हो, लेकिन अब उसे निभाना था।  

    ———-

    क्या अद्वैत सच में रूहानी को इस मजबूरी भरे सौदे में बाँध पाएगा?

    क्या एक मजबूरी से शुरू हुआ समझौता, अद्वैत के दिल के जख्मों को और गहरा कर देगा?

    या फिर रूहानी के अतीत का कोई ऐसा राज सामने आएगा, जो अद्वैत की आधी अधूरी दुनिया को और भी बिखेर देगा?

  • अधूरी इबादत भाग~12

    अधूरी इबादत भाग~12

    पढ़ने का समय : 10 मिनट

    भाग~12 ग़लत इल्ज़ाम का बोझ

     

    रूहानी ने जब दरवाज़े पर अपने माँ-पापा और अपने भाई को देखा, तो एक पल के लिए उसे अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हुआ। जैसे कोई सपना अचानक हक़ीक़त में बदल गया हो, जैसे वर्षों की सूनी सड़कों पर अचानक कोई परिचित चेहरा मुस्कुरा कर सामने आ गया हो। दरवाज़े की चौखट पर खड़ी रूहानी की आँखें भर आईं….. आंसू न खुशी के थे, न ग़म के, बस एक लंबी प्रतीक्षा के थके हुए, गीले मोती थे।

    किसी के कुछ कहने या सोचने से पहले ही, यश दौड़कर अपनी बहन से लिपट गया। उस आलिंगन में अनगिनत शब्द थे… शिकायतें, माफ़ी, डर, अपनापन और ना जाने क्या – क्या….

    “मुझे लगा मैंने आपको खो दिया है, दीदी,” यश एक ही साँस में कह गया, उसकी आवाज़ में एक टूटी हुई राहत थी, जो शायद अब तक रोज़ रात उसकी नींदें तोड़ देती थी।

    रूहानी ने उसके सिर को थपथपाते हुए कहा, “देख, मैं हूं न यहाँ… सही सलामत।” उसके शब्दों में न कोई दंभ था, न कोई सफाई। बस एक कोमल सच्चाई थी।

    पर जैसे ही रूहानी अपने पिता के पास पहुँची, समय जैसे पल भर में ठहर गया। भानु प्रताप चौहान, एक गरिमामय भाव लिए अपने सख्त चेहरे के साथ हाथ उठा कर उसे वहीं रुकने का इशारा करते हैं। उस इशारे में कोई क्रोध नहीं था, पर कोई प्रेम भी नहीं। बस एक गहरी दूरी थी…. आत्मा से आत्मा तक की दूरी।

    “यही दिन दिखाने के लिए तू घर छोड़ कर चली गई थी?” उनकी आवाज़ भारी थी, जैसे वर्षों से दबा ज्वालामुखी अब फूट पड़ा हो।

    रूहानी एक पल को स्तब्ध रह गई, मानो उसके कानों ने कुछ उल्टा सुन लिया हो।

    “मैं कुछ समझी नहीं, पापा,” उसने धीरे से कहा। उसकी आवाज़ में झिझक थी, पर दिल में अभी भी उम्मीद की थोड़ी सी रौशनी थी।

    भानु प्रताप गरज कर बोले, “मुझे पापा कहने का हक तुम पहले ही खो चुकी हो। तुम हमारे लिए पहले ही मर चुकी थी, लेकिन ये नहीं सोचा था कि तुम्हारी बेशर्मी इतनी बढ़ जाएगी कि तुम्हारे जाने के बाद भी हमारी समाज में कोई इज़्ज़त नहीं रहेगी।”

    ये शब्द नहीं थे, अंगारे थे। रूहानी जैसे एक-एक शब्द से जलती चली गई। उसकी आत्मा पर, जो अब तक अपने लौटने की घड़ी में सहजता ढूंढ रही थी, अचानक ठंडी हवा की जगह तपता सूरज उतर आया।

    वो अपने पिता की आँखों में देखती रही… वहाँ न कोई अपनापन था, न कोई सुरक्षा बस परछाईयाँ थी और एक टूटा हुआ विश्वास।

    “आप ये क्या सब बोल रहे हैं, पापा?” उसने आँखें भरकर कहा, “किस बारे में बोले जा रहे हैं? अंदर तो आइए, तब बात करते हैं।”

    उसका स्वर अब भी शांति लिए हुए था, पर भीतर कुछ टूटता जा रहा था, बिखरता जा रहा था, मगर चेहरे पर वो अब भी एक मुस्कान लिए खड़ी थी…. शायद खुद को समझाने के लिए, शायद यह दिखाने के लिए कि वो अब भी मजबूत है।

    लेकिन उसकी माँ जानकी चौहान की आवाज़ में जो तीखापन निकला, वो उसे सहने लायक नहीं रही।

    “बस कर रूहानी,” माँ की कड़ी आवाज़ गूँजी, “तेरे चलते हम कहीं मुँह दिखाने के क़ाबिल नहीं रहे। पहले तो तूने ज़िद करके वो फ़ैशन वाला कपड़ा सिलने का काम शुरू किया था, ये जानते हुए भी कि हम दोनों में से कोई भी रज़ामंद नहीं था। और फिर उसके बाद क्या हुआ, भूल गई है क्या? या फिर से याद दिलाऊँ?”

    हर एक शब्द जैसे अतीत की धूल उड़ा रहा था, वो धूल जो रूहानी ने बड़ी मुश्किल से जमा दी थी, हर उस बात को ढँक दिया था जिसने उसकी रातों की नींद और दिल की चैन छीन ली थी।

    रूहानी की आँखों में अब आँसू नहीं थे, मगर उसकी रगों में दर्द दौड़ रहा था, हर सांस के साथ जलन पैदा करता हुआ। उसे अब अपने माँ-बाप की इन उलझन भरी बातों से चिढ़ होने लगी थी। वो नहीं चाहती थी कि फिर से वो सब याद किया जाए। वो नहीं चाहती थी कि फिर से वो सब जिंदा हो….. वो रातें, वो ताने, वो अकेलापन।

    वो काँपते हुए अपने छोटे भाई यश का हाथ पकड़ ली, उसकी आँखों में एक बेचैनी थी, एक डर।

    “क्या हुआ है, यश? बता… मम्मी -पापा कैसी-कैसी बातें कर रहे हैं?” उसकी आवाज़ फुसफुसाहट में थी, जैसे डरती हो कि कहीं खुद उसकी आवाज़ से उसकी दुनिया और ज़्यादा टूट न जाए।

    यश कुछ क्षण चुप रहा। उसकी नज़रें ज़मीन में गड़ी रही और शब्द जैसे उसके गले में अटक गए हो। फिर वह अपने मम्मी -पापा से थोड़ी नज़रें चुराकर कहा, “वो दीदी… दी… वो पड़ोस वाली आंटी ने कहा है कि आप एक अजनबी आदमी के साथ उसके घर में अकेले रह रही हो और… और…”

    उसके शब्द अधूरे रह गए मगर रूहानी थोड़ा-थोड़ा समझ चुकी थी। उसके दिल की धड़कन तेज़ हो गई जैसे कोई भूचाल आया हो उसके भीतर।

    “और क्या यश?” उसकी आवाज़ अब भी धीमी थी, मगर उसमें डर नहीं था, बल्कि एक ऐसी सख़्ती थी जो उसके टूटे हुए आत्मसम्मान को थामे हुए थी।

    तभी माँ की आवाज़ फिर गूँजी और इस बार उसमें नफ़रत की तपिश थी, आरोपों की आग।

    “वो क्या कहेगा, तुमने जब हमारे मुँह काले किए तब याद नहीं था क्या? जब पराए मर्द के साथ उसके घर में, उसके बिस्तर में… छी… मुझसे तो बोलते भी नहीं बनता है।”

    एक पल को समय जैसे ठहर गया। रूहानी का चेहरा फक पड़ गया। उसके होंठ काँप उठे, और उसका सारा शरीर जैसे बर्फ बन गया हो। माँ की बातों ने उसके भीतर की उस मासूम बच्ची को झकझोर दिया था, जो अब तक यही सोचती आई थी कि उसकी माँ उसे समझेगी कि कभी तो उसका दर्द एक दिन उनके सीने तक पहुँचेगा।

    लेकिन आज तो जैसे उसकी रूह तक को किसी ने चीर दिया था।

    उसने एक गहरी साँस ली, फिर उसकी आँखें जल उठीं, लेकिन उसमें आँसू नहीं, एक गुस्सा था…. ग़लत इल्ज़ामों के खिलाफ़ एक मौन विद्रोह।

    “ये आप क्या अनाप-शनाप बोले जा रही हैं, मम्मी?” उसकी आवाज़ थरथरा रही थी, मगर वो चुप नहीं रही। “आप किसी तीसरे की बातों में कैसे आ गईं? क्या आपने अपनी आँखों से मुझे कुछ भी ग़लत करते देखा है?”

    उसकी आवाज़ की कड़क अब किसी आंधी जैसी थी। वो अब तक उन दोनों की इज्जत करते आयी थी, लेकिन अब चुप रहना उसे गवारा नहीं था।

    रूहानी की आँखों में एक हज़ार सवाल थे। क्या उसके सपने देखने की आज़ादी इतनी बड़ी ग़लती थी? 

    क्या उसने कोई अपराध कर दिया क्योंकि उसने अपने लिए एक रास्ता चुना, जो उसकी माँ-बाप की सोच से अलग था? 

    क्या एक लड़की का अपने पैरों पर खड़े होने का हक़ नहीं?

    तभी रूहानी के पापा ने उसके गाल पर एक जोर का तमाचा जड़ दिया जिसकी गूंज से रूहानई की माँ और उसका भाई दोनों एक दूसरे से चिपक से गए। 

    रूहानी के गाल पर वो तमाचा सिर्फ़ उसकी त्वचा नहीं, उसकी आत्मा तक को जला गया था। एक पल को समय ठहर गया, जैसे घर की दीवारें भी सहमकर चुप हो गई हों। 

    भानु प्रताप की गूंजती आवाज़ ने उस सन्नाटे को चीरते हुए उसकी रगों में तूफान भर दिया, “बेशर्म तो तू पहले से ही थी, लेकिन चरित्रहीन भी हो जाएगी ये हमने कभी उम्मीद नहीं की थी। तेरी वही सब करतूत देखने के लिए ही क्या अब हमारी आंखें बची हैं?”

    रूहानी की आंखों के सामने अंधेरा छाने लगा था, पर उससे ज़्यादा काले वो शब्द थे जो उसके पिता के होंठों से निकले थे… तेज, नुकीले, और आत्मा को बींध देने वाले।

    रूहानी, वो वहीं आधे झुके हुए, अपने सुजे हुए गाल पर हाथ रखे, अपनी ही उलझनों में डूबी खड़ी थी। सन्नाटा, उसकी साँसों की रुकावट में तब्दील हो गया था। उसकी आंखों में आंसू नहीं थे…. नहीं, अब तो वो भी सूख चुके थे, जैसे आत्मा रोते-रोते थक गई हो।

    रूहानी की आंखें कुछ पल के लिए पथरा गईं, गाल पर पड़ा हाथ अब कांपने लगा था, दर्द से नहीं, भीतर उमड़ते तूफान से। उसने कुछ नहीं किया था — ना कोई पाप, ना कोई छल, फिर भी हर बार वो ही क्यों दोषी बनती रही? अंदर से कोई चीख उठी, कोई घुटा हुआ आक्रोश जो बरसों से थमा हुआ था।

    “नहीं… बहुत हो गया…” उसने खुद से कहा, जैसे उसके भीतर कोई ज्वालामुखी फूटने की तैयारी में हो।

    फिर एक लंबी, टूटी सांस लेकर, उसने एक ही बार में वो सब कह दिया जो उसकी रूह में बरसों से धंसा पड़ा था।

    “क्यों, पापा? क्या सिर्फ मेरी जननांग से आपकी इज़्ज़त जुड़ी है? क्या आपने मुझे बेटी बनाकर पाला था या कोई ‘इज़्ज़त का बक्सा’ बनाकर, जिसे जब तक ताला लगा रहे, तब तक आप शरीफ़ कहलाएं?”

    उसकी आवाज़ में ना चीख थी, ना सिसकी, बल्कि वो सन्नाटे का वो रूप थी जो कानों को फाड़ सकता था साथ ही दिल को भी चीर सकता था।

    “आपको मेरे हक़ से ज़्यादा मेरी देह की फिक्र क्यों है? मैं जीऊँ या मरूँ, आपको फर्क नहीं पड़ता….. बस इतना तय रहे कि मेरी देह किसी अजनबी की देह से ना छुए। क्या आपकी मर्दानगी इतनी सस्ती है कि मेरे ज़िंदा रहने से भी डर जाती है?”

    उसके शब्दों में जहर नहीं था, बल्कि वो सालों की पीड़ा थी, जो अब शब्दों के लिबास में बाहर आ रही थी।

    “जब मैं पुल से कूद कर मरने जा रही थी, उससे पहले आपको शर्म नहीं आई थी मुझे धिक्कारते हुए कहने में कि ‘तू हमारे लिए मर गई’। पर अब, जब मैं किसी की छत के नीचे साँस ले रही हूँ, तो आपको अपनी इज़्ज़त की चिंता सताने लगी?”

    उसका गला सूखने लगा था, पर शब्द नहीं रुके।

    “कौन-सी इज़्ज़त है ये, पापा, जो एक लड़की के पैरों के बीच से निकलकर आपके सीने में जाकर बसती है?”

    उसके ये शब्द जैसे दीवारों से टकराकर फिर उसके ही कानों में लौट आए। पर उससे पहले, उसकी मां ने जैसे खुद की बेइज़्ज़ती महसूस कर ली हो, तो उन्होंने उसके गाल पर एक और तमाचा मारा, फिर एक और। फिर वो बरसने लगी, न केवल हाथों से, बल्कि शब्दों से भी।

    “सही में सारी शरम-हया बेच कर खा गई है ये लड़की! बोलने से पहले लिहाज़ भी नहीं हुआ कि क्या-क्या बके जा रही है!”

    रूहानी कुछ कदम पीछे हट गई, पर उसकी आवाज़ अब भी टिकी रही, जैसे हर थप्पड़ के साथ और मजबूत हो रही हो।

    “तो आख़िर क्या ग़लत कहा मैंने?” उसने सवाल किया, पर उसमें कोई लड़ाई नहीं थी, बस थकावट थी। जैसे एक टूटे हुए इंसान ने अब लड़ने का बोझ उतार फेंका हो।

    तभी उसके पिता, गुस्से से कांपते हुए, लगभग चीखते हुए बोले, “बस! बहुत बोल लिया तूने और बहुत सुन लिया हमने!”

    उनकी आंखों में वो लाचारी थी जो हर उस पुरुष की आंखों में होती है जब उसकी ‘इज़्ज़त’ उसके नियंत्रण से बाहर जाने लगती है। उन्होंने उसका हाथ पकड़ा, इतने ज़ोर से जैसे वो उसे अपनी ‘नाक कटने’ से बचाने के लिए किसी गहरी खाई से खींच रहे हों।

    “तुझे इसकी सज़ा मिलकर रहेगी।”

    और फिर वो उसे लगभग घसीटते हुए उस घर से बाहर निकाल ले गए, जैसे कोई अपराधी पकड़ा गया हो। पीछे-पीछे उसकी मां और छोटा भाई, जिनकी आंखों में सिर्फ़ शर्म और डर था। 

    रूहानी को इस पल में अपने पिता की पकड़ इतनी मजबूत महसूस हो रही थी, जैसे वह उसे किसी चट्टान की तरह घसीट रहे हो और वह उन चट्टानों के नीचे दबकर नष्ट हो जाएगी।

    उसका मन बेतहाशा उथल-पुथल कर रहा था, लेकिन उसकी आँखें पूरी तरह से खो चुकी थीं। उसकी दुनिया जैसे अंधेरे में डूब चुकी थी, जहां किसी भी उम्मीद का नामो-निशान नहीं था। वह जैसे एक खाली रास्ते पर चल रही थी, जहां न तो कोई मंजिल थी और न कोई वापसी का रास्ता।

    तभी रूहानी का मोबाइल उसकी नजरों के सामने गिर गया और उसके स्क्रीन पर लगातार नोटिफिकेशन आ रहे थे। लेकिन वह कुछ नहीं देख सकी। उसका मन वह था ही नहीं। 

    ———-

    रूहानी की आत्मा जैसे उथल-पुथल में थी, और हर शब्द, हर तमाचा, उसे और गहरे में ले जा रहा था। क्या उसके पास अब कोई रास्ता था, या ये उसका आखिरी संघर्ष था?

    क्या रूहानी की आत्मा इतनी टूट चुकी थी कि वो कभी खुद को फिर से नहीं पा सकेगी? 

    क्या अब भी कोई ऐसी उम्मीद है, जो उसे इस अंधेरे से बाहर निकाल सके?

    रूहानी की दुनिया अब सवालों में ढल चुकी थी, मगर क्या वह इन सवालों का जवाब कभी पा सकेगी?

  • अधूरी इबादत भाग~11

    अधूरी इबादत भाग~11

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    भाग~11 दरवाज़े पर तूफ़ान

     

    कुछ दिन पहले 

    जब यश रूहानी से फोन पर बात कर रहा था। तभी यश को अपने पीछे से अचानक एक सख्त, तीखी आवाज़ आई, “यश! किससे बात कर रहे हो?”

    वो कुछ पल वैसे ही खड़ा रहा, फोन अब भी उसके हाथ में था, लेकिन स्क्रीन बुझ चुकी थी… ठीक वैसे जैसे उसके भीतर की रोशनी। 

    उसकी रूहानी दीदी की काँपती आवाज़ अब भी उसके कानों में गूंज रही थी। एक अजीब सी चुप्पी कमरे में फैल गई थी, जैसे हर दीवार अब उसके जवाब चाहती हो।  

    “किससे बात कर रहे थे?” पिता की आवाज़ में उतनी ही सख्ती थी जितनी चिंता।

    यश, जो अभी-अभी फोन कट कर चुका था, थोड़ा हड़बड़ा गया। उसकी उंगलियाँ अब भी फोन की स्क्रीन पर ठहरी हुई थीं।

    “वो… दीदी थी…” उसने धीरे से कहा, आँखें नीचे कर लीं।

    उसके बोलते ही कमरे में जैसे सब कुछ थम गया। माँ ने चूल्हे पर रखी चाय की केतली को बंद कर दिया, जब उन्होंने यश के पिता की सख्त आवाज सुनी।

    “क्या कहा तुमने?” पिता की आवाज़ अब कुछ भारी हो गई थी।

    “द… दीदी से बात कर रहा था,” यश ने थोड़ा और स्पष्ट किया, लेकिन अब उसकी आवाज़ में भी डर था।

    “वो… ठीक हैं… मैंने बस पूछा कि कैसी हैं। मुझे उनकी फिक्र हो रही थी।”

    माँ की आँखों में नमी उतर आई। “कहाँ है वो?” उन्होंने लगभग फुसफुसाकर पूछा।

    यश ने सिर हिलाया, “पता नहीं माँ… लेकिन… लेकिन वो जिंदा हैं। उनकी आवाज़ बिलकुल वैसी ही थी। मैंने पूछा कि कब आओगी घर, तो…..”

    “बस!” पिता की आवाज़ तीर की तरह बरस पड़ी।

    “वो हमारे लिए मर चुकी है, यश। ये बात जितनी जल्दी समझो, उतना अच्छा होगा।”

    यह वाक्य यश के दिल को चीरता हुआ निकला। उसके भीतर कुछ टूटा, जैसे कोई काँच की परत हो जो अब तक उसके भीतर दीदी की यादों को सहेजे थी।

    यश ने आँखें मूंद लीं। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वो दीदी की आवाज़ से खुश हो या इस घर की चुप्पी से डर जाए।

    यश ने फिर भी हिम्मत जुटाई, माँ की तरफ देखा, लेकिन उसकी आँखें अब कहीं और टिक चुकी थीं – शायद यादों की किसी पुरानी धूल भरी किताब पर।  

    उसे समझ नहीं आया कि दीदी से बात करना क्यों इतना गलत था?  

    यश ने धीमे कदमों से अपने कमरे की ओर बढ़ना शुरू किया, पीछे से किसी ने नहीं रोका, किसी ने नहीं पुकारा। शायद अब उस घर में रिश्ते नहीं, सिर्फ़ नाम बचे थे… और कुछ अधूरी बातें, जो अब भी दीदी की तरह कहीं हवा में टंगी थीं।

    सूरज धीरे-धीरे अस्त हो रहा था और आसमान पर एक हल्की नारंगी आभा छा गई थी। यश अपने कमरे में बैठा, अपनी दीदी के बारे में सोच रहा था। उसके मन में उथल-पुथल मची हुई थी, जैसे कोई तूफ़ान उसके भीतर उठ रहा हो।

    तभी बाहर से कुछ अजीब सी आवाज़ें सुनाई देने लगीं। यश अपने कमरे के खिड़की की तरफ बढ़ा और परदे को हल्का सा खिसका कर झाँका। उसने देखा कि बाहर गली में पड़ोस वाली आंटी उसके माँ-पापा से बात कर रही थीं। उनके चेहरे पर चिंता और तीखी जिज्ञासा थी, जैसे कोई बड़ा रहस्य उजागर कर रही हों।

    यश ने कान लगाए तो उनकी आवाज़ें साफ़ सुनाई देने लगीं।

    “मैंने खुद देखा है, अपनी आँखों से,” वो कह रही थीं, “आपकी बेटी एक अजनबी के घर में जा रही थी। अकेली लड़की, इस उम्र में… और वो भी एक अनजान आदमी के घर? पता नहीं कौन है वो? कहाँ से आया? लेकिन इतना जरूर सुना है कि अकेले घर में रहता है और कोई है नहीं उसका उसे घर में…. पूरे मोहल्ले में तो यह बातें आग की तरह फैल रही हैं।”

    यश के दिल की धड़कनें तेज़ हो गईं। उसने देखा, माँ-पापा का चेहरा सुन पड़ गया था। माँ की आँखों में हैरानी और तकलीफ़ साफ झलक रही थी, जबकि पापा का चेहरा एकदम सख्त और कठोर हो गया था।

    “ये तो वाकई शर्म की बात है…” वो आगे बोलीं, “आप लोगों ने तो कहा था कि आपकी लड़की अब इस दुनिया में नहीं रही, लेकिन अब तो पूरे मोहल्ले में बात फैलने लगी है। लोग सवाल कर रहे हैं। आपकी इज्ज़त का क्या होगा?”

    पापा ने मुश्किल से अपनी जबान पर काबू पाते हुए कहा, “धन्यवाद, आपका। हम देख लेंगे।”

    उन्होंने दरवाज़ा धीरे से बंद किया।

    अंदर आते ही जैसे घर की हवा भारी हो गई। माँ सोफे पर बैठ गईं, उनकी आँखों में आँसू तैरने लगे। पापा चुपचाप खड़े रहे, लेकिन उनके सख्त चेहरे से साफ था कि अंदर बहुत कुछ उबल रहा है। यश समझ गया था कि अब कोई तूफ़ान उठने वाला है।

    “यश!” पापा की आवाज़ गूंज उठी। “अभी फोन करो अपनी बहन को। पूछो उससे, किसके घर हमारी इज्ज़त नीलाम कर रही है।”

    यश ने काँपते हाथों से फोन उठाया और रूहानी का नंबर डायल किया। उसका दिल तेजी से धड़क रहा था। फोन की घंटी बजती रही, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला। उसने फिर से कॉल किया, लेकिन इस बार भी कोई उत्तर नहीं आया।

    “नहीं उठा रही है फोन,” यश ने धीरे से कहा।

    “तो अब हम क्या करें?” माँ ने घबराते हुए कहा। “लोग क्या कहेंगे? हमारी बेटी किसी अजनबी के घर में रह रही है और हमें कुछ पता ही नहीं।”

    पापा ने गहरी साँस ली और कहा, “हमें खुद जाकर देखना होगा। पता करना होगा कि वो कहाँ है और किसके साथ रह रही है।”

    यश ने सिर हिलाया और कहा, “मैं भी चलूँगा। मुझे भी दीदी से बात करनी है।”

    तीनों ने मिलकर योजना बनाई कि वे उस जगह पर जाएंगे जहाँ उनकी पड़ोसन ने रूहानी को देखा था। 

    आज 

    कुछ दिनों की खोज खबर के बाद वे तीनों उस इलाके में पहुँच गए। उन्होंने आसपास के लोगों से पूछताछ की, और अंततः एक महिला ने बताया कि एक लेखक अद्वैत अवस्थी के घर में एक लड़की रह रही है, जो शायद आपकी रूहानी ही हो।

    वे सभी अद्वैत के घर पहुँचे और दरवाज़ा खटखटाया।

    दूसरे तरफ से रूहानी के पैर दरवाज़े की ओर बढ़े, लेकिन मन पीछे किसी तूफान में उलझा हुआ था। हाथ ने चिटकनी घुमाई, पर उंगलियाँ काँप रही थीं। दरवाज़ा खुला, और सामने जैसे समय रुक गया हो…

     

    लेकिन दरवाज़ा खोलते ही उसके शरीर का सारा रक्त जैसे एक पल को थम गया और साँस अटक गई।

    दरवाज़े पर खड़े थे उसके और यश के माता-पिता। उनकी आँखों में गुस्सा, अपमान और अविश्वास की ज्वाला जल रही थी। रूहानी के होंठ काँपने लगे, लेकिन शब्द गले में ही अटक गए।

    —— 

    क्या अब रूहानी के जवाब, सब कुछ बिखेर देंगे… या फिर कोई और सच उजागर होने वाला है, जिससे अब तक सब अनजान हैं?

    उस पल, दरवाज़े की दहलीज़ पर खड़ी रूहानी—क्या वो फिर से एक बार खो जाएगी… हमेशा के लिए?

  • अधूरी इबादत भाग~10

    अधूरी इबादत भाग~10

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

    भाग~10 तूफ़ान से पहले

     

    सुबह की ठंडी हवा खिड़कियों से छनकर कमरे के भीतर उतर रही थी, लेकिन रूहानी के भीतर एक अनाम घबराहट की तपिश थी। उसने बार-बार अपनी हथेलियों को आपस में मसलते हुए खुद को शांत करने की कोशिश की, पर बेचैनी जैसे उसके भीतर से फूट रही थी। 

    अद्वैत आज सुबह जल्दी ही निकल गया था। एक पास के शहर में कवि सम्मेलन था, जहाँ उसे मुख्य अतिथि के तौर पर बुलाया गया था। जाते समय उसने सिर्फ एक हल्की-सी मुस्कान के साथ सिर हिलाया था, कुछ कहा नहीं था। शायद कहने को कुछ था भी नहीं। दोनों के बीच अब तक जो दूरी थी, वह अनकही बातों से भरी थी।  

    रूहानी ने सोफे पर बैठते हुए गहरी सांस ली। दिल जैसे हल्का नहीं हो रहा था। हर कुछ मिनट पर उसे लग रहा था कि कुछ गलत होने वाला है, कुछ ऐसा जो उसकी समझ से परे है। वह इस अजीब सी भावना को झटकने की कोशिश कर रही थी, लेकिन हर बार वह और गहरे उतरती जा रही थी।  

    मीना, जो चाय लेकर आई थी, उसकी खोई-खोई आँखों को देख नहीं पाई। उसने धीरे से चाय का कप सामने रख दिया और मुस्कुराते हुए कहा, “क्या हुआ मैडम, आप बहुत चुपचाप हैं आज? आपके पैर का घाव तो अब पूरी तरह ठीक हो गया है, कई दिन हो गए।”  

    रूहानी ने अनमने भाव से अपने तलवे की ओर देखा। वहाँ अब सिर्फ एक हल्का गुलाबी निशान बचा था, जैसे बीते दर्द की कोई फीकी याद। उसने धीमे से कहा, “हाँ, घाव तो ठीक हो गया है, लेकिन पता नहीं क्यों, आज मन बहुत बेचैन हो रहा है… जैसे कुछ बुरा होने वाला है।”  

    उसकी आवाज में एक ऐसी मासूमियत और डर था, जिसे सुनकर मीना का दिल पसीज गया। मीना ने अपने अनुभव से सीखा था कि कई बार दिल की बेचैनी कोई झूठा वहम नहीं होती, लेकिन फिर भी उसने रूहानी को ढाढ़स बंधाते हुए कहा, “ज्यादा चिंता मत कीजिए मैडम। सब कुछ अच्छा ही होगा। अच्छे लोगों के साथ अच्छा ही होता है।”  

    रूहानी ने एक कमजोर मुस्कान के साथ सिर हिला दिया, लेकिन भीतर का तूफान अब भी थमा नहीं था।  

    उसने चाय का कप अपने हाथों में थामा और खिड़की के बाहर झांकने लगी – धूप हल्की थी, पेड़ धीरे-धीरे हिल रहे थे, सब कुछ सामान्य था… फिर भी दिल के किसी कोने में कोई साया मंडरा रहा था, कोई अनदेखा डर जो उसके भीतर घर कर गया था।

    मीना अब धीरे-धीरे रूहानी से खुलने लगी थी। घर के काम करते-करते वह अपनी चुप्पी तोड़ बैठी। उसकी आवाज़ में अपनापन घुला था, जैसे अपने दिल का बोझ हल्का कर लेना चाहती हो। उसने सिर झुकाए हुए कहा, “मैडम, आप जानती हैं, मेरे बच्चे की पढ़ाई का सारा खर्च अद्वैत सर उठाते हैं।”

    रूहानी ने चौंककर उसकी तरफ देखा। मीना ने सफाई देते हुए आगे कहा, “मेरे पति बहुत शराबी थे। रोज़ पीकर घर आते, गाली-गलौच, मारपीट… सब सहती रही। लेकिन एक रात ज़्यादा पीकर कहीं गिर पड़े और फिर लौटकर नहीं आए।” उसकी आवाज़ में ना कोई पछतावा था, ना कोई आँसू…. बस एक थकान, जो बरसों के जिए हुए दुःख से आई थी।

    “उनके मरने के बाद मैंने घर-घर जाकर काम करना शुरू किया। एक दिन अद्वैत सर के पापा के यहाँ भी काम पर लगी। लेकिन…” मीना का चेहरा तनिक कस गया, “उनकी पत्नी को मैं कभी पसंद नहीं आई। रोज़ कोई न कोई गलती निकालती, डाँटतीं। कभी खाना खराब, कभी झाड़ू सही नहीं।”

    रूहानी चुपचाप सुनती रही। मीना ने आगे कहा, “फिर एक दिन सर आए। देखा कि मैं डाँट खा रही हूँ। फिर उन्होंने अपनी पत्नी से मिलवाया और कहा — ‘मीना अब हमारे घर काम करेगी।’ बस तब से यहीं हूँ, सर ने कभी कोई शिकायत नहीं की। हमेशा सम्मान दिया।”

    मीना के शब्दों में अद्वैत के लिए एक गहरा आदर था। रूहानी ने उसकी आँखों में वह चमक देखी, जो केवल उन लोगों की आँखों में होती है जिन्हें किसी ने टूटने से बचा लिया हो।

    कुछ पल दोनों के बीच खामोशी रही। मीना ने धीरे से झाड़ू एक कोने में टिकाई और हिचकिचाते हुए पूछा, “मैडम, आपके घरवाले क्यों नहीं आते आपको देखने?”

    यह सवाल हवा में तीर की तरह तना रह गया। रूहानी का दिल एक पल को जैसे रुक गया। उसने पलकों को झपकाया, अपने भीतर उठती कड़वी यादों को जब्त किया। चेहरे पर हल्की सी मुस्कान लाते हुए, उसने नजरें चुराते हुए कहा, “ऐसा कुछ नहीं… वो सब बहुत दूर रहते हैं… व्यस्त होंगे शायद।”

    मीना ने उसकी आवाज़ में छुपे दर्द को महसूस कर लिया था, मगर उसने ज़्यादा कुरेदना सही नहीं समझा पर कमरे में जो मौन फैल चुका था, वह अब और भी गाढ़ा हो गया था।

    मीना ने माहौल को हल्का करने की कोशिश में फिर से बातचीत शुरू की। इस बार उसकी आवाज़ में हल्की उत्सुकता थी, “वैसे, आप क्या करती थीं, मैडम?”

    रूहानी ने एक पल को सोचा, क्या सच बताए या फिर वही आधा-अधूरा जवाब दे, जिसे सुनकर सामने वाला सवाल न बढ़ाए लेकिन मीना की आँखों में कोई छल नहीं था, बस एक सीधी-सादी जिज्ञासा थी।

    हल्की मुस्कान के साथ रूहानी ने कहा, “मैं ड्रेस डिजाइनर हूं।”

    मीना की आँखों में चमक आ गई। उसने पास आकर चहकते हुए पूछा, “अच्छा! तो आप तो बहुत बड़ी डिजाइनर होंगी न?”

    रूहानी ने हल्के से हँसते हुए सिर झुकाया। उसकी हँसी में एक थकी हुई सच्चाई थी।

    “नहीं, इतनी बड़ी भी नहीं,” उसने धीरे से कहा, “अभी तो बस… संघर्ष ही कर रही थी। खुद को साबित करने की कोशिश में थी।”

    मीना ने सहानुभूति से उसकी ओर देखा। फिर फुर्ती से बोली, “अरे, आप तो बहुत अच्छा काम करती होंगी। कपड़े का डिजाइन बनाना कोई मामूली बात थोड़े न है।”

    रूहानी ने मीना की बात पर कुछ नहीं कहा। दिल के किसी कोने में मीना की मासूम प्रशंसा ने हल्का-सा सुकून दिया, जैसे कोई किसी बर्फीली रात में काँपते हुए कंधों पर चुपचाप एक गर्म चादर रख दे।

    लेकिन उसी सुकून के नीचे एक कड़वी सच्चाई भी थी कि किस तरह उसका सपना टूटने की कगार पर था, कैसे उसे अपने अस्तित्व के लिए भी लड़ना पड़ा था, कैसे अपने घरवालों के ठुकराए जाने के बाद उसके पास खुद के अलावा कोई सहारा नहीं बचा था।

    कमरे में फिर से चुप्पी छा गई। मीना अब अपने बर्तन समेट रही थी, उनकी आवाजें उस भारी सन्नाटे में टकरा कर रह रह कर गूंज रही थीं।

    मीना ने आखिरी कुर्सी पर कपड़ा मारते हुए कहा, “ठीक है, मैंने अपना काम कर दिया है, मैं जा रही हूं।”

    रूहानी ने चुपचाप सिर हिलाया। उसकी मुस्कान फीकी थी, मगर आँखों में एक हल्का-सा अपनापन झलक गया था।

    मीना के जाते ही रूहानी ने धीरे से दरवाजा बंद कर दिया। दरवाज़ा बंद करते समय उसका हाथ कुछ पल के लिए हैंडल पर रुका, जैसे वह इस छोटे-से घर में पसरी एकाकी खामोशी से खुद को बचाने की कोशिश कर रही हो।

    कमरे में फिर से वही पुरानी चुप्पी फैल गई। रूहानी ने गहरी साँस ली और खुद को संयत करते हुए सोचा कि आज शायद कुछ पल अपने लिए भी होंगे। लेकिन इस उम्मीद को वक़्त ने लंबा नहीं चलने दिया।

    कुछ ही देर में दरवाज़े पर फिर से दस्तक हुई। रूहानी ने चौंक कर पलटकर दरवाजे की ओर देखा। उसके दिल में हल्की-सी बेचैनी उठी।

    “अब कौन?” उसने खुद से बुदबुदाया और धीमे कदमों से दरवाजे की ओर बढ़ी।

    जैसे ही उसने दरवाजा खोला, सामने मीना खड़ी थी। हाथों में अपनी चुन्नी मरोड़ते हुए, आँखों में उम्मीद की चमक लिए।

    “अरे तुम?” रूहानी ने थोड़ा आश्चर्य से पूछा।

    मीना हड़बड़ाई-सी बोली, “मैडम, एक बात कहनी थी। आप तो ड्रेस डिजाइनर हो ना? मेरे बच्चों के लिए ड्रेस डिजाइन कर दोगी क्या?”

    उसकी आवाज़ में संकोच और एक मासूम उम्मीद दोनों थीं।

    रूहानी ने भौंहें चढ़ाकर पूछा, “ड्रेस?”

    मीना ने जल्दी-जल्दी समझाया, “वो क्या है ना, मेरी बेटी का जन्मदिन आने वाला है। एक ड्रेस देखी थी उसने बाजार में, बहुत पसंद आई है उसे। लेकिन बहुत महंगी है, मारे बस की नहीं। अगर आप वही ड्रेस बना दें… तो मेरी गुड़िया बहुत खुश हो जाएगी।”

    रूहानी के होंठों पर एक कोमल मुस्कान तैर गई। मीना की आँखों में एक माँ का प्रेम साफ़ चमक रहा था।

    रूहानी ने सिर हिलाते हुए कहा, “हां, बना दूंगी। लेकिन मैं कोई बहुत फेमस डिजाइनर नहीं हूं। फिर भी, अपनी बेटी को ले आना। मैं उसके नाप की ड्रेस डिजाइन कर दूंगी।”

    मीना के चेहरे पर एक चमक आ गई, जैसे उसे कोई अनमोल तोहफा मिल गया हो। उसने बार-बार धन्यवाद कहा, फिर खुशी-खुशी पलट गई।

    रूहानी ने फिर दरवाजा धीरे से बंद कर दिया। कमरे में लौटते हुए उसके चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान बनी रही, जो मीना के भोलेपन से उपजी थी।

    लेकिन जैसे ही वह अपने बिस्तर के किनारे बैठी, पुराने विचार फिर से उसे घेरने लगे। उसने सोचा, “कितने दिन हो गए स्टूडियो गए हुए… सारा सामान वहीं रखा है।” एक कसक सी उसके भीतर उठी।

    “आज चली जाऊंगी,” उसने धीरे से खुद से वादा किया।

    मन में एक हल्का सा उत्साह जागा… शायद काम में खुद को डुबो कर वह इस अनजानी खालीपन से बच सकेगी।

    उसे लगा जैसे कोई चीज़ उसके भीतर फिर से सांस लेने लगी हो लेकिन उसकी ये सोच भी बस कुछ ही पल ठहरी।

    अचानक दरवाज़े पर फिर से दस्तक हुई। इस बार दस्तक में थोड़ी जोर थी, थोड़ी बेसब्री भी।

    रूहानी ने झल्लाकर बड़बड़ाया, “अब क्या है, मीना?”

    तेज कदमों से दरवाजे की ओर बढ़ते हुए उसने चिटकनी घुमाई और दरवाजा खोल दिया।

    लेकिन दरवाजा खोलते ही उसके शरीर का सारा रक्त जैसे एक पल को थम गया और सांस अटक गई।

    ——

    कौन था वह, जो इस बार मीना नहीं थी? 

    क्यों उसकी आंखों में अचानक डर की परछाई दौड़ गई? 

    क्या वही अनजानी आशंका अब हकीकत बनने जा रही थी?

  • अधूरी इबादत भाग~9

    अधूरी इबादत भाग~9

    पढ़ने का समय : 9 मिनट

    भाग~9 खोई नहीं हूँ मैं

    कमरे में चुप्पी घुली थी, जैसे दीवारें भी उसके भीतर उठते-गिरते ज्वार की साक्षी बन गई हों। रूहानी की उंगलियां अब भी मोबाइल को थामे कांप रही थीं, जबकि स्क्रीन बहुत पहले ही बुझ चुकी थी। कॉल कटने की वो छोटी सी ‘बीप’ अब भी उसके कानों में गूंज रही थी, जैसे कोई अटकी हुई सांस, जो पूरी निकलने से पहले ही दबा दी गई हो।

    यश की रुआंसी आवाज, माँ-बाबा के कठोर शब्द, सब उसके भीतर किसी पुराने घाव की तरह फिर से रिसने लगे थे। पल भर को रूहानी का मन किया कि वो फिर से फोन मिलाए, यश से बात करे, उससे पूछे कि अब वह ठीक तो है ना। पर अगले ही पल उसे खुद को रोकना पड़ा। वह जानती थी, अच्छी तरह जानती थी कि चाहे माँ-बाबा उसे अपने जीवन से काट चुके हों, पर यश अब भी उनका दुलारा बेटा था। उस पर हाथ उठाने या उसकी अनदेखी करने का सवाल ही नहीं था। यश, वो बेटा जिसे उन्होंने बरसों की तपस्या के बाद पाया था, उसके लिए तो उनके दिलों में अब भी असीम प्रेम था।

    इसी सोच ने उसे थोड़ी राहत दी, पर उस राहत की परत के नीचे जो कसक थी, वह कम नहीं हुई।

    धीरे से उसने मोबाइल को सिरहाने रखा और अपने पैरों की ओर देखा। पैर के तलवे पर पट्टी बंधी थी, पर पट्टी के बीच से झांकता दर्द अब भी धड़क रहा था। रूहानी ने पल भर को अपनी पलकों को भींच लिया, जैसे अपनी ही नजरों से खुद को बचाना चाहती हो। फिर एक धीमी, कसैली हँसी उसके होठों से फिसल गई।

    “अकेली,” उसने खुद से बुदबुदाया, “एकदम अकेली।”

    उसने अपने घायल पैर को हलके से सीधा किया। चुभन अब भी थी, पर उससे भी ज्यादा चुभन उसके मन में थी। खुद पर गुस्सा, खुद से नाराजगी। क्यों? क्यों वो इस हालत में आई थी? क्यों उसे लगा था कि मर जाने से सब कुछ बदल जाएगा? क्यों उसने सोचा था कि दुनिया इतनी आसान है कि बस एक फैसला, एक कदम और सब कुछ वैसा हो जाएगा जैसा वह चाहती थी?

    कमरे की धुंधली रोशनी में उसे अपनी ही परछाईं दीवार पर लहराती दिखी। एक टूटी हुई परछाईं, जिसमें अब कोई ठोस आकृति नहीं बची थी।

    “अब पड़े रहो,” वह खुद से फुसफुसाई, “इस अजनबी घर में, उस अजनबी आदमी के साथ… जब तक ये घाव भर नहीं जाते, तब तक कहीं जा भी नहीं सकती।”

    उसके शब्दों में जितनी कड़वाहट थी, उतनी ही असहायता भी। अद्वैत के घर में शरण लेना उसकी मजबूरी थी, न कि उसकी मर्जी। वो जानती थी कि अद्वैत उससे कोई उम्मीद नहीं रखता, न ही उसे यहाँ देखकर कोई खुशी होती थी, पर उसकी चुप्पी… उसकी चुप्पी उसे कहीं भीतर से चुभ रही थी।

    रूहानी ने अपने घुटनों को सीने से लगाकर खुद को और छोटा कर लिया, जैसे अपनी ही बाहों में छिप जाना चाहती हो।

    उसकी आँखों के कोनों से आंसू बह निकले, चुपचाप, बिना किसी आवाज के। वह रोई नहीं, बस बहने दिया उन आंसुओं को, जैसे बहाव ही उसकी सजा हो। उसने खुद से कहा, “तुम्हीं ने चुना था ये रास्ता, तुम्हीं को सहना भी होगा।”

    उसके दिल का सन्नाटा कमरे के भीतर भी उतर आया। हर चीज़ थम गई थी — धड़कनें, साँसें, उम्मीदें।

    एक पल के लिए उसे माँ-बाबा की वो आँखें याद आई, जो कभी उसके लिए आशीर्वाद थी और अब सिर्फ नफरत से भरी थीं। कैसे एक पल में वे लोग, जो उसके जीवन का आधार थे, उसे अपने जीवन से मिटा चुके थे। सिर्फ इसलिए कि उसने अपने लिए जीने की जुर्रत की थी?

    अचानक उसकी स्मृतियों में वह क्षण कौंध उठा जब अद्वैत ने उसे मृत्यु के मुख से खींच लाया था, जैसे किसी सूखते प्राण में फिर से प्राणवायु भर दी हो। आज फिर वही हाथ, उसके दूसरे पाँव को क्रूर कांच के टुकड़े से बचा गया था… एक चुप, मगर सजीव पहरेदार की तरह। 

    तभी रूहानी के भीतर कोई गहरी, शांत आवाज उठी—”नहीं… मैं विलीन नहीं हुई हूँ, मैं अब भी हूँ… पूर्ण और धड़कती हुई।”

    उसकी मुट्ठियाँ भींच गईं, दर्द से, डर से, और कहीं न कहीं, जिद से भी। उस अजनबी कमरे में, उस अजनबी के घर में, वह अपने अस्तित्व की छोटी सी लौ को थामे हुए थी।

    धीरे-धीरे उसके भीतर एक अजीब सी शांति फैलने लगी। एक ऐसा सन्नाटा जो बाहर के शोर से अलग था। यह सन्नाटा अंदर से आ रहा था, जैसे उसकी आत्मा ने हार मानने से इनकार कर दिया हो।

    ——–

    अद्वैत की सुबह हमेशा की तरह खामोशी के आवरण में लिपटी थी। सूरज की किरणें धीरे-धीरे खिड़कियों के पर्दों के नीचे से कमरे में घुसने लगी थीं, लेकिन अद्वैत को उजाले से कोई खास वास्ता नहीं था। वह नीचे रसोई में चुपचाप दराज खींच रहा था, जैसे हर ध्वनि से बचना चाहता हो। चाय के कपों के आपस में टकराने की धीमी सी आवाज कमरे के सन्नाटे को हल्के से चीरती थी। वही धीमा सधा हुआ स्पर्श, वही अभ्यस्त मौन, लेकिन आज इस मौन में कुछ और भी घुला था — एक अनजानी, अनकही उपस्थिति।

    रूहानी, जो अद्वैत के सुझाये गए रसोई से सटे कमरे में थी, अधजगी सी हालत में लेटी थी। उसकी पलकों के बीच नींद और जागृति का झीना सा परदा था। रसोई से आती हल्की आहटें, कप-प्लेट के टकराने की आवाजें उसके कानों में रिसती रहीं। उसे एहसास हुआ कि अद्वैत रसोई है — उसी घर में, उसी सांसों की लय में, बस कुछ कमरों की दूरी पर। कोई संवाद नहीं, कोई आमना-सामना नहीं, फिर भी उसकी उपस्थिति पूरे घर में महसूस हो रही थी, जैसे दीवारों में उसकी थकी हुई आत्मा की गूँज भरी हो।

    रूहानी ने कराहते हुए करवट ली। उसके सूजे हुए चेहरे पर कल रात के आँसुओं की कहानी अब भी बाकी थी। बाल बेतरतीबी से बिखरे थे, आँखों के नीचे गहरे साए थे। दर्द और थकान की मिश्रित परछाइयाँ उसकी देह पर पसरी हुई थीं। उसके घाव अब भी रिसते थे — न सिर्फ तलवों पर लगे घाव, बल्कि दिल के भी। 

    उसी वक्त अद्वैत, गलती से या शायद किसी अनकही बेचैनी के वश में, उसके कमरे के सामने से गुजरा। अनायास उसकी नजर कमरे के भीतर चली गई और वहाँ रूहानी को यूँ टूटा-बिखरा देखकर वह कुछ पल के लिए जैसे वहीं थम गया।  

    उसकी आँखें अनजाने ही रूहानी के सूजे चेहरे, नम पलकों और बिखरे बालों पर टिक गईं। उस पल अद्वैत के भीतर कोई अनचाहा मंथन उठ खड़ा हुआ। वह जो अब तक खुद को दुनिया से काट चुका था, जिसने अपनी पीड़ा को ताले में बंद कर दिया था, आज एक अनजान लड़की के दुःख से क्यों जुड़ रहा था? क्यों उसकी पीड़ा उसे अपने लंबे, सूने अकेलेपन की याद दिला रही थी?

    अद्वैत का गला अचानक भारी लगने लगा। भीतर एक कसक उठी जो उसे असहज कर गई। उसके भीतर का एक हिस्सा उसे झिड़क रहा था — क्यों देख रहा है? क्यों महसूस कर रहा है? यह तेरी लड़ाई नहीं है। लेकिन एक और हिस्सा था, जो फुसफुसा रहा था — यह पीड़ा पहचानी हुई है। यह वही खालीपन है जिसे तूने भी जिया है।

    उसकी उंगलियाँ दरवाजे के फ्रेम पर कस गईं। वह एक क्षण को भीतर जाने का सोचता है, फिर खुद को रोक लेता है। खुद पर गुस्सा आता है — इस बेबसी पर, इस अनचाही करुणा पर। 

    वह जानता था कि रूहानी एक अजनबी है, बस संयोग से उसके जीवन में आ गई है। और फिर भी, उसका टूटा हुआ चेहरा देखकर अद्वैत के भीतर बीते दिनों की एक रेखा खिंच गई थी। उसे अपनी पत्नी की आखिरी रात याद आ गई — जब उसने भी ठीक ऐसे ही बिस्तर पर बेजान पड़ी, थकी हारी आँखों से उसे देखा था। 

    एक टीस ने अद्वैत के सीने को चीर दिया। वह जानता था कि यह तुलना गलत थी। रूहानी उसकी पत्नी नहीं थी। यह अतीत को वर्तमान पर थोपना था। लेकिन भावनाएँ तर्क की राह कब चलती हैं?

    उसने धीरे से आँखें मूँद लीं, जैसे खुद को इस क्षण से अलग करना चाहता हो। फिर कदम पीछे खींच लिए, बमुश्किल खुद को कमरे से दूर किया।  

    लौटते हुए उसके कदम भारी थे, जैसे हर कदम उसके भीतर उठती हूक को और गहरा कर रहा हो। रसोई में लौटकर उसने दो कपों में चाय डाली। चाय के धुएं में उसकी आँखें फिर से उस सूजे चेहरे की परछाई खोजने लगीं। 

    अद्वैत चुपचाप कुर्सी पर बैठा रहा। चाय का कप हाथ में थामे, लेकिन पीने की कोई जल्दी नहीं। उसकी नजरें खिड़की के पार जाने कहाँ भटक रही थीं। 

    उधर, रूहानी धीरे से उठ बैठी थी। पैर का दर्द हल्का चुभ रहा था, लेकिन दिल का दर्द कहीं गहरा था। नीचे से आती हल्की-हल्की आहटें अब उसे चुभती नहीं थीं, बल्कि एक अजीब सा सुकून दे रही थीं। जैसे यह जान लेना कि कोई और भी घर में है, खुद में एक दवा बन गया हो। 

    वह जानती थी, अद्वैत से उसे कोई सहारा नहीं माँगना चाहिए। न कोई आस लगानी चाहिए। फिर भी, उसकी उपस्थिति — यह जानना कि वह अकेली नहीं है — एक नर्म, चुप सांत्वना की तरह उसके दिल के किसी कोने में फैलने लगी थी।  

    उसने खुद को सँभाला, गहरी साँस ली और अपने पैरों को बिस्तर से नीचे सरकाया। दर्द की एक लहर उसके तलवों से होते हुए पूरे जिस्म में दौड़ गई। वह जानती थी कि उसे अभी लंबा सफर तय करना है — न केवल शारीरिक घावों से उबरने का, बल्कि उस दिल के घावों से भी जिन्हें वह जाने कब से अपने भीतर छुपाती आई थी।

    और अद्वैत अपने ही विचारों के घेरे में फँसा चाय के कप से उठते धुएँ को ताक रहा था — जैसे उसमें से अपने सवालों के जवाब तलाश रहा हो, जिन्हें उसने खुद से पूछने की भी हिम्मत अब तक नहीं जुटाई थी। 

    दोनों चुप थे। दोनों अकेले थे। फिर भी एक महीन, अदृश्य धागे से एक-दूसरे से बंधने लगे थे — बिना बोले, बिना कहे।

    ——

    क्या अद्वैत अपनी बंद दुनिया के दरवाजे रूहानी के लिए खोलेगा? 

    या फिर दोनों अपनी-अपनी तन्हाइयों में डूबे रह जाएंगे? 

    क्या दर्द के पुराने साये उन्हें जोड़ेंगे या फिर और दूर कर देंगे?

  • अधूरी इबादत भाग~8

    अधूरी इबादत भाग~8

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    भाग~8 नाम तक मिटा दिया

    अद्वैत उस बंद दरवाज़े के सामने खड़ा था, जो बरसों से अपने पीछे ना जाने कितनी कहानियाँ छुपाए खड़ा था। उसके चेहरे पर एक अजीब सा तनाव था, जैसे वह खुद को इस पल के लिए भीतर से तैयार कर रहा हो। उसकी उंगलियाँ चाबी पर कस गई थीं। पल भर को उसने अपनी सांस रोक ली, फिर धीरे से चाबी घुमाई।

    चटक की एक धीमी आवाज़ के साथ दरवाज़ा खुला। जैसे ही अद्वैत ने दरवाज़े को धकेला, एक हल्की सी धूल भरी खुशबू उसके चेहरे से टकराई। वह भीतर कदम रखा और एक पल को उसकी आँखों के आगे उसकी पूरी ज़िंदगी जैसे उलटने लगी।

    यह कमरा कभी उसके सबसे करीब था। उसकी आत्मा का एक कोना।

    दीवार के साथ सजी किताबों की लंबी-लंबी कतारें थीं, जैसे समय को पकड़ कर रखने की एक नाकाम कोशिश हो। मोटी जिल्द वाली, पुरानी, धुंधली किताबें, जिनके कवर अब फीके पड़ चुके थे। किताबों के बीच-बीच में कुछ डायरी भी थीं, जिनके किनारे झड़ने लगे थे।  

    कमरे में जो भी था, उसे एक पाठक सह लेखक के घर का कमरा होना बता रहा था। 

    कमरे के एक कोने में खिड़की के पास एक स्टडी टेबल था। उस पर फैले हुए कागज, आधी लिखी चिट्ठियाँ और खाली पड़े पन्ने। कुछ चिट्ठियाँ ऐसी थीं, जिनके किनारे मुड़े हुए थे, शायद गीले हो जाने के कारण। जैसे कोई आँसू उनमें चुपके से समा गया हो।

    अद्वैत धीमे कदमों से भीतर चला आया। उसकी चाल में नरमी थी, जैसे वो इस कमरे की नींद को तोड़ना न चाहता हो। उसने एक गहरी सांस ली, जिसमें धूल और बीते हुए समय की महक घुल गई थी।

    यह सिर्फ वही जानता था कि क्यों उसने इस कमरे को बंद रखा था?

    क्यों मीना को साफ़ करने से मना किया था?

    क्योंकि यह कमरा उसकी आत्मा का सबसे कोमल हिस्सा था, जिसे वह दुनिया की नजरों से छुपाकर रखना चाहता था।

    फिर अद्वैत ने दरवाजे के पीछे से डस्टर और वाइपर निकाले। उसकी चाल में एक सधी हुई थकावट थी, जैसे वो हर कदम के साथ अपने भीतर किसी भारी बोझ को उठाने का साहस जुटा रहा हो।

    उसने डस्टर को कस कर पकड़ा और सबसे पहले दीवार से सटी किताबों की अलमारी की ओर बढ़ा। एक-एक करके किताबों के ऊपर जमी धूल हटाते हुए, उसकी उंगलियाँ किताबों की रीढ़ पर रेंगती चली गईं। जैसे हर किताब, हर कवर, हर स्पाइन पर उसके किसी बीते पल की परछाई बैठी हो।

    कुछ किताबों को छूते ही उसके चेहरे पर बिछी एक उदास मुस्कान हल्की सी तैर जाती। कोई पुराना शेर, कोई भूली-बिसरी कविता, कोई प्रेम कहानी… सब जैसे उसे पुकार रही थीं।

    कमरा धीरे-धीरे सांस लेने लगा। किताबें चमकने लगीं, अलमारियाँ मुस्कुराने लगीं।

    फिर वह स्टडी टेबल के पास की खिड़की तक चला गया। खिड़की से बाहर झांकते हुए उसने एक थकी हुई मुस्कान के साथ आसमान को देखा। बादल गहरे हो चले थे, जैसे कोई भी पल में बारिश फूट पड़ेगी।

    फिर भी वहां एक अलग सी संजीदगी थी, एक अलग सी तपिश। उसने डस्टर को और भी मुलायम हाथों से पकड़ा, जैसे किसी अपने के माथे से धूल हटाता हो। टेबल के हर कोने को उसने साफ किया, छोटे-छोटे खरोंचों को अपनी हथेली से सहलाया, मानो उन निशानों में दबी कहानियों को फिर से जीना चाहता हो।

    टेबल के किनारे रखे चिट्ठियों के बंडल पर नजर पड़ी तो उसने एक पल के लिए आँखें मूँद लीं। सांसें जैसे थोड़ी देर को थम गईं। फिर बहुत धीरे से, जैसे कोई प्राचीन ग्रंथ खोल रहा हो, उसने उन चिट्ठियों को अपने सामने रखा।

    कमरा अब पूरी तरह से साफ था। एक कोमल, शांत, मगर भारी हवा वहाँ बह रही थी।

    अद्वैत कुर्सी पर बैठ गया। उसकी उंगलियाँ एक चिट्ठी पर फिसलीं, फिर उसने पहली चिट्ठी उठाई। चिट्ठी के शब्द पढ़ते ही, उसकी आँखों के किनारे भीगने लगे। उसने चिट्ठी को अपने सीने से लगा लिया।

    पलकों के नीचे से कुछ गर्म बूँदें बह निकलीं। उसने आँखें बंद कर लीं और उन लम्हों में लौट गया जब वह दुनिया की भीड़ में सबसे अकेला नहीं था, जब उसका दिल किसी और के दिल की धड़कनों के साथ धड़कता था।

    एक-एक कर वह सारी चिट्ठियाँ पढ़ता गया। कहीं हँस पड़ता, कहीं साँसें भारी हो उठतीं। कभी उंगलियों से अक्षरों को छूता, मानो उन्हें आत्मा में समेट लेना चाहता हो।

    समय थम-सा गया था। हर चिट्ठी बीते कल की धुंध में उसे डुबोती चली जाती।

    आखिरी चिट्ठी हाथ में थी। उसने धीरे से उसे खोला, जैसे शब्दों के साथ कोई सपना टूट सकता हो। उसे भी पढ़कर उसने चिट्ठी को बहुत प्यार से मोड़ा और पूरे बंडल को फिर से एक किनारे रख दिया।

    इसके बाद उसने पास रखे नये कोरे कागजों के बंडल में से एक चिट्ठी निकाली। जिसमे कागज की खुशबू नई थी, लेकिन अद्वैत के भीतर सब कुछ पुराना था।

    उसने कलम उठाई। एक गहरी सांस ली और लिखता चला गया। 

    जब चिट्ठी पूरी हुई, उसने उसे बाकियों के बंडल में रख दिया। बहुत सहेज कर, जैसे कोई अनमोल चीज़ हो।

    फिर उसकी नजर टेबल के बीचोंबीच रखे छोटे से फ्रेम पर पड़ी। उसने तस्वीर को उठाया।

    वह तस्वीर जिसमें वह और उसकी पत्नी एक-दूसरे को देखते हुए मुस्कुरा रहे थे। इतनी सच्ची, इतनी गहरी मुस्कान कि आज भी उसमें जीवन की गर्माहट बाकी थी।

    उसने अपनी उंगलियाँ बहुत प्यार से उसके चेहरे पर फेरीं। जैसे वह उसके गालों को छू रहा हो, जैसे उसकी हँसी को महसूस कर रहा हो।

    फिर तस्वीर को वापस उसी जगह रख दिया और अपनी ठुड्डी टेबल पर टिकाकर वह तस्वीर को एकटक देखता रहा।

    उसके भीतर कुछ भी बोल नहीं रहा था। सब कुछ बस महसूस हो रहा था।

    कमरे में केवल दीवारों की साँसे थीं, धूल की हल्की खुशबू थी और अद्वैत के दिल की नमी थी।

    बाहर बारिश थम चुकी थी। बादलों के बीच कहीं एक हल्की सी धूप झाँक रही थी।

    अद्वैत ने तस्वीर को देखते हुए बुदबुदाया – “तुम अब भी यहीं हो… हमेशा।”

    उसके शब्द हवा में घुल गए, दीवारों में समा गए और शायद उसके दिल की गहराइयों में कहीं बैठ गए।

    —–

    उधर कमरे में रूहानी फोन के उस पार अपनी घुटती आवाज़ में सवाल कर रही थी, “यश! मां-बाबा अभी भी गुस्से में हैं?” उसकी आवाज़ में वह कम्पन था जो टूटे हुए सपनों और बिखरे हुए रिश्तों से उठता है, जैसे पतझड़ की रात में बर्फीली हवा किसी वीरान पेड़ की शाखों को कंपा देती है।

    यश — यशवर्धन चौहान — जो रूहानी से उम्र में करीब 9-10 साल छोटा था, उस पल खुद भी टूटा हुआ सा महसूस कर रहा था। उसके गले में भरा हुआ दर्द जैसे हर शब्द को कांपता बना देता। रुआंसी आवाज़ में वह बोला, “दीदी… मां-बाबा तो तुम्हारा नाम तक नहीं ले रहे हैं। अगर मैं तुम्हारा जिक्र भी कर दूं… तो मुझे भी डांट कर कहते हैं कि इस घर में अब आपका नाम कोई नहीं लेगा।”

    यश की आवाज जैसे फिसलती चली गई और अगले ही पल वह फोन पर फूट-फूट कर रोने लगा। उसका रोना नंगे पांव किसी वीराने में भटकते बच्चे का विलाप था, जो हर सुनने वाले के दिल को चीर सकता था। वह घुटती सांसों के बीच बिखरे लफ्जों में कहने लगा, “माँ-बाबा ने तो यहाँ तक कह दिया है… कि अब आप हमारे लिए म… म… मर चुकी हो।”

    यह सुनते ही रूहानी के भीतर कुछ चटक कर टूट गया। उसकी आँखों से आँसू ऐसे बहने लगे जैसे किसी सूखी नदी को अचानक बाढ़ ने छू लिया हो। वह चाहकर भी खुद को रोक नहीं सकी। लेकिन भाई उसकी रोती हुई आवाज़ न सुन ले, इसलिए उसने अपने होठों को दांतों के बीच जकड़ लिया, इतना ज़ोर से कि शायद खून भी छलक आया हो… पर दर्द का एहसास उस पल उसके दिल के टूटने के आगे बौना था।

    फोन के उस पार यश की आवाज़ फिर आई, हिचकियों के बीच काँपती हुई, मासूम और बेबस, “दीदी, तुम मेरे लिए कभी नहीं मर सकती… माँ-बाबा ने कितनी आसानी से कह दिया… दीदी, माँ-बाबा ऐसा कैसे कर सकते हैं?”

    उसके शब्द रूहानी के दिल में गहरी दरारें डालते जा रहे थे, जैसे बर्फ़ की एक शांत झील अचानक भीतर से टूटने लगे। वह कुछ कहना चाहती थी, कुछ ऐसा जो यश के भी टूटे हुए दिल को सहला दे, उसे यह यकीन दिला दे कि प्यार कभी नहीं मरता, कि रूह कभी अलग नहीं होती। लेकिन उसकी जुबान जैसे पत्थर बन गई थी, शब्द गले में अटक कर रह गए।

    तभी यश के तरफ से रूहानी को फोन पर अचानक एक सख्त, तीखी आवाज़ आई, “यश! किससे बात कर रहे हो?”

    उस आवाज़ ने जैसे दोनों के होश उड़ा दिए। यश एकदम सहम गया, उसकी साँसें रुक-रुक कर चलने लगीं और रूहानी का तो गला ही सूख गया, जैसे किसी ने उसके भीतर के सारे पानी को सोख लिया हो।

    —————

    क्या अद्वैत उस कमरे में दबी किसी भूली हुई सच्चाई से फिर टकराने वाला था?

    क्या रूहानी के अतीत की कोई दरार अब वर्तमान को भी निगलने वाली थी?

    वो तीखी आवाज़… क्या एक नया तूफान दरवाज़े पर दस्तक दे रहा था?

  • अधूरी इबादत भाग~6

    अधूरी इबादत भाग~6

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    भाग~6 कहानी वहीं रुक गई

    कार का दरवाज़ा खोलते ही अद्वैत को अजीब-सी बेचैनी ने घेर लिया। जैसे कोई अनकही बात हवा में तैर रही हो, जैसे कोई याद अब भी घर की दीवारों से चिपकी बैठी हो। उसके मन में एक डर सरसराने लगा—पता नहीं क्यों, लेकिन दिल धड़कने लगा था तेज़… जैसे कुछ होने वाला हो।

    वो तेज़ क़दमों से घर के भीतर दाखिल हुआ। अंदर की हल्की रौशनी, खिड़की से छनकर आती धूप और टेबल पर पड़े पानी के गिलास से उठती नमी… सब कुछ सामान्य था। पर उसकी आँखें जिसे ढूंढ रही थीं, वह नज़रों से ओझल थी।

    “रूहानी?” उसने धीमे से पुकारा।

    कोई जवाब नहीं आया।

    उसी क्षण एक धीमी आहट उसके बाएँ तरफ से आई। वो उधर बढ़ा और जैसे ही दरवाज़ा खोला, सामने का दृश्य उसके दिल को सिहराने वाला था।

    रूहानी नंगे पाँव फर्श पर बिखरे टूटे काँच पर चल रही थी। उसके कदम डगमगा रहे थे, पर उसकी चाल में एक अजीब-सी जिद थी, जैसे दर्द अब उसके लिए मायने नहीं रखता। अद्वैत का दिल धक् से रह गया। एक पल भी देर करता, तो शायद कोई और हादसा हो जाता।

    “रूहानी!” वो चीख़ा और तेज़ी से आगे बढ़ा।

    उसने झपटकर उसका हाथ पकड़ा और एक झटके में उसे अपनी तरफ खींच लिया। रूहानी उसकी बाहों में आकर झूल गई। उसका शरीर हल्का था, जैसे जान ही न बची हो और अद्वैत की बाँहों में एक अजीब-सी गर्मी उतर आई।  

    अद्वैत की आँखों के ठीक सामने रूहानी का चेहरा था। साँवली-सी रंगत, पर उसमें एक सुकून था, जैसे किसी भूले हुए गीत की धुन हो जो बरसों बाद फिर से कानों में पड़ी हो। उसका चेहरा थकान और डर से ढँका हुआ था, पर उस पल में कुछ ऐसा था जो अद्वैत को भीतर तक हिला गया। 

    उसके दिल के कोनों में, जो अब तक वीरान पड़े थे, कुछ जागने लगा था। लेकिन जैसे ही वो एहसास पनपा, उसकी पलकें झपकीं और उसकी पत्नी का चेहरा तैरता हुआ सामने आ गया—वही मुस्कुराहट, वही ठंडी-सी नज़रे, वही शांत आवाज़ जो अब केवल यादों में बची थी।

    उसने सिर हल्के से झटका, जैसे किसी परछाईं को खुद से दूर करना चाहता हो।  

    “नहीं,” उसने मन ही मन कहा, “ये सब नहीं दोबारा…”  

    थोड़ी ग्लानि से भरे हुए, उसने रूहानी को थोड़ा सीधा किया और उसकी ओर देखा। अब भी उसकी आँखें बंद थीं, वो डर में सिमटी हुई थी।

    उसकी मासूम प्रतिक्रिया पर अद्वैत के होंठों पर हल्की सी मुस्कान तैर गई। मगर अगले ही पल उसने उसे छुपा लिया। जैसे खुद से ही शर्मिंदगी हो रही हो कि इस क्षण में भी वो मुस्कुरा कैसे गया।

    वो उसे दोनों बाहों में उठा लिया। उसके वजन में हल्कापन था, लेकिन उसकी थकान गहरी थी। 

    धीरे से सोफे पर बिठाकर वो थोड़ी देर उसे देखता रहा। फिर बिना कुछ बोले पलटा और पास ही रखे ड्रॉअर के पास गया। वहाँ से फर्स्ट ऐड बॉक्स निकाला और वापस लौटकर उसके सामने फर्श पर बैठ गया।

    “मुझे ये सब करने की क्या ही ज़रूरत ….” वो बुदबुदाया, जैसे खुद को भी नहीं पता था कि उसे ये सब क्यों करना पड़ रहा है।

    उसने चुपचाप धीरे से उसका पैर उठाया और सोफे के पास वाले टेबल पर रख दिया। उसके तलवे में कांच के कई छोटे-छोटे टुकड़े चुभे हुए थे, जिनसे हल्का खून रिस रहा था। 

    रूहानी के तलवों से जब उसने पहला टुकड़ा निकाला, तो वो हल्का हिली, जैसे दर्द को अब भी महसूस कर सकती हो।

    अद्वैत के छूने से वो असहज हो उठी। पैर पीछे खींचने लगी। शायद दर्द बढ़ गया था। 

    “थोड़ा और…” अद्वैत बुदबुदाया, “बस एक टुकड़ा और है…”

    अद्वैत अगला टुकड़ा निकालने ही वाला था कि रूहानी तड़पकर चीख़ पड़ी।

    “आह!” उसकी चीख कमरे की हवा में गूंज गई।

    उसकी हालत देखकर अद्वैत की साँस तेज़ हुई। “शिट… थोड़ा आराम से निकालता हूँ।” उसने धीरे से कहा, जैसे उसकी लाचारी खुद पर भारी पड़ रही हो।

    तभी, रूहानी ने पहली बार कुछ कहा। उसकी आवाज़ टूटी हुई थी, मगर ठोस थी, जैसे अपने घावों की रक्षा कर रही हो।

    “नहीं… नहीं… प्लीज़… तुम मेरे पाँव मत छुओ।”

    उसकी आवाज़ में कुछ था। घृणा नहीं… दर्द था, एक डर था… आत्म-संकोच भी शायद।

    अद्वैत एक पल के लिए थमा, उसकी आँखें ऊपर उठीं और रूहानी के चेहरे पर टिक गईं।

    हाँ, अद्वैत ने उसकी बात सुनी, पर अनसुनी कर दी। उसकी उँगलियाँ अब भी उसके पैर के आसपास थीं। शायद अद्वैत किसी और ही सोच में था, या शायद… खुद से लड़ रहा था।

    उसने गहरी साँस ली, और पहली बार रूखे लहज़े में बोला, “मरने का इतना ही शौक है तो हिम्मत करके एक बार में ही मर जाओ, ऐसे ट्राई क्यों करती हो जिसमें जान पूरी तरह से जाने का चांस इतना कम रहता है?”

    उसके लहजे में तल्ख़ी थी। शायद वह खुद पर गुस्सा था, शायद अपनी लाचारी पर, जिसे अद्वैत खुद समझ नहीं पा रहा था। पर जैसे ही उसने ये कहा, उसकी आत्मा को यह एहसास हुआ कि ये बात बहुत कठोर थी।

    रूहानी का चेहरा सन्न हो गया। अद्वैत ने उसे देखा, कैसे उसकी आँखें एकाएक धुंधला गईं। रूहानी के चेहरे पर ऐसे भाव थे जैसे कोई उसे अब तक समझने की कोशिश नहीं कर पा रहा था ….. शायद वह अद्वैत भी नहीं।

    रूहानी को अपने कानों पर अब भी यकीन नहीं हो पा रहा थी। उसे सुबह में कही मीना की बात याद आ गई। उसने उसके बारे में कितना कुछ कहा था – संवेदनशील, शांत, अपने दुखों में डूबा, मगर किसी और का दर्द समझने वाला। 

    लेकिन उसके सामने जो खड़ा था, वह तो जैसे अपने ही डर में कैद कोई और आदमी था। वो खड़ूस था, बेरुख़, और कहीं न कहीं खुद में उलझा हुआ।

    वो सन्न सी बैठी रही, उसकी आँखें अद्वैत के चेहरे पर जमी थीं, जैसे समझने की कोशिश कर रही हो कि कौन है ये आदमी जो उसके जले पर नमक छिड़क रहा है।

    अद्वैत ने उसे खोया हुआ देखा तो झल्लाकर उसकी आँखों के सामने चुटकी बजाई, “कुछ कहोगी भी कि नहीं? घर नहीं जाना है क्या तुम्हें? सब राह देख रहे होंगे तुम्हारी।”

    उसका सवाल सीधा नहीं था, बल्कि एक तीर था—जख्म को कुरेद देने वाला।

    रूहानी जैसे अचानक सूख गई हो। उसका चेहरा पीला पड़ा, जैसे किसी पुराने ज़ख्म को फिर से खोल दिया गया हो।

    ‘घर’

    ये शब्द उसके भीतर एक तूफान बनकर उठा। उसकी आँखों में तिर आया हर मंज़र—वो गालियाँ, वो झगड़े, वो ज़हर जो उसके अपने लफ्ज़ों में घोलते थे।

    कुछ देर की खामोशी के बाद उसने धीमे से कहा, “क्या मैं यहाँ कुछ दिनों के लिए रह सकती हूँ? मेरे घाव ठीक होने तक… तुम कहो तो मैं किराया भी दे दूंगी।”

    अद्वैत ने चौंककर उसे देखा। उसकी आँखों में कोई चाल नहीं थी, बस एक अजीब-सी बेचैनी थी।

    “मतलब तुम्हारा इस दुनिया में कोई नहीं?” उसने थोड़ा अचंभित होते हुए पूछा।

    रूहानी ने एक थका हुआ सा मुस्कान दी, “कुछ ऐसा ही समझ लो।”

    अद्वैत ने गहरी सांस ली, जैसे कोई पुरानी याद सीने में चुभ गई हो।

    “तो अब तक कहाँ रहती थी?” उसने पूछा।

    रूहानी का चेहरा बुझ गया। वो जवाब देना चाहती थी, पर बस “अ… उ…” करती रह गई।

    अद्वैत ने आँखें संकरी कीं और फिर अचानक जैसे उसे कोई शंका हुई, “नहीं… नहीं… कहीं तुम चोर निकली तो…?”

    रूहानी का चेहरा लाल पड़ गया। एक तीखी गर्माहट उसके गालों तक चढ़ आई।

    “क्या मैं तुम्हें शक्ल से चोर नज़र आती हूँ?” वो झल्लाकर बोली।

    अद्वैत ने कुछ कहने के लिए मुँह खोला ही था कि तभी सोफे के पास पड़ा रूहानी का मोबाइल बजने लगा। दोनों की निगाहें अचानक उधर मुड़ीं। मोबाइल की स्क्रीन पर उभरे नाम को देखकर दोनों कुछ पल के लिए स्थिर हो गए।

    एक लंबा सन्नाटा कमरे में पसर गया।

    अद्वैत ने रूहानी की तरफ देखा। उसकी आँखों में फिर वही डर लौट आया था। मगर इस बार उसके साथ कोई और भी था—राज़… गहरे राज़ जो उसकी साँसों में छुपे थे।

    नाम अब भी स्क्रीन पर चमक रहा था, लेकिन दोनों में से किसी ने भी उसे उठाने की हिम्मत नहीं की।

    उस एक नाम ने जैसे उनकी पूरी बातचीत को अधर में रोक दिया था।

    अद्वैत ने कुछ कहने के लिए मुँह खोला… पर इस बार शब्द नहीं निकले।

    और रूहानी बस अपने मोबाइल को देखती रही… जैसे कोई पुराना साया फिर से लौट आया हो…

    —————-

    कौन था वो, जिसकी कॉल ने रूहानी की साँसें थमा दीं?

    क्या उस नाम के पीछे छिपा है कोई ऐसा सच जिसे रूहानी ने अब तक दुनिया से छुपाकर रखा है?

    अगर अद्वैत ने वो नाम पुकार लिया… तो क्या टूट जाएगी वो खामोश दीवार, जो अब तक उनके बीच खड़ी थी?

  • अधूरी इबादत भाग~4

    अधूरी इबादत भाग~4

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    भाग~4 शब्दों का वार

    रूहानी की नज़र अचानक अपने हाथों पर पड़ी। एक अनजाना अहसास उसके भीतर सिर उठा रहा था। उसे याद आया कि जब वह पुल से गिरने वाली थी, तब उसका मोबाइल उसकी सलवार की जेब में था।  

    लेकिन अब…  

    उसका हाथ अपने आप जेब में चला गया और अगले ही पल उसकी साँसें रुक-सी गईं। मोबाइल वहाँ नहीं था।  

    उसके अंदर एक अजीब-सी बेचैनी दौड़ गई। उसने जल्दी से अपने चारों ओर देखा, लेकिन कोई हलचल नहीं थी। कमरे में वही पुराना सन्नाटा पसरा था, जो पिछले कुछ घंटों से उसकी हमसफ़र बना हुआ था।  

    फिर अचानक, उसकी नज़र सोफे के बगल में रखी साइड टेबल पर गई। वहाँ, उसका मोबाइल रखा हुआ था।  

    एक पल के लिए उसे अपनी ही नज़रों पर यकीन नहीं हुआ। उसने धीमे-धीमे कदम बढ़ाए और मोबाइल की तरफ़ हाथ बढ़ाया। उसकी उंगलियाँ हल्के-हल्के काँप रही थीं।  

    रूहानी ने जैसे ही अपना मोबाइल उठाया, स्क्रीन पर ढेरों नोटिफिकेशन झिलमिला उठे।

    पर रूहानी यह सोच रही थी कि उसका मोबाइल जेब से यहाँ आया कैसे? 

    शायद इस अद्वैत ने ……… 

    उसने फिर अपना सिर झटकाया।

    उसकी आंखें हल्की-सी सिकुड़ गईं, उसने देखा— उसका फोन अभी भी साइलेंट पर था। शायद इसीलिए उसे इतनी देर तक कोई आवाज़ सुनाई नहीं दी थी। लेकिन अब, उस चमकती हुई स्क्रीन के पीछे कुछ ऐसा था, जिसे देखकर उसके अंदर अजीब-सी बेचैनी उठने लगी।  

    उसकी उंगलियां धीमे-धीमे स्क्रीन पर सरक रही थीं। सबसे पहले उसने इंस्टाग्राम खोला और जैसे ही उसकी नज़र अपने नाम पर पड़े #चीटर #धोखेबाज #फेक जैसे शब्दों पर गई, उसके दिल में कुछ टूटने जैसा महसूस हुआ।  

    सैकड़ों, शायद हज़ारों कमेंट्स थे। हर पोस्ट, हर स्टोरी में वही बातें— नफरत, ताने, अपमान। किसी ने उसकी तस्वीरों के नीचे आग उगलते शब्द छोड़े थे, किसी ने उसके कैप्शन्स का मज़ाक उड़ाया था, तो किसी ने सीधे-सीधे उसे दोषी ठहराया था।  

    उसकी आँखें तेजी से स्क्रीन पर दौड़ने लगीं, हर कमेंट को पढ़ने लगीं, लेकिन हर शब्द एक नया ज़हर था, एक नई चोट।  

    “इसने किसी और के डिज़ाइन्स चुराए हैं!”  

    “यह लड़की झूठी है, इसके सारे काम चोरी के हैं!”

    “छोटे शहरों की लड़कियाँ ऐसी ही होती हैं।”  

    “बड़ी आई थी डिज़ाइनर बनने।”

    “इसे ब्लैकलिस्ट कर देना चाहिए!” 

    उसकी पूरी दुनिया, उसकी मेहनत, उसके सपने— सब एक झटके में धूल में मिल चुके थे।  

    उसे यकीन नहीं हो रहा था कि लोग उसके बारे में इतनी नफरत से लिख सकते हैं। जिन लोगों ने कभी उसके डिज़ाइन्स की तारीफ की थी, वही अब उसे घृणा से देख रहे थे।    

    रूहानी ने कंपकंपाते हाथों से मोबाइल को कसकर पकड़ लिया। उसकी आँखें स्क्रीन पर टिकी थीं, लेकिन शब्द धुंधले होते जा रहे थे। सांसें तेज़ हो गई थीं, उंगलियाँ काँप रही थीं, और दिल एक अजीब-सी बेचैनी के साथ धड़क रहा था।  

    उसने धीरे-से स्क्रीन ऊपर स्क्रॉल किया, जहां किसी ने उसकी एक पुरानी तस्वीर पोस्ट करके उसके नाम के आगे ‘फ्रॉड’ लिख दिया था।  

    यह सब जो हो रहा था? इससे उसकी आंखों के आगे अंधेरा सा छाने लगा। ऐसा लगा जैसे वह किसी बहुत ऊंचे पुल से नीचे गिर रही हो— वही पुल, जहां वह कल रात खड़ी थी।  

    रूहानी ने एक लंबी, कांपती हुई साँस ली। गला सूख गया था। उसने जल्दी से अपना इंस्टाग्राम इनबॉक्स खोला।  

    वह उस एक अकाउंट पर गई, जो उसके लिए सबसे ज़्यादा मायने रखता था।  

    उसने उंगलियों से स्क्रीन पर उस नाम को छुआ— वही नाम, जिसने कभी उसके ख्वाबों को पंख दिए थे।  

    लेकिन वहाँ… कुछ नहीं था। 

    आखिरी मैसेज दो दिन पुराना था।  

    कहीं कोई सन्देश नहीं, कोई समर्थन नहीं, कोई आवाज़ नहीं।  

    वही शख्स, जिससे उसने सबसे ज्यादा उम्मीद की थी, जिसने उसे इस इंडस्ट्री में आगे बढ़ने की हिम्मत दी थी, जिसने कहा था कि वह उसके टैलेंट पर भरोसा करता था – वही अब खामोश था।  

    उसने एक बार फिर उस शख्स के कमेंट्स ढूँढने की कोशिश की, शायद उसने कहीं कुछ कहा हो, शायद कहीं उसके पक्ष में कोई सफाई दी हो…  

    लेकिन नहीं।  

    कोई शब्द नहीं, कोई बचाव नहीं, कोई सफाई नहीं।  

    बस एक भारी खामोशी।  

    उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था। उसने मोबाइल को कसकर पकड़ लिया, जैसे वह उसे और तकलीफ़ न दे सके, लेकिन उसका दिमाग इन सब बातो से पीछे नहीं हट पा रहा था।  

    उसे वह सभी बातें याद आने लगी, जब वह घंटों तक अपने डिज़ाइन्स पर मेहनत करती थी, जब वह खुद को पूरी तरह झोंक देती थी, जब वह बस यह सोचती थी कि एक दिन उसका नाम होगा, उसकी पहचान होगी।  

    और अब? 

    अब उसका नाम कीचड़ में घसीटा जा रहा था।  

    “लोग ऐसा कैसे कर सकते हैं?”

    “कैसे इतनी आसानी से उसकी पूरी मेहनत को झूठ कह सकते हैं?”

    “और वो…? उसने कुछ क्यों नहीं कहा?”

    उसकी साँस भारी हो गई। आँसू उसकी आँखों के कोरों तक आ चुके थे, लेकिन वह उन्हें बहने नहीं देना चाहती थी। वह टूटने नहीं देना चाहती थी खुद को, लेकिन सच तो यह था कि वह पहले ही टूट चुकी थी।  

    उसने फोन को टेबल पर पटक दिया और अपने बालों में उंगलियाँ फिराने लगी। 

    उसे तरह-तरह की आवाज़ें सुनाई देने लगी। वो एक जानी-पहचानी आवाज़ थी, एक ऐसी आवाज़ जिसने बचपन से उसके दिल में घाव किए थे।  

    “मैंने समझाया था ना कि लड़कियों को सिर्फ़ घर के काम करने चाहिए?” 

    “बहुत उड़ने की कोशिश कर रही थी!”  

    “परायों के साथ कंधे से कंधा मिलाने चली थी, अब भुगत!”

    “मुँह काला हो गया ना? यही अंजाम होता है लड़कियों का!”

    रूहानी ने घबराकर अपनी हथेलियों से कानों को दबा लिया।  

    लेकिन आवाज़ें और तेज़ हो गईं।  

    एक पल वो आवाज़ें बाहर से आ रही थीं, अगले ही पल वो उसके अंदर गूंजने लगीं।  

    वह चाह रही थी कि इस कमरे से भाग जाए। कहीं दूर, जहां ये सब नहीं पहुंचे, जहां ये नाम, ये आवाज़ें, ये ताने उसका पीछा न करें।  

    जहाँ उसे कोई नाम से ना पुकारे।  

    जहाँ कोई उसे पहचानता ना हो।  

    लेकिन वह भागकर भी कहां जाती? अब कोई ठिकाना नहीं बचा था। अब उसका कोई अपना नहीं था।  

    वह अपने घुटनों को समेटकर बैठ गई, सिर झुका लिया और गहरी सांस लेने की कोशिश करने लगी, लेकिन अंदर कोई सुनामी उठ चुकी थी।  

    “मैंने इतना भरोसा किया… इतनी उम्मीदें रखीं… और बदले में यह मिला?”

    कमरे की खामोशी अब बोझ बन चुकी थी। घड़ी की टिक-टिक, हवा की सरसराहट— सब कुछ उसके अंदर की बेचैनी को और बढ़ा रहे थे।  

    उसने उठकर पानी का गिलास उठाया, लेकिन हाथ इतने कांप रहे थे कि गिलास हाथ से छूटकर ज़मीन पर गिर गया।  

    छन्न ……

    कांच के टुकड़े फर्श पर बिखर गए।  

    रूहानी ने नीचे देखा। 

    कांच के बिखरे हुए टुकड़े…  

    वैसे ही जैसे उसके सपने।  

    वैसे ही जैसे उसका भरोसा।  

    वैसे ही जैसे वह खुद।  

    इस पूरी दुनिया में, इस पूरे शहर में, इस पूरे घर में—  

    कोई नहीं था।  

    वह अचानक से उठी और उन कांच के टुकड़ों पर चलने लगी। उसकी नंगे पाँव एड़ी से लेकर उंगलियों तक काँच चुभने लगा, पर दर्द का अहसास मर चुका था। पैरों के नीचे हल्की-सी गर्माहट महसूस हुई— खून की।

    वह एक कदम और बढ़ाने ही वाली थी कि किसी ने उसे पीछे खींच लिया।

    एक झटके से।

    इतनी तेज़ी से कि उसका संतुलन बिगड़ गया और वह किसी की बाहों में समा गई। उसकी सांसें थम गईं।

    वह हाथ अब भी उसकी बाहों को जकड़े हुए थे, जैसे उसे गिरने से बचा रहे हों।

    वह आँखें बंद किए हुए थी, लेकिन महसूस कर सकती थी— किसी की गर्म साँसें उसके करीब थीं।

    लेकिन कौन?

    —————-

    अगर कमरे में सिर्फ़ वही थी, तो फिर वो बाहें किसकी थीं, जो उसे थामे हुए थीं?

    क्या यह वही था, जिससे उसने सबसे ज़्यादा उम्मीदें रखी थीं—या कोई और?

    अगर कोई था, तो वह कौन था—कोई अपना, कोई अजनबी… या कोई ऐसा, जिसका यहाँ होना नामुमकिन था?

  • अधूरी इबादत भाग~3

    अधूरी इबादत भाग~3

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    भाग~3 रूहानी की उलझन

    मीना की बात सुनकर रूहानी की जिज्ञासा और भी बढ़ गई। वह उत्सुकता से पूछ बैठी, “वैसे तुम्हारे सर का क्या नाम है?”

    मीना, जो अब अपने काम में व्यस्त हो चुकी थी, मुस्कुराते हुए जवाब दिया, “अद्वैत अवस्थी।”  

    रूहानी ने अगला सवाल किया, “क्या करते हैं वे?”

    मीना के चेहरे पर सम्मान झलक उठा। उसने झाड़ू लगाना छोड़कर सीधा होकर गर्व से कहा, “अरे, हमारे सर बहुत बड़े लेखक हैं! बहुत नाम कमाया है उन्होंने!”

    लेकिन रूहानी के लिए यह सब नया था। उसने कभी किताबों में दिलचस्पी नहीं ली थी, पढ़ने का शौक उसमें कभी जागा ही नहीं था, न ही किसी लेखक के बारे में ज्यादा सुना था। जब स्कूल में थी, तब भी सिर्फ़ उतना ही पढ़ती थी, जितना ज़रूरी था। साहित्य, कविताएँ, उपन्यास – इन सबसे उसका कभी कोई जुड़ाव नहीं रहा।

    लेकिन इस समय, मीना की बातों से ज़्यादा, उसे अद्वैत अवस्थी को लेकर खुद में बढ़ती जिज्ञासा महसूस हो रही थी।

    कैसा होगा वो इंसान जो इतनी कहानियाँ लिखता है? 

    क्या वो अपनी कहानियों में खुद को छुपा लेता होगा या फिर उनमें अपनी कोई सच्चाई बयां करता होगा?

    मीना ने हैरानी से पूछा, “लेकिन आप मुझसे सर के बारे में इतना क्यों पूछ रही हो? कल उनसे बात नहीं कर पाई थी क्या?”  

    रूहानी ने गहरी साँस ली। उसकी उंगलियाँ मेज़ के किनारे को हल्के-हल्के सहला रही थीं, “नहीं… कल मैं बेहोश हो गई थी और जब सुबह होश आया, तो तुम्हारे सर यहाँ नहीं थे।”

    मीना को यह सुनकर हल्की हैरानी हुई, लेकिन बातचीत का सिलसिला उसे अच्छा लग रहा था। उसने रुचि लेते हुए कहा, “सर तो अपने काम के चलते ज़्यादातर बाहर ही रहते हैं। कभी कोई नई किताब प्रकाशित करनी होती है, तो कभी किसी बड़े लेखक से मिलने जाना पड़ता है। मगर जब भी यहाँ होते हैं, तो बस अपने कमरे में ही बंद रहते हैं, लिखने में डूबे रहते हैं।”

    रूहानी खिड़की के बाहर देखने लगी। 

    एक प्रसिद्ध लेखक… और यहाँ इस सूने घर में एक अजीब से अकेलेपन में रहता है। ये घर उसे अपनी ओर खींच रहा था, जैसे यहाँ की हर दीवार में कोई अनकही दास्तान क़ैद थी।

    मीना अब अपनी सफाई का काम लगभग पूरा कर चुकी थी। उसने टेबल पर कपड़ा मारा और एक हल्की मुस्कान के साथ बोली, “मैं तो तब से यहाँ हूँ, जब सर शादी करके आए थे। शादी के एक साल बाद ही मैडम दुनिया छोड़कर चली गईं।”

    रूहानी को यह सुनकर अजीब-सा महसूस हुआ। उसने अद्वैत अवस्थी के चेहरे को याद करने की कोशिश की— वो खाली, गहरी आँखें, जिसमें दर्द की परतें बिछी हुई थीं। 

    क्या उस दर्द की वजह उसकी पत्नी की मौत थी? 

    या कोई और ज़ख्म भी था, जो उसने किसी से साझा नहीं किया?

    मीना की आवाज़ में हल्की उदासी आ गई, मगर जब उसने कहा, “मैडम ने ही मुझे यहाँ काम करने के लिए चुना था,” तो उसके चेहरे पर गर्व की चमक आ गई। शायद वो खुद को इस घर का एक हिस्सा मानने लगी थी, जैसे उसकी पहचान अद्वैत अवस्थी और उनकी पत्नी से जुड़ी हो।

    रूहानी भी उसकी बातों में थोड़ी देर के लिए खो गई। एक लेखक, जो अपनी पत्नी को शादी के साल भर बाद ही खो चुका था। उस दर्द का अंदाजा भी नहीं लगाया जा सकता था।

    किसी की ज़िंदगी में इतना बड़ा बदलाव सिर्फ़ साल भर में कैसे आ सकता है? 

    कोई इतना अकेला कैसे हो सकता है कि सालों तक किसी से बात न करे? 

    या फिर वो भी उन्हीं लोगों में से था, जो सिर्फ़ दिखावे की शादी करते हैं?

    विचारों में डूबी रूहानी अचानक चौंकी, जब मीना ने उसके सामने चुटकी बजाई, “कहाँ खो गईं आप?”

    रूहानी चौंक गई। उसने अपनी पलकों को झपकाया और हल्का मुस्कुरा दिया, “नहीं, बस ऐसे ही…”

    मीना भी मुस्कुराई, “अच्छा, बाकी बातें कल करेंगे। मुझे अभी घर जाना है, नहीं तो मेरे बच्चे मुझे खोजने लगेंगे।”

    रूहानी ने अनायास ही पूछ लिया, “तुम्हारी शादी कब हुई?”

    मीना ने हड़बड़ी में कपड़े ठीक करते हुए कहा, “अरे, वो सब फिर कभी। अभी तो मुझे जाना होगा, बच्चे राह देख रहे होंगे।”

    इतना कहकर वह तेजी से बर्तन समेटने लगी। उसने चाय और नाश्ता रूहानी के सामने रखते हुए कहा, “ये खा लीजिएगा, मैडम। और सर के इंतजार मत कीजिएगा, उनका कोई ठिकाना नहीं। कभी आधी रात को आते हैं, तो कभी अगली सुबह तक।”

    रूहानी ने चुपचाप सिर हिला दिया। मीना ने एक अंतिम मुस्कान दी और दरवाज़ा बंद करके चली गई।

    अब फिर वही खामोशी।

    कमरे की हर चीज़ वैसी ही थी, लेकिन अब ये खामोशी और गहरी हो गई थी। रूहानी ने चाय का कप उठाया, लेकिन पीने का मन नहीं था। वह सोफे पर बैठी रही, अपनी ही उलझनों में घिरी हुई।

    उसकी आँखें दीवार पर टंगी घड़ी पर चली गईं।

    टिक… टिक… टिक…

    समय धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा था, मगर इस घर के भीतर सब कुछ रुका हुआ महसूस हो रहा था।

    उसका मन कह रहा था कि उसे यहाँ नहीं होना चाहिए था। उसे वापस जाना चाहिए। लेकिन वापस कहाँ?

    उसकी ज़िंदगी में पीछे मुड़कर देखने के लिए अब कुछ भी नहीं था। ना कोई घर, ना कोई ऐसा जिसे वह अपना कह सके। 

    एक अजनबी ने उसे बचाया और अब वह उसी अजनबी के घर में बैठी थी, उसके बारे में सोचते हुए।

    उसे महसूस हो रहा था कि यह जगह उसे खींच रही थी, लेकिन क्यों? वह खुद नहीं समझ पा रही थी।

    बाहर से हवा का हल्का झोंका आया और पर्दे धीरे-धीरे हिलने लगे। उस हवा में एक ठंडक थी, जो उसकी रूह तक महसूस हो रही थी।

    वह उठी और धीरे-धीरे हॉल में चहलकदमी करने लगी। उसकी नज़र किताबों की शेल्फ़ पर पड़ी।

    उसने धीरे से एक किताब उठाई। उस किताब के कवर पर लेखक का नाम लिखा था, लेकिन उसकी आँखें सिर्फ़ उन मोटे अक्षरों को देख रही थीं—”अद्वैत अवस्थी”

     

    उसने उंगलियों से नाम को छुआ। उसकी लिखी हुई किताबें…

    उसने किताब के पन्ने पलटने शुरू किए। उसकी नज़र एक पंक्ति पर ठहर गई—  

    “कुछ जख़्म ऐसे होते हैं, जिन्हें वक़्त नहीं भरता, बस इन्सान उनके साथ जीना सीख जाता है।” 

    उसका दिल एक पल के लिए ठहर गया।

    यह कैसा संयोग था कि उस इंसान की किताब में उसे खुद का अक्स मिल रहा था, जिसने उसे मौत के करीब से बचाया था?  

    पन्ने आगे बढ़ते गए और हर शब्द जैसे किसी भूली हुई वेदना को फिर से उभार रहा था—  

    “कभी-कभी हम अपनी तकलीफ़ें किसी से बाँटते नहीं, क्योंकि हमें डर होता है कि कोई समझेगा ही नहीं। लेकिन सच तो यह है कि कुछ दर्द ऐसे होते हैं, जिन्हें सिर्फ़ महसूस किया जा सकता है, बाँटा नहीं जा सकता।”

    रूहानी को महसूस हुआ कि उसकी आँखें हल्की-सी नम हो गई थीं।

    क्या अद्वैत अवस्थी ने अपनी कहानियों में खुद को छुपा लिया था?  

    या फिर वो अपनी किसी सच्चाई को इन शब्दों के पीछे किसी अनकही टीस की तरह छोड़ गया था?  

    उसने किताब धीरे से बंद कर दी, फिर धीरे से वापस शेल्फ़ में रख दी लेकिन वो पंक्तियाँ अब भी उसके दिल के भीतर गूंज रही थीं।  

    वह खिड़की के पास गई और पर्दा थोड़ा हटाया।

    वह सोचने लगी— क्या उसे भी अकेलेपन से डर लगता होगा?

    या फिर उसने इस अकेलेपन को ही अपनी ज़िंदगी बना लिया है?

    उसके मन में कई सवाल थे, लेकिन जवाब कहीं नहीं थे।

    कमरे में घड़ी की टिक-टिक जारी थी।

    वह धीरे-धीरे सोफे पर बैठ गई, अपने घुटनों को समेटते हुए।

    उसकी आँखों में हल्की नमी थी, लेकिन उसे खुद नहीं पता था कि यह किसलिए थी।

    क्या अपने लिए? या उस अजनबी के लिए, जो अब उसके सवालों के घेरे में था?

    क्या वह सच में किसी ऐसी कहानी का हिस्सा बनने जा रही थी, जिसके अंत से वह अनजान थी?

    —————-

    उसने धीरे-धीरे अपनी जगह से उठकर इधर-उधर नजर दौड़ाई। कहीं कुछ तो था जो उसे बेचैन कर रहा था। तभी अचानक उसे अहसास हुआ— उसका मोबाइल!  

    वो तेजी से अपना फोन ढूंढने लगी। नोटिफिकेशन लाइट टिमटिमा रही थी… लेकिन ये संदेश किसके थे?  

  • अधूरी इबादत भाग~2

    अधूरी इबादत भाग~2

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    भाग~2 सवालों से भरा अजनबी घर

    सूरज की हल्की किरणें खिड़की के झीने पर्दों से छनकर कमरे में फैल रही थीं। हल्की हवा में पर्दे हौले-हौले हिल रहे थे, जैसे किसी अदृश्य हाथ ने उन्हें छू लिया हो। धूप की पतली रेखाओं के बीच, हवा में तैरते धूल के महीन कण, किसी भूली-बिसरी याद की तरह दिख रहे थे। रूहानी की पलकें भारी थीं। ऐसा लग रहा था जैसे उसकी आत्मा किसी गहरे कुएं में डूब गई हो।

    उसकी सांसें धीमी थीं, जैसे उसका भीतर से सारा जोश कहीं खो गया हो। उसने धीरे-धीरे आँखें खोलीं। पहली चीज़ जो उसकी धुंधली दृष्टि में आई, वो थी छत पर घूमता हुआ पंखा। उसकी ब्लेड धीमी चाल में गोल-गोल घूम रही थीं, जैसे वक़्त खुद भी थम जाना चाहता हो।

    रूहानी ने अपना सिर घुमाया, कमरे का जायज़ा लिया। यह कोई होटल का कमरा नहीं था, ना ही अस्पताल का—बल्कि यह एक घर का हॉल था। एक ऐसा घर, जो बड़ा तो नहीं था, लेकिन उसमें एक अजीब-सी शांति पसरी हुई थी। दीवारें हल्के रंग की थीं, लेकिन उन पर हल्की उदासी का साया था। एक तरफ़ लकड़ी की बुकशेल्फ़ थी, जिसमें किताबें करीने से सजी हुई थीं। उन किताबों को देखकर ही अंदाजा लगाया जा सकता था कि यहाँ का मालिक कोई आम इंसान नहीं, बल्कि अपने ही ख्यालों में खोया रहने वाला कोई शख्स होगा।

    रूहानी ने माथे पर हाथ फेरा। उसे हल्का दर्द महसूस हो रहा था। और फिर… वो पल दिमाग़ में बिजली की तरह कौंधा।

    पुल…

    वो ठंडी हवा…

    उसका लड़खड़ाते हुए रेलिंग पर चढ़ना…

    फिर अचानक कोई उसे खींचता है… एक जोड़ी मजबूत बाहें…

    “कौन था वो?”

    वो बुदबुदाई।

    उसने धीरे से अपना हाथ सोफे से हटाया और पैर नीचे रखे। फर्श पर पैर रखते ही लकड़ी के ठंडेपन का एहसास हुआ। पूरा घर नीरव था, मगर यह खामोशी कानों में अजीब-सा सन्नाटा भर रही थी। एक सन्नाटा, जो कानों में सन्नाटे की तरह गूंज रही थी।

    हॉल से दाएँ एक छोटा-सा कॉरिडोर था। रूहानी ने धीरे-धीरे कदम बढ़ाए।

    कॉरिडोर संकरा था, मगर साफ़-सुथरा। दीवारों पर पुरानी तस्वीरें टंगी थीं—धुंधली और मोनोक्रोम—जैसे किसी बीते हुए अतीत की परछाइयाँ कैद हों। एक कोने में लकड़ी की एक छोटी-सी मूर्ति रखी थी। वह किसी औरत की आकृति थी—गर्दन झुकी हुई, आँखों में कोई गहरी उदासी। रूहानी ने हाथ बढ़ाकर उसे छुआ और उसकी उंगलियों के नीचे, लकड़ी की सतह पर न जाने क्यों ठंडापन नहीं, बल्कि एक हल्की-सी सिहरन महसूस हुई।

    उसने तुरंत हाथ पीछे खींच लिया।

    रूहानी आगे बढ़ी। पूरा घर शांत था, मानो दीवारों ने सदियों से कोई आवाज़ नहीं सुनी हो। उसे घर बड़ा नहीं लगा, मगर इसमें एक गहरा खालीपन था, जो उसकी रूह तक महसूस हो रहा था।

    वो हॉल में लौट आई। वहाँ एक कोने में डाइनिंग टेबल रखी थी और दूसरी तरफ़ सोफे और सेंटर टेबल। दीवार पर एक बड़ी-सी घड़ी टंगी थी, जिसकी सूइयाँ बिल्कुल धीमे-धीमे खिसक रही थीं। टिक-टिक की आवाज़ पूरे कमरे में गूँज रही थी, जैसे कोई अदृश्य ताकत हर गुजरते पल को दर्ज कर रही हो।

    फिर उसकी नज़र ऊपर की तरफ़ गई—सीढ़ियाँ।

    वो धीरे-धीरे सीढ़ियाँ चढ़ने लगी।

    ऊपर पहुँचते ही उसने देखा कि दो दरवाज़े बंद थे। एक दरवाजे पर हल्की धूल की परत जमी थी, जैसे वहां बहुत समय से कोई गया ही न हो। उसे एक अजीब-सी अनुभूति हुई। वो दरवाज़े कुछ छुपा रहे थे।

    वह नीचे आकर हॉल के सोफे पर धीरे से बैठ गई, उसकी उंगलियां आपस में उलझ रही थीं। 

    घर में कोई नहीं था। न जाने क्यों उसे ऐसा लग रहा था कि वह किसी अजनबी जगह पर नहीं, बल्कि कहीं बहुत गहरे दर्द के बीच बैठी थी।

    तभी दरवाज़े पर खटखटाहट हुई।

    रूहानी का दिल धक् से रह गया। उसके अंदर डर जागने लगा। इस अजनबी के घर पर पता नहीं कौन आ जाए।

    दरवाज़ा खुला और एक साधारण सी औरत अंदर आई—हाथ में थैला पकड़े, चेहरे पर थोड़ी थकान। मगर जैसे ही उसकी नज़र रूहानी पर पड़ी, वो एकदम से चौंक गई।

    “अरे…!”

    “आप कौन हैं?” वह जोर से चीखी।

    रूहानी भी घबरा गई, मगर खुद को संभालते हुए बोली, “वो… मैं…” उसकी आवाज़ लड़खड़ा गई।

    “आप यहाँ आईं कैसे?” औरत अभी भी सहमी हुई थी।

    “मैं…” रूहानी को समझ नहीं आया कि क्या कहे। “वो… कल… एक्सीडेंट…”

    “एक्सीडेंट?” औरत के चेहरे पर संदेह उभर आया।

    “हाँ… वो इंसान… जिन्होंने मुझे बचाया था ….”

    औरत ने कुछ पल उसे ध्यान से देखा, फिर सहज होकर बोली, “ओह… अच्छा… सर ने आपको बचाया है?”

    रूहानी ने सिर हिलाया।

    “तुम कौन हो?” रूहानी ने पूछा।

    “मैं यहाँ की मेड हूँ। दो साल से काम कर रही हूँ। सफाई, खाना बनाना… बस यही।”

    “तुम्हारा नाम क्या है?”

    “मीना,” औरत ने हल्की मुस्कान के साथ कहा।

    “और… वो तुम्हारे सर… वो कहाँ हैं?”

    “सर तो सुबह-सुबह निकल गए होंगे। वैसे आपका नाम क्या है?”

    रूहानी चुप हो गई।

    फिर धीरे से कहा, “रूहानी।”

    मीना ने थोड़ी देर तक उसे घूरा। फिर अचानक बोली,

    “बुरा मत मानिएगा, मैडम… मगर मैंने यहाँ पिछले एक साल में किसी औरत को आते नहीं देखा। खासकर सर की पत्नी के जाने के बाद तो बिल्कुल नहीं…”

    रूहानी के भीतर भूचाल आ गया।

    “उनकी पत्नी?”

    “हाँ… सर की पत्नी का तो पिछले साल ही देहांत हो गया था। बहुत ही अच्छी और शांत स्वभाव की थीं। उनके जाने के बाद से सर बिल्कुल बदल गए हैं… ना किसी से बात करते हैं, ना किसी को घर पर बुलाते हैं…”

    रूहानी की आँखें धीरे-धीरे चौड़ी हो गईं।

    “मर… गईं?” उसके होठों पर बस यही शब्द फिसले।

    मीना ने हल्की सहानुभूति जताते हुए सिर हिलाया, “बहुत मुश्किल वक़्त था उनके लिए।”

    रूहानी का मन डगमगाने लगा।

    उस आदमी की आँखों का खालीपन…

    उसकी उदासी…

    और अब ये सुनना कि उसकी पत्नी इस दुनिया में नहीं रही…

    सब कुछ किसी उलझे हुए रहस्य की तरह लगने लगा।

    रूहानी की साँसें तेज़ हो रही थीं। उसे ऐसा लग रहा था जैसे वह किसी ऐसी कहानी का हिस्सा बन गई है, जिसमें न चाहते हुए भी उसे शामिल होना पड़ रहा है।

    “मैडम… आप ठीक हैं?” मीना की आवाज़ ने उसे चौंका दिया।

    “हाँ… हाँ, मैं ठीक हूँ…” रूहानी ने खुद को संभालते हुए कहा।

    मगर उसकी आँखों में सवालों का सैलाब उमड़ रहा था —

    वो कौन था?

    उसकी आँखों में वो खालीपन क्यों था?

    क्या ये घर सिर्फ़ ईंट और पत्थरों का बना था, या इसमें कोई अनकहा दर्द दफ़न था?

    उसके दिल में इस अजनबी शख्स को लेकर एक अजीब-सा खिंचाव महसूस हो रहा था — ऐसा खिंचाव जो डर के साथ-साथ किसी अनकही कहानी को जानने की बेचैनी से भरा हुआ था।

    उसका मन कह रहा था—यह कहानी सिर्फ़ उसकी नहीं थी। वह किसी और की जिंदगी के ऐसे पन्ने में दाखिल हो गई थी, जहां से वापस लौटना अब शायद उसके बस में नहीं था।

    ——–

    दरवाज़े के पीछे आखिर क्या था, जिसे वक़्त की धूल ने ढक रखा था?

    उस आदमी की आँखों का खालीपन… क्या वो सिर्फ़ ग़म था, या किसी छुपे हुए राज़ की परछाई?

    इस घर की खामोशी में कोई अनसुनी दास्तान थी, मगर क्या रूहानी उसे सुनने के लिए तैयार थी?