🔐 लॉग-इन या रजिस्टर करें  

अधूरी इबादत भाग~9

पढ़ने का समय : 9 मिनट

भाग~9 खोई नहीं हूँ मैं

कमरे में चुप्पी घुली थी, जैसे दीवारें भी उसके भीतर उठते-गिरते ज्वार की साक्षी बन गई हों। रूहानी की उंगलियां अब भी मोबाइल को थामे कांप रही थीं, जबकि स्क्रीन बहुत पहले ही बुझ चुकी थी। कॉल कटने की वो छोटी सी ‘बीप’ अब भी उसके कानों में गूंज रही थी, जैसे कोई अटकी हुई सांस, जो पूरी निकलने से पहले ही दबा दी गई हो।

यश की रुआंसी आवाज, माँ-बाबा के कठोर शब्द, सब उसके भीतर किसी पुराने घाव की तरह फिर से रिसने लगे थे। पल भर को रूहानी का मन किया कि वो फिर से फोन मिलाए, यश से बात करे, उससे पूछे कि अब वह ठीक तो है ना। पर अगले ही पल उसे खुद को रोकना पड़ा। वह जानती थी, अच्छी तरह जानती थी कि चाहे माँ-बाबा उसे अपने जीवन से काट चुके हों, पर यश अब भी उनका दुलारा बेटा था। उस पर हाथ उठाने या उसकी अनदेखी करने का सवाल ही नहीं था। यश, वो बेटा जिसे उन्होंने बरसों की तपस्या के बाद पाया था, उसके लिए तो उनके दिलों में अब भी असीम प्रेम था।

इसी सोच ने उसे थोड़ी राहत दी, पर उस राहत की परत के नीचे जो कसक थी, वह कम नहीं हुई।

धीरे से उसने मोबाइल को सिरहाने रखा और अपने पैरों की ओर देखा। पैर के तलवे पर पट्टी बंधी थी, पर पट्टी के बीच से झांकता दर्द अब भी धड़क रहा था। रूहानी ने पल भर को अपनी पलकों को भींच लिया, जैसे अपनी ही नजरों से खुद को बचाना चाहती हो। फिर एक धीमी, कसैली हँसी उसके होठों से फिसल गई।

“अकेली,” उसने खुद से बुदबुदाया, “एकदम अकेली।”

उसने अपने घायल पैर को हलके से सीधा किया। चुभन अब भी थी, पर उससे भी ज्यादा चुभन उसके मन में थी। खुद पर गुस्सा, खुद से नाराजगी। क्यों? क्यों वो इस हालत में आई थी? क्यों उसे लगा था कि मर जाने से सब कुछ बदल जाएगा? क्यों उसने सोचा था कि दुनिया इतनी आसान है कि बस एक फैसला, एक कदम और सब कुछ वैसा हो जाएगा जैसा वह चाहती थी?

कमरे की धुंधली रोशनी में उसे अपनी ही परछाईं दीवार पर लहराती दिखी। एक टूटी हुई परछाईं, जिसमें अब कोई ठोस आकृति नहीं बची थी।

“अब पड़े रहो,” वह खुद से फुसफुसाई, “इस अजनबी घर में, उस अजनबी आदमी के साथ… जब तक ये घाव भर नहीं जाते, तब तक कहीं जा भी नहीं सकती।”

उसके शब्दों में जितनी कड़वाहट थी, उतनी ही असहायता भी। अद्वैत के घर में शरण लेना उसकी मजबूरी थी, न कि उसकी मर्जी। वो जानती थी कि अद्वैत उससे कोई उम्मीद नहीं रखता, न ही उसे यहाँ देखकर कोई खुशी होती थी, पर उसकी चुप्पी… उसकी चुप्पी उसे कहीं भीतर से चुभ रही थी।

रूहानी ने अपने घुटनों को सीने से लगाकर खुद को और छोटा कर लिया, जैसे अपनी ही बाहों में छिप जाना चाहती हो।

उसकी आँखों के कोनों से आंसू बह निकले, चुपचाप, बिना किसी आवाज के। वह रोई नहीं, बस बहने दिया उन आंसुओं को, जैसे बहाव ही उसकी सजा हो। उसने खुद से कहा, “तुम्हीं ने चुना था ये रास्ता, तुम्हीं को सहना भी होगा।”

उसके दिल का सन्नाटा कमरे के भीतर भी उतर आया। हर चीज़ थम गई थी — धड़कनें, साँसें, उम्मीदें।

एक पल के लिए उसे माँ-बाबा की वो आँखें याद आई, जो कभी उसके लिए आशीर्वाद थी और अब सिर्फ नफरत से भरी थीं। कैसे एक पल में वे लोग, जो उसके जीवन का आधार थे, उसे अपने जीवन से मिटा चुके थे। सिर्फ इसलिए कि उसने अपने लिए जीने की जुर्रत की थी?

अचानक उसकी स्मृतियों में वह क्षण कौंध उठा जब अद्वैत ने उसे मृत्यु के मुख से खींच लाया था, जैसे किसी सूखते प्राण में फिर से प्राणवायु भर दी हो। आज फिर वही हाथ, उसके दूसरे पाँव को क्रूर कांच के टुकड़े से बचा गया था… एक चुप, मगर सजीव पहरेदार की तरह। 

तभी रूहानी के भीतर कोई गहरी, शांत आवाज उठी—”नहीं… मैं विलीन नहीं हुई हूँ, मैं अब भी हूँ… पूर्ण और धड़कती हुई।”

उसकी मुट्ठियाँ भींच गईं, दर्द से, डर से, और कहीं न कहीं, जिद से भी। उस अजनबी कमरे में, उस अजनबी के घर में, वह अपने अस्तित्व की छोटी सी लौ को थामे हुए थी।

धीरे-धीरे उसके भीतर एक अजीब सी शांति फैलने लगी। एक ऐसा सन्नाटा जो बाहर के शोर से अलग था। यह सन्नाटा अंदर से आ रहा था, जैसे उसकी आत्मा ने हार मानने से इनकार कर दिया हो।

——–

अद्वैत की सुबह हमेशा की तरह खामोशी के आवरण में लिपटी थी। सूरज की किरणें धीरे-धीरे खिड़कियों के पर्दों के नीचे से कमरे में घुसने लगी थीं, लेकिन अद्वैत को उजाले से कोई खास वास्ता नहीं था। वह नीचे रसोई में चुपचाप दराज खींच रहा था, जैसे हर ध्वनि से बचना चाहता हो। चाय के कपों के आपस में टकराने की धीमी सी आवाज कमरे के सन्नाटे को हल्के से चीरती थी। वही धीमा सधा हुआ स्पर्श, वही अभ्यस्त मौन, लेकिन आज इस मौन में कुछ और भी घुला था — एक अनजानी, अनकही उपस्थिति।

रूहानी, जो अद्वैत के सुझाये गए रसोई से सटे कमरे में थी, अधजगी सी हालत में लेटी थी। उसकी पलकों के बीच नींद और जागृति का झीना सा परदा था। रसोई से आती हल्की आहटें, कप-प्लेट के टकराने की आवाजें उसके कानों में रिसती रहीं। उसे एहसास हुआ कि अद्वैत रसोई है — उसी घर में, उसी सांसों की लय में, बस कुछ कमरों की दूरी पर। कोई संवाद नहीं, कोई आमना-सामना नहीं, फिर भी उसकी उपस्थिति पूरे घर में महसूस हो रही थी, जैसे दीवारों में उसकी थकी हुई आत्मा की गूँज भरी हो।

रूहानी ने कराहते हुए करवट ली। उसके सूजे हुए चेहरे पर कल रात के आँसुओं की कहानी अब भी बाकी थी। बाल बेतरतीबी से बिखरे थे, आँखों के नीचे गहरे साए थे। दर्द और थकान की मिश्रित परछाइयाँ उसकी देह पर पसरी हुई थीं। उसके घाव अब भी रिसते थे — न सिर्फ तलवों पर लगे घाव, बल्कि दिल के भी। 

उसी वक्त अद्वैत, गलती से या शायद किसी अनकही बेचैनी के वश में, उसके कमरे के सामने से गुजरा। अनायास उसकी नजर कमरे के भीतर चली गई और वहाँ रूहानी को यूँ टूटा-बिखरा देखकर वह कुछ पल के लिए जैसे वहीं थम गया।  

उसकी आँखें अनजाने ही रूहानी के सूजे चेहरे, नम पलकों और बिखरे बालों पर टिक गईं। उस पल अद्वैत के भीतर कोई अनचाहा मंथन उठ खड़ा हुआ। वह जो अब तक खुद को दुनिया से काट चुका था, जिसने अपनी पीड़ा को ताले में बंद कर दिया था, आज एक अनजान लड़की के दुःख से क्यों जुड़ रहा था? क्यों उसकी पीड़ा उसे अपने लंबे, सूने अकेलेपन की याद दिला रही थी?

अद्वैत का गला अचानक भारी लगने लगा। भीतर एक कसक उठी जो उसे असहज कर गई। उसके भीतर का एक हिस्सा उसे झिड़क रहा था — क्यों देख रहा है? क्यों महसूस कर रहा है? यह तेरी लड़ाई नहीं है। लेकिन एक और हिस्सा था, जो फुसफुसा रहा था — यह पीड़ा पहचानी हुई है। यह वही खालीपन है जिसे तूने भी जिया है।

उसकी उंगलियाँ दरवाजे के फ्रेम पर कस गईं। वह एक क्षण को भीतर जाने का सोचता है, फिर खुद को रोक लेता है। खुद पर गुस्सा आता है — इस बेबसी पर, इस अनचाही करुणा पर। 

वह जानता था कि रूहानी एक अजनबी है, बस संयोग से उसके जीवन में आ गई है। और फिर भी, उसका टूटा हुआ चेहरा देखकर अद्वैत के भीतर बीते दिनों की एक रेखा खिंच गई थी। उसे अपनी पत्नी की आखिरी रात याद आ गई — जब उसने भी ठीक ऐसे ही बिस्तर पर बेजान पड़ी, थकी हारी आँखों से उसे देखा था। 

एक टीस ने अद्वैत के सीने को चीर दिया। वह जानता था कि यह तुलना गलत थी। रूहानी उसकी पत्नी नहीं थी। यह अतीत को वर्तमान पर थोपना था। लेकिन भावनाएँ तर्क की राह कब चलती हैं?

उसने धीरे से आँखें मूँद लीं, जैसे खुद को इस क्षण से अलग करना चाहता हो। फिर कदम पीछे खींच लिए, बमुश्किल खुद को कमरे से दूर किया।  

लौटते हुए उसके कदम भारी थे, जैसे हर कदम उसके भीतर उठती हूक को और गहरा कर रहा हो। रसोई में लौटकर उसने दो कपों में चाय डाली। चाय के धुएं में उसकी आँखें फिर से उस सूजे चेहरे की परछाई खोजने लगीं। 

अद्वैत चुपचाप कुर्सी पर बैठा रहा। चाय का कप हाथ में थामे, लेकिन पीने की कोई जल्दी नहीं। उसकी नजरें खिड़की के पार जाने कहाँ भटक रही थीं। 

उधर, रूहानी धीरे से उठ बैठी थी। पैर का दर्द हल्का चुभ रहा था, लेकिन दिल का दर्द कहीं गहरा था। नीचे से आती हल्की-हल्की आहटें अब उसे चुभती नहीं थीं, बल्कि एक अजीब सा सुकून दे रही थीं। जैसे यह जान लेना कि कोई और भी घर में है, खुद में एक दवा बन गया हो। 

वह जानती थी, अद्वैत से उसे कोई सहारा नहीं माँगना चाहिए। न कोई आस लगानी चाहिए। फिर भी, उसकी उपस्थिति — यह जानना कि वह अकेली नहीं है — एक नर्म, चुप सांत्वना की तरह उसके दिल के किसी कोने में फैलने लगी थी।  

उसने खुद को सँभाला, गहरी साँस ली और अपने पैरों को बिस्तर से नीचे सरकाया। दर्द की एक लहर उसके तलवों से होते हुए पूरे जिस्म में दौड़ गई। वह जानती थी कि उसे अभी लंबा सफर तय करना है — न केवल शारीरिक घावों से उबरने का, बल्कि उस दिल के घावों से भी जिन्हें वह जाने कब से अपने भीतर छुपाती आई थी।

और अद्वैत अपने ही विचारों के घेरे में फँसा चाय के कप से उठते धुएँ को ताक रहा था — जैसे उसमें से अपने सवालों के जवाब तलाश रहा हो, जिन्हें उसने खुद से पूछने की भी हिम्मत अब तक नहीं जुटाई थी। 

दोनों चुप थे। दोनों अकेले थे। फिर भी एक महीन, अदृश्य धागे से एक-दूसरे से बंधने लगे थे — बिना बोले, बिना कहे।

——

क्या अद्वैत अपनी बंद दुनिया के दरवाजे रूहानी के लिए खोलेगा? 

या फिर दोनों अपनी-अपनी तन्हाइयों में डूबे रह जाएंगे? 

क्या दर्द के पुराने साये उन्हें जोड़ेंगे या फिर और दूर कर देंगे?

Comments

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *