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अधूरी इबादत भाग~8

पढ़ने का समय : 7 मिनट

भाग~8 नाम तक मिटा दिया

अद्वैत उस बंद दरवाज़े के सामने खड़ा था, जो बरसों से अपने पीछे ना जाने कितनी कहानियाँ छुपाए खड़ा था। उसके चेहरे पर एक अजीब सा तनाव था, जैसे वह खुद को इस पल के लिए भीतर से तैयार कर रहा हो। उसकी उंगलियाँ चाबी पर कस गई थीं। पल भर को उसने अपनी सांस रोक ली, फिर धीरे से चाबी घुमाई।

चटक की एक धीमी आवाज़ के साथ दरवाज़ा खुला। जैसे ही अद्वैत ने दरवाज़े को धकेला, एक हल्की सी धूल भरी खुशबू उसके चेहरे से टकराई। वह भीतर कदम रखा और एक पल को उसकी आँखों के आगे उसकी पूरी ज़िंदगी जैसे उलटने लगी।

यह कमरा कभी उसके सबसे करीब था। उसकी आत्मा का एक कोना।

दीवार के साथ सजी किताबों की लंबी-लंबी कतारें थीं, जैसे समय को पकड़ कर रखने की एक नाकाम कोशिश हो। मोटी जिल्द वाली, पुरानी, धुंधली किताबें, जिनके कवर अब फीके पड़ चुके थे। किताबों के बीच-बीच में कुछ डायरी भी थीं, जिनके किनारे झड़ने लगे थे।  

कमरे में जो भी था, उसे एक पाठक सह लेखक के घर का कमरा होना बता रहा था। 

कमरे के एक कोने में खिड़की के पास एक स्टडी टेबल था। उस पर फैले हुए कागज, आधी लिखी चिट्ठियाँ और खाली पड़े पन्ने। कुछ चिट्ठियाँ ऐसी थीं, जिनके किनारे मुड़े हुए थे, शायद गीले हो जाने के कारण। जैसे कोई आँसू उनमें चुपके से समा गया हो।

अद्वैत धीमे कदमों से भीतर चला आया। उसकी चाल में नरमी थी, जैसे वो इस कमरे की नींद को तोड़ना न चाहता हो। उसने एक गहरी सांस ली, जिसमें धूल और बीते हुए समय की महक घुल गई थी।

यह सिर्फ वही जानता था कि क्यों उसने इस कमरे को बंद रखा था?

क्यों मीना को साफ़ करने से मना किया था?

क्योंकि यह कमरा उसकी आत्मा का सबसे कोमल हिस्सा था, जिसे वह दुनिया की नजरों से छुपाकर रखना चाहता था।

फिर अद्वैत ने दरवाजे के पीछे से डस्टर और वाइपर निकाले। उसकी चाल में एक सधी हुई थकावट थी, जैसे वो हर कदम के साथ अपने भीतर किसी भारी बोझ को उठाने का साहस जुटा रहा हो।

उसने डस्टर को कस कर पकड़ा और सबसे पहले दीवार से सटी किताबों की अलमारी की ओर बढ़ा। एक-एक करके किताबों के ऊपर जमी धूल हटाते हुए, उसकी उंगलियाँ किताबों की रीढ़ पर रेंगती चली गईं। जैसे हर किताब, हर कवर, हर स्पाइन पर उसके किसी बीते पल की परछाई बैठी हो।

कुछ किताबों को छूते ही उसके चेहरे पर बिछी एक उदास मुस्कान हल्की सी तैर जाती। कोई पुराना शेर, कोई भूली-बिसरी कविता, कोई प्रेम कहानी… सब जैसे उसे पुकार रही थीं।

कमरा धीरे-धीरे सांस लेने लगा। किताबें चमकने लगीं, अलमारियाँ मुस्कुराने लगीं।

फिर वह स्टडी टेबल के पास की खिड़की तक चला गया। खिड़की से बाहर झांकते हुए उसने एक थकी हुई मुस्कान के साथ आसमान को देखा। बादल गहरे हो चले थे, जैसे कोई भी पल में बारिश फूट पड़ेगी।

फिर भी वहां एक अलग सी संजीदगी थी, एक अलग सी तपिश। उसने डस्टर को और भी मुलायम हाथों से पकड़ा, जैसे किसी अपने के माथे से धूल हटाता हो। टेबल के हर कोने को उसने साफ किया, छोटे-छोटे खरोंचों को अपनी हथेली से सहलाया, मानो उन निशानों में दबी कहानियों को फिर से जीना चाहता हो।

टेबल के किनारे रखे चिट्ठियों के बंडल पर नजर पड़ी तो उसने एक पल के लिए आँखें मूँद लीं। सांसें जैसे थोड़ी देर को थम गईं। फिर बहुत धीरे से, जैसे कोई प्राचीन ग्रंथ खोल रहा हो, उसने उन चिट्ठियों को अपने सामने रखा।

कमरा अब पूरी तरह से साफ था। एक कोमल, शांत, मगर भारी हवा वहाँ बह रही थी।

अद्वैत कुर्सी पर बैठ गया। उसकी उंगलियाँ एक चिट्ठी पर फिसलीं, फिर उसने पहली चिट्ठी उठाई। चिट्ठी के शब्द पढ़ते ही, उसकी आँखों के किनारे भीगने लगे। उसने चिट्ठी को अपने सीने से लगा लिया।

पलकों के नीचे से कुछ गर्म बूँदें बह निकलीं। उसने आँखें बंद कर लीं और उन लम्हों में लौट गया जब वह दुनिया की भीड़ में सबसे अकेला नहीं था, जब उसका दिल किसी और के दिल की धड़कनों के साथ धड़कता था।

एक-एक कर वह सारी चिट्ठियाँ पढ़ता गया। कहीं हँस पड़ता, कहीं साँसें भारी हो उठतीं। कभी उंगलियों से अक्षरों को छूता, मानो उन्हें आत्मा में समेट लेना चाहता हो।

समय थम-सा गया था। हर चिट्ठी बीते कल की धुंध में उसे डुबोती चली जाती।

आखिरी चिट्ठी हाथ में थी। उसने धीरे से उसे खोला, जैसे शब्दों के साथ कोई सपना टूट सकता हो। उसे भी पढ़कर उसने चिट्ठी को बहुत प्यार से मोड़ा और पूरे बंडल को फिर से एक किनारे रख दिया।

इसके बाद उसने पास रखे नये कोरे कागजों के बंडल में से एक चिट्ठी निकाली। जिसमे कागज की खुशबू नई थी, लेकिन अद्वैत के भीतर सब कुछ पुराना था।

उसने कलम उठाई। एक गहरी सांस ली और लिखता चला गया। 

जब चिट्ठी पूरी हुई, उसने उसे बाकियों के बंडल में रख दिया। बहुत सहेज कर, जैसे कोई अनमोल चीज़ हो।

फिर उसकी नजर टेबल के बीचोंबीच रखे छोटे से फ्रेम पर पड़ी। उसने तस्वीर को उठाया।

वह तस्वीर जिसमें वह और उसकी पत्नी एक-दूसरे को देखते हुए मुस्कुरा रहे थे। इतनी सच्ची, इतनी गहरी मुस्कान कि आज भी उसमें जीवन की गर्माहट बाकी थी।

उसने अपनी उंगलियाँ बहुत प्यार से उसके चेहरे पर फेरीं। जैसे वह उसके गालों को छू रहा हो, जैसे उसकी हँसी को महसूस कर रहा हो।

फिर तस्वीर को वापस उसी जगह रख दिया और अपनी ठुड्डी टेबल पर टिकाकर वह तस्वीर को एकटक देखता रहा।

उसके भीतर कुछ भी बोल नहीं रहा था। सब कुछ बस महसूस हो रहा था।

कमरे में केवल दीवारों की साँसे थीं, धूल की हल्की खुशबू थी और अद्वैत के दिल की नमी थी।

बाहर बारिश थम चुकी थी। बादलों के बीच कहीं एक हल्की सी धूप झाँक रही थी।

अद्वैत ने तस्वीर को देखते हुए बुदबुदाया – “तुम अब भी यहीं हो… हमेशा।”

उसके शब्द हवा में घुल गए, दीवारों में समा गए और शायद उसके दिल की गहराइयों में कहीं बैठ गए।

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उधर कमरे में रूहानी फोन के उस पार अपनी घुटती आवाज़ में सवाल कर रही थी, “यश! मां-बाबा अभी भी गुस्से में हैं?” उसकी आवाज़ में वह कम्पन था जो टूटे हुए सपनों और बिखरे हुए रिश्तों से उठता है, जैसे पतझड़ की रात में बर्फीली हवा किसी वीरान पेड़ की शाखों को कंपा देती है।

यश — यशवर्धन चौहान — जो रूहानी से उम्र में करीब 9-10 साल छोटा था, उस पल खुद भी टूटा हुआ सा महसूस कर रहा था। उसके गले में भरा हुआ दर्द जैसे हर शब्द को कांपता बना देता। रुआंसी आवाज़ में वह बोला, “दीदी… मां-बाबा तो तुम्हारा नाम तक नहीं ले रहे हैं। अगर मैं तुम्हारा जिक्र भी कर दूं… तो मुझे भी डांट कर कहते हैं कि इस घर में अब आपका नाम कोई नहीं लेगा।”

यश की आवाज जैसे फिसलती चली गई और अगले ही पल वह फोन पर फूट-फूट कर रोने लगा। उसका रोना नंगे पांव किसी वीराने में भटकते बच्चे का विलाप था, जो हर सुनने वाले के दिल को चीर सकता था। वह घुटती सांसों के बीच बिखरे लफ्जों में कहने लगा, “माँ-बाबा ने तो यहाँ तक कह दिया है… कि अब आप हमारे लिए म… म… मर चुकी हो।”

यह सुनते ही रूहानी के भीतर कुछ चटक कर टूट गया। उसकी आँखों से आँसू ऐसे बहने लगे जैसे किसी सूखी नदी को अचानक बाढ़ ने छू लिया हो। वह चाहकर भी खुद को रोक नहीं सकी। लेकिन भाई उसकी रोती हुई आवाज़ न सुन ले, इसलिए उसने अपने होठों को दांतों के बीच जकड़ लिया, इतना ज़ोर से कि शायद खून भी छलक आया हो… पर दर्द का एहसास उस पल उसके दिल के टूटने के आगे बौना था।

फोन के उस पार यश की आवाज़ फिर आई, हिचकियों के बीच काँपती हुई, मासूम और बेबस, “दीदी, तुम मेरे लिए कभी नहीं मर सकती… माँ-बाबा ने कितनी आसानी से कह दिया… दीदी, माँ-बाबा ऐसा कैसे कर सकते हैं?”

उसके शब्द रूहानी के दिल में गहरी दरारें डालते जा रहे थे, जैसे बर्फ़ की एक शांत झील अचानक भीतर से टूटने लगे। वह कुछ कहना चाहती थी, कुछ ऐसा जो यश के भी टूटे हुए दिल को सहला दे, उसे यह यकीन दिला दे कि प्यार कभी नहीं मरता, कि रूह कभी अलग नहीं होती। लेकिन उसकी जुबान जैसे पत्थर बन गई थी, शब्द गले में अटक कर रह गए।

तभी यश के तरफ से रूहानी को फोन पर अचानक एक सख्त, तीखी आवाज़ आई, “यश! किससे बात कर रहे हो?”

उस आवाज़ ने जैसे दोनों के होश उड़ा दिए। यश एकदम सहम गया, उसकी साँसें रुक-रुक कर चलने लगीं और रूहानी का तो गला ही सूख गया, जैसे किसी ने उसके भीतर के सारे पानी को सोख लिया हो।

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क्या अद्वैत उस कमरे में दबी किसी भूली हुई सच्चाई से फिर टकराने वाला था?

क्या रूहानी के अतीत की कोई दरार अब वर्तमान को भी निगलने वाली थी?

वो तीखी आवाज़… क्या एक नया तूफान दरवाज़े पर दस्तक दे रहा था?

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