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  • अधूरी इबादत भाग~43

    अधूरी इबादत भाग~43

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    भाग~43 फासलों के बीच हम 

     

    काम्या रैना… एक ऐसा नाम जो किसी पहचान की मोहताज नहीं था। मशहूर फैशन डिज़ाइनर, कई national और international fashion weeks की consistent शो-स्टॉपर, luxury lifestyle magazine के कवर पर चमकता चेहरा और Pune के सबसे रईस इलाके में बने उस glass-walled penthouse की रानी… जहाँ से शहर की चकाचौंध रातों में उसकी ही तरह तन्हा चमकती दिखती थी।

    सिल्क की emerald green slit gown, six-inch high heels, diamond-studded smartwatch, curated nail art और एक flawless attitude….. ऐसा लग रह था जैसे काम्या किसी magazine shoot से निकल कर सीधी अपने रूम में आ गई हो। 

    उसके माता-पिता दूसरे शहर में रहते थे, पर दौलत और रुतबे में वो किसी राजा-रानी से कम नहीं थे। 

    और उसका पति? एकांश राठौड़….. 

    फेमस फोटो और वीडियो ग्राफर, जो कभी दुनियाभर की शादियाँ, शूट्स और फिल्म फेस्ट कवर करता था, अब शादी के बाद सिर्फ काम्या के लिए काम करता था। 

    उनकी शादी उतनी ही ग्रैंड थी, जितनी उनकी दुनिया…. लेकिन उस दुनिया के पर्दे के पीछे, कुछ अधूरा सा पल रहा था।

    जब एकांश के चीखने की आवाज़ें घर की साज़-सज्जा में दरार की तरह गूंजने लगीं, तो काम्या का धैर्य टूटा। वो अपने रूम से निकली, बालों में लगा महँगा क्लिप अब भी चमक रहा था, लेकिन चेहरे पर एक भी शिकन की जगह अब लावा बह रहा था।

    उसने देखा एकांश की उथल-पुथल में डूबा हुआ था। उसकी साँसें तेज़ थीं, आँखों में जैसे कोई भटका हुआ तूफ़ान हो जो दिशा भूल गया हो। उसका पूरा जिस्म काँप रहा था, पर वो कंपन भीतर के दर्द का नहीं, किसी खोए हुए पल को दोबारा छू लेने की बेतुकी कोशिश का था। 

    “ये सब क्यों कर रहे हो, एकांश?” उसने पूछा—आवाज़ सख्त, आँखें सवालों से भरी।

    मगर एकांश… वो जैसे किसी और ही दुनिया में था। उसकी आँखों में एक पागलपन था, चेहरा पसीने से तर, होठ बुदबुदा रहे थे। 

    वो जैसे हवा में किसी के होने का भ्रम जी रहा था। और उस भ्रम में, वो नाम निकल गया… “रूहानी।”

    बस… इतना ही सुनना था, काम्या का चेहरा गुस्से से जल उठा, उसने एक झटके में एकांश की बाँह पकड़ी और पूरे ज़ोर से झटकते हुए तमाचा जड़ दिया।

    “होश में आओ, एकांश! You dammit… what the hell is wrong with you!” उसकी आवाज़ दीवारों से टकरा रही थी।

    एकांश ठिठक गया। पलकें फड़कने लगीं। चेहरा जैसे गर्म रेत पर गिरा हो… वो एक पल को देखता रहा, फिर बुदबुदाया, “I’m sorry…” और बिना एक और शब्द बोले अपने कमरे की ओर चला गया। 

    कुछ देर बाद, कपड़े बदलकर, चेहरा धोकर, बाल सँवारकर… वो ड्रॉइंग रूम में लौटा तो देखा, काम्या वही थी, पर अब उसका चेहरा शांत था। पहली बार उसके हाथ में कोई luxury purse नहीं, बल्कि first aid box था। 

    वो professionally composed expression, जो वो runway पर रखती थी, अब भी था… बस उस calmness के नीचे कुछ टूटा हुआ तैर रहा था।

    एकांश चुपचाप उसके बगल बैठ गया। उसके चेहरे पर अब कोई ग़ुस्सा नहीं था… कोई प्यार भी नहीं। सिर्फ एक खालीपन था, जो ointment की ठंडक से भी नहीं भर पा रहा था। 

    काम्या उसके और पास खिसक आई, जैसे कई मुद्दों को hold पर रख दिया हो। उसने उसका हाथ उठाया और बहुत नर्मी से, उस जख्मी जगह पर ointment लगाने लगी। उसकी उंगलियाँ expert थीं…. न सख्त, न बहुत कोमल… बस उतनी ही कि घाव भर सके, बिना कुछ कहे।

    कमरे की हवा गाढ़ी हो चुकी थी, जैसे हर साँस किसी अधूरे वादे की राख समेटे चल रही हो। एकांश की उंगलियाँ अभी भी उस पट्टी की गर्माहट महसूस कर रही थीं, जो काम्या ने उसके जख्मी हाथ पर बांधी थी। 

    उसकी नज़रें फर्श पर जमी थीं, लेकिन ज़हन में अब भी रूहानी की छाया गूंज रही थी…. जैसे वो अभी भी वहाँ खड़ी हो, और कोई उसे ज़बरदस्ती वापस खींच रहा हो।

    काम्या के होंठों पर एक फीकी मुस्कान तैर रही थी…. वो मुस्कान जिसमें नमी नहीं, नफ़रत की नोंक छुपी थी।

    “तुम्हारे ज़ख्म की मरहम तो लगा दी, अब दिल के लिए भी कुछ चाहिए?” उसकी आवाज़ हल्की थी, लेकिन हर शब्द किसी surgical blade की तरह काटता चला गया। 

    “या वो कोई और लगाए?”

    एकांश ने आंखें उठाईं, धीमे से कहा, “काम्या… प्लीज़… अभी नहीं।”

    लेकिन उसकी बात पूरी होने से पहले ही काम्या का गुस्सा दहाड़ बनकर फूट पड़ा, “कब? जब तुम पूरी तरह उस Illusion के साथ जीने लगो?”

    उसका चेहरा अब केवल गुस्से से नहीं, अपमान की पीड़ा से भी तप रहा था। उसकी नथुने फड़फड़ा रही थीं, जैसे दिल की आग सांसों के रास्ते बाहर निकलने को मचल रही हो।

    “क्या तुम्हें ज़रा भी अंदाज़ा है कि तुम्हारी ये हालत देखकर कैसा लगता है?” उसकी आँखों में आँसू की नहीं, जवाब की मांग थी।

    एकांश ने हल्की साँस ली, जैसे भीतर कुछ जकड़ रहा हो, “मैंने कभी नहीं कहा था कि मैं परफेक्ट हूं।”

    “नहीं,” काम्या ने दाँत भींचते हुए कहा, “तुमने सिर्फ ये साबित किया है कि मैं irrelevant हूं। तुम्हारे लिए, मैं बस एक नाम हूं… एक well-dressed distraction… nothing more.”

    एकांश की निगाहें अब उसके चेहरे से हटकर सामने की दीवार पर टिक गईं। दीवार पर टँगा वो बड़ा सा मिरर अब उसके अंदर झाँक रहा था। 

    ठंडेपन से उसने कहा, “तुम्हें जो चाहिए था….. status, success, lifestyle…… सब कुछ तो है न। और मैं… एकांश राठौड़… वो भी तो मिल गया न तुम्हें। फिर शिकायत किस बात की?”

    काम्या की आँखों में कुछ काँपा, दर्द की परत में दबा हुआ सच। वो फुसफुसाई, “मैंने तुमसे सौदे नहीं किए थे, एकांश… मैंने तुमसे सच में प्यार किया….. पर तुमने मुझे कभी उस क़ीमत पर चाहा ही नहीं।”

    कुछ पल के लिए कमरे में फिर वही सन्नाटा। 

    एकांश ने नज़रें झुकाईं, जैसे अपने शब्दों की ही सच्चाई उसे कचोट रही हो। उसकी उँगलियाँ आपस में उलझ रही थीं…. जैसे सोच और शर्म एक-दूसरे से टकरा रही हों।

    उसकी आवाज़ आई, धीमी और डूबती हुई, जैसे किसी पुराने कमरे में कोई खिड़की खुली छोड़ दी गई हो और अब हवा की सिसकियाँ भीतर घुस रही हों।

    “काम्या… हर किसी का दर्द से जूझने का अपना तरीका होता है,” उसने कहा, मानो ये शब्द नहीं, कोई टूटी हुई ढाल हो जिसे वो अपने खिलाफ उठाने की कोशिश कर रहा हो।

    “मेरा तरीका… शायद थोड़ा उलझा हुआ है, लेकिन… मैं कोशिश कर रहा हूँ, सच में।”

    काम्या का चेहरा अब सख़्त था, लेकिन उसकी आँखों में कोई तूफ़ान हिलोरें मार रहा था। “तुम्हारा ‘तरीका’… एक दूसरी औरत के नाम को बड़बड़ाना है, उसे अपने hallucinations में छूना… और फिर sorry बोलकर बाथरूम में छुप जाना?”

    एकांश का सिर झटका, “रूहानी कोई ‘दूसरी औरत’ नहीं है।”

    उस एक वाक्य ने जैसे काम्या के भीतर किसी मृत volcano को जगा दिया। उसने एकदम शांत लहजे में कहा, “हां… और मैं कभी पहली नहीं थी।”

    वो उठी। हाई हील्स की खनक ने जैसे कमरे की चुप्पी को चीर दिया—हर कदम ऐसा, मानो फर्श पर नहीं, किसी गहरे राज़ पर रखा जा रहा हो। 

    एकांश वहीं बैठा रह गया….. उस खाली first-aid box के पास, जो अब पट्टी से ज़्यादा, उसके अंदर की टूट-फूट की गवाही दे रहा था।

    फिर उसने जेब से मोबाइल निकाला। उंगलियाँ काँप रही थीं, जैसे दिल और दिमाग आपस में लड़ रहे हों। उसने फोन अनलॉक किया। Contacts खोले।

    स्क्रॉल किया…

    “Ruhani 💔” 

    नाम अब भी सेव था, delete कभी कर नहीं पाया था।

    उसने स्क्रीन को कुछ सेकंड देखा, जैसे उसमें रूहानी की आँखें झाँक रही हों… पूछ रही हों,”अब क्यों?”

    थोड़ी देर वो यूँ ही बैठा रहा। कमरे में सिर्फ मोबाइल की नीली रौशनी थी और अचानक, उसने call button दबा दिया।

    Tring… tring… tring…

    हर रिंग एक heartbeat जैसी थी, धीमी, भारी, और किसी अनकही उम्मीद से भरी।

    फिर… क्लिक। call connect हो गया। पर दूसरी तरफ… सन्नाटा।

    न कोई “Hello” न कोई सांस न कोई हलचल….. बस… एक breathing silence जैसे किसी बंद कमरे में कोई अपनी साँसें रोककर सुन रहा हो।

    एकांश की उँगलियाँ काँप गईं। उसने धीमे से फुसफुसाया, “रूहानी…?”

    कोई जवाब नहीं।

    ——————————-

    क्या उस breathing silence के पीछे वाकई कोई था… या ये भी एकांश की उसी उलझी हुई दुनिया का हिस्सा था?

    अगर रूहानी सच में सुन रही थी… तो अब वो क्या सोच रही होगी?

    काम्या के हर कदम की खनक अब किसी गहरे राज़ को जगा रही है… क्या वो राज़ कभी उजाला देखेगा?

     

  • अधूरी इबादत भाग~42

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

    भाग~42 क्या वो लौट आई? 

     

    रूहानी कैब की खिड़की से बाहर देख रही थी, शहर की भीड़ में खोए चेहरों को, तेज़ भागती गाड़ियों को और उन धूप की किरणों को जो शाम होते-होते सुनहरी उदासी में बदल जाती थीं। 

    मन में हल्की-सी थकावट थी, पर साथ ही एक जिद भी थी, टूटे दिन की टहनियों से उम्मीद के फूल उगाने की कोशिश।

    स्टूडियो की ओपनिंग सेरेमनी की तारीख तय हो चुकी थी, और उसने सोचा कि अगर उसी दिन मीना की बेटी गुनगुन का बर्थडे भी मना लिया जाए, तो बच्ची की आँखों में अपनापन महसूस करने की चमक भी आ जाएगी।

    “वैसे भी… मैं गुनगुन के लिए ड्रेस डिज़ाइन तो कर ही रही हूँ,” रूहानी ने खुद से बुदबुदाते हुए सोचा, एक मुलायम मुस्कान के साथ।

    कैब रुकी, वो उतरी, हाथ में कुछ सैंपल्स और पर्स थामे, और धीरे-धीरे घर की ओर कदम बढ़ाए। दरवाज़ा खोलते ही सबसे पहले हॉल की खामोशी ने उसका स्वागत किया, वो खामोशी जो किसी की कमी से ज्यादा, किसी सोच में डूबे होने का संकेत लग रही थी। 

    अद्वैत वहां नहीं था, जबकि आमतौर पर इस वक़्त वो वही होता था, कॉफी मग के साथ या किसी किताब में उलझा हुआ।

    रूहानी ने मोबाइल निकाला, कॉल लगाया। पहली ही बेल में उठा लिया अद्वैत ने।

    “कहाँ हो?” उसने सीधा पूछा।

    “स्टडी रूम में,” अद्वैत की आवाज़ आई, थोड़ी थकी हुई, पर हमेशा की तरह स्थिर।

    “नीचे हॉल में आओगे? कुछ बात करनी है,” रूहानी ने कहा, आवाज़ में ना कोई झिझक थी, ना कोई बनावट, सिर्फ़ एक सादगी थी, जिसमें रिश्तों के सारे स्पेस टंगे हुए थे।

    फोन कटते ही उसने काँच की मेज पर सैंपल्स फैला दिए, हर रंग, हर डिज़ाइन जैसे गुनगुन के चेहरे की मुस्कान की कल्पना बनकर उसके आगे बिछ गए थे। 

    मन में अब भी हल्की हिचकिचाहट थी, न जाने अद्वैत को उसका सुझाव कैसा लगेगा। पर फिर भी, वो जानती थी कि जिन रिश्तों में maturity हो, वहाँ छोटी-छोटी बातें भी बन सकती हैं।

    “काश लोग ऐसे ही छोटी खुशियों को बाँटने में उतना ही उत्साहित हों, जितना कि बड़े इवेंट्स की प्लानिंग में होते हैं,” रूहानी ने बेजान टेबल की ओर देखते हुए कहा, जैसे कोई पेंटिंग अधूरी छोड़कर रंग सोच रहा हो।

    अद्वैत जब स्टडी रूम से नीचे आया, तो उसकी चाल में हमेशा वाली थकान नहीं थी, लेकिन एक अजीब-सी उदासी उसके चेहरे पर छाई हुई थी। 

    रूहानी सोफ़े पर बैठी हुई थी, सामने मेज़ पर इनविटेशन कार्ड और कुछ सैंपल्स फैले थे। कमरा हल्के पीले लैंप की रोशनी में डूबा हुआ था, जो दोनों की मौजूदगी को और भी गहरा बनाता जा रहा था।

    अद्वैत ने सीधे रूहानी के चेहरे को देखकर पूछा, “क्या बात करनी थी अभी? डिनर का टाइम तो वैसे भी होने वाला है।”

    रूहानी ने नज़रें उठाईं, फिर शांत लहजे में कहा, “इसीलिए तो अब बात करनी सोची… क्योंकि तुम तो डिनर के टाइम कभी बात नहीं करते हो?”

    उसकी आवाज़ में शिकवा नहीं था, बस एक स्मृति थी, उन नियमों की, जो दोनों ने बिना ज़्यादा कहे बना लिए थे।

    अद्वैत थोड़ा मुस्कराया, “तो आज तुमने मुझे नियम तोड़ने से पहले बुला लिया?”

    रूहानी ने नजर झुकाकर कहा, “शायद… या शायद ये भी एक रूल है जो मैंने खुद के लिए बना लिया।”

    वो उठी और मेज़ से एक इनविटेशन कार्ड उठाकर अद्वैत की ओर बढ़ाया।

    “ये लो… तुम्हारे लिए,” उसने कहा।

    अद्वैत ने कार्ड लिया, उस पर उंगलियाँ फिराईं, जैसे हर अक्षर को महसूस करना चाहता हो।

    “Well… thank you, इतनी बड़ी रकम देने के लिए,” रूहानी बोली, “और तुमने actual reason भी नहीं पूछा, पता नहीं क्यों… लेकिन मैं ही बता देती हूँ। मैंने विमान नगर के पास धनौरी में अपना नया स्टूडियो खरीदा है stich & soul।”

    अद्वैत ने कार्ड को देखा, फिर उसकी तरफ़ नज़रें उठाईं, बिलकुल खाली, जैसे उसका मन कुछ पलों के लिए वहीं अटका हो गया हो।

    “दो दिन बाद मेरे studio की opening ceremony है,” रूहानी ने धीमे से जोड़ा।

    वो बोल रही थी, लेकिन आँखें बार-बार अद्वैत के चेहरे पर टिक जा रही थीं, जैसे कुछ खोज रही हो वहाँ।

    “तो… तुम्हें इनवाइट करना बनता है,” उसने मुस्कराते हुए कहा, “आख़िर कुछ तो रिश्ता है हमारा… नाम का ही सही।”

    फिर हल्का सा रुककर, जैसे खुद से कह रही हो, “मतलब… कुछ मर्यादाएँ तो निभानी पड़ती हैं, है न?”

    अद्वैत कुछ नहीं बोला। उसके होंठ थोड़े खुले थे, लेकिन शब्द कहीं अटक से गए थे।

    “Chief guest के तौर पर आ सकते हो,” रूहानी ने हिम्मत से कहा, “I mean… अगर तुम्हारे schedule में fit हो।”

    वो पल थोड़े अजीब थे, एक formal आमंत्रण, जो उस रिश्ते के भीतर से निकला था जिसमें कभी personal होने की इजाज़त नहीं थी।

    अद्वैत की चुप्पी देख रूहानी खुद ही हँस पड़ी, एक हल्की, almost sarcastic हँसी।

    “Oh sorry, I forget…” उसने कहा, “तुम अपनी fee भी तो लोगे, right?”

    अद्वैत की भौंहें थोड़ी उठीं, लेकिन अब भी उसने कुछ नहीं कहा।

    “So… Mr. Bestselling Writer, Mr. Adwait Awasthi… आप कितना charge करेंगे?” उसकी आवाज़ में अब एक playful taunt था, जो वो अक्सर खुद को ढाल देने के लिए इस्तेमाल करती थी।

    फिर कुछ याद आया उसे, और उसका चेहरा थोड़ा गंभीर हो गया।

    “Ouch,” उसने कहा, “मैं तो सही में भूल गई… तुम तो यही बोलोगे ना कि ‘मेरे ही पैसे मुझे वापस कर रही हो?’”

    अद्वैत की आँखें अब उसकी तरफ़ सीधी टिक चुकी थीं, पर होंठ अब भी बंद थे।

    “Don’t worry,” रूहानी ने कंधे उचकाते हुए कहा, “मेरी little savings हैं… उसमें से दे दूँगी।”

    उसके चेहरे पर एक pride थी, लेकिन उस pride में एक अकेलापन भी छुपा था, जैसे वो दुनिया को साबित करना चाहती हो कि वो खुद के लिए काफी है, पर उसके भीतर कहीं एक कोना अब भी चाहता था कि कोई बिना कहे उसे थाम ले, बिना शर्तों के।

    अद्वैत ने कार्ड को देखा, फिर उसकी ओर बढ़ा, एक पल को कुछ कहने के लिए होंठ खुले, लेकिन वो फिर रुक गया।

    कमरे की हवा थोड़ी भारी हो गई थी, जैसे शब्दों के बजाय अब खामोशियाँ ही संवाद कर रही हों।

    और रूहानी?

    वो वही खड़ी थी, अपनी बनाई हुई सीमाओं के भीतर, फिर भी उम्मीद से थोड़ा आगे… जैसे चाहती हो कि इस बार कोई रेखा पार कर जाए… सिर्फ़ एक बार… बस एक बार।

    °°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°

    एकांश ने जैसे ही वो आवाज़ सुनी, उसकी पलकों की सिलवटें थरथरा उठीं, जैसे बरसों से सूखे पड़े किसी पुराने खत के अक्षर अचानक ज़िंदा हो उठे हों।

    गर्दन धीमी-सी हरकत में उठी, मानो उसे डर हो कि अगर ज़रा भी जल्दी की, तो वह मंज़र बिखर जाएगा। और फिर… उसने देखा।

    वो वही थी …. रूहानी।

    उसके सामने खड़ी, बिल्कुल वैसी ही जैसे उसकी यादों में थी, वही मासूम आँखें, जिनमें एक वक़्त उसकी पूरी कायनात सांस लेती थी। 

    वही धीमी साँसें, जो कभी उसके दिल की धड़कनों से ताल मिलाया करती थीं और वही हल्के मुस्कुराते होंठ, जिनमें उसकी ज़िन्दगी की सबसे गहरी तसल्ली लिपटी थी।

    “एकांश…” वो बोली, बेहद नर्मी से, जैसे किसी टूटते हुए सपने की आवाज़ हो, धीमी, लेकिन सीधी दिल में उतर जाने वाली।

    एकांश के भीतर कुछ दरक गया। उसका पूरा वजूद जैसे किसी पुराने मंदिर की मूर्ति की तरह थरथरा उठा, जिसमें सालों से किसी ने आस्था नहीं जगाई थी। 

    वो उठ खड़ा हुआ और धीमे-धीमे उसके पास गया। कांपते हाथों से उसके चेहरे को छूने लगा…. उसके गाल, उसकी ठोड़ी। हर स्पर्श में वो अपने टूटे हिस्सों को जोड़ने की कोशिश कर रहा था।

    वो रो नहीं रहा था, लेकिन उसकी आँखें… जैसे किसी अंधे कुएँ में उतरी हुई थीं….. गहरी, नम, और खोई हुईं। वो अब शब्दों में नहीं, सिर्फ स्पर्श में जी रहा था। जैसे ज़िन्दगी ने भाषा छोड़ दी हो।

    रूहानी चुप रही। ना कोई विरोध, ना कोई सवाल। जैसे वो कोई हक़ीक़त नहीं, एकांश की टूटी हुई कल्पना की सजीव मूर्ति हो…. जो सिर्फ उसके लिए वहाँ खड़ी थी।

    एकांश ने उसे बाँहों में खींच लिया। उसकी साँसें अब तेज़ थीं, अधूरी थीं। उसके होठों ने उसकी त्वचा को छुआ…. माथे से होते हुए उसकी गर्दन तक। 

    हर चुम्बन में एक अधूरा वादा था, हर साँस में एक बुझता हुआ इश्क़। एक वो इश्क़ जिसे वक़्त ने अधूरा छोड़ दिया था, और आज ये लम्हा जैसे उसे पूरा करने आया था।

    “तुम मेरी हो… हमेशा से,” वो बुदबुदाया, उसकी गर्दन में मुंह छुपाए हुए, “अब कोई फ़ासला नहीं… कोई वादा नहीं… बस तुम और मैं…”

    लेकिन…

    जैसे ही उसके होठ नीचे फिसले, जैसे ही उसका स्पर्श उस सरहद की ओर बढ़ा जहाँ इज़्ज़त और इच्छा की लकीरें धुंधली पड़ने लगती हैं…

    चटाक!!

    एक ज़ोरदार तमाचा उसकी दुनिया को झकझोर गया। जैसे कोई शीशा हो, जिसमें वो रूहानी को देख रहा था और अचानक किसी ने उसे पत्थर मार दिया हो। सब कुछ चकनाचूर।

    वो पीछे हटा। चेहरा सुलग उठा, और उसकी आँखों ने काँपते हुए सामने देखा …. 

    वो रूहानी नहीं थी।

    उसका चेहरा गुस्से से तमतमाया हुआ, आँखों में जलता हुआ तूफ़ान। उसकी नथुने फड़फड़ा रही थीं, जैसे हर साँस एक ज्वालामुखी को थामे हुए हो। उसने कसकर एकांश की बाहें झटक दीं…. जैसे किसी ज़हर को अपनी त्वचा से दूर फेंक रही हो।

    “होश में आओ, एकांश! You dammit… what the hell is wrong with you!” उसकी आवाज़ में वो सब कुछ था… जलन, गुस्सा, और टूटता हुआ भरोसा।

    एकांश वहीं खड़ा रह गया। जैसे किसी सपने से गिर पड़ा हो… हकीकत की सख़्त ज़मीन पर, नंगे पाँव, बेआवाज़।

    उसके हाथ अब भी हवा में थे… किसी को छूने की मुद्रा में, लेकिन अब वहाँ कोई नहीं था। 

    ——————

    क्या अद्वैत उस इन्विटेशन कार्ड के साथ रूहानी के जज़्बात पढ़ पाएगा, या फिर वो भी उस रिश्ते की तरह अनकहे रह जाएंगे? 

    क्या एकांश वाक़ई रूहानी को देख रहा था… या बस अपनी ही अधूरी चाहत को छूने की नाकाम कोशिश कर रहा था? 

    कौन थी वो… जो एकांश की बाँहों में थी? 

     

  • अधूरी इबादत भाग~41

    अधूरी इबादत भाग~41

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    भाग~41 ये सब क्यों? 

    शाम ढलने को थी और स्टूडियो की हल्की रोशनी अब गोधूलि की परछाइयों में घुलने लगी थी।

    रेनोवेशन का काम लगभग पूरा हो चुका था….. हर दीवार अब सफेद नहीं, बल्कि उम्मीद की तरह उजली लग रही थी और हर कोना जैसे एक नई शुरुआत की सुगंध लिए हुए था।

    मगर रूहानी का चेहरा आज फिर वही पुरानी थकान ओढ़े हुए था, जिसे किसी ने फिर से भीतर तक झकझोर दिया हो।

    वो अपनी ही साँसों में उलझी हुई थी, जब अचानक मोबाइल की स्क्रीन पर एक नोटिफिकेशन चमका। एक अनजाना नंबर… और सिर्फ़ एक लाइन: “तुम मुझसे एकांश को कभी नहीं छीन सकती।”

    जैसे किसी ने उसके सीने पर ठंडा पानी डाल दिया हो। पलभर को तो उसका मन किया कि फोन वहीं दीवार पर फेंक दे। मगर फिर, जैसे आत्मा में जमी कोई पुरानी आदत जाग उठी…. खामोश रहना, जवाब न देना… सिर्फ़ महसूस करना। 

    वो थक गई थी, हर बार साबित करते करते कि वो किसी को छीनने नहीं, बस खुद को ढूँढने निकली है।

    धीरे से उसने एक स्टूल खींचा और उस पर बैठ गई। उसकी उंगलियाँ काँप रही थीं, पर उसने उन्हें रोका नहीं। फोन का कैमरा ऑन किया। फ्रेम में स्टूडियो आया…. अभी अधूरा, पर उसका।

    एक-एक करके उसने तस्वीरें खींचीं…. वो कोना जहाँ वर्क टेबल होगा, वो दीवार जहाँ स्केचिंग बोर्ड टंगेगा और वो छत जो कुछ कहती सी लगती थी।

    इंस्टाग्राम खोला, कुछ पल देखा स्क्रीन को… फिर धीरे से टाइप किया….

    Chapter 2 – Her Comeback is Her Voice. #RuhaniReturns 

    उसने पोस्ट बटन दबाया। जानती थी, फिर लोग बात करेंगे। कुछ उसे नौटंकी कहेंगे, कुछ एकांश का नाम जोड़कर तमाशा बनाएँगे।

    पर इस बार रूहानी ने खुद से कहा, “कभी-कभी जवाब देना, जीत नहीं होती… जवाब न देना, शांति होती है।”

    स्टूल पर बैठी वो लड़की उस शाम कोई एलान नहीं कर रही थी, बस अपने टूटे हिस्सों को फिर से जोड़ रही थी…. किसी आवाज़ के बिना, किसी शोर के बिना… पर बहुत कुछ कहती हुई।

    °°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°

    कमरे का दरवाज़ा इतनी ज़ोर से बंद हुआ कि दीवारें तक काँप गईं, जैसे किसी ने भीतर छुपे तूफ़ान को बंद करने की नाकाम कोशिश की हो। 

    एकांश राठौड़ अपने ही घर में दाख़िल हुआ, लेकिन उसके क़दमों की आवाज़ में ऐसा कंपन था, जैसे वो घर नहीं, किसी जंग के मैदान में दाख़िल हो रहा हो।

    उसकी आँखों में जलन थी, पर आँसू नहीं… वो बर्दाश्त नहीं कर पा रहा था कि रूहानी इतनी आसानी से उसकी ज़िंदगी से निकलकर, अब अद्वैत की ज़िंदगी में घुल गई है। 

    उसकी साँसें तेज़ थीं, लेकिन वो दौड़कर नहीं आया था, वो गुस्से से उबलते खून के साथ आया था, उस सवाल के साथ जो उसे नज़रें झुकाने नहीं दे रहा था और न ही किसी जवाब को स्वीकार करने की इजाज़त दे रहा था।

    वो ड्राइंग रूम में पहुँचा और जैसे ही उसने सामने शीशे में खुद को देखा, उसकी आँखों की नसें तनी हुई दिखीं। होंठ कसे हुए, जबड़े की मांसपेशियाँ खिंची हुईं, और आँखों में एक साया था… चोट खाई हुई मोहब्बत का, अपमानित आत्मा का, और सबसे बढ़कर, छले गए दिल का।

    “नहीं… ये नहीं हो सकता! ये… ये नहीं हो सकता!” एकांश की आवाज़ किसी टूटते हुए शीशे जैसी थी, चुभती, बिखरती और हर कोने में फैलती।

    “रूहानी… तुझे हक किसने दिया, हाँ? कौन सा वक़्त था जिसमें तूने मुझे पीछे छोड़ना मंज़ूर कर लिया?” उसके स्वर में कोई तर्क नहीं था, सिर्फ़ एक बेकाबू, बेबस चीख़ थी, जो उसके सीने से निकलकर दीवारों पर टकरा रही थी।

    “मैंने तो तुम्हें कभी बाँधने की कोशिश नहीं की, पर तुमने तो मुझे जीने भी नहीं दिया। जब तुम मेरे साथ थी, तो क्या मैं तुम्हें छूने की कोशिश करता था? करता क्या… तुमने कभी मौक़ा ही नहीं दिया। ‘शादी के बाद’ — ये तेरी टेप रिकॉर्डर वाली लाइन थी, रूहानी!” उसकी आवाज़ अब काँपती नहीं, फट रही थी।

    उसने एक कुर्सी की तरफ़ देखा, पर हाथ बढ़ाने से खुद को रोक लिया। नहीं, ये उसका घर नहीं था…. ये उसकी पत्नी का था, और उसे अपनी औक़ात याद थी।

    “मैंने तो सोचा था… जब तुम सुननोगी कि मैंने शादी कर ली है, तब तुम्हारी नींदें उड़ जाएँगी। तुम्हारे आँसू तुम्हारे गाल नहीं, तुम्हारी आत्मा से बहेंगे। तुम भागती हुई मेरे पास आओगी… पूछेगी क्यों किया ऐसा? तुम टूटी हुई होगी, पागलों की तरह… मेरी तस्वीरें देखोगी, हमारे पुराने मेसेज पढ़ोगी, रातों को जगकर खुद को कोसोगी कि क्यों मुझे छोड़ा।”

    एकांश अब आगे बढ़ा, दीवार के पास खड़ा होकर ज़ोर से घूंसा मारा। एक झन्नाटेदार आवाज़ हुई, और उसके नखूनों के नीचे से खून की पतली धार बहने लगी।

    “लेकिन नहीं… तुम तो जैसे मेरी ज़िंदगी से निकलकर सीधी अद्वैत की बाँहों में चली गई। और वो भी… कौन…. मेरा भाई। मेरा अपना खून… जिसे मैंने हमेशा भगवान की तरह चाहा, उसकी आँखों में अपने लिए इज़्ज़त देखी… और तू उसकी पत्नी बन गई?” उसकी आवाज़ अब रुकती-रुकती चल रही थी, जैसे हर शब्द कोई नश्तर हो जो ज़ुबान से निकलते ही दिल में उतर जाता हो।

    “तुम्हारे उस वादे का क्या, रूहानी? कि शादी से पहले कुछ नहीं… कुछ भी नहीं। उस दिन, जब मैंनेतुम्हे छूना चाहा था, तुमने कहा था, ‘एकांश, शादी के बाद सबकुछ तुम्हारा होगा।’ 

    “और आज? आज तुम उसके बिस्तर पर सोती हो, उसके साथ साँसें बाँटती हो? तो क्या अब तुम पूरी तरह से उसकी हो चुकी है? क्या अब तुम केवल उसके नाम से सिसकती हो?”

    उसकी आँखों की कोरें भीगने लगीं, पर ये आँसू प्यार के नहीं थे…. ये अपमान और क्रोध के थे, वो जहर जो दिल में घुला हो पर बाहर बहने की इजाज़त अब मिला हो।

    वो शीशे की तरफ़ गया, वहाँ खड़ा होकर खुद को देखा। उसका चेहरा फूला हुआ, आँखें लाल, और उंगलियों से खून बहता हुआ। उसने एक ग्लास उठाया, साफ़, बर्फ़ जैसा चमकता हुआ और उसे इतनी ज़ोर से पकड़ा कि हाथ की नसों में दर्द उभर आया।

    ग्लास उसके हाथ में धीरे-धीरे चटकने लगा। पहली दरार दिखी, फिर दूसरी। अगले ही पल एकांश की हथेली से काँच के टुकड़े चुभकर उसकी चमड़ी में समा गए। एक पल को उसने खुद को देखा….. खून गिरता हुआ, धीमी बूँदों में, जैसे हर बूँद एक टूटे रिश्ते की कहानी कह रही हो।

    “मैं तुझसे नफरत नहीं कर सकता और खुद से प्यार अब होता नहीं। मैं सिर्फ तुम्हे चाहता हूँ, रूहानी… अब भी… इस कदर कि चाहता हूँ जब तुम केवल मेरे बिस्तर पर हो और मेरे नाम से सिसकियाँ भरे। ये इश्क़ है या पागलपन, मुझे नहीं पता। पर ये जुनून अब मेरी रगों में खून से तेज़ बहता है।”

    धीरे-धीरे उसकी आवाज़ उभरी, मगर इस बार वो चीख नहीं थी, बल्कि राख से निकली कोई धीमी चिंगारी –

    “मुझे लगा था… सच में लगा था, कि तुम मेरा इंतज़ार कर रही होगी, रूहानी। कि एक दिन जब मैं तुम्हारे सामने फिर से खड़ा होऊँगा… तो तुम्हारी आँखों में वही सवाल होंगे, वही तड़प… और फिर मैं… मैं तुम्हें अपना बना लूंगा। हमेशा के लिए… बिना किसी शर्त के।”

    उसकी आवाज़ टूट गई थी, मगर उसने खुद को ज़बरदस्ती संभाला। 

    उसने एक गहरी साँस ली, घाव से खून साफ़ किया और सोफ़े पर बैठ गया। उसका चेहरा अब शांत था, पर वो शांति वैसी थी जैसे किसी शेर ने खुद को पिंजरे में बंद कर लिया हो।

    मैं तुझे छीनना नहीं चाहता… पर खुद को खोते नहीं देख सकता। अगर तुम मेरी नहीं हो सकती… तो याद रखना, रूहानी… तुम किसी और की भी नहीं होगी, कभी नहीं….।”

    कमरे में सन्नाटा फिर से फैल गया। खिड़की के बाहर हवा चल रही थी, पर अंदर की हवा अब ठहरी हुई थी…. जैसे वो एकांश की साँसों की गवाही दे रही हो।

    वो सोफ़े पर सिर टिकाए बैठा था, आंखें बंद, और उस चेहरों की भीड़ में एक ही शक्ल थी…. रूहानी। 

    उसकी साँस, उसका घाव, उसकी चाहत… और अब… उसकी जंग।

    होंठों पर कसमसी तीखी सांसें… लेकिन भीतर कोई कोहराम अभी थमा नहीं था।

    तभी…. एक नर्म, मगर काँपती हुई आवाज़ ने सन्नाटा चीर दिया।

    “ये सब क्यों कर रहे हो, एकांश?”

    —————-

    क्या रूहानी वाक़ई भूल चुकी है… या अब भी किसी कोने में उसकी साँसें एकांश के नाम से धड़कती हैं?

    उस आवाज़ के पीछे कौन था?…. क्या वाक़ई रूहानी लौट आई थी… या ये सिर्फ़ एकांश की टूटती चेतना का धोखा था? 

    क्या अद्वैत जान पाएगा कि उसकी दुनिया में जो सबसे करीबी दो लोग हैं… वो अब एक चुपचाप तूफ़ान के बिल्कुल किनारे खड़े हैं? 

  • अधूरी इबादत भाग~40

    अधूरी इबादत भाग~40

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    भाग~40 पन्ना नंबर तेईस 

     

    एकांश के घर से बाहर निकलते ही जैसे कमरे में ठहरे हुए हर शब्द की गर्मी भी साथ चली गई हो। रूहानी ने दरवाज़ा धीरे से बंद किया, फिर सीधे जाकर डाइनिंग टेबल की कुर्सी पर बैठ गई…. जैसे उसकी टाँगों में अब खड़े रहने की ताक़त नहीं बची हो। 

    उसने एक ही साँस में पूरा गिलास पानी पिया, गले से नीचे उतरते पानी की ठंडक जैसे उसके भीतर उठ रहे तूफ़ान को थोड़ी देर के लिए थामना चाह रही थी। लेकिन उस ठंडेपन से भी उसका भीतर नहीं बुझा… आँखें अभी भी भटकी हुई थीं, जैसे कुछ खोज रही हों… या कुछ खो चुकी हों।

    उसकी नज़र सामने पड़े सैंडविच पर गई, जो अधूरी माफ़ी की तरह प्लेट में पड़ा था। अद्वैत ने बनाया था…. सादगी से भरा, न बोल सकने वाली क्षमा जो शब्दों से नहीं, हर काटे गए टुकड़े से झलक रही थी। 

    रूहानी ने उसे उठाया और खाना शुरू कर दिया, बिना अद्वैत की तरफ़ देखे। सैंडविच अब ठंडा हो चुका था, बिल्कुल उसी तरह जैसे उनके बीच की वो ऊष्मा जो कभी समझदारी से उपजी थी, अब चुप्पियों में बर्फ़ बनकर पिघल रही थी।

    अद्वैत ने कॉफ़ी का मग उठाया, कुछ कहने की हिम्मत जुटाते हुए बोला, “मैं रीहीट कर देता हूँ…”

    रूहानी की आवाज़ आयी… बहुत नर्म, मगर भीतर से साफ़ कटती हुई, “रहने दो… आइस हो फ्रिज में तो वही डाल दो।”

    वो नहीं चाहती थी कि अद्वैत कुछ पूछे….. न एकांश के बारे में और न उन दोनों के बीच के उस रिश्ते के बारे में। 

    इस घर में बहुत कुछ था जो कहे बिना भी भारी था और उन शर्तों के मुताबिक, सवाल करना मना था। 

    अद्वैत चुपचाप उठा और जैसे आदेश मिला हो, वैसे ही फ्रिज से आइस निकालकर कॉफ़ी में डाल दी। 

    रूहानी ने सैंडविच खत्म किया, भूख इतनी नहीं थी जितना बेचैनी थी, जो हर निवाले के साथ उसके गले से उतर रही थी। जब भी वो तनाव में होती थी,कुछ ज़्यादा ही भूख लगती थी उसे। 

    नाश्ता पूरा हुआ। प्लेट खाली, मग ठंडा, और उसका चेहरा पहले से ज़्यादा बुझा हुआ।

    “शाम तक लौट आऊँगी,” बस इतना कहा, और दरवाज़ा खोलकर निकल गई….. बिना पीछे देखे, बिना किसी सफ़ाई के, जैसे कोई पन्ना पलट दिया हो जिसमें अब और कुछ लिखना बाकी न हो। 

    अद्वैत वहीं खड़ा रह गया, उस अधूरे वाक्य की तरह, जिसका उत्तर कभी किसी ने माँगा ही नहीं।

    °°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°

    रूहानी ने जैसे ही कैब का दरवाज़ा बंद किया, एक सधे हुए अंदाज़ में बैग से मोबाइल निकाला और रिनोवेशन वाले को कॉल कर दिया। उसकी आवाज़ में एक अजीब-सी ठंडक थी…. वह ठंडक जो अब उसकी पहचान बन गई थी; जैसे हर बातचीत सिर्फ एक डील हो, हर लहजा एक ऑर्डर। 

    “मैं दस मिनट में स्टूडियो पहुँच रही हूँ। टीम टाइम पर आ जाए।” कॉल कटते ही वह खिड़की की ओर मुड़ गई। ट्रैफिक की आवाज़ों के पीछे जैसे कोई पुरानी धुन चल रही थी… धीमी, शांत, बस उसी के लिए बजती हुई। वह धुन, जो उसे अतीत से जोड़ती थी और वर्तमान से काटती भी।

    स्टूडियो इस बार बड़ा था, बिल्कुल नया। एक खुली छत के नीचे फैला हॉलनुमा कमरा, जहाँ हर दीवार, हर कोना एक नई शुरुआत का इशारा दे रहा था। 

    सामने वुडन फ्लोर पर लाइट्स की वायरिंग चल रही थी, दूसरी ओर कपड़ों की कढ़ाई और डिज़ाइनिंग के लिए अलग सेक्शन बन रहा था, और एक कोना फोटोशूट और ब्रांडिंग स्टूडियो में तब्दील हो रहा था।

    दीवारों पर निशान लगते जा रहे थे, जैसे समय खुद वहाँ नए ख्वाबों की रेखाएँ खींच रहा हो। रिनोवेशन टीम अपने-अपने हिस्से का काम करने में जुटी थी…. किसी ने ब्लूप्रिंट फैलाया, कोई लैपटॉप खोलकर प्लानिंग समझाने लगा। सबकुछ योजनाबद्ध, सटीक, ठोस था।

    पर रूहानी?

    वह सबके बीच होकर भी कहीं दूर खड़ी थी…. ना दखल देती, ना कुछ रोकती, बस जैसे किसी पर्दे के पीछे से अपनी ही ज़िंदगी को एक बार फिर रंगते हुए देख रही हो। 

    कुछ देर बाद एक वर्कर ट्रे में जूस के गिलास लेकर आया। एक गिलास उसकी ओर भी बढ़ाते हुए बोला, “मैम, थोड़ा ब्रेक ले लीजिए।” 

    रूहानी ने शुक्रिया कहा, एक हल्की मुस्कान आई, जो अगले ही पल जैसे पिघल गई। स्टूडियो के काँच वाले दरवाज़े से कुछ दूरी पर रखी एक लकड़ी की बेंच पर जाकर बैठ गई।

    पहला घूँट लिया, तो गले से उतरती उस मिठास में एक कसक भी थी। बाहर की चिलचिलाती धूप के बीच, अंदर कुछ ठंडा बह रहा था… लेकिन वह ठंडक जूस की नहीं थी। वह उन यादों की थी जो समय की धूल में दबी थीं, पर अब भी साँस ले रही थीं।

    उसकी आँखें कहीं और ही चली गईं… वहीं पुरानी जगह पर, उस पहले स्टूडियो में जहाँ छत टपकती थी और दीवारें खुद-ब-खुद परतें छोड़ देती थीं। मगर उस कमरे की हवा में कभी मायूसी नहीं होती थी…..

    Flashback

    बारिश की रुक-रुककर गिरती बूंदें जैसे हर उस खामोशी को बुन रही थीं जो रूहानी के भीतर कई महीनों से बिना शब्दों के पनप रही थी। उसका पुराना स्टूडियो…. वही टूटी छत वाला, ईंटों की खुली दीवारों वाला कोना…. जहाँ वक़्त ने कई बार रुक कर साँस ली थी। 

    वहाँ आज फिर वही गंध थी — गीली मिट्टी, गीले रंग और पुराने सपनों की।द

    वो कैनवास के सामने बैठी थी, बाल रबर बैंड में बँधे, एक लट फिर भी जिद पर उतरी हुई थी… बार-बार आँखों के पास आकर उसे चिढ़ा रही थी। दीवारों पर कुछ अधूरी रेखाएँ थीं, जो अभी कहानी नहीं बनी थीं, बस किसी टूटी आत्मा की हल्की दस्तक सी लग रही थीं।

    तभी दरवाज़े पर दस्तक हुई। इतनी धीमी कि जैसे खुद भी यकीन नहीं था कि कोई उसे सुनेगा। रूहानी ने पलटकर देखा….. एक अनजाना चेहरा। मगर अजनबी तो बस दिखता था, उसकी आँखों में जाने-पहचाने सवाल थे।

    “तुम रूहानी हो?” आवाज़ हल्की थी और भीगी हुई।

    “हाँ…” उसने धीरे से जवाब दिया, जैसे किसी पुराने कागज़ को पलटते हुए।

    “ये तुम्हारी स्केचबुक है शायद… बस में छूट गई थी।”

    रूहानी की साँसें थम-सी गईं। वो स्केचबुक, जो वो हर रोज़ अपने दिल की धड़कनों की तरह संभालती थी…. अब उसके हाथों में नहीं, इस अजनबी के पास थी।

    उसने किताब हाथ में ली, काँपती उंगलियाँ जैसे किसी खोए हुए बच्चे को गले लगाना चाहती हों।

    “तुमने… देखा इसे?” उसने संकोच से पूछा।

    वो मुस्कुराया, एक धीमे उजाले की तरह जो किसी बहुत गहरे अंधेरे को समझता हो।

    “देखना तो नहीं चाहिए था मुझे” उसने जवाब दिया, “लेकिन ये पन्ना नंबर 23…. खुद ही अलग होकर गिर पड़ा था…. वही सबसे प्यारा लगा मुझे।”

    रूहानी ने झट से उस पन्ने को पलटकर देखा। 

    वहाँ एक अधूरी लड़की थी…. आँखें बंद, हथेलियाँ फैली हुई… जैसे कुछ माँग रही हो… शायद खुद को।

    “वो मैंने खुद को रचा है,” रूहानी के ज़हन में गूंजा, मगर होंठ चुप रहे।

    उस दिन कुछ नहीं कहा गया ज़्यादा, बस उसने उसे अंदर बुलाया और कॉफी दी। 

    “यहाँ अक्सर बारिश आती है क्या?” उसने पूछा।

    रूहानी ने सिर हिलाया। “यहाँ बारिश नहीं, पुराने दिन आते हैं… और खुद को धो जाते हैं।”

    वो हँसा नहीं, बस देखता रहा… उस दीवार की ओर जहाँ रूहानी की अधूरी स्केच टंगी थी। 

    फिर धीरे से बोला, “मैं एक डॉक्यूमेंट्री बना रहा हूँ… लोकल आर्टिस्ट्स पर। तुम्हें शूट करना चाहता हूँ।”

    रूहानी ने पहली बार किसी को इतना हल्के से अपनी दुनिया में आते देखा था…. जैसे वो दरवाज़ा नहीं खटखटाता, बल्कि साँसों के ज़रिए भीतर उतरता हो।

    “कैमरे से डर लगता है मुझे,” वो मुस्कुराई थी उस दिन।

    “क्यों?” उसने पूछा।

    “क्योंकि वो मुझे वैसी दिखा देता है, जैसी मैं खुद से भी छिपाना चाहती हूँ।”

    वो कुछ पल खामोश रहा, फिर कहा, “तो कैमरे को झूठ बोलना सिखा देंगे। या शायद… सच के लिए थोड़ा प्यार बाँट देंगे।”

    उस शाम के बाद, एकांश सिर्फ उस डॉक्यूमेंट्री का हिस्सा नहीं रहा। वो उसके स्केचों के बीच रहने लगा… कभी पन्नों में, कभी रंगों में, और धीरे-धीरे साँसों में।

    flashback ends

    वो उस दिन को भूल नहीं पाई। ना पन्ना नंबर 23 को और ना उस एकांश को जो पहली बार किसी के सपनों को लौटा कर आया था।

    “काश,” उसने बेंच पर बैठे-बैठे सोचा, “कुछ चीज़ें लौटकर सिर्फ स्केचबुक तक सीमित रहतीं… दिल तक नहीं जातीं।”

    तभी मोबाइल की स्क्रीन चमकी। एक अनजान नंबर से सिर्फ एक पंक्ति….

    “तुम मुझसे एकांश को कभी नहीं छीन सकती। वो मेरा था… और हमेशा रहेगा।” 

    उसका दिल एक लम्हे को रुक गया। उँगलियाँ स्क्रीन पर जमीं रहीं। आसपास सब कुछ चलता रहा….

    वर्कर्स की आवाज़ें, मशीनों की गूंज, ट्रैफिक का शोर….. लेकिन रूहानी के भीतर सन्नाटा उतर आया।

    उसने नंबर दोबारा देखा, पहचानने की कोशिश की… मगर न नाम, न कोई और सुराग।

    पर जो लहजा था… वो अजनबी नहीं था।

    ——————-

    वो मैसेज किसका था, जो एकांश को अपना बता गया…? 

    अगर वो लहजा अजनबी नहीं था, तो क्या रूहानी पहले ही किसी अनजाने झूठ से बंध चुकी थी…?

    क्या रूहानी सच में भूल पाई थी एकांश को… या बस खुद से झूठ बोल रही थी? 

  • अधूरी इबादत भाग~39

    अधूरी इबादत भाग~39

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    भाग~39 कुछ तो छुपा है… 

     

    एकांश के कानों को यकीन नहीं हुआ… सामने खड़ी रूहानी, वही रूहानी, जिसकी आँखों में कभी उसने खुद को देखा था, जिसकी हँसी से उसकी सुबहें जगा करती थीं…. आज वही औरत, अद्वैत की पत्नी कहलाने लगी है?

    उसके ही भाई की पत्नी…..

    फिर भले ही वो आज किसी और का पति है , कोई और औरत जिसके साथ उसने अग्नि के सात फेरे लिए थे…..

    एक पल को तो उसका शरीर सुन्न हो गया, समय जैसे थम गया। उसके चारों ओर की आवाजें मद्धम पड़ गईं और आँखों के सामने सिर्फ रूहानी का चेहरा छाया हुआ था और उसकी मांग में भरा सिंदूर और गले में मंगलसूत्र….. जो चीख-चीखकर कह रहा था कि अब वह किसी और की है। 

    उसने अद्वैत की ओर देखा….. वो अद्वैत जो बचपन से ही उसका हमदर्द रहा, जिसने उसे कभी यह महसूस होने नहीं दिया कि वह उसका सगा भाई नहीं है। 

    एकांश के दिल में अद्वैत के लिए कभी कोई ईर्ष्या नहीं थी… कभी भी नहीं। लेकिन यह… यह बहुत अलग था।

    “इतनी जल्दी?” एक प्रश्न खुद-ब-खुद उसके भीतर से उठा। 

    “भाई ईशिता भाभी को इतनी जल्दी कैसे भूल सकते है? क्या सब कुछ इतना ही आसान था उनके लिए?”

    लेकिन यह सवाल सिर्फ अद्वैत के लिए नहीं था। यह सवाल खुद रूहानी के लिए भी था। 

    वो रूहानी, जिसे वह जानता था…. टूटने के बाद भी मुस्कुराने वाली, मगर भीतर से बिखरने वाली।

    क्या वो सच में इतनी जल्दी आगे बढ़ गई? इतनी जल्दी move on कर पाना क्या उसके लिए इतना आसान था? 

    एकांश के भीतर उठता सवाल जैसे खुद एक दरवाज़ा खोल गया..…. एक पुरानी गली का, जहाँ हर मोड़ पर एक मुस्कान बिखरी थी, हर दीवार पर कोई अधूरी बात टंगी थी।

    flashback 

    रूहानी और उसका वो पुराना स्टूडियो… वही ईंटों से बने कच्चे से कमरे का कोना, जहाँ धूप शाम की तरह उतरती थी और कपड़े के टुकड़ों पर रंग नहीं, सपने चिपकाए जाते थे।

    उस शाम भी कुछ ऐसा ही था। हल्की हल्की बारिश हो रही थी। बाहर का आसमान जैसे उदास था, मगर भीतर की हवा में कोई मीठा साज़ बज रहा था।

    कमरे की एक दीवार पर रूहानी के स्केच चिपके थे…. कुछ अधूरे, कुछ अनगढ़, मगर हर एक में उसका दिल धड़कता था।

    एकांश फर्श पर बैठा था, कैमरा गोद में रखे और सामने खड़ी थी रूहानी… हल्के नीले रंग की इंडो-वेस्टर्न ड्रेस में, बालों को रबर बैंड से ऊपर बाँध रखा था, कुछ लटें उसके गालों पर गिरती थी और उसकी आँखों में वो चमक थी जो केवल अपने सपनों से लड़ने वालों में होती है।

    “इतनी जल्दी क्यों भागती हो तुम हर बार कैमरे से?” एकांश ने मुस्कुराकर पूछा था, उसकी आँखों में खेलती हुई रौशनी उस पर टिकी थी।

    रूहानी ने झिझकते हुए नजर झुकाया, फिर उसके सामने चुपचाप आ खड़ी हुई, “क्योंकि तुम मुझे वैसा देख लेते हो… जैसा मैं खुद को कभी नहीं देख पाई।”

    एकांश की आँखें पल भर को ठहर गईं। उसने कैमरा नीचे रख दिया और धीमे से बोला, “और मैं तुम्हें वैसी देखना ही नहीं चाहता… जैसी तुम खुद को देखती हो।”

    रूहानी के होंठ थरथराए थे। वो कुछ कहती, उससे पहले ही एकांश ने आगे बढ़कर उसकी हथेली थाम ली। उस छोटे से स्पर्श में जो गर्माहट थी, उसने कमरे की नमी को भी छू लिया।

    “कभी-कभी लगता है…” रूहानी की आवाज़ टूटी, “तुम्हारे कैमरे में नहीं, तुम्हारी आँखों में रहना चाहती हूँ मैं।”

    एकांश कुछ पल तक उसे बस देखता रहा। रूहानी के चेहरे पर वो मासूम-सी ख्वाहिश थी, जैसे कोई बच्चा टॉफ़ी नहीं, एक घर माँग रहा हो।

    “तो रहो न,” एकांश ने फुसफुसाकर कहा, “यह आँखें तुम्हारा इंतज़ार करती हैं… हर पल।”

    वो एक क्षण… समय जैसे ठहर गया था। 

    रूहानी ने उसकी ओर देखा…. गहराई से, पूरी तरह, जैसे उसके भीतर उतर जाना चाहती हो, उस नज़्म की तरह, जिसे कोई पढ़ ले।

    रूहानी ने धीरे से कहा, “तुम्हें खो दूँगी, तो शायद सब कुछ खो जाएगा… क्योंकि अब जब दिल धड़कता है, तो लगता है बस तुम्हारे नाम पर ही ज़िंदा है।”

    वो उससे लिपट गई थी, उस पुराने स्टूडियो की भींगी हवा में, उसकी हथेलियों में अपनी साँसें भरते हुए। कोई वादा नहीं था, बस एक साँझ थी, जिसमें रूहानी ने पहली बार खुद को पूरा महसूस किया था, एकांश की बाँहों में।

    उसी शाम एकांश ने जो तस्वीरें खींचीं, वो कभी किसी को नहीं दिखाई। वो उसके स्टूडियो की सबसे नज़दीकी दराज़ में बंद रहीं… क्योंकि उनमें रूहानी नहीं, उसकी पूरी दुनिया कैद थी।

    उसका दिल अब फिर से वही खो गया… उसी स्टूडियो में, उसी हल्की बारिश में… उसी वाक्य पर…. 

    “तुम्हें खो दूँगी, तो सब कुछ खो जाएगा…”

    flashback end 

    एकांश की आँखों में अब सवालों की आग थी। हर लम्हा एक साज़िश सा लगने लगा। दिल किसी पुराने गीत की तरह बार-बार वही धुन गुनगुनाता रहा— “कुछ तो है… कुछ छुपा हुआ है…”

    अब वह पीछे नहीं हटेगा। उसे जानना होगा… हर सच, हर परत… और उस सवाल का जवाब, जो अब उसकी रातों की नींद उड़ाने वाला था।

    “भाई… आप कब रूहानी से मिले?” एकांश की आवाज़ धीमी थी, मगर भीतर से कंपकंपाती हुई निकली। जैसे किसी बंद दरवाज़े को सालों बाद खटखटाया हो। 

    अद्वैत कुछ पल के लिए चुप रह गया। उसे समझ नहीं आया कि कहाँ से शुरू करे, कौन सा सच पहले बताए और कौन सा खुद तक ही सीमित रखे। 

    लेकिन उससे पहले ही एक अजीब-सी बात उसके मन में कौंधी, एकांश ने रूहानी का नाम सीधे क्यों लिया? 

    क्या वो उसे पहले से जानता था? उसकी आँखों में सवाल तैर गए। 

    “तुम… तुम रूहानी को कैसे जानते हो, एकांश?” अद्वैत की आवाज़ अब कुछ सख़्त थी, जैसे दिल में बैठी शंका को अब ज़ुबान मिल गई हो। 

    दोनों की आँखें एक-दूसरे से टकराईं… एक में आश्चर्य था, दूसरे में छुपा हुआ डर। 

    और तभी, जैसे उन दोनों के सवालों को सुनकर कोई तीसरा जवाब देने चला हो, पीछे से एक धीमी, मगर भारी आवाज़ आई……

    दोनों भाई पलटे तो देखा, रूहानी अब धीरे-धीरे उठकर बैठ चुकी थी। उसका चेहरा उतरा हुआ था, आँखों के नीचे नींद और उलझनों की छाया साफ़ दिख रही थी।

    उसकी आवाज़ बस इतनी कि सन्नाटे ने भी कान लगाकर सुनी, “पानी…” वह बस इतना ही कह पाई।

    दोनों जैसे किसी सहज पल में लौट आए हों, बिना कुछ बोले, दोनो अलग-अलग गिलासों में पानी लेकर डाइनिंग टेबल से उसकी ओर बढ़े। 

    अद्वैत के हाथ में कांपती उंगलियाँ थी और एकांश की आँखों में हज़ार सवाल छिपे थे। 

    रूहानी ने नज़रें उठाईं, दोनों के हाथों में पकड़े पानी को देखा…. कुछ ऐसा था उस दृश्य में, जैसे अतीत और वर्तमान पहली बार आमने-सामने खड़े हों।

    पर उसने पानी नहीं पिया। वह तुरंत खड़ी हुई, अपनी कपड़े ठीक करते हुए बोली, “मुझे एक अर्जेंट काम है, निकलना होगा।” 

    और बिना किसी की ओर देखे, तेजी से अपना पर्स उठाया और दरवाज़े की ओर बढ़ गई।

    “रूहानी,” अद्वैत की आवाज़ में चिंता भी थी और असहजता भी, “नाश्ता तो करती जाओ…”

    एकांश ने एक पल सोचा, फिर संयम से कहा, “अगर जल्दी है तो मैं छोड़ देता हूँ तुम्हें… अपनी कार से।”

    रूहानी वहीं दरवाज़े के पास ठिठक गई। उसकी पीठ अब भी उनकी ओर थी, मगर भीतर कहीं कुछ जैसे टूट रहा था। 

    आँखें नम हो चुकी थीं, पर उसने पलकें मजबूती से रोके रखीं। कुछ कहना चाहती थी, पर ज़ुबान साथ नहीं दे रही थी। 

    ठीक उसी पल एकांश का मोबाइल बजा, वह जेब से निकालकर स्क्रीन की ओर देखने लगा। उसकी पत्नी का नाम चमक रहा था। 

    उसने एक हल्की-सी मुस्कान के साथ अद्वैत को गले लगाया, “ठीक है, भाई… फिर जल्दी आऊँगा। घर से कॉल आ रहा है।”

    अद्वैत ने सिर हिलाकर उसे विदा किया, लेकिन वो जो अगला वाक्य एकांश ने हवा में कहा, उसने जैसे कमरे की दीवारों को भी सिहरने पर मजबूर कर दिया।

    एकांश के आख़िरी शब्द उसके कानों में नहीं, सीधे उसकी धड़कनों में गूंजे, “आपकी वाइफ से अच्छे से मुलाकात भी तो नहीं हुई है…. इशिता भाभी को गए हुए अभी ज्यादा वक्त भी तो नहीं गुजरा है,” यह कहकर एकांश मुस्कुराया और दरवाज़े की ओर बढ़ गया। 

    अद्वैत भी बस एक हल्की मुस्कान के साथ सिर हिलाता रहा, जैसे सब कुछ सामान्य हो।

    रूहानी वहीं दरवाज़े की चौखट के पास जैसे जम-सी गई। उसकी साँसें रुक गई थीं। हाथ में पकड़ा पर्स अब हथेली में पसीने से भीग चुका था। 

    शब्द हवा में जैसे फँस गए थे और दिल की धड़कन किसी पुरानी घड़ी की तरह लड़खड़ाने लगी थी।

    “एकांश राठौड़…”

    उसने मन ही मन दोहराया, होंठों के नीचे कुछ काँपा। उसके चेहरे का रंग उड़ गया था, जैसे अचानक कोई परदा हट गया हो और अतीत की नंगी रौशनी आँखों में चुभने लगी हो।

    “अद्वैत अवस्थी का छोटा भाई…”

    वह शब्द जो अब तक केवल नाम थे, अचानक अर्थ लेने लगे थे….. भारी, जटिल, और असहनीय।

    ————–

    “आपकी वाइफ से अच्छे से मुलाकात भी तो नहीं हुई है…” क्या एकांश के शब्दों में कोई छुपा इशारा था… जो रूहानी ही समझ सकी? 

    क्या अब सच सामने आएगा… या सब कुछ और गहराई में दफ़न हो जाएगा?

  • अधूरी इबादत भाग~38

    अधूरी इबादत भाग~38

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    भाग~38 रूहानी… मेरी पत्नी

     

    फ्लैशबैक = एकांश की शादी की रात 

    उस रात महफ़िल अपने पूरे शबाब पर थी। झूमते हुए झूमर, रंगीन रोशनी में चमकती दीवारें और शहनाइयों की मधुर स्वर-लहरियाँ…. सब कुछ जैसे एक परी-कथा की तरह सजा था।

    हर चेहरा मुस्कराता, हर नजरें दुआओं से भरी हुईं, मगर जैसे ही दरवाज़े की भारी चौखट से कदम रखते हुए अद्वैत भीतर दाख़िल हुआ… वक़्त ने धीमी चाल पकड़ ली।

    उसका चेहरा गम्भीर था, कंधे तनकर सीधा चलने वाले थे, मगर आँखों में एक बेचैनी थी जिसे शोर-गुल भी नहीं दबा पा रहा था। कमरे की रौशनी उसकी आँखों से उलझ रही थी, पर उसका ध्यान तो कुछ और ही तलाश रहा था। और तभी…..

    सीढ़ियों के पास, सफेद सलवार में लिपटी एक लड़की, जिसके कंधे काँप रहे थे, जो किसी तूफान से भागकर आई हो….. बिखरे आँसू, धुँधली नज़रें और मन का ऐसा कोलाहल कि उसे खुद भी नहीं पता था वो कहाँ जा रही है।

    और तभी दोनों की टकराहट हुई।

    एक झटका… वो अचानक रुक गए। एक सन्नाटा उनके इर्द-गिर्द पसर गया जैसे महफ़िल की हर आवाज़ थम गई हो।

    दोनों की नज़रें झुकी हुईं, चेहरों का सामना नहीं हुआ, वे दोनों ही नहीं एक दूसरे की तरफ नहीं मुड़े..… मगर दिलों ने कुछ महसूस किया। कुछ जाना-पहचाना, मगर अनकहा।

    लड़की काँपती आवाज़ में बुदबुदाई, “सॉरी…”

    अद्वैत भी धीमे से फुसफुसाया, “इट्स ओके…”

    बस इतना ही। दोनों फिर अपने रास्ते चल पड़े…. जैसे कुछ हुआ ही नहीं।

    यूँ तो अद्वैत सौतेले भाई की शादी में न चाहते हुए भी चला आया था…… केवल अपने भाई की ज़िद के आगे।   

    शादी की सजावटें भले ही चमचमा रही थीं, पर उसके अंदर कुछ बुरी तरह बुझा हुआ था। हँसी-ठहाकों की गूंज में उसके भीतर एक सन्नाटा था, ठंडा और थरथराता हुआ। 

    एकांगी स्नेह से भरे इस माहौल में वह बस एक अधूरा किरदार था, जिसे मंच पर होना तो था, पर संवाद नहीं दिए गए थे। 

    “अरे, देखो तो कौन आया है!”   

    किसी ने ठहाका लगाया और कुछ चेहरे उसकी ओर मुड़ गए।    

    “कौन? ओह! वही… नाजायज़ औलाद!”

    ये शब्द तीर की तरह उसके भीतर उतर गए। नहीं, ये नया नहीं था। हर बार की तरह वही लहजा, वही ज़हर। लेकिन चेहरा… चेहरा निर्विकार रहा। वही शांति, जो उसने वर्षों से ओढ़ रखी थी जैसे आत्मा के जख्मों पर बर्फ की पट्टियाँ बांध ली हों।  

    “अब तो बड़ा लेखक बन गया है… नाम है अद्वैत अवस्थी का!” किसी और ने तंज कसा।  

    “पर एक सच्चाई कभी नहीं बदलेगी, है ना?”  

    कानों तक बात पहुंची, फिर दिल तक, फिर जैसे रगों में ठंडक उतर आई। उंगलियाँ अनजाने में कस गईं, जैसे अपने ही भीतर कुछ थामने की कोशिश कर रहा हो।

    किसी और को जैसे अचानक याद आया…

    वैसे इसकी पत्नी भी मर गई है ना? हाय बेचारी! जाने किस पाप का फल मिला उसे!”  

    इस बार भीतर कुछ टूटा। जैसे किसी ने उसकी आत्मा पर खरोंच मार दी हो। उसकी इशिता… वह जो उसकी ज़िंदगी की इकलौती रोशनी थी, उसके सारे अंधेरों में एक मोमबत्ती। अब वह भी नहीं थी। केवल याद थी…. अधूरी, चुप, और बर्फ सी ठंडी। 

    “और उससे पहले इसकी माँ भी तो छोड़ गई थी इसे…” किसी ने और धीरे कहा, पर पर्याप्त तेज़ कि वो सुन ले। 

    उसने कुछ नहीं कहा। बस एक गहरी साँस ली, मानो उस सारे ज़हर को अपने भीतर पी गया हो। वह जानता था, शब्दों की लड़ाई में उसकी हार पहले ही तय थी। बचपन से लेकर अब तक, कोई भी उसका सच सुनने को तैयार नहीं था। 

    वह अपने सौतेले भाई एकांश की ओर बढ़ा। अपने साथ लाया छोटा सा गिफ्ट बॉक्स उसके हाथ में दिया, जैसे सालों की चुप्पी उसमें बंद कर दी हो। एक हल्की सी मुस्कान दी, जो शब्दों से ज़्यादा कहती थी। 

    एकांश की आँखों में हलचल थी, शायद पछतावा, शायद कुछ कहना जो जुबां तक नहीं आ सका और न ही अद्वैत ने कोई उम्मीद की।

    अद्वैत ने भी कुछ नहीं बोला। वो जानता था, अब किसी स्पष्टीकरण की ज़रूरत नहीं रही। जो रिश्ता था, वो कब का मर चुका था। अब बस उसकी राख रह गई थी….. गर्म, चुप और लाचार। 

    हॉल से बाहर निकलते समय उसके कदम ठोस थे, पर भीतर से वह दरक रहा था। जैसे हर कदम उसके भीतर की एक ईंट गिरा रहा हो।

    दरवाज़े से निकलते हुए उसने एक आखिरी बार पीछे देखा…. भीड़ अब भी हँस रही थी, जैसे उसका आना और जाना महज़ हवा का झोंका था।

    कार में बैठते ही उसने अपना सिर स्टीयरिंग पर टिका दिया, आँखें बंद कर लीं।

    इशिता…” वह बुदबुदाया।

    बस एक नाम… पर उस नाम में पूरा जीवन था। एक खोया हुआ जीवन।

    कार स्टार्ट की और वो उसी तरह चला गया जैसे आया था….. चुपचाप, अनदेखा, और भीतर से खाली। 

    यही उसका नसीब था… आना, देखना, सहना, और बिना शोर किए लौट जाना।

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    वर्तमान…….

    अद्वैत एकांश से खुद को धीरे से अलग किया।, जैसे कोई पुरानी किताब का पन्ना वापस बंद कर रहा हो….. सहेजते हुए, मगर दोबारा न पढ़ने की कसम के साथ। 

    उसकी आँखें अब भी एकांश की आँखों में नहीं देख रही थीं, क्योंकि वहाँ सवाल थे….. ऐसे सवाल जिनके जवाब उसके सीने में पत्थर बनकर जमे हुए थे। 

    “भाई…” एकांश की आवाज़ टूटी, मगर सीधी दिल से निकली, “मेरी शादी की रात… आप अचानक वापस क्यों चले आए थे? बिना बताए… बिना कुछ कहे… मैं आपको पूरे फेरे भर ढूंढता रहा… आप क्यों नहीं रुके?” 

    यह सवाल सुनते ही अद्वैत कुछ पल चुप खड़ा रहा। जैसे कोई पुराना घाव फिर से खुल गया हो। उसकी पलकें भारी थीं, पर उनमें आँसू नहीं, सिर्फ एक पुरानी परछाई थी….. दर्द की, ठुकराए जाने की, और न कह पाने की। 

    “मैं… रुकना चाहता था एकांश,” अद्वैत ने धीमे, थके हुए स्वर में कहा, “लेकिन… वहाँ जो शोर था, वह मेरी आत्मा की चुप्पी को निगलने लगा था। हर मुस्कान मेरे भीतर की किसी स्मृति को घायल कर रही थी।”

    उसने दीवार से नजर हटाकर दूर, खिड़की से बाहर अंधे आकाश की ओर देखा।

    “जब सबने मेरा स्वागत नहीं, मेरी परछाईं को याद किया… जब हर तंज मेरे ज़ख्मों को कुरेदता चला गया… मैं बस वहाँ और नहीं रह सकता था। तुम्हारे लिए आया था, सच में। लेकिन वो लोग…” वह रुका, साँस खींची। 

    उसने एक क्षण को आँखें बंद कीं, मानो भीतर का शोर फिर जाग गया हो।

    अद्वैत ने एक गहरी साँस ली, जैसे भीतर उठते भूचाल को जबरन रोक रहा हो। उसकी आँखें अब भी खिड़की के उस पार किसी अनदेखी दूरी को ताक रही थीं, पर भीतर कुछ बदल रहा था…. शब्दों की जगह अब जज़्बात ले रहे थे। 

    उसने अचानक अपनी उदासी को पीछे धकेला और एक हल्का सा मुस्कान लिए, आवाज़ में पुराना अपनापन लौटाते हुए कहा, “वैसे एकांश… तुम भी तो अपनी शादी के बाद अब मिल रहे हो मुझसे। कितने दिन हो गए, गिनती में आ भी नहीं रहा।”

    उसके स्वर में कोई उलाहना नहीं था, बस एक मीठी सी शिकायत थी… जैसे कोई टूटा हुआ रिश्ता अपनी पहली दरार पर उँगली रखकर मुस्कुराने की कोशिश कर रहा हो।

    एकांश की पलकें झुक गईं, उसकी आँखें भीग गई थीं…… न शर्म से, न अपराधबोध से, बल्कि उस नज़दीकी के एहसास से जिसे उन्होंने खुद ही समय और सन्नाटे के हवाले कर दिया था।

    “मैं आया था, भाई..…” उसकी आवाज़ काँपी, “कई बार… दरवाज़े तक। लेकिन… हिम्मत नहीं हुई कि कॉल बेल बजा सकूँ।”

    अद्वैत की आँखें थोड़ी नरम पड़ीं, जैसे बरसों की बर्फ पिघलने लगी हो।

    एकांश थोड़ा हँसा, हिचकी के बीच में, “लेकिन आज तो तय करके निकला था… कि बात करके ही जाऊँगा। पर ये नहीं सोचा था कि सुबह-सुबह आपके… गेस्ट से भी मुलाकात हो जाएगी।”

    अद्वैत ने उसकी बात सुनी, फिर बहुत ठहरकर, अपनी दोनों भौहें सिकोड़ते हुए, जैसे शब्दों को तोलकर बोल रहा हो, जवाब दिया, “रूहानी मेरी गेस्ट नहीं है।”

    एकांश ने चौंक कर उसकी ओर देखा। हल्की-सी हँसी के साथ चुटकी ली, “तो रूहानी आपकी कौन है, भाई?”

    अद्वैत अब उसकी आँखों में देख रहा था। वहाँ न शरारत थी, न व्यंग्य….. बस एक सीधी, निर्विकार नज़र। जैसे अब और कुछ छिपाना बाकी नहीं था। उसके शब्द सीधे, मगर भारी थे।

    रूहानी मेरी पत्नी है।

    यह सुनते ही एकांश ने एक कदम पीछे ले लिया, जैसे कुछ पकड़ने की कोशिश कर रहा हो जो अब फिसल चुका था। उसके चेहरे पर बहुत सारे भाव एक साथ उभर पड़े….. झटका, अविश्वास, दर्द और कुछ ऐसा, जो वो खुद भी समझ नहीं पाया।

    ————-

    तो क्या उस रात सीढ़ियों के पास काँपती वो लड़की… वही थी?

    फिर क्या छुपा था उन काँपते कंधों, उन बिखरे आँसुओं और उस एक “सॉरी” के पीछे?

    एकांश की आँखों में जो सवाल तैर रहे थे… क्या वो सिर्फ रूहानी को लेकर थे? 

  • अधूरी इबादत भाग~37

    अधूरी इबादत भाग~37

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    भाग~37 उसकी बाँहों में

     

    दरवाज़े पर जैसे ही रूहानी ने एकांश को देखा, उसके भीतर जैसे किसी भूले हुए समय की परछाइयाँ जाग उठीं। उसकी आँखें फैल गईं, होंठ सूख गए, और साँसों ने जैसे चलना बंद कर दिया हो। 

    उसके ज़ेहन में हजारों सवाल एक साथ दौड़ पड़े… “ये यहाँ कैसे? क्या ये मेरा पीछा कर रहा था? क्या अद्वैत को सब बता देगा?” दिल ने डर के थपेड़े खाए और दिमाग खाली हो गया, जैसे हर जवाब उस दरवाज़े के पीछे ही छूट गया हो।

    उसके पैर लड़खड़ाए। घबराहट उसकी साँसों में जहर घोलने लगी और शरीर सुन्न होने लगा। वो गिरने ही वाली थी, जब एक पुरानी आदत की तरह एकांश की बाँहें अचानक उसके चारों ओर आ गईं। उसने बिना सोचे, बिना समझे उसे थाम लिया, जैसे कोई भूली हुई महक अचानक साँसों में लौट आई हो। 

    उसकी बाँहों में रूहानी का शरीर हल्का-सा कांपा, और एकांश के हाथ, जैसे खुद-ब-खुद उसकी पीठ पर फिसलते गए, धीमे-धीमे, सहेजते हुए, जैसे पुराने दिनों की कोई आदत लौट आई हो। 

    उसकी आवाज़ बेहद मुलायम हुई, “रूहानी…” वो नाम जिसे अब उसने शायद अरसो से किसी और की ज़ुबान पर नहीं सुना था, अब किसी पुराने राग की तरह उसके कानों में घुल रहा था।

    अंदर से अद्वैत की आवाज़ आई, “रूहानी, कौन है?”

    मगर रूहानी जवाब नहीं दे सकी। और तब, जैसे किसी अपरिचित चेतावनी से घिरा हुआ, अद्वैत दरवाज़े की ओर आया और उसने देखा।

    उसकी नज़रों के सामने था…. उसकी ‘पत्नी’ किसी और की बाँहों में थी। मगर ये सिर्फ कोई और नहीं था… वो लड़का था जिसकी आँखों में उस वक़्त इतनी बेचैनी थी जैसे रूहानी को खो देने का डर फिर से उसके भीतर सुलग रहा हो। 

    अद्वैत की नज़रों में कुछ टूटा… कुछ बहुत बारीक, कुछ बेहद निजी। वो खुद नहीं समझ पाया कि क्या… लेकिन पहली बार उसने महसूस किया, उसे रूहानी को यूँ किसी और की बाँहों में देखना ठीक नहीं लगा।

    एकांश ने अद्वैत की ओर देखा, उसकी बाहों में अब भी रूहानी थी, जो बेहोश थी। उसकी आवाज़ थोड़ी काँपी, “मैं… मैं इसे कहाँ लिटा दूँ?”

    अद्वैत कुछ कहने वाला ही था…”नीचे उसके कमरे में…” मगर अचानक, जैसे कुछ भीतर से झटका देता है उसे, और वो झूठ बोल देता है, “यहाँ सोफे पर लिटा दो।”

    अद्वैत तुरंत किचन की ओर मुड़ता है, पानी लाने का बहाना बनाकर। उसकी उंगलियाँ पानी के गिलास को थामते हुए थोड़ी कांपती हैं, जैसे किसी अदृश्य दर्द से जूझ रही हों। 

    जब वो वापस आता है, तो देखता है….. एकांश अब भी उसके गाल थपथपा रहा है, धीरे-धीरे, उसी अंदाज़ में जैसे कोई बहुत अपना किसी अपने को होश में लाने की कोशिश करता है।

    अद्वैत वहीं ठिठक जाता है।

    गिलास उसके हाथ में ठहरा रहता है, मगर उसका ध्यान कहीं और है।

    क्यों चुभ रहा है ये?

    वो खुद से पूछना चाहता है…. मगर कोई जवाब नहीं…..

    उसकी नज़रें रूहानी के चेहरे पर ठहरती हैं और वहाँ एक अजीब-सी शांति है, जैसे उसका शरीर उस स्पर्श को पहचानता है… मानता है…

    और उस क्षण अद्वैत को पहली बार अहसास होता है कि शायद उसकी इस ‘कॉन्ट्रैक्ट मैरिज’ के दायरे में अब कुछ ऐसा दाख़िल हो चुका है… जो अनुबंध से परे है।

    अद्वैत ने काँपते हाथों से पानी का गिलास उठाया, और खुद से रूहानी के चेहरे पर कुछ छींटे मारे। 

    एकांश अब भी वहीं बैठा था, उसका हाथ रूहानी के गाल पर था, लेकिन अद्वैत के आने से अब वो हल्के से पीछे हट चुका था, जैसे किसी पुराने हक़ को अब नए मौन से बदलना चाहता हो। 

    अद्वैत के चेहरे पर अब वो शांत मुखौटा नहीं था जो उसने अक्सर दुनिया को दिखाया था। उसकी भौंहें सख़्त थीं, जबड़े भींचे हुए, और होंठों के किनारे काँप रहे थे। उसकी उंगलियाँ अब बार-बार रूहानी के माथे को छूतीं, जैसे यह यक़ीन दिलाना चाहती हों कि सब ठीक है… कि वो यहाँ है… लेकिन हर बार जब रूहानी की पलकें नहीं फड़कतीं, उसका दिल और गहराई में डूबने लगता।

    “रूहानी… प्लीज़… होश में आओ,” उसकी आवाज़ फुसफुसाहट से भी धीमी थी, लेकिन इतनी सच्ची, इतनी भारी कि उस कमरे में हवा भी कुछ पल ठहर गई।

    एकांश ने ये सुना। और वह पल… जिसमें उसने अद्वैत की आँखों में कुछ देखा…. कुछ ऐसा जो शब्दों में नहीं था, लेकिन चीख रहा था… डर, मोह, उलझन… और शायद… एक नामालूम-सा अधिकार। 

    एकांश ने खुद को एक क़दम पीछे खींच लिया, जैसे अब ये दृश्य उसका नहीं था, जैसे कोई अदृश्य लकीर खिंच चुकी हो, जिसे लांघना अब मुमकिन नहीं।

    अद्वैत अब पूरे होश में था…. उसकी गंभीरता किसी जिम्मेदारी की नहीं थी, ये कुछ ज़्यादा था। 

    एकांश की आँखों ने देखा कि कैसे उसके चेहरे का रंग बदला… घबराहट उसकी पलकों पर जमा हो गई, जैसे कोई तूफ़ान आने से पहले का सन्नाटा।

    “देख न एकांश,” अद्वैत की आवाज़ टूटी, “रूहानी को होश नहीं आ रहा है।”

    एकांश की पलकों में चिंता झलक गई। वो तुरंत झुककर फिर से रूहानी के चेहरे के पास आया, उसकी नब्ज़ देखी, हाथ उसके गले के पास रखा, और फिर शांत स्वर में कहा, “भाई, जल्दी से डॉक्टर को बुलाओ… शॉक के कारण हो जाता है। लेकिन रिस्क नहीं ले सकते।”

    अद्वैत ने फौरन फोन उठाया, डॉक्टर को कॉल लगाया, और उसकी आवाज़ में वो घबराहट थी जो दिल को सीधा चीर जाती है। उसका हाथ काँप रहा था, और आँखें बार-बार रूहानी पर टिक रही थीं, जैसे हर पल उससे कहती हों, “तुम ठीक रहो… बस ठीक रहो…”

    फोन के दूसरी तरफ डॉक्टर की आवाज़ आई, “ये सिंकोप लग रहा है, शॉक के कारण। बस उसे लेटाकर पैरों को ऊपर रखो ताकि दिमाग तक खून का प्रवाह बढ़े। अगर दस मिनट में होश नहीं आता, तो क्लिनिक लाना पड़ेगा।”

    अद्वैत ने बिना वक़्त गँवाए एकांश को देखा, दोनों ने एक साथ मिलकर रूहानी को सावधानी से सोफे पर उसके पैरों के नीचे कुछ कुशन रखे। 

    अद्वैत अब ज़मीन पर बैठ चुका था, उसके माथे पर पसीना था, आँखें रूहानी के बंद पलकों पर टिकी थीं, जैसे उसकी हर साँस अब उसी की धड़कनों पर निर्भर हो।

    एकांश कुछ कदम पीछे खड़ा रहा। उसकी आँखों में भी चिंता थी, लेकिन वो जानता था… ये जगह अब सिर्फ उसकी नहीं रही। वहाँ एक और एहसास मौजूद था — अद्वैत का, जो शायद नाम नहीं जानता था… लेकिन महसूस कर चुका था।

    कमरे में अभी भी रूहानी की बेहोशी पसरी हुई थी, उसकी साँसें धीमी, लेकिन जारी थीं। उसकी पलकों पर थमे आँसू अब भी सूखने का नाम नहीं ले रहे थे। 

    बाहर मौसम जैसे कमरे की हालत से मेल खा रहा था…. बादलों से ढँका आसमान, कभी-कभी हल्की बिजली की चमक, और दूर से आती गरज की गूँज। 

    अद्वैत ने एक बार फिर उसकी ओर देखा, मगर इस बार उसकी नज़रें सिर्फ चिंता से भरी नहीं थीं, उनमें उलझन भी थी…. जैसे किसी पहेली के अनसुलझे टुकड़े अचानक आँखों के सामने बिखर गए हों।

    एकांश ने दीवार से टिककर लंबी साँस ली, फिर धीरे-धीरे अद्वैत के पास आया। उसकी चाल में कोई बनावट नहीं थी, बस एक सालों पुरानी थकान थी जो अब बाहर निकलना चाहती थी। 

    अचानक उसने आगे बढ़कर अद्वैत को बाँहों में भर लिया। एक क्षण के लिए दोनों सगे नहीं, मगर खून से बंधे हुए भाइयों की तरह एक-दूसरे के सीने से लग गए।

    “भाई…” एकांश की आवाज़ टूटी, मगर सीधी दिल से निकली, “मेरी शादी की रात… आप अचानक वापस क्यों चले आए थे? बिना बताए… बिना कुछ कहे… मैं आपको पूरे फेरे भर ढूंढता रहा… आप क्यों नहीं रुके?”

    अद्वैत सन्न खड़ा रह गया। उसका चेहरा ठंडा था, मगर आँखों में कुछ टूटता हुआ दिख रहा था।

    ————

    क्या अद्वैत सच में अब महसूस करने लगा है… कुछ ऐसा जो कभी तय नहीं किया गया था?

    रूहानी की बेहोशी में छुपा है कौन-सा सच… और वो होश में आकर सबसे पहला नाम किसका लेगी?

    एकांश का वो सवाल… ‘मेरी शादी के वक़्त आप वापस क्यों चले आए थे?’… क्या ये सब पहले से जुड़ा हुआ था किसी अधूरी कहानी से?

  • अधूरी इबादत भाग~36

    अधूरी इबादत भाग~36

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    भाग~36  तुम… यहाँ क्यों? 

     

    रूहानी की नज़रें उस अलमारी से हटकर अब पूरे कमरे को टटोल रही थीं, जैसे हर चीज़ से एक जवाब माँग रही हो। उसकी उंगलियाँ धीरे-धीरे मेज़, दराज़, और किताबों की कतारों पर फिसलती चली गईं, हर पल उम्मीद और बेचैनी की लहरों से भीगती। 

    तभी उसकी नज़र कमरे के सबसे पिछले कोने में पड़ी—जहाँ एक पुरानी किताबों की गठरी पड़ी थी, धूल की चादर ओढ़े हुए। वह झुकी, और जैसे ही उसने गठरी हटाई, एक फाइलनुमा डायरी उसके हाथों में आ गई… वही हल्का नीला कवर, और किनारे से झांकता हुआ इशिता का नाम। 

    उस पल रूहानी के भीतर जैसे कोई सील टूट गई। सांसें तेज़ हो गईं, और उंगलियाँ काँपने लगीं।

    “यही है…” उसने बुदबुदाकर खुद से कहा, जैसे किसी अपराध की स्वीकारोक्ति कर रही हो।

    कमरे की नीरवता अब और भारी हो गई थी, मानो अद्वैत की मौजूदगी कहीं दीवारों में गूंज रही हो। और वहीं दूसरी ओर, कहीं दूर, एक अनकही सच्चाई उसके इंतज़ार में थी, किसी अधूरे पन्ने की तरह जो खुला तो बहुत कुछ बदल सकता था… शायद सब कुछ।

    रूहानी ने जैसे ही पुरानी किताब का पन्ना खोला, उसमें से एक मोड़ा हुआ ख़त निकल आया। कमरे में हल्की-सी पीली रौशनी थी, चांदनी खिड़की से फर्श पर उतर रही थी और पूरा कमरा एक सन्नाटे की चादर ओढ़े था। दीवार घड़ी की टिक-टिक और बाहर किसी कुत्ते की दूर जाती आवाज़ के सिवा कुछ भी न था।

    उसने गहरी साँस ली, ख़त को खोला और धीमे-धीमे पढ़ने लगी।

    “मुझे आज भी वो दिन साफ़ याद है जब तुमने कहा था कि तुम मुझसे प्यार करोगे। उस दिन, अनजाने में तुमने मेरी कलाई थाम ली थी जब समुद्र की लहरें किनारे से टकरा रही थीं लेकिन उनका शोर भी मेरे दिल की धड़कनों के आगे फीका पड़ गया था।

    मैंने कोशिश की थी, सच में, हज़ारों बार उस दिन को भूल जाने की। लेकिन यह दिल… यह नहीं चाहता कि उस पल को जाने दे। वो पल जब मुझे लगा कि मैं ताउम्र तुमसे मोहब्बत करने वाली हूँ। और मैं चाहती हूँ कि तुम जानो… मैं आज भी तुमसे मोहब्बत करती हूँ, और करती रहूँगी।”

    पढ़ते-पढ़ते रूहानी की उंगलियाँ कांपने लगीं। उसने किताब को बंद किया, ख़त को सावधानी से वापस मोड़ा, और फिर कमरे की खिड़की बंद कर दी। हवा अब भी बाहर बह रही थी, पर कमरे के अंदर जैसे कोई सूनापन घुस आया हो। 

    उसने ख़त को उसी किताब के भीतर वापस रखा, लेकिन वो बेचैनी अब उसकी सांसों से उतरकर उसके दिल में टिक चुकी थी।

    वो उठी और वापिस दबे पाँव सीढ़ियों से नीचे उतरकर कमरे में पहुँची, फिर धीरे-धीरे बिस्तर की ओर बढ़ी। बिस्तर पर गिरते ही वह एकटक छत को घूरने लगी, जैसे वहाँ कोई जवाब छिपा हो। 

    दिल की धड़कनें इतनी तेज़ थीं मानो कोई अंदर से छटपटा रहा हो। गले में अटकी हुई सिसकियाँ अब आँखों से बहकर गालों तक पहुँच गईं।

    रूहानी को खुद नहीं पता था कि वो रो क्यों रही है। पर ये खालीपन, ये टूटापन… किसी तरह सुकून दे रहा था। जैसे एक घाव जो अब खुलकर बह रहा हो। 

    उसे लगा, शायद ये उस एहसास की चुभन है कि वो किसी के लिए भी कभी “काफ़ी” नहीं रही।

    न अपने घर के लिए। 

    न उसके लिए जिन्हें उसने अपना सब कुछ मान लिया था।

    “उसने ही तो मुझे धोखा दिया था… मेरा करियर, मेरा विश्वास…. सबकुछ तोड़ दिया,” रूहानी ने धीमे से खुद से कहा।

    उसकी आँखों में अब आँसू नहीं, बस एक थकी हुई चमक थी… जैसे रो लेने के बाद भी सुकून नहीं, सिर्फ़ थकावट मिली हो।

    रात के उस पहर में, कमरे की दीवारें भी जैसे उसके भीतर की चीखें चुपचाप सुन रही थीं…

    °°°°°°°°°°°°°°°°°°

    रात भर अद्वैत करवटें बदलता रहा, जैसे हर अंग अपने किए पर शर्मिंदा हो। कमरे की दीवारें भी उसके साथ जाग रही थीं, और हर साँस एक बोझ की तरह उसके सीने में उतर रही थी। 

    उसके भीतर एक बेचैनी थी — नहीं, सिर्फ़ इस बात की नहीं कि उसने दरवाज़ा बिना इजाज़त खोला… बल्कि इस डर की कि रूहानी ने उसे वैसा देखा जैसा वो कभी होना नहीं चाहता था। 

    उसके ख्यालों में बार-बार रूहानी की वो नज़रें तैरतीं, जो चोट खाई थीं…. न चिल्लाईं, न तोड़ीं, बस चुपचाप उतर गईं उसकी आत्मा तक।

    सुबह जब हल्की धूप खिड़की के कोनों से सरकती हुई फर्श पर फैल रही थी, अद्वैत बिस्तर छोड़ चुका था। रसोई में जाकर उसने पहला काम किया — इंटरनेट पर सर्च किया: “How to make sandwich and coffee for someone you’ve hurt.” 

    उसकी उँगलियाँ काँप रही थीं, पर दिल में एक अजीब सी ठान थी। उसे खाना बनाना नहीं आता था, पर उसे एहसास आता था। उसने ब्रेड निकाली, टमाटर धीरे-धीरे काटे, चीज़ को बहुत एहतियात से रखा… जैसे हर परत में वह अपनी गलती का इकरार रख रहा हो।

    कॉफी बनाते वक्त उसकी आँखों में नमी थी। भाप से ढँके उसके चश्मे के शीशों में रूहानी की परछाईं थी, वो जो अब दूर लगती थी, पर जिस तक पहुँचने की कोशिश अब भी जारी थी।

    टेबल पर उसने सब कुछ अच्छे से सजाया, कप के पास एक छोटा सा नोट भी रखा, “अगर मेरी खामोशी ने ज़ख़्म दिए, तो ये सुबह मेरी पहली कोशिश है उन्हें भरने की।”

    और ठीक तभी, जैसे वक़्त ने उसकी पुकार सुन ली हो, रूहानी आ गई।

    उसकी चाल में अब भी वही चुप्पी थी, और आँखों में एक अजनबीपन — जैसे रात की नमी अब तक उसकी पलकों पर टिक गई हो। 

    उसने टेबल पर नज़र डाली, फिर अद्वैत की ओर, और कुछ पल तक कुछ नहीं बोली। मगर उन नज़रों में एक सवाल अब नहीं था, सिर्फ एक थकी हुई स्वीकृति थी — कि शायद कुछ रिश्ते माफ़ी से नहीं, कोशिशों से जुड़ते हैं।

    अद्वैत की नज़र जैसे ही रूहानी के चेहरे पर पड़ी, उसका दिल एक पल को थम-सा गया। उसकी आँखों के नीचे हलकी सूजन थी, जैसे कोई चुपचाप पूरी रात अपने आँसुओं से भीगता रहा हो। 

    वो दर्द जो ज़ुबान नहीं कहती, मगर चेहरा छुपा भी नहीं पाता….. अद्वैत ने वो सब कुछ उसकी आँखों में पढ़ लिया था। उसके दिल में एक हूक-सी उठी, जैसे किसी ने उसकी साँसों पर बोझ रख दिया हो। 

    एक बेचैनी, एक आत्मग्लानि, कि वो भी कहीं न कहीं इस उदासी का हिस्सा बन गया है। वो कुछ कह नहीं पाया, बस एक निगाह डाली — नम और शर्मिंदा।

    रूहानी ने धीरे से पूछा, “मीना नहीं आई आज काम पे?”

    अद्वैत थोड़ा झिझका, फिर बोला, “उसके काम करने का टाइमिंग बदल दिया है मैंने…”

    रूहानी ने उसे थोड़ा संदेह से देखा, जैसे दिल में कोई अनकहा सवाल उठ रहा हो।

    अद्वैत ने तुरंत बात सँभाली, उसकी आँखों में डूबते हुए बोला — ‘अगर तुम रोज़ नीचे वाले कमरे में सोओगी, वहीं से तैयार होकर निकलोगी… तो उसे शक हो जाएगा न। और फिर, उसके दोनों बच्चे तो सुबह-सुबह ही स्कूल निकल जाते हैं…’

    उसके लहजे में कोई चालाकी नहीं थी, सिर्फ एक मासूम-सी फ़िक्र थी कि वो इस रिश्ते की परतों को सबके लिए उतना ही अनदेखा रखना चाहता है, जितना कि रूहानी खुद चाहती थी।

    मगर रूहानी की आँखें उस पल कुछ और ढूँढ रही थीं… शायद कोई जवाब, या शायद ये जानना कि क्या अद्वैत की ये परवाह सिर्फ दिखावे की है… या कहीं उसमें कोई और परत भी छुपी है, जो धीरे-धीरे उजागर हो रही है।

    दोनों नाश्ते की मेज पर अभी बैठे ही थे। टेबल पर अद्वैत के हाथों से बनाए गए सैंडविच की खुशबू और कॉफी की भाप धीरे-धीरे कमरे में फैल रही थी। एक अजीब-सी चुप्पी थी दोनों के बीच बोझिल, मगर टूटी नहीं हुई।

    रूहानी ने कॉफी का प्याला उठाया ही था कि अचानक दरवाज़े की घंटी बजी।

    “मैं देखता हूँ,” अद्वैत कुर्सी से उठने लगा, मगर रूहानी ने उसे हल्के से रोक दिया।

    “मैं देखती हूँ,” उसने धीरे से कहा, उसकी आँखों में अब भी पिछली रात की थकान और आज की उलझनें तैर रही थीं।

    वो दरवाज़े की ओर बढ़ी, कदम थोड़े संकोच भरे थे जैसे दिल कुछ अनहोनी का संकेत दे रहा हो। उसने कुंडी खोली, और जैसे ही दरवाज़ा पूरा खुला… उसके सामने खड़ा था – एकांश राठौर 

    वही चेहरा, वही तीखी नज़रें… जो एक समय उसकी रगों में लावा बनकर दौड़ती थीं… अब दरवाज़े पर यूँ खड़ी थीं जैसे वक़्त को चीरकर लौट आई हों।

    “त-तुम…. यहाँ?” रूहानी की आवाज़ उसकी साँसों में ही घुल गई।

    उसका दिमाग एक पल के लिए शून्य हो गया… शब्द गायब, सोचें धुंध में डूबीं और दिल की धड़कन जैसे किसी दूसरे युग में पहुँच गई हो।

    अंदर से अद्वैत ने आवाज़ लगाई, “रूहानी, कौन है?”

    ————-

    क्या रूहानी के अतीत की परछाई, उसके आज की चौखट पर दस्तक देने आई है? 

    अद्वैत… क्या वो जान पाएगा कि ये दस्तक सिर्फ अतीत की नहीं, एक नए तूफ़ान की शुरुआत है? 

    अब जब तीन धड़कनों का वक़्त एक ही कमरे में समा गया है, तो क्या कोई रिश्ता बचेगा… या सब बिखर जाएगा?

  • अधूरी इबादत भाग~35

    अधूरी इबादत भाग~35

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    भाग~35 आँखें जो शर्मिंदा हैं 

     

    अद्वैत वहीं दरवाज़े पर जड़ हो गया था, जैसे वक़्त उसकी साँसों के साथ थम गया हो। कमरे की हल्की पीली रौशनी रूहानी के नम बालों पर पड़कर उसे किसी बारिश में भीगी, अनकही कविता की तरह बना रही थी। 

    उसकी गर्दन से बहकर पायजामे के कपड़े तक पहुँचती पानी की बूंदें, हर उस भावना की गवाही दे रही थीं जो उसने आज तक दबा रखी थीं। 

    मगर अद्वैत के लिए यह दृश्य कोई आम क्षण नहीं था….. यह ऐसा था जैसे किसी पुराने, भरे हुए घाव पर अचानक धूप पड़ जाए। आँखों ने देखा जो दिल कहने से कतराता रहा।

    रूहानी का चेहरा जब आइने में उसकी अपनी परछाई से टकराया और उसने अद्वैत की मौजूदगी को महसूस किया, तो एक सिहरन सी दौड़ गई उसकी रूह तक। 

    वह चौंकी नहीं, मगर उसकी आंखों में एक ऐसी परत चढ़ गई जो शर्म और उलझन दोनों की थी। उसने तुरंत तौलिया उठाकर खुद को ढक लिया, जैसे कोई लहर जो तट से टकराकर लौटती है। 

    उसकी नज़रों में सवाल था, पर ज़ुबान पर सिर्फ वही एक वाक्य निकला, “ऐसे क्या देख रहे हो?”

    उसके स्वर में वो अजनबीपन था, जो दो अजनबियों के बीच बने रिश्ते की दीवार बन जाता है, चाहे वो एक ही छत के नीचे क्यों न रहते हों। 

    अद्वैत को समझ नहीं आया कि वो क्या कहे। उसकी पलकें झपकना भूल गई थीं और दिल एक लय में धड़कना बंद कर चुका था।

    “मैं… माफ़ करना, मैं बस… बस ये पूछने आया था कि… डिनर करोगी क्या?” उसकी आवाज़ जैसे किसी थके हुए दिल से निकली हो, टूटी, हकलाती हुई…. मानो हर शब्द अपने ही अपराध की गवाही दे रहा हो। 

    आँखें ज़मीन पर थीं, जैसे वहाँ खुद को दफना देना चाहता हो, और साँसें बोझिल, जैसे हर पल अपने किए पर शर्म की परतें चढ़ा रहा हो। 

    रूहानी ने उसकी तरफ देखा, आँखों में कहीं हल्का सा कांपता गुस्सा और कहीं एक मौन सी मायूसी तैरती थी। 

    “अद्वैत, हम दोनों जानते हैं कि इस शादी में हमारी अपनी-अपनी सीमाएँ हैं। इस तरह बिना नॉक किए…” वह रुकी, जैसे शब्द गले में अटक गए हों।

    अद्वैत ने कुछ कहने के लिए कदम बढ़ाया, मगर फिर रुक गया। “मैंने दरवाज़ा खटखटाया था… शायद तुमने सुना नहीं।”

    उसके स्वर में कोई सफाई नहीं थी, बस एक बेकसी थी। जैसे कोई खुद से भी नज़रें नहीं मिला पा रहा हो।

    “चाहे कुछ भी हो, हमारी ये… इस कॉन्ट्रैक्ट मैरिज में, निजता सबसे ज़रूरी है,” रूहानी की आवाज़ अब संयत थी, लेकिन उसमें एक थरथराहट थी जो अद्वैत को चीरती चली गई।

    और फिर एक लंबा मौन पसरा, जैसे वक्त खुद भी इस तनाव में घुटने लगा हो।

    अद्वैत ने उसकी आँखों में देखा, उन आँखों में कोई औरत नहीं थी, जो उससे नज़दीकियाँ चाहती हो। वहाँ सिर्फ एक इंसान था, जो खुद को सम्हालने में जुटा था। 

    उसे वह सब याद आ गया…. इशिता की मुस्कान, उसकी आखिरी साँसें और वो वादा कि वो कभी किसी और को अपनी दुनिया में इतनी जगह नहीं देगा।

    फिर भी आज, उस हल्की गीली खुशबू में, रूहानी की मौजूदगी ने उसकी दीवारों में एक दरार डाल दी थी।

    “माफ़ कर देना,” उसने धीरे से कहा और मुड़कर चला गया।

    रूहानी वहीं खड़ी रही, आइने में खुद को देखते हुए, जैसे पहली बार अपने ही चेहरे को समझने की कोशिश कर रही हो।

    अंदर कुछ टूटने जैसा था, मगर उससे भी ज़्यादा कुछ जुड़ने जैसा भी। मगर ये जुड़ाव कोई प्रेम नहीं था… ये सिर्फ दो जिंदगियों के बीच के मौन का पहला शब्द था।

    और बाहर, अद्वैत की चाल में एक ऐसा बोझ था जो उसने खुद अपने लिए चुना था… प्यार की कब्र पर खड़ा होकर किसी और की साँसें महसूस करना।

    °°°°°°°°°°°°°°°°°

    डिनर टेबल पर दोनों आमने-सामने बैठे थे, लेकिन उनके बीच की खामोशी किसी अथाह गहराई जैसी थी….. ठंडी, स्थिर और बोझिल। कमरे की रौशनी हल्की थी, और हर चम्मच की आवाज़ दीवारों से टकराकर लौटती थी जैसे कोई सूनी पुकार। 

    अद्वैत की निगाहें थाली में थीं, पर वो कुछ देख नहीं रहा था। हर निवाला जैसे एक गवाही था उसके अंदर के अपराधबोध की, उस एक पल की जब उसने रूहानी की निजता के आँगन में बिना अनुमति कदम रख दिया था।

    रूहानी चुपचाप खा रही थी, मगर उसके चेहरे पर कहीं कोई जीवन नहीं था। उसकी पलकों की झपक भी जैसे भारी हो गई थी, जैसे वह अपने ही भीतर की बेचैनी को छिपाने की कोशिश कर रही हो। 

    उसके जेहन में अभी भी अद्वैत की वो नज़रें थी…. गहराई तक जाती, पर न समझती, सिर्फ देखती हुई। वह नज़र जो इंसान को समझने नहीं, बस छूने आई थी, और वह छुअन… किसी आँधी जैसी थी…. तेज, असहज, और बिना चेतावनी।

    अद्वैत ने भीतर ही भीतर कई बार कोशिश की कि कुछ कह सके। कोई माफ़ी, कोई स्पष्टीकरण, कोई ऐसा शब्द जो इन तनों हुई नसों को थोड़ा ढीला कर दे। मगर हर बार कुछ अजीब-सा डर उसके शब्दों को गला देता। जैसे किसी पुराने वादे की लाश उसके गले में फँसी हो। 

    वह जानता था, उसके अतीत की परछाइयाँ आज भी उसके वर्तमान में साँस ले रही थीं…. उसकी पहली पत्नी की छवि, उसकी यादें, और उसका वादा कि वह किसी और को उस जगह तक नहीं पहुँचने देगा।

    रूहानी ने बिना कुछ कहे धीरे से अपनी प्लेट सरकाई और उठ खड़ी हुई। कुर्सी की आवाज़ जैसे उस सन्नाटे को तोड़ने की एक बेकार कोशिश थी। 

    अद्वैत ने सिर उठाया और उनकी नज़रों की टकराहट ने एक पल को वक्त रोक दिया। उसमें कोई शब्द नहीं थे, बस भाव थे… टूटी उम्मीदें, अनकही शिकायतें, और कोई अजनबी सी आत्मीयता जिसे दोनों ने पहचानने से इनकार कर दिया।

    “मैं थक गई हूँ,” रूहानी ने बहुत धीमे, बहुत संयत स्वर में कहा। मगर इस थकान में नींद नहीं थी, इस थकान में टूटन थी — उस बोझ की, जिसे वो रोज़ ढो रही थी, उस रिश्ते की जो काग़ज़ पर था, मगर दिलों में कभी नहीं बसा।

    अद्वैत कुछ कहना चाहता था, बहुत कुछ। मगर शब्द उसकी ज़ुबान तक आते-आते जल जाते। वह सिर्फ उसे जाते हुए देखता रहा, जैसे कोई धुंध में लिपटा साया पीछे छूट रहा हो।

    टेबल पर रखी दो अधूरी थालियाँ अब भी वहीं थीं…. ठंडी, चुप, और गवाह उस रात की, जब दो लोग साथ थे, मगर फिर भी एक-दूसरे से बहुत दूर।

    °°°°°°°°°°°°°°°

    रूहानी बिस्तर पर थी, मगर मन किसी और समय में उलझा था — करवटें नहीं, अब तो जैसे आत्मा ही बेचैन थी… तकिए पर सिर रखते ही उसे अपने अंदर कोई धीमा तूफान सुनाई देता….. एक बेचैनी, जो थमती नहीं थी। नींद आँखों के किनारों तक आकर लौट जाती थी, जैसे उसे भी इस मौन की भाषा समझ न आ रही हो… बिल्कुल किसी अपने की तरह जो पास होकर भी अजनबी लगने लगे। 

    हर बार जब वो आंखें मूंदती, अद्वैत की वो नज़रें सामने आ खड़ी होतीं…. नरम, संकोच भरी, लेकिन कहीं भीतर कुछ कहती हुई। वो नज़रें जिनमें कोई पुराना दुख छिपा था, कोई अधूरा वादा, और वो खामोशी जो चीखने जैसी थी।

    उसने करवट ली और एकाएक उसे ख्याल आया…. सुबह जब वो पहली मंज़िल में गई थी, तो अद्वैत का स्टडी रूम लॉक नहीं था। ये बात उसे अभी याद आई, और अजीब बात ये थी कि वो कमरा हमेशा बंद रहता था। 

    उसके भीतर कुछ खिंचा, कोई पुरानी डोर जैसे खुद-ब-खुद खिंचने लगी। वह उठी, बिना चप्पलों के, नंगे पाँव, और दबे क़दमों से सीढ़ियाँ चढ़ने लगी। घर की दीवारें साँसें रोककर जैसे उसका पीछा कर रही थीं।

    स्टडी रूम के बाहर आकर वो रुकी। साँसें धीमी थीं, लेकिन दिल की धड़कनें जैसे कानों में गूंज रही थीं। दरवाज़ा सच में खुला था। उसका हाथ थोड़ा कांपा, उसने हँथेली दरवाज़े पर रखा, पर खोलने से पहले एक और सवाल भीतर से उठा….. 

    क्या ये सही होगा? 

    क्या ये भी वही गलती नहीं होगी जो आज अद्वैत ने की थी? 

    क्या मैं भी उसकी निजता में झाँकने जा रही हूँ?

    लेकिन वो एक पन्ना… वो किताब… और उसमें लिखा इशिता का नाम… रूहानी का मन अब पीछे हटने को तैयार नहीं था। 

    उसने धीरे से दरवाज़ा खोला….. कमरे में हल्की-सी लकड़ी की महक थी, और खिड़की से आती चांदनी सीधे उस खाली खुली अलमारी पर पड़ रही थी, जहाँ वो किताब रखी जाती थी।

    मगर वो खाली थी।

    वहाँ कुछ नहीं था…. न किताब, न वो टुकड़ा 

    जो उसके भीतर के सारे सवालों को जिंदा कर गया था। 

    ————

    तो क्या अद्वैत जानता था कि वो वहाँ आएगी?

    क्या ये सिर्फ एक इत्तेफ़ाक था… या कोई अधूरी कहानी, जो खुद को छुपा रही थी?

    अगर किताब वहाँ नहीं थी….. तो फिर… इशिता की यादों का बोझ अब किसके पास था? 

  • अधूरी इबादत भाग~34

    अधूरी इबादत भाग~34

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    भाग~34 नज़रें जब मिलें 

     

    धनौरी की उस धूलभरी सड़क पर, जहाँ हर मोड़ जैसे किसी अधूरे किस्से की तरह चुप खड़ा था, रूहानी की सांसें एक अनकहे डर और उम्मीद के दो सिरों के बीच झूल रही थीं। 

    उस पुरानी दुकान के सामने खड़े होकर उसने पल भर को आँखें बंद कीं…. मन ही मन अपनी माँ की वो बात याद आई, “हर सपना एक कीमत मांगता है, बेटा… सिर्फ पैसों की नहीं, हिम्मत की भी।” लेकिन उस वृद्ध दुकानदार की जिद और चालाकी ने जैसे उसकी उम्मीदों पर पानी फेर दिया था।

    पर तभी मीना, जो अब तक शांत खड़ी थी, एकदम से बोल पड़ी, “बाबूजी, आप तो कह रहे थे कि आपको शाम की फ्लाइट है विदेश जाने की, और बेटा कह रहा था कि सारी प्रॉपर्टी बेचकर ही आना। अब अगर आप यही दुकान नहीं बेचेंगे, तो क्या बाकी टाइम बचा है जाने का?”

    उसके शब्दों में कुछ ऐसा था जो दुकानदार को भीतर तक छू गया। वह चुप हुआ, फिर गहरी साँस लेकर बोला, “ठीक है… तुम लोग बार-बार पूछ रहे हो, और मुझे भी अब देर नहीं करनी। लो, बीस लाख में तय रहा, पर आज ही कागज़ात पूरे होंगे।”

    रूहानी की साँस जैसे एक झटके में लौट आई। एक पल के लिए उसे सब कुछ थमता सा महसूस हुआ, जैसे आसमान पर छाए बादल अचानक हट गए हों। उसने अपने बैग से दस्तावेज़ और पैसे निकाले, और कांपते हाथों से कागज़ात उसके सामने रख दिए। 

    दुकानदार ने भी एक पुराना फाइल खोला और दोनों ने कागज़ों पर दस्तखत किए। रूहानी ने ध्यान से पढ़ा, हर लाइन को जाँचा, और जब आखिरी हस्ताक्षर किए, तो ऐसा लगा मानो उसने सिर्फ एक दुकान नहीं खरीदी, बल्कि अपने सपनों को एक ठिकाना दे दिया हो।

    कागज़ साइन करने के बाद, वो कुर्सी से उठी, जैसे किसी जीत का बोझ उसके कंधों से उतर गया हो।

    उस पल रूहानी को कोई परवाह नहीं थी कि किसने उस दुकान को खरीदने की कोशिश की थी। अब वो जगह उसकी थी….. उसकी पहचान, उसकी मेहनत, उसका सपना। 

    “अब कोई भी मुझे इस राह से पीछे नहीं कर सकता,” उसने मन ही मन कहा।

    जैसे ही रूहानी को दुकान की चाबी मिली, उसकी मुट्ठी कस गई… वो सिर्फ धातु का एक टुकड़ा नहीं थी, बल्कि उसकी मेहनत, संघर्ष और उम्मीदों की चाबी थी। उसने उसे हथेली में भरकर कुछ पल के लिए अपनी आँखें मूँद लीं, मानो उस धड़कते हुए पल को आत्मा में समेट लेना चाहती हो। 

    फिर वह हल्के क़दमों से मीना की ओर मुड़ी और धीमे स्वर में बोली, “मीना, अब तुम विमान नगर वापस चली जाओ। मुझे हडपसर जाना है… वहाँ पुराने स्टूडियो का जो किराया बकाया है, वो चुकता करना है।”

    मीना ने थोड़ा चौंकते हुए कहा, “मैडम, चलिए मैं भी साथ चलती हूँ…”

    रूहानी ने उसकी तरफ देख मुस्कुराते हुए सिर हिलाया, “नहीं मीना, आज अकेले जाने का मन है… ये सफर मेरा है। और तुम्हारे बच्चे भी घर पर अकेले होंगे, उनके बारे में भी तो सोचो। कल वापस आ जाना, बहुत सारा काम भी रहेगा।”

    मीना थोड़ी मायूस होकर चुप हो गई, लेकिन रूहानी के चेहरे पर जो विश्वास की चमक थी, उसने उसे और कुछ कहने नहीं दिया। वो चुपचाप विदा लेकर चली गई।

    हडपसर पहुँचते-पहुँचते दिन हल्का सा ढलने लगा था। स्टूडियो के बाहर खड़ी रूहानी ने एक बार फिर उस पुरानी इमारत को देखा…. धूल में लिपटा वो सपना, जिसे आज वो साफ करने आई थी। 

    पुराने मकान मालिक से मिलकर उसने बाकी का किराया अदा किया, और पक्की रसीद ली। बुजुर्ग ने उसे दुआ देते हुए कहा, “बिटिया, इस बार अपना सपना अधूरा मत छोड़ना।”

    लौटते वक़्त, रूहानी खुद से बुदबुदाई, “अब भी मेरे पास चार लाख हैं… उसी से मैं रिनोवेशन करवा लूंगी। और जो भी ज़रूरत का सामान होगा, मशीन, कपड़ा, डिजाइनिंग टेबल — सब कुछ ले आऊंगी।”

    उसके चेहरे पर अब थकावट नहीं थी… थी तो सिर्फ़ उम्मीद की चमक और एक नर्म-सी मुस्कान — जैसे ज़िंदगी पहली बार उसकी ओर बढ़ी हो, बिना किसी शर्त के।

    रूहानी जैसे ही सड़क किनारे कैब रोकने लगी, उसकी नज़र सामने से आ रहे एक दुबले-पतले, स्कूल यूनिफॉर्म में सजे लड़के पर पड़ी।

    सड़क पार करता वह लड़का पलभर में उसे पहचान गया। उसकी आँखों में चमक उभरी, “दीदी!” 

    वह दौड़कर रूहानी की ओर लपका। रूहानी की साँस जैसे रुक गई हो, वर्षों से भुलाया कोई एहसास दिल में दस्तक देने लगा।

    दोनों बहन-भाई गले लगे, कसकर, जैसे वक्त के हर बीते पल को समेट लेना चाहते हों। रूहानी ने उसकी पीठ पर हाथ फेरते हुए पूछा, “कैसा है मेरा छोटा यश? और मम्मी-पापा कैसे हैं?”

    यश ने चुपचाप खुद को अलग किया और थोड़ा रूठे हुए स्वर में कहा, “आपकी वजह से ही अब मैं आपको फोन नहीं करता, दीदी। आप ही ने तो कहा था ना, मुझसे कोई संपर्क मत करना… वरना मम्मी-पापा मेरा फ़ोन भी छीन लेंगे।”

    रूहानी की आँखें भीग आईं, लेकिन उसने मुस्कुराने की कोशिश की। कुछ पल चुप रहकर वो बोली, “मैंने ऐसा इसलिए कहा था यश… क्योंकि मैं नहीं चाहती कि मेरी वजह से तुम्हें डाँट पड़े। तू उनके लाडले बेटे है, वो तुझे बहुत चाहते हैं।”

    यश ने गर्दन झुकाई और धीमे से कहा, “हाँ… लेकिन फिर भी, मैं बहुत अकेला हो गया हूँ दीदी। दोस्तों के बीच तो रहता हूँ… पर वो जो बात जीजाजी में है… वो किसी में नहीं। आप जानती हो, मैं रोज़ उनके बारे में सबको बताता हूँ… जीजू ऐसे, जीजू वैसे…”

    रूहानी बस उसकी हाँ में हाँ मिलाती रही, हल्की मुस्कान के पीछे बहुत कुछ छुपाते हुए। 

    फिर उसने उसकी कंधे पर हाथ रखकर कहा, “मुझे अब निकलना होगा यश… नहीं तो विमान नगर पहुँचते-पहुँचते रात बहुत हो जाएगी।”

    यश ने चुपचाप सिर हिलाया, लेकिन उसकी आँखों में जो कसक थी, वो दूर तक रूहानी का पीछा करती रही।

    °°°°°°°°°°°°°°°°°

    जब रूहानी विमान नगर अद्वैत के घर पहुँची, तो उसकी रूहानी की सारी थकान जैसे एक पल में झलकने लगी। सीधे अपने कमरे में जाकर नहाने चली गई, बिना यह सोचे कि अद्वैत घर में है या नहीं।

    सुबह से बाहर भाग-दौड़, मानसिक उलझनों और सपनों की जद्दोजहद ने उसे थका दिया था। बाथरूम से निकली तो उसने ढीले पायजामा सेट को पहना था, जो हल्का रंग का था और भीगते बालों से गीला हो चुका था। 

    वह तौलिये से अपने गीले बालों को धीरे-धीरे थपकाते हुए सूखाने की कोशिश में लगी थी, जैसे हर बूंद उसके भीतर की सारी बेचैनी को बहा ले जा रही हो।

    उसने बिल्कुल भी महसूस नहीं किया कि अद्वैत उसके कमरे के बाहर खड़ा है, डिनर के लिए पूछने आया था, लेकिन अद्वैत का दिल जैसे रुक-रुक कर धड़क रहा था। 

    उसकी आँखें रूहानी के हर छोटे-छोटे हाव-भाव को बड़े ही बारीकी से देख रही थीं…. उसके भीगे बाल, जो उसकी नाजुक गर्दन पर गिर रहे थे, तौलिये की कोमल छुअन, और वो हल्का सा कंपकपाना जो उसके चेहरे पर था। 

    अंदर एक अजीब सी गर्माहट उठ रही थी, जिसे वह खुद भी समझ नहीं पा रहा था। 

    उसकी सांसें धीरे-धीरे तेज हो रही थीं, और दिल की गहराइयों में कोई अनकहा सवाल उठ रहा था। 

    क्या ये सही है, क्या उसने अपने मन को इस तरह खो दिया? 

    रूहानी ने जैसे ही आइने में अपनी परछाई देखी, उसे महसूस हुआ कि कोई दरवाजे के पास खड़ा है। वह तुरन्त तौलिये को अपने गर्दन और साइन के उस हिस्से पर ले आई, जहाँ पानी की बूंदें गिरी थीं।

    अद्वैत को खड़ा पाकर उसने सकपकाते हुए कहा, “ऐसे क्या देख रहे हो?” उसकी आवाज़ में नश्तर की तरह कड़कपन और एक छुपी हुई शर्मिंदगी दोनों झलक रही थी।

    —————–

    क्या रूहानी के सपनों की ये दुकान सचमुच उसकी आज़ादी की चाबी बनेगी, या उसके अतीत के साये फिर से उस पर मंडराएंगे?

    क्या अद्वैत के उस खामोश नज़र में छुपा वो अनकहा सवाल, रूहानी के दिल की सबसे नाज़ुक जगह को छू पाएगा, या दोनों के बीच की दीवारें और गहरी होंगी?